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-गिरीश नेगी
ऊर्जा आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए एक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण निवेष है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी विद्युत ऊर्जा उपभोक्ता वाला देश है, जो भारत की 2015 के ऊर्जा सांख्यिकी के अनुसार दुनिया की कुल वार्षिक ऊर्जा खपत का लगभग 4.4 प्रतिशत है। भारत के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आकङों के अनुसार, विश्व में प्रति व्यक्ति 2873 किलोवाट प्रति घंटा विद्युत ऊर्जा खपत की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत अभी भी बहुत कम (1010 किलोवाट प्रति घंटा) है, और इस विद्युत खपत को सामाजिक - आर्थिक विकास के लिए बढ़ाने की आवश्यकता है।
भारत वर्तमान में अपने सकल बिजली उत्पादन का लगभग 63 फीसदी तापीय ऊर्जा प्लांटों से और लगभग 24 फीसदी जल-विद्युत परियोजनाओं (ज.वि.प.) से उत्पन्न करता है, जो मुख्य रूप से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं। भारतवर्ष में विद्युत ऊर्जा की पूर्ति में अक्षय ऊर्जा एवं ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों में से जल-विद्युत ऊर्जा पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किफायती एवं सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु भी अनुकूल साबित हो सकती है।
उत्तराखंड राज्य में मौजूद, ग्लेशियर एवं बर्फानी नदियों से लगभग 20,000 मेगावाट जल-विद्युत क्षमता उत्पन्न होने का अनुमान है, हालांकि इस क्षमता का लगभग 4000 मेगावाट ही अब तक विकसित कर उपयोग में लाया जा सका है, अतः इन नदियों की एक बड़ी ऊर्जा क्षमता को अभी भी उपयोग में लाना बाकी है। उत्तराखण्ड में वर्तमान में, 25 जल-विद्युत परियोजना (6 मध्यम एवं 19 लघु) 2378 मेगावाट क्षमता के साथ निर्माणरत चरण में हैं, तथा 21,213 मेगावाट क्षमता वाली 197 जल-विद्युत परियोजनाएं उत्तराखंड के विभिन्न नदी घाटियों में प्रस्तावित हैं।
इस क्षेत्र के संवेदनशील पर्यावरणीय परिवेश को संरक्षित करने हेतु इन नदी घाटी परियोजनाओं में से उत्तरकाषी जिले में धराॅसू से गंगोत्री के बीच संपूर्ण भागीरथी नदी के जलग्रहण क्षेत्र को पर्यावरण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा राजपत्र अधिसूचना संख्या 2429 दिनांक 18 दिसंबर 2012 के अन्र्तगत पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया। जिसके अनुपालन में भागीरथी नदी घाटी के तीन प्रमुख भावी प्रस्तावित/निर्माणाधीन ज.वि.प., पाला मनेरी, भैरोंघाटी; दोनों प्रस्तावित एवं लोहारीनाग पाला (निर्माणाधीन) का निर्माण कार्य रोक दिया गया था।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में ज.वि.प. का निर्माण विवादास्पद रहा है अत्एव पर्यावरण तथा सामाजिक सरोकारों के प्रति जवाबदेही हेतु इन परियोजनाओं पर सामूहिक चर्चा आवश्यक है।
इस विषय पर प्रकाशित साहित्य में जल विद्युत परियोजनाओं के प्रभाव पर स्थानीय लोगों एवं अन्य हितधारकों की धारणाएं सामाजिक ताने-बाने में परिवर्तन, जनसांख्यिकी बदलाव वनों, जैव विविधता व कृषि भूमि के नुकसान पर केन्द्रित रहीं है। अतः प्रमुख सुझावों में इन प्रभावों को न्यून्तम रखनें हेतु ज.वि.प. के निर्माण के दौरान पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को सम्मिलित करते हुए स्थानीय लोगों के हितों का ध्यान रखे जाने की जरूरत महसूस की जाती रही है।
उत्तराखंड में टिहरी ज.वि.प. के अलावा अन्य ज.वि.प. के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों पर भारतीय हिमालयी क्षेत्र से कई रिपोर्टें उपलब्ध हैं। एक सर्वाधिक चर्चित रिपोर्ट में दिल्ली विष्वविद्यालय के पंडित एवं ग्रुम्बिन (2012) ने मॉडलिंग का उपयोग करते हुए भारतीय हिमालय क्षेत्र में 292 बांधों (निर्माणाधीन और प्रस्तावित) का वर्गीकरण करके अनुमान लगाया कि इन परियोजनाओं से 54,117 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलमग्न हो जाएगा एवं 114,361 हेक्टेयर क्षेत्र बांध से संबंधित गतिविधियों से क्षतिग्रस्त हो जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2025 तक 22 पुष्पीय पौंधों एवं 7 कशेरुकीय जन्तु प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी।
हालांकि, इस संदर्भ में गढवाल वि. वि. के पूर्व कुलपति एवं प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी प्रो. एस. पी. सिंह व डाॅ. थडानी (2015) का मत है कि पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन हेतु कमजोर कार्यप्रणाली एवं जमीनी स्तर पर अध्ययन आधारित अपर्याप्त आकङों का उपयोग किया जाता है, जिससे ज.वि.प. के प्रभावों की सटीकता का स्तर बहस योग्य हो जाता है।
अतः पर्यावरणीय प्रभावों की बेहतर निगरानी के लिए अधिकाधिक जमीनी सच्चाई पर आधारित आकङों के आदान-प्रदान की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। कुल मिलाकर, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में बड़े बांधों के निर्माण के बजाय लघु पनबिजली परियोजनाओं के लिए स्थानीय निवासियों एवं पर्यावरणविदों में एक आम सहमति बनती प्रतीत होती है।
प्रस्तुत लेख उत्तराखंड की भागीरथी नदी में निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित तीन ज.वि.प. क्रमषः लोहारीनाग पाला (600 मेगावाट निर्माणाधीन), मनेरी भाली फेज-प् (90 मेगावाट) एवं मनेरी भाली फेज-प्प् (304 मेगावाट) दोनों विद्युत उत्पादन कर रही ज.वि.प. में से प्रथम निर्माणाधीन ज.वि.प. को माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेष द्वारा रोकने के एक वर्ष बाद सकारात्मक एवं नकारात्मक पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का 140 परियोजनाओं प्रभावित परिवारों की धारणा पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित पायलट अध्ययन के तहत लेखक की टीम द्वारा 2009-10 में किये गये शोध कार्य पर आधारित है।
भागीरथी नदी के तट पर स्थित उत्तरकाशी जिले का मुख्यालय उत्तरकाशी नगर सामाजिक-राजनीतिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र हैए एवं ऐतिहासिक रूप से एक समृद्ध पौराणिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। उत्तराखण्ड के अन्य क्षेत्रों की भाॅति बार-बार भूगर्भीय हलचलों के कारण यह क्षेत्र पर्यावरणीय आपदाओं हेतु अत्यधिक संवेदनषील है। इस संदर्भ में अक्टूबर 1991 में आये उत्तरकाषी भूकम्प का स्मरण करना आवश्यक होगा जिसमें लगभग 768 से भी अधिक लोगों की जान चली गयी थी एवं चल- अचल सम्पति को लगभग 6 करोङ डालर की क्षति हुई थी। यह क्षेत्र भागीरथी नदी की मत्स्य विविधता सहित वनस्पतियों और जीवों की विविधता में भी समृद्ध है।
भागीरथी नदी गंगोत्री ग्लेशियर के गौमुख (ऊंचाई 3892 मीटर) से निकलती है एवं कई सहायक नदियों के जल प्रवाह को समेटे हुए टिहरी जिले के देवप्रयाग में एक प्रमुख हिमानी नदी (अलकनंदा नदी) के साथ मिलकर आगे गंगा नदी कहलाती है। भागीरथी नदी अपनी पौराणिक मान्यताओं के लिए पूजनीय है। साल भर भागीरथी नदी के किनारे कई मेले, त्यौहार (जैसे, कंडारी देवता/डोलियाँ) एवं अनुष्ठान किए जाते हैं। गंगा नदी के आत्म-शुद्धिकरण, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व को स्वीकार करते हुए, इसे वर्ष 2008 में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था।
इस नदी पर बाँध और नहर बनाकर ज.वि.प. हेतु जल के प्राकृतिक बहाव को रोकने पर पर्यावरणविदों एवं स्थानीय लोगों की गहरी सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक लोकाचार में बाधा के रूप में देखा जा रहा है। भागीरथी नदी घाटी क्षेत्र में धरासूॅ से गंगोत्री के बीच 23 ज.वि.प. (सूक्ष्म से मध्यम परियोजनाओं) निर्माणरत् या प्रस्तावित है। उनमें से, 18 ज.वि.प. भागीरथी नदी की सहायक नदीयों/उपनदियों पर प्रस्तावित हैं, जबकि केवल 5 ज.वि.प. (सभी मध्यम आकार) भागीरथी नदी पर प्रस्तावित हैं। इनमें से केवल दो ज.वि.प. (मनेरी भाली स्टेज-एक एवं मनेरी भाली स्टेज-दो) का निर्माण पूर्व में ही किया जा चुका था जो कि वर्तमान में विद्युत पैदा कर रही है। जबकि लोहारीनाग पाला ज.वि.प. वर्ष 2009 की शुरुआत में निर्माण चरण में थी एवं उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार इसका निर्माण रोक दिया गया था।
मनेरी भाली फेेज-एक (90 मेगावाट) जल विद्युत परियोजना में वर्ष 1984 में विद्युत उत्पादन शुरू हो गया था, जिससे विगत 35 वर्षों से बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इस जल विद्युत परियोजना के अंतर्गत (आंशिक/पूर्णतया) परियोजना-प्रभावित गांवों में जामक, हीना, सिरोर एवं मनेरी शामिल हैं। इस परियोजना के अंतर्गत भागीरथी नदी पर बने मनेरी बांध (39 मीटर ऊँचा और 127 मीटर चौड़ा) के पानी को 8.6 किलोमीटर लंबी 4.75 मीटर गोलाई की उच्च दबाव वाली सुरंग से रन-ऑफ-द-रिवर विधि से 90 मेगावाट क्षमता वाली तिलोथ विद्युत गृह (उत्तरकाषी) को जल आपूर्ति करती है।
तिलोथ विद्युत गृह पर यह जल पुनः भागीरथी नदी में प्रवाहित हो जाता है जो कि मनेरी भाली स्टेज-दो परियोजना (स्थापित क्षमता 4 × 76 त्र 304 मेगावाट) के उत्तरकाषी नगर के पास बने 81 मीटर ऊंचें बांध में जमा होकर 16 किमी लंबी एवं 6 मीटर व्यास वाली सुरंग से धरासू बिजली घर तक ले जाया जाता है एवं यह जल आगे पुनः भागीरथी नदी में मिलकर टिहरी जल विद्युत परियोजना में प्रयुक्त हो जाता है।
इस परियोजना से 2008 में विद्युत उत्पादन शुरू हो गया था एवं इससे पिछले 10 वर्षों से बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत प्रभावित (आंशिक/पूर्ण रूप से) ग्रामों में पुजार, गुयाना, ढुंगी, सिंगुडी, कुरीगाड और दयाली शामिल हैं। लोहारीनाग पाला रन-ऑफ-द-रिवर निर्माणाधीन परियोजना (150 × 4: 600 मेगावाट) हेतु भागीरथी नदी पर 8 मीटर ऊंची जलधारा मोड़ने हेतु एक संरचना प्रस्तावित है, जो भागीरथी नदी के जल को सुरंग से लोहारीनाग से पाला बिजली घर तक ले जाने हेतु निर्मित होनी थी।
इस परियोजना की 2006 में हुई निर्माण गतिविधियाँ लगभग आधी हो चुकने के बाद इसे पर्यावरणविदों के भारी विरोध के कारण वर्ष 2009 में रोक दिया गया और इसे अंततः 2010 में मा0 सुप्रीम कोर्ट के आदेषानुसार इसे बंद कर दिया गया था। इसके अंतर्गत 12 आंशिक व पूर्ण रूप से प्रभावित गांवों में सुक्की, सुनगढ, कुॅजन, पाला, भटवाङी, भुकी, भंगेली, तेहार, बर्सू, क्यार्की, सालंग और हुर्री शामिल हैं।
लेखक एवं उनकी टीम द्वारा उपरोक्त तीन परियोजनाओं के पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर लोगों की धारणा को समझने के लिए परियोजना प्रभावित गांवों के परिवारों में गहन साक्षात्कार एवं फोकस समूह चर्चा (एफजीडी) सहित अन्य अनुसंधान विधियां प्रयुक्त की गईं जिसमें परियोजनाओं के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में चिंताओं और धारणाओं पर आधारित 33 प्रभावों (नकारात्मक/सकारात्मक) की एक चेकलिस्ट तैयार की गई, जिनमेंः (1) जैव विविधता प्रभाव (8 बिन्दु), (2) पर्यावरणीय प्रभाव (12 बिन्दु ं), (3) सामाजिक-आर्थिक प्रभाव (8 बिन्दुं) एवं (4) सांस्कृतिक प्रभाव (5 बिन्दु) शामिल थे।
हमारी परियोजना टीम ने उपरोक्त तीन परियोजनाओं के विभिन्न ग्रामों में 140 परियोजना-प्रभावित लोगों के बीच इस चेकलिस्ट को लेकर व्यक्तिगत संवाद किया। इसके अतिरिक्त हमने इन ज.वि.प के स्थानीय कार्यालयों में दस्तावेजों का अध्ययन एवं उपलब्ध ज.वि.प. कर्मियों से भी साक्षात्कार किया। अतः व्यक्तिगत साक्षात्कार पर आधारित उत्तरदाताओं द्वारा बताऐ गए इन प्रभावों की (सूची “सकारात्मक“/“नकारात्मक“ प्रभाव/कोई प्रभाव नहीं/ पता नहीं) चार श्रेणियों में संकलित की गई।
इसके अलावा, उपरोक्त सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों का परियोजनाओं से सम्बन्ध होने पर उत्तरदाताओं की प्रतिक्रिया “हाँ“ या “नहीं“ में दर्ज की गई एवं पूर्वाग्रह को कम करने के लिए तीन परियोजना में से दो हां या नहीं को “निर्णायक“ माना गया। अध्ययन से प्राप्त आकङों एवं निष्कर्ष को परियोजनाओं के अनुसार निम्नवत प्रस्तुत किया गया है।
मनेरी भाली स्टेज-एक
इस परियोजना के 38 प्रभावित परिवारों के 55-73 प्रतिशत उत्तरदाताओं की धारणा थी कि वन्य आवास विखंडन (73 प्रतशित), चारागाह (68%), वनस्पतियां एवं वन्य जीवों की आबादी (55%) जल विद्युत परियोजना से प्रभावित नहीं हुए हैं। क्योंकि यह परियोजना आज से लगभग 35 वर्ष पूर्व बनी थी, अतः वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार इस ज.वि.प के निर्माण चरण के दौरान वनस्पतियों में कुछ नुकसान देखा गया जो कि अब स्थिर है, अपितु परियोजना अधिकारियों द्वारा किये गये वृक्षारोपण के कारण भी वनस्पतियों में वृद्धि हुई।
पुनः 42-55 प्रतशित लोगों की धारणा थी कि परियोजना के कर्मचारियों द्वारा दूध और सब्जियों की अधिक मांग के कारण विशेष रूप से पशुधन एवं कृषि कार्य में वृद्धि हुई। परियोजना-प्रभावित लोगों के आधे से अधिक (52 प्रतिशत) ने परियोजना के बांध के कारण मछलियों की विविधता में भी वृद्धि की बात कही।
शत-प्रतिषत ग्रामीणों के अनुसार विशेष रूप से सर्दियों के दौरान नदी के प्रवाह में कमी के कारण नदी तट की ओर बढ़ती हुई मानव गतिविधियों को मुख्य नकारात्मक प्रभावों में माना गया। परियोजना में कार्यरत बाह्य लोगों के आने से चोरी की घटनाओं एवं सांस्कृतिक संक्रमण जैसी सामाजिक बुराइयों में वृद्धि को भी नकारात्मक प्रभावों के संदर्भ में 71 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा महसूस किया गया।
अन्य नकारात्मक प्रभावों में 60-95 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा भागीरथी घाटी में वर्षा (82 प्रतिशत) एवं प्राकृतिक सौंदर्य (74 प्रतिशत) में कमी तथा तापमान (95%), जल प्रदूषण (76%) एवं वायु प्रदूषण (60%) में वृद्धि के रूप में इंगित की गई। फोकल समूह चर्चा से ज्ञात हुआ कि ज.वि.प का निर्माण चरण समाप्त होने के बाद, वायु और ध्वनि प्रदूषण निर्णायक रूप से कम हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि परियोजना-प्रभावित लोगों द्वारा जल विद्युत परियोजना का कोई भी ठोस नकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव महसूस नहीं किया गया। इसके बजाय, 79-82 प्रतिशत लोगों ने परियोजना और उससे संबंधित गतिविधियों के कारण सार्वजनिक सुविधाओं में वृद्धि (84%), पर्यटन (82%) और जीवन स्तर में सुधार (79%) जैसे सकारात्मक प्रभाव का पक्ष लिया।
हमने देखा कि इस परियोजना का गाद निष्कासन स्थल स्थानीय लोगों के लिए एक पर्यटन स्थल बन गया है जहां पर स्थानीय बेरोजगार युवाओं द्वारा दो दुकानें खोली गई हैं। जल विद्युत परियोजना के उल्लेखनीय सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभावों में 79-95 प्रतिशत लोगों द्वारा पर्यावरणीय जागरूकता (95%) एवं धार्मिक त्योहारों (79%) में वृद्धि महसूस की गई।
मनेरी भाली स्टेज- दो
इसके प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत छह गांवों के 59 परिवारों के 49-83 प्रतिशत उत्तरदाताओं की धारणा के अनुसार जैव विविधता पर उल्लेखनीय नकारात्मक प्रभावों में पहाड़ी ढलानों पर परिेयोजना हेतु सम्पर्क मार्ग निर्माण से उत्पन्न मलवे के पर्वतों के ढाल पर निस्तारण के कारण वनस्पतियों/जीवों (83%), कृषि (83%), चारागाह भूमि (77%), वन्यजीव आबादी में कमी (56%), प्राकृतिक आवास के विखंडन (48%) एवं खरपतवारों में वृद्धि (49%) को माना गया।
उन्होंने शिकायत की कि परियोजना के बांध से अचानक जल बहाव के कारण कभी-कभी नदी के तट पर निचले क्षेत्रों में चराई/पानी पीने के लिए आने वाले पालतू पशु बह जाते हैं। इन लोगों में से 22-37 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मनेरी भाली परियोजना के जलाशय के आसपास नए पक्षियों की उपस्थिति (22%) और मत्स्य विविधता (37%) में वृद्धि को सकारात्मक प्रभाव के रूप में स्वीकार किया।
हालांकि, 39 प्रतिशत परियोजना-प्रभावित लोगों ने कहा कि नदी के प्रवाह में गिरावट से मछली पकड़ने के अवसरों में वृद्धि के कारण मछलियों कि प्रजातियां घट रही है। इनके द्वारा इंगित प्रमुख नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों में, जल प्रदूषण (100% ), भागीरथी नदी के जल प्रवाह में कमी (90%), नदी घाटी की सुन्दरता में कमी (90%), वर्षा की मात्रा में कमी (83%) एवं वायु प्रदूषण (85%), ध्वनि प्रदूषण (81%), वायु तापमान (78%), नदी किनारों के मृदा अपरदन (68%), भूस्खलन (63%) तथा नदी के तट से रेत और पत्थर का उत्खनन (62%) एवं नदी तट में मानव जनित गंदगी में वृद्धि (58%) को स्वीकार किया गया।
प्रमुख सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों में 56-75ः उत्तरदाताओं द्वारा परिवहन के साधनों (75%), दूरसंचार (63%), चिकित्सा, शिक्षा एवं सार्वजनिक-सुविधाओं में वृद्धि (56%) के रूप में महसूस की गई। लेकिन इन सुविधाओं का ज.वि.प. के साथ कोई संबंध होना नहीं बताया गया। एमबी-प्प् ज.वि.प. के भाली बांध जलाशय के कारण पर्यटन में वृद्धि को 51ः परियोजना-प्रभावित लोगों द्वारा स्वीकार किया गया। उल्लेखनीय नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभावों में, धार्मिक त्योहारों (53%) और भागीरथी नदी के प्रति श्रद्धा में कमी (50%) को स्वीकार किया गया। लेकिन इन्हीं में से 72ः उत्तरदाताओं ने पर्यावरण जागरूकता में वृद्धि को परियोजना का सकारात्मक प्रभाव माना।
लोहारीनाग पाला ज.वि.प. के प्रभाव क्षेत्र में पड़ने वाले 12 गाँवों में स्थित 43 परियोजना-प्रभावित परिवारों की धारणा के आधार पर 51-84ः उत्तरदाताओं ने जैव विविधता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों में, वनस्पतियों/जीवों (84%), कृषि (81%), चारागाह भूमि (77%) एवं वन्यजीवों की आबादी में कमी (53%), वन्य जीव निवास स्थान विखंडन (53%) एवं खरपतवार में वृद्धि (51%) को माना गया।
हालांकि, चरागाह भूमि में कमी के विपरीत, परियोजना-प्रभावित 65% लोगों ने स्वीकार किया कि पशुधन की आबादी स्थिर बनी हुई है। वन्य जीवों हेतु भोजन तथा जल की कमी के कारण वन्यजीव आबादी में आई गिरावट को 50ः से अधिक उत्तरदाताओं ने नकारात्मक प्रभाव के रूप में महसूस किया। अन्य नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों में 84-100% उत्तरदाताओं ने नदी के जल (100%), वायु (88%) एवं ध्वनि प्रदूषण (84%) में वृद्धि, परियोजना में कार्यरत स्टोन क्रशर से उत्पन्न धूल, निर्माण सामग्री के परिवहन के लिए बड़े वाहनों की आवाजाही एवं ईंधन दहन से उत्पन्न धुआ, सड़क निर्माण हेतु चट्टानों में ब्लास्टिंग इत्यादि कारण बतलाये गये।
इसके अलावा, भागीरथी नदी की जलराषि में कमी से उत्पन्न हुई मानव की समीपता के कारण नदी तट पर बढ रहे अतिक्रमण और घाटी की सौंदर्यता में आई गिरावट क्रमशः 76-86% परियोजना-प्रभावित लोगों की चिंता थी। पुनः 63-77% उत्तरदाताओं द्वारा वर्षा की मात्रा में कमी (77%), हवा के तापमान में वृद्धि (72%), मिट्टी के कटाव में एवं, भूस्खलन में वृद्धि (65%) एवं पहाड़ी ढलानों पर निर्माण का मलबा गिरने के कारण नदी में गंदगी (63 प्रतिशत) को भी परियोजना के महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभावों से जोड़ा।
सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के रूप में 37-72 प्रतिशत उत्तरदाताओं की धारणा थी कि परिवहन के साधनों में हुई उल्लेखनीय वृद्धि के कारण कुंजन, तिहाड़ और भंगेली जैसे गांवों का सड़क से जुड़ाव (37 प्रतिशत), दूरसंचार (72 प्रतिशत), चिकित्सा (67 प्रतिशत), शिक्षा (56 प्रतिशत) और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं (53 प्रतिशत) में वृद्धि हुई है।
विस्तृत चर्चा में स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि को अंकित किया क्योंकि इन ग्रामों में उपलब्ध सब्जी एवं दूध को अब ज.वि.प. के कर्मचारियों को बेचा जाता है एवं स्थानीय बाजार में ले जाया जा सकता है, जो कि पूर्व में मोटर सड़क न होने के कारण बाजार में नहीं बेचा जा सकता था। उल्लेखनीय नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभावों में 51 प्रतिशत परियोजना-प्रभावित लोगों ने नदी के किनारे धार्मिक त्योहारों में कमी और सामाजिक बुराइयों में वृद्धि होना बताया।
इस अध्ययन के निष्कर्ष पर पहुचने हेतु तीनों जल विद्युत परियोजनाओं के प्रभावित लोगों की धारणा के संदर्भ में प्राप्त आकड़ों पर सावधानी से अवलोकन करने से बेहतर उपयोगी अंतर्दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। इस अध्ययन में भूगर्भीय रूप से संवेदनशील एवं जैव विविधता व सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भागीरथी नदी पर धरासूं-गंगोत्री क्षेत्र के बीच निर्मित ज.वि.प. के प्रभावों (नकारात्मक और सकारात्मक) पर प्रभावित लोगों की धारणा को समझने की कोशिश की है।
इस अध्ययन में शामिल दो परियोजनाओं क्रमश: पिछले 30 वर्षों से (एमबी-एक) और पिछले 10 वर्षों से (एमबी-दो) बिजली पैदा कर रही है जबकि लोहारीनाग पाला ज.वि.प. का निर्माण प्रस्तुत अध्ययन के किए जाने से ठीक पहले बंद हो गया था। अतएव, यह अध्ययन परियोजनाओं के प्रभावों की दोनों स्थितियों (चालू/निर्माणाधीन) को प्रस्तुत करता है।
परिणामतः इन तीन परियोजनाओं के बारे में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के कारण परियोजना के नकारात्मक/सकारात्मक प्रभावों पर लोगों की धारणाएँ भिन्न पाई गयी। परन्तु इन तीनों परियोजनाओं के प्रभावित ग्रामीणों द्वारा यह समान रूप से माना कि वायुमंडल के तापमान में वृद्धि एवं वर्षा में आई गिरावट परियोजना से संबंधित है, परन्तु इन धारणा को बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन के सच नहीं माना जा सकता है।
इसी प्रकार परियोजनाओं से धार्मिक उत्सवों में आई कमी को विशेष रूप से लोहारीनाग पाला परियोजना के हेतु सत्य नही माना जा सकता, क्योंकि वहां अभी भागीरथी नदी में कोई बैराज नहीं बना है एवं नदी का प्रवाह अभी भी अपनी प्राकृतिक स्थिति में बना हुआ है।
जैव-विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों पर स्थानीय लोगों की धारणा में एमबी-एक परियोजना प्रभावित लोगों में से आधे से अधिक लोगों द्वारा कृषि फसलों एवं भागीरथी नदी में मत्स्य प्रजाति की विविधता में वृद्धि महसूस की गई। जबकि वन्यजीवों की आबादी में कमी, वनस्पतियों/जीवों के निवास स्थान के विखंडन और चारागाह भूमि के ह्रास के संबंध में एमबी-एक के आधे से अधिक परियोजना प्रभावित लोगों ने माना कि यह परियोजना से संबंधित नहीं है।
एमबी-दो एवं एलएनपी के प्रभावित लोगों ने वनस्पतियों/जीवों, कृषि फसलों, चारागाह भूमि, वन्यजीव की आबादी में कमी एवं वन्य जीवों के निवास स्थानों के विखंडन और खरपतवारों की वृद्धि को जैव विविधता पर महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभावों के रूप में दर्ज किया। कृषि कार्य एवं पषुधन में आई कमी को एमबी-दो एवं एलएनपी ज.वि.प. के प्रभावितों ने नकारात्मक प्रभाव के रूप में माना। हालांकि उत्तराखण्ड के अन्य क्षेत्रों की भांति इस क्षेत्र में भी लोगों की बदलती जीवन शैली और नौकरी की तलाश में आवास-प्रवासन के लिए कृषि और पशुधन आबादी में कमी को अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। अतः यह प्रभाव पूरी तरह से ज.वि.प. के लिए निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता।
यह स्पष्ट है कि भागीरथी नदी घाटी में तीनों ज.वि.प. के प्रभाव स्वरूप नदी के बहाव में कमी एवं भागीरथी नदी घाटी के सौदर्य में 90ः से भी अधिक उत्तरदाताओं ने गिरावट महसूस की। उल्लेखनीय नकारात्मक प्रभावों में वायु, जल, एवं ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि, नदी तट क्षेत्र में अतिक्रमण और नदी तट में गंदगी, रेत एवं पत्थर के उत्खनन, मृदा अपरदन, एवं भूस्खलन में वृद्धि एमबी-दो और एलएनपी ज.वि.प. के आधे से अधिक परियोजना प्रभावित लोगों द्वारा सूचित किए गए।
भागीरथी नदी से बहाव को तुरन्त एमबी-एक और एमबी-दो दोनों ज.वि.प. के जलाशय से एकाएक छोड़ा जाना (विशेष रूप से सर्दियों के महीनों के दौरान जब बर्फ का पिघलना कम रहता है) को नदी की तटीय पारिस्थितिकी के लिए चिंता का विषय माना। हालांकि लगभग तीन दषक पूर्व एमबी-प् के निर्माण के दौरान सड़क के किनारे होने वाले भूस्खलन अब स्थिर हो जाने से लोगों द्वारा भुला दिए गए है जो उनके द्वारा नकारात्मक प्रभावों की सूची में नहीं रखें गये।
भटवाड़ी और गंगनानी (एलएनपी परियोजना क्षेत्र में पड़ने वाले ग्राम) क्षेत्र भूगर्भीय कारकों की दृष्टि से भूस्खलन हेतु सबसे संवेदनशील क्षेत्र हैं। पुनः मानवजनित गतिविधियों द्वारा इस संवेदनषीलता में वृद्धि होने से अक्सर ज.वि.प. को ही भूस्खलन हेतु जिम्मेवार ठहराया जाता हैं। फोकल समूह चर्चा से यह खुलासा हुआ कि ज.वि.प. निर्माण के लिए होने वाले ब्लास्टिंग पर्वतीय ढलान को अस्थिर करता है, इससे घरों में दरार और कुछ क्षेत्रों में जलस्रोत सूखने (एमबी-एक के जामक गांव और एमबी-दो के सिंगुडी और पुजार गांव) के लिए स्थानीय निवासियों ने जिम्मेदार ठहराया। ब्लास्टिंग के कारण भू-गर्भीय संरचना में हुई गड़बड़ी को इंकार नहीं किया जा सकता है जिसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।
एलएनपी परियोजना क्षेत्र में फोकल समूह चर्चा से खुलासा हुआ कि, ज.वि.प. के स्टोन क्रशर और लोडिंग वाहनों से उत्पन्न होने वाली धूल, सेब के फूलों में परागकण एवं पत्तियों के प्रकाष संष्लेषण को प्रभावित करती है, जिसे फसलों की पैदावार में कमी और उपज में गिरावट का कारण माना गया जिसे कि अन्य वैज्ञानिकों द्वारा भी साबित किया जा चुका है।
इसके अलावा धूल जमने के कारण आसपास की दुकानों में विक्रय हेतु रखे संमान की गुणवत्ता घट जाने के कारण वस्तुओं बिक्री भी प्रभावित होती हैं। उपरोक्त अलग-अलग उदाहरणों के जरिए लोगों नेे बड़ी परियोजनाओं के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए रन-ऑफ-द-रिवर एवं छोटी जल विद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा देने का समर्थन किया।
यह विदित है कि ज.वि.प. के ग्रामीण क्षेत्र की पिछड़ी अर्थव्यवस्था के कारण आधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं। परियोजना के परिणामस्वरूप सकारात्मक परिणामों के रूप में सड़क मार्ग, दूरसंचार, चिकित्सा और शिक्षा सुविधाओं में वृद्धि को महसूस किया गया जबकि ये सुविधाएं सरकार के विकास कार्यक्रमों से ज्यादा संबंधित रही होंगी। स्पष्टतया ग्रामीणों में इस जानकारी के अभाव से इस धारणा को बल मिला होगा कि जल विद्युत परियोजनाओं के आने से उनके ग्रामों में मूलभूत सुविधाओं का विकास हो पाया।
परियोजना-प्रभावित लोगों की इस धारणा का समर्थन इस तथ्य से भी होता है कि गरीबी से त्रस्त ग्रामीणों में ज.वि.प. के द्वारा रोजगार सृजन उल्लेखनीय रूप से सकारात्मक प्रभाव लाया है। उदाहरण के लिए, एलएनपी के निर्माण के दौरान, 480 ग्रामीणों को (2500-5000 रू. प्रति महीनें) अकुशल से लेकर उच्च कुशल मजदूरी का रोजगार मिला था। लेकिन एलएनपी परियोजना के बन्द हो जाने के परिणामस्वरूप, इन स्थानीय लोगों ने अपनी नौकरियां खो दीं एवं उन्होनें उक्त ज.वि.प. को पुनः शुरू करने के लिए प्रयास किये एवं वह इस परियोजना के निर्माण के समर्थक थे। इन ग्रामीणों को प्रत्यक्ष रोजगार लाभ के अलावा, सड़क संपर्क की सुविधा और अपने उत्पादों जैसे दूध और सब्जियों को बेचने के लिए बाजार की उपलब्धता हुई।
उदाहरण के लिए, एमबी-एक और एमबी-दो के आसपास के लोगों ने स्वीकार किया कि ज.वि.प. कर्मचारियों मे दूध की बढ़ती माँग के कारण वे अब अतिरिक्त गायों और भैंसों को पालने लगे हैं। इसलिए, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र में जहां विकास अपेक्षित गति से नही हो सका है, परियोजनाएं लोगों की आशा के अनुरूप नौकरी के अवसरों एवं अवस्थापना विकास से जीवन स्तर में आंषिक सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान करती हैं, लेकिन इन परियोजनाओं के निर्माण में प्राकृतिक संसाधनों की भारी लागत आती है, जिसका आर्थिक आकलन आवश्यक है।
उत्तराखंड की अलकनंदा घाटी में दो ज.वि.प. के एक मामले के अध्ययन में ऐलन इत्यादि; 2013 के माध्यम से यह सुझाव आया कि उत्तराखंड में परियोजना का विकास, निर्णय लेने में सुधार, समानता को बढ़ावा देने एवं सतत् विकास के अवसर पैदा करने के लिए सहभागी बन सकता है। परियोजना-प्रभावित लोगों के कौशल वृद्धि एवं उनकों रियायती दर पर बिजली के प्रावधान का उपयोग करने से वैकल्पिक आजीविका विकल्प जैसे- पर्यटन और कुटीर उद्योग हो सकते हैं।
जैसा कि पहले बताया गया है भागीरथी नदी घाटी की ज.वि.प. को रोकने का एक मजबूत कारण माॅ गंगा नदी का स्रोत, एवं इससे जुड़ी सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक लोकाचार थी। अतः सांस्कृतिक प्रभावों पर लोगों द्वारा व्यक्त धारणा का सावधानीपूर्वक परीक्षण आवश्यक है। एमबी-एक के 79 प्रतिशत परियोजना-प्रभावित लोगों की धारणा के अनुसार धार्मिक त्योहारों में वृद्धि एवं भागीरथी नदी के प्रति श्रद्धा में कोई अन्तर नहीं आया है। जिसे एमबी-दो और एलएनपी के आधे से अधिक परियोजना-प्रभावित लोगों के द्वारा आ रही कमी में माना गया और इसे ज.वि.प. से संबंधित पाया गया।
इसके अलावा, सामाजिक बुराइयों में वृद्धि को आधे से अधिक लोगों ने ज.वि.प. में कार्यरत बाहरी लोगों से जुड़ा हुआ होना बताया। तीनों ज.वि.प. के 79 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव स्थानीय लोगों में पर्यावरणीय जागरूकता के रूप में बताया गया। इसे एक सकारात्मक संकेत के रूप में लिया जा सकता है, क्योंकि लोग अपनी प्राकृतिक संपत्ति की उपयोगिता के बारे में अब अधिक जानने लगे हैं और इसे विकासात्मक गतिविधियों के कारण होने वाले नुकसान से बचाने हेतु संरक्षण और संवर्धन के लिए आगे आने लगे हैं।
यह वास्तविकता है कि उत्तराखण्ड में ऊर्जा की मांग जनसंख्या वृद्धि (प्रति वर्ष कम से कम 1.8ः की दर से) और शहरीकरण के साथ तेजी से बढ़ रही है। इस प्रदेष में बिजली खपत के चरम घंटों के दौरान विद्युत मांग और आपूर्ति में कमी प्रति व्यक्ति वर्ष 2012 में 1012 किलोवाट प्रति घंटा से बढ़कर वर्ष 2015 में 1154 किलोवाट प्रति घंटा पाई गई।
इस अंतर को पाटने के लिए बायोगैस प्लांट, लकङी गैसीफायर-आधारित पॉवर प्लांट, सोलर वाटर हीटर, सोलर पीवी प्लांट, पवन ऊर्जा और बायोडीजल जैसे कार्बन संग्रहण और भंडारण टेक्नोलॉजी पर आधारित कम कार्बन उत्पन्न करने वाले ईधनों के विकल्पों की जरूरत है। सरकार द्वारा इनमें से सौर ऊर्जा को अधिक लोकप्रिय बनाया जा रहा है क्योंकि इसे संग्रहीत करके आवश्यकतानुसार उपयोग किया जा सकता है जिससे सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान किया जा सकता है जहां छोटे पैमाने के उपयोगों के लिए बिजली का सामान्य ग्रिड तक पहुँचना मुश्किल है।
जीवाश्म ईंधन के विपरीत, सौर ऊर्जा के दोहन से हानिकारक कार्बनडाइ ऑक्साइड उत्सर्जन नहीं होता है। इसी तरह, पवन ऊर्जा एक पर्यावरण के अनुकूल अक्षय ऊर्जा का स्रोत है जो जलवायु परिवर्तन या वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में, सामुदायिक बायोगैस संयंत्र खाना पकाने और पानी गर्म करने के लिए एक और ऊर्जा का विकल्प प्रदान कर सकते हैं जिसे उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है।
यह अनुमान है कि उत्तराखंड में सालाना लगभग 20 मिलियन मीट्रिक टन कृषि अवशेष और कृषि औद्योगिक/प्रसंस्करण अपशिष्ट का उत्पादन किया जाता है, जिसमें लगभग 300 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है। इसके अलावा, राज्य में हर दिन उत्पादित होने वाले लगभग 1000 मीट्रिक टन नगरपालिका, शहरी और औद्योगिक ठोस/तरल अपशिष्ट को वैज्ञानिक रूप से संषोधित किया जा सकता है जिसे पर्यावरण प्रदूषण के उन्मूलन के साथ-साथ बिजली उत्पन्न करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
इसके अलावा, राज्य में पर्याप्त अप्रयुक्त भू - तापीय विद्युत क्षमता उपलब्ध है जिसे प्रयोग में लाने की आवश्यकता है। पर्वतीय समुदायों के बीच बिजली की पहुंच बढ़ाने के लिए इस क्षेत्र में छोटे पैमाने पर पनबिजली (एक मेगावाट से कम) विकसित करने की बहुत बड़ी संभावना है। ये विकल्प सस्ते है एवं कम पर्यावरणीय प्रभाव डालते हैं एवं इनका परिचालन स्थानीय समुदायों को शामिल करते हुए कम समय में किया जा सकता है।
वर्तमान में, उत्तराखंड में ऊर्जा का सबसे बड़ा हिस्सा हाइड्रो-पावर (68 प्रतिशत) है, इसके बाद कोयला (12 प्रतिशत), गैस (3 प्रतिशत), परमाणु (1 प्रतिशत) और नवीकरणीय ऊर्जा (16 प्रतिशत) के लगभग है। सरकार बिजली बचाने के लिए विद्युत बल्व और सीएफएल की जगह एलईडी बल्ब उपलब्ध करा रही है। इस प्रकार, एक विकेन्द्रीकृत ऊर्जा रणनीति, जो हिमालय क्षेत्र में स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए कुशल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से स्थानीय रूप से उपलब्ध अक्षय ऊर्जा संसाधनों का उपयोग करती है एंब उत्तराखण्ड में बढती हुई विद्युत ऊर्जा खपत हेतु एक आदर्श समाधान प्रस्तुत करती है।
संक्षेप में: भागीरथी नदी घाटी क्षेत्र के निवासियों के मध्य इस धारणा अध्ययन के आधार पर ज.वि.प. के नकारात्मक प्रभावों में वनस्पतियों/वन्य जीवों, कृषि, भागीरथी नदी का प्रवाह एवं नदी घाटी की सुंदरता में कमी, एवं जल प्रदूषण, रेत/पत्थर उत्खनन और सामाजिक बुराइयों में वृद्धि को उल्लेखनीय माना जा सकता है। सकारात्मक प्रभावों में, जीवन स्तर में वृद्धि, सड़क संपर्क और परिवहन के साधन, सार्वजनिक सुविधाएं, पर्यटन और पर्यावरणीय जागरूकता को निर्णायक रूप से स्वीकार किया जा सकता है।
यह कहना उचित होगा कि कारण और प्रभाव की जटिलता के विश्लेषण की अनुपस्थिति में नकारात्मक एंब सकारात्मक प्रभावों के अंतरसंबंध को समझना मुश्किल है। अतएव भागीरथी नदी घाटी पारिस्थितिकी तंत्र के पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक घटकों पर जल विद्युत परियोजनाओं और अन्य मानवजनित गतिविधियों के प्रभावों को अलग- अलग करना परियोजनाओं के विरोध की धारणा को दूर करने के लिए इन निर्माणाधीन/प्रस्तावित परियोजनाओं के बन्द हो जाने के बाद भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इसके अलावा इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि जब परियोजना से बिजली उत्पादन के लाभ मिलने लगते हैं तो लोग समय के साथ परियोजनाओं के नकारात्मक प्रभावों को भूल जाते हैं एवं परियोजना के निर्माण चरण में ही सर्वाधिक नकारात्मक प्रभाव लोगों द्वारा महसूस किये जाते हैं। अतः इस क्षेत्र में परियोजनाओं को पर्यावरण के अनुकूल एवं सत्त बनाये रखने के लिए एवं विज्ञान-आधारित, बहुआयामी अध्ययन परियोजना-प्रभावित लोगों की भागीदारी से करने की आवश्यकता है जिससे कि जल संसाधनों से विद्युत ऊर्जा के विकास, सामाजिक आर्थिक उन्नयन एवं पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके। (downtoearth.org.in)
चीन के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि भारत और चीन के बीच हुए नौवें दौर की सैन्य कमांडर-स्तरीय वार्ता में बनी सहमति के मुताबिक, बुधवार को पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी और उत्तरी तट पर चीनी और भारतीय सैनिकों ने डिसइगेंजमेंट की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल के जवाब में रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “दोनों देशों के बीच मॉस्को में विदेश मंत्रियों और दोनों देशों के बीच नौवें दौर की सैन्य कमांडर-स्तरीय वार्ता में बनी सहमति के अनुसार सीमा पर तैनात चीनी और भारतीय सैनिकों ने 10 फरवरी को प्लान के मुताबिक डिसइंगेजमेंट शुरू किया. हमें उम्मीद है कि भारत दोनों देशों के बीच हुई सहमति के मुताबिक इस प्रक्रिया को सुचारू रूप से लागू करेगा."
इस मुद्दे पर भारत की तरफ़ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. (bbc.com)
-अनंत प्रकाश
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बीते शुक्रवार कश्मीर पर बात करते हुए कहा है कि अगर भविष्य में जनमत संग्रह होता है जिसमें कश्मीर पाकिस्तान को चुनता है तो पाकिस्तान सरकार उन्हें (कश्मीरियों को) अपने भविष्य का फैसला करने का अधिकार देगी.
पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने इमरान ख़ान के इस बयान का कड़ा विरोध किया है.
दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों के बीच भी इस बयान को गौर से देखा जा रहा है.
सवाल उठ रहे हैं कि क्या इमरान ख़ान का ये बयान पाकिस्तान की कश्मीर को लेकर हो रहे नीति परिवर्तन का संकेत हैं?
इमरान ख़ान ने क्या कहा?
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के कोटली शहर में आयोजित हुई एकजुटता रैली को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा, "दुनिया ने कश्मीर के लोगों से साल 1948 में एक वादा किया था. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के मुताबिक़, कश्मीर के लोगों को अपने भविष्य का फ़ैसला करने के लिए हक़ मिलना था."
उन्होंने कहा, "दुनिया को याद दिलाना है कि कश्मीर के लोगों से जो वादा किया गया था, वो वादा पूरा नहीं हुआ, जबकि इसी सुरक्षा परिषद ने ईस्ट तिमोर को, जो मुस्लिम मुल्क इंडोनेशिया का एक जज़ीरा (द्वीप) था, वहां ईसाई ज़्यादा थे, वही हक़ ईस्ट तिमोर को दिया गया. जनमत संग्रह करवाकर उन्हें जल्द आज़ाद करवा दिया गया. मैं संयुक्त राष्ट्र को याद दिलाना चाहता हूं कि उसने पाकिस्तान से अपना वादा पूरा नहीं किया."
इसी रैली में इमरान ख़ान ने वो बयान दिया जिसकी वजह से विवाद हो रहा है.
उन्होंने कहा, "मैं कश्मीर के लोगों को ये कहना चाहता हूं कि इंशा अल्लाह जब आपको अपना ये हक़ मिलेगा और जब कश्मीर के लोग पाकिस्तान के हक़ में फ़ैसला करेंगे, उसके बाद पाकिस्तान कश्मीर के लोगों को अधिकार देगा कि आप आज़ाद रहना चाहते हैं या पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहते हैं. ये आपका हक़ होगा."
राजनीतिक विरोध तेज़
पाकिस्तान के मुख्य विपक्षी दलों के साथ-साथ पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट की ओर से इस बयान का विरोध किया गया है.
पाकिस्तान की 11 विपक्षी पार्टियों के समूह पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) ने कहा है कि भारत प्रशासित कश्मीर के मामले में मोदी और इमरान एक पेज पर हैं.
पीडीएम के प्रमुख मौलाना फ़ज़लुर्रहमान ने कहा कि कश्मीरियों को पाकिस्तान से अलग करने की कोशिश करने वालों को इतिहास माफ़ नहीं करेगा.
पीडीएम की ओर से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद में एक रैली आयोजित करके प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश की गई.
इस रैली में मुस्लिम लीग (नवाज़) की उपाध्यक्ष मरियम नवाज़ ने कहा, "राष्ट्रीय हित, परमाणु कार्यक्रम और कश्मीर के मुद्दे पर हम सब एक हैं. जब भी कश्मीर का ज़िक्र आएगा, इमरान ख़ान मुजरिम के तौर पर खड़े होंगे."
वहीं, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ने भी कहा, "किसी कठपुतली को कश्मीर की आज़ादी का सौदा करने की इजाज़त नहीं देंगे. मोदी को जवाब देना है तो पाकिस्तान में लोकतंत्र क़ायम करना होगा. सरकार (इमरान ख़ान की सरकार) मुशर्रफ़ (पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़) के फ़ॉर्मूले पर चल रही है. कश्मीर का राजदूत बनने का दावा करने वाला कुलभूषण जाधव का वकील बनने की कोशिश कर रहा है. हमारी बहादुर वायुसेना ने भारत का जहाज़ गिराया और जंगी क़ैदी पकड़ लिया. सिलेक्टेड प्रधानमंत्री ने अभिनंदन (पाकिस्तान में पकड़े गए भारतीय वायुसेना के कमांडर अभिनंदन) को चाय पिलाकर वापस भेज दिया. कश्मीर पर सौदा मंज़ूर नहीं."
सियासी स्तर के साथ साथ सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर विवाद देखा गया.
लोगों ने सवाल उठाए हैं कि क्या ये बयान बिना सोचे समझे दिया गया है या कश्मीर को लेकर हुए नीति परिवर्तन की वजह से?
सोशल मीडिया पर उठे सवाल
बीबीसी संवाददाता शुमाइला ज़ाफरी बताती हैं कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के इस बयान के बाद से ही सोशल मीडिया पर सवाल उठना शुरू हो गए थे.
वो कहती हैं, “प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की ओर से बयान आने के बाद लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया था कि क्या कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की नीति बदल रही है. लोगों ने पूछा कि क्या ख़ान ने संसद से विचार विमर्श करने के बाद कश्मीर पर नई नीति बनाने का फ़ैसला किया है. क्या इमरान ख़ान ने इस भाषण के माध्यम से नीति में बदलाव के संकेत देने शुरू कर दिए हैं.
लेकिन जब तक ये विचार विमर्श थोड़ा व्यापक हो पाता, उससे पहले ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से ये बयान जारी कर दिया गया कि "नीति में परिवर्तन नहीं हुआ है और प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने यही कहा है कि पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव के माध्यम से ही हल होना चाहिए, और यही प्रस्ताव कश्मीरियों को ये हक़ देता है कि वे अपने मुस्तकबिल (भविष्य) का फ़ैसला स्वयं करें. यही बात इमरान ख़ान ने भी कही है.’"
विदेश मंत्रालय ने दिया स्पष्टीकरण
इस मामले पर विवाद बढ़ता देख पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से एक बयान जारी किया गया जिसमें ये कहा गया कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया है.
विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा कि जम्मू – कश्मीर विवाद को लेकर पाकिस्तान की नीति में किसी तरह का परिवर्तन नहीं आया है.
विदेश मंत्रालय की ओर से जारी विस्तृत बयान में कहा गया है, “मीडिया की ओर से किए सवालों पर प्रवक्ता की ओर से कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर विवाद को लेकर पाकिस्तान की नीति में किसी तरह का परिवर्तन नहीं है और यह नीति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव से जुड़ी हुई है. आज़ाद जम्मू–कश्मीर के कोटली में कश्मीर एकजुटता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पाकिस्तान के पुराने रुख़ और पाकिस्तान द्वारा कश्मीरियों के अपने भाग्य का निर्धारण करने के अधिकार का समर्थन किए जाने की बात को दोहराया है.”
लेकिन कई पक्षों ने विदेश मंत्रालय की ओर से आये बयान पर आपत्ति जताई है. कहा गया है कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कश्मीर के मुद्दे पर कुछ भी ग़लत नहीं कहा है.
पाकिस्तानी पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता मार्वी सिरमद ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा है, “तो, कश्मीर पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बयान में ग़लत क्या है? कश्मीरियों की आज़ादी का विकल्प, अगर वे चाहते हैं, तो ये विकल्प मौजूद है और होना भी चाहिए. ये पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 257 के अनुसार ही है. विदेश मंत्रालय को प्रधानमंत्री को शर्मसार करने से पहले दो बार सोचना चाहिए था.”
सिरमद ने अपने ट्वीट के साथ एक तस्वीर भी चस्पा की है जिसमें आर्टिकल 257 का ज़िक्र है जिसमें कहा गया है कि –
“जब जम्मू – कश्मीर प्रांत के लोग पाकिस्तान के साथ आते हैं तो पाकिस्तान और कश्मीर के बीच जो रिश्ता होगा वह कश्मीरियों की इच्छा के अनुसार होना चाहिए.”
ऐसे में सवाल उठता है कि इस बयान के पीछे पाकिस्तान सरकार का कोई नीतिगत फ़ैसला है या ये बयान जल्दबाज़ी में दिया गया है.
पाकिस्तान सेना ने क्या प्रतिक्रिया दी?
कई टिप्पणीकार मानते हैं कि इस विवाद को समझने के लिए इमरान ख़ान के राजनीतिक अंदाज़ पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है.
बीबीसी उर्दू सेवा के साथ लंबे समय तक काम कर चुके पाकिस्तानी पत्रकार हारून रशीद कहते हैं, “ये प्रधानमंत्री की ओर से आया एक अजीब बयान था. ये अजीब इसलिए था क्योंकि अब तक किसी ने भी इसे इस तरह नहीं रखा है. कई लोग मानते हैं कि जनमत संग्रह के बाद क्या होगा, उस स्थिति को समय आने पर देखने के लिए छोड़ देना चाहिए, और इसका फ़ैसला उस समय की स्थितियों के मुताबिक़ किया जा सकता है."
"लेकिन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के लिखे हुए भाषण नहीं देने की आदत स्थितियां साफ़ करने की जगह भ्रम पैदा करती हैं. भाषण के तुरंत बाद पाकिस्तान के विदेश कार्यालय को यह स्पष्ट करने के लिए कदम उठाना पड़ा कि पाकिस्तान कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के लिए प्रतिबद्ध है. इसी बात की उम्मीद थी और यही हुआ. इससे आगे कुछ नहीं कहा गया."
इस बयान पर राजनीतिक विरोध पर रशीद कहते हैं, "राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने इमरान ख़ान पर आरोप लगाया है कि वह कश्मीर को लेकर नरम पड़ रहे हैं. उन पर ये आरोप भी लग रहा है कि उन्होंने कश्मीर को मोदी को बेच दिया है क्योंकि उन्होंने भारत पर पांच अगस्त का फ़ैसला पलटने के लिए पर्याप्त दबाव नहीं बनाया."
पाकिस्तान के विपक्षी दल इमरान ख़ान को एक सेलेक्टेड प्रधानमंत्री यानी पाकिस्तानी सेना का चहेता कहकर पुकारते हैं, इस मुद्दे पर भी विपक्षी दलों की ओर से इमरान ख़ान के साथ साथ बार बार पाकिस्तानी सेना का ज़िक्र किया जा रहा है.
ऐसे में पाकिस्तानी सेना की ओर से इस विवाद पर किस तरह की प्रतिक्रिया आ रही है.
हारून रशीद बताते हैं, “पाकिस्तान की सेना इस बार इस मुद्दे पर चुप रही है. लेकिन सेना प्रमुख ने इमरान ख़ान के भाषण से पहले भारत पर एक नरम बयान देते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि कश्मीर का मुद्दा गरिमापूर्ण ढंग से सुलझ जाए. कुछ लोगों का मानना है कि ये प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के रुख़ से अलग है जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत के साथ तब तक कोई बातचीत नहीं हो सकती जब तक कि भारत जम्मू – कश्मीर का स्वायत्त दर्जा वापस न लौटा दे.” (bbc.com)
म्यांमार में बड़े पैमाने पर सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि अमेरिका म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट के पीछे सैन्य नेतृत्व के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहा है.
म्यांमार के सैन्य जनरलों से सत्ता छोड़ने का आह्वान करते हुए बाइडन ने कहा कि अमेरिका म्यांमार के अमेरिका स्थित फंड को फ्रीज़ कर रहा है.
बाइडन ने कहा, 'मैंने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं जो सैन्य तख़्तापलट करने वाले सैन्य नेतृत्व पर तुरंत प्रतिबंध लागू करता है. उनके व्यापारिक हित और नज़दीकी परिजन भी प्रतिबंधों के दायरे में आएंगे.'
राष्ट्रपति बाइडन ने कहा कि अमेरिका इस सप्ताह प्रतिबंध के पहले दौर में उन लोगों को चिन्हित करेगा जिन पर प्रतिबंध लगाए जाने हैं.
राष्ट्रपति ने ये भी कहा कि अमेरिका म्यांमार के लिए सख़्त निर्यात नियंत्रण लागू करेगा और ज़रूरत पड़ने पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार है.
राष्ट्रपति बाइडन ने कहा, 'मैं आज एक बार फिर बर्मा की सेना से आंग सान सू ची और विन मिंत समेत लोकतांत्रिक राजनीतिक बंदियों और कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा करने की मांग करता हूं.'
उन्होंने कहा, 'सेना को सत्ता छोड़नी ही होगी.'
राष्ट्रपति बाइडन ने कहा कि उनका प्रशासन म्यांमार के अमेरिका में रखे एक अरब डॉलर के फंड को फ़्रीज़ कर रहा है.
म्यांमार में प्रदर्शन तेज़
म्यांमार के प्रमुख शहर यंगून में लाखों लोग सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.
म्यांमार में सेना ने एक फ़रवरी को राजनीतिक नेतृत्व को हिरासत में लेकर सैन्य तख़्तापलट कर दिया था.
प्रदर्शनकारी हिरासत में ली गईं नेता आंग सान सू ची और अन्य कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग कर रहे हैं.
सेना ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया है और लोगों के एकजुट होने पर पाबंदियां हैं.
बावजूद इसके बड़ी तादाद में लोग सेना विरोधी प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं.
पुलिस ने किया बल प्रयोग
सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रही एक महिला के सिर में गोली मार दी गई थी. ये महिला गंभीर हालत में राजधानी नेपीडा के अस्पताल में भर्ती है.
19 साल की म्या थ्वे खाइंग मंगलवर को प्रदर्शन के दौरान घायल हो गईं थीं.
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पानी की बौछारें, रबड़ की गोलियां और असली गोलियां चलाईं थीं.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि म्या गोली लगने से घायल हुई हैं.
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ भारी बल प्रयोग किया है और कई लोगों के घायल होने की रिपोर्टें हैं.
अभी तक किसी के मारे जाने की रिपोर्ट नहीं है.
इसी बीच पूर्वी काया प्रांत में दर्जनों पुलिसकर्मी प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं.
बुधवार को भी म्यांमार में बड़े पैमाने पर सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए हैं. (bbc.com)
रजनीश सिंह
चमोली (उत्तराखंड), 10 फरवरी| उत्तराखंड के चमोली जिले में रविवार आई त्रासदी के बाद कई नई तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं। जिस वक्त पानी का सैलाब आया, उस समय तपोवन बैराज में फंसे कुछ लोगों का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें करीब 10 मजदूर अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते नजर आ रहे हैं।
इस नए दिल दहला देने वाले वीडियो में देखा जा सकता है कि लगभग 10 मजदूरों का एक समूह जीवन और मृत्यु के बीच एक जगह से दूसरी जगह भाग रहा है। तपोवन बैराज में फंसे यह मजदूर घातक सैलाब से नहीं बच सके और इसमें बहते दिखाई दे रहे हैं। रविवार की सुबह उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमस्खलन ने कहर बरपाया, जिसमें कई लोगों की जान चली गई और काफी लोग अभी तक लापता हैं, जिनमें से अधिकतर का सैलाब में बह जाने का अनुमान है।
वीडियो में साफ नजर आ रहा है कि जब पानी का सैलाब उनके करीब आ रहा था तो मजदूरों ने अपनी जान बचाने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागने की पूरी कोशिश की, लेकिन कीचड़युक्त पानी का तेज बहाव उन्हें बहा ले गया। ये मजदूर उन 174 व्यक्तियों की सूची में शामिल हैं, जो अभी भी लापता हैं, जबकि 34 शव अब तक बरामद किए जा चुके हैं।
तपोवन बैराज पर आए सैलाब को ऊंचाई वाले स्थानों पर खड़े कुछ स्थानीय लोगों ने मोबाइल फोन में कैद कर लिया, जो प्रकृति के प्रकोप का गवाह है।
वीडियो को देखने पर मालूम पड़ता है कि मजदूरों को बाढ़ के बारे में बहुत देर से जानकारी मिली, इसलिए उनके पास जल्दी से बैराज से बाहर निकलने के लिए ज्यादा विकल्प नहीं थे। उन्होंने अपने जीवन को बचाने के लिए सामने से आ रहे सैलाब से बचने की कोशिश की और वह बैराज के ऊपर चढ़ गए और शायद इस प्रक्रिया में 10 महत्वपूर्ण मिनटों का नुकसान हुआ, जो जीवन और मृत्यु के बीच अंतर हो सकता है।
जब तक मजदूरों का समूह बैराज के शीर्ष पर पहुंचा, तब तक उनके पास खुद को बचाने के लिए 10 सेकंड से भी कम का समय था। वीडियो में स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि वे एक कोने से दूसरे कोने तक भागते हुए खुद को उनकी ओर मलबा लेकर आ रहे सैलाब के बहाव से बचाते हैं। जब पानी की एक और धारा उनकी तरफ आने लगी तो मजदूर फिर बैराज की छत पर पिछले स्थान पर भाग गए।
लेकिन यह फंसे हुए मजदूरों की आखिरी दौड़ रही, क्योंकि पानी का एक और मजबूत प्रवाह उन्हें बहा ले गया। वीडियो में स्पष्ट रूप से उन्हें बैराज की छत से कीचड़ भरे पानी में गिरते देखा जा सकता है। कोई नहीं जानता कि वे मलबे से युक्त तेज पानी के बहाव से जीवित बच गए होंगे या नहीं, क्योंकि उनके शव अभी तक बरामद नहीं हुए हैं।
धौली गंगा नदी पर तपोवन में 520 मेगावाट की डाउनस्ट्रीम एनटीपीसी जल विद्युत परियोजना एक भूस्खलन के बाद आई बाढ़ में बह गई थी। इलाके में 14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक हिमस्खलन हुआ, जिससे चमोली जिले में ऋषिगंगा नदी में सैलाब की वजह से बाढ़ आ गई।
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के प्रवक्ता ने आईएएनएस को बताया कि सुरक्षा बल अब उस जगह से मलबा हटाकर वहां जांच करने की योजना बना रहा है, जहां मजदूर बैराज की छत से बाढ़ के पानी में बह जाने के बाद गिरे थे।
आईटीबीपी की अगली योजना के बारे में प्रवक्ता ने आईएएनएस को बताया, "यह लगभग असंभव लगता है कि मजदूर जिंदा हो सकते हैं, लेकिन हमारा बल हमेशा जान बचाने की कोशिश करेगा। हम जगह खोदेंगे और शव खोजने की कोशिश करेंगे।"
ऋषि गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में समुद्र तल से 5600 मीटर ऊपर ग्लेशियर के मुहाने पर हिमस्खलन हुआ, जो लगभग 14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जितना बड़ा था, जिससे ऋषि गंगा नदी के निचले क्षेत्र में फ्लैश फ्लड की स्थिति बन गई।
यह त्रासदी रविवार सुबह 10 बजे तब हुई। ऋषिगंगा में जल स्तर के बढ़ने पर फ्लैश फ्लड के कारण 13.2 मेगावाट की एक कार्यात्मक ऋषिगंगा छोटी पनबिजली परियोजना (स्मॉल हाइड्रो प्रोजेक्ट) को नुकसान पहुंचा है।
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने अपना नियंत्रण कक्ष स्थापित किया है और सभी आवश्यक उपकरणों के साथ 450 आईटीबीपी कर्मी बचाव और राहत कार्यो में लगे हुए हैं।
पांच राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) की टीमें भी घटनास्थल पर पहुंच गई हैं और बचाव और राहत कार्यो में लगी हुई हैं। इसके अलावा भारतीय सेना की आठ टीमें, जिनमें एक इंजीनियर टास्क फोर्स (ईटीएफ) शामिल हैं, बचाव कार्य में जुटी हैं। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 10 फरवरी|कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा गुरुवार दोपहर 1 बजे पवित्र संगम में डुबकी लगाने प्रयागराज जाएंगी। प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम है।
कांग्रेस के प्रतिनिधि संजय तिवारी ने फोन पर आईएएनएस को बताया, "प्रियंका गांधी सुबह लगभग 10 बजे हवाई अड्डे पर पहुंचेंगी और फिर आनंद भवन के लिए रवाना होंगी। इसके बाद वे मनकामेश्वर घाट पर स्वामी स्वरूपानंद से मिलने से पहले पवित्र स्नान करने के लिए अरैल घाट जाएंगी।"
इससे पहले, अंतरिम कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने भी संगम पर पवित्र स्नान किया था।
प्रियंका की प्रयागराज यात्रा को भाजपा के मतदाताओं को लुभाने और हिंदी हृदयभूमि में पैठ बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। (आईएएनएस)
पटना, 10 फरवरी। बिहार में नीतीश कुमार सरकार के मंगलवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद बुधवार को कई नए मंत्रियों ने अपने-अपने कार्यालय पहुंचकर पदभार ग्रहण कर काम संभाल लिए। इस क्रम में बुधवार को अजीबोगरीब वाक्या हुआ, जब खान एवं भूतत्व मंत्री जनक राम अपने कार्यालय पहुंचे तब प्रधान सचिव सहित कोई भी अधिकारी उनके स्वागत में नहीं थे। इसके बाद मंत्री ने एक चतुर्थवर्गी कर्मचारी से फूलों का गुलदस्ता स्वीकार किया।
इसके बाद हांलाकि मंत्री ने कहा कि राज्य में जो अफसरशाही है वह समाप्त करने की घोषणा की है।
दरअसल, बिहार सरकार के खान एवं भू-तत्व विभाग के नए मंत्री जनक राम बुधवार को जब पदभार ग्रहण करने विभाग पहुंचे तो मंत्री को आशा थी कि उनका स्वागत बड़े अधिकारी करेंगे, लेकिन प्रधान सचिव के साथ वरिष्ठ अधिकारी नदारद दिखे थे।
इसके बाद मंत्री 10 मिनट तक असहज रहे। बाद में मंत्री ने अपने स्वागत के लिए टेबल रखे गुलदस्ते को वहां खड़े एक चतुर्थवर्गीय कर्मचारी सतीश कुमार यादव के हाथों स्वीकार किया।
मंत्री ने सतीश कुमार यादव को अपना भाई बताते हुए कहा कि प्रधान सचिव का सम्मान चतुर्थवर्गीय कर्मी को दे रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि जनता में संदेश है कि बिहार में अफसरशाही है, उसे समाप्त करना है।
उन्होंने कहा कि अफसरशाही के नेक्सेस को समाप्त करना है। मंत्री ने यह भी कहा कि इस घटना से वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी अवगत कराएंगें।
इधर, सूत्रों का कहना है कि विभाग की प्रधान सचिव हरजोत कौर उस समय वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए किसी बैठक में भाग ले रही थीं। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 11 फरवरी| एनआईए की विशेष अदालत ने बुधवार को जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) के प्रमुख कौसर को बर्दवान विस्फोट मामले में 35,000 रुपये के जुर्माने के साथ 29 साल के कारावास की सजा सुनाई। एनडीआईए के एक अधिकारी ने इसकी जानकारी दी। एनआईए के एक प्रवक्ता ने कहा कि बांग्लादेश के निवासी कौसर उर्फ बोमा मिजान को भारतीय दंड संहिता, गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम गतिविधियां (यूएपीए), शस्त्र अधिनियम और विदेशी अधिनियम के कई धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया।
अधिकारी ने कहा कि कौसर भारत में अभियुक्त जेएमबी का प्रमुख था, और जनवरी 2018 में बिहार में बोध गया विस्फोट से संबंधित एक अन्य एनआईए मामले में भी दोषी था।
मामला 2 अक्टूबर 2014 को पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के व्यस्त खड़गगढ़ इलाके में किराए के मकान की पहली मंजिल पर एक शक्तिशाली आईईडी विस्फोट से संबंधित है।
आईईडी गलती से प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन के सदस्यों द्वारा अपने निर्माण के समय फूट गया, जिसमें दोनों आतंकवादियों ने चोटों के कारण दम तोड़ दिया था।
पश्चिम बंगाल पुलिस ने शुरू में एक मामला दर्ज किया था, जिसके बाद एनआईए ने 10 अक्टूबर 2014 को जांच को अपने कब्जे में लिया। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 10 फरवरी | केंद्र ने बुधवार को कहा कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का अनुमानित 5,000 करोड़ रुपये की लागत से सार्वजनिक निजी भागीदारी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के साथ पुनर्विकास किया जाएगा। लोकसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में, केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि प्रस्तावित सुविधाओं में स्टेशन परिसर में भीड़-रहित एवं सुविधाजनक प्रवेश और निकास शामिल है।
इसके अलावा इन सुविधाओं में यात्रियों के आगमन/प्रस्थान को अलग-अलग सुनिश्चित करना, भीड़भाड़ से इतर एक सुगम स्थान, शहर के दोनों किनारों का एकीकरण और परिवहन प्रणालियों का अन्य तरीकों के साथ एकीकरण शामिल है।
उन्होंने कहा, "अच्छी तरह से सुसज्जित क्षेत्र और ड्रॉप ऑफ, पिकअप एवं पार्किं ग के लिए पर्याप्त प्रावधान प्रस्तावित किया गया है। रिक्वेस्ट फॉर क्वालीफिकेशन (आरएफक्यू) 2 फरवरी से खोली गई है।"
रेल मंत्री ने आगे कहा कि निजी भागीदारी को आमंत्रित करते हुए, स्टेशन के आसपास और इसके परिसर की जमीन और हवाई क्षेत्र का लाभ उठाते हुए स्टेशन पुनर्विकास की योजना बनाई गई है।
गोयल ने कहा, "इसके लिए, रेलवे देश भर के स्टेशनों की तकनीकी-आर्थिक व्यवहार्यता अध्ययन कर रहा है। इन व्यवहार्यता अध्ययनों के परिणाम के आधार पर विभिन्न चरणों में स्टेशनों का पुनर्विकास किया जाएगा।"
रेल मंत्री गोयल ने कहा कि गुजरात में पुनर्विकास के लिए अहमदाबाद, गांधीनगर, न्यू भुज, साबरमती, सूरत और उधना रेलवे स्टेशनों की पहचान की गई है।
उन्होंने कहा, "गांधीनगर में कार्य एक उन्नत चरण में है और पूरा होने वाला है। साबरमती स्टेशन के लिए आरएफक्यू को अंतिम रूप दिया गया है। सूरत और उधना स्टेशनों के लिए मंजूरी प्राप्त करने को आरएफक्यू वित्त मंत्रालय की सार्वजनिक निजी भागीदारी मूल्यांकन समिति (पीपीपीएसी) को सौंप दिया गया है। अहमदाबाद और न्यू भुज के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट विभिन्न चरणों में है।" (आईएएनएस)
जनेवा, 10 फरवरी| विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने घोषणा की है कि कोरोना वैरिएंट बी.1.1.7, जिसे पहली बार 20 सितंबर को ब्रिटेन में पाया गया वह अब 86 देशों में फैल चुका है। अपने साप्ताहिक महामारी विज्ञान अद्यतन में डब्ल्यूएचओ ने कहा कि वैरिएंट बी.1.1.7 में प्रसार में वृद्धि हुई है, और प्रारंभिक निष्कर्षो के आधार पर रोग की गंभीरता में वृद्धि के कुछ प्रमाण मिले हैं।
7 फरवरी तक अतिरिक्त छह देशों ने इस संस्करण के मामलों की सूचना दी है।
डब्ल्यूएचओ ने मंगलवार को कहा, उदाहरण के तौर पर ब्रिटेन की बात करें तो नया वैरिएंट का सैंपल जांच 14 दिसंबर के सप्ताह में 63 प्रतिशत से बढ़कर 18 जनवरी के सप्ताह में 90 प्रतिशत हो गया है।
सीएनएन की रिपोर्ट अनुसार, इसके अलावा डब्ल्यूएचओ दो अतिरिक्त कोरोना के प्रकार पर भी निगरानी कर रहा है जो सक्रिय रूप से फैल रहे हैं। इ.1.351 शुरू में दक्षिण अफ्रीका में देखा गया था और पी.1 स्ट्रेन को पहली बार ब्राजील में पाया गया।
डब्ल्यूएचओ ने कहा, "7 फरवरी तक 44 देशों में इ.1.351 स्ट्रेन के मिलने की पुष्टि हुई है, जबकि 15 देशों में पी.1 स्ट्रेन पाए गए हैं।" (आईएएनएस)
भोपाल, 11 फरवरी | मध्यप्रदेश में जलाभिषेक कार्यक्रम के तहत बनाई गई साढ़े 57 हजार से अधिक जल संरचनाओं का केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह वर्चुअल तरीके से गुरुवार को लेाकार्पण करने वाले हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. महेंद्र सिंह सिसोदिया भोपाल में मौजूद रहेंगे। आधिकारिक तौर पर दी गई जानकारी के अनुसार, राजनाथ सिंह गुरुवार को जल संरचनाओं का वर्चुअल लोकार्पण करेंगे। भोपाल के मिंटो हॉल में होने वाले इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शिवराज और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. सिसोदिया और राज्यमंत्री राम खिलावन पटेल मौजूद रहेंगे। यह जल संरचनाएं महात्मा गांधी नरेगा, कृषि सिंचाई योजना, वॉटर शेड और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा द्वारा निर्मित की गई है।
राज्य रोजगार गारंटी परिषद् ने बताया कि 2073 करोड़ 72 लाख रुपये की लागत से 57 हजार 653 जल संरचनाओं के लोकार्पित होने वाले कार्यो में तालाब, सार्वजनिक कूप, प्राचीन बावड़ियों की मरम्मत, स्टॉप-डैम और चेक-डैम शामिल हैं। कार्यक्रम में प्रदेश की प्रत्येक ग्राम पंचायत ऑनलाइन जुड़ेगी। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 11 फरवरी| संयुक्त किसान मोर्चा ने 18 फरवरी को देशभर में 'रेल रोको' अभियान का ऐलान किया है। देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर करीब ढाई महीने से डेरा डाले किसानों के आंदोलन की अगुवाई करने वाले किसान संगठनों ने संयुक्त मोर्चा के बैनर तले बुधवार को हुई बैठक में चार कार्यक्रम करने का फैसला लिया। आंदोलनकारी किसानों के नेता डॉ.दर्शन पाल ने एक बयान में कहा कि आज सयुंक्त किसान मोर्चा की बैठक में आंदोलन को तेज करने के लिए ये फैसले लिए गए हैं।
संयुक्त किसान मोर्चा ने 12 फरवरी से लेकर 18 फरवरी तक के लिए चार कार्यक्रमों का ऐलान किया है। कार्यक्रम के अनुसार, 12 फरवरी से राजस्थान के भी सभी रोड टोल प्लाजा को टोल मुक्त करवाया जाएगा।
मोर्चा ने कहा कि इसके बाद 14 फरवरी को पुलवामा हमले में शहीद जवानों के बलिदान को याद करते हुए देशभर में कैंडल मार्च व मशाल जुलूस व अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
संयुक्त किसान मोर्चा के बयान के अनुसार, 16 फरवरी को किसानों के मसीहा सर छोटूराम की जयंती के दिन देशभर में किसान एकजुटता दिखाएंगे।
चौथे कार्यक्रम का ऐलान करते हुए किसान नेता ने कहा कि 18 फरवरी को दोपहर 12 से शाम 4 बजे तक देशभर में रेल रोको कार्यक्रम किया जाएगा।
केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल लाए गए तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर फसलों की खरीद की कानूनी गारंटी की मांग को लेकर किसान दिल्ली की सीमाओं पर पिछले साल 26 नवंबर से आंदोलनरत हैं।
सरकार के साथ आंदोलनकारी नेताओं की 11 दौर की वार्ताएं बेनतीजा रही हैं। सरकार ने किसान यूनियनों को नए कृषि कानूनों के अमल पर 18 महीने तक रोक लगाने और उनकी मांगों से संबंधित मसलों का समाधान तलाशने के लिए एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया है। मगर, आंदोलनकारी किसान संगठन तीनों कानूनों को निरस्त करने की मांग पर अड़े हुए हैं। (आईएएनएस)
हैदराबाद, 11 फरवरी| आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की बेटी वाई.एस. शर्मिला तेलंगाना की राजनीति में प्रवेश करने वाली हैं। राज्य की राजनीतिक अखाड़े केप्रमुख खिलाड़ियों के मन में हैरत के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या 2023 के विधानसभा चुनाव पर शर्मिला का असर पड़ सकता है? आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी की बहन शर्मिला, 2014 में अलग राज्य के रूप में गठन के बाद से तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष एन.चंद्रबाबू नायडू के बाद तेलंगाना की राजनीति में आने वाली आंध्र प्रदेश की पहिली नेता हैं।
राजन्ना राज्यम को वापस लाने के उद्देश्य से, अपने दिवंगत पिता के 'सुनहरे शासन' का सपना पूरा करने के लिए शर्मिला तेलंगाना की राजनीति में कदम रखने के लिए एक नई पार्टी बनाने की योजना बना रही हैं।
जैसा कि वाईएसआरसीपी ने शर्मिला के कदम से खुद को दूर कर लिया है, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि उनके लिए एक नई पार्टी बनाना जरूरी होगा।
शर्मिला, जिन्होंने मंगलवार को अपने दिवंगत पिता के वफादारों के साथ परामर्श शुरू किया, का मानना है कि तेलंगाना की राजनीति में एक नए खिलाड़ी के लिए गुंजाइश है। उन्होंने कहा, तेलंगाना में कोई राजन्ना राज्यम नहीं है। मैं इसे लाना चाहती हूं, उन्होंने दावा किया कि नलगोंडा जिले के वाईएसआर के वफादारों के साथ पहली बैठक के दौरान सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।
वह जमीनी हकीकत जानने के लिए अन्य जिलों के वाईएसआर के वफादारों के साथ इसी तरह की बैठक करने की योजना बना रही हैं और अपनी अगली कार्रवाई की घोषणा करने से पहले स्थिति को समझेंगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेलंगाना की नई राजनीतिक वास्तविकताओं में शर्मिला को 'राजन्ना राज्यम' के लिए आकर्षक योजना पेश करनी होगी, क्योंकि तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) कल्याणकारी योजनाओं में हर साल 40,000 करोड़ रुपये खर्च करने का दावा करती है।
किसानों के लिए मुफ्त बिजली, छात्रवृत्ति और राजीव आरोग्यश्री या गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा सहित कई योजनाएं राजशेखर रेड्डी द्वारा शुरू की गईं, जिन्हें वाईएसआर के रूप में जाना जाता है। वह साल 2004 से 2009 के बीच अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।
मगर कई दलों के नेताओं ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है कि तेलंगाना में एक बाहरी व्यक्ति की कोई भूमिका नहीं है।
तेलंगाना के विश्लेषक पी. राघव रेड्डी ने कहा कि अभी भी लोगों में विश्वास है कि वाईएसआर एक अलग राज्य के गठन में बाधा थे। उन्होंने कहा, उन्हें लगता है कि (कांग्रेस अध्यक्ष) सोनिया गांधी और कांग्रेस आलाकमान द्विभाजन के पक्ष में थे, यह वाईएसआर थे, जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए इस प्रक्रिया को रोक दिया था।
साल 2009 में वाईएसआर के हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन के बाद तेलंगाना के लिए आंदोलन ने गति पकड़ ली। (आईएएनएस)
-मयूरेश कन्नूर
भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ़्तार अभियुक्त
महाराष्ट्र के पुणे में भीमा कोरोगांव में 2018 में हुई हिंसा के सिलसिले में हुई जाँच और गिरफ़्तारियाँ एक नई रिपोर्ट के आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में है.
अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'द वाशिंगटन पोस्ट' ने अमेरिका की एक साइबर फ़ोरेंसिक लैब की जाँच रिपोर्ट के आधार पर दावा किया है कि इस मामले में गिरफ़्तार किए गए कम-से-कम एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ सबूत प्लांट किए गए थे.
पुणे में हुई हिंसा के मामले में कई वामपंथी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को गिरफ़्तार किया गया है. भीमा कोरेगांव में अंग्रेज़ों की महार रेजीमेंट और पेशवा की सेना के बीच हुई लड़ाई में महार रेजीमेंट की जीत हुई थी. दलित बहुल सेना की जीत की 200वीं वर्षगांठ के मौक़े पर हिंसा की घटना हुई थी.
भीमा कोरेगाँव- इतिहास, वर्तमान और पुलिस की जांच
इस वर्षगांठ के कार्यक्रमों का आयोजन करने वाले संगठन एल्गार परिषद के कई सदस्यों और जाने-माने दलित अधिकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अलग-अलग समय पर देश के अलग-अलग कोनों से गिरफ़्तार किया गया है और उन पर 'प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश' और 'देश की एकता और अखंडता को तोड़ने की कोशिश करने' जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं, और वे सभी जेल में हैं.
'द वाशिंगटन पोस्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक मैसाच्युसेट्स स्थित लैब आर्सनल कंसल्टिंग अपनी जांच में इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि दलित अधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन के लैपटॉप पर साइबर हमला किया गया था.
लैब रिपोर्ट के मुताबिक एक मैलवेयर (वायरस) के ज़रिए इस लैपटॉप में कई दस्तावेज़ रखे गए थे. इनमें वो विवादित पत्र भी हैं जिसमें कथित तौर पर रोना विल्सन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश के लिए हथियार जुटाने पर चर्चा की है.
भीमा कोरेगांव मामला
हालांकि भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) प्रवक्ता ने 'वाशिंगटन पोस्ट' से कहा है कि विल्सन के लैपटॉप की जो फ़ोरेंसिक जांच एजेंसी ने करवाई है उसमें किसी वायरस के होने के सबूत नहीं मिले हैं.
एनआईए प्रवक्ता ने कहा है कि इस मामले में जिन लोगों को अभियुक्त बनाया गया है उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त मौखिक और दस्तावेज़ी सबूत हैं.
मामले में नया कानूनी मोड़
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के बाद रोना विल्सन और अन्य अभियुक्तों के वकीलों ने मुंबई हाई कोर्ट में याचिका दायर करके सभी आरोप रद्द करने और उन्हें रिहा करने की मांग की है.
इस मामले में पांच अभियुक्तों के वकील मिहिर देसाई ने बीबीसी से कहा, "हम इस पूरी कार्रवाई को ही रद्द करवाना चाहते हैं क्योंकि जिस मुख्य सबूत पर ये मुक़दमा चल रहा है वो ही अब प्लांटेड साबित हो रहा है. हम दस्तावेज़ प्लांट किए जाने की भी स्वतंत्र जांच चाहते हैं. हम ये भी जानना चाहते हैं कि पूरी जांच प्रक्रिया के दौरान दस्तावेज़ प्लांट करने की जांच क्यों नहीं हुई और अभियोजन पक्ष ने इस पर गौर क्यों नहीं किया."
रोना विल्सन
मिहिर देसाई रोना विल्सन से ज़ब्त किए गए हॉर्ड डिस्क की कॉपी हासिल करने में कामयाब रहे थे. उन्होंने बताया, 'हमने दिसंबर 2019 में कोर्ट में आवेदन देकर अभियुक्तों से ज़ब्त की गई सभी चीज़ों की क्लोन कॉपी मांगी थी. अदालत के आदेश पर ये हमें उपलब्ध करवाईं गईं थीं.'
हाई कोर्ट में दायर याचिका के मुताबिक रोना विल्सन के क़ानूनी प्रतिनिधियों ने ज़ब्त किए गए सामान की फ़ोरेंसिक जांच के लिए अमेरिका की बार एसोसिएशन की मदद मांगी थी.
बार एसोसिएशन ने उनका आर्सनल कंसल्टिंग के साथ संपर्क करवाया था. ये कंपनी बीस साल से फ़ोरेंसिक जांच से जुड़ी है और दुनिया भर की जांच एजेंसियों के साथ मिलकर काम करती है.
रिपोर्ट, दावा और याचिका
याचिका में आर्सनल कंसल्टिंग की रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि रोना विलसन के लैपटॉप में पहला दस्तावेज़ उनकी गिरफ़्तारी से 22 महीने पहले प्लांट किया गया था.
याचिका में कहा गया है, "एक हमलावर (साइबर) ने नेटवायर नाम के मैलवेयर (वायरस) का इस्तेमाल किया जिसके ज़रिए पहले याचिकाकर्ता (विल्सन) की जासूसी की गई और फिर बाद में मैलवेयर के ज़रिए दूर से ही कई फाइलें डाली गईं, जिनमें सबूत के तौर पर पेश किए गए 10 दस्तावेज़ भी शामिल हैं. इन्हें एक फोल्डर में रखा गया था जिसे हिडेन मोड (छुपा हुआ) में बनाया गया था और 22 महीनों के दौरान, समय-समय पर, याचिकाकर्ता के लैपटॉप पर, बिना उनकी जानकारी के उन्हें प्लांट किया गया."
याचिका में रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि विल्सन के लैपटॉप को कई बार रिमोटली (दूर से) नियंत्रित किया गया था. हालांकि आर्सनल कंसल्टिंग की रिपोर्ट में ये नहीं बताया गया है कि साइबर हमलावर कौन था, या उसका किसी संगठन या विभाग से कोई संबंध था.
वाशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि उन्होंने उत्तरी अमेरिका में मैलवेयर के तीन स्वतंत्र विशेषज्ञों से इस रिपोर्ट की जांच करवाई है और उन सबने इस रिपोर्ट को ठोस बताया है.
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में आतंकवाद के आरोप में गिरफ़्तार तुर्की के एक पत्रकार को आर्सनल कंसल्टिंग की रिपोर्ट के बाद छोड़ दिया गया था. उनके साथ गिरफ्तार कई और अभियुक्त भी रिहा कर दिए गए थे.
2018 में भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के बाद पुणे पुलिस ने कई वामपंथी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के घरों और दफ़्तरों पर छापे मारे थे. पुलिस ने उनके लैपटॉप, हार्ड डिस्क और दूसरे दस्तावेज़ ज़ब्त किए थे.
इनसे मिले दस्तावेज़ों को अदालतों में सबूत के तौर पर पेश करते हुए पुलिस ने दावा किया था कि इसके पीछे प्रतिबंधित माओवादी संगठनों का हाथ था.
रोना विल्सन, वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा समेत 14 से अधिक सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस मामले में गिरफ़्तार किया जा चुका है. शुरुआत में इस मामले की जांच पुणे पुलिस ने की थी, अब नेशनल इंवेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) इसकी जांच कर रही है.
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट आने के बाद बीबीसी ने एनआईए की प्रतिक्रिया जानने के लिए एनआईए के प्रवक्ता और सरकारी वकील से संपर्क किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका. उनकी प्रतिक्रिया मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा. (bbc.com)
7 मौतें भी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 10 फरवरी। राज्य में आज रात 08.00 बजे तक 222 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सबसे अधिक 67 रायपुर जिले से हैं।
आज कुल 7 कोरोना मौतें हुई हैं।
राज्य शासन के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दुर्ग 36, राजनांदगांव 8, बालोद 4, बेमेतरा 1, कबीरधाम 3, रायपुर 67, धमतरी 5, बलौदाबाजार 5, महासमुंद 10, गरियाबंद 7, बिलासपुर 16, रायगढ़ 14, कोरबा 6, जांजगीर-चांपा 7, मुंगेली 2, जीपीएम 0, सरगुजा 9, कोरिया 2, सूरजपुर 7, बलरामपुर 2, जशपुर 2, बस्तर 4, कोंडागांव 0, दंतेवाड़ा 0, सुकमा 0, कांकेर 2, नारायणपुर 0, बीजापुर 0 अन्य राज्य 1 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
रायपुर, 10 फरवरी। प्रदेश में संचालित स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल की बेहतर संचालन के लिए रणनीति तैयार की गई है। प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा डॉ. आलोक शुक्ला ने वर्तमान में संचालित इन इंग्लिश मीडियम स्कूलों के नियमित मॉनिटरिंग करने के लिए जिला शिक्षा अधिकारियों और स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल के प्राचार्यों को दिए गए हैं। प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा ने यह भी निर्देश दिए हैं कि जो भी शिक्षक कार्यों में रूचि नहीं ले रहे हैं उनकी प्रतिनियुक्ति निरस्त करने का प्रस्ताव प्रेषित किया जाए। हिन्दी मीडियम के बच्चों को अंग्रेजी माध्यम का लाभ बताकर प्रेरित किया जाए। जिन स्कूलों में बाउण्ड्रीवाल नहीं है, वहां वन विभाग के सहयोग से वृक्षारोपण किया जाए ताकि वातावरण हरा-भरा रहे।
प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा ने कहा कि स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल की गुणवत्ता में वृद्धि के लिए सुव्यवस्थित प्रशिक्षण का होना आवश्यक है। यह सरकार की उच्च प्राथमिकता का कार्यक्रम है। उन्होंने आवासीय प्रशिक्षण में अनुपस्थित प्रिंसिपल की 2 वेतनवृद्धि रोके जाने के निर्देश दिए। डॉ. आलोक शुक्ला ने जिला शिक्षा अधिकारियों को जिले में संचालित स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूलों की समस्याओं का निराकरण करने के निर्देश दिए। बैठक में एससीईआरटी के डायरेक्टर श्री डी. राहुल वेंकट, अतिरिक्त संचालक डॉ. योगेश शिवहरे, लोक शिक्षण संचालनालय के उप संचालक श्री आशुतोष चाबरे, पांचो संभाग के संयुक्त संचालक, सभी जिला शिक्षा अधिकारी उपस्थित थे।
प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को यह स्पष्ट किया कि अशासकीय विद्यालयों के लिए बनाए गए छत्तीसगढ़ फीस विनियमन अधिनियम का 3 माह के भीतर पालन करना अनिवार्य है। 15 तारीख तक इसका पालन जिस जिले में नहीं होगा, और साफ्टवेयर में इसकी पुष्टि नहीं होगी, इसके लिये जिला शिक्षा अधिकारी स्वयं जिम्मेदार होंगे। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा नवाचारी पहल करते हुए शिक्षकों के स्थानांतरण, प्रमोशन, अवकाश, गोपनीय चरित्रावली, अचल संपत्ति की जानकारी सहित स्थापना संबंधी कार्यों के त्वरित निराकरण के लिये एक ‘एप‘ बनाया गया है, उसे एक माह के भीतर शत् प्रतिशत पूर्ण की जाए। उन्होंने यह भी निर्देश दिये की वर्तमान भर्ती नियम के अनुसार 31 मार्च तक संयुक्त संचालक एवं जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा समस्त प्रकार के पदों पर पदोन्नत की कार्यवाही तत्काल पूरी कर ली जाए। उन्होंने कहा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अब व्यक्तिगत नियुक्ति जारी किया जाएगी।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 10 फरवरी। एक हजार करोड़ रुपये के घोटाले मामले में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से जांच पर लगाई गई रोक हटाने के लिये विशेष अनुमति याचिका दायर की है। इस घोटाले में छत्तीसगढ़ के सात आईएएस सहित 12 नौकरशाहों की जांच होनी है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तत्कालीन मंत्री के खिलाफ भी जांच की छूट दी थी।
सीबीआई भोपाल ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से पूर्व के अनेक उदाहरणों और कानूनी प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा है कि चूंकि हाईकोर्ट के आदेश पर एफआईआर दर्ज की गई है इसलिये जांच पर रोक लगाई गई है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सीबीआई को एफआईआर दर्ज कर, सारे दस्तावेज कब्जे में लेकर जांच का आदेश बीते साल 30 जनवरी को दिया था। याचिकाकर्ता कुंदन सिंह ठाकुर समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत गठित फिजिकल रेफरल रिहेबिलेशन सेंटर में संविदा कर्मचारी रहे हैं। उन्होंने अनेक तथ्यों के साथ याचिका में आरोप लगाया कि प्रदेश के नौकरशाह यहां तक के मंत्रियों ने मिलकर भाजपा शासनकाल के दौरान 10 साल में करीब 1000 करोड़ रुपये के फंड का दुरुपयोग किया। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा व जस्टिस प्रार्थ प्रतीम साहू की डबल बेंच ने इस मामले में जांच का आदेश सीबीआई को दिया था। इसमें विवेक ढांड, सुनील कुजूर, एम के राउत, बीएल अग्रवाल, आलोक शुक्ला और एमके श्रोती सहित 12 नौकरशाहों पर तथा समाज कल्याण विभाग की मंत्री रहीं रेणुका सिंह पर आरोप लगाये गये थे।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ आईएएस अफसरों ने हाईकोर्ट में रिव्यू पिटिशन भी फाइल की थी लेकिन उन्हें यहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद प्रतिवादी सुप्रीम कोर्ट गये थे जहां 13 फरवरी 2020 को इन्हें फौरी राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट ने जांच पर रोक लगाने का निर्देश दिया और सीबीआई को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने कहा। इसके बाद कोरोना महामारी के कारण काफी दिनों तक अदालती कामकाज बाधित रहा। अब करीब एक साल बाद सीबीआई ने इस रोक को हटाने की मांग की है।
याचिकाकर्ता कुंदन सिंह ने प्रतिवादी नौकरशाहों की ओर से सरकारी अधिवक्ताओं के उपस्थित होने पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 10 फरवरी। राज्य में आज शाम 4.30 तक 195 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सर्वाधिक 66 अकेले रायपुर जिले के हैं।
आईसीएमआर के मुताबिक आज बालोद 4, बलौदाबाजार 6, बलरामपुर 2, बस्तर 4, बेमेतरा 1, बीजापुर 0, बिलासपुर 8, दंतेवाड़ा 0, धमतरी 6, दुर्ग 29, गरियाबंद 7, जीपीएम 0, जांजगीर-चांपा 6, जशपुर 2, कबीरधाम 2, कांकेर 2, कोंडागांव 0, कोरबा 5, कोरिया 2, महासमुंद 10, मुंगेली 1, नारायणपुर 0, रायगढ़ 14, रायपुर 66, राजनांदगांव 4, सुकमा 0, सूरजपुर 5, और सरगुजा 9 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों में रात तक राज्य शासन के जारी किए जाने वाले आंकड़ों से कुछ फेरबदल हो सकता है क्योंकि ये आंकड़े कोरोना पॉजिटिव जांच के हैं, और राज्य शासन इनमें से कोई पुराने मरीज का रिपीट टेस्ट हो, तो उसे हटा देता है। लेकिन हर दिन यह देखने में आ रहा है कि राज्य शासन के आंकड़े रात तक खासे बढ़ते हैं, और इन आंकड़ों के आसपास पहुंच जाते हैं, कभी-कभी इनसे पीछे भी रह जाते हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि समलैंगिकता के आरोप में किसी को नौकरी से हटाना गैरकानूनी है. उत्तर प्रदेश में एक होमगार्ड को इस आधार पर बर्खास्त किए जाने को गलत ठहराते हुए कोर्ट ने तुरंत उसे बहाल करने का आदेश दिया है.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट-
न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल ने यूपी के बुलंदशहर में तैनात एक होमगार्ड को समलैंगिक संबंध बनाने के आरोप में बर्खास्त किए जाने के मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश जारी किया. जस्टिस सुनीता अग्रवाल ने होमगार्ड को सेवा से हटाने का आदेश रद्द करते हुए यूपी के होमगार्ड विभाग के कमाडेंट जनरल को आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता को तत्काल सेवा में वापस लें.
कोर्ट ने नवतेज सिंह जौहर मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि विभाग की यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत है. कोर्ट का कहना था कि समलैंगिकता किसी व्यक्ति का निजी मामला है और यह उसके निजता के अधिकार के तहत आता है. याचिकाकर्ता को बुलंदशहर के जिला कमाडेंट होमगार्ड ने 11 जून 2019 को सेवा से हटा दिया था. कमांडेट ने यह कार्रवाई एक वीडियो वायरल होने के बाद की थी जिसमें याचिकाकर्ता होमगार्ड अपने एक साथी के साथ समलैंगिक संबंध बना रहा था. जिला कमाडेंट होमगार्ड ने अपने जवाब में कहा कि होमगार्ड को उसके अनैतिक कार्यों की वजह से सेवा से हटाया गया है लेकिन हाईकोर्ट ने इसे मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन है.
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति यदि अपनी पसंद के किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहता है तो यह उसका निजी मामला है और इसे इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वे दोनों समलैंगिक हैं या फिर विषमलैंगिक. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, इसे अपराध समझने वाले किसी व्यक्ति या संस्था को उस व्यक्ति की निजता में हस्तक्षेप करना समझा जाएगा.
दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में आईपीसी की धारा 377 को समाप्त करते हुए दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. धारा 377 को पहली बार कोर्ट में साल 1994 में चुनौती दी गई थी. कई साल और कई अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने छह सितंबर 2018 को इस पर अंतिम फैसला दिया था.
फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एलजीबीटी समुदाय के निजी जीवन में झांकने का अधिकार किसी को नहीं है और इस समुदाय के साथ पहले जो भेदभाव हुए हैं उसके लिए किसी को माफ नहीं किया जाएगा. हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में डाल दिया था.
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता
कोस्टा रिका के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, वहां 26 मई को समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिल गई. इसी के साथ कोस्टा रिका समलैंगिक विवाहों को कानूनी रूप से वैध मानने वाला दक्षिण अमेरिका का आठवां देश बन गया. अब दुनिया में कम से कम 29 देशों में समलैंगिक विवाह की अनुमति है. जानिए कौन कौन से हैं ये देश.
आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाना अपराध है और इसके लिए दस साल तक की सजा या फिर आजीवन कारावास दिया जा सकता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने धारा 377 को खत्म कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद समलैंगिक और ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भले ही मिल गया हो लेकिन इन लोगों का संघर्ष खत्म नहीं हुआ है. अभी भी इस समुदाय के लोगों को साथ रहने या फिर शादी करने और फिर शादी का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए कानूनी संघर्ष करना पड़ रहा है.
पिछले साल सितंबर में ऐसे ही एक मामले में केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष दायर उस याचिका का विरोध किया, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम 1956 के तहत विवाह करने वाले समलैंगिक जोड़ों के अधिकारों को मान्यता देने की मांग की गई है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकारी पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि समलैंगिक विवाह की अवधारणा को भारतीय संस्कृति या भारतीय कानून के तहत मान्यता प्राप्त नहीं है. उनका तर्क था कि कानूनी आधार पर महिला और पुरुष विवाहों को ही मान्यता दी गई है. हालांकि मामले की सुनवाई कर रहे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीएन पटेल का कहना था कि इस तरह की याचिका पर खुले दिमाग से विचार किया जाना चाहिए. चीफ जस्टिस ने कहा, "इस मामले में कानून की स्थिति भिन्न हो सकती है लेकिन दुनिया भर में तमाम बदलाव हो रहे हैं और उस परिप्रेक्ष्य में भी विचार करने की जरूरत है.”
दरअसल, 2018 में नवतेज सिंह जौहर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 का जो फैसला दिया था उसमें आपसी सहमति से की गई समलैंगिक गतिविधियों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखना था. कानूनी तौर पर इसकी यह व्याख्या भी की जा रही है कि इस आधार पर समलैंगिक विवाह को मंजूरी नहीं दी जा सकती. दिल्ली हाईकोर्ट में समलैंगिक विवाह के अधिकारों को मान्यता देने की मांग वाली याचिका की सुनवाई के दौरान ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने यह बात रखी. यह याचिका एलजीबीटी समुदाय के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से दाखिल की गई है. हालांकि इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सलाह दी है कि पहले वे अपने विवाह का रजिस्ट्रेशन कराएं और यदि ऐसा करने से इनकार किया जाता है तो कोर्ट में इसकी शिकायत करें.
जनहित याचिका दाखिल करने वालों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद समलैंगिक शादियों के रजिस्ट्रेशन में कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं और प्रशासनिक स्तर पर रजिस्ट्रेशन करने में हीला-हवाली की जाती है. भारत में समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं है, इसलिए धारा 377 को गैरकानूनी घोषित करने के बावजूद कुछ समलैंगिक जोड़े अपने विवाह के पंजीकरण के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे ही कई समलैंगिक जोड़ों की याचिकाएं इस समय दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित हैं. इस मामले में न्यायालय ने केंद्र से जवाब भी मांगा है.
विशेष विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग करने वाली एक ऐसी ही याचिका केरल हाईकोर्ट के समक्ष भी लंबित है. यह याचिका निकेश और सोनू की तरफ से दायर की गई थी जो केरल में समलैंगिक विवाह करने वाला पहला जोड़ा है. इन लोगों ने विशेष विवाह अधिनियम 1954 के प्रावधानों को चुनौती देते हुए कहा था कि उनको समलैंगिक विवाह का पंजीकरण कराने की अनुमति नहीं दी गई है.
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बीते लगभग एक साल से भारत समेत पूरी दुनिया में कोरोना और इस महामारी के चलते मरने वालों के आंकड़े सुर्खियों में हैं. लेकिन भारत में सड़क हादसों में होने वाली मौतें इस आंकड़े को भी पीछे छोड़ रही हैं.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट-
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भी माना है कि सड़क हादसे कोरोना महामारी से भी खतरनाक हैं. देश में रोजाना ऐसे हादसों में 415 लोगों की मौत हो जाती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वर्ष 2030 तक सड़क हादसों में मरने और घायल होने वालों की तादाद घटा कर आधी करने का लक्ष्य रखा है. नितिन गडकरी ने कहा है कि सरकार उससे पांच साल पहले यानी 2025 तक ही इस लक्ष्य तक पहुंचने की दिशा में ठोस पहल कर रही है.
गडकरी के मुताबिक, देश में हर साल साढ़े चार करोड़ सड़क हादसों में डेढ़ लाख लोगों की मौत हो जाती है और साढ़े चार लाख लोग घायल हो जाते हैं. उन्होंने ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने के लिए तमाम राज्यों को तमिलनाडु मॉडल अपनाने की सलाह दी है. वहां हादसों में 38 फीसदी और इनमें होने वाली मौतों में 54 फीसदी की कमी दर्ज की गई है. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे हादसों में होने वाली मौतों की तादाद सरकारी आंकड़ों के मुकाबले ज्यादा है. दूर-दराज के इलाकों में होने वाले हादसों की अक्सर खबर ही नहीं मिलती.
लॉकडाउन के बाद बढ़े हादसे
बीते साल कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन के दौरान तमाम सड़क परिवहन ठप होने की वजह से हादसों में भारी कमी दर्ज की गई थी. लेकिन उसके बाद अनलॉक के दौरान इन हादसों में वृद्धि दर्ज की गई है. केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 में देश में 4.49 लाख सड़क हादसे हुए थे. उनमें 4.51 लाख लोग घायल हुए और 1.51 लाख लोगों की मौत हो गई. इसमें कहा गया है कि देश में रोजाना 1,230 सड़क हादसे होते हैं जिनमें 414 लोगों की मौत हो जाती है.
इससे पहले अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन (आईआरएफ) की रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया भर में 12.5 लाख लोगों की प्रति वर्ष सड़क हादसों में मौत होती है. उस रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया भर में वाहनों की कुल संख्या का महज तीन फीसदी हिस्सा भारत में है, लेकिन देश में होने वाले सड़क हादसों और इनमें जान गंवाने वालों के मामले में भारत की हिस्सेदारी 12.06 फीसदी है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2018 में 1.52 लाख लोगों की मौत हुई थी जबकि साल 2017 में यह आंकड़ा डेढ़ लाख लोगों का था. सड़क हादसों में मारे गए लोगों में से 54 फीसदी हिस्सा दुपहिया वाहन सवारों और पैदल चलने वालों का है. यानी नई सड़कों के निर्माण और ट्रैफिक नियमों के कड़ाई से पालन की तमाम कवायद के बावजूद इन आंकड़ों पर कोई अंतर नहीं पड़ा है.
कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिए देशभर में जो लॉकडाउन लगाया गया था उससे सड़क हादसों में लगभग बीस हजार लोगों की जान जाने से बचाई गई. अप्रैल से लेकर जून 2020 तक सड़क हादसों में 20 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई.
ध्यान भटकना
दुनिया भर में हर साल सबसे ज्यादा सड़क हादसे ध्यान भटकने की वजह से होते हैं. बेख्याली में लोगों का ध्यान सड़क से बाहर चला जाता है. मोबाइल फोन, खाना-पीना या फिर बाहर का नजारा देखना इसके मुख्य कारण हैं.
लगातार बढ़ते सड़क हादसों की वजह क्या है?
केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब 67 फीसदी हादसे निर्धारित सीमा से तेज गति से चलने वाले वाहनों की वजह से होते हैं. 15 फीसदी हादसे बिना वैध लाइसेंस के गाड़ी चलाने वालों के कारण होते हैं. सरकारी आंकड़ों में कहा गया है कि करीब 10 फीसदी हादसे ओवरलोड वाहनों के कारण होते हैं और 15.5 फीसदी मामले हिट एंड रन के तौर पर दर्ज किए जाते हैं. इसके साथ ही करीब 26 फीसदी हादसे लापरवाही से वाहन चलाने या ओवरटेकिंग की वजह से होते हैं.
केंद्रीय मंत्री गड़करी का कहना है कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) की तकनीकी खामियां ही सड़क हादसों की सबसे प्रमुख वजह हैं. विभिन्न एजंसियों की ओर से तैयार की गई इन त्रुटिपूर्ण रिपोर्टों के चलते ज्यादातर हादसे ट्रैफिक चौराहों पर होते हैं. हालांकि सरकार का दावा है कि मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम के लागू होने के बाद सड़क हादसों में कुछ कमी दर्ज की गई है.
अंकुश के उपायमंत्री नितिन गडकरी का कहना है, "सरकार इन हादसों की तादाद घटा कर आधी करने की दिशा में ठोस कदम उठा रही है. उच्चाधिकार सड़क सुरक्षा परिषद के पहले चेयरमैन की नियुक्ति एक सप्ताह के भीतर कर दी जाएगी.” उनका कहना है कि राज्य सरकारों को सड़क सुरक्षा चुस्त करने के लिए इंसेटिव देने की खातिर सरकार ने 14 हजार करोड़ का एक समर्थन कार्यक्रम शुरू किया है. इसमें से आधी रकम एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक की ओर से मिलेगी जबकि आधी केंद्र सरकार देगी.
मंत्री के मुताबिक सरकार देश के हाइवे नेटवर्क पर पांच हजार से ज्यादा उन जगहों की शिनाख्त का काम कर रही है जो हादसों के लिहाज से सबसे संवेदनशील हैं. उसके बाद जरूरी दिशा-निर्देश बनाए जाएंगे. इसके साथ ही 40 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबे हाइवे की सुरक्षा जांच कराई जा रही है.
सरकारी दावे तो अपनी जगह हैं लेकिन सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि हादसों पर अंकुश लगाने के लिए इनके अलावा भी बहुत कुछ करना जरूरी है. मिसाल के तौर पर सबसे पहले राज्य सरकारों के साथ मिल कर वाहन चालकों में जागरूकता पैदा करनी होगी. इसके साथ ही ट्रैफिक नियमों के कड़ाई से पालन के जरिए यह सुनिश्चित करना होगा कि तमाम वाहन निर्धारित गति से ही चलें. लोक निर्माण विभाग (सड़क) के एक पूर्व इंजीनियर संजय कुमार जायसवाल कहते हैं, "इस समस्या के कई पहलू हैं. इनमें लाइसेंस जारी करने से पहले तमाम मानकों की कड़ाई से जांच करना भी शामिल हैं. खासकर कोरोना महामारी के दौर में सार्वजनिक परिवहन कम होने और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के पालन की वजह से कारों व दोपहिया वाहनों की बिक्री तो बढ़ी है. लेकिन उस लिहाज से सड़कों का विस्तार नहीं हो सका है.”जायसवाल का कहना है कि विदेशों की तर्ज पर तमाम राज्यों में साइकिल की सवारी को बढ़ावा देने और इसके लिए अलग सुरक्षित लेन बनाना भी इस काम में काफी मददगार साबित हो सकता है.
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नई दिल्ली, 9 फ़रवरी। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि विविधिता के बावजूद हम एक राष्ट्र हैं. विकट और विपरीत काल में भी ये देश किस प्रकार से अपना रास्ता चुनता है, रास्ता तय करता है और रास्ते पर चलते हुए सफलता प्राप्त करता है, ये सब राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में कहा है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति जी का भाषण भारत के 130 करोड़ भारतीयों की संकल्प शक्ति को प्रदर्शित करता है. विकट और विपरीत काल में भी ये देश किस प्रकार से अपना रास्ता चुनता है, रास्ता तय करता है और रास्ते पर चलते हुए सफलता प्राप्त करता है, ये सब राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में कहा. मैं इस चर्चा में भाग लेने वाले सभी सांसदों का आभार व्यक्त करता हूं. मैं विशेष रूप से हमारी महिला सांसदों का आभार व्यक्त करना चाहता हूं.
- राष्ट्रपति जी का भाषण भारत के 130 करोड़ भारतीयों की संकल्प शक्ति को प्रदर्शित करता है. विकट और विपरीत काल में भी ये देश किस प्रकार से अपना रास्ता चुनता है, रास्ता तय करता है और रास्ते पर चलते हुए सफलता प्राप्त करता है, ये सब राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में कही.
- मैं इस चर्चा में भाग लेने वाले सभी सांसदों का आभार व्यक्त करता हूं. मैं विशेष रूप से हमारी महिला सांसदों का आभार व्यक्त करना चाहता हूं.
- देश जब आजाद हुआ, जो आखिरी ब्रिटिश कमांडर थे, वो आखिरी तक यही कहते थे कि भारत कई देशों का महाद्वीप है और कोई भी इसे एक राष्ट्र नहीं बना पाएगा. लेकिन भारतवासियों ने इस आशंका को तोड़ा. विश्व के लिए आज हम आशा की किरण बनकर खड़े हुए हैं.
- कुछ लोग ये कहते थे कि India was a miracle democracy. ये भ्रम भी हमने तोड़ा है. लोकतंत्र हमारी रगों और सांस में बुना हुआ है, हमारी हर सोच, हर पहल, हर प्रयास लोकतंत्र की भावना से भरा हुआ रहता है.
- आज जब हम भारत की बात करते हैं तो मैं स्वामी विवेकानंद जी की बात का स्मरण करना चाहूंगा. "हर राष्ट्र के पास एक संदेश होता है, जो उसे पहुंचाना होता है, हर राष्ट्र का एक मिशन होता है, जो उसे हासिल करना होता है, हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे वो प्राप्त करता है."
- जिन संस्कारों को लेकर हम पले-बढ़े हैं, वो हैं- सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया. कोरोना कालखंड में भारत ने ये करके दिखाया है.
- हमारे लिए आवश्यक है कि हम आत्मनिर्भर भारत के विचार को बल दें. ये किसी शासन व्यवस्था या किसी राजनेता का विचार नहीं है.
- आज हिंदुस्तान के हर कोने में वोकल फ़ॉर लोकल सुनाई दे रहा है. ये आत्मगौरव का भाव आत्मनिर्भर भारत के लिए बहुत काम आ रहा है.
- हमारे लिए संतोष और गर्व का विषय है कि कोरोना के कारण कितनी बड़ी मुसीबत आएगी इसके जो अनुमान लगाए गए थे कि भारत कैसे इस स्थिति से निपटेगा. ऐसे मैं ये 130 करोड़ देशवासियों के अनुशासन और समर्पण ने हमें आज बचा कर रखा है.
-एक घंटा पहले
एक हज़ार से अधिक ट्विटर अकाउंट्स को ब्लॉक करने के केंद्र सरकार के निर्देश पर माइक्रो-ब्लॉगिंग वेबसाइट 'ट्विटर' ने बुधवार को जवाब दिया है.
26 जनवरी 2021 की घटना का ज़िक्र करते हुए ट्विटर ने लिखा है कि 'हमारी ग्लोबल टीम ने इस दौरान 24/7 कवरेज प्रदान की और सारे कॉन्टेंट, ट्वीट्स और अकाउंट्स पर न्यायिक और निष्पक्ष रूप से कार्रवाई की, क्योंकि ये ट्विटर के नियमों का उल्लंघन कर रहे थे.'
'कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वाले सैकड़ों अकाउंट्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है. ख़ासतौर पर उनके ख़िलाफ़, जो हिंसा, दुर्व्यवहार और धमकियों से भरे हुए थे. इसके साथ ही कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वाले कुछ ट्रेंड्स पर भी रोक लगाई.'
ट्विटर इंडिया ने अपने एक आधिकारिक ब्लॉग में लिखा है कि 'कंपनी ने 500 से अधिक ट्विटर अकाउंट्स को निलंबित कर दिया है जो स्पष्ट रूप से स्पैम की श्रेणी में आते थे और प्लेटफ़ॉर्म का ग़लत इस्तेमाल कर रहे थे.'
ट्विटर इंडिया ने इस ब्लॉग में लिखा है कि 'ये कार्रवाई बीते दस दिन में की गई है.'
ट्विटर ने अब तक क्या कार्रवाई की?
कंपनी के अनुसार, इस दौरान केंद्र सरकार से भी उन्हें आईटी एक्ट के सेक्शन-69ए के तहत कुछ आदेश मिले, जिनमें बहुत से ट्विटर अकाउंट्स को निलंबित करने का अनुरोध किया गया है.
कंपनी ने लिखा है कि 'हमने इनमें से दो आदेशों का अस्थायी रूप से पालन किया था, जिनमें आपातकालीन रूप से अकाउंट ब्लॉक करने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में हमने उन्हें बहाल कर दिया क्योंकि ये भारतीय क़ानून के अनुरूप पाए गए. जब इसकी सूचना भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को दी गई, तो उन्होंने हमें निर्देशों का अनुपालन करने में विफल रहने का एक नोटिस थमा दिया.'
ट्विटर ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि 'जिन ट्वीट्स में नुक़सानदायक कॉन्टेंट था, वो अब कम दिखाई देंगे क्योंकि कंपनी ने उनकी विज़ीबिलिटी घटा दी है. कंपनी ने केंद्र सरकार से सुझाए गए 500 से ज़्यादा ट्विटर अकाउंट्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है जिनमें से अधिकांश अकाउंट स्थायी रूप से निलंबित कर दिए गए हैं.'
"इसके अलावा, कंपनी ने बुधवार को ही सरकार की ओर से रेखांकित किए गए अकाउंट्स में से कुछ को भारत में रोक दिया है. हालांकि, ये अकाउंट भारत के बाहर उपलब्ध रहेंगे क्योंकि हम नहीं मानते कि हमें भारतीय क़ानून के अनुरूप इन अकाउंट्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा गया. हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं और इसी नज़रिये को ध्यान में रखकर हमने मीडिया के लोगों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के अकाउंट्स के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है."
'हर नज़रिये का सम्मान'
ट्विटर इंडिया के अनुसार, कंपनी ने 10 फ़रवरी को केंद्र सरकार के सामने अपना जवाब पेश किया है और ये सभी दलीलें रखी हैं.
कंपनी ने अपने ब्लॉग में लिखा है, "हमारा विश्वास है कि सार्वजनिक संवाद और परस्पर विश्वास बनाने के लिए पारदर्शिता बहुत ज़रूरी है. यह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि लोग इस बात को समझें कि हम अपने प्लेटफ़ॉर्म पर कंटेंट की छटनी कैसे करते हैं और पूरी दुनिया की सरकारों के साथ कैसे संवाद करते हैं."
"हमारी पारदर्शिता रिपोर्ट में यह देखा जा सकता है कि सरकारें हमसे क्या अनुरोध करती हैं और हम वैश्विक स्तर पर कैसे काम करते हैं."
कंपनी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि "मौजूदा दौर में फ़्री इंटरनेट और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार ख़तरा मंडरा रहा है. पिछले कुछ हफ़्तों में भारत में हिंसा की ख़बरों पर हम बारीकी से अपडेट देना चाहते थे और अपने नियमों और सिद्धांतों को गंभीरता से लागू करने के प्रयास कर रहे थे."
कंपनी ने लिखा है कि "ट्विटर की मौजूदगी इसीलिए है ताकि हम अपने यूज़र्स की आवाज़ को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचा सकें. इसे ध्यान में रखते हुए हम लगातार अपनी सेवाओं में सुधार कर रहे हैं ताकि हर कोई - चाहे उनका जो भी नज़रिया हो - निर्भीक होकर एक सार्वजनिक संवाद में शामिल हो सके."
भारत सरकार ने ट्विटर से क्या कहा था?
मंगलवार को समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से लिखा था कि भारत सरकार ने ट्विटर को कथित पाकिस्तान और खालिस्तान समर्थकों से संबंधित 1178 ट्विटर अकाउंट बंद करने का आदेश दिया है जो किसानों के विरोध प्रदर्शनों को लेकर ग़लत सूचना और उत्तेजक सामग्री फैलाते रहे हैं.
बताया गया कि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने चार फ़रवरी को इन ट्विटर अकाउंट्स की एक सूची साझा की थी. इन अकाउंट्स की पहचान सुरक्षा एजेंसियों ने खालिस्तान समर्थक या पाकिस्तान द्वारा समर्थित और विदेशी धरती से संचालित होने वाले अकाउंट्स के तौर पर की थी, जिनसे किसान आंदोलन के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था को ख़तरा है.
इससे पहले, सरकार ने ट्विटर को उन 'हैंडल्स' और 'हैशटैग्स' को हटाने का आदेश दिया था, जिनमें दावा किया गया था कि किसान नरसंहार की योजना बनाई जा रही है. सरकार ने कहा था कि इस तरह की ग़लत सूचना और भड़काऊ सामग्री सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करेगी.
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार ने ट्विटर को निर्देशों का अनुपालन करने में विफल रहने पर दण्डात्मक कार्रवाई की भी चेतावनी दी थी.
किसान विरोध प्रदर्शन के समर्थन में कई विदेशी हस्तियों द्वारा किये गए कुछ ट्वीट्स को ट्विटर के सीईओ जैक डोरसी द्वारा हाल ही में लाइक किये जाने से भी आईटी मंत्रालय परोक्ष तौर पर अप्रसन्न बताया जाता है.

इस बीच ट्विटर के एक प्रवक्ता ने अपनी ई-मेल प्रतिक्रिया में कहा था कि 'ट्विटर सार्वजनिक संवाद के सशक्तीकरण और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर चलता है. अगर हमें ट्विटर पर संभावित अवैध सामग्री के बारे में वैध क़ानूनी अनुरोध प्राप्त होता है, तो हम इसकी समीक्षा ट्विटर के नियमों और स्थानीय क़ानून, दोनों के तहत करते हैं. यदि सामग्री ट्विटर के नियमों का उल्लंघन करती है, तो सामग्री को हटाया जाएगा.'
इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि 'यदि यह एक विशेष अधिकार क्षेत्र में अवैध होना निर्धारित करता है, लेकिन ट्विटर के नियमों का उल्लंघन नहीं है, तो हम केवल उस स्थान में सामग्री तक पहुँच को रोक सकते हैं. सभी मामलों में, हम अकाउंट धारक को सीधे सूचित करते हैं ताकि उसे पता चले कि हमें अकाउंट से संबंधित एक क़ानूनी आदेश प्राप्त हुआ है.' (bbc.com)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 10 फरवरी। आज जिला गौरेला पेंड्रा मरवाही में आयोजित अरपा महोत्सव के समापन समारोह में पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, विधानसभा अध्यक्ष डॉ चरणदास महन्त व राजस्व मन्त्री जयसिंह अग्रवाल के साथ विधायक शैलेश पाण्डेय, मोहित केरकेट्टा, विधायक के के ध्रुव, जिला अध्यक्ष मनोज गुप्ता सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं जिला प्रशासन के अधिकारियों और मंच पर पहुंचे नगर व जिला पंचायत के अधिकारियों ने सेल्फी खिंचवाई।
करीब डेढ़ साल पहले मैंने सांसद महुआ मोइत्रा पर एक लेख लिखा था जब उन्होंने लोकसभा में पहली बार अपना तेजतर्रार भाषण दिया था। महुआ के तेवर जस के तस हैं जो अभी लोकसभा में फिर उनकी तकरीर में देखने मिला।
-कनक तिवारी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शेरनी की तरह दहाड़ती हैं। फिलवक्त उन्होंने अपनी पार्टी का एक नुमाइंदा लोकसभा में महुआ मोइत्रा के नाम से निर्वाचित कराया है। अपने पहले भाषण में महुआ ने दो तिहाई बहुमत की संसदीय हेकड़ी के तैश को समझा दिया कि कपड़ा धोबी के यहां कितना भी साफ सांप्रदायिक भावनाएं भडक़ाकर धो लिया गया हो। उस पर लोकतंत्रीय इस्तरी चलाने से ही संसद की व्यापक समझ का मानक पाठ तैयार किया जा सकता है। अपने पहले क्रिकेट मैच या मेडन स्पीच में महुआ ने लोकसभा की पिच पर छक्का लगा दिया। वे शेरनी के जुमले में नहीं गरजीं। उन्होंने बहुत कम समय में जनसंसद में एक प्राथमिकी दर्ज करने के साथ भवियमूलक चुनौतियों का कोलाज भी बिखेरा। उस तर्कमहल की एक एक ईंट इतनी मजबूत रखी कि बीच बीच में दो तिहाई वाले भारी भरकम सत्ता पक्ष की ओर से की जा रही व्यवधानी हुल्लड़ तुलसीदास की रामचरितमानस की चौपाइयों के बीच में क्षेपक या गड़बड़ रामायण की तरह सुनने में बेहूदी लगी।
बेहद संयत, सटीक, व्याकरणसम्मत, संसूचित करती जवाबदेह अंगरेजी गद्य में महुआ ने सैद्धांतिक सवाल उठाए। तकनीक की भाषा में कहें तो उसका डेमो सत्ता पक्ष के मुंह पर दे मारा। महुआ के बेहद कुलीन और ईंट ईंट जोडक़र तराशे गए भाषण के तर्कमहल को हिन्दी में अनुवादित कर सुना जाए। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लोकसभा के स्मरणीय नायक मधु लिमये का संसदीय इतिहास में पुनराविष्कार दिखा। शालीन मुद्रा में एनडीए सरकार के दो तिहाई बहुमत को पराजित नहीं लेकिन असहमत विपक्ष के रूप में महुआ ने कबूला। जैसे पोरस ने सिकंदर के सामने युद्ध में पराजय के बावजूद स्वाभिमानी सिर ऊंचा रखा।
तृणमूल सांसद ने दो टूक कहा कि दो बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को विस्फोटक मुहाने पर शातिर साजिशी सियासत द्वारा बिठा दिया गया है। यह लोकतंत्र के लिए ट्रेजडी या अशुभ संकेत हो सकता है। उन्होंने कहा अल्पसंख्यकों के सडक़ों, बाजारों पर एक उन्मादी हिंसक और खुद को वहशी सांप्रदायिकता की सांस्कृतिक उत्तराधिकारी समझते लोगों द्वारा जानवर की तरह पीट पीटकर मारा और कत्ल किया जा रहा है। यह युग इस देश के इतिहास के नए परिच्छेद के रूप में लिखा जा रहा है। उन्हें बरगलाकर हिंसक बनना सिखाया भी जा रहा है। देश कूढ़मगज, कुंद, गैरप्रगतिशील और कुंठाग्रस्त सलाहकारों के रेवड़ में फंसा दिया गया है। वहां विज्ञानसम्मतता, आधुनिक भावबोध और सभ्यतामूलक समकालीन मूल्यों की कोई जरूरत नहीं रह गई है।
लोकसभा में दिया जा रहा महुआ का भाषण महज नये सदस्य द्वारा बिखेरी गई चेतावनी का अहसास नहीं था। लगा जैसे हिन्दुस्तान का जख्मी और कराहता हुआ मौजूदा इतिहास खुद एक इंसानी प्रतिनिधि बनकर देश के नागरिकों की चेतना को झिंझोड़ रहा है। वह अभिमन्यु शैली का साहसी लेकिन सहायता मांगता हुआ चीत्कार नहीं था। उसमें महाभारत उपदेशक का भाव भी नहीं था। महुआ ने अद्भुत संयम, सावधानी और मुक्तिबोध के शब्दों की ‘दृढ़-हन’ की विनम्रता चेहरे पर कायम रखी। यह बताने के लिए कि विनम्रता मूल्यों को रचने में ज्यादा नायाब और स्थायी कारगर हथियार होती है। एक शब्द का दोहराव किए बिना, अटके बिना, सांसों के आरोह अवरोह का अभिनय कौशल इस सांसद को याद दिला गया कि इस नई महाभारत में उसे दुर्योधन और दु:शासन को भी नए रूपक में ढालकर ओज के हिन्दी कवि रामधारी सिंह दिनकर से उनकी पंक्तियों में आशीर्वाद लेना है। वह उसने अद्भुत सामायिकता के साथ किया। शायर राहत इंदौरी का शेर भी बहुत मौंजू तरीके से इस महिला सांसद ने सूत्रबद्ध चेतावनी के रूप में लोकसभा के रेकार्ड में लिखा तो दिया। महुआ मोइत्रा की तरह यदि छह सांसद भी संसद की तकरीरोंं में इसी तरह सजग रहे, तो भारी भरकम सत्तामूलक धड़े का हुल्लड़बाज हिस्सा अपने उस लक्ष्य तक तो पहुंचने में कठिनाई महसूस करेगा, जो एक बरसाती नदी के मजहबी, उद्दाम उफान की तरह हिन्दुस्तानियत की सदियों पुरानी उगी फसल को बेखौफ होकर काफी कुछ बहा ले गया।
एक भौंचक सरकार को अंगरेजी भाषा सरिता में चप्पू चलाती सांसद ने तर्क और तथ्य के दोहरे आक्रमण में फंसाकर पूछा जिसका जवाब ‘मोदी है तो मुमकिन है‘ के नारे में नहीं दिया जा सकता। 120 सरकारी नुमाइंदे हैं जो सूचना प्रसारण मंत्रालय में बैठकर हिन्दुस्तान की मीडिया के सेंसर अधिकारी हैं। उनके आदेश, निर्देश और समीक्षा के बाद ही मीडिया में खबरें तराशी, खंगाली और छापी जाती हैं। देश की अवाम की दौलत का केवल एक पार्टी और एक नेता के लिए दुरुपयोग हो रहा है। देश के चुनिंदा कॉरपोरेटी ही मीडिया मुगल हैं। सत्ता और संपत्ति के गठजोड़ का खुला खेल चल रहा है। उसकी परत-परत नोचकर महुआ ने संसद को अभियुक्त भाव से आंज भी दिया। यह मार्मिक सवाल पूछा कि देश की सेना तो देश की सेना है। वह एक व्यक्ति की सेवा में चुनाव प्रचार का एजेंडा कैसे बन सकती है। चाहे कुछ हो निराशा का एक बादल तो उनके भाषण से छंटा। एक लोकसभा सदस्य ने पूरी लोकसभा को उसके इतिहास, संगठन, मकसद और भविष्य का साफ सुथरा आईना दिखा दिया। यह तो वह भाषण है जिसने मार्क एंटोनी भले न हो, मधु लिमये, हीरेन मुखर्जी, नाथ पई, हेम बरुआ, सोमनाथ चटर्जी और राममनोहर लोहिया की एक साथ याद दिला दी।
मौजूदा लोकसभा का भारी भरकम सत्ता पक्ष केवल संख्या बल के आधार पर ही अपना कीर्तिमान स्थापित नहीं कर सकता। कई नए तनाव जबरिया उठाए जा रहे हैं। सरकार के मुख्य घटक भाजपा की पूरी नीयत और ताकत जवाहरलाल नेहरू के रचे लोकशाही के एक एक अवयव पर सैद्धांतिकता की आड़ में निजी हमला करने की है। महुआ ने भी राजस्थान के पहलू खान और झारखंड के तबरेज अंसारी का नाम लेकर मॉब लिंचिंग की ओर अपनी आवेशित करुणा के जुमले में हमला किया। हैरत की बात है प्रधानमंत्री को अशोका होटल में भोज के वक्त या बिहार के स्वास्थ्य मंत्री को विश्व कप में भारत के खिलाड़ी रोहित शर्मा की बल्लेबाजी पर खुश होकर तालियां बजाते वक्त बिहार के मुजफ्फरपुर में 200 से भी ज्यादा बच्चों के सरकारी बदइंतामी के फलवरूप मर जाने पर भी अफसोस करते नहीं सुना देखा गया। महुआ मोइत्रा देश के लिए दिए गए बंग-संदेश में भारतीय नवोदय के अशेष हस्ताक्षरों राजा राममोहन राय, रवींद्रनाथ टैगोर, काज़ी नजरुल इस्लाम, विवेकानन्द और सुभाष बोस आदि की सामूहिक सांकेतिक अनुगूंज थी। तब भी हिन्दुस्तान की संसद में आधे से ज्यादा चार्जशीटेड सदस्य देश की रहनुमाई कर रहे हों-यही पेचीदा सवाल महाभारत में उठाए गए यक्ष प्रश्नों के मुकाबले कहीं अधिक तकलीफदेह हैै।

सांसद मोइत्रा ने बहुत कम समय मिलने के बावजूद अपनी विज्ञान और गणित की छात्र जीवन की डिग्रियों और अनुभवों से लैस होकर देश के समाने आई मुश्किलों को सात सूत्रों में बताने की कोशिश की। यह साफ है कि अवाम को तकलीफ दे रही मुसीबतों की संख्या नहीं होता। उसका घनत्व और परिणाम होता है। भारतीय और अन्य संस्कृतियों में सात का आंकड़ा तरह तरह से रेखांकित होता रहा है। उसे भी किसी गणितीय संख्या की तरह स्थिर करने के उद्देश्य से ईजाद नहीं किया गया होगा। हिन्दू विवाह के सात फेरे हों या सात वचन। आकाश के सात तारे हों। साल के सात दिन हों। सात समंदर हों। दूसरी संस्कृति में सात पाप हों। या किलों के सात दरवाजे कहे जाते रहे हों। ये यब लोकजीवन की खोज हैं। उनमें संख्या का महत्व नहीं है। उसके पीछे दर्शाए गए हेतु का महत्व होता है। महुआ मोइत्रा के भाषण में हिन्दुस्तान के अवाम की वेदना की कहानी शब्दों के साथ साथ उनकी आवाज के उतार चढ़ाव, चेहरे पर उग रहे तेवरों के झंझावातों के साथ हिलकोले खा रही थीं। पूरे सदन में सत्ताधारी पार्टी के प्रधानमंत्री सहित नए सांसदों और पुराने दिग्गजों ने तार्किक मुकाबला करने की कोशिश तो की लेकिन जो पैनापन भारतीय जनता की तकलीफों की आह से उठता हुआ तृणमूल कांग्रेस की युवा सांसद के ऐलान में समा गया था। वह एक तरह से हिन्दुस्तानियत का यादनामा बनकर उभरा है।
लगभग कारुणिक तैश में आकर इस महिला सांसद ने कहा आज भारत में एकल तरह की राष्ट्रीयता या संस्कृति सायास फैलाई और विकसित की जा रही है। वह अपने अमल में लगभग हत्यारिणी है। लोगों को उनके घरों से निकालकर सडक़ों पर कत्ल किया जा रहा है। असम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा राष्ट्रीय नागरिकता, रजिस्टर जैसे मुद्दे की आड़ में इस देश के गरीब, मजलूम और अशिक्षित लोगों से पूछा जा रहा है। वे दस्तावेजी सबूत दें कि कब से भारत के नागरिक हैं। अपनी व्यंग्य की भृकुटि में महुआ ने चेहरे पर कसैलापन लाते हुए सरकारी बेंच की तरफ तीखा सवाल किया। इस देश में तो मंत्री तक अपनी पढ़ाई की डिग्री बताने में नाकाबिल रहे हैं। 2014 से 2019 के बीच देश में मानव अधिकारों का उल्लंघन तो कम से कम दस गुना बढ़ गया है। यह संसद इस बात का घमंड नहीं करे कि सरकार के पास जरूरत से ज्यादा बहुमत है। उस बहुमत का स्वीकार तो करना पड़ेगा लेकिन उससे कमतर संख्या के विपक्ष को ज्यादा जवाबदारी के साथ जम्हूरियत की हिफाजत करनी होगी। आंकड़ों में यदि ज्यादा अंतर नहीं होता तो विपक्षी सरकार के ऊपर आवश्यक होने पर वैचारिक नियंत्रण तो कर सकता था।
उनका यह भी कहना था कि सत्ताधारी पार्टी को वहम है। भले ही वह इसका प्रचार करती रहे कि अच्छे दिन आ गए हैं या और भी आने वाले हैं। लेकिन हकीकत यह है कि लगातार और बार बार झूठ बोलने से कोई बात लोगों को सच की तरह लगने लगती है और वे इस हिमाकत का शिकार हो जाते हैं। धर्म और राजनीति का इस कदर घालमेल कर दिया गया है कि दोनों अशुद्ध हो गए हैं। यह सब सायास और जतन के साथ किया जा रहा है। अब इस देश की एकता के लिए न तो कोई इकलौता नारा है या कोई इकलौता प्रतीक। महुआ मोइत्रा के इस कथन की अनुगूंज में हिन्दुस्तान के इतिहास को ‘इंकलाब जिन्दाबाद’, ‘वंदे मातरम’, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’, ‘आराम हराम है’, ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, ‘जयहिन्द’ वगैरह की याद तो संसद सदस्यों के दिमागों के जरिए आई होगी।
शुरुआत में ही अपने भाषण के संयत आचरण के लिए भी महुआ ने बहुत अदब और सम्मान के साथ देश के महान नेता मौलाना आजाद की याद की और उनके कहे हुए उद्धरण का पाठ किया। यह भी बताया कि संसद में प्रवेश करने के पहले मौलाना आजाद की प्रतिमा देश को उसकी बहुलवादी संस्कृति और सभी वैश्विक सभ्यताओं के आपसी सहकार की भी याद दिलाती रहती है। वही भारतीय सोच का प्रतिनिधि अक्स है। उसकी अनदेखी किसी भी कीमत पर संविधान निर्माताओं की उत्तराधिकारी पीढ़ी द्वारा लोकसभा में कैसे की जा सकती है। सच है, लोगों को भले अन्यथा समझाया जाता हो लेकिन 70 बरस पुराना लोकतंत्र और संविधान कहीं न कहीं दरक तो जरूर रहे हैं। उनके भाषण में एक देशभक्त की पीड़ा एक बुद्धिजीवी के कथन की भविष्यमूलकता और एक आम नागरिक से सरोकार रखने की सैद्धांतिक और प्रतिनिधिक कशिश ने एक साथ तृणमूल कांग्रेस की इस युवा सांसद के भाषण को संसद के अभिलेखागार में अपनी सम्मानित जगह पर रखने का वचन तो वक्त ने दिया होगा।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 10 फरवरी। राज्य वन औषधि बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष रामप्रताप सिंह की हालत चिंताजनक है। उन्हें एयर एम्बुलेंस से मेदांता हॉस्पिटल में शिफ्ट कराया गया है। श्री सिंह कोरोना पीडि़त हैं।
श्री सिंह पिछले कुछ दिनों से बालाजी हॉस्पिटल में भर्ती थे। उनकी हालत में सुधार न होने पर उन्हें दिल्ली ले जाने का फैसला लिया गया। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की पहल पर कलेक्टर ने आधी रात को दिल्ली जाने की अनुमति जारी की।
अग्रवाल के साथ-साथ महामंत्री (संगठन) पवन साय सहित कई नेता रामप्रताप सिंह का हाल जानने वहां पहुंचे थे। बुधवार को सुबह एयर एम्बुलेंस से उन्हें दिल्ली ले जाया गया। पार्टी के चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ. जेपी शर्मा और परिवार के कुछ नियमित फ्लाइट से दिल्ली गए हैं।


