संपादकीय
अभी जब देश के सबसे बड़े खेल सम्मान का नाम राजीव गांधी के नाम से हटाकर मेजर ध्यानचंद के नाम पर किया गया तो सोशल मीडिया पर मोदी के आलोचकों ने काफी कुछ लिखा। अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल खेल कांप्लेक्स में जिस स्टेडियम का नाम पटेल के नाम पर चले आ रहा था, उसे पिछले बरस नरेंद्र मोदी के नाम पर किया गया, उस समय भी यह बात जमकर उठी थी लेकिन अभी तो लोगों ने और अधिक तल्खी से याद किया और कहा कि अगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर कुछ रखना ही था तो उस स्टेडियम का नाम मोदी ने अपने नाम पर क्यों रखवाया जहां उनकी खुद की पार्टी की सरकार है, जहां का क्रिकेट एसोसिएशन उनके अपने कब्जे में हैं, उसी स्टेडियम का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखवा दिया जाता। खैर, यह तो सरकार की अपनी मर्जी की बात होती है, लेकिन अब जब एक बार फिर ओलंपिक में भारतीय हॉकी खबरों में आई तो उस वक्त फिर मेजर ध्यानचंद का नाम चला। आधी सदी से यह मांग चली आ रही है कि मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाए लेकिन इस मांग को किनारे रख दिया गया है। पिछले ही बरस की बात है, मेजर ध्यानचंद के जन्म की 115वीं सालगिरह थी और अनगिनत भूतपूर्व और मौजूदा हॉकी खिलाडिय़ों ने मिलकर यह मांग की थी कि उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न दिया जाए, लेकिन मोदी सरकार चुप रही उसने ऐसा नहीं किया। और तोहमत के लिए तो कांग्रेस है ही, कि उसने इतने समय में मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न क्यों नहीं दिया था?
अधिक पुरानी बात न करें और हाल के बरसों को देखें जब एक गैरकांग्रेसी इंद्र कुमार गुजराल साल भर के लिए प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने इस एक साल में बहुत से लोगों को भारतरत्न दिया। इनमें गुलजारी लाल नंदा, अरूणा आसफ अली, एपीजे अब्दुल कलाम, एमएस सुब्बूलक्ष्मी, और चिदंबरम सुब्रमण्यम, इतने लोग थे। गुजराल के तुरंत बाद अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री बने जो पूरी तरह से भाजपा के थे, और एनडीए सरकार के मुखिया थे, उन्होंने अपने कार्यकाल में जयप्रकाश नारायण, अमर्त्य सेन, गोपीनाथ बोर्दोलोई, रवि शंकर, लता मंगेशकर, और बिस्मिल्लाह खान को भारत रत्न से सम्मानित किया। इसके बाद एनडीए की दूसरी सरकार बनी, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और इस कार्यकाल में मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजपेई, प्रणब मुखर्जी, भूपेन हजारिका, और नानाजी देशमुख को भारत रत्न दिया गया। मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल भी आ गया, और यह सरकार तो बड़ी रफ्तार से बड़े-बड़े फैसले लेने को जानी जाती है, लेकिन ओलंपिक के दो वक्त में भी मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की कोई चर्चा भी नहीं हुई बल्कि पिछले बरस खिलाडिय़ों की मांग पर भी सरकार का कोई रुख सामने नहीं आया। अब राजीव गांधी के नाम पर रखा गया खेल का सबसे बड़ा सम्मान उनके नाम से हटाकर मेजर ध्यानचंद के नाम पर कर दिया गया, लेकिन इसके बाद भी ऐसा नहीं हुआ कि इस मौके पर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न की घोषणा हुई हो। कुल मिलकर देखें तो राजीव गाँधी का अपमान करने में मेजर ध्यानचंद को हथियार की तरह इस्तेमाल कर लिया गया।
हिंदुस्तान में जो नामकरण का सिलसिला अटपटा है और फिर नामों को बदलने का सिलसिला तो और भी बदमजा है। बहुत सी पार्टियों की सरकारें नाम बदलने का यह काम करती हैं और ऐसा इसलिए भी होता है कि नामकरण भी वैसी ही राजनीति दिखाते हुए किए जाते हैं, और बाद में उन्हें बदलना एक अलग किस्म की राजनीति रहती है। ऐसा भाजपा ने भी बहुत किया है, कांग्रेस ने भी बहुत किया है, इसलिए हर किसी की मिसालें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यह समझने की जरूरत है कि नाम रखते हुए भी सोचा जाना चाहिए और हटाते हुए भी सोचा जाना चाहिए। फिर भी हम आज यहां पर नामकरण और दोबारा नामकरण पर नहीं लिख रहे हैं, हम इस बात पर लिख रहे हैं कि राजीव गांधी का नाम हटाने की बात तो ठीक है लेकिन मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न क्यों नहीं दिया जा रहा है? यह तो मोदी सरकार के हाथ की बात थी और ओलंपिक में हॉकी के जिस खेल को मोदी ने रात-रात जागकर देखा है, टीवी के परदे के सामने खड़े रहकर देखा है, उस हॉकी के खेल के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का सम्मान अगर इस सरकार को सचमुच ही करना है, तो राजीव गांधी का नाम मिटा कर क्यों किया गया? मोदी अपने नाम के स्टेडियम के नाम को ध्यानचंद के नाम पर रखते और उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा करते? ऐसे में ही लोगों को याद पड़ता है कि अरुण जेटली के नाम पर भी दिल्ली के एक ऐतिहासिक स्टेडियम का नाम रख दिया गया। जैसा कि हमने हाल के बरसों में भारतरत्न पाने वालों के नाम गिनाए हैं कि अगर इच्छाशक्ति थी तो इंद्र कुमार गुजराल ने एक बरस के प्रधानमंत्री रहते हुए पांच भारतरत्न दे दिए, और अटल बिहारी वाजपेई ने 6 बरस प्रधानमंत्री रहते हुए पांच भारतरत्न दिए। देने के लिए तो मोदी ने भी पांच भारत रत्न अपने पिछले कार्यकाल में ही दे दिए हैं, लेकिन मेजर ध्यानचंद की बारी वहां पर नहीं आई। मेजर ध्यानचंद को मौका दिया गया तो राजीव गांधी की स्मृतियों को हटाकर उस कुर्सी को खाली करके ध्यानचंद को वहां बैठा दिया। क्या यह सचमुच यही मेजर ध्यानचंद का सम्मान हुआ है? जिस देश में सचिन तेंदुलकर जैसे कारोबारी खिलाड़ी को अभी कुछ ही बरस पहले, सबसे कम उम्र में भारत रत्न दे दिया गया, वहां पर मोदी के 6 वर्षों में भी भारतरत्न के लिए ध्यानचंद का नाम नहीं आया !
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गांधीवादी किफायती जिंदगी को अगर देखें तो यह लगेगा कि आज की अर्थव्यवस्था की बुनियाद उससे हिल जाएगी। लोग पैदल या साइकिल से चलने लगेंगे, छोटी-छोटी आवाजाही के लिए कारों का इस्तेमाल कम हो जाएगा, सडक़ों पर गाडिय़ों की भीड़ घटेगी, और पैदल चलने वाले या साइकिल चलाने वाले लोग प्रदूषण पैदा नहीं करेंगे तो हवा साफ करने वाली मशीनों की बिक्री घट जाएगी, गाडिय़ां कम चलेंगी तो ऑटोमोबाइल की कंपनियों का भट्टा बैठ जाएगा, पेट्रोलियम कम बिकेगा, और लोग सेहतमंद भी रहेंगे। सोशल मीडिया में पैदल और पैडल के फायदे गिनाते हुए लोग यह भी गिनाते हैं कि इससे नुकसान किस-किसका होगा। सेहतमंद लोग देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख देते हैं, न महँगे इलाज की जरूरत पड़ती, न बड़े अस्पतालों की, न कसरत की मशीनों की, और न उन्हें जिम जाना पड़ता। ऐसे लोग देश की अर्थव्यवस्था में कुछ भी नहीं जोड़ पाते, न किसी चीज की बर्बादी करते, ना खुद बर्बाद होते। दूसरी तरफ महज बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में चलने वाले लोग, रेस्तरां का फास्ट फूड खाने वाले लोग, कुल मिलाकर अस्पतालों को चलाते हैं, उनका खुद का आकार हर बरस बदल जाता है, तो उनकी वजह से फैशन उद्योग भी चलता है। और पैदल और पैडल में भी सबसे खतरनाक पैदल लोग रहते हैं क्योंकि वे तो साइकल तक नहीं खरीदते और साइकिल उद्योग भी नहीं चलता।
सोशल मीडिया पर हल्के फुल्के मिजाज में लिखी गई ऐसी गंभीर बातों के साथ-साथ एक दूसरी बात को भी समझने की जरूरत है। अभी दो दिन पहले ही यूरोप की सबसे चर्चित पर्यावरणवादी आंदोलनकारी किशोरी ग्रेटा थनबर्ग का एक बयान सामने आया है जिसमें उसने अंधाधुंध मार्केटिंग करने वाले फैशन उद्योग की आलोचना की है कि वह लोगों के बीच गैरजरूरी फैशन को बढ़ावा देता है। और ग्रेटा ने यह बात कहने के लिए एक फैशन मैगजीन वोग को दिए हुए एक इंटरव्यू का इस्तेमाल किया जिसमें उसने कहा कि पर्यावरण की बर्बादी के लिए और मौसम की तरह-तरह की इमरजेंसी आने के लिए फैशन उद्योग बहुत हद तक जिम्मेदार है। फैशन उद्योग हर कुछ महीनों में फैशन बदलकर लोगों को नए कपड़े और सामान खरीदने के लिए उकसाते रहता है। ग्रेट ने यह कहा कि वह कभी नए कपड़े नहीं खरीदती, अगर जरूरत भी रहती है तो पुराने कपड़ों के बाजार से इस्तेमाल होने के बाद बिकने वाले पुराने कपड़े ही खरीदती है, और जान-पहचान के करीबी लोगों से कपड़े उधार लेकर भी अपना काम चला लेती है 18 बरस की ग्रेटा थनबर्ग स्वीडन की एक किशोरी है और पर्यावरण को लेकर अपने आंदोलन की वजह से वह खबरों में भी रही। पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बावलेपन की हद तक जाकर ग्रेटा थनबर्ग पर हमला करते थे जिसका मजा लेते हुए ग्रेटा अमेरिका की पर्यावरण विरोधी नीतियों को उजागर करते रहती थी।
इन दो अलग-अलग बातों को अगर देखें तो इनका एक दूसरे से बहुत सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन दोनों ही बातें पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी हैं। एक तो यह कि लोग एक सेहतमंद जीवनशैली इस्तेमाल करें जिसमें वे पैदल और पैडल पर अधिक निर्भर करें। यह जरूरी है। इसके साथ ही यह भी समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान से हजारों मील दूर किस तरह एक संपन्न यूरोपियन देश स्वीडन में एक किशोरी उन्हीं जीवनमूल्यों को बढ़ावा दे रही है जिन्हें गांधी ने अपनी जिंदगी में इस गरीब हिंदुस्तान में बढ़ाया था. आज अगर यह सोचें कि क्या हिंदुस्तान में कोई लडक़ा या लडक़ी अपने किशोरावस्था में पर्यावरण को लेकर ऐसी जागरूकता की बात कर सकते हैं, तो गांधीवादी होने का दावा करने वाले परिवारों में भी ऐसे कोई बच्चे नहीं मिलेंगे। इसलिए गांधीवादी किफायत न सिर्फ धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी है, बल्कि गांधी के किस्म की आत्मनिर्भरता लोगों की सेहत के लिए भी जरूरी है। यह एक अलग बात है कि आज दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह से फिजूलखर्ची पर टिक गई है, वह अर्थव्यवस्था जरूर डांवाडोल होने लगेगी।
आज हिंदुस्तान में किसी संपन्न तबके के बच्चों को तो छोड़ ही दें, औसत दर्जे की कमाई वाले परिवारों में भी बच्चे धरती को बचाने के लिए बाजार से पुराने कपड़े खरीदें या यार दोस्तों से उधार में लेकर पहन लें ऐसा किसी ने देखा-सुना भी नहीं होगा। इसलिए ग्रेटा की बातों को ग्रेट मानना भी जरूरी है और उनको गांधी के नजरिए से देखना भी जरूरी है. यह भी समझना जरूरी है कि किस तरह आज का फैशन उद्योग लोगों को गैरजरूरी खरीदारी के तरफ धकेलता है और फैशन को बार-बार बदल कर लोगों को ग्राहक बनाए रखता है, समर्पित ग्राहक।
वैसे तो देश और दुनिया में चर्चित बहुत से फिल्मी और खिलाड़ी सितारों को देखें तो उनकी एक अपील भी गैरजरूरी फैशन खपत को घटा सकती है, लेकिन घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? यही सारे फिल्म और क्रिकेट के सितारे ऐसे हैं, जो तमाम किस्म की फैशन के इश्तहार करते हैं, उनको बढ़ावा देते हैं। अब अगर अमिताभ बच्चन ही यह कहने लगें कि वे तो पिछले 15 वर्षों से एक ही पतलून पहन रहे हैं, या उन्होंने तो पिछले 5 बरस से कोई नया सूट सिलवाया नहीं है, तो उनके खुद के पेट पर लात पड़ेगी। इसलिए जो लोग मॉडलिंग और बिक्री को बढ़ावा देने के ऐसे धंधे की कमाई पर नहीं टिके हुए हैं, उन लोगों को खुलकर सादगी, और फैशन की बात करनी चाहिए। अब कनाडा का प्रधानमंत्री अगर किसी मौके पर अपने रंग-बिरंगे मोजों के रंग, या उन पर छपी हुई डिजाइन को लेकर अपने सामाजिक सरोकार के प्रदर्शन पर वाहवाही पाता है, तो दुनिया के और भी बहुत से नेता और दूसरे चर्चित व्यक्ति फैशन की बर्बादी घटाने के लिए इस तरह के बयान दे सकते हैं। बहुत छोटी-छोटी बातों को देखें तो फेसबुक कंपनी का नौजवान मालिक मार्क जुकरबर्ग अधिकतर वक्त सलेटी रंग की मामूली टी-शर्ट और जींस में ही दिखता है। उसे किसी मौके के लिए कपड़े छंाटने में भी अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती क्योंकि उसने इन्हीं रंगों के, ऐसे ही डिजाइन के यही कपड़े 4-6 जोड़ी रखे हुए हैं। ऐसे चर्चित लोग भी अगर किफायत को लेकर कोई आंदोलन शुरू करेंगे तो उसका धरती पर बड़ा असर पड़ सकता है लेकिन सवाल यह है कि जिस फेसबुक पर रात-दिन फैशन के इश्तहार आते हैं, क्या वहां पर धंधा मार नहीं खायेगा? इसलिए बहुत से लोग जो सीधे-सीधे मॉडलिंग से जुड़े हुए नहीं है वे लोग भी इश्तहार की कमाई से तो जुड़े हुए हैं। देखें इन्हीं के बीच से कोई रास्ता ऐसा निकल सकता है क्या, जिसमें चर्चित लोग गांधी या ग्रेटर थनवर्ग की तरह किफायत और सादगी को बढ़ावा दे सकें। जिस वक्त चीन में अकाल की नौबत थी और लोगों के पास काम नहीं था, खाना नहीं था, उस वक्त वहां औरत-मर्द सभी के लिए एक ही किस्म की पतलून और वैसा ही कोट, और वह भी एक ही रंग के, लागू कर दिए गए थे ताकि लोग फैशन में बर्बाद ना हों। आज भी सरकार और समाज में जिम्मेदार लोगों को यह देखना चाहिए कि जिंदगी कैसे अधिक किफायती हो सकती है, और कैसे हम धरती पर अधिक बड़ा बोझ बनने से बचें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
जाने कैसे खबरों में और सोशल मीडिया में पिछले 4 दिनों से एक मंदिर की ऐसी तस्वीरें लगातार घूम रही हैं जिनमें ईश्वर के लिए आया हुआ चढ़ावा गिना जा रहा है। दर्जनों लोग बैठकर नोटों को अलग कर रहे हैं, सिक्कों को अलग कर रहे हैं, उनके बंडल बनाते जा रहे हैं। कुछ खबरें ताजा हैं, कुछ तस्वीरें और आंकड़े पिछले सालों के भी हैं। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश-राजस्थान की सरहद पर राजस्थान के हिस्से के इस मंदिर में हर महीने करोड़ों का चढ़ावा आने की खबरें पिछले वर्षों में लगातार आ रही हैं। देश का प्रमुख मीडिया, देश के प्रमुख अखबार, सभी जगहों पर आंकड़ों के साथ इस मंदिर की कमाई का जिक्र है, और उसकी तस्वीरें भी हैं। अब यह जगह कोई बहुत बड़ा तीर्थ स्थान नहीं है जहां पर तिरुपति या नाथद्वारा या स्वर्ण मंदिर या अजमेर शरीफ की तरह बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। लेकिन सांवलिया सेठ का यह मंदिर कई मायनों में बड़ा चर्चित है। और जैसा कि सांवले रंग से समझ में आ जाना चाहिए यह कृष्ण का एक मंदिर है। कृष्ण के अनगिनत रूपों में से एक रूप उनके सांवले रंग की वजह से सांवलिया सेठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। अब इस मंदिर में इतने चढ़ावे की एक वजह यह भी है यह पूरा इलाका अफीम की गैरकानूनी खेती का इलाका माना जाता है और अफीम तस्कर परंपरागत रूप से इस मंदिर के भगवान को अपना भागीदार बनाकर चलते हैं। जब कभी वे अफीम की कोई बड़ी खेप बाहर भेजते हैं, तो हिस्सा देने पहुंचते हैं और चढ़ावे में नोटों के साथ-साथ अफीम भी डाली जाती है। हर महीने अमावस्या को दान पेटी खोली जाती है तो उसमें से करोड़ों रुपए निकलते हैं जो कि जाहिर तौर पर अफीम तस्करों के दिए गए दान की वजह से इतनी बड़ी रकम बन पाते हैं। इस बात को उस इलाके के तमाम लोग अच्छी तरह जानते हैं यह बात खबरों में आती रहती है, इसलिए यह हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोई साजिश भी नहीं है। ये खबरें बड़े धर्मालु हिंदुओं के मालिकाना हक वाले अखबारों और मीडिया में आती हैं, और अफीम को चूंकि काला सोना कहा जाता है इसलिए सांवलिया सेठ को भी काले सोने का देवता कहते हैं।
लोगों को याद होगा कि दक्षिण भारत के विख्यात तीर्थस्थान तिरुपति में भी वहां के देवता को उनके मानने वाले लोग अपने व्यापार में भागीदार मानकर चलते हैं और फिर चाहे उनका व्यापार शराब का ही क्यों ना हो, वे अपने बही-खातों में ईश्वर के नाम का हिस्सा दिखाते हुए उतनी रकम को दान में तिरुपति ट्रस्ट को हर बरस भेजते रहते हैं. उनकी आस्था उन्हें यह भरोसा दिलाती है कि ईश्वर की भागीदारी की वजह से उनका कारोबार खूब पनपेगा। और यह बात बहुत गलत भी नहीं है क्योंकि ऐसे भागीदार लोगों के धंधे में बरकत से ईश्वर का खुद का भी फायदा बढ़ता है, और यही वजह है कि व्यापारी अधिक कामयाब होते हैं, मजदूर बमुश्किल मजदूरी कमा पाते हैं, और बीच के लोग जो कि अधिक चढ़ावा नहीं दे पाते जो कि मुफ्त का लड्डू प्रसाद के रूप में पाकर ही प्रसाद पा सकते हैं, प्रसाद को खरीद नहीं सकते हैं, उनकी जिंदगी भी जस की तस चलती रहती है वह आखिर ईश्वर को किस चीज में भागीदार बना सकते हैं?
जिन लोगों ने गॉडफादर फिल्म देखी होगी या मारियो पूजा की लिखी हुई कहानी पढ़ी होगी, उन्हें पता होगा कि किस तरह दुनिया के सबसे खूंखार मुजरिम और माफिया सरगना अपने दिल की गहराइयों से ईसाई धर्मावलंबी रहते हैं, सुख-दुख के तमाम मौकों पर चर्च जाते हैं, इतवार को चर्च जाते हैं, एक-दूसरे को कत्ल की साजिश चर्च और कब्रिस्तान में करते हैं। लेकिन किसी का ईश्वर उन्हें किसी जुर्म से नहीं रोकता, किसी जुर्म की कमाई से नहीं रोकता। ईश्वर ने अगर जुर्म की कमाई से किसी को रोका होता तो भला मुंबई का एक बड़ा माफिया सरगना और एक सबसे बड़ा तस्कर मस्तान कैसे हाजी बना होता? हाजी तो लोग एक तीर्थ करने के बाद, हज करने के बाद ही बन पाते हैं, और मस्तान जब हाजी बन गया तो जाहिर है कि उसके पीछे भी ईश्वर की मर्जी रही होगी।
ईश्वर और काले कारोबार का यह पूरा सिलसिला दुनिया में कहीं भी एक-दूसरे के साथ कोई टकराव नहीं रखता। हमने दुनिया के सैकड़ों धर्मस्थानों के बारे में पढ़ा है, दर्जनों को रूबरू देखा भी है। किसी एक में भी ऐसी कोई तख्ती नहीं लगी है कि जुर्म करने वाले और पापी यहां पर ना आएं, ईश्वर के सामने ना पड़ें, पाप की कमाई से यहां दान ना दें। सच तो यह है कि जब बड़े से बड़े चर्चित धर्मस्थान पर बड़े-बड़े चर्चित मुजरिम पहुंचते हैं, तो उनके स्वागत के लिए उस जगह के, उस धर्म के पुजारी खड़े रहते हैं। वह तमाम लोगों की भीड़ को चीरते हुए ऐसे मुजरिमों को लेकर ईश्वर तक जाते हैं और फिर जितनी देर ईश्वर और मुजरिम एक दूसरे को देखना चाहते हैं, उतनी देर ये पुजारी बाकी लोगों की भीड़ को रोककर रखते हैं। अलग-अलग धर्मों में रिवाज थोड़ा सा कम-अधिक फर्क वाला हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि दुनिया का एक भी धर्म पाप की काली कमाई से कोई परहेज नहीं करता। धर्म स्थानों पर यह तो लिखा दिखता है कि यहां दलित भीतर ना आएं, महिलाएं भीतर ना आएं, गैरहिंदू भीतर ना आएं, लेकिन जिस मंदिर से यह चर्चा हमने शुरू की है, सांवलिया सेठ के उस मंदिर में भी ऐसी किसी तख्ती की चर्चा पिछले कई बरस की खबरों में हम न ढूंढ पाए कि क्या वहां पर अफीम तस्करों के लिए आने की कोई मनाही है? क्या वहां पर अफीम की कमाई दान में न देने या दान पेटी में अफीम न डालने की कोई अपील है? ऐसा कुछ भी नहीं है।
जो धर्म अपने भीतर के इंसानों को अछूत और सछूत तो जैसे तबकों में बांटकर चलता है, उस धर्म में भी कोई भी नोट, कोई भी सिक्का, कोई भी गहने, कुछ भी अछूत नहीं हैं. और तो और अफीम की डली और अफीम की पोटली भी अछूत नहीं है। ईश्वर का यह हैरान करने वाला दरबार रहता है जहां किसी मुजरिम के लिए कोई मनाही नहीं है जहां किसी जुर्म की कमाई से कोई परहेज नहीं है। और तो और यह भी याद पड़ता है कि मदर टेरेसा ने भी अपने अनाथ आश्रम के बच्चों के लिए दुनिया के कुछ ऐसे लोगों से दान लिया था जिन्हें मुजरिम माना जाता था। अब जब ईश्वर को ही परहेज नहीं है, तो ईश्वर का नाम लेकर अनाथ बच्चों को जिंदा रखने का काम करने वाली मदर टेरेसा कैसा परहेज निभा सकती है? इसलिए जिस पैसे को प्रवचनकर्ता हाथों का मैल करार देते हैं, उस पैसे के बारे में एक भ्रष्ट नेता, अधिक बेहतर तरीके से, अधिक सच्चाई के साथ बता सकता है कि पैसा खुदा तो नहीं है, लेकिन खुदा से कम भी नहीं है। बात एकदम सही है, किसी धर्मस्थल की ऐसी हिम्मत हमने आज देखी-सुनी तो दूर, कहानी में भी नहीं पढ़ी है जहां पर यह लिखा गया हो कि इस जगह पर मुजरिमों और पापियों के आने पर रोक है, और जुर्म की काली कमाई दान में डालने पर रोक है।
ईश्वर को तस्करों से लेकर तमाम किस्म के मुजरिमों तक की भागीदारी अच्छी लगती है. अफीम के धंधे में भागीदारी से भी उसे कोई परहेज नहीं है। धर्म में जिनकी दिलचस्पी है उन्हें धर्म की बारीकियों को जानना चाहिए। अगर ईश्वर सिर्फ नेक काम करने वाले, पुण्य करने वाले लोगों का दान मंजूर करने लगेगा तो उसे दिन में दो बार अपनी प्रतिमा से निकलकर पास के गुरुद्वारे में लंगर खाने के लिए जाना पड़ेगा। ईश्वर समझदार है, व्यावहारिक है इसलिए वह किसी किस्म की कमाई को बुरा नहीं मानता और दो नंबर के धंधे में भी अगर उसे भागीदार बनाकर रखा जाता है तो वह उनको भी बरकत देता है। मनरेगा के मजदूरों को जरूर अपनी मजदूरी बढ़वाने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि उन्होंने किसी ईश्वर को अपनी मजदूरी की कमाई में भागीदार बनाया हुआ नहीं है। मजदूरों को भी अफीम तस्करों से दो नंबरियों से लेकर 10 नंबरियों तक से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, क्योंकि वह सीख नहीं पाए हैं इसीलिए हाड़-मांस जलाते हुए रात-दिन मेहनत करते हैं, और आधा पेट खाकर सोते हैं। ईश्वर के तौर-तरीके अलग किस्म के हैं और वहां पर एक अलग ही भाषा चलती है, उस भाषा में पार्टनरशिप-डीड लिखवाना मजदूरों को आना चाहिए।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
कई बरस पहले अमरीका के एक स्कूल में एक सिरफिरे समझे जा रहे नौजवान ने गोलियों से दर्जनों बच्चों को भून दिया था। इस हत्यारे से जुड़ी हुई जो खबरें आई थीं उन पर भारत के लोगों के सोचने का भी एक पहलू है। इस अमरीकी नौजवान की मां को बंदूकों से बहुत मोहब्बत थी और वह अपने बेटों को पास की एक शूटिंग-रेंज पर ले जाया करती थी, जहां पर कि बंदूकों के शौकीन बहुत से लोग प्रैक्टिस के लिए आया करते थे। और वह बंदूकों के अपने संग्रह के बारे में भी लोगों से फख्र के साथ बात किया करती थी। दो दिन पहले जब वह अपने बेटों के हाथों मारी गई, तब उसी की बंदूक उसके खिलाफ इस्तेमाल हुई और इसके बाद वह बेटा इसी मां के स्कूल जाकर वहां छब्बीस और लोगों को मार बैठा। हर कुछ महीनों में अमरीका में ऐसी वारदात होती ही रहती हैं।
हिंदुस्तान में बड़े बुजुर्ग हमेशा से यह कहते हैं कि घर का वातावरण अच्छा रखना चाहिए। यहां की कहानियों में यह लिखा हुआ है कि किस तरह मां के पेट में रहते हुए अभिमन्यु ने चक्रव्यूह तोडऩा सीखा। इसी तरह इस देश में यह भी माना जाता है कि जब कोई महिला मां बनने वाली होती है, तो उसे अच्छा सुनना चाहिए, अच्छा देखना चाहिए। कुल मिलाकर बात यह है कि पैदा होने के पहले, या पैदा होने के बाद, लोगों को एक बेहतर माहौल की जरूरत होती है। जो लोग यह मानते हैं कि लोग पैदाइशी अच्छे या बुरे होते हैं, वे विज्ञान के कुछ आधे-अधूरे नतीजों को मान बैठते हैं, या फिर हमेशा से चली आ रही तर्कहीन कहावतों और मुहावरों को। दरअसल होता यह है कि किसी भी बच्चे की सोच बनने में उसके आसपास के माहौल का ही पूरा असर होता है। यह माहौल परिवार का भी हो सकता है, पड़ोस का भी हो सकता है, स्कूल या दोस्तों का भी हो सकता है। और आज के जमाने में इन सबसे परे, टीवी और इंटरनेट का भी हो सकता है। इसलिए जब कोई मां अपने बच्चे के सामने बंदूकों के अपने शौक को गर्व के साथ बखान करती है, और जब कोई बच्चा बचपन से ही इन बंदूकों के बीच सांस लेते बड़ा होता है, तो उसके इन बंदूकों के इस्तेमाल करने का खतरा भी बढ़ जाता है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि बंदूकें किन्हीं मुजरिमों के मारने के, बुरे लोगों को मारने के काम नहीं आतीं, वे अधिकतर मामलों में सिर्फ बेकसूरों को मारने के काम आती हैं। कभी अपने को, कभी अपने जीवनसाथी को, और जैसा कि अमरीका के इस मामले में हुआ, अपनी मां को और उस मां की नौकरी वाले स्कूल के दर्जनों लोगों को।
इसलिए लोगों को यह सोचने और समझने की जरूरत है कि उनके, और उनके बनाए हुए माहौल का असर बच्चों पर बहुत दूर तक पड़ता है। जो मां-बाप बीड़ी-सिगरेट पीते हैं, उनके बच्चों के इस लत में पडऩे का खतरा अधिक होता है। ऐसा ही हाल बदजुबानी का है, जो लोग बातचीत में गालियां देते हैं, उनके बच्चे या उनके आसपास के बच्चे इन बातों को तेजी से सीखते हैं। जो बच्चा अपने पिता के हाथों अपनी मां से बदसलूकी देखते बड़ा होता है, वह आगे चलकर पिता से नफरत तो करता ही है, उसके खुद के हिंसक होने के खतरे बढ़ जाते हैं। हिंदुस्तान के आम परिवारों में लोग बच्चों के सामने बात करते हुए सामाजिक न्याय को भूल जाते हैं। कहीं कोई परिवार गरीबी को मूर्खता बताने लगता है, तो कहीं किसी आरक्षित तबके को सरकारी दामाद कहने लगता है। ऐसी सारी भाषा लोगों के मन में बचपन से ही बैठते चलती है और बड़े होने पर ऐसे बच्चों की सोच बदलने की गुंजाइश कम रहती है। आज इस पर लिखने का हमारा मकसद यह है कि भारत के मां-बाप इस पूरे हादसे को लेकर, और उसके पीछे इस हत्यारे नौजवान की मां की शौक और पसंद को देखते हुए, अपने खुद के बारे में सोचें-विचारें। यह देखें कि क्या उनकी कोई बात तो उनके बच्चों को गलत राह पर नहीं धकेल रही। अमरीका के इस हादसे से अगर हिंदुस्तान के मां-बाप, खुद बड़ी ठोकर खाने के पहले अपने को संभाल सकें, तो उसी में समझदारी है।
आज इस पुराने मामले पर लिखी हुई बात को दोहराने की जरूरत इसलिए पड़ रही है कि दो दिन पहले देश की राजधानी में चीख-चीख कर जो भीड़ मुसलमानों को काटने का फतवा जारी कर रही थी और इस बात को लेकर पागलपन के नारे लगा रही थी कि जब इन्हें काटा जाएगा तब वे राम-राम का नारा लगाएंगे। ऐसे लोगों को यह भी समझना चाहिए कि इस देश का नाकारा कानून और इस देश की सांप्रदायिक मुजरिमों से रियायत बरतने वाली सरकार मिलकर उन्हें सजा चाहे ना दिलवा सकें, लेकिन जब उनके परिवार के लोग, उनके आसपास के लोग सांप्रदायिक नफरत के ऐसे नारे लगाते उन्हें देखेंगे, तो वे या तो अपने परिवार के लोगों से नफरत करने लगेंगे, या इनके फतवे के झांसे में आकर खुद भी समाज के एक हिस्से से नफरत करने लगेंगे। कुल मिलाकर यह है कि उनकी जिंदगी नफरत से भरी हुई रहेगी। ये लोग मुसलमानों का कोई नुकसान नहीं कर सकेंगे, ये नुकसान सिर्फ हिंदुओं का करेंगे और अपने करीब के लोगों का सबसे अधिक नुकसान करेंगे, जिनकी जिंदगी में इंसानियत की एक जगह हो सकती थी, लेकिन उस जगह को यह नफरत से भर दे रहे हैं। इन लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह अमेरिका में मां-बाप की जमा की हुई बंदूकों को लेकर छोटे-छोटे बच्चे अपने स्कूल और कॉलेज में अपने बेकसूर साथियों को थोक में मार रहे हैं, उसी तरह की नफरत का शिकार हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी नफरतजीवियों के बच्चे होने जा रहे हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
कल दिल्ली में भाजपा के एक नेता की अगुवाई में प्रतिबंधों को तोड़ते हुए प्रदर्शन हुआ, और इस प्रदर्शन में भीड़ ने खुलकर मुस्लिमों पर हिंसा करने के नारे लगाए, और उन नारों के साथ यह नारे भी लगाए कि जब इनको मारा जाएगा तो ये राम-राम चिल्लाएंगे। अपनी हिंसक और सांप्रदायिक सोच में राम को जिस तरह से लपेटा गया है, उससे लगता है कि तुलसी की कहानी से परे अगर सचमुच ही राम कहीं होते तो अपना नाम समेटकर भी यहां से चले गए होते। जिस राम के नाम पर देश के सबसे लंबे मुकदमे के बाद एक मंदिर बन रहा है, उस राम का नाम मुंह से निकलवाने के लिए मुस्लिमों को मारने और काटने के नारे संगठित तरीके से लगवाए जा रहे हैं। और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक छाए हुए इन वीडियो को अगर किसी ने नहीं देखा है तो दिल्ली और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने नहीं देखा है जिनकी प्राथमिकता में ऐसी सोच पर कोई कार्यवाही करना रह नहीं गया है। मीडिया के कुछ लोगों ने इस बात को लिखा भी है कि ऐसे नारे लगाने वालों को गिनती के फतवेबाज मान लेना गलत होगा क्योंकि यह उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले हर कुछ दिनों में आगे बढ़ाए जा रहे एजेंडे का एक हिस्सा है, जिसे समझ पाना अधिक मुश्किल बात नहीं है। ऐसा लगता है कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश चुनाव का मतदान उत्तर प्रदेश में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के बीच एक जनगणना की तरह होकर रह जाएगा जो कि धर्म के आधार पर की जाएगी।
जिस तरह एक पत्रकार को जंतर मंतर पर इस सांप्रदायिक भीड़ ने घेर लिया और उससे जबरिया जय श्री राम कहलवाने की कोशिश की गई, और ना कहने पर उसे वहां से निकाल दिया गया, वे तमाम वीडियो देखने के बावजूद दिल्ली की पुलिस तो मौन है ही, अपने आपको भाजपा से अलग बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी ऐसी नौबत के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे जबकि वह आए दिन इस बात की आड़ लेते रहते हैं कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है और दिल्ली का मुख्यमंत्री पुलिस को नियंत्रित नहीं करता। लेकिन दिल्ली का मुख्यमंत्री अपनी जुबान को तो नियंत्रित करता है, वह यह तो तय कर सकता है कि वह किस सांप्रदायिक हिंसा को देखते हुए अपना मुंह खोले? या फिर वह अपनी ही पार्टी के विधायकों की गुंडागर्दी को बचाने के लिए ही मुंह खुलेगा और फिर चाहे उसके राज्य के भीतर इतनी बड़ी-बड़ी सांप्रदायिक हिंसा होती चले उसका मुंह भी नहीं खुलेगा? यह हिंदुस्तान का किस किस्म का निर्वाचित मुख्यमंत्री है जिसका मुंह ही चुनिंदा मुद्दों पर खुलता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि उसके गुरु अन्ना हजारे का मुंह चुनिंदा मुद्दों पर, चुनिंदा लोगों के खिलाफ ही खुलता था, और पिछले 6 बरस से वह कुंभकरण की तरह सोया हुआ है यह कहकर कि कांग्रेस सरकार आएगी तो उठा देना।
यह सिलसिला बहुत ही शर्मनाक है लेकिन दिक्कत यह है कि दिल्ली की पुलिस और उत्तर प्रदेश की पुलिस इन दोनों की सांप्रदायिकता में कोई फर्क रह नहीं गया है। जो वीडियो बच्चे-बच्चे के हाथ में है, वह वीडियो भी पुलिस को हासिल नहीं हो रहा है। जिस प्रदर्शन की अर्जी खारिज की जा चुकी थी उसके बावजूद वह प्रदर्शन हुआ और इतने भयानक सांप्रदायिक तरीके से हुआ लेकिन फिर भी केंद्र सरकार की इतनी एजेंसियां जो कि लोगों के मोबाइल फोन पर झांकने के लिए इजराइल से अरबों का जासूसी स्पाइवेयर खरीदती हैं, उन्हें सडक़ पर नारे लगाती भीड़ के यह वीडियो भी नहीं मिल रहे जिन्हें पाने के लिए पेगासस की जरूरत नहीं है, महज आंख और कान खोलने की जरूरत है, वे सोशल मीडिया पर चारों तरफ हैं। ऐसी अनदेखी करके केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की पुलिस देश को किस हालत में धकेल रही है, क्या इन दो पुलिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा अध्यादेश के तहत मुक़दमा दजऱ् नहीं होना चाहिए?
और पूरे देश में पुलिस किस तरह एक अराजक ताकत बन चुकी है इसको देखना हो तो कल देश के मुख्य न्यायाधीश का दिया हुआ यह भाषण सुनना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि देश में मानवाधिकार का सबसे बुरा हनन पुलिस हिरासत में होता है जहां ताकतवर लोगों को भी प्रताडऩा और अत्याचार झेलना पड़ता है। प्रधान न्यायाधीश एन वी रमना ने कहा कि मानवाधिकार और व्यक्ति की गरिमा को सबसे अधिक खतरा पुलिस थाने में होता है। उन्होंने पुलिस में पहुंचने के बाद लोगों के मानवाधिकार के मामले में अमीर और गरीब की ताकत के फर्क के बारे में भी काफी कुछ कहा है। उन्होंने कहा कि अगर हम कानून का राज बनाए रखना चाहते हैं तो न्याय तक पहुंच वाले, और बिना पहुंच वाले गरीब, के बीच का फर्क खत्म करना होगा।
पहुंच और बिना पहुंच वालों के बीच का यह फर्क हिंदुस्तान में आज ना सिर्फ पैसे वालों और गरीब के बीच में है, बल्कि बहुमत की आबादी और अल्पमत आबादी के बीच भी है। आज अल्पमत के लोग अगर बहुमत के खिलाफ इस तरह के नारे लगाते हुए मिलते तो अब तक उनके खिलाफ बड़ी-बड़ी एफआईआर दर्ज हो चुकी रहतीं। देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोग उनके खिलाफ टीवी की बहसों में मुंह से झाग निकालने लगते, और सडक़ों पर राजनेता देश के ऐसे गद्दार तबके को पड़ोस के देश भेज देने की बात कहने लगते। मुख्य न्यायाधीश ने जो बात गरीब और अमीर के बारे में कही है वह दरअसल पैसों की ताकत से जुड़ी हुई बात है, उसे और अधिक बारीकी से देखें तो वह सिर्फ ताकत से जुड़ी हुई बात है जो कि सिर्फ पैसों की ताकत हो, ऐसा जरूरी नहीं है। आज देश में बहुमत की ताकत और अल्पमत की ताकत का जो फर्क है उसने लोगों की जिंदगी का बुनियादी हक छीन लिया है। आज अल्पमत की भीड़ पर निशाना लगाने के लिए बहुमत की सोच वाली सरकारों की पुलिस कहीं पैलेट गन चलाने तैयार है, तो कहीं बेकसूरों को चौथाई-चौथाई सदी तक जेलों में बंद रखने को तैयार है, तो कहीं उनके खिलाफ अंतहीन झूठे मुकदमे दायर करने को तैयार है।
पता नहीं क्यों मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस तक संपन्न और विपन्न की पहुंच के फर्क को गिनाते हुए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की पहुंच के फर्क को नहीं गिनाया, जबकि कल जब वे यह भाषण दे रहे थे तकरीबन उसी समय के आसपास उन्हीं की दिल्ली में यह नारे लग रहे थे जिनमें मुस्लिमों को जब मारा जाएगा तो वे राम-राम चिल्लाएंगे के नारे वीडियो कैमरों के सामने लगाए जा रहे थे। या अलग बात है कि बिना इजाजत यह प्रदर्शन जिस भाजपा नेता के संगठन ने किया था वह इसे अपना भारत जोड़ो आंदोलन करार देता है यह किस तरह का भारत जोड़ो है? क्या इसे उसी दिल्ली में बैठे हुए देश के मुख्य न्यायाधीश को नहीं देखना चाहिए? क्योंकि देश में लोकतंत्र की अन्य संस्थाओं का दिवाला निकल चुका है, और अब थोड़ी बहुत उम्मीद इस नए मुख्य न्यायाधीश से इसलिए है कि इनकी कोई नीयत रिटायरमेंट के बाद किसी कुर्सी को पाने की दिख नहीं रही है। उनके अब तक के फैसले एक ईमानदार अदालत का रुख दिखा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश भी अगर बुलाकर यह नहीं पूछेगा कि राम का नाम लेने वालों की कमी हो गई है क्या जो कि मुस्लिमों को मार-मारकर राम का नाम लिवाया जाएगा? क्या मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी नहीं बनती कि एक मासूम नासमझ बच्चा बनी हुई दिल्ली पुलिस को बुलाकर पूछे कि उसके आंख और कान कुछ चुनिंदा मौकों पर काम करना क्यों बंद कर देते हैं? वह केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों को यह नहीं पूछ सकती कि ऐसे नारों के पहले और इसके बाद क्या उन्हें देश की सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं दिखता है? लोकतंत्र की बुनियादी समझ को ध्यान में रखते हुए कल की इस वारदात के बाद कोई नतीजा निकाला जाए तो उससे दिल्ली पुलिस के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज हो सकता है कि वह अपनी सरहद में इतनी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा के फतवे हवा में गूंजने दे रही है, उसकी अनदेखी कर रही है, और पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा भडक़ने का खतरा खड़ा कर रही है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
जिंदगी के बहुत से असल मुद्दों पर लगातार लिखने वाली एक महिला पत्रकार दोस्त ने एक वक्त लिखा था कि वह एक स्थानीय अखबार में पढ़ रही थी कि किस तरह हाथियों ने एक बस्ती में तोड़-फोड़ की। और साथ यह लिखा कि ऐसी खबरों के बाद उसे शाहरूख खान के डॉन-2 के बारे में पढऩे की क्या जरूरत है? यह बात रोज ही हमारे सामने आती है क्योंकि अखबार के कई पन्ने रोज तैयार करते हुए दिन की शुरुआत से लेकर रात काम खत्म होने तक दुविधा खत्म ही नहीं होती। अखबार पढऩे वालों की उम्मीदों के मुताबिक अखबार निकाला जाए, या उन्हें उनकी उम्मीदों के बारे में कुछ सलाह देता हुआ अखबार निकाला जाए? अखबार का मकसद कारोबार हो, या सरोकार हो? ऐसे बहुत से सवाल बहुत सी खबरों को लेकर और उन खबरों से छांटे गए किसी मुद्दे पर इस तरह का, इस जगह पर संपादकीय लिखते हुए सामने आकर खड़े हो जाते हैं। जब हम जिंदगी की तकलीफों और समाज में बेइंसाफी के बारे में लिखते हैं तो बहुत से लोगों को लगता है कि लिखने को कोई अच्छी बात बची ही नहीं है क्या? कुछ अखबारों ने अपनी यह नीति बना रखी है कि वे पहले पन्ने पर दुख-तकलीफ की कोई खबर नहीं छापते हैं, जब तक कि वह किसी बड़ी ताजा घटना की खबर न हो, और जिसे छोड़ देना लापरवाही लगे।
जो जुबान खबरों को छांटने के लिए इस्तेमाल होती है वह बहुत दिलचस्प है। हिंदुस्तान में हिंदी में अंग्रेजी के बहुत से शब्द घुल-मिल चुके हैं और ऐसा ही एक शब्द अखबारनवीसी में इस्तेमाल होता है-पब्लिक इंटरेस्ट। बारीकी से देखें तो हिंदी में इसके दो अलग-अलग मायने निकलते हैं, एक तो इसका मतलब जनहित होता है और दूसरा मतलब जनरुचि होता है। अखबार की खबरें तय करते हुए, विचारों के मुद्दे और विचारों को तय करते हुए, इन सबकी प्राथमिकताएं और इनका महत्व तय करते हुए, जब बात पब्लिक इंटरेस्ट की होती है तो कारोबारी अखबार (बिजनेस न्यूजपेपर नहीं, बिजनेस के लिए फिक्रमंद न्यूजपेपर) उसे जनरुचि मानकर एक ऐसा अखबार पाठकों के सामने रखता है जैसा कि दस-बीस बरस पहले एक तांत्रिक अंगूठी के इश्तहार में दावा किया जाता था-जो मांगोगे वही मिलेगा। और पब्लिक इंटरेस्ट का यह मतलब अखबार की रगों में दौडऩे वाले इश्तहार वाले फायदे की बात भी होती है। दूसरी तरफ जो लोग अखबार को कारोबार से कुछ अधिक, सरोकार से जुड़ा हुआ मानते हैं, वे पब्लिक इंटरेस्ट के जनहित वाले अर्थ को ढोकर चलते हैं, जो कि खासा भारी होता है और कमर भी तोड़ देता है। हम अभी बात मोटे तौर पर अखबारों की इसलिए कर रहे हैं कि देश का लंबा अनुभव इन्हीं के बारे में अधिक है और टीवी के समाचार चैनलों को आए अख़बारों के मुकाबले कम दिन हुए हैं और उनका सरोकारों से, जनहित से लेना-देना उसी वक्त जरा सी देर के लिए शुरू होता है जब कोई स्टिंग ऑपरेशन उनके हाथ ऐसा लग जाता है जो लोगों को टीवी के सामने कुछ देर बांध सके। भारत के समाचार चैनलों को हम आज के इस गंभीर विश्लेषण में जोडऩे की कोशिश करने पर भी नहीं जोड़ पाएंगे।
आज इस बात पर लिखने की कुछ जरूरत इसलिए भी लग रही है कि पाकिस्तान में एक कमजोर और खतरे में चल रहे लोकतंत्र के भीतर वहां के मीडिया को लेकर खुली बहस चलती है और लोग जिस तरह उसकी आलोचना भी करते हैं, वह बात हिंदुस्तान में शायद इसलिए कम है क्योंकि यहां मीडिया उस तरह के किसी फौजी, खुफिया, आतंकी और कट्टरपंथी हमलों का शिकार नहीं है। अधिक आजादी ने भारत के मीडिया को आत्ममंथन से परे कर दिया है और तरह-तरह के दबावों के तले पाकिस्तानी मीडिया चर्चा का सामान बनता है। अखबारों के पन्नों के लिए रोजाना धरती के अनगिनत पेड़ कटते हैं, ये पन्ने कम से कम ऐसे तो हों कि वे पेड़ों की कुर्बानी को सही ठहरा सकें! प्रेस काउंसिल के एक वक़्त के अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने अपनी कुछ बातों को लेकर मीडिया के बीच एक हलचल खड़ी की थी, और एक नाराजगी भी। लेकिन ‘उनकी’ बातों को लेकर उन्हें भला-बुरा कहने के साथ-साथ, उनके नाम को अलग करके च्उनज् बातों पर चर्चा की जरूरत क्या आज नहीं है? न सिर्फ उनकी कई बातें खरी हैं, बल्कि मीडिया में आज जो खोट है उसे लेकर आपस में ही कुछ खरी-खोटी करने की जरूरत है ताकि अगर किसी किस्म की बेहतरी मुमकिन है तो वह तो हासिल हो सके।
अखबारों के बाजारू मुकाबले के चलते कुछ ऐसी हरकतें हो रही हैं जो कि हमारी इस फिक्र को जायज और जरूरी ठहराती हैं। किसी का नाम लेकर उसे बुरा कहने या बदनाम करने का आज कोई मौका नहीं है इसलिए बिना नाम दो अलग-अलग मामलों की चर्चा यहां करना हमें माकूल लग रहा है। एक शहर में एक बड़े अखबार का स्थानीय संस्करण शुरू होने को था। वहां पहले से निकल रहे एक अखबार को यह फिक्र खड़ी हो गई थी कि नए अखबार के आने से लोग उसकी तरफ ध्यान न दें। उसने नए अखबार के पहले ही दिन, अपने अखबार में शहर की एक इतनी सनसनीखेज खबर छापी कि जिस पर पूरा देश हिल उठा। और तीन हफ्ते बीतते न बीतते देश के एक तीसरे, बड़े और जिम्मेदार अखबार ने यह रिपोर्ट छापी कि वह सनसनीखेज रिपोर्ट पूरी की पूरी झूठी थी, और सोच-समझकर उसे सच से दूर महज सनसनीखेज बनाया गया था। एक दूसरा प्रदेश और दो दूसरे अखबारों के बीच का मुकाबला। वहां भी पुराने जमे हुए अखबार ने नए अखबार के पांव न जमने देने के लिए एक इतनी बड़ी खबर छापी, जिसे पढक़र लोग हिल जाएं। एक बेटे ने अपने मां को मारकर, काटकर, पकाकर खा लिया। इससे बड़ी खबर किसी इलाके के लिए और क्या हो सकती है? और फिर वहां शायद चौथाई या आधी सदी से निकलते अखबार में अगर यह सबसे बड़ी सुर्खी हो, तो फिर लोग और क्या पढऩा चाहेंगे? कम से कम इसके मुकाबले किसी नए अखबार को तो पढऩा नहीं ही चाहेंगे। नतीजा यह हुआ कि नया अखबार बुरी तरह से पिटा हुआ सा लगने लगा। लेकिन उस प्रदेश के पाठकों की हैरानी की कोई सीमा न रही जब नए अखबार ने उस औरत को लाकर पुलिस और पाठकों के सामने पेश कर दिया जिसे कि मार, काट, पकाकर खा चुका गया बताया गया था।
लेकिन मीडिया के ऐसे झूठ पर बात आमतौर पर तभी होती है जब बाजार में मुकाबले के लिए किसी को किसी दूसरे अखबार को नीचा दिखाना हो। पर जहां कोई बाजारू टकराव न हों, और जहां अखबारी परंपरागत जुबान के मुताबिक, कुत्ता, कुत्ते को न काट रहा हो, वहां पर लोगों को झूठ की ऐसी साजिशों का क्या पता लगेगा? हम उसी बात पर लौटें, जिस बात से हमने आज लिखना शुरू किया था। जनहित और जनरुचि के फर्क को लेकर मीडिया पर अगर बात नहीं होगी तो यह तो वैसे भी संसद की एक बहस के मुताबिक कार्पोरेट हाऊसों का एक कारोबार बन ही चुका है। कार्पोरेट कारोबार की जुबान में सरोकार सिर्फ हाथीदांत की तरह का होता है। यहां पर चलते-चलते हम एक और अखबार और उसकी खबर का जिक्र करना चाहेंगे। टाईम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली के संस्करण में नोएडा इलाके के लिए निकलने वाले पन्नों पर एक बार एक खबर छपी थी जिसमें एक कार दुर्घटना में मारे गए एक युवक और एक युवती के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें थीं। इस पर अखबार ने अपनी कुछ जानकारियों का खंडन उसी बरस कर दिया था। लेकिन कुछ बरस बाद जाकर, शायद अदालत के बाहर समझौते के लिए, इस खबर को लेकर एक बड़ा सा माफीनामा अखबार ने एक रिपोर्ट की तरह छापा है कि उसकी खबर में कौन-कौन सी बातें झूठी थीं। एक मीडिया वेबसाईट ने हिसाब लगाया है कि करीब सवा दो सौ वर्ग सेंटीमीटर जगह में छपे इस माफीनामे का इस अखबार के विज्ञापन रेट से बिल बनता तो वह करीब आठ लाख रूपए का होता। हम अभी रूपयों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन हम मीडिया की गलतियों, उसके गलत कामों, और उनमें सुधार की ऐसी मिसालों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
इराक के प्रधानमंत्री अभी अमेरिका की सरकारी यात्रा पर पहुंचे तो लौटते हुए वे युद्ध के दौरान इराक से लूटी गई 17000 कलाकृतियों को वापस लेकर आए। ये कलाकृतियां एक संग्रहालय और एक प्रमुख अमेरिकी विश्वविद्यालय की तरफ से वापिस की गईं। अभी हाल ही में एक दूसरी खबर भी आई थी जिसके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया ने भी भारत से जुड़ी हुई कुछ पुरानी कलाकृतियां लौटाने का फैसला लिया है। जो विकसित और सभ्य देश हैं वे अपने देश के कलाकृतियों के व्यापारियों और संग्रह कर्ताओं, दोनों पर कई तरह के नियम लागू करते हैं कि वे दूसरे देशों से चुराई गई या लूटी गई कलाकृतियों को न लें।
यहां पर यह भी देखने की जरूरत है कि ब्रिटेन के बड़े-बड़े संग्रहालयों में भारत की कलाकृतियां उस वक्त पहुंचीं जब भारत पर अंग्रेजों ने कब्जा कर रखा था। एक गुलाम देश की कलाकृतियों, पुरातत्व, और संस्कृति को इस तरह से ले जाना एक निहायत नाजायज बात थी, और एक सभ्य लोकतंत्र होने का दवा करने वाले ब्रिटेन को अपने गुलाम देशों से जबरिया ले जाई गईं तमाम चीजों को वापस करना चाहिए। किसी भी देश को यह हक नहीं कि वे खुद दूसरे देशों से लुटेरों की तरह कलाकृतियां ले जाएं या कि चोरों और लुटेरों से उन कलाकृतियों को खरीदें जिन पर किसी दूसरे देश का हक है। सभ्य लोकतंत्र की यह जिम्मेदारी होती है कि वह कोई अंतरराष्ट्रीय कानून लागू हुए बिना भी दुनिया के हर देश के अधिकारों का सम्मान करें। इसलिए अभी इराक की जो कलाकृतियां वहां की सरकार को लौटाई गईं वह एक अच्छी पहल है क्योंकि आज इराक ऐसी हालत में भी नहीं था कि वह अमेरिका पर कोई दबाव बना सके, और ऐसे में अमेरिकी संग्रहालय और एक विश्वविद्यालय ने अगर ऐसी पहल की है तो उससे दुनिया के बाकी लोगों को भी सबक लेना चाहिए। भारत का कलाकृतियों का और पुरातत्व का सैकड़ों बरस पुराना एक संपन्न इतिहास रहा है और अविभाजित भारत-पाकिस्तान के वक्त से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की संस्कृति बहुत ही पुरानी रही है। जाहिर है कि पुरातत्व के ऐसे शोध कार्यों से उस वक्त जो चीजें निकली होंगी उनमें से बहुत सी इधर-उधर हो गई होंगी। जिन देशों में दूसरे देशों की ऐसी कलाकृतियां है उन्हें अपने विकसित और सभ्य लोकतंत्र होने का सबूत देते हुए और अंतरराष्ट्रीय अधिकारों का सम्मान करते हुए ऐसी तमाम चीजों को उनके मूल देश को वापिस करना चाहिए।
दिक्कत यह भी है कि ब्रिटेन जैसे हमलावर और नाजायज कब्जा करने वाले देश अपने गुलाम देशों से लूटी गई चीजों को यह कह कर न्यायोचित ठहराते हैं कि वहां के भूतपूर्व राजाओं ने यह सामान उन्हें तोहफे में दिए थे। ब्रिटेन की महारानी के ताज पर जो कोहिनूर जड़ा हुआ है उस कोहिनूर को लेकर भी यही तर्क दिया जाता है कि इसे भारत के एक शासक महाराज रंजीत सिंह ने युद्ध में अंग्रेजों द्वारा की गई मदद के एवज में तोहफे में दिया था, लेकिन ब्रिटेन के कई संग्रहालयों में भारत की अनगिनत कलाकृतियां सजी हुई हैं और अंग्रेजों की सरकार को इन्हें रखने का कोई भी हक नहीं है। पूरी दुनिया में कलाकृतियों को उनके मालिकों तक वापस पहुंचाने की एक मुहिम चलाने वाले लोगों का एक बड़ा आसान सा तर्क है उनका मानना है इतिहास भूगोल के आधार पर तय होगा, यानी जिस जगह का सामान है उसी जगह उसे भेजना न्याय उचित होगा। एक बात यह भी है कि ऐसे एक अभियान से जुड़े हुए लोगों ने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बहुत से संग्रहालयों में ऐसी कलाकृतियां ढूंढ निकाली हैं जो कि भारत के मंदिरों से 1947 के बाद चोरी की गई हैं। अभी-अभी, 2 बरस पहले जर्मनी ने भारत से चुराकर वहां ले जाई गई एक कलाकृति को भारत को वापिस भी किया है। लेकिन यह काम बहुत धीमे हो रहा है और अधिकतर देश इसमें खुलकर साथ नहीं दे रहे हैं।
एक वक्त आधी दुनिया पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों की सोच आज भी ऐसी है कि ब्रिटेन के दो बड़े संग्रहालयों का यह कहना है कि वे अलग-अलग देशों की ऐसी ऐतिहासिक कलाकृतियों या पुरातत्व कृतियों को इसलिए नहीं लौटा सकते क्योंकि ब्रिटेन का म्यूजियम एक्ट इसकी इजाजत नहीं देता, या फिर इन कलाकृतियों का ब्रिटेन में बने रहना विश्व के हित में है। यह सोच आज भी एक सामंती और साम्राज्यवादी सोच बनी हुई है जो कि दूसरे देशों का भला अपने अधिकारों में अलग देख रही है। ऐसे चोर देशों के भीतर वहां के सांसदों को भी संसद में आवाज उठानी चाहिए कि क्या अपने को लोकतंत्र की जननी कहने वाले देश को ऐसी गुंडागर्दी का हक़ है?
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ईसाई धर्म से जुड़ी हुई संस्कृति में क्रिसमस के मौके पर एक काल्पनिक सांता क्लॉज रात में आकर बच्चों के लिए तोहफे छोड़ जाता है। शायद यह रिवाज इसलिए शुरू किया गया है कि ऐसे तोहफे अच्छे बच्चों को ही मिलने की बात उनके ध्यान में डाली जाती है और ऐसा बताया जाता है कि खराब काम करने वाले बच्चों को सांता क्लॉज कोई तोहफे नहीं देता। धर्म से जुड़ी हुई बहुत सी बातें इस किस्म की होती हैं जो लोगों को सपनों में जीने का मौका देती हैं। कहीं पर पूर्वजन्म के किए का फल इस जन्म में, और इस जन्म में किए का फल अगले जन्म में पाने की बात सिखाई जाती है तो कहीं यह सिखाया जाता है कि जिनको कम मिल रहा है, वह उनके कर्मों का फल है। सांता क्लॉज की धारणा तो कम नुकसानदेह है क्योंकि यह ईसाई संस्कृति में या पश्चिमी जीवन-शैली में समारोह को मनाने के एक तरीके के रूप में इस्तेमाल की जाती है और छोटे बच्चों को तोहफे देने का यह एक रास्ता होता है। लेकिन धर्म जब बहुत सी दूसरी बातों को कर्म से अलग करके स्थापित करने की कोशिश करता है तो वह कार्ल मार्क्स के शब्दों में अफीम की तरह लोगों को सुस्त और मंद करके सोचने और संघर्ष करने से दूर कर देता है।
हम किसी एक धर्म के त्यौहार के मौके पर इस चर्चा को नहीं छेड़ रहे हैं क्योंकि बहुत से धर्मों में, या शायद सभी धर्मों में, धर्म लोगों को कर्म से दूर रखने का एक जरिया रहता है, और इस कर्म में सामाजिक जागरूकता और अपने हक़ ले लिए संघर्ष भी शामिल रहते हैं। यह सिलसिला भारत सहित बहुत से देशों में बहुत खतरनाक हद तक लोगों को ऐसा भाग्यवादी और ऐसा निराश बना देता है कि लोग अपने साथ हो रहे किसी भी किस्म के अन्याय को अपनी किस्मत मान बैठते हैं और उसके लिए जो अच्छा-बुरा कहना रहता है वह ईश्वर को कहकर, उसके लिए असल जिम्मेदार इंसानों को बख्श देते हैं, जिससे कि समाज के भीतर अन्याय के खिलाफ संघर्ष की संभावना खत्म हो जाती है। धर्म को बनाया इसी हिसाब से गया है कि वह ताकतवर शोषक को कमजोर बहुसंख्यक तबके का निशाना कभी न बनने दे। इसलिए हम भारत में लगातार देखते हैं कि जनता को, देश को और धरती को लूटने वाले सबसे बड़े लोगों से किसी धर्मगुरु को कोई परहेज नहीं होता और उनके प्रवचनों में, धार्मिक अनुष्ठानों में हर किस्म के अपराधी ताकतवर लोग सबसे ऊपर, सबसे सामने जगह पाते हैं और एक किस्म से प्रवचन करने वाले गुरु ऐसे लोगों का सम्मान करते भी दिखते हैं, इन्हीं के डेरों में महीनों गुजारते हैं। यह पूरा सिलसिला माक्र्स की जुबान की अफीम की तरह लोगों को सामाजिक और आर्थिक शोषण और अन्याय को समझने से भी दूर रखता है और इस तरह धर्म, और उसकी एक दूसरी शक्ल आध्यात्म, में पूंजी निवेश करके ताकतवर, अत्याचारी और शोषक तबके उसी तरह एक बीमा पॉलिसी और चौकीदार खरीद लेते हैं जिस तरह वे अपने कारखानों और दुकानों के लिए खरीदते हैं।
ईश्वर को न मानने वाले हमारे किस्म के नास्तिक इतने कम हैं, और उनकी प्रचार की ताकत इतनी कम है कि वे ईश्वर की धारणा का भांडाफोड़ नहीं कर पाते। दूसरी बात यह कि ईश्वर की धारणा, धर्म की बातें दिमाग पर जोर नहीं डालतीं, वे चूंकि तर्कों से परे की होती हैं इसलिए वे लोगों को कीर्तन में सिर हिलाने की तरह का आसान काम लगती हंै। धर्म पर सवाल खड़े करना, उसकी वैज्ञानिकता और उसकी सामाजिक उपयोगिता के बारे में बात करना बहुत तकलीफ का काम होता है। और किसी भी जगह किसी भी आबादी या भीड़ में यह न तो लोकप्रिय काम होता और न ही लुभावना काम। लेकिन हम ऐसा काम करने से परहेज नहीं करते और लोगों को धर्म के बजाय कर्म की तरफ देखने को सलाह देते रहते हैं। धर्म का राज जब तक समाज के लोगों के दिल-दिमाग पर चलता रहेगा तब तक समाज के सबसे ताकतवर लोग सबसे कमजोर तबकों पर राज करते रहेंगे, उनके हक लूटते रहेंगे। कबीलों के जमाने से लेकर आज की 21वीं सदी तक धर्म ने कमजोर लोगों को लूटने का, लुटवाने का काम ही किया है, और जब हिटलर ने लाखों को मारा, तब भी पोप चुप ही रहा। कहने को यह बात कही जा सकती है कि ईश्वर, धर्म और धर्मगुरुओं में फर्क है। किसी तर्क से बचने के लिए, किसी बहस से बचने के लिए धर्म के झंडाबरदार अक्सर यह तर्क उठा लेते हैं कि धर्म का यह बिगड़ा हुआ चेहरा ईश्वर नहीं है। लेकिन समाज पर राज तो धर्म का बिगड़ा हुआ चेहरा ही करता है। यह चर्चा हमने छेड़ी तो आज है लेकिन इसका किसी एक धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और हर धर्म के लोग अपने-अपने भीतर यह झांक सकते हैं कि वहां पर किस-किस किस्म का शोषण उनके ईश्वर और धर्म के बैनर तले चल रहा है, चलता रहेगा।
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दिल्ली में अभी एक दलित बच्ची से गैंग रेप के बाद उसका कत्ल कर दिया गया। 9 साल की बच्ची से बलात्कार के बाद हत्या में पुजारी सहित चार गिरफ्तार किये गए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल फांसी की मांग की है। लेकिन बलात्कारी हत्यारा एक पुजारी दिख रहा है, और मरने वाली बच्ची एक दलित, तो उससे एक बड़े तबके की जुबान बंद हो गयी है। जो लोग इसी दिल्ली में निर्भया के बलात्कार के बाद कह रहे थे कि वोट डालते हुए निर्भया को यद् रखना, वे अभी चुप हैं। देश भर में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब ऐसे दस-बीस मामले अस्पताल और पुलिस तक न पहुंचते हों। दिल्ली चूंकि कैमरों के घेरे में रहती है इसलिए वहां की छोटी-छोटी बात भी खबर बन जाती है। फिर दूसरी बात यह कि जब परिवार के लोग यह तय करते हैं कि ऐसे बलात्कार या देहशोषण के मामले पुलिस तक ले जाए जाएं, तभी वे मीडिया की नजर में भी आते हैं। लेकिन इससे कई गुना अधिक मामले सामाजिक शर्मिंदगी या पारिवारिक असुविधा की बात सोचकर घर में ही दबा दिए जाते हैं।
यह भी याद रखने की जरूरत है कि किस तरह कुछ बरस पहले जब जम्मू में एक खानाबदोश बच्ची से गैंगरेप में एक पुजारी सहित आधा दर्जन लोग गिरफ्तार हुए थे, तो किस तबके ने वहां पर देश का झंडा लेकर बलात्कारियों को बचाने के लिए जुलूस निकाला था और उस मुस्लिम खानाबदोश बच्ची की वकील के ऊपर अंधाधुंध दबाव डाला गया था कि वह मुजरिमों को सजा दिलाने की कोशिश ना करें। इसलिए जब इस देश में बलात्कारियों को धर्म और जाति के आधार पर बचाने की कोशिश होगी तो लोगों को यह याद रखना चाहिए कि ऐसी बचाने वाली जाति और ऐसे धर्म के लोगों के बच्चे भी खतरे में आएंगे, और उनको बचाते हुए ये जाति और धर्म किसी काम के नहीं रहेंगे।
अब बच्चों से बलात्का की ऐसी तरह-तरह की नौबत को देखते हुए पूरे देश में जिन बातों की जरूरत है, उनमें पहली तो यह है कि छोटे बच्चों को बिना हिफाजत न छोड़ा जाए। बेंगलुरू जैसे एक बड़े शहर में स्कूली बच्चियों से स्कूलोंं में ही लगातार बलात्कार के मामले सामने आते रहते हैं, और सबसे पढ़े-लिखे शहर का यह हाल है। गांवों में नौबत और खराब होगी, यह तय है। इसलिए पूरे देश में बच्चों की हिफाजत को लेकर न सिर्फ सरकार को बल्कि समाज और परिवार को भी एक नई जागरूकता के साथ और एक नई सावधानी के साथ सोचने की जरूरत है। दूसरी बात यह कि समाज को यह भी समझना पड़ेगा कि बच्चों का देहशोषण करने वाले लोग उसके अपने बीच के होते हैं, और बहुत से मामलों में उनकी परिवार तक, स्कूल तक पहुंच होती है। इसलिए अपने पारिवारिक परिचितों के बारे में ऐसा अंधविश्वास ठीक नहीं है कि वे भला ऐसा कैसे कर सकते हैं।
तीसरी बात यह कि बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो शायद किशोरावस्था से भी पहले, आठ-दस बरस की उम्र से उन्हें उनके बदन के बारे में, और सावधानी बरतने के बारे में सिखाना बहुत जरूरी है। भारत में दरअसल जब कभी बच्चों को सिखाने के मामले में सेक्स शब्द का इस्तेमाल भी होता है, तो संस्कृति के ठेकेदारों का एक ऐसा तबका उठकर खड़ा हो जाता है जो सोचता है कि यह बच्चों को सेक्स करना सिखाने की योजना है। बच्चों को उनके बदन की जानकारी देना, और सेक्स के प्रति सावधान करना भी एक जरूरी शिक्षा है, और देश का कट्टरपंथी माहौल इसकी इजाजत ही नहीं देता है। नतीजा यह होता है कि बच्चे किशोरावस्था से पार होने लगते हैं, और अपने बदन से लेकर देहसंबंधों तक की उनकी जानकारी पोर्नोग्राफी या अश्लील फिल्मों से मिली रहती है, उन्हें किसी तरह की वैज्ञानिक या मानसिक सीख नहीं मिल पाती।
देश भर में सेक्स-अपराध बहुत बढ़ रहे हैं, और बच्चों की जिंदगी में सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। स्कूलें दूर-दूर हैं, वहां आना-जाना पड़ता है, खेलकूद में बच्चों को दूर तक जाना पड़ता है, और जब मां-बाप दोनों कामकाजी रहते हैं तो भी बच्चों को घंटों तक अकेले रहना पड़ता है। ऐसे में कम उम्र से भी उनको एक सावधानी सिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि बच्चे परिवार से जुड़े किसी के बारे में मां-बाप को शिकायत करते हैं, तो मां-बाप उनको ही झिडक़कर चुप करा देते हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए, क्योंकि सेक्स-अपराधी चारों तरफ फैले हुए हैं, और मौकों की तलाश में रहते हैं। पश्चिमी देशों में साइबर-पुलिस लगातार ऐसे मुजरिमों को इंटरनेट पर तलाशती रहती है, और पकडक़र सजा भी दिलवाती रहती है। लेकिन भारत अभी तक बच्चों के यौन शोषण के खतरों की तरफ से आंखें बंद किए बैठा है कि मानो यह कोई पश्चिमी समस्या है।
एक खबर के मुताबिक़ - ‘‘बिहार के मुंगेर में कल ही दूसरी कक्षा में पढने वाली 8 साल की बच्ची की रेप के बाद निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। मछली मारने वाले की बेटी का क्षत विक्षत शव बरामद हुआ। मृत बच्ची की बलात्कार के बाद साक्ष्य छिपाने को लेकर हत्या निर्मम तरीके से की गई थी। रेप के बाद हत्या की गई और फिर आंख निकाल ली।’’ जिस बात को आज अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए वह यह है कि हिंदुस्तान में सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समझी जाने वाली जातियों और वैसे धर्मों के बच्चों और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं ज्यादा होती हैं। भारत की जाति व्यवस्था को लेकर भी एक बार यह सोचने की जरूरत है कि बलात्कारियों में ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग अधिक क्यों हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं में नीची कहीं जाने वाली जातियों की लड़कियां और महिलाएं अधिक क्यों है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रदेशों में राज्य सरकारों के फैसले से स्कूलें खुलना शुरू हो गया है। हर राज्य ने अपने-अपने हिसाब से तय किया है कि किसी एक दिन कितने फीसदी बच्चों को क्लास में बिठाया जाए, या कौन-कौन सी क्लास से शुरू की जाए, या क्लास रूम के बाहर खुले में बैठाया जाए। यह स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से प्रदेश की सरकार और शायद कहीं-कहीं पर जिले के अफसरों को भी आजादी से ऐसा तय करने का अधिकार दिया गया है। कुछ राज्यों ने यह भी तय किया है कि जिन जिलों में नए कोरोना केस एक फीसदी से भी कम सामने आ रहे हैं वहीं पर स्कूलें शुरू की जाएं। बच्चों के मां-बाप दहशत में हैं, और बच्चों के लगातार घर रहने से होने वाली तमाम किस्म की दिक्कतों के बावजूद उनको ठीक से भरोसा नहीं है कि छोटे-छोटे बच्चे शारीरिक दूरी रख पाएंगे, साफ-सफाई रख पाएंगे, और कोरोना से बच पाएंगे। इसीलिए सरकारों ने यह छूट भी दी है कि स्कूलों में कहीं भी हाजिरी जरूरी लागू नहीं की जाएगी, मतलब यह कि जो लोग अपने बच्चों को भेजना ना चाहें, वे ना भेजें, और कई राज्यों ने इसीलिए ऑनलाइन कक्षाएं जारी रखना भी तय किया है।
दूसरी तरफ निजी स्कूल चलाने वाले लोगों के सामने दिक्कत यह है कि उनके ढांचे का खर्च तो तकरीबन पूरा का पूरा हो ही रहा है। इमारत अगर बैंक कर्ज से बनी है तो उस पर किस्तें आ रही हैं, बसें अगर बैंक कर्ज से खरीदी हैं, तो उस पर किस्तें देना ही पड़ रहा है, और शिक्षक-शिक्षिकाओं और कर्मचारियों को कितना भी कम किया जाए, तनख्वाह का काफी बड़ा हिस्सा तो जा ही रहा है। फिर ऑनलाइन पढ़ाई के चलने से फीस भी पता नहीं पूरी मिल रही है या नहीं, लेकिन निजी स्कूलों को कई दूसरे तरह की कमाई भी होती है कहीं यूनिफार्म की अनिवार्यता से कमीशन मिलता है, तो कहीं निजी प्रकाशकों की किताबें अनिवार्य करके उससे कमीशन मिलता है, वह सब बंद सा हो गया है। इसलिए निजी स्कूलों को स्कूल शुरू करने की हड़बड़ी अधिक थी, और सारे प्रदेशों में ऐसे स्कूल संचालकों ने स्कूलें शुरू होने से राहत की सांस ली है। अब सवाल यह है कि क्या बच्चों को सावधानी के साथ बिठाया और लाया ले जाया जा सकेगा?
जहां कहीं भी स्कूलें शुरू हुई हैं या हो रही हैं, यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इस फैसले के साथ ही स्कूल के किसी भी किस्म के कर्मचारी एक किस्म से फ्रंटलाइन वर्कर्स हो गए हैं, जो कि अभी तक अस्पताल या स्वास्थ्य कर्मचारी ही थे, और सफाई कर्मचारी ही थे। इनके बाद पुलिस और सरकार के सीधे मैदानी ड्यूटी करने वाले नुमाइंदे इस तबके में आते थे। अब जब रोजाना सैकड़ों बच्चों से सीधा वास्ता पड़ेगा तो स्कूल के हर दर्जे के कर्मचारी भी उसी तरह खतरे में आएंगे और उनके खतरे में आने से एकमुश्त सैकड़ों बच्चे भी खतरे में आ सकते हैं। इसलिए स्कूलों को खुद ही या वहां की सरकारों को, या स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को, स्कूलों में हर किसी कर्मचारी के लिए कोरोना टीकाकरण का इंतजाम करना चाहिए और उसके बाद ही उनका बच्चों से संपर्क होने देना चाहिए। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई काफी नहीं थी जो उन्हें इस तरह अब बसों में और क्लास रूम में भीड़ के बीच धक्का-मुक्की में लाया ले जाया जाएगा?
इस बारे में कुछ एक मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से, परामर्शदाताओं से बात करने पर यह समझ में आता है कि पिछले डेढ़ बरस से अधिक वक्त से बच्चे घर बैठे हुए थे या आस-पड़ोस में भी बड़े सीमित संपर्क में आ जा रहे थे। एक सामाजिक व्यवस्था के तहत स्कूलों में अपने हमउम्र बच्चों के साथ जिस तरह का सामाजिक संपर्क उनका होता था, जो कि उनकी विकास प्रक्रिया में अहमियत रखता था, वह तकरीबन खत्म सा हो गया था। ऐसे में इन बच्चों को घर में रहते हुए क्या कोई बड़ा मानसिक नुकसान हो रहा था? इस बारे में जानकार लोगों का कहना है कि छोटे बच्चों के तो दिमाग इस तरह से तैयार रहते हैं, इतने लचीले रहते हैं, कि वह एक-दो बरस की ऐसी दिक्कतों से तेजी से उबर जाएंगे, लेकिन जो बच्चे किशोरावस्था में पहुंच रहे हैं, या अभी पहुंचे ही हैं, उनके लिए यह डेढ़ साल बड़ा भारी रहा है। इस दौरान वे शारीरिक और मानसिक फेरबदल के ऐसे दौर से गुजरते रहते हैं कि उन्हें अपने हमउम्र बच्चों के साथ मिलने-जुलने, उनके साथ बात करने, और उनसे कई मुद्दों को समझने का मौका मिलता है, जो कि घर रहते मुमकिन नहीं है। किशोरावस्था के बच्चे मां-बाप के काबू से बाहर भी निकलने के दौर में रहते हैं, लेकिन कोरोना वायरस के खतरे ने, और लॉकडाउन ने उन्हें घर में रख दिया, जो कि उनका अधिक बड़ा नुकसान हुआ, छोटे बच्चों के मुकाबले। इसलिए कुछ मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता यह मानते हैं कि किशोरावस्था के बच्चों के लिए स्कूलें शुरू होना अधिक जरूरी था और पढ़ाई के मुकाबले भी उनके व्यक्तित्व विकास के लिए उनकी उम्र की जरूरत के लिए यह अधिक जरूरी था।
जो भी हो, ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके बारे में जानकार लोगों के और भी विश्लेषण सामने आएंगे लेकिन फिलहाल स्कूलें शुरू होने के इस मौके पर हम इतना ही कहना चाहते हैं कि जरा सी लापरवाही भी स्कूलों को कोरोना के फैलने का एक बहुत बड़ा अड्डा बना सकती हैं, और बच्चों के मार्फत एक स्कूल भी एक दिन में सैकड़ों परिवारों तक कोरोना का खतरा पहुंचा सकती हैं। ऐसा खतरा पता लगने में कई हफ्ते लग सकते हैं और किसी शहर के आंकड़े कई हफ्ते बाद यह बतलाएंगे कि उस शहर में पॉजिटिविटी रेट बढ़ गया है, लेकिन तब तक मामला हाथ से निकल चुका रहेगा क्योंकि तब तक बच्चे आपस में एक दूसरे को कोरोना वायरस दे चुके रहेंगे, और उनके भीतर लक्षण भी आसानी से सामने नहीं आएंगे। इसलिए स्कूलों को सिर्फ पढ़ाई के लिए या बच्चों के मिलने-जुलने के लिए खोल देना काफी नहीं है, इन तमाम बच्चों के बीच कड़ी निगरानी रखना भी जरूरी है क्योंकि यह बच्चे खुद लक्षणमुक्त रहते हुए भी कोरोना को अपने परिवारों तक पहुंचा सकते हैं। अभी कोरोना की तीसरी लहर आना बाकी ही बताया जा रहा है, इसलिए भी स्कूलें बहुत खतरनाक साबित हो सकती हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
मध्य प्रदेश के छतरपुर में अभी 2 दिन पहले 13 बरस के एक लडक़े ने खुदकुशी कर ली। उसने एक ऑनलाइन गेम खेलते हुए अपनी मां के खाते से 40 हजार रुपये गंवा दिए थे और जब मां को अपने फोन पर अकाउंट से पैसे कटने की खबर मिली तो उन्होंने बेटे को फोन पर डांटा, और खुदकुशी की एक चिट्ठी छोडक़र लडक़े ने आत्महत्या कर ली कि उसने इस खेल के चक्कर में 40 हजार रुपये बर्बाद कर दिए और उसी डिप्रेशन में वह आत्महत्या कर रहा है। इसके अलावा देश में कुछ और जगहों पर ऑनलाइन गेम में लंबी हार के बाद अलग-अलग बच्चों ने आत्महत्या की है, और दिल्ली के एक सामाजिक संगठन ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी लगाई है जिसमें ऐसे ऑनलाइन गेमों पर प्रतिबंध की मांग की गई है। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को बच्चों को ऑनलाइन गेम की लत से बचाने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने का नोटिस भी जारी किया है। उल्लेखनीय है कि अभी चार दिन पहले ही देश के दर्जनों प्रमुख अखबारों में पहले पूरे पन्ने का इश्तिहार ऐसे ही ऑनलाइन गेम का छपा था, जिसे लेकर सोशल मीडिया में लोगों ने फिक्र जाहिर की थी, और मध्यप्रदेश की यह आत्महत्या उसके बाद सामने आई है।
हिंदुस्तान में पिछले वर्षों में अर्थव्यवस्था, उदारवादी से अति उदारवादी की तरफ बढ़ चली है, और विदेशी पूंजी निवेश को तकरीबन हर दायरे में अंधाधुंध बढ़ाने की छूट दी गई है. नतीजा यह निकला है कि ऐसा पूंजी निवेश विदेश की कारोबारी-संस्कृति के साथ आ रहा है. ऑनलाइन खेल के नाम पर ऑनलाइन जुआ चल रहा है जिसमें किसी मौत तो खबरों में आ रही है, लेकिन लोगों के रात-दिन लुटने की कोई खबर खबरों में नहीं आ रही, क्योंकि इनमें हारे हुए लोग अपनी हार को अधिक उजागर भी नहीं करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि एक वक्त हिंदुस्तान का एक बड़ा हिस्सा जिस तरह रोजाना खुलने वाली लॉटरी में सट्टे का एक विकल्प ढूंढ चुका था, क्या अब घर बैठे मोबाइल फोन पर या कंप्यूटर पर अपने मां-बाप के खातों से या अपने खुद के बैंक का अकाउंट से भुगतान करके इस तरह के ऑनलाइन गेम में बच्चे-बड़े सभी लोग पैसा लगाते चलेंगे, जिसके साथ उनके सपने तो जुड़े रहेंगे, उनकी हसरतें भी जुड़ी रहेंगी, लेकिन उनकी हार इसमें तय रहेगी। पूरी दुनिया का जुए का इतिहास है कि जुआ खिलाने वाले कैसीनो या जिन देशों में ऑनलाइन सट्टेबाजी कानूनी है, वहां पर सट्टेबाजों के अलावा और कोई नहीं कमाते, अधिकतर लोग वहां से रकम गंवाकर निकलते हैं, और इसकी लत बढ़ते चलती है।
इस बारे में एक समाचार के मुताबिक दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका में कहा गया था कि इस एनजीओ को माता-पिता से कई शिकायतें मिल रही हैं, जो बच्चों के ऑनलाइन गेम खेलने की आदत से चिंतित हैं। इन गेम्स के ज़रिए बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्याएँ पैदा हो रही है। याचिका में यह भी कहा गया था कि बच्चों के आत्महत्या करने या अवसाद में जाने और ऑनलाइन गेम की लत के कारण चोरी जैसे अपराध करने की कुछ हालिया ख़बरों ने एनजीओ को याचिका दायर करने के लिए मजबूर किया। कोरोना महामारी के दौरान बच्चे पढ़ाई के लिए मोबाइल का बहुत इस्तेमाल कर रहे हैं और इसी कारण से गेम्स खेलने की आदत लग रही है। उनके मुताबिक़ समस्या उन बच्चों में ज़्यादा देखी जा रही है, जिनके माँ-बाप दोनों काम पर जाते हैं। 10 साल से 18 साल के बच्चे इसमें अधिक फँसते है और पैसे ख़र्च करते है।
यह समझना मुश्किल है कि हिंदुस्तान में ऐसी चीजों की इजाजत देने की क्या मजबूरी है एक तरफ तो यह सरकार अपने-आपको भारतीय संस्कृति की पहरेदार भी बताती है और लोगों के बीच अच्छे चाल-चलन को बढ़ावा देने का दावा भी करती है, दूसरी तरफ इस तरह की ऑनलाइन सट्टेबाजी या जुएबाजी में लोगों को डुबाने का इंतजाम करना, उसका खुला इश्तहार करना, उसे हर मोबाइल फोन और कंप्यूटर से खेलना मुमकिन बना देना, यह कहां की समझदारी है? खुदकुशी तो कम होंगी लेकिन अधिक लोग डिप्रेशन में रहेंगे, परिवारों के भीतर लोगों के संबंध खराब होंगे, और लोग अपनी जमा-पूंजी ऐसे ऑनलाइन जुए में खेल के नाम पर लुटा चुके रहेंगे। बिना देर किए हुए केंद्र सरकार को ऐसे तमाम ऑनलाइन खेल बंद करवाने चाहिए जिसकी जरूरत किसी को भी नहीं है। अगर ऐसे ऑनलाइन खेल की जरूरत लग रही है तो देशभर में जुए की फड़ में लोगों को क्यों गिरफ्तार करना हर की रफ़्तार भी काम रहती है? और सट्टे की पट्टी लिखने वाले लोगों को क्यों गिरफ्तार करना? देश में आज वैसे भी फटेहाली में लोगों का जिंदा रहना मुश्किल हो गया है लोग किसी तरह जी रहे हैं, ऐसे में अगर कोई परिवार किसी तरह बैंक में कुछ रकम बचाकर चल रहा है और घर का कोई भी एक व्यक्ति ऑनलाइन गेम के नाम पर युवाओं में उस रकम को लुटा देगा, तो हो सकता है पूरे परिवार के मरने की नौबत आ जाए, या पूरे परिवार के जिंदा रहने की, बेहतर जिंदगी पाने की संभावनाएं खत्म हो जाएं।
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केरल के एक ईसाई पादरी की जमानत अर्जी हाईकोर्ट से खारिज होते हुए सुप्रीम कोर्ट से भी खारिज हो गई है जिसमें उसकी अपील यह थी कि उसके बलात्कार की शिकार लडक़ी अब उससे शादी करना चाहती है, और इस शादी के लिए उसे कुछ वक्त के लिए जेल से रिहा किया जाए। अदालत से इस पादरी को 20 बरस की कैद सुनाई गई थी क्योंकि उसने एक नाबालिग लडक़ी से बलात्कार किया था, जिसमें वह लडक़ी गर्भवती भी हो गई थी। अब अदालत में इस पादरी और उस लडक़ी दोनों ने यह अर्जी लगाई है कि वे शादी करना चाहते हैं और इस औपचारिकता के लिए पादरी को कैद से कुछ दिनों के लिए मुक्त किया जाए। इन दोनों ने यह तर्क भी लिया है कि बलात्कार के बाद इस लडक़ी से जो संतान हुई है, उसके अब स्कूल जाने की उम्र हो गई है, और स्कूल में अगर पिता का नाम नहीं लिखाया जा सकेगा तो उससे सामाजिक अपमान होगा। पादरी के बलात्कार की शिकार नाबालिग लडक़ी अब बालिग हो चुकी है, और शादी की उम्र की हो गई है। बच्चे की उम्र भी अभी स्कूल जाने लायक हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने जब हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ इस अपील की सुनवाई की तो उसके पूछने पर पता लगा कि पादरी 45 बरस का है और यह लडक़ी अब 25 वर्ष की हो चुकी है। हाईकोर्ट ने जेल से छुट्टी कि यह अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी थी कि सुप्रीम कोर्ट का कई मामलों का यह रुख रहा है कि बलात्कार की शिकार लडक़ी के साथ शादी करके बलात्कारी किसी तरह की रियायत नहीं पा सकते। ऐसा पहले भी देश के कई मामलों में हुआ है जहां दोनों परिवारों की सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से या लडक़ी पर नाजायज दबाव बनाकर या बलात्कार की वजह से होने वाली किसी संतान का ख्याल करके, इस तरह के प्रस्ताव रखे गए थे और यह सोचा गया था कि शादी हो जाने के बाद अदालत से फैसले में कोई रियायत मिल जाएगी।
छत्तीसगढ़ की एक अदालत में तो कई बरस पहले एक ऐसा दिलचस्प मामला आया था जिसमें बलात्कार का एक मुकदमा चल रहा था। और जिस लडक़ी ने बलात्कार की शिकायत की थी उसकी शादी बलात्कारी के साथ हो हो चुकी थी, लेकिन उसने मामला वापस लेने से मना कर दिया था, और गांव से पति-पत्नी दोनों एक साइकिल पर जिला अदालत आते थे और सुनवाई में आमने-सामने खड़े रहते थे। फिर उस मामले का क्या हुआ वह तो ठीक से याद नहीं है लेकिन भारत में जगह-जगह समाज की पंचायत में बैठकर इस किस्म के कई फैसले करवाती हैं। आज भी देश के अधिकतर राज्यों में जाति पंचायतें या समाज की पंचायतें बैठती हैं, और जो हो गया, सो हो गया, यह मानकर बलात्कारी से लडक़ी या महिला को एक मुआवजा दिलवाने का फैसला सुनाती हैं, और सामाजिक दंड के रूप में समाज को खाना खिलाने जैसा कोई और जुर्माना भी लगा देती हैं ताकि सभी लोग मजा करें। ऐसी खाप या जाति पंचायतों में लड़कियों के अधिकार की तो कोई बात ही नहीं होती, लड़कियों के परिवार की इज्जत मामले मुकदमे से और अधिक हद तक लुट जाएगी, बस यही बात होती है। यह भी बात बिल्कुल नहीं होती कि बलात्कारी की भी इज्जत ऐसे मामलों में खराब होनी चाहिए, और उसके परिवार को भी शर्मिंदगी झेलनी चाहिए। हिंदुस्तानी समाज ऐसा अजीब है कि दहेज प्रताडऩा करने वाला परिवार, दहेज हत्या करने वाला परिवार, और बलात्कार करने वाले का परिवार इन सबमें भी लोगों को रिश्ता करने में कोई परहेज नहीं दिखता है।
लेकिन केरल की इस बात पर लौटें, तो यह सोचने की जरूरत है कि एक पादरी ने एक नाबालिग बच्ची से बलात्कार करके उसे गर्भवती कर दिया, इसे लेकर चर्च के पूरे संगठन को जितनी शर्मिंदगी होनी चाहिए थी, वैसी तो कुछ भी कहीं सुनाई नहीं पड़ी। चर्च को तो अपना रुख इस मामले में भी साफ करना चाहिए कि क्या वह बलात्कार की शिकार लडक़ी से बलात्कारी की ऐसी शादी का हिमायती है? चर्च को बहुत सी बातें साफ करना चाहिए। लेकिन हम पहले कई बार लिखी गई एक बात को फिर दोहराते हैं कि धर्म को बलात्कार से कोई परहेज नहीं रहता। एक नाबालिग छात्रा से बलात्कार का आरोपी बूढ़ा आसाराम जेल में बंद है, सुप्रीम कोर्ट तक से उसे जमानत हासिल नहीं हो पाई है, अदालत से कैद पाकर वह सजा काट रहा है, लेकिन उसके भक्तजन देश भर के शहरों में उसकी तस्वीरें लगाकर झांकी निकालते हैं, उसके प्रवचन के पर्चे बांटते हैं, और अपने पूरे परिवार के बच्चों सहित ऐसी शोभायात्रा में शामिल होते हैं। धर्म के नाम पर अंधविश्वास का यह सिलसिला इतना खतरनाक है कि यह धर्म के सिम्हासनों पर बैठे हुए लोगों को भी बर्बाद कर देता है। अगर (बाबा) राम-रहीम के भक्त न होते, तो क्या किसी की मजाल थी कि राम रहीम इस तरह से बलात्कार कर पाता? अगर केरल के इस चर्च में आस्था नाम के अंधविश्वास के शिकार लोग न होते तो इस पादरी को एक नाबालिग लडक़ी के साथ इस तरह बलात्कार करने मिलता?
धर्म और अध्यात्म से जुड़े हुए लोगों को ऐसे बलात्कार का मौका इसीलिए मिलता है कि उन्हें मानने वाले लोग अंधविश्वास से भरे रहते हैं और उनकी कोई भी बात उन्हें गलत या खराब नहीं लगती है। लेकिन जिस तरह सरकारी और निजी सभी किस्म के दफ्तरों में और कामकाज की जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए कमेटियां बनाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू किया जाता है, उसी तरह का फैसला धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों में लागू किया जाना चाहिए क्योंकि किसी भी धर्म के संस्थान सेक्स शोषण जैसे आरोपों से परे रहते हों इसकी मिसालें बहुत ही कम हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला इस एक मामले में चाहे जैसा फैसला पाए, लेकिन इस मामले की चर्चा की वजह से लोगों में एक जागरूकता आएगी और धर्म स्थानों में धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों में धड़ल्ले से चलने वाले सेक्स शोषण के बारे में हो सकता है कि भक्तों और अनुयायियों में थोड़ी सी जागरूकता भी आ सके, और उनके बच्चे बर्बाद होने से बच सकें।
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सोशल मीडिया पर वैसे तो बहुत किस्म की बहसें दिलचस्प रहती हैं, लेकिन एक बहस उनमें बड़ी खास रहती है जो कि आस्थावान, धर्मालु लोगों, और नास्तिक लोगों के बीच चलती है। ये धर्मालु लोग उन लोगों से अलग हैं जिन्हें हिंदुस्तान में हाल के वर्षों में भक्त कहा जाने लगा है। एक वक्त हिंदुस्तान में भक्त या भगत का बहुत अलग मतलब होता था। भक्त सूरदास कहा जाता था, या भगत नाम से भी कई संतों को पहचाना जाता था। इन दिनों जो भक्त दर्जे के लोग हैं, आज की यह बात उनके बारे में बिल्कुल भी नहीं है। आज की बात आस्थावान, धर्मालु और धार्मिक लोगों के बारे में है, जिन्हें किसी एक समय भक्त कहा जाता था, अब भक्त नाम का विशेषण उनसे छीन लिया गया है। लेकिन नास्तिक तो कल भी नास्तिक थे, आज भी नास्तिक हैं, और आने वाले कल भी शायद उनका यही नाम जारी रहेगा क्योंकि इसे छीनने वाले कोई नहीं रहेंगे। अभी ट्विटर पर एक महिला ने ईश्वर के बारे में लिखा कि मैं उसकी आराधना करती हूं, और वह मेरा मार्गदर्शन करता है। कई बार वह मेरी कई प्रार्थना पर तुरंत ही जवाब देता है, जैसे कि मुझे एक बारीक धार वाले एक औजार की जरूरत थी, और मैंने उससे प्रार्थना की, और मैं एक विदेश में एक पहाड़ी और निर्जन इलाके में थी, लेकिन फिर भी 30 मिनट में मुझे वह औजार वहां मिल गया। इसके जवाब में एक जाहिर तौर पर नास्तिक दिखने वाले व्यक्ति ने लिखा कि यह ईश्वर बड़े-बड़े जनसंहार अनदेखा करता है और तुम्हें एक औजार पहुंचाता है!
आस्थावान लोगों की दुनिया ही कुछ अलग होती है। मोटे तौर पर आस्थावान और धर्मालु लोग किसी न किसी धर्म को मानने वाले ऐसे लोग रहते हैं जो धार्मिक रीति-रिवाज का भी पालन करते हैं, धर्मस्थलों पर आते-जाते हैं, धार्मिक त्यौहार मानते हैं, और ईश्वर की उपासना करते हैं। इनके बीच आपस में तौर-तरीकों को लेकर कुछ फर्क हो सकता है लेकिन इनके बीच मोटे तौर पर एक बात एक सी ही रहती है कि इन्हें कानून या विज्ञान, इन सबसे अधिक भरोसा ईश्वर पर रहता है। हिंदुस्तान में भी हम देख चुके हैं कि किस तरह बाबरी मस्जिद को गिराने के वक्त लगातार यह नारा हवा में कुछ बरस गूंजते रहा कि आस्था पर कानून का कोई बस नहीं चल सकता, आस्था कानून से ऊपर होती है, वैसी ही दिमागी हालत में लोगों को लाकर बाबरी मस्जिद को गिराया गया था। लेकिन ऐसा सिर्फ हिंदू धर्म और हिंदुस्तान में होता हो ऐसा भी नहीं है। सिखों के सबसे पवित्र कहे जाने वाले स्वर्ण मंदिर में संत कहे जाने वाला भिंडरावाले जिस तरह हथियारबंद आतंकी गिरोह चला रहा था और जिस तरह वे स्वर्ण मंदिर से बाहर जाकर थोक में हत्याएं करके वापस आकर वहीं रहते थे, उस पूरे खूनी सिलसिले पर धर्म का कोई बस नहीं चला था, और उस दौर में सिख धर्म को देश के कानून से ऊपर मान लिया गया था।
आज भी अफगानिस्तान में तालिबान यही काम कर रहे हैं वह शरीयत का नाम लेकर अपनी मर्जी के इस्लामी कानून लोगों पर लाद रहे हैं, और लोगों को थोक में मार रहे हैं। हिंदुस्तान के ठीक बगल के म्यांमार में बौद्ध धर्म के लोग सत्ता और ताकत में हैं, पिछले कुछ वर्षों से वहां से लगातार जिस तरह मुस्लिम रोहिंग्या लोगों को भगाया गया और जिस तरह उन्हें दुनिया के कई देशों में जाकर शरण लेनी पड़ी, वह एक मिसाल है कि बौद्ध धर्म के भगवाधारी लोगों के बीच भी हिंसा की कोई कमी नहीं है। इटली की माफिया फिल्म देखें या माफिया का इतिहास पढ़ें तो उनमें से कोई भी नास्तिक नहीं थे। वह बात-बात में सीने पर क्रॉस बनाने लगते थे, इतवार को चर्च जाते थे, और पूरी तरह धर्मालु लोग थे और पूरी तरह हिंसक भी थे। जिस अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा नागासाकी पर बम गिराकर लाखों लोगों को मार डाला था, उस अमेरिका के तमाम राष्ट्रपति बाईबिल पर हाथ रख कर ही शपथ लेते हैं, और जाहिर है कि उनमें से हर कोई धर्मालु ईसाई रहे हैं, लेकिन वैसे ही धर्मालु ने जापान पर बम गिराने का, वियतनाम में फौजियों को भेजने का, 20 बरस से अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजियों को बनाए रखने का, इराक पर हमला करने का, सीरिया पर हमला करने का फैसला लिया। इसलिए कोई धर्म किसी को कोई गलत काम करने से कभी नहीं रोक पाया है।
दूसरी तरफ यह ईश्वर को धर्मालु लोग छोटी-छोटी बातों के लिए तमाम श्रेय देते हैं। उस ईश्वर को भी न तो कभी बलात्कार से बच्चियों को बचाना सूझता, न किसी फौजी तानाशाह के हाथों से लोगों को बचाना सूझता। यह तो आस्थावान लोग हैं जो कि हर बात को ईश्वर की मर्जी ठहरा देते हैं, लोगों का जब कुछ बुरा होता है तो उन्हें पिछले जन्म के पाप का फल भुगतना बतला देते हैं, लेकिन वह ईश्वर को न तो किसी अनदेखी का गुनहगार ठहराते, और न ही ईश्वर से सवाल करते कि जब दुनिया में इतने बड़े-बड़े जुर्म हो रहे थे तो वह क्या कर रहा था? जब जर्मनी में हिटलर 10 लाख से अधिक लोगों को मार रहा था तो ईश्वर क्या कर रहा था? और हिटलर के हाथों मारे जाने वाले यहूदियों के देश इजराइल का आज जब बेकसूर फिलिस्तीन पर रात-दिन हमला होता है तो वह ईश्वर क्या करता है ? ईश्वर का यह सिलसिला लाजवाब है, बेजवाब है, किसी को कोई जवाब इसलिए नहीं मिल सकता कि ईश्वर जिंदा तो है नहीं, और जो लोग उसके प्रतिनिधि बनकर लोगों और ईश्वर के बीच एक कड़ी बने रहते हैं, वे ईश्वर से किसी भी सवाल करने का हौसला पस्त ही करते रहते हैं। ईश्वर के लिए प्रतिनिधि ऐसे हैं कि इनके चर्च में बच्चों से पादरी सेक्स करते रहते हैं, और चर्च का ढांचा उसे बचाता रहता है। और क्योंकि ईश्वर के बारे में यह कहा जाता है कि वह सर्वत्र है, सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है, इसलिए हम यह मानते हैं कि बच्चों से बलात्कार करते हुए पादरियों को रोकने के लिए वह ईश्वर भी कुछ नहीं करता। वह महज दीवार पर टंगे रहता है। यह ईश्वर और जगह पर भी कुछ नहीं करता। हिंदुस्तान के हिंदू मंदिरों में जब देवदासी प्रथा चलाकर महिलाओं को सेक्स के लिए इस्तेमाल किया जाता था, तब भी ईश्वर ने कोई दखल नहीं दी। जब दक्षिण भारत में अभी एक सदी पहले तक महिलाओं को अपनी छाती ढंकने के लिए टैक्स देना पड़ता था, तब भी ऐसा टैक्स वसूलने वालों से ईश्वर ने कभी कोई सवाल नहीं किया था। लोगों को अपने आसपास की दुनिया देखनी चाहिए कि उनके पास उनके आसपास कैसे-कैसे जुर्म हो रहे हैं, कैसी कैसी ज्यादती हो रही है, और क्या उनके इलाके में हर 100-200 मीटर पर मौजूद मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च में बैठे ईश्वर क्या किसी बुरे काम को रोक रहे हैं? आस्थावान लोगों को खासकर अपने ईश्वर से ऐसे सवाल करने चाहिए।
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हिंदुस्तान के उत्तर पूर्व के 2 राज्यों असम और मिजोरम के बीच जैसा हिंसक संघर्ष शुरू हुआ है, वह भारत और चीन के बीच पिछले एक-डेढ़ बरस में कई बार हुई हिंसक मुठभेड़ के टक्कर का है। भारत और चीन के सीमा संघर्ष में कुछ दर्जन हिंदुस्तानी फौजियों के मारे जाने की बात भारत सरकार ने मंजूर की है, और हो सकता है कि चीन में भी कई सैनिक मारे गए हों, लेकिन हिंदुस्तान के भीतर के अगल-बगल के ये दो राज्य, असम और मिजोरम, दोनों भाजपा की, या गैरकांग्रेस सरकार के रहते हुए जिस तरह से हिंसक संघर्ष में असम पुलिस के 6 लोग मारे गए हैं और असम ने मिजोरम के कई सरकारी लोगों के खिलाफ जुर्म कायम किया है। यह पूरा सिलसिला भारत के 2 राज्यों के बीच है पिछले बहुत समय में तो कभी सुनाई नहीं पड़ा था। असम और मिजोरम का इतिहास बताता है कि अंग्रेजों के वक्त 1873 में जो सीमा तय की गई थी, मिजोरम उस सीमा को लागू करवाना चाहता है, और अंग्रेजों के ही वक्त 1933 में एक दूसरी सीमा तय हुई थी, जिसे कि असम मानता है। इन दोनों राज्यों के बीच झगड़े की एक दूसरी वजह यह भी है कि 1972 के पहले तक मिजोरम असम का हिस्सा था, उसके बाद मिजोरम को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था, और 1987 में वहां लंबे समय से चली आ रही उग्रवादी हिंसा को खत्म करने के लिए मिजोरम समझौते के बाद उसे राज्य का दर्जा दिया गया, और 20 साल से चले आ रहा विद्रोह खत्म हो गया।
असम और मिजोरम के बीच कई किस्म के नक्शे और कई किस्म की सरहदों के चलते हुए दोनों राज्य एक-दूसरे पर अपनी जमीनों पर अवैध कब्जे की शिकायतें लंबे समय से करते आ रहे हैं लेकिन लोगों को यह उम्मीद थी कि पिछले 6 बरस से जिस तरह केंद्र में बहुत ही मजबूत माने जाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अभी के गृह मंत्री अमित शाह देश पर अपनी मजबूत पकड़ रखते हैं और उन्हीं की पार्टी की राज्य सरकार असम में है, और मिजोरम में उनके समर्थन से है, तो ऐसे में इस तरह की कोई नौबत किसी के लिए भी अकल्पनीय है। इन प्रदेशों में गैरकांग्रेस मुख्यमंत्रियों के रहते हुए और दिल्ली की लगातार निगरानी के बीच ऐसी हिंसा जिसमें एक राज्य के पुलिस के लोग मारे जाएं इसकी देश में दूसरी कोई मिसाल याद नहीं पड़ती है।
अभी 24 जुलाई को ही उत्तर पूर्व के दौरे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहुंचे थे और उन्होंने कहा था कि नरेंद्र मोदी की सरकार इस इलाके के सीमा संबंधी सभी मामलों को सुलझाना चाहती है और इसके 2 दिन के भीतर ही इन दो राज्यों के बीच बीच इतना बुरा हिंसक संघर्ष छिड़ गया। अमित शाह ने एक किस्म से असम के बीजेपी मुख्यमंत्री को सारे उत्तर-पूर्वी राज्यों का मुखिया बनाकर रखा है। फिर भी आज हालत यह है कि असम सरकार ने मिजोरम आने-जाने वाले अपने लोगों और मिजोरम में गए हुए या रहने वाले अपने लोगों के लिए चेतावनी जारी की है कि वे बहुत ही सावधानी बरतें। जानकारों का मानना है कि देश में इसके पहले कभी किसी राज्य ने पडोसी के लिए ऐसी चेतावनी जारी नहीं की थी। दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच जुबानी जंग छिड़ी हुई है, दोनों सुप्रीम कोर्ट तक जमीनों पर अपने दावे लेकर कानूनी लड़ाई लडऩे के लिए तैयार हैं, और सरहद पर तो धमाकों के साथ ऑटोमैटिक हथियारों के साथ संघर्ष चल ही रहा है।
कांग्रेस ने ऐसी नौबत के लिए गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा की इन दोनों राज्य सरकारों पर तोहमत लगाई है। लेकिन भाजपा का यह कहना है कि यह सीमा विवाद नया नहीं है और लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार के रहते हुए कांग्रेस ने इन विवादों को निपटाया नहीं, नतीजा यह निकला कि वे आज भडक़ रहे हैं। अभी हम ऐसे किसी इतिहास की तरफ जाना नहीं चाहते क्योंकि इतिहास में जितना पीछे जाएंगे, उतना तो सरहदी विवाद बढ़ा हुआ दिखेगा, लेकिन यह बात तो है की इन दो राज्यों के बीच हाल के वर्षों में ऐसा खूनी संघर्ष कभी हुआ नहीं था। और किसी एक पार्टी की सरकार देश पर भी हो और इन दोनों प्रदेशों में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष उसी की सरकार हो और उसके बाद ऐसी नौबत आए तो वह अधिक फिक्र की बात है। अदालत से लेकर सरहद तक यह तनाव बना हुआ है और केंद्र सरकार को कुछ हजार हथियारबंद सिपाही केंद्रीय बलों से इस सरहद के लिए भेजने पड़े हैं। केंद्र सरकार अपने असर का इस्तेमाल करे, और भाजपा अपने असर का इस्तेमाल करे, और देश की आज की नौबत बताती है कि इन दोनों की सारी ताकतें कुल मिलाकर दो ही हाथों में केंद्रित है। इसलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह को इन दोनों प्रदेशों के भले के लिए, देश के भले के लिए, और अपनी पार्टी की सरकारों के भले के लिए इस टकराव पर तुरंत काबू पाना चाहिए। यह काम वह कैसे करेंगे यह बताना मछली के बच्चे को तैरना सिखाने जैसा होगा क्योंकि मोदी और शाह ऐसी नौबतों से जूझने की समझ रखते हैं, और ताकत भी रखते हैं। हैरानी तो इस बात की है इन दोनों के रहते हुए असम और मिजोरम के बीच इतना खून बह रहा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हिंदुस्तान में पैगासस नाम के जासूसी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की खबरों पर देश के दो प्रमुख पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई थी, जिसे अगले हफ्ते सुनने के लिए मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने मंजूर किया है। कांग्रेस पार्टी से जुड़े और सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के सामने उठाया था और उन्होंने इस याचिका का जिक्र किया था जो कि हिंदू नाम के अखबार के पूर्व मुख्य संपादक एन राम और एशियानेट नामक मीडिया समूह के संस्थापक शशि कुमार की ओर से लगाई गई है। इस याचिका में अपील की गई है कि पैगासस को लेकर जितने तरह के तथ्य दुनिया के मीडिया में सामने आ रहे हैं, उनमें हिंदुस्तान के भी करीब डेढ़ सौ लोगों के फोन नंबर संभावित निशाने के रूप में पहचाने गए हैं, इसलिए देश में इसकी जांच सर्वोच्च स्तर पर होनी चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा या रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में इस मामले की जांच की जाए, और सरकार से यह भी पूछा जाए कि क्या उसने इस जासूसी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का लाइसेंस लिया है, या इसका इस्तेमाल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी तरह की निगरानी के लिए किया है?
यह मुद्दा पिछले एक पखवाड़े से लगातार खबरों में बना हुआ है और संसद में भी विपक्ष ने इसे जोर-शोर से उठाया है. विपक्ष के एक सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का नाम भी ऐसे संभावित निशाने के रूप में खबरों में आया है कि उनका और उनके सहयोगियों का फोन पेगासस नाम के जासूसी सॉफ्टवेयर से घुसपैठ करने की लिस्ट में मिला है। अब तक सरकार की तरफ से साफ-साफ कुछ नहीं कहा गया है, और संसद के बाहर, संसद के भीतर, कहीं पर भी सरकार ने न तो यह बात मानी है कि उसने इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है और ना ही उसने यह ही कहा है कि उसने यह सॉफ्टवेयर नहीं लिया है, और उसने ऐसी जासूसी नहीं करवाई है. इसी सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पेगासस जासूसी की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग की घोषणा की है जिसमें दो रिटायर्ड जजों को मनोनीत किया गया है. इसके साथ ही यह एक दिलचस्प बहस भी शुरू हो गई है कि केंद्र सरकार पर इस जासूसी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की तोहमत लग रही है तो उसकी जांच देश का कोई एक राज्य कैसे करवा सकता है? लेकिन अगर बंगाल के लोगों के नंबर ऐसे जासूसी कांड में सामने आ रहे हैं जिनमें ममता बनर्जी के रणनीति के सलाहकार रहे प्रशांत किशोर का नाम भी आया है, और ममता बनर्जी के साथ राजनीति में काम करने वाले उनके भतीजे का नाम भी आया है, तो हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की किसी बहस में पश्चिम बंगाल सरकार का यह अधिकार साबित हो कि वह इस मामले की जांच करवा सकती है, और भारत सरकार से भी जवाब मांग सकती है। ऐसे ही जटिल मामलों पर जब अदालतों में बहस होती है, तब यह बात भी तय होती है कि केंद्र और राज्य के संबंधों में किसके क्या अधिकार रहते हैं, और दोनों एक दूसरे के प्रति किस हद तक जवाबदेह रहते हैं। ममता की शुरू करवाई जांच से यह सवाल भी उठता है कि अगर भारत सरकार से परे किसी और ने हिन्दुस्तानियों की ऐसी साईबर सेंधमारी की है, जासूसी की है, तो उसकी जांच करवाने की जिम्मेदारी तो भारत सरकार की ही होनी चाहिए! केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ऐसी जांच क्यों नहीं करवा रही है?
पेगासस के मार्फत जासूसी को लेकर यह सॉफ्टवेयर को बनाने वाली कंपनी चाहे कितने ही दावे कर ले कि वह इजराइल की डिफेंस मिनिस्ट्री की इजाजत के बाद ही किसी देश की सरकार को यह सॉफ्टवेयर बेचती है, दुनिया का तजुर्बा यह है कि कारोबारियों का बहुत से मामलों में कोई ईमान नहीं होता है और कारोबार किसी नैतिकता की बंदिशों से बंधे भी नहीं रहता। इसलिए इस इजराइली कंपनी के इस दावे पर भी हमको अधिक भरोसा नहीं है कि वह सिर्फ सरकारों को यह सॉफ्टवेयर बेचती है। लेकिन दूसरी तरफ यह कहते हुए हम भारत सरकार को साफ-साफ जवाब देने की जिम्मेदारी से बरी भी नहीं करते कि उसे खुलकर यह बताना चाहिए कि उसने यह जासूसी सॉफ्टवेयर खरीदा था या नहीं और इसका इस्तेमाल किया था या नहीं। यहां पर इस बात की चर्चा भी प्रासंगिक होगी कि देश में आईटी मंत्रालय की सलाहकार समिति के मुखिया शशि थरूर ने पिछले दिनों यह कहा था कि भारत का कानून हैकिंग की इजाजत नहीं देता है, और इस कानून के तहत हैकिंग करने वालों को कई बरस की कैद देने का प्रावधान है। दूसरी तरफ देश के लोगों के डेटा सुरक्षा के लिए एक कानून की तैयारी चल रही है, लेकिन जब तक वह बनता नहीं है और लागू नहीं होता है तब तक भी देश के लोगों का मौलिक अधिकार तो अपनी जगह है ही जिसमें उन्हें उनको अपनी जिंदगी की निजता का अधिकार भी हासिल है। इसलिए केंद्र सरकार पर यह जिम्मेदारी बनती है कि जब दुनिया के बहुत से प्रतिष्ठित अखबार मिलकर कोई रिपोर्ट बना रहे हैं और सबूतों के आधार पर बना रहे हैं, फॉरेंसिक जांच के आधार पर बना रहे हैं, तो सरकार को भी उस पर अपना जवाब देना ही चाहिए।
आज हिंदुस्तान के जिस तरह के पत्रकारों और मानव अधिकार सामाजिक कार्यकर्ताओं, सुप्रीम कोर्ट के कम से कम एक भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश, और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ देश शोषण की शिकायत करने वाली महिला के पूरे परिवार, कुछ केंद्रीय मंत्री, कई विपक्षी नेताओं की जासूसी के जैसे आरोप हवा में तैर रहे हैं वैसे में सरकार की यह जवाबदेही बनती है कि उसे सामने आकर पाक-साफ होकर दिखाना चाहिए। सरकार की चुप्पी उसे ऐसी जासूसी का जिम्मेदार ही ठहराएगी। जनाधारणा लोकतंत्र में बड़ी चीज होती है और आज जनधारणा यह मांग करती है कि सरकार सार्वजनिक रूप से और अधिकृत रूप से इस बात को कहे कि उसने ऐसी जासूसी की है या नहीं की है। लोगों को ऐसे में याद पड़ रहा है कि किस तरह कर्नाटक में एक वक्त रामकृष्ण हेगड़े की एक सरकार जासूसी के एक मामले में गिरी थी। लोगों को यह भी याद पड़ रहा है कि केंद्र में चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी सरकार एक अलग किस्म की जासूसी के मामले में गिरी थी। हिंदुस्तान का कानून और यहां के राजनीतिक मूल्य इस तरह की जासूसी को बर्दाश्त नहीं करते हैं, और अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट इस जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इस मामले को पूरी गंभीरता से लेगा ऐसी हमें उम्मीद है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
अभी चार दिन पहले हिंदुस्तान में बड़ी अहमियत वाली एक बात हुई लेकिन उसे खबरों में ठीक से जगह भी नहीं मिल पाई क्योंकि वह सनसनीखेज नहीं थी, वह राजनीति या क्रिकेट नहीं थी, जुर्म नहीं थी, सेक्स नहीं थी, उससे अधिक जगह राज कुंद्रा की पॉर्नोग्राफी को मिलती रही, उससे अधिक जगह राजनीति के ओछे आरोपों को मिलती रही। लेकिन यह मुद्दा ऐसा है जिस पर लिखना सोचना और अमल करना जरूरी है। देश में जो एक पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता है, उस ओडिशा के पुरी को यह फख्र हासिल हुआ है कि वह हिंदुस्तान का ऐसा पहला शहर बना है जहां नल के पानी को पिया जा सकता है। भारत के शुद्ध और साफ पानी के जो पैमाने हैं, उन पर जगन्नाथपुरी शहर के नलों का पानी खरा उतरा है। और ऐसा भी नहीं कि नल से साफ पानी कुछ गिने-चुने घंटे आता है कि लोग उन्हें घरों में भर लें। चौबीसों घंटे पुरी के नलों से ऐसा साफ पानी आ रहा है कि जिसे पूरी तरह भरोसे के साथ पिया जा सकता है। वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पहल पर पूरे प्रदेश में इस सुजल योजना का विस्तार किया जा रहा है। और ओडिशा राज्य सरकार का यह कहना है कि पुरी की ढाई लाख आबादी और साल भर में वहां पहुंचने वाले दो करोड़ पर्यटकों को यह शुद्ध पानी पूरे वक्त हासिल रहेगा जिसे पूरे भरोसे के साथ पिया जा सकेगा। सरकार का यह अंदाज है कि इससे हर बरस करीब तीन करोड़ प्लास्टिक बोतलें बचेंगी जिनमें भरा हुआ पानी साल भर में यहां खर्च होता है। सरकार का यह भी अंदाज है कि इससे करीब 400 टन प्लास्टिक कचरा बचेगा।
आज हिंदुस्तान की किसी भी किस्म की सरकारी तस्वीरों को देखें, जिनमें कोई कार्यक्रम हो रहा हो या मंच पर कुछ चल रहा हो, या कोई सरकारी बैठक हो रही हो, तो उनमें से हर मेज पर प्लास्टिक की बोतल में पानी लोगों के सामने दिखता है। सरकारी दफ्तरों में बड़े अफसरों के लिए, या नेताओं के बंगलों में अधिकतर लोगों के लिए, ऐसी बोतलों के बक्से भरे रहते हैं। और लोग अब आदी हो गए हैं कि कौन खतरा उठाएं, उसके बजाय बाजार का बोतल बंद महंगा ब्रांड पानी खरीद कर अपनी हिफाजत का ख्याल रखा जाए। नतीजा यह हो रहा है कि प्लास्टिक की बोतलों का अंबार बढ़ते ही चल रहा है. प्लास्टिक प्रदूषण का एक तरफ पहाड़ बन रहा है और दूसरी तरफ समंदर के पानी में ऐसी खाली बोतलें पहुंचकर किनारों को इतना प्रदूषित कर रही है कि वहां जल जीवन खत्म होते जा रहा है क्योंकि इन बोतलों को पार करके सांस लेना पानी के जानवरों के लिए मुमकिन नहीं रह गया है। फिर जैसा कि प्लास्टिक का विज्ञान बतलाता है ये बोतलें धरती पर हजारों बरस तक खत्म नहीं होनी हैं। और आज प्लास्टिक के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बोतलबंद पानी हो गया है जो कि पूरी तरह से गैरजरूरी था। अगर स्थानीय सरकारें साफ पानी उपलब्ध करा सकतीं तो इन बोतलों की किसी को जरूरत ही नहीं पड़ती।
यूरोप के देशों में आमतौर पर यह दिखता है कि सार्वजनिक जगहों पर नल लगे हुए हैं जिनसे लोग पानी पीते ही रहते हैं और अपनी बोतलों में भरते रहते हैं। बहुत से विकसित देश ऐसे हैं जहां होटलों के बाथरूम में यह तख्ती लगी रहती है कि बाथरूम के नल से पीने के लिए पानी लिया जा सकता है, पानी एकदम साफ और सुरक्षित है। दूसरी तरफ आज हिंदुस्तान में अतिसंपन्न तबका ऐसा भी है जो अपने घर के भीतर फिल्टर का पानी भी नहीं पीता है, और घर के भीतर भी कारखाने की बोतलों का महंगा पानी पीता है। एक तरफ सचिन तेंदुलकर और हेमा मालिनी जैसे लोग संसद में एक-एक कुर्सी पर कब्जा करके बरसों तक बैठे रहते हैं, और पीने के पानी के ब्रांड का इश्तिहार करते हैं, वाटर फिल्टर का इश्तिहार करते हैं, दूसरी तरफ इन लोगों ने संसद के इतने बरसों में देश के गरीब लोगों को साफ पानी मिलने के हक के बारे में कभी एक शब्द नहीं कहा, ना संसद के भीतर कहा, ना संसद के बाहर का है। देश के लोगों को साफ़ पानी मिलने लगेगा तो इनके इश्तिहार ख़त्म न हो जायेंगे?
इस देश की तकलीफ यह है कि जिन लोगों के कंधों पर सरकारी योजनाएं बनाने और उन पर अमल करने का जिम्मा है, ऐसे नेता और अफसर अपने खुद के लिए जनता के पैसों पर महंगा पानी खरीद लेते हैं, और फिर जनता को गंदे पानी के हवाले कर देते हैं। अगर जनता के दबाव में ऐसा होने लगे कि सरकारी और राजनीतिक बैठकों में, और सार्वजनिक कार्यक्रमों में तमाम नेताओं और अफसरों को वहीं मौजूद नल का पानी ही परोसा जाएगा, तो हो सकता है कि बड़ी रफ्तार से नलों का पानी साफ होने लगे। यह कुछ उसी किस्म का है कि अगर सरकारी दफ्तरों में नेताओं और बड़े अफसरों को भी आम शौचालयों में जाना पड़े, आम पेशाबघरों में जाना पड़े, तो वे शौचालय और पेशाब घर साफ रहने लगेंगे। इसलिए देश की किसी हौसलामंद सरकार को सबसे पहले तो यह करना चाहिए कि वह एक तारीख की मुनादी कर दे किस तारीख के बाद किसी के लिए बोतलबंद पानी का इंतजाम नहीं किया जाएगा, और मंत्री, अफसर और दूसरे लोग सरकारी इमारतों में या सार्वजनिक कार्यक्रमों में आम नलों का ही पानी पिएंगे।
ओडिशा का जगन्नाथपुरी इस देश के ही एक पिछड़े राज्य का एक हिंदू तीर्थ स्थान है जहां कि अंधाधुंध पर्यटक भीड़ रहती है, और जहां बहुत साफ-सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में ओडिशा सरकार ने पूरे देश में एक पहल करके दिखाई है, और ओडिशा तो अपने बाकी शहरों के लिए इस इंतजाम को बढ़ा रहा है, लेकिन बाकी प्रदेशों को अपने बारे में सोचना चाहिए। हिंदुस्तान के उन बड़े शहरों को भी अपने बारे में सोचना चाहिए जो कि स्मार्ट सिटी नाम के केंद्र सरकार के पाखंड के तहत हजारों करोड़ों रुपए पा चुके हैं, और इनमें से अधिकांश हिस्सा मनमानी के दिखावे में बर्बाद भी कर चुके हैं। जबकि किसी भी स्मार्ट सिटी को सबसे पहले अपनी सिटी के ढांचे में आम जनता के लिए पीने का साफ पानी, सडक़ और नाली की सफाई, और रोशनी का इंतजाम, इन दो-तीन बुनियादी चीजों का इंतजाम सबसे पहले करना था। लेकिन जिन कामों में भ्रष्टाचार सबसे अधिक अनुपात में हो सकता है, स्मार्ट सिटी वैसे ही कामों में लग गईं और जनता का पैसा बर्बाद होते चले गया। जिन शहरों में लोग जागरूक हैं वहां लोगों को अपनी स्थानीय संस्था को पुरी की यह मिसाल देते हुए सार्वजनिक रूप से उन्हें चुनौती देनी चाहिए कि वे ओडिशा के इस शहर की कामयाबी का मुकाबला करके दिखाएं तब अपने आपको स्मार्ट कहें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
धर्म की विज्ञान से दुश्मनी कुछ अधिक ही गहरी दिखती है। कई धर्मों के सबसे लापरवाह फतवे देने वाले नेता अपने-अपने धर्म के लोगों से अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने के लिए बोलते हैं. यह एक अलग बात है कि ऐसे गैरगंभीर लोगों की बात को उनके समाज के लोग भी ठीक से नहीं सुनते, और इसीलिए हिंदुस्तान की आबादी आसमान तक पहुंचने के बजाय धरती पर ही सिमटती जा रही है। लेकिन एक खबर केरल से आई है जहां पर एक कैथोलिक चर्च ने अपने सदस्यों के लिए एक नई योजना की घोषणा की है जिसमें 5 से अधिक बच्चे वाले परिवारों को चर्च की तरफ से आर्थिक मदद दी जाएगी। यह भी कहा गया है कि जो महिला चौथे, या उसके बाद के बच्चे को जन्म देगी तो उसके लिए चर्च के अस्पताल में कोई फीस नहीं ली जाएगी। इसे लोग इस बात से जोडक़र देख रहे हैं कि केरल में ईसाइयों की आबादी का अनुपात गिर रहा है और आबादी में अपना अनुपात बनाए रखने के लिए भी शायद किसी चर्च ने ऐसी योजना बनाई हो. जो भी हो, कुल मिलाकर धर्म लोगों के पारिवारिक जीवन में इस तरह दखल दे रहा है कि वह आज लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए बढ़ावा दे रहा है। यह कोई बहुत नई बात भी नहीं है क्योंकि ईसाई चर्च हमेशा से गर्भपात का भी विरोधी रहा है, और गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल का भी विरोधी रहा है।
तकरीबन तमाम धर्म बच्चों के जन्म को ईश्वर की मर्जी से जोडक़र देखते हैं, और धर्म का नजरिया यह रहता है कि जो पेट देता है, मुंह देता है, वह हाथ भी देता है। इसलिए धर्म को यह लगता ही नहीं कि ईश्वर किसी को भूखे मरने देगा। यह अलग बात है कि ईश्वर के ऊपर ऐसा अंधविश्वास किसी काम का नहीं रहता, और लोग कुपोषण के शिकार होकर भूखे मरते ही हैं. ईश्वर किसी को बचाने नहीं आता, ईश्वर किसी का पेट नहीं भरता। और यह एक अलग बात है कि ईश्वर के नाम पर सभी धर्म स्थानों के पुजारी, पादरी, ग्रंथी, मुल्ला, सभी अपने-अपने पेट भर लेते हैं। अब केरल में एक चर्च की की हुई ऐसी घोषणा के बारे में उसका खुद का कहना है कि महामारी के वक्त जो आर्थिक मुसीबतें लोगों के ऊपर आई हैं उसमें राहत देने के लिए बड़े परिवारों को कुछ आर्थिक मदद की जा रही है जो कि बहुत बड़ी नहीं है, 5 से अधिक बच्चों के परिवारों को 15 सौ रुपए महीने की सहायता दी जाएगी। चर्च का कहना है कि यह बच्चे अधिक पैदा करने के लिए कोई बढ़ावा नहीं है, यह हो चुके बच्चों को पालने के लिए एक बहुत मामूली सी आर्थिक सहायता है।
अब यह जो भी हो, जिस वजह से भी यह आर्थिक सहायता दी जा रही हो, कुल मिलाकर बात यह है कि अधिक बच्चे पैदा करने को चर्च के बढ़ावे के रूप में ही इसे देखा जाएगा और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच में इसकी प्रतिक्रिया होगी। लोग मानकर चलेंगे कि यह आबादी बढ़ाने की वेटिकन की साजिश है, ठीक उसी तरह जिस तरह मुस्लिमों का विरोधी एक तबका यह मानकर चलता है कि हर मुस्लिम चार शादी करते हैं और 16 बच्चे पैदा करते हैं। यह एक अलग बात है कि मुस्लिमों की आबादी के भीतर शायद 1 फीसदी भी ऐसे लोग नहीं होंगे जिन्होंने चार शादियां की होंगी, और शायद ही कोई मुस्लिम हिंदुस्तान में ऐसा होगा जिसने 16 बच्चे पैदा किए होंगे, लेकिन एक नारे के रूप में लोगों के बीच में नफरत और हिकारत पैदा करने के लिए यह मुद्दा उछाला जाता रहा है।
अब अगर यह बात चर्च की तरफ से नहीं आई होती और किसी जनकल्याणकारी सरकार की तरफ से आई होती तो भी उसके पीछे एक तर्क हो सकता था। रूस की तरह के ऐसे कई देश हैं जहां पर अधिक बच्चों पर अधिक सुविधा देने की सरकारी नीति ही है। लेकिन हिंदुस्तान में सरकार की आर्थिक मदद कम मौजूद है, और उसे पाने की कोशिश करने वाली आबादी बहुत बड़ी है, इसलिए यह बात समझने की जरूरत है कि सरकार की या समाज की कोई भी योजना ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष असर आबादी को बढ़ाने वाला हो। हम जबरदस्ती किसी आबादी को काबू करने के हिमायती नहीं हैं, लेकिन पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ऐसी जनसंख्या नीति की घोषणा की जिसमें दो से अधिक बच्चे होने पर लोग स्थानीय संस्थाओं के कोई चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, सरकारी नौकरी के लिए अर्जी नहीं दे सकेंगे, और उन्हें 2 बच्चों से अधिक पर किसी तरह की सरकारी रियायती योजनाओं का फायदा नहीं मिलेगा, तो हमने कुछ शर्तों के साथ उस नीति का समर्थन किया था। हमारा यह मानना है कि जो लोग ऐसी योजना को मुस्लिम समाज पर हमला मान रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि अधिकतर मुस्लिम परिवार अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर क्या बना पा रहे हैं? क्या वे उन्हें मजदूर, ड्राइवर, और मामूली कारीगर से ऊपर कुछ बना पा रहे हैं? तो फिर उस समाज में अधिक बच्चों को बढ़ावा देने की क्या जरूरत है? और बात सिर्फ मुस्लिमों की नहीं है उन तमाम जातियों और धर्मों की है जिनके लोगों पर यह जनसंख्या नीति बराबरी से लागू होगी। वहां भी दो बच्चों से अधिक जिन्हें पैदा करना हो उन्हें सरकार कोई भी रियायती योजना का फायदा क्यों दे? और आबादी को घटाने के लिए सभी धर्मों पर अगर एक साथ, एक जैसी नीति लागू की जा रही है, तो इसे सिर्फ स्थानीय संस्था के चुनाव के बजाय विधानसभा और संसद के लिए भी लागू करना चाहिए कि 2 से अधिक बच्चे होने पर कोई सांसद या विधायक भी ना बन सके।
वैसे तो चर्च हो या मंदिर, मस्जिद, यह सब अपने हिसाब से अपने लोगों को बढ़ावा देने के लिए आजाद हैं, और लोगों को याद होगा कि देश में सबसे ज्यादा रफ्तार से गिरने वाली पारसी आबादी से फिक्रमंद पारसी समाज ने यह योजना घोषित की थी कि जो पारसी जोड़ा दो या अधिक बच्चे पैदा करेगा उसे समाज की तरफ से एक फ्लैट दिया जाएगा। लेकिन यह बात भी समझने की जरूरत है कि पारसी समाज इतना संपन्न है कि उसमें बेरोजगारी सुनाई नहीं पड़ती है, और लोग बड़े-बड़े कारोबार चलाते हैं, इसलिए वहां तो अगर लोगों के बच्चे कुछ अधिक हैं तो भी वे उन बच्चों का खर्च उठा सकते है लेकिन जिन समाजों में लोग गरीब अधिक हैं वहां पर इस समझदारी को दिखाने की जरूरत है कि वह कम बच्चे पैदा करें उन्हें अधिक पढ़ा-लिखाकर बेहतर रोजगार में लगाएं, और उनकी जिंदगी बेहतर बनाएं।
यूपी में जिन लोगों को मुस्लिम समाज पर आबादी की रोक का हमला दिख रहा है, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या हर समाज के बच्चे सीमित होने पर सबसे अधिक फायदा उस समाज का नहीं होगा जिस समाज में आर्थिक स्थिति आज सबसे आगे सबसे अधिक खराब है? अभी केरल की सरकार और दूसरे धर्म के लोगों की प्रतिक्रिया, वहां के चर्च के ऐसे फैसले पर आनी बाकी है, और यह भी हो सकता है कि 15 सौ रुपए महीने की रकम आबादी बढ़ाने के काम ना आए, केवल मदद के लिए काम आए, क्योंकि पढ़ाई-लिखाई वाले केरल में 15 सौ रुपए महीने में भला कितने बच्चों को पाला जा सकता है? खैर उत्तर प्रदेश हो या असम की जनसंख्या नीति हो, या केरल के चर्च की यह घोषणा हो, हमारा मानना है कि जनसंख्या पर सभी लोगों को खुलकर बात करनी चाहिए और बहस बहुत हड़बड़ी में खत्म नहीं करनी चाहिए। जो समाज जितना जिम्मेदार होगा अपने सदस्यों का जितना भला चाहेगा वह जनसंख्या पर एक सीमा का हिमायती भी होगा। जनसंख्या की सीमा किसी पर जबरदस्ती नहीं लादी जा रही है और अगर आज के बाद बनने वाले जनप्रतिनिधियों पर ऐसी कोई सीमा लागू होती है, तो वह हमारे हिसाब से ठीक ही रहेगी क्योंकि वह इस कानून के लागू होने के बाद पैदा होने वाले बच्चों पर लागू होगी, न कि आज के बच्चों पर। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
सुप्रीम कोर्ट में अभी एक याचिका लगाई गई है जिसमें कहा गया है कि कोरोना के खतरे को देखते हुए सडक़ों पर से भिखारियों को हटाया जाए, उनका टीकाकरण किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को मानने से साफ-साफ इनकार कर दिया और कहां कि अदालत कोई आभिजात्य दृष्टिकोण नहीं लेगी, और अदालत ने यह भी कहा कि कोई भी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते, लोग शिक्षा और रोजगार के अभाव में मजबूरी में भीख मांगते हैं क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं रहता। अदालत ने साफ-साफ यह कहा कि वे लोगों को सडक़ों से हटाने के लिए बिल्कुल नहीं कहेंगे, भिखारियों को सार्वजनिक जगहों से हटाने के लिए बिल्कुल नहीं कहेंगे, लेकिन वे सरकार से यह जरूर पूछेंगे कि इन लोगों को टीके कैसे लगाए जा सकते हैं, और कैसे इन्हें बुनियादी सुविधाएं दी जा सकती हैं। अदालत ने साफ-साफ कहा यह एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है और भिखारियों को सार्वजनिक जगहों से हटाकर इसका समाधान नहीं किया जा सकता।
इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों का नजरिया सच में ही इंसानियत से भरा हुआ दिख रहा है। यह मामला जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एम आर शाह की अदालत का है, जहां पर दिल्ली के एक व्यक्ति ने एक जनहित याचिका लगाई है जिसमें देशभर से भिखारियों, आवारा, या बेघर लोगों को चौराहों से, बाजारों और सार्वजनिक जगहों से भीख मांगने से हटाकर उनके पुनर्वास की मांग की गई है।
भिखारियों का पुनर्वास दुनिया के किसी भी विकसित या विकासशील देश में एक बड़ा जनकल्याणकारी कार्य माना जा सकता है। लेकिन हिंदुस्तान में हमने देखा है कि सरकारी निराश्रित गृह में भिखारियों को ले जाकर छोड़ दिया जाता है, जहां उन्हें दो वक्त का खाना तो मिलता है, सोने की जगह मिल जाती है लेकिन उनकी जिंदगी वहीं खत्म हो जाती है। मानो सरकार ने यह मान लिया हो कि उन्हें अब मरने तक इसी तरह जीना है। और चूँकि वे इंसान हैं, इसलिए मुर्गीखाने की मुर्गियों की तरह उनसे अंडे की उम्मीद भी नहीं की जाती, और बस उन्हें दाना दिया जाता है ताकि वे जिंदा रह जाएं। जो लोग इस किस्म के पुनर्वास को भिखारियों के लिए पुनर्वास मानते हैं, उनकी इंसानियत की समझ बड़ी सीमित है। उन्हें लगता है कि सडक़ों पर भीख मांगने वाले लोगों को वहां से हटाकर किसी एक निराश्रित गृह में रख दिया जाए तो उनका बड़ा भला हो जाएगा। हकीकत तो यह है की भिखारी चौराहे या बाजार, या मोहल्ले की गलियों में अपनी मर्जी से घूमते हैं, अलग-अलग किस्म का खाना पाते हैं, कुछ नगदी भी पाते हैं, कुछ अपने पर खर्च करते हैं, और कुछ बचाते हैं।
बहुत से भिखारी ऐसे भी रहते हैं जो अपने परिवार के किसी तरह के संपर्क में रहते हैं और किसी मौके पर अपने परिवार के लोगों की मदद करने के लिए भी अपनी कमाई और बचत में से कुछ पैसे देते हैं। भीख मांगने का यह पूरा सिलसिला चाहे कितना ही अमानवीय लगे, लेकिन यह इस मायने में मानवीय रहता है कि इसमें भिखारी अपनी मर्जी के मालिक रहते हैं, इन्हें जब मंदिर के सामने बैठना रहता है तो वह गुरुवार को साईं बाबा का मंदिर देख लेते हैं, सावन सोमवार को शंकर का मंदिर, शुक्रवार को किसी मस्जिद के सामने, और इतवार को चर्च के सामने। उन्हें पता रहता है कि किस गुरुद्वारे के लंगर से उन्हें कुछ मिल सकता है, या सडक़ किनारे जब शामियाना लगते दिखता है तो भी उन्हें पता रहता है कि कहां भंडारा लगने वाला है। उन्हें यह भी मालूम रहता है कि उनके शहर में किन जगहों पर रोज गरीबों या भिखारियों को खाना बांटा जाता है। वे अपनी आजादी से रोजगार की अपनी जगह तय करते हैं, तरह-तरह की चीजें खाते हैं, और किसी को बददुआ देना, किसी को दुआ देना भी उनके हाथ में रहता है। वे सडक़ों पर आवाजाही देखते हैं, लोगों को हंसते-खेलते देखते हैं, लोगों के मनोविज्ञान का अध्ययन करते हैं, और अपने तजुर्बे का यह इस्तेमाल करते हैं कि कौन लोग उन्हें भीख दे सकते हैं, और कौन नहीं दे सकते हैं। ऐसे में अगर किसी सरकारी निराश्रित गृह में उन्हें किसी जानवर की तरह बांध दिया जाए और कहा जाए कि यही उन्हें दो वक्त का खाना मिलेगा और यही सोने की, सिर छुपाने की जगह मिलेगी, तो उसका मतलब यह है कि एक इंसान के रूप में विविधता के साथ जीने की उनकी सारी संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। इन विविधताओं के बारे में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाने वाले संपन्न तबके के लोग जो कि जाहिर तौर पर भिखारियों की फिक्र कर रहे हैं, लेकिन शायद जिनका मकसद सडक़ों पर से गंदे और बीमार दिखने वाले, फटे कपड़ों में ऐसे बूढ़े और विकलांग लोगों को हटाना है, तो ऐसे लोगों की जनहित याचिका के पीछे की जो सोच है, उसे सुप्रीम कोर्ट के कम से कम इन दो जजों ने बिल्कुल सही संदर्भ में समझा है, और सार्वजनिक जगहों से भिखारियों को हटाने से बिल्कुल मना कर दिया है, और यह कहा है कि अगर वे कोई नोटिस जारी करेंगे तो उससे ऐसा लगेगा कि वे लोगों को हटाने के हिमायती हैं, जो कि वे नहीं हैं।
दरअसल संपन्न समाज बहुत सी चीजों को अपनी नजरों के सामने से हटाना चाहता है। इसमें गरीब, बीमार, विकलांग, बेघर लोग भी हैं क्योंकि उन पर नजर पडऩे के बाद संपन्न समाज अपनी संपन्नता का बिना अपराध बोध के उस हद तक मजा नहीं ले पाता, जितना मजा लेना वह चाहता है। चौराहों पर एसी कारों के भीतर कुछ खाते-पीते लोगों को शीशा खटखटाते भिखारी खटकते हैं। इसलिए मंदिरों और धर्म स्थलों के वैराग्य से परे जिंदगी की सुख की जगहों पर ऐसे दुखी लोगों को देखना कोई नहीं चाहते। और तो और हमें पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार याद है जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जॉन मेजर कोलकाता आए थे। कोलकाता शहर के फुटपाथ और सडक़ों से सारे के सारे भिखारियों और बेघर लोगों को शहर के बाहर ले जाया गया था। यह पूरी तरह से वामपंथी सोच के खिलाफ और गोरे शासकों के प्रति गुलामी वाली एक सोच थी कि ऐसे मेहमान के आने पर हमें अपनी जिंदगी की हकीकत भी छुपा लेना है। यह वामपंथी सरकार का एक पाखंड था कि एक अंग्रेज प्रधानमंत्री को यह दिखाए कि उसके शहर में गोरी आंखों को तकलीफ देने वाले कोई भी फटेहाल बेघर लोग नहीं है। लोगों को याद होगा कि इसी सोच के चलते हुए अभी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के ठीक पहले जब डॉनल्ड ट्रंप अहमदाबाद आए थे तो सडक़ों के किनारे की झोपड़पट्टियों को छुपाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपनी ही पार्टी की गुजरात सरकार ने उन बस्तियों के सामने पूरी दीवार खड़ी कर दी थी ताकि वहां से तेज रफ्तार बुलेटप्रूफ गाड़ी में गुजरते हुए भी ट्रंप को कोई झोपड़पट्टी न दिखे।
यह सोच नई नहीं है लेकिन यह किसी विकसित और सभ्य लोकतंत्र की सोच भी नहीं है। दुनिया में अमेरिका जैसे लोकतंत्र हैं जहां बहुत से प्रदेशों में, बहुत से शहरों में, सार्वजनिक बाग-बगीचों में बेघर लोगों ने कब्जा कर लिया है, और उनमें रहते हैं। वहां पर भी इतनी बड़ी संख्या में रहते हैं कि वहां और लोगों का घूमने जाना नामुमकिन सरीखा रहता है। लेकिन फिर भी वहां जागरूक नागरिकों का एक तबका ऐसा है जो यह मानता है कि किसी भी सार्वजनिक जगह पर पहला हक बेघर लोगों का है, उसके बाद ही कोई हक वहां घरबार वाले लोगों का हो सकता है। क्या आज हिंदुस्तान में शहरी संपन्न लोगों के बीच कोई इस सोच से बात भी कर सकते हैं कि सार्वजनिक जगहों पर पहला हक बेघर गरीब और भिखारियों का है? संपन्न तबका ऐसा तर्क देने वालों को नोंच खाएगा। लेकिन हमें बहुत खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट के इन दो जजों ने एक ऐसी राय सामने रखी है जो कि आदेश की शक्ल में सामने आने के बाद देश के दर्जनों हाईकोर्ट के सैकड़ों जजों के लिए भी एक मार्गदर्शक की तरह रहेगी कि भिखारियों को नजरों से हटा देना कोई आर्थिक सामाजिक समाधान नहीं है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
राजस्थान के भीलवाड़ा की एक खबर है कि वहां दहेज प्रताडऩा के बाद एक बहू ने आत्महत्या कर ली, और इसके पहले उसने एक वीडियो बनाकर यह बयान सबके सामने रखा कि उसके पति सहित ससुराल के लोगों ने उसके साथ कई बार मारपीट की, एक बार उसे बहुत बुरी तरह पीटते हुए उसके ससुर के सामने ही सारे कपड़े फाडक़र उसे नंगा कर दिया। इस मानसिक प्रताडऩा से विचलित होकर उसने इस बारे में बयान वीडियो रिकॉर्ड किया और फिर जहर खा लिया। इस अकेली घटना पर लिखना आज शायद जरूरी नहीं लगता लेकिन एक दूसरी घटना और हुई है। वह घटना अलग किस्म की है, और एक अलग इलाके की भी है। लेकिन जिस तरह की सामाजिक प्रताडऩा का शिकार राजस्थान रहता है, उसी तरह की सामाजिक प्रताडऩा का शिकार रहने वाले एक और प्रदेश हरियाणा के हिसार में एक महिला ने पुलिस में ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट लिखाई है और उसने अपने बेटे पर ही ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया है। महिला ने कहा कि उसका पति बीमार रहता है, घर की आर्थिक हालत खराब है, और बेटा शराबी है। ऐसे में वह घर चलाने के लिए खुद पड़ोसी के खेत में मजदूरी करती है। वहां एक दिन उसके बेटे ने खेत मालिक के साथ उसका आपत्तिजनक हालत में मोबाइल पर वीडियो रिकॉर्ड कर लिया और फिर वीडियो वायरल करने की धमकी देकर नशे के लिए पैसे ऐंठने लगा। पिछले कुछ महीनों में दो लाख रुपये बेटा वसूल चुका है, और जब उसने और पैसे देने से मना कर दिया तो बेटे ने यह अश्लील वीडियो व्हाट्सएप के कई ग्रुप में भेज दिया।
अब इन दो घटनाओं को देखें तो लगता है कि और क्या सुनना और देखना बचा है? ससुर और बहू के बीच में जिस तरह के वर्जित संबंध रहते हैं, उसका ख्याल रखते हुए पुराने वक्त में जब ससुर घर के भीतर आते थे तो कोई भी दोहा-चौपाई या राम का नाम बोलते हुए भीतर घुसते थे, ताकि बहू पर्दा कर ले। ऐसा माना जाता था कि बहू और ससुर-जेठ के बीच रिश्तों का एक फासला रहना चाहिए, और सामाजिक प्रतिबंध इसे कड़ाई से लागू भी करते थे। अब अगर दहेज के लिए एक पूरा परिवार बहू को इस हद तक प्रताडि़त करे कि वह खुदकुशी कर ले, तो ऐसी खुदकुशी के पहले की उसकी बातों को सच के अलावा और क्या माना जा सकता है? इसलिए अगर पूरा परिवार बहू को पीट-पीटकर उसे सबके सामने नंगा कर दे, तो ऐसे परिवार का अदालत में नंगा होना जरूरी भी है। दूसरी तरफ एक महिला जो कि बीमार पति और शराबी बेटे को पालने के लिए मजबूरी और मजदूरी कर रही है, उसके ही किसी संबंध को लेकर बेटा उसे ब्लैकमेल करने के लिए वीडियो बना रहा है, तो फिर अब इससे घटिया और हरकत बची क्या है?अभी-अभी छत्तीसगढ़ में एक गिरफ्तारी हुई है जिसमें एक शराबी बाप ने अपनी ही बेटी से बलात्कार किया था। लेकिन वह तो फिर भी नशे में था, हरियाणा का यह बेटा तो सोच-समझकर वीडियो बनाकर अपनी मां को ब्लैकमेल कर रहा था और आखिर में वसूली बंद हो जाने पर उसने वह वीडियो जगह-जगह पोस्ट कर दिया।
इंसानी रिश्तों का यह सिलसिला हैरान करता है और सदमा भी देता है। लोग बात-बात पर इंसान की घटिया हरकतों के लिए जानवरों की मिसालें देने लगते हैं। और हम भी इंसानों की इस बेइंसाफी के बारे में कई बार लिखते रहते हैं। लेकिन इंसान हैं कि वे सदमा देना बंद ही नहीं करते। कई बार तो यह भी लगता है कि इस तरह की भयानक खबरों को छापने से क्या समाज में परिवार के भीतर भी लोगों का एक दूसरे के ऊपर से भरोसा नहीं उठ जाएगा? क्या ऐसी खबरों के बाद लोगों का एक-दूसरे के साथ जीना मुश्किल नहीं हो जाएगा? लेकिन फिर यह भी लगता है कि ऐसी खबरों की जानकारी लोगों को इसलिए भी रहना चाहिए कि वे बाकी जिंदगी अपने आसपास के दायरे से सावधान रहें और याद रखें कि आसपास के लोग भी किसी भी हद तक गिर सकते हैं, किसी भी हद तक हिंसक हो सकते हैं, इसलिए जितना भरोसा करना जरूरी हो उतना तो ठीक है लेकिन उसके बाद एक सावधानी रखना जरूरी है। परिवारों के भीतर भी लोगों को ऐसी सावधानी बरतनी चाहिए कि किसी कमजोर घड़ी में ऐसी कोई हरकत ना हो जाए जो बाद में जिंदगी भर जीना मुहाल कर दे, और किसी लडक़ी की अगर ससुराल में लगातार हिंसक प्रताडऩा चल रही है, तो उसके मां-बाप को भी उस लडक़ी को वापस वहां नहीं भेजना चाहिए, बाद में लाश पर रोने से वह लडक़ी जिंदा तो नहीं हो जाएगी।
आज की दोनों खबरें एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग किस्म की हैं, इन दोनों को लेकर कोई एक निष्कर्ष निकालना भी बहुत आसान या मुमकिन नहीं है, लेकिन इन दोनों के साथ एक बात जरूर है कि दोनों परिवार के भीतर की हिंसा की बात हैं। इन दो मामलों से बिल्कुल अलग किस्म की एक बात यह भी है कि जितने बच्चे सेक्स शोषण के शिकार होते हैं उनमें से अधिकांश बच्चों के साथ ऐसी हिंसा परिवार के भीतर, परिवार के लोग करते हैं, या परिवार के बहुत करीबी लोग करते हैं जिनका बड़े हक और भरोसे के साथ उस घर में आना जाना होता है। इनके अलावा बच्चों का सेक्स शोषण वे लोग करते हैं जो शिक्षक होते हैं, या उनके खेल प्रशिक्षक होते हैं, या उन्हें स्कूल लाने ले जाने वाले घरेलू कामगार होते हैं। इसलिए हर परिवार को अपने भीतर जुर्म और हिंसा के ऐसे खतरों के बारे में जरूर सोचना चाहिए और इन्हें लेकर सावधान भी रहना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
नोट देकर वोट खरीदने की बात हिंदुस्तानी चुनावों में इतनी आम है कि कांटे की टक्कर वाले, और मुनाफे की सीट वाले कई चुनावों में तो आखिरी के वोटों के लिए पांच-पाँच हज़ार तक देने की चर्चा सुनाई पड़ती है। अब असली रेट क्या रहता है यह तो देने और लेने वाले जानें, लेकिन संपन्न सीटों के अति संपन्न उम्मीदवार मतदान के पहले की रात को नोट बांटने के लिए उतावले रहते हैं। ऐसे में तेलंगाना में एक सांसद को वोट पाने के लिए नोट बांटने का मुजरिम ठहराते हुए एक विशेष अदालत ने 6 महीने की कैद सुनाई है। यह महिला सांसद मलोत कविता नाम की टीआरएस नेता हैं। हालांकि हिंदुस्तान में चुनावी वोट पाने के लिए वोटरों को रिश्वत देने का सिलसिला कोई नया नहीं है, और लोगों को याद होगा कि इस देश में इमरजेंसी का इतिहास इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले से चालू होता है, जिसमें इंदिरा गांधी के चुनाव को नाजायज ठहराया गया था, क्योंकि उनके एक सहयोगी सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा मंजूर हुए बिना इंदिरा का चुनावी एजेंट बन गए थे। इंदिरा पर वोटरों को कम्बल बांटने का भी आरोप था, जो कि अदालत में साबित नहीं हो पाया था। कुर्सी न छोड़नी पड़े इसलिए उस वक्त इंदिरा और संजय गांधी ने इमरजेंसी लगाना तय किया था, और आगे की कहानी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है जिस पर अधिक चर्चा आज का मकसद नहीं है।
लेकिन तेलंगाना के इस ताजा फैसले को लेकर इस बात पर चर्चा की इच्छा जरूर होती है कि क्या भारतीय चुनावों में वोटरों को रिश्वत और भ्रष्टाचार को सचमुच ही काबू में किया जा सकता है, या यह निचली अदालत का एक ऐसा फैसला है जिसे देश की आखिरी अदालत तक पहुंचने में एक पीढ़ी का वक्त लग जाएगा और सांसद का कार्यकाल पूरा भी हो चुका रहेगा? दरअसल देश भर में चुनाव के वक्त पैसों का जो नंगा नाच देखने मिलता है वह इतना डरावना हो गया है कि ऐसा लगता है कि संसद में वे लोग पहुंचते हैं जिन्हें अपनी चुनावी सीट के वोटरों को सबसे अधिक दाम पर खरीदने की ताकत हासिल रहती है। दक्षिण भारत में वोटों का रेट उत्तर भारत के मुकाबले कुछ अधिक माना जाता है और चुनाव के वक्त वहां गहनों से लेकर दूसरे किस्म के सामान बांटने का रिवाज अधिक है। इसकी एक वजह शायद यह हो सकती है कि उत्तर भारत की एक-एक सीट पर वोटर अधिक हो गए हैं, और दक्षिण भारत की सीटों पर आबादी काबू में रहने की वजह से वोटर भी कम हैं।
जो भी हो हिंदुस्तानी आम चुनाव सबसे अधिक भ्रष्ट व्यवस्था है और किसी लहर में जीतने वाली पार्टी या उम्मीदवार की बात छोड़ दें तो कांटे की टक्कर वाली जितनी सीटें रहती हैं, वहां पर तो वोटों को खरीदने से चुनावी नतीजों का सीधा रिश्ता रहता है। अब ऐसे में मन में एक सवाल यह भी उठता है कि जहां पर वोटों को खरीदने की इतनी बड़ी गुंजाइश रहती है क्या वहां के चुनावों को सचमुच ही जनता की राय मांग लेना ठीक होगा, सचमुच ही उसे एक जनतांत्रिक पसंद माना जाना चाहिए? या फिर यह वोटों की एक ऐसी मंडी है जहां पर सबसे अधिक बोली बोलने वाला नेता या उसकी पार्टी वोट पा जाते हैं, और देश भर में सबसे ऊंची बोली लगाने वाले लोग संसद और विधानसभा में पहुंचने की सबसे अधिक संभावना भी रखते हैं? हम तो मध्य भारत के इस इलाके छत्तीसगढ़ में चुनावों को रूबरू देखते हुए यह जानते हैं कि एक बड़े शहर के एक वार्ड के चुनाव में किस तरह बड़े उम्मीदवार एक-एक करोड़ रुपए तक खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं, उतारू रहते हैं। यहां तक सुनाई पड़ता है कि सबसे भ्रष्ट किसी वार्ड उम्मीदवार को किसी एक जगह से ही एक साथ 25 लाख का चुनावी चंदा मिल जाता है। इससे भी अंदाज लग सकता है कि कुछ हजार वोट वाले वार्ड किस तरह महंगी जीत वाले रहते हैं और जाहिर है कि इसके बाद अगले 5 बरस निर्वाचित लोग इस पूंजी निवेश की वापिसी के लिए, कमाई करने के लिए कैसे-कैसे काम करते होंगे।
हिंदुस्तान का चुनाव आयोग इसी फर्जी बात पर फख्र हासिल करते रहता है कि चुनाव में गुंडागर्दी खत्म हो गई है, और अब चुनाव भी बिना किसी हिंसा के हो जाते हैं। लेकिन आज भारतीय चुनाव की जो सबसे बड़ी समस्या है, रुपयों का वह बोलबाला खत्म करने में यह चुनाव आयोग कुछ भी नहीं कर पाया है। बल्कि हाल के चुनावों में देखा गया है कि यह चुनाव आयोग लोगों के हिंसक भाषणों को भी नहीं रोक पाया, भडक़ाऊ और सांप्रदायिक नेताओं और तबकों को भी नहीं रोक पाया, यह चुनाव आयोग हिंसक जातिवाद को भी नहीं रोक पाया। यह चुनाव आयोग मतदान करवाने की एक काबिल मशीन से परे और किसी काम का नहीं रह गया है, और यह चुनाव को निष्पक्ष और ईमानदार करवाने के लिए तो कुछ भी करने के लायक नहीं रह गया है। इसलिए अगर सुप्रीम कोर्ट को यहां पर दखल देने की कोई गुंजाइश दिखती है तो उसे संसद और चुनाव आयोग इन दोनों के सामने इस बात को रखना चाहिए क्योंकि संसद के भीतर बाहुबल चुनाव आयोग को ऐसा ही बनाए रखने का हिमायती हो सकता है। इसलिए तेलंगाना के इस अदालती फैसले से हमें इस मुद्दे पर चर्चा करने की सूझ रही है कि हिंदुस्तान के चुनाव की इस मंडी में खरीदने-बेचने का सिलसिला कैसे खत्म हो सकता है? इस बारे में जो देश के जिम्मेदार तबकों को सोचना चाहिए, यहां की अदालत को भी सोचना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
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सम्पादकीय में एक तथ्य गलत
'छत्तीसगढ़' अखबार में 25 जुलाई को प्रकाशित संपादकीय जिसमें वोट के बदले नोट देने के जुर्म में तेलंगाना की एक महिला सांसद को कैद की सजा सुनाई गई है, उसमें इंदिरा गांधी के मामले की चर्चा भी की गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जिस फैसले ने इंदिरा गांधी के चुनाव को नाजायज ठहराया था, उसके बारे में संपादकीय में लिखा गया था कि उनके एक सहयोगी को वोटरों को कंबल बांटने का दोषी पाया गया था। यह बात सही नहीं थी।
हमारे एक नियमित पाठक डॉ. परिवेश मिश्रा और कुछ दूसरे पाठकों ने इस गलती के बारे में ध्यान दिलाया था। उस पुराने फैसले को देखने पर तथ्य यह मिला कि इंदिरा गांधी के सहयोगियों पर वोटरों को कंबल बांटने का आरोप लगाया गया था, लेकिन वह हाईकोर्ट में साबित नहीं हो पाया था। और इंदिरा गांधी के चुनाव को नाजायज ठहराने की एक बड़ी वजह यह थी कि उनके एक सहयोगी का सरकारी नौकरी से इस्तीफा उस समय तक मंजूर नहीं हुआ था, जो कि उनका चुनावी एजेंट भी बना दिया गया था। इसके अलावा रायबरेली के इस लोकसभा चुनाव में कलेक्टर और दूसरे अफसरों का बेजा इस्तेमाल चुनावी मंच बनाने जैसे चुनावी कामों के लिए किया गया था।
ऐसे नाजायज तरीकों के इस्तेमाल की वजह से इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित करार दिया गया था। संपादकीय में लिखा गया यह तथ्य सुधारना जरूरी है कि कंबल बांटने की वजह से चुनाव अवैध हुआ था। अखबार के छपे हुए अंकों में तो कोई सुधार नहीं हो सकता, लेकिन वेबसाइट और ऑनलाइन जहां-जहां यह सम्पादकीय है वहां इसमें सुधार किया जा रहा है। इस चूक के लिए हमें खेद है, संपादक, सुनील कुमार।
दुनिया के बहुत से देशों में कारोबार कर रही अमेरिका की स्टारबक्स नाम की कॉफ़ी कंपनी ने घोषणा की है कि वह अमेरिका के अपने फास्ट फूड और कॉफ़ी के आउटलेट में न बिका हुआ खाने-पीने का सामान उस इलाके के जरूरतमंद और भूखे लोगों के लिए ऐसे समाजसेवी संगठनों को देगी जो उसे बांट सकें। इस कंपनी ने अगले 10 बरस में 100 मिलियन डॉलर की ऐसी मदद करने की घोषणा की है। अभी हम इस रकम को लेकर यह अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि यह कंपनी कितनी बड़ी है और अमेरिकी हालात में यह मदद कितनी बड़ी रहेगी। लेकिन हम इसे इस मुद्दे के रूप में देख रहे हैं कि दुनिया के बहुत से ऐसे खाने-पीने के कारोबार हैं जिनमें बहुत सा सामान बचता है जो फेंकने में जाता है या बर्बाद हो जाता है. दूसरी तरफ हर शहरी इलाके में बहुत से गरीब लोग भूखे रहते हैं या कम खा कर जीते हैं. कारोबार की सामाजिक जिम्मेदारी के हिसाब से देखें तो ऐसा लगता है कि इन दोनों का एक मेल हो सकता है. और दुनिया के बहुत से ऐसे बड़े दुकानदार भी हैं जो सामान फेंकने के बजाय उन्हें निकालकर दुकान के बाहर रख देते हैं और जरूरतमंद लोग उन्हें उठाकर ले जाते हैं. दुनिया में भूख बहुत बुरी तरह फैलती और बढ़ती जा रही है, दूसरी तरफ खाने-पीने की बर्बादी इतनी अधिक होती है कि अमेरिका जैसे दुनिया के कई देश बहुत बुरी तरह के मोटापे के शिकार हैं। मोटापे का मतलब जरूरत से अधिक खाना ही होता है। तकरीबन तमाम अधिक मोटे लोग खाने की बर्बादी बदन के बाहर करने के बजाय बदन के भीतर करते हैं. नतीजा यह होता है कि वह महंगे अस्पतालों के लिए एकदम फिट मरीज हो जाते हैं। इस हिसाब से भी यह सोचने की जरूरत है कि जो लोग जरूरत से अधिक खा रहे हैं, यानी जिनके पास जरूरत से अधिक खाना है, उन लोगों से भी कुछ खाना गरीबों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।
इस मुद्दे पर पढ़ते हुए भारत की एक प्रमुख पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थ में छपा हुआ एक लेख दिख रहा है जिसमें फीडिंग इंडिया नाम के एक संगठन के बारे में बताया गया है। इस संगठन की एक संस्थापक सृष्टि जैन ने कहा कि हर शादी में औसतन 15-20 फ़ीसदी खाना बर्बाद होता है और जो कि 25-50 किलो से लेकर 800 किलो तक रहता है इतने खाने से 100-200 लोगों से लेकर 2-4 हजार लोगों तक का पेट भरा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट भी मेहमानों की संख्या सीमित करने के बारे में सोच रहा था, लेकिन तब तक अधिक व्यावहारिक बात यह है कि अधिक बने हुए खाने को किस तरह भूखे लोगों तक पहुंचाया जाए, और उनका संगठन यह काम करने में लगा हुआ है। डाउन टू अर्थ पत्रिका ने एक बड़े कैटरर से बात की जो शादियों की पार्टियों में खाने का इंतजाम करते हैं. उनका तजुर्बा यह रहा कि छोटी पार्टियों में करीब 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद होता है और बड़ी पार्टियों में यह 60 फ़ीसदी तक हो सकता है क्योंकि लोग जितने मेहमानों को बुलाते हैं उतने आते नहीं, और वे जितने किस्म की चीजें बनाते हैं उतनी चीजों की खपत नहीं होती। उनका कहना यह है कि 500 लोगों की दावतों में 700 लोगों के खाने लायक खाना बना लिया जाता है, और ऐसी दावत तो में कई बार 300 लोग ही पहुंचते हैं.
यह कोई बहुत मौलिक और नई सोच की बात नहीं है हिंदुस्तान में आज से कई दशक पहले मुंबई में एक कोई समाजसेवी संगठन ऐसा था जो शादी-ब्याह के बाद बचा हुआ बिना जूठा खाना ले जाकर अपनी गाड़ियों में गरीब बस्तियों में जरूरतमंद गरीबों को खिलाता था। हर दावत में खाना जरूरत से ज्यादा बनता है और बर्बाद होने के बजाय ऐसा खाना दूसरों तक पहुंचाना एक बड़ा भला काम है. मुंबई के अलावा कुछ और शहरों में भी अलग-अलग स्तर पर यह काम हुआ है और कुछ जगहों पर तो लोगों ने दावतों में खाने की बर्बादी रोकने के लिए खाने की टेबलों पर यह तख्ती लगानी शुरू कर दी है कि कृपया उतना ही खाना लें जितना आप खा सकते हैं। कुछ संपन्न और सवर्ण तबकों में ऐसी दावतों के वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें कोई एक जिम्मेदार व्यक्ति खड़े होकर प्लेट रखने वाले लोगों को वापिस भेज रहे हैं कि प्लेट का पूरा खाना खाकर खाली प्लेट लेकर आएं।
ऐसी जागरूकता और इसी तरह तरह की पहल जरूरी है क्योंकि आज दुनिया में एक तरफ खाने की बर्बादी जारी है और दूसरी तरफ भूख से लोगों की जिंदगी बर्बाद हो रही है। इन दोनों बातों को जब भी एक साथ रखकर देखें, तो लगता है कि यह संपन्न तबके की और समाज की एक किस्म की हिंसा है जो कि गरीब और भूखे लोगों को अनदेखा करके खाना-पीना इतना बर्बाद करती है। लोग इस बात को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बना लेते हैं कि वे कितने अधिक किस्म के खाने परोसते हैं, और कितना जबरदस्ती लोगों को खिला सकते हैं, फिर भले ऐसा खिलाना उनके मेहमानों की सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह ही क्यों ना हो। इसलिए समाज में ऐसी जागरूकता की जरूरत है जो लोगों को सीमित किस्म के खाने परोसने के सामाजिक प्रतिबंध भी लगाए। कुछ शहरों में कुछ समाज के लोगों ने ऐसा किया हुआ भी है। दूसरी तरफ दावतों के बाद बचे हुए खाने को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने के लिए सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए। हमने अलग-अलग किस्म के बहुत से समाजसेवी संगठनों के काम देखे हैं जो कि बड़ी मेहनत करते हैं लाशों को घर पहुंचाने का काम करते हैं, कफन-दफन का काम करते हैं, अंतिम संस्कार करते हैं। इसलिए खाने की बर्बादी रोकने के लिए भी ऐसे संगठन जरूर बन सकते हैं, या मौजूदा संगठन इस काम को भी कर सकते हैं. (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी कल भाजपा कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसानों के प्रदर्शन पर एक सवाल का जवाब दे रही थीं, और उन्होंने काफी आक्रामक तरीके से कहा- फिर किसान आप उन लोगों को बोल रहे हैं, मवाली हैं वो। इसका वीडियो मौजूद है जो उनके शब्दों को बड़ा साफ-साफ बतला रहा है। लेकिन जैसा कि बाद में होता है, उन्होंने एक और बयान में कहा कि उनके शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया है, फिर भी अगर उनके शब्दों से कोई किसान आहत हुआ है, तो वह उन्हें वापस लेती हैं। इन दोनों बातों के वीडियो हमने देखे हैं और इन दोनों बातों में कहीं गलतफहमी की कोई गुंजाइश नहीं है।
मीनाक्षी लेखी केंद्रीय राज्य मंत्री बनने के पहले सुप्रीम कोर्ट सहित बहुत सी अदालतों में वकालत कर चुकी हैं, और पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुकी हैं। वे हिंदी भाषी इलाके से हैं इसलिए किसी गैर हिंदी भाषी प्रवक्ता या नेता के मुंह से निकले अटपटे शब्दों के लिए उन्हें संदेह का लाभ देने की कोई गुंजाइश भी मीनाक्षी लेखी के साथ नहीं है। वे लंबे समय से भाजपा के कई पदों पर दिल्ली में ही काम करती रही हैं जो कि मोटे तौर पर हिंदी भाषी प्रदेश है और वह खुद भी वकील रहते हुए वे मवाली शब्द का मतलब न समझें ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए अपने शब्दों के बचाव में बाद में उनका चाहे जो बयान नुकसान को घटाने के लिए आया हो, किसानों की जो बेइज्जती होनी थी, वह तो हो ही चुकी है। राजनीति में सत्ता पर रहते हुए बहुत से लोग इस तरह बड़े हमलावर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वह अगर ज्यादा आक्रामक रहते हैं तो वह पूरे के पूरे वाक्यों और मिसालों को बहुत ही हमलावर बनाकर बोलते हैं, गाड़ी के नीचे आ जाने वाले पिल्ले जैसी मिसाल । यह जानते हुए भी बोलते हैं कि इन दिनों किसी शहर स्तर के नेता की कही हुई बात को भी कई कई कैमरे रिकॉर्ड करते ही रहते हैं. इसलिए यह समझना मुश्किल होता है कि कौन सी बात किसके मुंह से चूक से निकली है, और कौन सी बात सोच-समझकर किसी हथियार की तरह चलाई गई है। फिर भी किसानों के व्यापक तबके के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में उन्हें मवाली करना कुछ अधिक ही हमलावर और अपमानजनक बात है इसलिए पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बिना वक्त गवाएं तुरंत ही मीनाक्षी लेखी के इस्तीफे की मांग की है, और उन्होंने यह भी याद दिलाया है कि दिल्ली की सरहद पर आंदोलन शुरू होने के बाद से किसानों के खिलाफ कई भाजपा नेताओं ने समय-समय पर अपमानजनक बातें कही हैं, उनके आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की है।
यह बात बहुत हद तक सही है क्योंकि केंद्र सरकार सहित हरियाणा के भी कई भाजपा नेताओं, और मंत्रियों ने किसानों के बारे में समय-समय पर बहुत ओछी बातें कही हैं। और हैरानी यह होती है कि किसानों पर ऐसे हमलों के बीच ही असम, बंगाल, और केरल जैसे चुनाव भी निपट गए, अब तो उस पंजाब का चुनाव सामने खड़ा हुआ है जहां से इस आंदोलन में शुरू से किसान आए हुए हैं, इससे जुड़े हुए हैं। देश में कोई एक प्रदेश किसानों के मुद्दों से सबसे अधिक जुड़ा हुआ है तो वह पंजाब है. आज देश में जितने किस्म के अलग-अलग पेशेवर तबके हैं उनमें शायद किसान ही अकेले ऐसे हैं जो भ्रष्टाचार से सबसे कम जुड़े हुए हैं, जो कोई भी गुंडागर्दी नहीं करते हैं, और जो कुदरत और सरकार इन दोनों के रहमो करम पर जीते हुए मेहनत करते हैं, और राजनीतिक दलों और सरकारों के किए हुए वायदों के पूरे होने की उम्मीद रखे हुए जिंदगी गुजार लेते हैं। किसानों ने अपने आंदोलन में कभी किसी को मारा नहीं है, देश का इतिहास गवाह है कि हर बरस हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लेकिन ऐसा कोई भी साल नहीं है जब किसानों ने कुछ दर्जन भी हत्याएं की हों। और एक तबके के रूप में तो किसानों ने कभी भी कोई हिंसा नहीं की है। दिल्ली में भी स्वतंत्रता दिवस के दौरान जिन लोगों ने वहां आकर हिंसा की वे लोग भाजपा से जुड़े हुए थे, चर्चित और नामी-गिरामी थे जिनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के साथ हैं, और जिनके खिलाफ सुबूत भी मिले और मुकदमे भी चल रहे हैं. लेकिन किसानों ने एक तबके के रूप में, एक आंदोलन के रूप में कोई हिंसा नहीं की।
इसलिए हमारा ख्याल है कि किसानों को मवाली कहना न सिर्फ किसानों का अपमान है, बल्कि इस देश के हर उस इंसान का अपमान है जिसका पेट किसानों के उगाए हुए अनाज से भरता है. और किसानों से परे भी लोगों को ऐसी जुबान का विरोध करना चाहिए और भाजपा के लिए बेहतर यह होगा कि एक मंत्री की कही हुई बात और फिर वापस लिए गए शब्दों से ऊपर जाकर, वह एक पार्टी के रूप में किसानों से माफी मांगे, और अपनी पार्टी के बाकी नेताओं के लिए भी यह चेतावनी जारी करे कि किसानों के बारे में अभद्र और अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने से बाज आएं. ऐसा नहीं है कि बंगाल और केरल के चुनावों में भाजपा के नेताओं का किसानों के खिलाफ कहा हुआ कमल छाप के खिलाफ न गया हो। देश के हर प्रदेश में किसान हैं और कम से कम आम नागरिकों में तो बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि किसानों से हमदर्दी रखते हैं, किसानों के लिए सम्मान रखते हैं. इसलिए भाजपा को पंजाब चुनाव में इस मवाली-शब्दावली का नुकसान हो उसके पहले उसे खुले दिल से, और साफ शब्दों में, बिना किंतु परंतु किए हुए किसानों से माफी मांगनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
दुनिया के कई देशों में लोगों के मोबाइल फोन पर घुसपैठ करके जासूसी करने वाले इजराइली सॉफ्टवेयर पेगासस का मामला जल्दी ठंडा होते नहीं दिख रहा है क्योंकि कई विकसित और सभ्य लोकतंत्र इसके शिकार हुए हैं। फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने इसकी औपचारिक जांच की घोषणा की है। हिंदुस्तान में लोकतंत्र तो पुराना है और हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भी भरता है, लेकिन यहां पर सरकार अभी तक इस बात पर साफ-साफ जवाब देने से भी कतरा रही है कि उसने पेगासस सॉफ्टवेयर खरीदा था या नहीं, और इससे देश के लोगों पर हुई जासूसी की खबर उसे है या नहीं। यहां पर समझने की बात यह है कि हिंदुस्तान में डाटा प्राइवेसी कानून देश के हर नागरिक और संस्थान को उसके डेटा की सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है और जब लोगों के टेलीफोन पर घुसपैठ करके इस तरह से डाटा चोरी किया गया, तो उसकी जांच और उस पर कार्रवाई भी केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बनती है। लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले की जांच के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। सरकार का संसद के भीतर और संसद के बाहर बयान बहुत ही अमूर्त किस्म का, गोलमाल शब्दों का बयान है, जिसमें सरकार न तो इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की बात मंजूर कर रही है और ना इसे इस्तेमाल करने का खंडन कर रही है।
निजता पर आए ऐसे गंभीर खतरे के बीच सुप्रीम कोर्ट में एक पिटीशन लगाई गई है कि सुप्रीम कोर्ट इस जासूसी सॉफ्टवेयर की खरीदी पर रोक लगाए। जैसा कि यह कंपनी कहती है वह इसे केवल सरकारों को बेचती है, ऐसे में हिंदुस्तान में सिर्फ सरकार ही इसे कानूनी रूप से खरीद सकती है, तो सुप्रीम कोर्ट से इस पर रोक लगाने की मांग सीधे-सीधे सरकार पर यह रोक लगाने की मांग है कि वह इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल न करे। अभी इस याचिका पर अदालत में कोई सुनवाई नहीं हुई है लेकिन देश के लोगों को इस जासूसी घुसपैठ के मामले से खत्म होने वाली निजता का मामला बहुत ही भयानक लग रहा है, और हो सकता है कि इसकी गंभीरता को देखकर सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई आदेश भी करें। सुप्रीम कोर्ट शायद याचिका को इस नाते भी गंभीरता से देखेगा कि सुप्रीम कोर्ट के एक पिछले मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ उनकी मातहत कर्मचारी द्वारा लगाए गए सेक्स शोषण के आरोपों की जांच के चलते समय बताया जा रहा है कि उस जज का फोन भी पेगासस के रास्ते हैक किया गया था, और शिकायतकर्ता महिला के परिवार के तो 8 मोबाइल फोन नंबर हैक किए गए थे, अब इनमें से कोई बात अभी तक साबित इसलिए नहीं हो रही है कि यदि सरकार ही हर बात की मनाही कर रही है।
फिलहाल हम यह देख रहे हैं कि दुनिया के कई देशों में इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके इतने तरह के काम किए गए कि उससे लोगों के बुनियादी अधिकार बुरी तरह कुचले गए। मेक्सिको में एक ऐसे पत्रकार की हत्या कर दी गई जिस पर पेगासस के माध्यम से नजर रखी जा रही थी, और यह सॉफ्टवेयर जिस फोन में घुसपैठ कर लेता है उसका लोकेशन भी बतला देता है, और उसके कैमरे और माइक्रोफोन से आसपास की बातों को सुन भी लेता है, आसपास की तस्वीरें भी देख लेता है। इसलिए एक बड़ा शक हो रहा है कि मेक्सिको में इस पत्रकार की हत्या के पीछे इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का हाथ रहा है। ऐसा ही दुनिया के कुछ दूसरे देशों में कुछ पत्रकारों की गिरफ्तारी के लिए तो किसी के बेडरूम में घुसकर अनैतिक संबंधों की तोहमत लगाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया है। पूरी दुनिया में पेगासस के ग्राहकों ने अपनी दिलचस्पी के जो टेलीफोन नंबर इस कंपनी में दर्ज करवाए थे, ऐसे करीब 50 हज़ार नंबर बताए जा रहे हैं, और हिंदुस्तान में ही ऐसे 300 से अधिक नंबर बताए जा रहे हैं, जिनकी निगरानी करना बताया जा रहा है।
एक दिलचस्प बात यह है कि खुद इजराइल की सरकार ने अपने देश की इस कंपनी के इस सॉफ्टवेयर के रास्ते दुनिया भर में हुई जासूसी की जांच करवाने की घोषणा की है। लोगों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि सऊदी अरब ने दुसरे देश में अपने दूतावास में बुलाकर एक वरिष्ठ पत्रकार की हत्या की थी, उस पत्रकार और उसके आसपास के लोगों के फोन भी इसी पेगासस सॉफ्टवेयर से निगरानी में रखे गए थे, उनमें घुसपैठ की गई थी।
अब दुनिया भर के साइबर विशेषज्ञ यह मान कर रहे हैं कि दुनिया की सरकारों के बीच इस बात को लेकर एक आम सहमति बनना चाहिए की जासूसी के नाम पर किस-किस तरह के अनैतिक काम न किए जाएं। इस तरह की सहमति कुछ दूसरे मामलों में सरकारों के बीच बनी हुई है जैसे मानव क्लोनिंग को लेकर दुनिया की सरकारों के बीच यह सहमति बनी हुई है कि इस पर काम नहीं होना चाहिए। यहां तक कि चीन जैसा दुस्साहसी प्रयोग करने वाला देश अभी कुछ समय पहले अपने देश के तीन वैज्ञानिकों को कैद सुना चुका है जिन्होंने एक बच्चे के जन्म के पहले उसके डीएनए में एडिटिंग करके उसे एचआईवी जैसी बीमारी के खिलाफ एक प्रतिरोधक शक्ति देने का काम किया था। चीन में ऐसी जेनेटिक एडिटिंग के बाद 3 बच्चे पैदा हुए और ऐसा प्रयोग करने वाले तीन वैज्ञानिकों को चीनी अदालत ने अभी कैद सुनाई है।
दुनिया में लोकतंत्र के हिमायती साइबर विशेषज्ञ यह मान कर रहे हैं कि पेगासस जैसे घुसपैठ करने वाले सॉफ्टवेयर बनाने और उसके इस्तेमाल पर रोक के लिए पूरी दुनिया में एक सहमति बननी चाहिए क्योंकि यह कंपनी चाहे जैसे दावे करती रहे कि यह सॉफ्टवेयर सिर्फ आतंक रोकने के लिए और ड्रग माफिया को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, यह जाहिर है कि इसका इस्तेमाल सरकारों ने अपने विरोधियों के खिलाफ किया है, और ऐसी ताकत रखने वाला घुसपैठिया सॉफ्टवेयर दुनिया के लोकतंत्र को खत्म करके रख सकता है। इसलिए हिंदुस्तान की सरकार को तो इस बारे में बिना देर किए एक जांच की घोषणा करनी चाहिए जिससे वह अपनी खुद की साख भी बचा सकती है, और दुनिया के सभी जिम्मेदार लोकतंत्रों को एक पहल करनी चाहिए कि इस किस्म के घुसपैठिए सॉफ्टवेयर पर रोक लगाई जाए जो कि लोगों की आजादी, लोगों की निजता को इस हद तक खत्म कर सकते हैं। सरकार नहीं करेगी तो सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में जांच का हुक्म दे सकता है जिसमें सरकार को हलफनामे पर सब कुछ बताना होगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
केंद्र सरकार ने लंबे समय बाद हो रहे संसद के सत्र में एक सवाल के जवाब में कहा कि कोरोना के दौर में देश में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। इसे लेकर देश हक्का-बक्का रह गया और संसद में कई विपक्षी दलों के लोगों ने इसे लेकर खासी नाराजगी जाहिर की क्योंकि इस पूरे दौर में लोग ऑक्सीजन की कमी से कोरोना मरीजों को मरते देख रहे थे, परिवार के लोगों को बिलखते देख रहे थे, अस्पतालों ने नोटिस लगा दिए थे कि ऑक्सीजन उनके पास नहीं है, और मरीजों को कहीं और ले जाएं। ऐसे में केंद्र सरकार का यह कहना कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई है, एक बड़ी ही अटपटी बात लग रही है। लेकिन इससे भी अधिक दिलचस्प और तकलीफदेह बात यह है कि किसी राज्य सरकार ने अपने भेजे गए आंकड़ों में केंद्र सरकार को यह नहीं कहा कि उनके राज्य में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत हुई है। केंद्र सरकार की इस बात में दम है कि वह तो महज राज्यों से मिले हुए आंकड़ों को जोडक़र संसद को बतला देती है। यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार लगातार यह देख रही थी कि ऑक्सीजन की कमी से देश में मौतें हो रही हैं और देश में ऑक्सीजन की बहुत बुरी कमी चल रही है, लेकिन जब तक अस्पतालों के इंचार्ज राज्य के अधिकारी यह बात मानेंगे नहीं कि ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं, तब तक केंद्र सरकार अपनी तरफ से कैसे कह सकती है कि कुछ मौतें ऑक्सीजन की कमी से भी हुई हैं ?
भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का यह मिला-जुला पाखंड नया नहीं है। इस देश में पिछली करीब पौन सदी से यह देखने में आ रहा है कि जब कभी भूख से कोई मौत होती है, तो वहां की राज्य सरकार बड़ी तेजी से ऐसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश कर देती है जिसमें लाश के पेट से पचा हुआ खाना निकला बताया जाता है। मरने वाले के घर पर कुछ किलो अनाज दिखा दिया जाता है। उस इलाके की राशन दुकान के रिकॉर्ड बताने लगते हैं कि मरने वाले को कुछ दिन पहले ही अनाज दिया गया था। कुल मिलाकर कोई भी राज्य सरकार हिंदुस्तान में आज तक इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुई है कि उनके यहां भूख से कोई मौत हुई है। और तो और, कुपोषण के जो आंकड़े बतलाते हैं कि बहुत से बच्चे कुपोषण की वजह से बहुत गंभीर रूप से कमजोर हैं, उनकी मौत पर भी उनकी मौत को कुपोषण से मौत दर्ज करने में सरकारें कतराती हैं, और उन्हें भी किसी बीमारी से मौत बतला दिया जाता है। बात यहीं तक सीमित नहीं है, कई ऐसे राज्य हैं जिन्होंने पिछले डेढ़ बरस में कोरोना से होने वाली मौतों को कोरोना के साथ दर्ज नहीं किया है और महज किसी और बीमारी से मौत दर्ज कर लिया है। नतीजा यह निकला कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार जब कोरोना मौतों पर कोई मुआवजा देने की तैयारी कर रही हैं, तो उस लिस्ट में भी इन मरने वालों के घर वालों का नाम नहीं आ पा रहा क्योंकि उनकी मौतों को ही कोरोना मौत दर्ज नहीं किया गया है।
सरकारों का गजब का करिश्मा तो तब देखने मिलता है जब उनके राज्य में कोई किसान आत्महत्या करते हैं। किसानों की आत्महत्या क्योंकि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बनता है, और सरकार को जवाब देने में मुश्किल होती है, इसलिए देश के कई राज्यों ने किसान की आत्महत्या को कुछ दूसरी वजहों के साथ दर्ज करना शुरू कर दिया है। आत्महत्या करने वाले के पेशे या रोजगार के कॉलम में किसान दर्ज ही नहीं किया जाता। और आत्महत्या की वजह में नशे की आदत, कर्ज में डूबना, या कहीं अवैध प्रेम और सेक्स संबंध जैसी बातें दर्ज कर ली जाती हैं, लेकिन किसानी के नुकसान से, किसानों के कर्ज से आत्महत्या हुई हो, ऐसा रिकॉर्ड में नहीं आने दिया जाता। नतीजा यह होता है कि सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार किसान की आत्महत्या पर उठने वाले असुविधाजनक सवालों से बच जाती हैं।
हिंदुस्तान में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपनी सार्वजनिक छवि को बचाने के लिए सरकारी आंकड़ों को किसी भी हद तक दबाने-कुचलने, तोडऩे-मरोडऩे के लिए एक पैर पर खड़ी रहती हैं। जनधारणा का प्रबंधन पूरी तरह आंकड़ों और इमेज को लेकर चलता है। एक वक्त कुछ होशियार लोग यह कहते थे कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव 5 साल काम करके नहीं, चुनाव का मैनेजमेंट करके जीते जाते हैं। अब एक बात लग रही है कि चुनाव जनधारणा प्रबंधन से जीते जाते हैं, और लोगों के सामने सरकार की कैसी छवि पेश की जाती है, इससे भी जीते जाते हैं। भारतीय चुनावों में और भी कई मुद्दे रहते हैं जिनमें धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण, लोगों के बहुसंख्यक तबके को खुश करने वाले कई किस्म के मुद्दे रहते हैं जिनमें अल्पसंख्यकों को प्रताडि़त करने के मुद्दे भी शामिल रहते हैं। जब सरकारें झूठे और फरेबी आंकड़ों से अपने को बेहतर दिखाने की कोशिश करती हैं तो राज्यों के भेजे गए झूठे आंकड़ों पर भी केंद्र सरकार ने कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि अलग-अलग पार्टियों की राज्य सरकारें जो भेज रही है उनसे केंद्र सरकार की एक देश के रूप में बेहतर छवि बनाने की कोशिश बिना खुद की मेहनत के पूरी हो रही है।
ऐसे में संसद में एक विपक्षी सांसद के दिए गए इस बयान को देखने की जरूरत है जिसने सोशल मीडिया पर लोगों को हिला कर रख दिया है। राज्यसभा में कोरोना पर बहस के दौरान आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि पूरे सदन को उन लोगों से माफी मांगनी चाहिए जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं, पर उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया गया। झा ने कोरोना संकट के दौरान ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सांसद होने के बावजूद वे लोगों की मदद नहीं कर पाए। मनोज झा ने कहा कि कोरोना के प्रकोप में देश के तमाम परिवारों ने किसी अपने को खोया है। उन्होंने कहा, ‘हम सबको एक साझा माफीनामा उन लोगों को भेजना चाहिए जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं।’ उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि हमने इस कोरोना महामारी में ऑक्सीजन की कमी के कारण कई मौतें देखी है। उन्होंने कहा कि हम आंकड़ों की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि सच्चाई से रूबरू होकर यह कहना चाहते हैं कि ये जो लोग हमारे बीच से आज चले गए, वो एक जिंदा दस्तावेज छोडक़र गए हैं, हमारी नाकामी का, उन्होंने कहा कि यह कलेक्टिव फेल्योर है 1947 से लेकर अब तक की सभी सरकारों का। मुफ्त वैक्सीन पर भी तंज कसते हुए झा ने कहा कि यह मुफ्त राशन, मुक्त वैक्सीन की बात जो हो रही है, यह कुछ मुफ्त नहीं है, इस वेलफेयर स्टेट का एक कमिटमेंट है, उसको सरकार कम ना करे, उसे बौना ना बनाए। उन्होंने कहा ‘मैं चाहता हूं, जगाना चाहता हूं आपको भी और सभी को भी, क्योंकि हमने असम्मानजनक मौत को देखा है, और अगर हमने इसे दुरुस्त नहीं किया तो आने वाली पीढ़ी आप हमें माफ नहीं करेगी।’ (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
दुनिया भर में इजराइल की एक कंपनी के बनाए हुए पेगासस नाम के एक सॉफ्टवेयर को लेकर हंगामा मचा हुआ है कि दर्जनों देशों की सरकारों ने इसका इस्तेमाल करके अपने देश के विरोधी नेताओं और मीडिया के लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी की, उनके फोन में घुसपैठ की, वहां से जानकारी चुराई, उनकी लोकेशन देखी कि वह किस वक्त कहां पर थे, उनके फोन की लॉग बुक देखी कि उन्होंने कब किसको फोन किया। और जैसा कि इस सॉफ्टवेयर को बनाने वालों का कहना है, जिस फोन में इसकी घुसपैठ हो गई, उसके कैमरा और माइक्रोफोन का इस्तेमाल करके बिना किसी को पता लगे इस सॉफ्टवेयर ने आसपास की तस्वीरें, वीडियो भेजने का काम किया, और वहां की आवाजों को बाहर ट्रांसमिट किया। कुल मिलाकर दुनिया के सभ्य लोकतंत्रों ने अपने नागरिकों की निजता के लिए जितने किस्म के कानूनी इंतजाम किए हैं, जितने तरह से उनकी हिफाजत के दावे किए हैं उसके ठीक खिलाफ जाकर इस कंपनी के ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया और बेचा जिसने सबके बदन पर से तौलिया खींच दिया। कहने के लिए इस कंपनी का दावा यह है कि वह इजराइल की डिफेंस मिनिस्ट्री की इजाजत से ही दुनिया की चुनिंदा सरकारों को यह सॉफ्टवेयर बेचती है, और इससे आतंकी हमलों पर काबू पाने की सोच बताई गई है, और इसके अलावा नशे की तस्करी, बच्चों की तस्करी, महिलाओं की तस्करी को रोकने के लिए भी इसके इस्तेमाल का दावा किया गया है। कंपनी ने बढ़-चढक़र यह भी कहा है कि वह सरकारों और सरकारी एजेंसियों के अलावा किसी को यह सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है। लेकिन दुनिया की बाजार व्यवस्था बताती है कि बाजार में कमाई के लिए काम करने वाले लोग लोकतंत्र या सभ्यता का कितना सम्मान करते हैं, उनको मानवाधिकार की कितनी फिक्र रहती है, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। इसलिए जब ऐसा कोई सॉफ्टवेयर बना है तो यह जाहिर है कि उस तक किसी की भी पहुंच हो सकती है जिसके पास इसको खरीदने की ताकत हो। कहने के लिए तो आज दुनिया के बहुत से जंग के मोर्चों पर इस्तेमाल होने वाले खतरनाक फौजी हथियारों को भी उन्हें बनाने वाले कारखाने, किसी न किसी देश की सरकार को ही बेचते हैं, लेकिन दुनिया का इतिहास बताता है कि गृहयुद्ध में लगे हुए हथियारबंद समूहों तक ये सारे हथियार कहीं न कहीं से पहुंचते ही हैं। दिलचस्प बात यह है कि इजरायल की इस कंपनी ने यह खुलासा भी किया है कि उसका सॉफ्टवेयर अमेरिका के किसी टेलीफोन नंबर पर काम नहीं कर सकता। उसे ऐसा बनाया गया है कि उसका अमेरिका में या अमेरिका के फोन नंबरों पर कोई इस्तेमाल ना हो सके। अब सवाल यह है कि अमेरिकी सरकार का ऐसा कितना काबू इजराइल की इस कंपनी पर है कि वह अमेरिका में जासूसी के लायक सॉफ्टवेयर ही ना बनाएं और यह बात जासूसी की शौकीन अमेरिकी सरकार की मर्जी से हुई है, या उसकी मर्जी के खिलाफ यह भी अभी साफ नहीं है।
खैर, जिन देशों की बात इसमें आ रही है और दुनिया के करीब एक दर्जन सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने मिलकर इस मामले की तहकीकात की है जिसमें दुनिया का सबसे बड़ा मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल भी शामिल था और दुनिया की कुछ सबसे बड़ी और साख वाली साइबर लैब ने इस मामले की जांच करके अपने नतीजे सामने रखे हैं। कुल मिलाकर जो तस्वीर सामने आ रही है उसमें यह है कि भारत में भी बहुत से ऐसे मीडिया कर्मी जिनका रुख सरकार के खिलाफ आलोचना का रहते आया है उनके फोन में भी पेगासस से घुसपैठ हुई है, दूसरी तरफ शुरुआती खबरें यह कहती हैं कि हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे हुए एक जज के खिलाफ भी इस सॉफ्टवेयर से घुसपैठ हुई और इस जज पर सेक्स शोषण का आरोप जिस मातहत महिला कर्मचारी ने लगाया था, उसकी शिकायत के बाद उसके परिवार के 8 लोगों के टेलीफोन में इस सॉफ्टवेयर से हमले किए गए और वहां से जानकारी चुराने की कोशिश की गई। यह भी बात सामने आई है कि भारत में विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के फोन भी इस हमले के शिकार हुए हैं।
पिछले कुछ महीनों में ऐसी जानकारियां दूसरी बार सामने आई हैं और पिछली बार भी सरकार की तरफ से साफ-साफ शब्दों में ना तो पेगासस के इस्तेमाल की बात मानी गई थी न इसका खंडन किया गया था, और सिर्फ इतना कहा गया था कि निगरानी के लिए बने हुए कानून के मुताबिक ही काम किया जाता है। अभी भी जब दोबारा यह मामला उठा है और संसद का सत्र चल रहा है तब भी सरकार का रुख यही है कि मीडिया में सरकार पर पेगासस के इस्तेमाल को लेकर जो आरोप लग रहे हैं उन आरोपों में कोई दम नहीं है और वे किसी ठोस बुनियाद पर नहीं खड़े हैं। लेकिन सरकार की बात को ध्यान से पढ़ा जाए तो उसमें सरकार सीधे-सीधे इस बात पर कुछ कहने से बचते हुए दिख रही है कि इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भारत में हुआ है या नहीं। सरकार इस बारे में कुछ भी नहीं कह रही है वह इस बात का खंडन तक नहीं कर रही है।
इस दौरान मीडिया में जो रिपोर्ट आई हैं उनमें जानकार कानूनी विशेषज्ञों का यह कहना है कि सॉफ्टवेयर बनाने वाली विदेशी कंपनी अपने हिसाब से कुछ भी बना सकती है लेकिन हिंदुस्तान का कानून इस बारे में बहुत साफ है कि यहां के कानून के मुताबिक तय किए गए तरीकों से ही लोगों के टेलीफोन या ई-मेल की निगरानी की जा सकती है, लेकिन उनमें किसी तरह की हैकिंग नहीं की जा सकती। हैकिंग अगर सरकार भी इस देश में करती है तो भी वह गैरकानूनी होगी ऐसा जानकर लोगों का कहना है। वैसे तो अभी संसद का सत्र चल रहा है और सरकार जवाबदेही के सबसे बड़े मंच पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए एक किस्म से मजबूर है, लेकिन सच तो यह है कि चतुर और चालबाज सरकारें कुछ गोलमोल शब्दों का सहारा लेकर साफ-साफ जवाब देने से बचती हैं, और इससे अधिक कोई जवाबदेही इस देश में किसी सरकार की रह नहीं गई है। फिलहाल हम इस किस्म की सारी हैकिंग और घुसपैठ को बहुत ही अलोकतांत्रिक, बहुत ही परले दर्जे का जुर्म, और बहुत ही असभ्य बात मानते हैं। यह बात मानवाधिकार के भी खिलाफ है और लोकतांत्रिक देश के नागरिकों के निजता के अधिकार के खिलाफ तो है ही। ऐसे ही आरोपों को लेकर अमेरिका में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की सरकार चली गई थी क्योंकि उन्होंने अपने विरोधियों की बातचीत को रिकॉर्ड करवाने की कोशिश की थी, और एक अख़बार ने उसका भंडाफोड़ कर दिया था।
हिंदुस्तान में भी इस मामले को एक तर्कसंगत अंत तक पहुंचाने की जरूरत है क्योंकि यहां केंद्र और राज्य सरकारों को लोगों की जासूसी करवाने में बहुत मजा आता है, और यह बात लोकतंत्र को खत्म करने वाली हो सकती है। जब अपने विरोधियों को, अपने से सहमत लोगों को, ऐसी जासूसी का शिकार बनाया जाए, तो इसके पीछे जो कोई है उसकी जांच होनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि अगर यह मामला कोई सुप्रीम कोर्ट में ले जाए तो वहां आज की हालत में इसकी सुनवाई की उम्मीद बंधती है, और हो सकता है कि अदालत सरकार से यह हलफनामा दायर करने को कहे कि उसने इस सॉफ्टवेयर से देश के लोगों की जासूसी करवाई है या नहीं। यह भी बहुत भयानक नौबत होगी कि कोई बाहरी एजेंसी हिंदुस्तान के लोगों की, किसी के भी कहने पर, ऐसी जासूसी करें। उस हालत में भी यह सरकार की ही जिम्मेदारी होगी कि वह इसकी जांच करवाए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


