बेमेतरा
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बेमेतरा, 20 अप्रैल। माटी की महक और लोक संस्कृति का अनूठा संगम शहरों व ग्रामीणों में देखने को मिला।
अक्षय तृतीया यानि अक्ती पर समूचा अंचल उत्सव के रंग में सराबोर नजर आया। गाँव-गाँव में अक्षय तृतीया (अक्ती) पर मिट्टी के गुड्डा-गुडिय़ा (पुतरा-पुतरी) का विवाह एक प्रमुख और पारंपरिक उत्सव है, जो अब ग्रामीण संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। बच्चे इन गुड्डों को सजाधजा कर, तेल-हल्दी लगाकर और बारात निकालकर शादियों की तरह विवाह की रस्में निभाते हैं।
कृषि कार्य की शुरुआत और बच्चों को वैवाहिक जिम्मेदारियां सिखाने का प्रतीक है। अक्षय तृतीया पर गुड्डा-गुडिय़ा विवाह की यह परम्परा बरसों से चली आ रही है। जिसमें छोटे छोटे बच्चे मिट्टी के गुड्डे-गुडिय़ों की शादी रचाते हैं। बच्चों द्वारा बाकायदा मौर-मुकुट बांधकर, हल्दी-तेल चढ़ाकर, मंडप सजाकर और बारात गाजे-बाजे के साथ लाकर शादी करवाई जाती है। छोटे-छोटे बच्चे इस पुतरा और पुतरी के विवाह से जुडक़र खूब मजा लेते हैं। इस कार्य में घर के माता-पिता और बड़े भाई बहन भी खूब सहयोग करते हैं।
इस तरह से यह पुतरा और पुतरी का विवाह बड़े लडक़ों और लड़कियों जैसा आनंददायक बन जाता है। छोटे-छोटे बच्चे अपने घर के आसपास के परिवारों को भोजन में भी आमंत्रित करते हैं और बाजे गाजे के साथ हर रस्म को पूरी संजीदगी के साथ निभाते हैं। यह खेल-खेल में बच्चों को विवाह और जिम्मेदारियों का ज्ञान देने का एक तरीका है, साथ ही यह अच्छी फसल के लिए ‘माटी पूजन’ से भी जुड़ा है। इस अवसर पर गांव-गांव के बाजारों में मिट्टी के सुंदर गुड्डा-गुडिय़ा, मोर, मटका और चुनरी की दुकानें सजती हैं, जो 50 से 150 रुपये तक में मिलते हैं।
गांव-गांव में यह त्यौहार बच्चों के लिए मनोरंजन और संस्कृति से जुडऩे का बड़ा दिन होता है। यह पर्व छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन में नई फसल की तैयारी और बच्चों में संस्कार के रूप में मनाया जाता है।सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। देशभर में जहां अक्षय तृतीया के दिन मां लक्ष्मी का पूजन किया जाता है। वहीं छत्तीसगढ़ में अक्षय तृतीया को ‘अक्ती’ के नाम से जाता है और इस दिन गुड्डा-गुडिय़ा की शादी करने की बड़ी सुन्दर परंपरा है।
चुलमाटी, हल्दी एवं पुतरा-पुतरी का विवाह रहा आकर्षण का केंद्र
रानो में बच्चों ने नवाचारी शिक्षिका प्रतीक जैन के मार्गदर्शन में अक्ति तिहार बहुत ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया। विवाह के जैसे ही बच्चों ने सारी चीजों की बहुत ही अच्छी तैयारी की थी। सर्वप्रथम सभी चुलमाटी के लिए गए। वहाँ दीप जलाकर पूजा की तथा वहाँ की मिट्टी लेकर आए।फिऱ हल्दी कार्यक्रम शुरू हुआ सभी ने गुड्डा गुडिय़ा एवं एक दूसरे को हल्दी लगाया। उसके बाद उनका विवाह कराया गया तथा सभी ने टिकावन भी टीका।
नवाचारी शिक्षिका प्रतीक जैन ने बताया कि अक्ति तिहार को अक्षय तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। यह छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख पारम्परिक त्यौहार है। जो कि वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है। इसे कृषि के नए मौसम की शुरुआत, समृद्धि एवं सौभाग्य के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मिट्टी के गुड्डे गुडिय़ों का विवाह, कृषि औज़ारों की पूजा तथा माटी पूजन भी किया जाता है। गाँव गाँव में बच्चे मिट्टी के गुड्डे गुडिय़ा बनाकर उनका विवाह करते हैं। मान्यता है कि इस दिन शुरू किया गया काम अक्षय फल देता है।


