बलौदा बाजार
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बलौदाबाजार, 6 अप्रैल। अक्टूबर नवंबर में खेतों में फसलों की कटाई के लिए आए किसान एक बार फिर रोजी-रोटी की तलाश में महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से लेकर नॉर्थ इंडिया के अलग-अलग इलाकों में पलायन करने लगे हैं। कारण एकमात्र रोजी-रोटी बलौदाबाजार शहर के आसपास ही आधा दर्जन से ज्यादा सीमेंट प्लांट होने के बाद भी कामगार दूसरे राज्यों में प्रवास करने के लिए मजबूर है क्योंकि यहां लोकल मजदूरों को काम नहीं दिया जाता।
अब जब खेती का काम समाप्त हो चुका है तो 5 माह बाद मजदूर फिर रोजी-रोटी की खातिर घर द्वार छोडक़र दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं। मौजूदा स्थिति यह है कि गरीब 80 हजार से अधिक मजदूर जिले से पलायन कर चुके हैं। आने वाले दिनों में आंकड़ा एक लाख के पार पहुंचाने की आशंका हैं। सबसे ज्यादा कसडोल की हालत खराब हैं। खास तौर पर कोलिहा, कोसमसरा, नंदनिया, पर सदा, डोगरीडीह, डोगरा, तिल्दा, बाजार भाटा, गंगई, सुनसुनिया और लाटा में तो लगभग आधा गांव ही खाली हो चुका हैं।
5 साल में किसानों को रोजगार पता ही नहीं
पिछले 5 साल में कितने बेरोजगारों को रोजगार मिला रोजगार कार्यालय इसका स्पष्ट आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं करवा सका। ऐसे में रोजगार दिलाने की प्रक्रिया और व्यवस्थाओं पर सवाल उठने लगे हैं, वहीं बेरोजगारों में निराशा लगातार बढ़ती जा रही हैं। मामले में जिला प्रशासन का कहना है कि कौशल विकास के तहत युवाओं को प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप के माध्यम से उद्योगों में अवसर दिलाने की पहल की जा रही हैं। हम होंगे कामयाब योजना के तहत अन्य राज्यों में भी रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा हैं।
आधा दर्जन से ज्यादा प्लांट फिर भी रोजगार नहीं
जिले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आधा दर्जन से अधिक विश्वस्तरीय सीमेंट संयंत्र संचालित हैं। इसके बावजूद स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिल पा रहा हैं। यहां एक ओर बड़े-बड़े उद्योग क्षेत्र के विकास और रोजगार सीजन का दावा करते हैं। वहीं दूसरी ओर यहां के निवासी काम की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां बाहरी प्रशिक्षित श्रमिकों को प्राथमिकता देती है जबकि स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण और अवसर दोनों की कमी का सामना करना पड़ता हैं।
कोरोना काल में लौटे सवा लाख लोग फिर वही हाल
कोरोना काल में जिले में बाहर से लौटे प्रवासी मजदूरों की संख्या 1.25 लाख से अधिक दर्ज की गई थी। उस समय शासन प्रशासन द्वारा अस्थायी तौर पर रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए थे। हालांकि अब फिर से वही हालत हैं।
शिकायत मिलने पर ही कार्यवाही संभव एसपी
बलौदाबाजार एसपी अभिषेक सिंह ने कहा कि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से रोजगार के लिए बाहर जाता है तो रोक नहीं सकते। अगर दलालों द्वारा बहला फुसलाकर मजदूरों को ले जाने की शिकायत मिलती हैं तो पुलिस जरूर कार्रवाई करेगी।
जिले में पंजीकृत शिक्षित बेरोजगारों की संख्या 70 हजार के आसपास है जबकि अर्ध शिक्षित और अशिक्षित बेरोजगारों की संख्या इससे दो-तीन गुना अधिक हैं। पलायन के पीछे मुख्य कारण ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी कृषि पर निर्भरता और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों की कमी हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होने से बेरोजगारों को स्थाई आए नहीं मिलती।
औद्योगिक इकाइयों में स्थानीय श्रमिकों को प्राथमिकता ना मिलना भी समस्या को बढ़ता हैं। इसके साथ ही कौशल विकास की कमी और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग बाहर जाने को मजबूर होते हैं। पलायन अब सामाजिक प्रवृत्ति बनता जा रहा हैं, जिसे रोकने के लिए स्थानीय रोजगार सृजन जरूरी हैं।
पलायन की मुख्य प्रमुख वजहें जानिए
1. कृषि कार्य खत्म-नवंबर में फसल कटाई के बाद खेतों में काम बंद हो जाता है फिर गांव में कोई विकल्प रोजगार उपलब्ध नहीं रहता। ऐसे में मजदूर दूसरे राज्यों में जाते हैं। 2 स्थानीय उद्योगों में काम नहीं- जिले के सीमेंट प्लांट में बाहरी और प्रशिक्षित श्रमिकों को प्राथमिकता है, जबकि स्थानीय लोगों को अवसर नहीं मिलता। 3. योजनाओं का क्रियान्वयन- मनरेगा जैसी योजना का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा। समय पर काम नहीं भुगतान में देरी और सीमित कार्य अवसर से पलायन की स्थिति बनती हैं। 4. मशीनों का उपयोग- निर्माण कार्यों और सरकारी परियोजनाओं में श्रमिक मशीनों का अधिक उपयोग किया जा रहा हैं। इससे मानव श्रम की जरूरत काम हो गई हैं। 5. परिवार का दबाव- गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों के लिए रोज कमाना और रोज खाना ही जीवन का आधार हैं। जब गांव में आय का कोई साधन नहीं बचता तो परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता हैं।
-प्रोफेसर सी.के.चंद्रवंशी
समाजशास्त्र विभाग डीके कॉलेज बलौदाबाजार.


