अम्बिकापुर, 19 अगस्त। रक्षाबंधन के उपलक्ष्य में तुलसी साहित्य समिति के द्वारा केशरवानी भवन में वरिष्ठ साहित्यकार व पूर्व विकासखंड शिक्षा अधिकारी एसपी जायसवाल की अध्यक्षता में सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शायर-ए-शहर यादव विकास, विशिष्ट अतिथि गीता मर्मज्ञ पं. रामनारायण शर्मा, सच्चिदानंद पाण्डेय, कवयित्री आशा पाण्डेय, चंद्रभूषण मिश्र और फिल्मकार आनंद सिंह यादव थे। संचालन समिति की कार्यकारी अध्यक्ष कवयित्री माधुरी जायसवाल ने किया।
गोष्ठी का शुभारंभ कवयित्री माधुरी जायसवाल ने सुंदर सरस्वती-वंदना से किया। पं. रामनारायण शर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन मूलत: एक हिन्दू त्योहार है, जिसमें बहन भाई के हाथ में राखी बांधती है। भाई रक्षा का संकल्प करते हुए बहन को उपहार प्रदान करता है। ब्राम्हण अपने यजमान को राखी बांधकर शिक्षा के द्वारा रक्षा करने का वचन देते हैं। प्रकृति के संरक्षण के लिए आजकल वृक्षों को भी राखी बांधने की परपंरा है। इस दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सदस्य परस्पर भाईचारा के लिए एक-दूसरे को भगवा रंग की राखी बांधते है। परस्पर प्रेम-व्यवहार परिवार और समाज में बना-रहे ,यही रक्षाबंधन पर्व का प्रमुख उद्देश्य है। कविवर एसपी जायसवाल ने रक्षाबंधन की पौराणिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए बताया कि देवासुर संग्राम में जब देवताओं की हार हो रही थी, तब देवगुरु वृहस्पति की सलाह पर शची ने अपने पति इन्द्र को मंत्रोच्चारित राखी बांधी जिससे इन्द्र की विजय हुई और असुरों को हार का सामना करना पड़ा। महाभारत में श्रीकृष्ण और द्रौपदी को भाई-बहन माना गया है। शिशुपाल का वध करते समय भगवान श्रीकृष्ण की तर्जनी उंगली कट गई थी। द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाडकर उनकी उंगली में पट्टी बांध कर स्नेह प्रदर्शन किया तो श्रीकृष्ण ने भी एक भाई का कर्तव्य निभाते हुए चीरहरण के समय बहन द्रौपदी की रक्षा की थी। वह दिन श्रावण पूर्णिमा का था। इसी प्रकार मेवाड़ की रानी कर्णावती के द्वारा भेजी गई राखी को स्वीकार कर बादशाह हुमायूं ने आक्रमणकारी बहादुर शाह को पराजित कर मेवाड़ की रक्षा की थी।
वरिष्ठ व्याख्याता सच्चिदानंद पाण्डेय का कहना था कि भाई-बहन का नाता संसार में सबसे अनूठा और ख़ास होता है। रक्षाबंधन का पर्व इस पवित्र रिश्ते को और भी प्रगाढ़, चिरस्थाई और नितनवीन बनाए रखता है। कार्यक्रम को पेंशनर्स समाज के जिलाध्यक्ष हरिशंकर सिंह ने भी संबोधित किया और सबको रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं।
काव्यगोष्ठी में कवयित्री माधुरी जायसवाल ने एक मार्मिक कविता पेश की जिसमें उनका भाई न होने का दर्द छलक पड़ा- मैं हूं बहन मगर मेरे भाई नहीं हैं। है राखी सजी पर कलाई नही है। बधाई है उन्हें, जिन्हें भाई मिले हैं। रक्षाबंधन पर खुशियों के खजाने मिले हैं। सदा खुश रहें वे, राहों में फूल खिले हैं !
कवयित्री आशा पाण्डेय ने रेशम की डोरी को जीवन का सार बताया- भाई-बहन के प्रेम का, बंधन ही आधार। रेशम-डोरी में रहे, जीवन का है सार। करती बहना कामना, संकट सब हो दूर। जीवन खुशियों से भरा, रहे भ्रात भरपूर ! संस्था के अध्यक्ष दोहाकार व शायर मुकुन्दलाल साहू ने अपने दोहों में रक्षाबंधन पर्व को एक अनुपम त्योहार बताया- भाई-बहनों में करे, मधुर प्रेम संचार। रक्षाबंधन-सा नहीं, कोई भी त्योहार।
अपने भाई पर नहीं, किस बहना को गर्व। प्रेम बढाने आ गया, रक्षाबंधन पर्व। राखी भाई के लिए है अनुपम उपहार। इसके आगे कुछ नहीं, हीरों का भी हार। कवयित्री सीमा तिवारी ने राखी को यादगार बनाने हेतु भाइयों को एक प्यारा और मीठा-सा उपदेश दिया- भाई ! अपनी बहन का, रखना हरदम ध्यान। उसके होंठों पर खिले, सदा मधुर मुस्कान। फिल्मकार आनंद सिंह यादव ने अपने दोहे में भाई-बहन के पवित्र नाते की सच्चाई बयां की- भाई-बहनों की यहां, भले अलग हो राह। एक-दूसरे की मगर, रहती है परवाह ! वरिष्ठ कवि एसपी जायसवाल ने अपनी सरगुजिहा कविता में रक्षाबंधन के उमंग और उल्लास का मधुरिम चित्रण किया- राखी में मोर बहिन आइस। खुशी कर मारे झूम गंए। बहिन संग बहनोई आइस, ओमन संग भांचा-भांची आइन खुशी कर मारे झूम गंए ! गोष्ठी में देशभक्तिपूर्ण रचनाओं ने भी समा बांध दिया। राष्ट्रीय पर्वो को उत्साह से मनाने का गीतात्मक आह्वान कविवर श्यामबिहारी पाण्डेय ने किया- राष्ट्र के सफर में आता है ऐसा दिन। सबके ह्दय में जोश जगाता है ऐसा दिन। हैं टूटती बोझिल पड़ीं जंजीरें, तब गीत नवबिहान के गाता है ऐसा दिन ! आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर ने राष्ट्र के लिए जीने-मरने को ही सच्चा राष्ट्रधर्म बताते हुए कविता पेश की- साठ साल की आयु में रहेंगे जेल या जंगल में।
राष्ट्र-धरा को रक्त से सींचा नहीं जिसने, राष्ट्रहित में द्रव्यदान किया नहीं जिसने-धिक-धिक-धिक्कार है ! लोकगायिका व कवयित्री पूर्णिमा पटेल ने भारत माता को प्रमाण करते हुए उसके लिए सर्वस्व बलिदान करने का संकल्प दोहराया- सूरज-चांद-सितारों -सा चमके तेरा नाम। मेरे देश की धरती तुझे सलाम। तेरी आन बचाने को मैं अपना शीश कटा दूं, तेरी शान में भारतमाता सबकुछ तुम्हें चढा दूूं ! इनके अलावा काव्यगोष्ठी में कविवर उमाकांत पाण्डेय, चंन्द्रभूषण मिश्र, अजय श्रीवास्तव और अम्बरीष कश्यप ने भी देश भक्ति की उत्कृष्ठ रचनाएं प्रस्तुत कीं। अंत में शायर-ए-शहर यादव विकास की इस बेमिसाल और पुरअसर गज़़ल से कार्यक्रम का यादगार समापन हुआ- धुआं हर सिम्त उठता है, हवाओं जागते रहना ! ए नजऱों जागते रहना, नज़ारों जागते रहना ! चमन की खैरियत से खैरियत है गुलों का रंग। दरख्तों जागते रहना, फज़़ाओं जागते रहना। वतन में रंग बरसे, नूर बरसे, चांदनी बरसे। दुआओं के लिए तुम भी घटाओं जागते रहना ! समिति की उपाध्यक्ष कवयित्री आशा पाण्डेय ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर लीला यादव, मदालसा, आशी गुप्ता के अलावा केशरवानी वैश्य सभा के उपाध्यक्ष मनीलाल गुप्ता भी उपस्थित रहे।