संपादकीय
हिंदुस्तान में रोज बहुत से प्रदेशों में ऐसे मामले पुलिस में दर्ज होते हैं जिनमें किसी लडक़ी या महिला से शादी का वादा करके देह संबंध बनाने और बाद में शादी न करने की शिकायत रहती है। कानून कुछ ऐसा है कि ऐसे मामलों को शादी का झांसा देकर रेप करने के तहत दर्ज किया जाता है, और इनमें खासी लंबी सजा का भी इंतजाम है। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें ऐसी शिकायतकर्ता लडक़ी या महिला, ऐसे लडक़े या आदमी के साथ वर्षों तक लिव इन रिलेशनशिप में भी रहती है, लेकिन शादी न होने पर वे रिपोर्ट लिखवाती हैं, और कानून में उसकी गुंजाइश है इसलिए ऐसे लडक़े या आदमी की गिरफ्तारी में अधिक समय भी नहीं लगता। इस बारे में कुछ प्रदेशों के हाईकोर्ट ने समय-समय पर शक जाहिर किया है कि क्या सचमुच ऐसे मामलों को बलात्कार मानना चाहिए, या फिर यह बलात्कार के दायरे से बाहर रखना चाहिए। हमने इस अखबार में ऐसे मामलों को लेकर साफ-साफ लिखा है कि इन्हें बलात्कार मानना गलत होगा और ऐसा लिखने पर बहुत सी महिला आंदोलनकारियों ने हमारी आलोचना भी की है कि यह महिला विरोधी नजरिया है। ताजा मामला दिल्ली का है जिसमें एक नाबालिग को शादी का झांसा देकर उसके साथ बलात्कार किया गया था, और उसकी रिपोर्ट पर मामला दर्ज हो गया है।
भारत में महिला को कानून में खास हिफाजत मुहैया कराई गई है, और इसलिए इन मामलों में महिला के बयान को ही सुबूत मान लिया जाता है, और इनमें बलात्कार या सेक्स शोषण जैसे मामले रहते हैं। जिस समाज में महिला सदियों से कुचली चली आ रही है, वहां पर उसे बराबरी का दर्जा देने या सुरक्षा देने के लिए ऐसा कानून जरूरी भी था। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या समाज के किसी एक कमजोर तबके को उसका जायज हक दिलाने के लिए कानून ऐसा बनाया जाए जिसका एक बड़ा बेजा इस्तेमाल भी हो सकता हो? दिल्ली की जिस घटना को लेकर आज इस मुद्दे पर यहां लिखा जा रहा है उसमें तो शिकायत करने वाली लडक़ी नाबालिग है और इसलिए उसके साथ किसी बालिग का देह संबंध, अनुमति से बनाना भी जायज नहीं है, और कानूनन जुर्म है। इसलिए जो कुछ हम लिखने जा रहे हैं वह इस मामले पर लागू नहीं होता है लेकिन दूसरे बहुत से ऐसे मामले हैं जिनके बारे में एक मानवीय और सामाजिक नजरिए से सोचने की जरूरत है।
यह कोई नई बात नहीं है कि शादी के पहले लोगों के सेक्स संबंध बनें, हिंदुस्तान जैसे दकियानूसी समाज में भी लंबे समय से ऐसा चले आ रहा है और इसके पीछे दो वजहें हैं। एक तो किसी लडक़ी या महिला की अपनी शारीरिक जरूरतें रहती हैं जिन्हें पूरा करने के लिए वह किसी से संबंध बना सकती है। दूसरी बात यह कि शादी हो जाने की एक उम्मीद से भी वह किसी आदमी के सामने समर्पण कर सकती है कि शायद इसके बाद शादी हो जाए। यह दूसरी वजह ऐसी है जो कि भारत की सामाजिक व्यवस्था से पैदा हुई है जहां पर किसी भी लडक़े या लडक़ी के बालिग हो जाने पर उसके शादी कर लेने की सामाजिक उम्मीद एक बहुत बड़ा पारिवारिक दबाव बना देती है। 20-25 बरस के होते ही परिवार से लेकर पड़ोस तक, और रिश्तेदारों तक के दबाव पडऩे लगते हैं कि कब हाथ पीले हो रहे हैं, कब शादी हो रही है। और चूँकि लडक़ी की शादी उसके परिवार पर एक बड़ा आर्थिक बोझ भी रहती है, इसलिए भी लडक़ी पर यह मानसिक दबाव रहता है कि वह किस तरह अपने परिवार का बोझ कम कर सकती है। इसके अलावा पारिवारिक स्तर पर तय हुई शादी में लडक़ी की कोई मर्जी तो रहती नहीं है, और जो लडक़ी अपनी मर्जी से शादी करना चाहती है, वह भी ऐसी शादी अपने बूते पर करने के लिए कई बार किसी लडक़े के सामने उसके सुझाये अपने बदन को खड़ा कर देती है। कुल मिलाकर यह कि हिंदुस्तान में जब शादी की उम्मीद में किसी लडक़ी या महिला को किसी के सामने एक समझौता करना पड़ता है, तो वह निजी जरूरत का कम रहता है पारिवारिक और सामाजिक जरूरत का अधिक रहता है। इसलिए इस बात को समझने की जरूरत है कि इस देश में शादी को जितना जरूरी करार दिया जाता है, उसकी वजह से भी लड़कियों पर शादी का रास्ता निकालने का एक दबाव बनता है।
दूसरी बात को भी समझने की जरूरत है कि लडक़े-लड़कियों के बीच या औरत-मर्द के बीच बिना शादी के भी प्रेम संबंध बनते हैं, जो देह संबंध तक पहुंचते हैं, जो पूरी तरह से दोनों की सहमति के रहते हैं। हो सकता है कि इस बीच किसी एक ने दूसरे से शादी का वायदा किया हो, और यह भी हो सकता है कि ऐसा वायदा करते समय सच में ही उसकी नीयत आगे चलकर शादी करने की रही हो, लेकिन बाद में किसी वजह से शादी ना हो पाना, या बाद में मन का बदल जाना या साथी का शादी के लायक न लगने लगना भी हो सकता है। और ऐसे इसे देह संबंध बनाने के लिए दिया गया झांसा मान लेना ज्यादती की बात होगी। बहुत से मामलों में तो सगाई होने के बाद भी शादी टूट जाती है और इस दौर में अमूमन न तो कोई देह संबंध बनता है न कुछ और। तो इसे क्या कहा जाए? लोगों के विचार समय के साथ-साथ सचमुच बदल भी सकते हैं। इसलिए अगर प्रेम संबंध और देह संबंध को अनिवार्य रूप से शादी में बदलने की शर्त रख दी जाए, तो ऐसी शर्त की गारंटी इन संबंधों की शुरुआत में ही कौन दे सकते हैं? इसलिए यह सिलसिला कुछ ज्यादती का लगता है. दो बालिग लोगों के बीच आपसी सहमति से प्रेम हो, आपसी सहमति से देह संबंध बने, और उसके बाद उन दोनों के बीच शादी को लेकर अगर कभी कोई बात हुई थी तो उसे पूरा न होने की नौबत आने पर इस संबंध को बलात्कार करार दे देना, यह इंसाफ की बात तो नहीं लगती।
महिलाओं के अधिकारों को लेकर लडऩे वाले लोगों को यह बात खटक सकती है लेकिन अखबार में लगातार महिलाओं के अधिकारों के लिए लिखते हैं, और बहुत से मुद्दे ऐसे भी उठाते हैं जो कहीं चर्चा में नहीं रहते, फिर भी यह बात लगती है कि इंसाफ को किसी एक तबके के अधिकारों से भी ऊपर मानना चाहिए, और किसी तबके के हक इंसाफ के नजरिए से ही तय होने चाहिए। अगर लोग प्रेम संबंध और देह संबंध बनाते हुए इसी तनाव और फिक्र में रहेंगे कि उनके साथी आगे चलकर उन्हें बलात्कार में जेल भेज सकते हैं, तो इससे लोगों के संबंधों में शुरू से ही एक अविश्वास पैदा हो सकता है, जो कि प्रेम और सेक्स दोनों को खराब कर सकता है। इस बारे में अधिक विचार-विमर्श की जरूरत है, लोगों के बीच सार्वजनिक बहस होनी चाहिए कि क्या शादी के वायदे के बिना कोई संबंध बन ही नहीं सकते या शादी का वायदा करने के बाद लोगों का अपना इरादा बदलने का हक़ खत्म हो जाता है? और अगर लोग अपना इरादा बदल लें, तो क्या पहले का वह आपसी सहमति का बालिग रिश्ता बलात्कार करार दिया जाए?
इस बारे में सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए
वैसे तो कांग्रेस पार्टी कुछ अच्छी और कुछ बुरी बातों के लिए लगातार खबरों में बनी हुई है, और पंजाब से लेकर राजस्थान, छत्तीसगढ़ तक पार्टी के भीतर अलग-अलग किस्म के मुद्दों को लेकर बेचैनी भी बनी हुई है, लेकिन उसकी खबरें दिल्ली से बन रही हैं। राज्यों को लेकर फैसले भी क्योंकि परंपरागत रूप से इस पार्टी में, और सच तो यह है कि बाकी तमाम पार्टियों में भी, दिल्ली से होते हैं, इसलिए राज्यों की खबरें भी दिल्ली से निकल रही हैं. लेकिन कुछ दूसरी दिलचस्प बातें भी हो रही हैं। देश की नौजवान पीढ़ी में एक सबसे चर्चित नौजवान चेहरा, जेएनयू का छात्र नेता रहा हुआ कन्हैया कुमार, अपने सीपीआई से राजनीतिक संबंधों का एक लंबा दौर छोडक़र कांग्रेस में शामिल हुआ। उसी के साथ जिग्नेश मेवाणी नाम का गुजरात का एक दलित राजनीतिक कार्यकर्ता, और मौजूदा निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस में आया। जिग्नेश मेवाणी वकील और अखबारनवीस भी रह चुका है और बाद में एक दलित कार्यकर्ता की हैसियत से निर्दलीय विधायक बना है। इन दोनों के कांग्रेस में आने की चर्चा कई दिनों से चल रही थी, और राहुल गांधी से मिलकर शायद एक से अधिक मुलाकातें करके ये कांग्रेस में आए हैं. इनके पहले गुजरात में एक और नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता हार्दिक पटेल भी कांग्रेस में लाया गया था और उसे हैरान कर देने वाले तरीके से गुजरात प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया गया। हार्दिक ने पिछले कुछ वर्षों में गुजरात में लगातार सामाजिक और आरक्षण आंदोलनों में बड़ी अगुवाई की थी, और वहीं से हार्दिक का नाम लगातार खबरों में आया, बने रहा, और इतनी कम उम्र का कोई नौजवान इतने बड़े आंदोलन का अगुआ बने ऐसा कम ही होता है। तो हार्दिक पटेल गुजरात के पाटीदार-ओबीसी समुदाय का एक बड़ा असरदार चेहरा है और जिग्नेश मेवानी गुजरात का एक दलित चेहरा है, इन दोनों का कांग्रेस से कोई पुराना इतिहास नहीं रहा बल्कि इन दोनों का कोई चुनावी राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है। पाटीदार आंदोलन से हार्दिक पटेल खबरों में आए क्योंकि वे अपने समाज को ओबीसी आरक्षण में शामिल करवाना चाहते थे। और गुजरात के दलितों की तकलीफ तो बहुत बुरी तरह खबरों में बनी हुई रहती ही हैं।
अब यह सिलसिला थोड़ा सा अटपटा लगता है कि कांग्रेस में एक तरफ तो अपने जमे-जमाए पुराने नेताओं से बातचीत का सिलसिला भी टूटते जा रहा है। कांग्रेस के मौजूदा तौर तरीकों से बेचैन, लेकिन कांग्रेस में ही अब तक बने हुए, करीब दो दर्जन बड़े नेताओं से ऐसा लगता है कि राहुल गांधी, या कांग्रेस हाईकमान, या सोनिया परिवार ने सीधे बातचीत बंद ही कर रखी है। और दूसरी तरफ प्रशांत किशोर नाम के एक चुनावी राजनीतिक रणनीतिकार से जिस तरह कांग्रेस सलाह-मशविरा कर रही है, उसे ऐसा लगता है कि कांग्रेस अपने भीतर की जड़ हो चुकी, फॉसिल बन चुकी, भूतपूर्व प्रतिभाओं को छोडक़र, कुछ नई नौजवान प्रतिभाओं की तरफ जा रही है। यह भी हो सकता है कि कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी को कांग्रेस में लाने के पीछे प्रशांत किशोर जैसे किसी गैरकांग्रेसी की राय रही हो। जो भी हो कांग्रेस को आज एक नए खून की जरूरत है, और बहुत बड़ी जरूरत है. जरूरत तो उसे कांग्रेस की लीडरशिप के स्तर पर भी है कि वहां पर भी कुछ नया होना चाहिए, लेकिन जब तक वह नहीं हो सकता, जब तक वह नहीं होता है, तब तक कम से कम कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी जैसे लोग पार्टी में लाए जाएं, तो इसे कारोबारी दुनिया में एक नए कामयाब स्टार्टअप को किसी पुरानी बड़ी कंपनी द्वारा अधिग्रहित कर लेने जैसा मानना चाहिए। कारोबार से भी राजनीति कुछ सीख सकती है, और उसमें यह है कि अपने पुराने लोग अगर एसेट के बजाय लायबिलिटी अधिक हो चुके हैं, तो बाहर से कम से कम कुछ नई नई प्रतिभाओं को लाकर पार्टी की एसेट बढ़ाई जाए।
यह बात हम कन्हैया कुमार के आज कांग्रेस में लाए जाने को लेकर नहीं कह रहे हैं, जिस दिन कन्हैया कुमार जेल से छूटकर जेएनयू पहुंचे थे और वहां पर करीब पौन घंटे का उनका भाषण टीवी चैनलों पर बिना किसी काट-छांट के पूरा दिखाया गया था, उस दिन से ही हम यह मानकर चल रहे हैं कि देश को ऐसे नौजवानों की जरूरत है। हमारे नियमित पाठकों ने इसी जगह पर उसी दौर में कई बरस पहले हमारा लिखा हुआ पढ़ा होगा कि देश की संसद में अगर किसी एक व्यक्ति को लाया जाना चाहिए तो वह कन्हैया कुमार है। सार्वजनिक जीवन में और चुनावी राजनीति में निजी ईमानदारी के साथ जब मजबूत विचारधारा को ओजस्वी तरीके से बोलने का हुनर किसी में होता है, तो उसका बड़ा असर भी होता है. यह बात फुटपाथ पर चूरन या तेल बेचने वाले के बोलने के हुनर से अलग रहती है। और जनसंघ के जमाने से भाजपा के इतिहास के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेई अपनी साफगोई और बोलने की अपनी खूबी के चलते हुए ही इतने लोकप्रिय रहते आए थे। इसलिए कन्हैया कुमार का कांग्रेस में आना और खासकर ऐसे वक्त आना जब उसका वर्तमान ही अंधेरे में दिख रहा है, और उसका भविष्य एक लंबी अंधेरी सुरंग के आखिर में टिमटिमाती रोशनी जैसा दिख रहा है, तब यह कांग्रेस के लिए एक हासिल है।
अब इसे एक दूसरे पहलू से भी देखने की जरूरत है। जिन चार नामों की हमने यहां चर्चा की है, हार्दिक पटेल, कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी, और प्रशांत किशोर, इन सबके साथ एक बात एक सरीखी है कि ये कांग्रेस की राजनीति में अगर रहते हैं, तो भी ये राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई पकड़ नहीं रखते कि ये राहुल गांधी या प्रियंका गांधी के लिए कई बरस बाद जाकर भी किसी तरह की कोई चुनौती बन सकें। जबकि कांग्रेस पार्टी के भीतर के जिन दर्जनों नेताओं को धीरे-धीरे अलग-अलग वजहों से किनारे होना पड़ा है, उनमें से कई ऐसे हो सकते थे जिन्हें कांग्रेस की मौजूदा लीडरशिप के लिए एक किस्म की चुनौती माना जा सकता था। अभी भी यह संभावना या आशंका खत्म नहीं हुई है कि जब कभी कांग्रेस के संगठन चुनाव होंगे तो 23 बेचैन नेताओं में से कोई पार्टी अध्यक्ष का चुनाव भी लडऩे के लिए तैयार हो जाए. इसलिए राहुल गांधी या उनके परिवार ने देश के कुछ चर्चित और दमखम वाले नौजवानों को पार्टी में लाकर पार्टी को समृद्धि तो किया है, लेकिन शायद अपनी हिफाजत का भी पूरा ध्यान रखा है। राजनीति किसी किस्म के त्याग और आध्यात्म का कारोबार नहीं है और इसमें लोग अगर अपने प्रतिद्वंद्वियों को कम करते हैं, कमजोर करते हैं, तो उसमें कोई अटपटी बात नहीं है। ऐसे में कांग्रेस ने अपने बड़े कमजोर राज्यों में, गुजरात और बिहार में इन नौजवानों को पार्टी में लाकर अपनी संभावनाओं को बेहतर बनाने की कोशिश की है, जो कि एक अच्छी बात है।
हो सकता है कि कांग्रेस संगठन के पुराने जमे जमाए मठाधीशों को यह बात अच्छी न लगे, लेकिन वह अधिक काम के रह नहीं गए हैं। वे भाजपा में होते तो घोषित या अघोषित मार्गदर्शक मंडल में भेजे जा चुके रहते। लेकिन कांग्रेस की संस्कृति कुछ अलग है, और इसने अभी एक बरस पहले तक देश के सबसे बुजुर्ग कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा को राहुल और सोनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते देखा हुआ है। इसलिए बिना रिटायर किए या बिना घर भेजे भी कांग्रेस अपने पुराने बोझ को किनारे करना जानती है, और अब उसने जिन नए होनहार लोगों को पार्टी में लाने का काम किया है, वह उसके लिए एक अच्छी बात है। हम यहां पर किनारे किए गए पुराने लोगों के साथ इन नए लोगों को जोडक़र कोई नतीजा निकालना नहीं चाहते क्योंकि संगठन के भीतर की राजनीति का इतना सरलीकरण करना मुमकिन नहीं है। लेकिन देश में तेजस्वी और होनहार नौजवानों को आगे लाना किसी भी पार्टी के लिए एक अच्छी बात है और कांग्रेस ने इस हफ्ते कुछ हासिल ही किया है। हो सकता है कि इसी संदर्भ में पंजाब में भारी अलोकप्रिय हो चुके बुजुर्ग मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को किनारे करना, और एक दलित, तकरीबन नौजवान को मुख्यमंत्री बनाना भी गिना जा सकता है। देखें आगे-आगे होता है क्या।
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उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में वहीं की एक महिला शिक्षिका ने छात्राओं के नहाते और कपड़े बदलते हुए वीडियो बना लिए और अब उन लड़कियों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है क्योंकि वे इस बात से डरी-सहमी हैं कि कहीं वह टीचर यह वीडियो और फोटो वायरल ना कर दे। पुलिस उस महिला शिक्षिका को तलाश रही है जो कि फरार हो गई है। यह मामला छत्तीसगढ़ के जशपुर में विकलांग बच्चों के एक प्रशिक्षण केंद्र और छात्रावास में अभी कुछ दिन पहले हुए बलात्कार और सामूहिक सेक्स शोषण जितना गंभीर नहीं है, लेकिन अपने आप में गंभीर तो है ही। हिंदुस्तान में एक तो लोग लड़कियों को बाहर पढऩे भेजना नहीं चाहते, ऐसे में जब किसी हॉस्टल में लड़कियों को रखकर गरीब मां-बाप उनके बेहतर भविष्य की कोशिश करते हैं, तो जशपुर के प्रशिक्षण केंद्र में वही के केयरटेकर कर्मचारियों ने बलात्कार किया, और देशभर में जगह-जगह ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।
इस मामले से जुड़े हुए दो अलग-अलग पहलू हैं. एक तो यह कि बच्चों से जुड़ी हुई शिक्षण या प्रशिक्षण संस्थान या फिर उनके खेलकूद के संस्थान ऐसे रहते हैं जहां पर बच्चों से सेक्स की हसरत रखने वाले लोग नजर रखते हैं, और मौका मिलते ही वहां यह जुर्म करने में लग जाते हैं। फिर हिंदुस्तान में तो कानून भी लचर है और सरकारी इंतजाम उससे भी अधिक लचर है, लेकिन जिस अमेरिका में कानून मजबूत है, और सरकारी इंतजाम भी खासे मजबूत हैं, वहां भी अभी ओलंपिक में पहुंची हुई बहुत सी जिमनास्ट की शिकायतें जांच में सही पाई गईं कि उनके एक प्रशिक्षक ने अनगिनत लड़कियों का सेक्स शोषण किया। टोक्यो ओलंपिक में अमेरिकी जिमनास्ट टीम की जो सबसे होनहार खिलाड़ी थी उसने आखिरी वक्त में अपना नाम वापस ले लिया और कहा कि वह मानसिक रूप से इतनी फिट नहीं है कि वह मुकाबले में हिस्सा ले सके। बाद में यह जाहिर हुआ कि वह भी ऐसे शोषण की शिकार लड़कियों में से एक थी, और अमेरिका में ओलंपिक में पहुंचने वाली बच्चियां तक का शोषण करने वाला यह प्रशिक्षक लंबे समय तक किसी कार्रवाई से बचे रहा, शिकायतें अनसुनी होती रही, और जाने कितने दर्जन लड़कियों को इस यातना से गुजरना पड़ा जो कि जिंदगी भर उनका पीछा नहीं छोड़ेगी। हिंदुस्तान में पढ़ाई, खेलकूद, और सभी किस्म की दूसरी जगहों पर लड़कियों और महिलाओं के देह शोषण की कोशिश चलती ही रहती है, और इस देश का इंतजाम इतना घटिया है कि वह मुजरिम की शिनाख्त तो हो जाने पर भी उसे 10-20 बरस तक तो कानूनी लुकाछिपी का मौका देते रहता है। छत्तीसगढ़ में ही ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें सारे सबूतों के बावजूद 5 से 10 बरस तक ना तो पिछली रमन सरकार ने अपने अफसरों पर कार्यवाही की, और ना ही पिछले ढाई साल की भूपेश सरकार ने ऐसे मामलों को एक इंच भी आगे बढ़ाया। ऐसे में किसकी हिम्मत हो सकती है कि वे शिकायत लेकर जाएं और सारी कार्रवाई के बावजूद, सारे सबूतों के बावजूद, केवल अदालतों में वकील खड़े करते रहें, लड़ते रहें, और कोई इंसाफ ना पाएं।
दूसरी तरफ हिंदुस्तानी समाज के बारे में भी यह सोचने की जरूरत है कि संस्थागत शोषण से परे जब परिवारों के भीतर बच्चों का देह शोषण होता है तो ऐसे अधिकतर मामलों के पीछे परिवार के लोग, रिश्तेदार, या घर में आने-जाने वाले लोग, घरेलू कामगार ही रहते हैं। लेकिन जब बच्चे शिकायत करते हैं तो आमतौर पर मां-बाप ही अपने बच्चों की शिकायतों को अनसुना कर देते हैं, उस पर भरोसा नहीं करते क्योंकि उससे परिवार या सामाजिक संबंधों का बना-बनाया ढांचा चौपट हो जाने का खतरा उन्हें अधिक गंभीर लगता है। जो अपने बच्चों की हिफाजत से अधिक महत्वपूर्ण अपने पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को मानते हैं, ऐसे मां-बाप को क्या कहा जाए। लेकिन हिंदुस्तान में बच्चों के यौन शोषण में अधिकतर मामले इसी किस्म के हैं। बच्चे और बच्चियां न तो घर-परिवार में सुरक्षित हैं, और न ही किसी संस्थान में। ऐसी ही वजह रहती हैं जिनके चलते हुए गरीब मजदूरों के परिवार अपनी बच्चियों का बाल विवाह कर देते हैं कि किसी हादसे के पहले अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली जाए, और बच्ची के हाथ पीले कर दिए जाएं। उसके बाद उसकी हिफाजत उसके ससुराल की जिम्मेदारी रहेगी। जिन गरीब घरों में मां-बाप दोनों काम करने बाहर जाते हैं, वहां पर अक्सर ही बच्ची की शादी जल्दी कर दी जाती है। यह पूरे का पूरा सिलसिला हिंदुस्तान में लड़कियों पर जुल्म का है, और क्योंकि इस देश का कानून इस कदर कमजोर है कि वह कागज पर तो अपना बाहुबल दिखाता है लेकिन जब उसके इस्तेमाल की बात आती है तो अदालतों का पूरा ढांचा आखिरी दम तक मुजरिम का साथ देता है और शिकायत करने वाले लोग वहां अपराधी की तरह देखे जाते हैं। अभी जशपुर में जो हुआ है उसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेश के बाकी सभी छात्रावासों और रिहायशी संस्थानों में बच्चे-बच्चियों की हिफाजत की जांच करने के लिए कहा है, देखते हैं कि जिलों के बड़े-बड़े अफसर कितनी गंभीरता से ऐसी जांच करते हैं।
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कांग्रेस पार्टी ने हो सकता है कि अपने इतिहास में इससे अधिक चुनौतियों वाले दिन देखे हों जब उसे इमरजेंसी लगानी पड़ी, जब वह इमरजेंसी के बाद हार गई। लेकिन इन मौकों पर इंदिरा गांधी मौजूद थीं। आज कांग्रेस अपने सबसे बुरे दिनों को देख रही है, और लोग यह देख रहे हैं कि कांग्रेस को अभी और क्या-क्या देखना बाकी है। इस बात की चर्चा पंजाब को लेकर करनी पड़ रही है जहां कांग्रेस ने हटाने लायक मुख्यमंत्री को हटाने में बरसों लगा दिए, और अध्यक्ष न बनाने लायक नवजोत सिंह सिद्धू को पल भर में अध्यक्ष बना दिया, जो कि कुछ महीनों में ही उस कुर्सी को लात मारकर पूरी कांग्रेस पार्टी के लिए एक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। इस बीच राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से जो 23 असंतुष्ट नेता सवाल लेकर खड़े हुए हैं, उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह सवाल किया है कि आज जब पार्टी के पास कोई अध्यक्ष नहीं है, तो इन सब फैसलों को कर कौन रहे हैं? बात सही भी है सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं, लेकिन तमाम फैसले लेते राहुल गांधी दिख रहे हैं जो कि पार्टी के अध्यक्ष नहीं रह गए हैं, और जिन्होंने पार्टी का अध्यक्ष न बनने की खुली मुनादी की हुई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पार्टी में अधिकार किसके पास हैं, और जवाबदेही किस पर है? अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी मुद्दे पर कुछ बातों को लिखा था लेकिन अब पंजाब की ताजा घटनाओं को देखते हुए और असंतुष्ट नेताओं के ताजा बयान देखते हुए यह लगता है कि कांग्रेस की बची-खुची सरकारों के बजाय कांग्रेस संगठन के बारे में बात करना चाहिए, कांग्रेस के उस तथाकथित हाईकमान के बारे में बात करना चाहिए जो कि दिखता नहीं है, लेकिन एक अदृश्य ताकत की तरह पार्टी पर अपनी फौलादी जकड़ बनाए हुए है।
बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी वक्त रहते कोई फैसले नहीं ले पा रहे हैं और जब पानी सिर से गुजर चुका रहता है तब वे पंजाब जैसे फैसले लेते हैं, जिनमें चुनाव के कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री को बदल रहे हैं, और उसके कुछ महीने पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदल रहे हैं और अब वह अध्यक्ष भी पार्टी की कुर्सी पर नहीं रहा। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि नया मुख्यमंत्री तय करते हुए कांग्रेस ने किसी गैरसिक्ख को मुख्यमंत्री बनाना तय किया जिससे सिखों के बीच कुछ नाराजगी होना जायज है। इसके बाद उन्होंने एक दलित को मुख्यमंत्री बनाया तो गैर दलितों के बीच नाराजगी जायज है। कांग्रेस की एक नेता अम्बिका सोनी आग में घी डालते हुए यह बताती हैं कि उन्हें सीएम बनने कहा गया था, लेकिन वे तो नहीं बनेंगी, किसी सिख को ही सीएम बनाना चाहिए। कांग्रेस के पंजाब प्रभारी हरीश रावत एक दलित के सीएम घोषित हो जाने के बाद कहते हैं कि अगला चुनाव सिद्धू के चेहरे पर लड़ा जायेगा। एक दलित का सम्मान कुछ घंटे भी नहीं रहने दिया कांग्रेस ने। चुनाव में अधिक से अधिक तबकों के अधिक से अधिक वोटों की जरूरत रहती है तो कांग्रेस पार्टी, एक-एक करके हर तबके तो नाराज कर रही है, चुकी है। कुछ बदनाम अफसरों और मंत्रियों को पंजाब की सरकार में स्थापित कर रही है, कर चुकी है, और अपने करिश्मेबाज होने का दावा करने वाले नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर और गवा कर बैठी है। नतीजा यह है कि आज किसी को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि चुनाव तो बाद में लड़ा जाएगा आज कांग्रेस पार्टी के भीतर कौन किससे लड़ेंगे ? यह उस वक्त हो रहा है जब कैप्टन अमरिंदर सिंह दिल्ली में घूम घूम कर अमित शाह से मिल रहे हैं, और अजीत दोवाल से मिल रहे हैं।
कांग्रेस को प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों या दूसरे नेताओं को सुधारने के बजाय अपने-आपको सुधारने के बारे में पहले सोचना चाहिए। इस किस्म की अदृश्य, अनौपचारिक, और सर्वशक्तिमान हाईकमान पार्टी में किसके भीतर भरोसा पैदा कर सकती है? पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के वक्त कैप्टन अमरिंदर सिंह ने औपचारिक रूप से यह कहा कि उनकी राहुल गांधी से 2 बरस से मुलाकात नहीं हुई है। यह किसी पार्टी की किस तरह की नौबत है कि उसके बचे-खुचे 3-4 मुख्यमंत्रियों में से किसी एक से, पार्टी के सर्वेसर्वा राहुल गांधी की 2 बरस तक मुलाकात ही ना हो? यह पूरा सिलसिला बड़ा ही अजीब सा है, बहुत अटपटा है और इसके चलते हुए कोई राजनीतिक दल किसी भविष्य की उम्मीद नहीं कर सकता। यह इंदिरा गांधी के करिश्मे वाले दौर की कांग्रेस पार्टी नहीं है। यह तो आज मोदी के करिश्मे वाले वाली भाजपा के मुकाबले हाशिये के भी एक किनारे पर पहुंच चुकी कांग्रेस है, जिस पर रात-दिन मेहनत करने की जरूरत है। कांग्रेस पार्टी पर किसी जागीरदार की तरह काबिज सोनिया गांधी का परिवार आज अपने ही संगठन के लिए एक बहुत ही कमजोर मिसाल बन चुके हैं कि ऐसी लीडरशिप से कोई पार्टी कैसे चल सकती है। जिन दो दर्जन बड़े नेताओं ने हाईकमान के ऐसे हाल पर सवाल उठाए हैं, उन्हें पार्टी का गद्दार करार देना, उन्हें भाजपा का दलाल बतलाना, यह सब कुछ हो चुका है। लेकिन इन दो दर्जन बड़े नेताओं में से कोई एक भी तो बीजेपी में नहीं गया! तो इसका मतलब है कि कांग्रेस में चापलूस जिस अंदाज में अपने नेता को खुश करने के लिए, सवाल उठाने वालों पर टूट पड़े थे, उनके सारे हमले नाजायज थे।
वक्त आ गया है कि कांग्रेस पार्टी बिना देर किए चुनाव करवाए और जैसा कि राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस परिवार से परे कांग्रेस अपना अध्यक्ष देखे। यह मानकर चलना कि इस परिवार के बिना कांग्रेस टूट जाएगी, यह मानकर चलना कि सिर्फ यही परिवार कांग्रेस को बांधकर रख सकता है, यह इस परिवार के साथ भी पार्टी के चापलूस नेताओं की नाइंसाफी है। इस परिवार को भी सांस लेने का मौका देना चाहिए, और पार्टी को कोई नया नेता तय करके आगे बढऩा चाहिए। पार्टी के चुनाव करवाने का रास्ता निकालना चाहिए क्योंकि अब तो कोरोना भी खत्म हो चुका है, और तकरीबन तमाम राज्यों में सारी राजनीतिक गतिविधियां भी शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में चुनाव न करवाने का केवल एक ही मतलब निकाला जा सकता है कि पार्टी की लीडरशिप को छोडऩे की नीयत नहीं है। ऐसा तस्वीर को मिटाने के लिए चुनाव से कम किसी में काम नहीं चलेगा, और 2-3 राज्य कांग्रेस के पास बचे हैं, उनके और डूब जाने के पहले अगर यह चुनाव हो जाए, तो हो सकता है किसी काम भी आए।
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इटली के मिलान शहर में अभी क्लाइमेट चेंज पर नौजवान पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने एक सम्मेलन रखा जिसमें स्वीडन की चर्चित पर्यावरण आंदोलनकारी युवती ग्रेटा थनबर्ग भी पहुंची। उसने एक जबरदस्त भाषण में दुनिया के देशों की जुबानी जमाखर्च को लताड़ा, और उसका भाषण चारों तरफ तैर रहा है। दुनिया के 190 देशों से करीब 400 जवान इस शहर में इकट्ठा हुए हैं, और उन्होंने दुनिया के राष्ट्रीय प्रमुख शासन प्रमुखों की धोखाधड़ी को उजागर करने का काम किया है। नौजवानों का यह विरोध उस वक्त सामने आया है जब महीने भर बाद ही ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले एक बड़ा पर्यावरण सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें इन नौजवानों के उठाए हुए मुद्दे छाए रहना तय है।
दूसरी तरफ वैज्ञानिकों ने मौसम के बदलाव को लेकर जो हिसाब लगाया है वह भी बहुत डरावना है। एक बड़ी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस’ जर्नल में जलवायु परिवर्तन के बारे में छपा है कि आज के जो बच्चे हैं वे अपने जीवन में अपने दादा-दादी, या नाना-नानी के मुकाबले मौसम के सबसे बुरे मामलों (एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स) दो-तीन गुना अधिक देखेंगे। इसमें भी एक बात यह है कि जो संपन्न या विकसित देश हैं, वहां के बच्चों को ऐसे हालात अपनी दो पीढ़ी पहले के मुकाबले 2 गुना अधिक देखने होंगे, लेकिन गरीब देशों के बच्चों को ऐसे हालात 3 गुना अधिक देखने होंगे। मतलब यह कि आने वाली पीढिय़ों की किस्मत में तकलीफ तो पिछली पीढिय़ों के मुकाबले बहुत अधिक लिखी हुई है ही, उसमें भी जो गरीब हैं उनके हिस्से ज्यादा तकलीफ लिखी हुई है, चाहे वह गरीब देश हों, चाहे वह गरीब बच्चे हों।
मौसम की मार और तरह-तरह की प्राकृतिक विपदाओं ने इस बुरी तरह लोगों पर वार किया है कि गरीब लोगों के लिए तो खाना जुटाना मुश्किल हो गया है। अगर देखें कि मौसम का यह बदलाव, यह जलवायु परिवर्तन किनकी वजह से हो रहा है तो बड़ा साफ समझ में आता है कि संपन्न और विकसित देशों के लोग सामानों की जितनी खपत कर रहे हैं, और जितना प्रदूषण पैदा कर रहे हैं, सुविधाओं को जितना भोग रहे हैं, उनकी वजह से यह परिवर्तन अधिक हो रहा है. दूसरी तरफ उनसे कई गुना अधिक आबादी वाले जो गरीब देश हैं वे ऐसे जलवायु परिवर्तन के लिए बहुत थोड़े हद तक जिम्मेदार हैं। मतलब यह कि जलवायु परिवर्तन की औसत जिम्मेदारी अगर डाली जाए तो दुनिया की 20 फीसदी रईस आबादी पर उसकी 80 फीसदी जिम्मेदारी आ सकती है, और दुनिया की 80 फीसदी गरीब आबादी पर कुल मिलाकर भी पर्यावरण बर्बादी की 20 फीसदी से अधिक जिम्मेदारी नहीं आती। फिर यह भी है कि पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे लोगों की वजह से संपन्न और विकसित, और प्रदूषण फैलाने वाले धरती पर बोझ बने हुए देशों ने गरीब देशों में पर्यावरण के बचाव के लिए जिस मदद का वायदा किया था उसे उन्होंने पूरा नहीं किया है। नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने जरूर अपने देश के योगदान के वायदे को अब बढ़ाकर दोगुना किया है, लेकिन फिर भी गरीब देशों की पर्यावरण बचाने की जरूरत पूरी होने के करीब कहीं भी नहीं पहुंच पा रही हैं, क्योंकि संपन्न देश पर्यावरण बिगाडऩे की अपनी जिम्मेदारी के एवज में कोई हर्जाना देना नहीं चाहते हैं।
यह सिलसिला धरती पर देशों के बीच, और देश के भीतर लोगों के बीच, एक बहुत बड़े भेदभाव का मामला है। दुनिया में बहुत से लोग अधिक आबादी को पर्यावरण पर या धरती पर एक बोझ बोझ मानकर चलते हैं। हकीकत यह है कि गरीब आबादी धरती को जितना इस्तेमाल करती है, उससे ज्यादा दुनिया के लिए पैदा करके देती है। गरीबों की उत्पादकता उनकी खपत के मुकाबले बहुत अधिक है। दूसरी तरफ हर अमीर इंसान की खपत गरीब के मुकाबले आसमान छूती हुई है। ऐसे बहुत से भेदभाव लगातार खबरों में रहते हैं, बहसों में रहते हैं, लेकिन जब दुनिया के देश किसी एक मंच पर जुटते हैं तो सबसे विकसित, सबसे ताकतवर, और सबसे संपन्न देश अपनी जिम्मेदारी से कतराने की कोशिश करते हैं। इस बारे में अधिक से अधिक चर्चा होनी चाहिए, हर प्रदेश में, और हर देश में चर्चा होनी चाहिए, और दुनिया के छात्र-छात्राओं, नौजवानों ने जिस तरह पर्यावरण के लिए आंदोलन करने का एक मोर्चा खोला है, उससे बाकी दुनिया के बाकी नौजवानों को भी कुछ सीखना चाहिए, और धरती के प्रति, अपनी आने वाली जिंदगी के प्रति एक फिक्र करनी चाहिए। सबको सोचना चाहिए कि मौसम की मार से इंसानों को बचाने के मोर्चे पर आप कहीं खड़े हैं?
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अभी दो दिन पहले कनाडा के कैथोलिक बिशप ने एक बयान जारी करके देश के आदिवासी मूल निवासियों से उन जुल्मों के लिए माफी मांगी है जिन्हें चर्च के चलाए जा रहे आश्रम स्कूलों में एक सदी से अधिक समय तक किया गया था। यह बयान कनाडा में दो ईसाई स्कूलों के अहातों में हजार से अधिक बच्चों की कब्र मिलने के बाद चल रहे हंगामे को लेकर सामने आया है। हालांकि बिशप ने सीधे-सीधे इन कब्रों का जिक्र नहीं किया है, लेकिन कुछ महीने पहले कनाडा की सरकार ने चर्च से इन कब्रों को मिलने के बाद माफी मांगने की अपील की थी। ऐसे रिहायशी स्कूलों को कनाडा में एक जांच आयोग ने कुछ बरस पहले एक सांस्कृतिक जनसंहार कहा था। आने वाले दिसंबर के महीने में पोप फ्रांसिस कनाडा के आदिवासियों के प्रतिनिधिमंडल से मिलने वाले हैं।
लोगों को याद होगा कि पहले ऑस्ट्रेलिया में भी मूल निवासियों को उनके गांवों से, उनके परिवार और संस्कृति से छीनकर शहरों में लाकर, चर्च की स्कूलों में पढ़ाकर, और शहरी गोरे परिवारों के साथ रखकर, उन्हें सांस्कृतिक रूप से तथाकथित आधुनिक बनाने का काम होते आया है। इसके लिए आस्ट्रेलिया ने अपनी संसद के बीच आदिवासी समुदाय को आमंत्रित करके, तमाम सांसदों ने खड़े होकर उनसे माफी मांगी थी। हम इस बात को हिंदुस्तान से भी जोडक़र देख चुके हैं, लिख चुके हैं कि किस तरह यहां कुछ हिंदू संगठन उत्तर पूर्वी राज्यों से आदिवासी परिवारों की लड़कियों को लाकर, उन्हें हिंदी भाषी इलाकों में शबरी आश्रम बनाकर वहां रखते आए हैं, जिसमें वे अपनी आदिवासी संस्कृति से कट जाती हैं, अपनी भाषा से, अपने परिवार, अपनी जमीन से कट जाती हैं। किसी दिन हिंदुस्तान भी सभ्य देश बनेगा तो यहाँ की संसद भी इन आदिवासी बच्चियों के समुदायों से माफी मांगेगा।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कोरिया की लाखों महिलाओं को सेक्स-गुलाम बनाकर रखने वाले जापान ने तय किया था कि अपने इस ऐतिहासिक अपराध के लिए वह कोरिया से माफी मांगेगा। युद्ध के दौरान सैनिकों के सुख के लिए न सिर्फ जापान में, बल्कि दुनिया के कुछ और देशों ने भी ऐसे जुर्म सरकारी फैसलों के तहत किए हुए हैं। अब अगर ऐसी माफी मांगी जाती है, तो उससे इतिहास में दर्ज एक जख्म का दर्द कुछ हल्का हो सकता है। हिटलर ने जो यहूदियों के साथ किया, अमरीका ने जो जापान पर बम गिराकर किया, वियतनाम में पूरी एक पीढ़ी को खत्म करके किया, और अफगानिस्तान से लेकर इराक तक जो किया, अमरीका के माफीनामे की लिस्ट दुनिया की सबसे लंबी हो सकती है। लेकिन बात सिर्फ एक देश की दूसरे देश पर हिंसा की नहीं है। देश के भीतर भी ऐतिहासिक जुर्म होते हैं, और उनके लिए लोगों को, पार्टियों को, संगठनों को, जातियों और धर्मों को माफी मांगने की दरियादिली दिखानी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया की एक मिसाल सामने है जहां पर शहरी गोरे ईसाइयों ने वहां के जंगलों के मूल निवासियों के बच्चों को सभ्य और शिक्षित बनाने के नाम पर उनसे छीनकर शहरों में लाकर रखा था, और अभी कुछ बरस पहले आदिवासियों के प्रतिनिधियों को संसद में बुलाकर पूरी संसद में उनसे ऐसी चुराई-हुई-पीढ़ी के लिए माफी मांगी।
अब हम भारत के भीतर अगर देखें, तो गांधी की हत्या के लिए कुछ संगठनों को माफी मांगनी चाहिए, जिनके लोग जाहिर तौर पर हत्यारे थे, और हत्या के समर्थक थे। इसके बाद आपातकाल के लिए कांग्रेस को खुलकर माफी मांगनी चाहिए, 1984 के दंगों के लिए फिर कांग्रेस को माफी मांगनी चाहिए, इंदिरा गांधी की हत्या के लिए खालिस्तान-समर्थक संगठनों को बढ़ावा देने वाले लोगों को माफी मांगनी चाहिए, बाबरी मस्जिद गिराने के लिए भाजपा को और संघ परिवार के बाकी संगठनों को माफी मांगनी चाहिए, गोधरा में ट्रेन जलाने के लिए मुस्लिम समाज को माफी मांगनी चाहिए, और उसके बाद के दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी और विश्व हिन्दू परिषद जैसे लोगों और संगठनों को माफी मांगनी चाहिए। इस देश के दलितों से सवर्ण जातियों को माफी मांगनी चाहिए कि हजारों बरस से वे किस तरह एक जाति व्यवस्था को लादकर हिंसा करते चले आ रहे हैं। और मुस्लिम समाज के मर्दों को औरतों से माफी मांगनी चाहिए कि किस तरह एक शाहबानो के हक छीनने का काम उन्होंने किया। इसी तरह शाहबानो को कुचलने के लिए कांग्रेस पार्टी को भी माफी मांगनी चाहिए जिसने कि संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा।
दरअसल सभ्य लोग ही माफी मांग सकते हैं। माफी मंागना अपनी बेइज्जती नहीं होती है, बल्कि अपने अपराधबोध से उबरकर, दूसरों के जख्मों पर मरहम रखने का काम होता है। दुनिया के कई धर्मों में क्षमायाचना करने, या जुर्म करने वालों को माफ करने की सोच होती है, लेकिन ऐसे धर्मों को मानने वाले लोग भी रीति-रिवाज तक तो इसमें भरोसा रखते हैं, असल जिंदगी में इससे परे रहते हैं। इसमें आज की हमारी यह चर्चा भी जुड़ सकती है क्योंकि बीती जिंदगी की गलतियों और गलत कामों से अगर उबरना है, एक बेहतर इंसान बनना है, तो उन गलत कामों को मानकर, उनके लिए माफी मांगे बिना दूसरा कोई रास्ता नहीं है। आने वाला वक़्त छत्तीसगढ़ के नक्सलग्रस्त इलाकों में दशकों से चली आ रही पुलिस ज्यादती के लिए भी माफी मांगने का रहेगा। देखेंगे कि इस राज्य की विधानसभा के भीतर आदिवासियों से माफी मांगने की नैतिक हिम्मत राजनीतिक दलों में जुट पाती है या नहीं।
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ब्रिटेन में एक भारतवंशी वैज्ञानिक सर शंकर बालासुब्रमण्यम ने इंसानों के जींस से जुड़ी हुई एक नई खोज की है जिससे उनकी बीमारियों को शुरुआती दौर में ही पकड़ा जा सकेगा और उनके लिए अलग से दवाइयां बनाकर उनका इलाज भी किया जा सकेगा। ऐसा माना जा रहा है कि बीमारियों की ऐसी शिनाख्त और उसके इलाज से औसत उम्र भी काफी बढ़ सकती है और 120 बरस तक उम्र बढऩे की एक अटकल लगाई जा रही है। यूनिवर्सिटी आफ कैंब्रिज के विशेषज्ञ सुब्रमण्यम ने अपनी इस कामयाबी का खुलासा किया है और दिलचस्प बात यह भी है कि अब इंसानी जींस कि यह जांच बहुत मामूली खर्च से हो सकती है, जबकि कई बरस पहले जब पहली बार इस किस्म की एक जांच शुरू हुई थी तो उस पर सैकड़ों करोड़ों रुपए खर्च हुए थे।
यह अकेला विश्वविद्यालय या अकेली प्रयोगशाला नहीं है जहां पर इस तरह की खोज चल रही थी, या अभी चल रही है। इंसान की जिंदगी को कैसे बढ़ाया जाए यह एक बड़ी चुनौती है और इसका एक बड़ा बाजार भी है. जिस तरह लोग अमर हो जाना चाहते हैं, जिस तरह लोग अपने हमशक्ल और अपने किस्म के क्लोन बनवाना चाहते हैं, लोग उम्र को अधिक से अधिक लंबा और सेहतमंद भी करवाना चाहते हैं, तो उन सबको देखते हुए इस किस्म की तमाम रिसर्च पर खासा खर्च भी हो रहा है क्योंकि अतिसंपन्न लोगों के बीच ऐसी खोज का एक बड़ा महंगा बाजार भी रहेगा। लेकिन चिकित्सा विज्ञान की कामयाबी और लोगों की बढ़ी हुई उम्र से परे कुछ और चीजों पर भी सोचने की जरूरत है कि अगर इंसान की उम्र 25-50 बरस बढ़ जाती है, तो उसके क्या-क्या असर होंगे? यह महज चिकित्सा विज्ञान के सामने बड़ी चुनौती नहीं रहेगी कि वह इतनी अधिक उम्र के लोगों की सेहत की दिक्कतों के बारे में अंदाज लगाए और उनका इलाज ढूंढ कर रखे बल्कि यह दुनिया के लिए बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी रहेगी।
सामाजिक चुनौती से हिसाब से संपन्न तबकों के लोग जिनके अस्सी-सौ बरस होकर गुजर जाने का अब तक सिलसिला चल रहा है, वे अगर अपनी अगली पीढ़ी की छाती पर सवा सौ बरस की उम्र तक मूंग दलते बैठे रहेंगे, तो उनकी औलाद कब काम संभाल सकेगी, और कब परिवार और कारोबार की मुखिया हो सकेगी? फिर यह भी रहेगा कि सामाजिक लीडरशिप, राजनीतिक लीडरशिप, इन सब में लोगों का रहना और 20-25 वर्ष बढ़ जाएगा, और फिर नई सोच के ऊपर छाए हुए ऐसे वटवृक्ष किसी को पनपने का मौका भी नहीं देंगे। आज जिस तरह भारतीय जनता पार्टी में 75 बरस की उम्र के बाद लोगों को मार्गदर्शक मंडल में भेजने की एक घोषित या अघोषित नीति चली आ रही है, वह मान लें कि सौ बरस की उम्र तक बढ़ा दी जाएगी, तो नई लीडरशिप को तो आने का मौका ही नहीं मिलेगा। और ऐसा ही हाल उन पार्टियों में भी होगा जिन पार्टियों में एक कुनबे की लीडरशिप चलती है, वहां की औसत लीडरशिप और 25-30 बरस लंबी खिंच जाएगी।
फिर यह भी होगा कि सरकारी नौकरी से जो 58 या 60 बरस में रिटायर होते हैं, उनके सामने अगले 58 या 60 बरस और बचे रहेंगे, और पता नहीं वे उसे कैसे गुजारेंगे। उनकी यह भी उम्मीद हो सकती है कि रिटायरमेंट की उम्र को बढ़ाकर 70 वर्ष या 75 वर्ष कर दिया जाए, और उस हालत में आज की बेरोजगार भीड़ कहां जाएगी? परिवार के भीतर आज तो दादा-दादी ही नजर आते हैं, लेकिन उनके भी ऊपर एक पीढ़ी और बढ़ जाएगी, तो फिर परिवार के अंदरूनी सांस्कृतिक टकराव का क्या होगा? चार या पांच पीढिय़ों के बीच पोशाक का फर्क, खानपान का फर्क, रहन-सहन का फर्क, क्या सचमुच ही परिवार को खुशहाल रख सकेगा या फिर टकराव बढ़ते चलेगा? या फिर ऐसे में नई पीढ़ी यह चाहेगी कि पुरानी पीढ़ी के लिए वृद्धाश्रम बढ़ते चलें और वृद्धाश्रम में लोगों का रहना 25-50 बरस तक का होने लगेगा!
दरअसल चिकित्सा विज्ञान की अपनी सोच रहती है जो वैज्ञानिक कामयाबी तक सीमित रहती है। उसे इस बात से लेना-देना नहीं रहता कि इससे समाज पर क्या फर्क पड़ेगा, मानवीय रिश्तों पर क्या फर्क पड़ेगा। एक अंधाधुंध सीमा तक जीने वाली बूढ़ी आबादी, हो सकता है कि चिकित्सा सुविधाओं के ढांचे पर इतना बड़ा बोझ बन जाए कि दूसरे जरूरी और गरीब मरीजों को इलाज मिलना मुश्किल हो जाए। लेकिन एक दूसरी संभावना भी हो सकती है कि इतना लंबा जीने वाली एक आबादी दुनिया का बड़ा ग्राहक भी बन सकती है जिसे इलाज की जरूरत हो, सहायक कर्मचारियों की जरूरत हो, जिसके लिए एक पूरे बुजुर्ग-केंद्रित कारोबार का ढांचा खड़ा करने की जरूरत हो. इसलिए यह सोचना भी कुछ तंग नजरिए की बात होगी कि यह दुनिया के लिए अनिवार्य रूप से एक समस्या ही रहेगी। हो सकता है कि संपन्नता के साथ अगर आबादी के एक हिस्से की उम्र ऐसी बढ़ती है, तो हो सकता है उससे बहुत लोगों को रोजगार और बहुत लोगों को कारोबार भी मिले।
लेकिन खुद चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से देखें तो उम्र के लंबे होने का मतलब उस लंबी उम्र के सेहतमंद होने जैसा नहीं है। हो सकता है कि इंसानी जिस्म के बहुत से ऐसे हिस्से रहें जिन्हें जवान रखने का कोई तरीका ढूंढा न जा सके। वैज्ञानिक एक जेलीफिश की मिसाल को बड़ा महत्वपूर्ण मान रहे हैं जिसमें वह जब चाहे अपने पुराने हो रहे अंगों को छोडक़र अपने पूरे बदन को अपने कम उम्र की हालत में ले जा सकती है. इसे इस तरह समझा जाए, कि 60 बरस के इंसान जब चाहें वे फिर से 16 बरस के हो जाएं। जेलीफिश में उसकी एक प्रजाति ऐसी क्षमता रखती है, और ऐसा करती भी रहती है। अब वैज्ञानिकों को उसकी इस खूबी से बड़ी उम्मीदें हैं, और उन्हें लगता है कि जीव विज्ञान के हिसाब से ऐसा होना अगर उसमें मुमकिन है, तो हो सकता है कि कुछ हद तक दूसरे जीवों में भी यह हो सके। अब देखना होगा कि इंसानों के लिए क्या क्या खोजा जा सकता है।
हम जेनेटिक्स की ऐसी खोज की किसी भी किस्म से आलोचना करना नहीं चाहते क्योंकि यह हो सकता है कि जींस में फेरबदल करने की एक वैज्ञानिक क्षमता से आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कई किस्म की ऐसी बीमारियों से छुटकारा पा जाए, जिनके साथ पूरी जिंदगी गुजारना उसकी मजबूरी रहती है। अस्थमा हो या डायबिटीज, या फिर कैंसर हो, ऐसी बहुत सी बीमारियां रहती हैं जिनसे पूरी जिंदगी लदी हुई रहती है, और अगर इनसे छुटकारा मिल सके तो हो सकता है कि अस्पतालों के मौजूदा ढांचे पर से बोझ कम भी हो जाए। फिलहाल अमर बनने की चाह रखने वाले लोग ऐसी किसी भी खोजे से बड़ी उम्मीद पाल लेते हैं जो कि बहुत गलत भी नहीं है। लेकिन बढ़ी हुई उम्र के साथ-साथ दुनिया का नक्शा कैसा होगा, समाज और अर्थव्यवस्था पर, परिवार के ढांचे पर इसका क्या फर्क पड़ेगा, इस बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए। यह पूरा सिलसिला रातों-रात में हो जाने वाला नहीं है, ऐसी कोई कामयाबी मिलने पर भी उसका असर दिखने में दो-चार पीढिय़ां निकल सकती हैं, लेकिन जब भविष्य की कल्पना करके किसी योजना को बनाया जाए तो अगले सौ-पचास बरस की बात भी सोच लेना बेहतर होता है।
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कांग्रेस पार्टी ने उसके कुछ नेताओं के मातहत चलने वाले जवाहर बाल मंच को कल पार्टी के एक विभाग की मान्यता दी है। और इसके लिए दक्षिण भारत के एक पार्टी नेता डॉ जीबी हरि को पहला राष्ट्रीय चेयरमैन नियुक्त किया है, जो कि केरल में इस मंच को कई बरस से चलाते आ रहे थे। कांग्रेस की खबर के मुताबिक यह संगठन 7 से 17 वर्ष के बच्चों के बीच काम करेगा और जाहिर है कि यह कांग्रेस की विचारधारा को फैलाने का भी काम करेगा। इस पार्टी का वर्तमान बड़ा खराब चल रहा है, भविष्य अनिश्चित है, लेकिन इसके पास इतिहास सबसे बुलंद है। हिंदुस्तान में अगर किसी पार्टी के पास सबसे गौरवशाली इतिहास है तो वह कांग्रेस पार्टी ही है जो कि गांधी के वक्त से चली आ रही है। जो गांधी की निगरानी में चलती रही, और गांधी के पसंदीदा नेहरू ने जिसे आजादी के आंदोलन से जोडक़र देश के इतिहास की सबसे अधिक शहादत देने वाली पार्टी बनाकर रखा। ऐसे में देश के छोटे बच्चों को अगर सांप्रदायिकता से परे, और धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक सद्भाव, और समानता की नसीहत देनी है तो उसके लिए कांग्रेस के पास अपना सबसे संपन्न इतिहास है। और शायद आज उसे जिंदा रहने के लिए अपने इतिहास के नगदीकरण की जरूरत भी है क्योंकि इसके अलावा उसके पास और बहुत कुछ बचा नहीं है।
लेकिन जैसा कि कांग्रेस के बहुत से दूसरे संगठनों या मोर्चों के साथ हो होता है, उनमें राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य तक ऐसे लोगों को मनोनीत किया जाता है जिनका उस दायरे से बहुत कम लेना-देना रहता है। कांग्रेस के मजदूर संगठनों के मुखिया की जगह करोड़पति, अरबपति संपन्न कांग्रेसी काबिज हो जाते हैं। मजदूरों के बाच ऐसे संगठनों का काम धरा रह जाता है, और लोगों के बीच कांग्रेस पार्टी की विश्वसनीयता भी खत्म होती है। दूसरी तरफ पिछले बरस कोरोना और लॉकडाउन से जूझने में कांग्रेस के नौजवान संगठन युवक कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के मातहत दिल्ली में जितना काम किया था, उससे पार्टी को बड़ी वाहवाही भी मिली थी। अब देखने की बात यह है कि कल बनाया गया यह नया विभाग बच्चों के बीच कितना काम कर सकता है।
बच्चों का मामला कुछ अधिक नाजुक इसलिए है कि जब कांग्रेस पार्टी के बैनर तले बच्चों के लिए कोई काम संगठित रूप से करने की नीयत पार्टी की है तो उसे पूरी की पूरी पार्टी को एक आदर्श के रूप में भी बच्चों के सामने रखना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि पार्टी के बहुत से नेता आज गंदी जुबान में बात करें, बहुत से नेता सार्वजनिक रूप से सरकारी कर्मचारियों को पीटें और उसके बाद पार्टी बच्चों को शहादत और महानता का इतिहास पढ़ाए। बच्चों को पढ़ाने के लिए इतिहास तो ठीक है लेकिन बच्चों को आज की मिसाल भी देनी होगी और अगर वह अखबारों के पन्नों पर, या अपने परिवार के लोगों से, या टीवी की खबरों पर कांग्रेस के लोगों की गुंडागर्दी पढ़ते रहेंगे, तो गांधी और नेहरू कहां से आकर कांग्रेस को बचा पाएंगे? इसलिए हम कांग्रेस के मजदूर संगठन, या उसके महिला मोर्चा, या युवक कांग्रेस इन सबसे परे बच्चों के लिए बनाए गए इस विभाग को लेकर उलझन में हैं कि क्या कांग्रेस सचमुच बच्चों के बीच काम करने लायक, और बच्चों को प्रभावित करने लायक पार्टी अपने आपको बना पाएगी?
इतने छोटे बच्चों के लिए काम करने वाले संगठनों को देखें तो सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ याद पड़ता है जो मुहल्लों के मैदानों पर या स्कूलों के अहातों में कहीं-कहीं पर सुबह से शाखा लगाता है, बच्चों और बड़ों को राष्ट्रप्रेम की बात सुनाता है, और कहीं पर परेड करवाता है, कहीं उन्हें खेल खेल पाता है। दूसरी तरफ बस्तर जैसे इलाकों में नक्सल संगठन भी छोटे-छोटे बच्चों के बीच काम करते हुए दिखते हैं। इस तरह कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करना कोई नई बात नहीं है और दुनिया के इतिहास में कई जगहों पर राजनीतिक संगठन या दूसरे अपने-आपको सांस्कृतिक कहने वाले संगठन ऐसा करते ही आए हैं। इनका मोटा मकसद अपने बड़े संगठन की तरफ बच्चों को मोडऩे का रहता है, और क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने पिछले 10-15 बरस से चले आ रहे इस संगठन को अब कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन के एक विभाग की तरह दर्जा दिया है, तो जाहिर है कि अब यह एक राजनीतिक पार्टी का एक मोर्चा है, जो कि सबसे कम उम्र के लोगों के लिए है। ऐसे संगठन का काम करना बड़ा नाजुक हो सकता है क्योंकि पार्टी संगठन यह उम्मीद कर सकता है कि इसमें उसके नेताओं को प्रमुखता से पेश किया जाए, और बच्चों के बीच उन्हें लोकप्रियता मिले। दूसरी तरफ ऐसे संगठन को एक व्यापक लोकतांत्रिक के हित में काम करना चाहिए और किसी व्यक्ति को बढ़ावा देने के बजाय लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय मूल्यों की समझ बच्चों के बीच मजबूत करनी चाहिए। कांग्रेस के भीतर रहते हुए यह संगठन पता नहीं कितना कुछ कर पाएगा, लेकिन बच्चों के बीच इसे अगर पार्टी की प्रोपेगेंडा मशीन का एक हिस्सा ही बनाकर रखा जाएगा तो इससे लोग शायद ही जुड़ेंगे। इसे पार्टी के चुनावी मकसद से परे रखा जाएगा तो हो सकता है कि यह बच्चों के भी अधिक काम आए और खुद कांग्रेस के भी।
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छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिले जशपुर में एक दिव्यांग छात्रावास और प्रशिक्षण केंद्र में तीन दिन पहले वहीं के दो कर्मचारियों ने शराब के नशे में एक मूक-बधिर बच्ची से बलात्कार किया और आधा दर्जन दूसरी लड़कियों के कपड़े फाड़े, उनका सेक्स शोषण किया, और बहुत से दूसरे बच्चों से मारपीट की। यह पूरा सिलसिला भयानक है। वहां की महिला सफाई कर्मचारी को कमरे में बंद करने के बाद इन दो पुरुष कर्मचारियों ने जिस तरह बच्चियों के कपड़े फाड़े, उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारा, उनका देह शोषण किया, और एक बच्ची से बलात्कार किया, उनकी आवाजें सुनते हुए यह सफाई कर्मचारी दरवाजा तोडऩे की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे नहीं तोड़ पाई। मूक बधिर बच्चों की बिना शब्दों की चीख पुकार उस रात वहां गूंजती रही, और जब सफाई कर्मचारी ने इस प्रशिक्षण केंद्र के प्रभारी अफसर को फोन पर बताया तो उन्होंने वहां पहुंचकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। बाद में मीडिया के रास्ते यह मामला खुला और अब नाबालिग बच्ची से बलात्कार के अलावा, बाकी लड़कियों का सेक्स शोषण करने का मामला दर्ज हुआ है, और ये दोनों कर्मचारी गिरफ्तार हुए हैं, जिनमें से एक को इस प्रशिक्षण केंद्र, छात्रावास का केयरटेकर बनाया गया था। सरकार के नियम यह कहते हैं कि जहां लड़कियों को रखा जाता है वहां पर किसी पुरुष को केयरटेकर न रखा जाए, लेकिन नियमों से परे साधारण समझबूझ की भी इस बात को भी अनदेखा करते हुए ऐसी बेबस बच्चियों और उन्हीं के जैसे मूकबधिर लडक़ों के इस छात्रावास को चलाया जा रहा था। जानकार लोगों का कहना है कि यह बात भी नियमों के खिलाफ है कि लडक़े और लड़कियों को एक ही साथ रखा जाए।
जिन्हें ईश्वर या कुदरत ने बोलने और सुनने की ताकत नहीं दी है ऐसी बच्चियों के साथ सरकार भी क्यों मेहरबान रहे? इसलिए सरकार ने इन लडक़े-लड़कियों के लिए ऐसा भयानक इंतजाम करके रखा है। दिक्कत यह है कि इस प्रदेश में एक मानवाधिकार आयोग और एक राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग बैठे हुए हैं, और इस घटना के बाद इनमें से किसी ने कोई नोटिस जारी किया हो ऐसा सुनाई नहीं पड़ता है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष पद पर राज्य सरकार ने एक ऐसी महिला को मनोनीत किया है जिसकी शैक्षणिक योग्यता, उम्र, और उसका तजुर्बा उस उस पद के लायक नहीं बताया जा रहा है, और इस नियुक्ति के खिलाफ हाईकोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई चल रही है, सरकार को नोटिस जारी हो चुका है। जब राजनीतिक संतुष्टि के लिए या मेहरबानी करने के लिए अपात्र लोगों को ऐसे नाजुक पदों पर बिठा दिया जाता है तो उसका यही नतीजा होता है। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए सरकार की वेबसाइट पर जो शर्ते रखी गई है, उनमें ग्रेजुएट होना जरूरी है, और यह शर्त रखी गई है कि आवेदक को बाल कल्याण, बाल सुरक्षा, किशोर न्याय, निशक्त बच्चों, बाल मनोविज्ञान, या समाजशास्त्र में कम से कम 5 वर्ष का अनुभव होना चाहिए। यह भी शर्त रखी गई है कि आवेदक की आयु 65 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा भी कई शर्ते हैं। इस पद पर राज्य सरकार ने कुछ महीने पहले भूतपूर्व विधायक तेजकुंवर नेताम को नियुक्त किया है जिसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए वहां कहा गया है कि वह केवल आठवीं पास हैं और उनकी उम्र 65 वर्ष हो चुकी है। यह सरकार की तय की गई शर्तों के पूरी तरह खिलाफ है।
सरकार की राजनीतिक पसंद से होने वाली नियुक्तियों से लेकर सरकारी विभागों के आम कामकाज तक एक ही किस्म का संवेदनाशून्य माहौल रहता है। जिस छात्रावास में बच्चियों से बलात्कार और सेक्स शोषण कि यह भयानक हरकत हुई है, उसमें काम करने वाले कर्मचारियों को हाथ के इशारों से बात करने की भाषा का भी कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। खबर की जानकारी यह भी है एक पुरुष को वहां का अधीक्षक बना दिया गया था, जो खुद वहां कभी रहता नहीं है। जांच में और बातें भी सामने आएंगी लेकिन नीचे से ऊपर तक सरकार का जो हाल दिख रहा है वह सबसे कमजोर तबके की सबसे अधिक उपेक्षा का है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को चाहिए कि आज ही वे अपने अफसरों को आदेश दें कि प्रदेश भर में जहां-जहां बच्चों के ऐसे छात्रावास हैं या दूसरे किस्म के आश्रम या प्रशिक्षण केंद्र हैं उन सबमें उनकी सुरक्षा के इंतजाम को तुरंत परखा जाए, और जहां कहीं नियमों के तहत काम नहीं हो रहा है वहां कड़ी कार्यवाही की जाए।
मूक-बधिर बच्चियों से सरकारी संस्थान में इस किस्म का सामूहिक बलात्कार को, और उस पर भी प्रदेश विचलित न हो, तो ऐसे प्रदेश को भी धिक्कार है।
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देश की राजधानी दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में पेशी पर लाए गए एक गैंगस्टर को दो हमलावरों ने वकील की पोशाक में आकर जज के सामने ही गोलियां मार दीं, उस गैंगस्टर को लेकर आने वाले हथियारबंद पुलिस वालों ने गोलियां चलाईं, और दोनों हमलावर वहीं मारे गए। बाद में आने वाली खबरें बतलाती हैं कि जब भी इस बड़े गैंगस्टर को पेशी पर लाया जाता था तो उस पर हमले की आशंका रहती थी और पुलिस को पहले से इत्तला की जाती थी कि अतिरिक्त सुरक्षा का इंतजाम किया जाए। इसके बाद भी ये दो हमलावर अदालत के भीतर आकर बैठे थे, और उन्होंने जज के सामने ही, जज के कुछ फीट दूर ही खड़े रहकर इसे गोलियां मार दीं। ऐसी घटनाएं उत्तर प्रदेश और बिहार में समय-समय पर सुनाई पड़ती रही हैं जहां मुजरिमों के गिरोह एक-दूसरे को निपटाने के लिए अदालत में पेशी के दिन और वक्त जानकारी रखते हैं और वहां हिसाब चुकता करते हैं। लेकिन जैसा कि जाहिर है दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है, और राज्य सरकार का उससे कुछ भी लेना देना नहीं है, ऐसे में केंद्र सरकार की ही जवाबदेही इस वारदात पर बनती है। पर आज महज इसी एक वारदात को लेकर हम यहां पर नहीं लिख रहे हैं, दिल्ली पुलिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कुछ और मामले हाल के महीनों में सामने आए हैं, जिन पर बात की जानी चाहिए, और एक बात दिल्ली से बहुत दूर असम की भी है।
अभी दिल्ली के दंगों को लेकर और कुछ दूसरे मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने यह पाया है कि पुलिस ने बेबुनियाद मामले दर्ज किए, बेकसूर लोगों को पकडक़र जेलों में ठूंस दिया, शायद इसलिए कि वे मुस्लिम थे और देश की राजनीतिक ताकतों को पसंद नहीं थे। कुछ मामलों में तो अदालत ने पाया कि दिल्ली पुलिस को यह भी नहीं मालूम था कि वह किस मामले की जांच कर रही है। अदालत ने बड़ी सख्ती और तल्खी से पुलिस की ऐसी नालायकी, निकम्मेपन और उसकी बदनीयत इन सब पर काफी नाराजगी जाहिर करते हुए खिंचाई की है। यह बात नई नहीं है और केजरीवाल की सरकार आने के पहले से दिल्ली की सरकारें यह मांग करते आई हैं कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए और दिल्ली पुलिस राज्य शासन के अधीन की जाए। सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला जाने के बाद भी वहां से दिल्ली सरकार को कोई अधिकार नहीं मिले और दिल्ली के उपराज्यपाल के मार्फत दिल्ली सरकार के गैर पुलिसिया कामकाज पर भी केंद्र सरकार की पकड़ बनी हुई है। ऐसे में क्योंकि सारे अधिकार केंद्र सरकार के पास हैं इसलिए जिम्मेदारी भी उसी की बनती है। यह एक बड़ा बुरा मौका है जब आज-कल में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में लोगों से मिल रहे हैं, और उसी वक्त भाजपा के शासन वाले असम में गरीब मुस्लिम परिवारों को पुलिस सरकारी जमीन से बेदखल कर रही है, और पुलिस गोलियों से लोग मारे गए हैं, और वैसे में पुलिस के साथ गया हुआ एक फोटोग्राफर दम तोड़ते हुए एक लहूलुहान आदमी के सीने पर कूद-कूद कर खुशी मना रहा है। ऐसे वीडियो भारतीय मीडिया के उस हिस्से में भी छाए रहे जो मोटे तौर पर केंद्र सरकार या भाजपा की राज्य सरकारों के बारे में कोई आलोचना करते दिखता नहीं है। असम का वह वीडियो अभी तक टीवी की खबरों से हटा नहीं था, और आज दिल्ली की एक अदालत में इस किस्म की गोलीबारी खबरों पर छा गई है। जिस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में लोगों से मेल-मुलाकात को हिंदुस्तानी टीवी पर एकाधिकार करते देखना चाहते होंगे, उस मौके को असम की भाजपा सरकार की पुलिस ने, और दिल्ली की केंद्र सरकार की पुलिस ने तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब टीवी दर्शकों की बात तो छोड़ ही दें, टीवी समाचार चैनलों की दिलचस्पी भी इन दो गोलीबारी में अधिक हो गई है।
लेकिन हम दिल्ली की अदालत में जज के सामने किए गए इस कत्ल को ही आज का मुद्दा बनाना नहीं चाहते, असम में जो हुआ है उस पर पूरे देश में चर्चा की जरूरत है क्योंकि वहां पर बहुत ही गरीब मुस्लिम लोगों का जिस तरह पुलिस के हाथों मरना हुआ है, और उस पर जिस तरह पुलिस के साथ जड़े हुए फोटोग्राफर ने जख्मी पर कूद-कूद कर खुशी मनाई है, लाठी लिए हुए एक अकेले बेदखल हो रहे गरीब पर जिस तरह दर्जनों पुलिस टूट पड़ी और जाने कितनी ही गोलियां उसे मारी गईं, और मरते हुए या मर चुके कुछ इंसान पर और हमला किया गया, वह सब कुछ वीडियो में बड़ा साफ-साफ दिखता है। देश के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इसे आदिवासी नस्ल को खत्म करने की एक साजिश करार दिया है। हालांकि असम सरकार ने इस मामले की न्यायिक जांच की घोषणा जरूर की है, लेकिन वह वीडियो लोगों का दिल दहला रहा है कि किस तरह पुलिस के ही साथ घूमने वाला, और शायद पुलिस के लिए ही काम करने वाला फोटोग्राफर, एक जख्मी या मुर्दा गरीब के बदन पर चढक़र कूदता है, हो सकता है कि उसमें उस वक़्त जान बाकी रही हो, और उस पर कूदने से उसकी मौत हुई हो। असम का यह मामला दिल्ली के रोहिणी कोर्ट के मामले के मुकाबले अधिक अमानवीय है, अधिक हिंसक है, और दिल्ली की गोलीबारी की आवाज में असम के गरीबों की आवाज दब नहीं जानी चाहिए। इन दोनों मामलों पर आगे बात तो होगी, लेकिन असम में मुस्लिमों के साथ, आदिवासियों के साथ भेदभाव का सिलसिला पिछले कुछ वर्षों से लगातार चले आ रहा है, और इस ताजा वीडियो के बाद उस भेदभाव की तरफ भी दुनिया का ध्यान जाना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
भारत की मोदी सरकार द्वारा पेगासस खुफिया हैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल देश के कुछ प्रमुख और प्रतिष्ठित नागरिकों, पत्रकारों, और नेताओं के खिलाफ किया गया है या नहीं, इसकी जांच अब शुरू होते दिख रही है। राहुल गांधी से लेकर कुछ दूसरे नेताओं तक, चुनाव आयोग के भूतपूर्व सदस्य अशोक लवासा, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के अलावा केंद्र सरकार की बहुत सी नीतियों से असहमत प्रमुख पत्रकारों के फोन पर पेगासस की घुसपैठ की खबरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया की एक जांच में सामने आई हैं। इस बारे में संसद के पिछले सत्र में भी दिल्ली में लगातार विपक्ष ने मांग की थी कि सरकार इस बात पर जवाब दें कि उसने पेगासस का इस्तेमाल किया है या नहीं, लेकिन सरकार ने इस बारे में कोई साफ जवाब नहीं दिया, और वह सीधे शब्दों में जवाब देने से कतराती रही। इसके बाद बहुत से प्रमुख पत्रकार और पत्रकारों के संगठन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जहां उन्होंने अदालत से यह मांग की कि ऐसी घुसपैठ भारत के कानून के भी खिलाफ है, और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के भी खिलाफ है, इसलिए इसकी जांच करवाई जाए। इस पर सरकार सुप्रीम कोर्ट में भी साफ-साफ कुछ कहने से बचती रही, और कई बार टालने के बाद आखिर में जाकर उसने कहा कि क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ मामला है इसलिए वह इस बारे में कोई हलफनामा भी दायर करना नहीं चाहती। हलफनामा अदालत में एक किस्म से पुख्ता बयान देने जैसा हो जाता और उससे बचकर केंद्र सरकार ने बिना कहे हुए ऐसा माहौल बना दिया है कि उसने यह इजराइली घुसपैठिया सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया है।
भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख वकील पी चिदंबरम ने सरकार के अदालत में दिए गए कुछ बयानों को लेकर उनका एक मतलब निकालकर सामने रखा है कि सरकार यह मान चुकी है कि उसने पेगासस का इस्तेमाल किया है। अब सुप्रीम कोर्ट ने आज इस मामले में पिटीशन दायर करने वाले वकीलों में से एक ने कहा है कि अदालत अगले हफ्ते इस मामले की जांच के लिए एक विशेषज्ञ तकनीकी कमेटी बना देगी। इस बारे में सरकार के खिलाफ वकील कहते आये थे कि केंद्र सरकार यह कह जरूर रही है कि वह इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाएगी लेकिन केंद्र सरकार की बनाई कमेटी पर किसी का भरोसा नहीं रहेगा। शायद इसलिए अदालत अब खुद यह कमेटी बनाने जा रही है।
दुनिया भर के प्रमुख प्रकाशनों और उनके पत्रकारों की एक मिली-जुली टीम ने पेगासस की घुसपैठ की जांच की, और उनकी जांच रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में 300 से अधिक लोगों के नाम एक ऐसी संदिग्ध लिस्ट में मिले थे जिनके बारे में ऐसा अंदाज है कि उन्हें जांच के निशाने पर रखा गया, घुसपैठ के निशाने पर रखा गया था। इस बात का जिक्र जरूरी है कि एक फौजी हथियार माने जा रहे इस घुसपैठिया सॉफ्टवेयर को बनाने वाली इजराइली कंपनी ने बार-बार यह साफ कहा है कि वह इसे सिर्फ देशों की सरकारों और उनकी जांच एजेंसियों को बेचती है, वह भी इजराइल की सरकार से इजाजत मिलने के बाद। इस कंपनी ने बार-बार यह कहा है कि वह सरकारी एजेंसियों के अलावा किसी को यह सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है और इसे बेचते हुए इन शर्तों पर दस्तखत करवाए जाते हैं कि इनका इस्तेमाल केवल आतंकवाद और गंभीर अपराधों की रोकथाम के लिए ही किया जाएगा। इस कंपनी के दावे चाहे जो भी हो, दुनिया भर में जगह-जगह जांच के नतीजे यह बताते हैं कि इस हैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल पत्रकारों के खिलाफ, वकीलों के खिलाफ, और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ, कहीं-कहीं किसी देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के खिलाफ भी किया गया है। खरीददार देशों की लिस्ट में भारत का नाम भी बताया जा रहा है, लेकिन न कंपनी ने इसकी पुष्टि की है, और न भारत सरकार।
इस मामले ने खासा वक्त ले लिया। एक तो संसद में सरकार जवाब देने से साफ-साफ कतराते रही, जबकि जब देश के लोगों के मौलिक अधिकारों को कुचलने का आरोप लग रहा था, जब विपक्ष के एक सबसे बड़े नेता राहुल गांधी के फोन में घुसपैठ करने का आरोप लग रहा था, और यह घुसपैठ सरकार के पास पहले से मौजूद टेलीफोन टैप और निगरानी करने के मौजूदा कानूनों से परे, गैरकानूनी तरीकों से करने का आरोप लग रहा था, तब तो सरकार को साफ होकर सामने आने की कोशिश करनी थी, अगर वह सचमुच साफ है तो। ऐसे में चिदंबरम का यह निष्कर्ष सही लगता है कि बार-बार सरकार इस बात का खंडन करने से बचती रही कि उसने इस हैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है या नहीं, जिससे यही साबित होता है कि उसने इसका इस्तेमाल किया है। और जहां तक टेलीफोन को हैक करने की बात है तो देश का संचार निगरानी वाला कानून इसकी इजाजत नहीं देता है, और इसे एक जुर्म करार देता है। ऐसे में यह बात केंद्र सरकार के लिए एक परेशानी की हो सकती है, अगर यह साबित होता है कि उसने कानून के खिलाफ जाकर देश के गैरमुजरिम लोगों के खिलाफ ऐसी घुसपैठ की है, जो कि उनकी निजी जिंदगी में सबसे बड़ी घुसपैठ थी। इस पूरे सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के भी मुख्य न्यायाधीश रहे एक व्यक्ति का नाम आया था कि उसके फोन भी हैक किए गए थे, और उस पर जिस मातहत कर्मचारी ने सेक्स शोषण का आरोप लगाया था, उसके परिवार के कई फोन हैक किए गए थे। यह सारे आरोप बताते हैं कि सांसदों से लेकर जजों तक, और पत्रकारों से लेकर दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों तक के फोन हैक करने का एक शक है। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी हो सकता है कि इस मामले में किसी किनारे तक पहुंच सके।
आज सुप्रीम कोर्ट से जो खबर आई है, और यह मुख्य न्यायाधीश की जुबानी टिप्पणी से बनी हुई खबर है कि अदालत इस मामले में एक तकनीकी विशेषज्ञ कमेटी बना रही है। लेकिन यह कमेटी किस हद तक जांच करेगी, जांच करेगी या नहीं करेगी, और सरकार कहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ लेकर इस कमेटी से बचने की कोशिश कर सकेगी, ऐसी कई चीजें अभी साफ नहीं हैं। फिर भी सुप्रीम कोर्ट का रुख आज सकारात्मक है, और वह सरकार लुकाछिपी को और अधिक जारी नहीं रहने दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट से जनता के बुनियादी हक के लिए जैसी उम्मीद की जानी चाहिए थी, वह उसे पूरी कर रहा है। अगला हफ्ता बहुत दूर नहीं है, और इस कमेटी के बनने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि कुछ महीनों के भीतर यह साफ हो जाएगा कि केंद्र सरकार ने अपने नागरिकों के खिलाफ पेगासस का इस्तेमाल किया था या नहीं। वैसे अभी केंद्र सरकार के पास इस मामले को अदालत में और लंबा खींचने के कुछ तरीके शायद ढूंढे जा रहे होंगे और अदालत की बनाई हुई कमेटी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक खतरा साबित करने की कोशिश भी हो सकता है कि की जाए। लेकिन जब संसद में सरकार किसी जवाबदेही से बचती है, जब सुप्रीम कोर्ट को भी जवाब देना नहीं चाहती है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट की बनाई जांच कमेटी ही अकेला जरिया हो सकता था। यह कमेटी केंद्र सरकार की बनाई जा रही किसी जांच कमेटी के मुकाबले तो अधिक विश्वसनीय रहेगी ही।
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इस मुद्दे पर लिखने को इसलिए सूझता है कि जब-जब सेना की भर्ती की तस्वीरें सामने आती हैं, खुले बदन दौड़ते हुए नौजवान, सीना नपवाते हुए नौजवान दिखते हैं और लगता है कि इनमें से पता नहीं कितने सेना तक पहुंच पाएंगे। उनका अपना भला तो इस नौकरी के मिलने से जितना भी हो, इस प्रदेश या इलाके का भला भी होता है क्योंकि ऐसे एक-एक सैनिक अपने आसपास के लोगों के लिए एक मिसाल भी बनते हैं और सेना को लेकर इलाके में जागरूकता भी आती है। हमारा मोटे तौर पर यह भी मानना रहता है कि सैनिक, बाकी लोगों के मुकाबले नियम-कायदों को कुछ अधिक मानने वाले भी रहते हैं और इनसे उनके आसपास की दुनिया में थोड़ा सा अनुशासन भी आता है। इस बात को गलत करार देने के लिए कुछ लोग सेना के भ्रष्टाचार को गिना सकते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार सभी जगह है और सेना में बाकी जगहों से अधिक है ऐसा हम नहीं मानते।
लेकिन आगे की बात सेना तक सीमित रखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, हम छत्तीसगढ़ के बेरोजगार नौजवानों की बात करना चाहते हैं जो कि हर कुछ महीनों में सेना की भर्ती में दौड़ते दिखते हैं और दौड़ से परे भी उनके कई किस्म के इम्तिहान होते होंगे। यह हमारा एक पसंदीदा मुद्दा है कि किसी भी प्रदेश को अपनी युवा पीढ़ी को किस तरह नौकरी के लिए, आगे की पढ़ाई के मुकाबले के लिए, रोजगार की संभावनाओं के लिए और पेट की जरूरतों से परे भी समाज के बाकी मुकाबलों के लिए कैसे तैयार करना चाहिए। सेना भर्ती की तस्वीरें हमें इस मुद्दे पर कुछ हफ्तों के भीतर एक बार फिर लिखने की बात सुझा रही है। ऐसी दौड़ की तैयारी कितने नौजवान कर पाते होंगे? कितने नौजवान सामान्य ज्ञान, या अंग्रेजी, या कम्प्यूटर, इंटरनेट, व्यक्तित्व जैसी बातों को लेकर मुकाबले के लिए तैयार रहते होंगे? और फिर मुकाबलों से परे भी अपनी-अपनी जिंदगी में पिछले दिन के खुद के मुकाबले आज कितने लोग बेहतर होते होंगे? यह बात बार-बार कचोटती है। हमें लगता है कि जिस तरह छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कुदरत की दी हुई खदानों, जमीनों और यहां के जल-जंगल से कमाई करने की एक दौड़ लगी हुई है, उसी तरह की दौड़ इस प्रदेश के नौजवान इंसानों की ताकत और उनकी संभावनाओं को लेकर क्यों नहीं लगती? इस प्रदेश को प्रकृति ने जितना कुछ दिया है वह तो है ही, लेकिन धरती की संतानें अगर अपनी पूरी क्षमता से धरती की दी गई दौलत में कुछ जोड़ न सकें तो इसे कामयाबी कैसे कहेंगे?
छत्तीसगढ़ बहुत से मोर्चों पर तरक्की कर-करके देश भर में चर्चा में आया हुआ है। लेकिन हमें इस राज्य में ऐसी कोई बात भी सुनाई नहीं देती कि देश और दुनिया के अलग-अलग मुकाबलों के लिए यहां के लोगों को कैसे तैयार किया जाए और उसके लिए मुकाबले की नौबत आने के पहले, किसी मुकाबले को ध्यान में रखे बिना, लोगों में उत्कृष्टता को कैसे बढ़ाया जाए? हम पहले कई बार यहां पर सलाह दे चुके हैं कि राज्य में सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की इमारतों में सुबह-शाम या रात के खाली वक्त में उस इलाके के स्कूल-कॉलेज के बच्चों और बेरोजगार नौजवानों के लिए तरह-तरह का शिक्षण-प्रशिक्षण चलाना चाहिए और इसके लिए सरकार पहल करके, कुछ मदद करके बाकी का काम उस इलाके के लोगों के जनसहयोग से भी कर सकती है। छत्तीसगढ़ की मौजूदा संपन्नता से संतुष्ट होकर सरकार या जनता अगर मोटे तौर पर चुप बैठे रहेंगे, तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संभावनाओं के लिए निरंतर चलने वाले मुकाबलों में छत्तिसगढिय़ा सबसे बढिय़ा साबित नहीं हो पाएंगे। एक पहल बिना देर किए शुरू करने की जरूरत है और अंग्रेजी भाषा से लेकर बोलचाल के सलीके तक, सामान्य ज्ञान से लेकर कम्प्यूटर-इंटरनेट तक, इंटरव्यू का सामना करने से लेकर आवेदन लिखने तक, अनगिनत ऐसी बातें हैं जो छत्तीसगढ़ के दसियों लाख लोगों को सिखाने की जरूरत है। जब ज्ञान फैलता है तो वह इसे पाने वाले लोगों तक सीमित नहीं रहता, वह उनसे उनके इर्द-गिर्द के दूसरे लोगों तक भी पहुंचता है और पूरा का पूरा समाज धीरे-धीरे बेहतर होने लगता है, अधिक काबिल और अधिक कामयाब होने लगता है।
आज छत्तीसगढ़ में बहुत छोटी-छोटी सी, बहुत छोटी तनख्वाह वाली नौकरियों के लिए गलाकाट मुकाबला होता है। लेकिन राज्य के बाहर या देश के बाहर जाकर काम करने वाले लोगों को देखें तो इस राज्य से गिने-चुने लोग ही नजर आते हैं। देश के केरल या पंजाब जैसे राज्यों को देखें तो वहां से बाहर जाकर काम करने वाले और अपने घर-शहर कमाई लाने वाले लोगों के मुकाबले छत्तीसगढ़ कहीं भी नहीं टिकता और जो लोग यहां से बाहर जाकर कमाते हैं वे लगभग सारे के सारे मजदूर दर्जे के लोग हैं। इसलिए सरकार और समाज दोनों को हमारी सलाह है कि इस तस्वीर को बदलने के लिए कोशिश करनी चाहिए, इसके बिना यह राज्य सिर्फ धरती के दिए हुए को ही खाते रह जाएगा।
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हिंदुस्तान के सोशल मीडिया पर अभी किसी इमारत में लिफ्ट के बगल में लगाए गए एक नोटिस की तस्वीर घूम रही है जो कि जाहिर तौर पर किसी हिंदी इलाके का है। अगर वह गैर हिंदी इलाके का होता तो अंग्रेजी के साथ किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखा हुआ होता, लेकिन इसमें हिंदी में लिखा हुआ है कि खाना पहुंचाने के लिए आने वाले लोग लिफ्ट से ऊपर नहीं जा सकते उन्हें सीढिय़ों से जाना है। अब आज भारत के महानगरों में रिहायशी इमारतें भी 25-50 मंजिला होने लगी हैं। यह इमारत कितने मंजिल की है यह तो साफ नहीं है लेकिन बंधुआ मजदूर की तरह काम करने वाले, खाना पहुंचाने वाले लोग क्या खाने का बैग टांगकर हर जगह कई मंजिल पैदल चढक़र जा सकते हैं? और फिर एक सवाल यह भी है कि यह किस किस्म का सामंती मिजाज है जो उसी इमारत में लोगों के लिए खाना लेकर आने वाले लोगों को लिफ्ट की बुनियादी सहूलियत देने से मना कर रहा है? यह ठीक वैसा ही हो गया जैसे बड़ी कारों के पार्किंग के अहाते में किसी कोने में भी मोटरसाइकिल को जाने से रोक दिया जाए, या जैसा कि हिंदुस्तान के बहुत से पांच सितारा होटलों में होता है, ऑटो रिक्शा में पहुंचने वाले लोगों को सडक़ पर उतरना पड़ता है, क्योंकि होटल के दरबान ऑटो रिक्शा को होटल के भीतर पोर्च तक जाने नहीं देते।
जिंदगी में बुनियादी सहूलियत क्या है और ऐशो-आराम की चीजें क्या हैं, इनमें फर्क करना हिंदुस्तान का संपन्न तबका कई बार नहीं कर पाता, या शायद अक्सर नहीं करता। अगर किसी इमारत में वहां बसे हुए लोगों के लिए कोई स्विमिंग पूल बना है, तब तो यह बात हो सकती है कि इमारत में काम करने वाले कर्मचारी उसका इस्तेमाल ना करें। लेकिन वे कर्मचारी लिफ्ट का इस्तेमाल ना करें, कई महानगरों में कई रिहायशी इमारतों में ऐसे नोटिस भी लगे रहते हैं कि काम करने वाले लोग लिफ्ट से ना आए-जाएं। यह सिलसिला समाज के भीतर कमाई के आधार पर एक बहुत ही घटिया किस्म के भेदभाव का है जिसमें इंसानों को इंसान नहीं माना जाता, और जिन लोगों को चर्बी हटाने की जरूरत है वे लोग सीढ़ी से आने-जाने के बजाय लिफ्ट से आते जाते हैं, और जो गरीब मजदूर काम करके वैसे भी थके हुए रहते हैं, उन्हें लिफ्ट में चढऩे को मना कर दिया जाता है। यह बात बताती है कि हिंदुस्तान में किसी छोटे तबके में अतिसंपन्नता तो आ गई है, लेकिन सभ्यता उन्हें छू भी नहीं गई है। दुनिया में जो सभ्य समाज हैं वहां पर इस किस्म का कोई भेदभाव नहीं रहता। कुछ बरस पहले जब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, तो उनकी एक तस्वीर आई थी जिसमें वे राष्ट्रपति भवन के गलियारे में चलते हुए एक सफाई कर्मचारी से हाथ टकराते हुए और उसका अभिवादन करते हुए दिखते हैं। हिंदुस्तान में राष्ट्रपति अगर निकलने को हों तो सफाई कर्मचारी उनके सामने भी शायद नहीं पड़ सकेंगे। कई जगहों पर तो कम तनख्वाह वाले कर्मचारियों को दीवार की तरफ मुंह करके खड़ा रहने के लिए कह दिया जाता है, जब उनके मालिक या कोई ताकतवर व्यक्ति गलियारे से निकलते हैं।
हिंदुस्तान में मुगल खत्म हो गए, अंग्रेज आकर चले गए, देश में लोकतंत्र आए पौन सदी का वक्त हो गया, लेकिन लोगों का मिजाज अभी तक सामंती बना हुआ है। हर हफ्ते-पखवाड़े में देश में कहीं ना कहीं से किसी नेता की बिगड़ैल औलाद का या खुद नेता का ऐसा वीडियो सामने आता है जिसमें वे कहीं टोल टैक्स कर्मचारी को पीट रहे हैं तो कहीं पेट्रोल पंप कर्मचारी को कहीं ट्रैफिक पुलिस से मारपीट कर रहे हैं तो कहीं किसी और सरकारी कर्मचारी को धमका रहे हैं कि जानते नहीं हो कि मैं कौन हूँ? देश तो आजाद हो गया है लेकिन लोगों के दिमाग में अपनी ताकत और दूसरों की गुलामी की बात इतने गहरे बैठी हुई है कि वह निकलने को तैयार नहीं है। फिर इस देश में जो प्रचलित धर्म है उनमें से अधिकतर में लोगों की बराबरी की कोई गुंजाइश नहीं है। जाति व्यवस्था कायम रहती है, धर्म का अपना ढांचा हावी रहता है। और मजे की बात यह है कि अभी पंजाब में एक दलित सिख को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया है, उस पंजाब में दलित आबादी 30 फ़ीसदी है, इस तरफ भी लोगों का ध्यान नहीं था, उस पंजाब में यह पहला दलित मुख्यमंत्री बना है, यह बात भी लोगों को हैरान कर रही है। यह पूरा सिलसिला लोगों को पहली बार यह जानकारी दे रहा है कि सिखों के बीच भी एक जाति व्यवस्था कायम है वरना गुरुद्वारे में एक साथ बैठकर खाने की परंपरा को देखते हुए पंजाब के बाहर के गैर सिख लोग यह मान बैठे थे कि सिखों में कोई जाति व्यवस्था है ही नहीं।
भारत में अब जाति व्यवस्था बड़े शहरों में कुछ हद तक घट रही है, तो वहां पर गरीब कामगार और अमीर मालिक के बीच की एक नई व्यवस्था कायम हो रही है जिसमें कुछ लोग खाना पहुंचाने वाले लोगों से मारपीट भी करते दिखते हैं, और जैसा कि यह नोटिस कई इमारतों में लगा हुआ है, उससे भी जाहिर है कि उनकी सेवा करने वाले लोगों को भी लोग इंसान का दर्जा देने से इनकार करते हैं। अगर सफाई कर्मचारी कूड़े का या गंदगी का कोई डिब्बा लेकर लिफ्ट में साथ में जाए, तो भी हो सकता है कि एक बार लोगों को वह खटके, लेकिन बैग में बंद खाना लेकर अगर कोई कर्मचारी लिफ्ट से जा रहा है, तो उसमें भी लोगों को आपत्ति है, जो कि जाहिर तौर पर उस व्यक्ति के गरीब होने को लेकर है कि इतना गरीब कामगार कैसे उसी लिफ्ट में सवार होकर जा सकता है, जिसमें कि महंगे फ्लैट के मालिक ऊपर-नीचे आते-जाते हैं। हमारा ख्याल है कि चाहे ये रिहायशी इमारतें निजी क्यों न हों, ऐसे नोटिस के खिलाफ उन प्रदेशों के मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी करना चाहिए, और ऐसे प्रतिबंध को गैरकानूनी करार देना चाहिए क्योंकि किसी से ऐसी मेहनत करवाना जिसकी कि कोई जरूरत नहीं है, और जो बिल्डिंग में कानूनी रूप से लगाई जाने वाली अनिवार्य सहूलियत हैं, उनके इस्तेमाल से लोगों को रोकने के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
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अभी एक ब्रिटिश टेनिस खिलाड़ी एमा राडुकानू ने यूएस ओपन टूर्नामेंट जीता तो वह लंबे अरसे के बाद दुनिया का कोई ग्रैंड स्लैम टाइटल जीतने वाली ब्रिटिश महिला खिलाड़ी बनी। इसके पहले ग्रैंड स्लैम सिंगल्स टाइटल 1977 में ब्रिटेन की वर्जीनिया वेड ने विंबलडन जीतकर हासिल किया था और उसके बाद का यह लंबा फासला ब्रिटेन की महिला टेनिस खिलाडिय़ों के लिए बड़े इंतजार का था। लेकिन एमा की जीत की खुशी कई जगह मनाई जा सकती है, वह टोरंटो में पैदा हुई थी तो वह जन्म से कनाडा की नागरिक है। उसके पिता रोमानिया से आकर कनाडा में बसे थे, और उसकी मां चीन से आकर वहां बसी थी, और वहीं उसके पिता से मिली थी। वह जन्म के बाद जल्द ही ब्रिटेन आकर बस गई थी और उसकी पढ़ाई-लिखाई यहीं पर हुई। इस तरह उसके पास इन दोनों देशों की नागरिकता है। वह अपनी मां के जन्म के देश चीन की मंडारिन भाषा बखूबी बोलती है। अब कोई अगर यह सोचे कि वह कहां की है, तो यह सोचना मुश्किल है। उसकी इस जीत के बाद वह जिस तरह खबरों में आई, तो उससे कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी लिखा कि उसे लाखों चीनी अपना आदर्श मान रहे हैं, और रोमानिया में भी उसकी जीत की खुशियां मनाई जा रही हैं, कनाडा और ब्रिटेन तो खुश हैं ही।
लेकिन इस एक खिलाड़ी की जीत से यूरोप के कई लोगों के बीच में यह चर्चा शुरू हो रही है कि देशों की सरहदें किसके काम आती हैं, और किसका आगे बढऩा उससे रुकता है? मां किसी देश की, बाप किसी देश का, पैदा किसी देश में हुए, और पढ़े किसी और देश में। आज दुनिया के जिन देशों में लोग धर्म को लेकर, जाति को लेकर लड़े पड़े हैं, जहां पर नफरत का बोलबाला है, ऐसे हिंदुस्तान जैसे देश क्या अगली सदी में भी इस किस्म की उदारता के बारे में सोच पाएंगे? आज एक धर्म की लडक़ी दूसरे धर्म के लडक़े से किसी रेस्तरां में मिल रही है तो उसे उत्तर प्रदेश में खुलेआम पीटा जा रहा है, अगर लडक़ी ने दूसरी जाति में शादी कर ली तो लडक़ी के घरवाले जाकर लडक़े को मार डाल रहे हैं, और जरूरत रहे तो अपनी लडक़ी को भी मार रहे हैं। कहीं लडक़ी के प्रेमी को घर पर बुलाकर उसे पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया जा रहा है और छत से नीचे फेंक दिया जा रहा है। आज दुनिया के दो अलग-अलग हिस्से दो अलग-अलग युगों में जी रहे हैं। यह फर्क महज एक सदी का हो ऐसा भी नहीं है, कई सदियों का फर्क है, और एक जगह नफरत का बोलबाला है, और दूसरी जगह कामयाबी का।
आज जिन देशों में लोगों के सिर पर धर्म की नफरत, राष्ट्रीयता की नफरत, रंग की नफरत नहीं रहती, उन देशों में लोग अपनी पूरी क्षमता के आसमान पर पहुंच सकते हैं और अपनी संभावनाओं का पूरा फायदा उस देश को दे सकते हैं। अमेरिका इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल है क्योंकि वहां नौजवान पीढ़ी को तकरीबन तमाम बातों में एक बराबरी का मौका मिलता है, और हिंदुस्तान में जिन बातों को लेकर वैलेंटाइन डे पर लोगों को मारा जाता है, जबरदस्ती राखी बंधवाई जाती है, ऐसे कोई सामाजिक तनाव वहां की नौजवान पीढ़ी पर नहीं रहते, और वह अपनी पूरी संभावनाओं का इस्तेमाल कर पाती है। जब समाज में एक समानता और सद्भावना का माहौल रहता है तो वहां आगे बढ़ते हुए लोग अलग दिखते हैं। शायद कई दूसरी वजहों के साथ-साथ हिंदुस्तान के खेल में पिछडऩे की, कारोबार या दूसरी प्रतिभाओं में पिछडऩे की एक बड़ी वजह यह भी है कि यहां नौजवान पीढ़ी के दिमाग से तनाव कम नहीं होता, और कुंठा बढ़ती चली जाती है। वे न अपनी मर्जी से शादी कर सकते, न अपनी अपनी मर्जी से किसी के साथ उठ बैठ सकते, न मर्जी का खा सकते, न मर्जी का पहन सकते। ऐसे में तनाव और कुंठा से भरी हुई नौजवान पीढ़ी के आगे बढऩे की संभावनाएं बड़ी सीमित रहती हैं। और अब तो इस देश में विज्ञान के नाम पर जो ‘वैदिक’ अवैज्ञानिक बातें पढ़ाई जा रही हैं, बढ़ाई जा रही हैं, वे सब नौजवान पीढ़ी को एक ऐसी अंधेरी सुरंग में धकेल रही हैं, जहां से बाहर निकलने का रास्ता जल्द मिलने वाला नहीं है।
जो हिंदुस्तानी नौजवान दुनिया के दूसरे देशों में जाते हैं और अपनी क्षमताओं को साबित करते हैं, दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के मुखिया हो जाते हैं और कामयाब रहते हैं, उनकी कामयाबी का हिंदुस्तान से लेना-देना कम रहता है, यहां के पढ़े-लिखे से लेना-देना कम रहता है, उसका अधिक लेना-देना उन देशों में काम करने की परिस्थितियों और रहने-जीने की परिस्थितियों से अधिक रहता है। वहां पर जिस तरह भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखल के बिना वे कारोबार कर सकते हैं, वहां वे जिस तरह बिना किसी डर के अपनी राजनीतिक पसंद के पक्ष में काम कर सकते हैं, हिंदुस्तान में वैसा करने का सोच भी नहीं सकते। इसलिए जब लोगों की राजनीतिक और लोकतांत्रिक भावनाओं को डरा कर रखा जाता है, दहशत में रखा जाता है, तो उससे उनका व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है और वे अपनी संभावनाओं को कहीं छू नहीं पाते। दुनिया में राष्ट्रीयता, रंग, नस्ल, सेक्स, इन सबसे परे जिस तरह लोग आगे बढ़ते हैं, हिंदुस्तान शायद अगली सदी में भी उस तरह की कामयाबी नहीं पा सकेगा क्योंकि हमारी सोच बड़ी तेजी से कुछ सदी पीछे ले जाई जा रही है। आज के मुद्दों से, आज की दिक्कतों से निपटने और कल की संभावनाओं के लिए ठोस काम करना एक बड़ा मुश्किल काम है, एक नामौजूद काल्पनिक इतिहास को लेकर कीर्तन करना एक अधिक आसान काम है, और वैसे कीर्तन में हिलने के लिए हिंदुस्तान में सिरों की कोई कमी तो है नहीं।
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पूरे हिंदुस्तान में कल से कांग्रेस पार्टी एक नए मखौल का सामान बन गई है। पंजाब में मुख्यमंत्री को जिस अंदाज में, अपमान के साथ हटाया गया है, और अभी कल ही भाजपा से आए हुए नवजोत सिंह सिद्धू को पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया, और फिर जिस तरह उनके हमलावर बयान आए कि उनके मर्जी से सब कुछ नहीं किया जाएगा तो वह सब कुछ तबाह कर देंगे, और मानो उनकी ही मर्जी से कांग्रेस के एक सबसे सीनियर नेता और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को अपमानित करके कुर्सी से हटने के लिए मजबूर किया गया, उसने कांग्रेस पार्टी की पूरे देश में थू थू कर दी। खासकर तब, जब पिछले कुछ महीनों में एक के बाद दूसरे भाजपा मुख्यमंत्री बिना किसी हंगामे के, बिना किसी विरोध के हटा दिए गए, और मनचाहे मुख्यमंत्री बना दिए गए, पार्टी के बाहर किसी को कानों-कान कोई खबर नहीं हुई, ऐसे माहौल में कांग्रेस की यह हालत उसकी रही-सही साख को चौपट करने वाली है। यह बात इसलिए भी कांग्रेस के लिए अधिक फिक्र की है कि देश में उसके पास गिने-चुने राज्य रह गए हैं, और पंजाब के अलावा कम से कम दो और ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस में मुख्यमंत्री को लेकर एक गंभीर स्थानीय चुनौती खड़ी हुई है। राजस्थान में पिछले एक दो बरस से सचिन पायलट की अगुवाई में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ एक अभियान चल ही रहा है। बीच में तो ऐसी नौबत थी कि राजस्थान के कांग्रेस विधायकों का एक हिस्सा कई दिन तक हरियाणा के किसी रिसॉर्ट में पड़े रहा, देश में ऐसी भी अफवाह रही कि कांग्रेस खुद ही अपने विधायकों को खरीदकर वापस ले गई और किसी तरह सरकार को बचाया। अब पंजाब की इस उथल-पुथल को देखें तो छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उन्हें बेदखल करके मुख्यमंत्री बनने का दावा करने वाले टीएस सिंहदेव के बीच चले आ रहे तनाव को पंजाब के इस हालात से बढ़ावा ही मिलेगा। कांग्रेस के पास इन राज्यों को अगले चुनाव में खोने के बाद देश में कुछ भी नहीं बचेगा और उसके बाद हो सकता है कि यह पार्टी बिना किसी अध्यक्ष के भी जिंदा रह सके।
कांग्रेस की दिक्कतें कम नहीं है। पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ा और जिस तरह वे एक सार्वजनिक जिद पर अड़े रहे कि अगला अध्यक्ष सोनिया परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को बनाया जाए, उन्होंने अपने-आपको अध्यक्ष पद से अलग कर दिया, लेकिन हालत यह है कि पार्टी के सारे मामले घूम-फिर कर उनके पास ही पहुंचते हैं। वे बंद कमरों में पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण मामलों पर बैठक करते हैं। उनके बिना पार्टी का गुजारा नहीं है, लेकिन वे किसी ओहदे पर नहीं है और वे पार्टी संगठन के भीतर एक संविधानेतर सत्ता बने हुए हैं। जिम्मेदारी कुछ नहीं, अधिकार पूरे के पूरे। कांग्रेस और भाजपा के साथ यह एक बात दिलचस्प है कि भाजपा के फैसलों को लेकर कई बार यह चर्चा होती है कि यह संघ परिवार ने तय किया, और संघ परिवार ने करवाया, और संघ प्रमुख की मर्जी से ऐसा हुआ। जबकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने आप को एक गैरराजनीतिक संगठन कहता है, और यह भी कहता है कि उसका भाजपा से कोई लेना देना नहीं है। ठीक वैसे ही राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन कांग्रेस में जो कुछ और होता है वह उनकी मर्जी से होता है। अब इन दो संस्थाओं की संविधानेतर सत्ता की और तो कोई तुलना नहीं है सिवाय इसके कि ये दो पार्टियां मोटे तौर पर इनके फैसलों के मुताबिक ही चलती हैं, वरना एक सांस्कृतिक संगठन से एक राजनीतिक संगठन के संगठन मंत्री अनिवार्य रूप से क्यों इंपोर्ट किए जाते हैं?
कांग्रेस पार्टी के दिक्कत महज पंजाब को लेकर या राजस्थान और छत्तीसगढ़ को लेकर नहीं है, यह दिक्कत एक पार्टी संगठन की दिक्कत है जिसमें जो अध्यक्ष बनना नहीं चाहते उन्हीं को पार्टी के अधिकतर लोग अध्यक्ष बनाने पर आमादा हैं, ऐसे में पार्टी में जिम्मेदारी किसकी है, और अधिकार किसके पास हैं, इस पर धुंध छाई हुई है। कल पंजाब के मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि राहुल गांधी से पिछले 2 साल में उनकी मुलाकात नहीं हुई। अब सवाल यह है कि जिसकी मर्जी के बिना कांग्रेस में पत्ता नहीं हिल सकता, वह अपने पिता के वक्त से कांग्रेस का एक बड़ा नेता रहे हुए एक बुजुर्ग कांग्रेस मुख्यमंत्री से दो 2 बरस तक मिलना न चाहे, तो ऐसे में पार्टी का क्या हाल होगा? हमारा किसी प्रदेश के किसी एक नेता से कोई लेना देना नहीं है लेकिन अगर उनके प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है, तो यह तो होना चाहिए कि वहां के जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर कांग्रेस पार्टी वक्त पर सोच-विचार कर ले और वक्त रहते फैसला कर ले।
कल हिंदुस्तान के राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात पर कांग्रेस की समझ पर बड़ा अफसोस जाहिर किया कि अब जब पंजाब में चुनाव को कुछ ही महीने बाकी रह गए हैं, तब जाकर मुख्यमंत्री को हटाया गया है। अगर हटाना ही था तो पहले हटा देना था। दूसरी बात जो कैप्टन अमरिंदर सिंह के मामले में तो सामने नहीं आई, लेकिन भाजपा के कुछ मुख्यमंत्रियों को हटाने के मामले में जरूर सामने आई कि वे अपने-अपने प्रदेशों में कुछ अधिक ताकतवर हो रहे थे, इसलिए भाजपा हाईकमान ने उन्हें हटाकर ऐसे लोगों को बिठाया जो कि हाईकमान के कहे, बनाए ही नेता बने हैं, जिनका अपना जनाधार कम है। कांग्रेस पार्टी दशकों से इस बात के लिए बदनाम रहते आई है कि वह अपने किसी क्षेत्रीय नेता को कभी इतना मजबूत नहीं होने देती कि वह हाईकमान के सामने रीढ़ की हड्डी सीधी करके खड़े हो सकें। कमोबेश वैसा ही हाल अब भाजपा में हो चला है क्योंकि भाजपा के ढेर सारे नेता कांग्रेस से वहां पहुंचे हैं और भाजपा को यह समझ आ गया है कि कांग्रेस को हराने के लिए कांग्रेस की संस्कृति को अपनाना, और कांग्रेस के लोगों को अपनाना, दोनों ही जरूरी है। इसलिए एक वक्त के नरेंद्र मोदी सरीखे मजबूत मुख्यमंत्री आज भाजपा में नहीं रहने दिए जा रहे हैं, क्योंकि पार्टी की केंद्रीय सत्ता ऐसे मजबूत मुख्यमंत्रियों को राजधर्म नहीं सिखा पाएगी। अब लोगों का अंदाज भी है कि भाजपा का निशाना उसके अपने किस अगले मुख्यमंत्री पर होगा।
कांग्रेस की बात पर लौटें, पार्टी अपनी बुनियाद होते जा रही है और नेहरू-गांधी की विरासत का नाम लेकर वह अब किसी वार्ड का चुनाव भी नहीं जीत सकती। देश में नरेंद्र मोदी ने एक नए दर्जे की राजनीति, और राजनीति में नई ऊंचाई की मेहनत को पेश कर दिया है। एक ओवरटाइम करने वाले प्रधानमंत्री के मुकाबले एक पार्ट टाइम पार्टी अध्यक्ष की कोई गुंजाइश भारत की चुनावी राजनीति में नहीं है। कांग्रेस जब अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्तर का विवाद नहीं सुलझा पा रही है, राज्यों के मुख्यमंत्रियों का विवाद क्या सुलझा सकेगी। इसलिए कांग्रेस की यह शर्मनाक नौबत उसके केंद्रीय नेतृत्व की घोर असफलता से उपजी हुई है, उसके लिए तसल्ली की यही बात हो सकती है कि अब खोने को कुल दो-तीन प्रदेश ही बचे हैं। कांग्रेस के लोगों को यही राहत हो सकती है कि पार्टी लीडरशिप का यही हाल जारी रहा तो भी उसे दो तीन राज्यों से अधिक का नुकसान नहीं होगा। अब कांग्रेस का जो भी बदहाल हो वह भाजपा के राज्य तो खो नहीं सकती, और अपने राज्य उसके घरेलू कलह और हाईकमान की अनदेखी के शिकार हैं।
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बिहार से बड़ी दिलचस्प खबर आ रही है कि रामविलास पासवान की पहली बरसी निपटते ही उनके बेटे चिराग पासवान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चि_ी लिखकर अनुरोध किया है कि वे केंद्र सरकार से सिफारिश करें कि रामविलास पासवान को भारत रत्न दिया जाए। इसके अलावा उन्होंने यह भी अपील की है कि रामविलास पासवान की जयंती को राजकीय अवकाश घोषित किया जाए। जैसा कि होता है, चिराग पासवान ने अपने पिता को महिमामंडित करते हुए बहुत सी बातें लिखी हैं, और साथ-साथ बहुत सी मांगें भी रखी हैं कि पटना में और हर जिला मुख्यालय में रामविलास पासवान की प्रतिमा स्थापित की जाए। इसके पहले दिल्ली में रामविलास पासवान के जीते जी जो सरकारी बंगला उनके पास था, उसमें चिराग पासवान ने उनकी एक प्रतिमा स्थापित कर ही दी है, और उसके साथ ही उनकी यह हसरत भी दिखती है कि वह बंगला रामविलास पासवान की स्मृति में चिराग पासवान के पास रहने दिया जाए।
यह एक बड़ी ही तकलीफदेह नौबत है जब रामविलास पासवान के गुजरने के बाद उनके नाम का झंडा लेकर अकेले उनके बेटे चल रहे हैं। जिंदगी भर जिसने राजनीति में समय लगाया, उसने अपने जीते-जी अपनी पार्टी की अपनी सारी विरासत अपने बेटे को ही देकर जाना तय किया, और शायद उसी वजह से भी यह नौबत आई है कि किसी और को यह नहीं लग रहा कि उन्हें भी पासवान की स्मृति में कुछ करना चाहिए। ऐसी नौबत किसी की जिंदगी में ना आए वही बेहतर है, कि उनकी स्मृतियों को लेकर उनकी संतानें ही कार्यक्रम करें, उनके नाम पर स्मृति ग्रंथ निकालें, परिवार ही उनकी स्मृति में व्याख्यानमाला रखें, पुरस्कार और सम्मान स्थापित करे। और यह तो एक अलग दर्जे का मामला है जिसमें रामविलास पासवान का बेटा उनके लिए भारत रत्न की मांग कर रहा है। जिंदगी में जो व्यक्ति सचमुच महान होते हैं या कोई महत्वपूर्ण काम छोड़ कर जाते हैं, वे कम से कम अपने समर्थकों, प्रशंसकों, अनुयायियों, और भक्तों का इतना तबका तो छोडक़र जाते हैं कि उनके जाने के बाद परिवार से परे बाहर के कुछ लोग उनके नाम को जप सकें। लेकिन वे लोग सहानुभूति के हकदार रहते हैं, हमदर्दी के हकदार रहते हैं, जिनके नामलेवा उनके कुनबे के लोग ही रह जाते हैं उसके बाहर कोई नहीं रह जाते।
वैसे भी हम तो राजकीय सम्मानों के खिलाफ लिखते आए हैं, और किसी को भी सरकार सम्मानित करे, उसके खिलाफ हम लोगों को समझाते हैं। फिर भारत रत्न जैसी उपाधि तो हमेशा विवादों से घिरी रही है क्योंकि रात-दिन कारोबारी इश्तहार करने वाले सचिन तेंदुलकर जैसे कम उम्र को भारत रत्न मिल गया है, और हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ओलिंपिक मेडल लेकर आने वाले ध्यानचंद के नाम पर यह सोचा भी नहीं गया। इसलिए जिन लोगों को भारत रत्न सम्मान की बात लगती है, वे अपने मन में किसी हीन भावना के शिकार रहने वाले लोग हैं ताकि उन्हें सरकारी सम्मान अच्छा लगता है। वोटों को पाकर सरकार में आने वाले, और सरकार में रहते हुए आगे वोट पाने की कोशिश करने वाले लोग भला किस तरह से किसी सम्मान का ईमानदार फैसला कर सकते हैं? दुनिया में सम्मान देने का हक सरकारों से परे, राजनीतिक दलों से परे, ऐसे निर्विवाद संगठनों और संस्थाओं का काम होना चाहिए, जो बहुत ही भरोसेमंद निर्णायक मंडल के साथ, बहुत ही पारदर्शी तरीके से इसका फैसला कर सकें। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो नोबेल पुरस्कार को ऐसा ही सम्मानजनक माना जा सकता है जिसे कोई किसी दबाव से हासिल कर ले ऐसा सुना नहीं गया है। फिर एक बात यह भी है कि जब-जब रामविलास पासवान को अधिक महान साबित करने की कोशिश होगी, लोगों को यह भी याद आते रहेगा कि उनको मजाक में भारतीय राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था, जो कि यह अंदाज लगा लेते थे कि अगली सरकार कौन सी आने वाली है और वे विचारधाराविहीन अंदाज में किसी भी सत्तारूढ़ हो संगठन का हिस्सा बनने के लिए तैयार रहते थे, और तकरीबन तमाम सरकारें उनके साथ ही बनती थीं। किसी के बारे में अगर अप्रिय बातों को शुरू करवाना हो, तो उसके सम्मान की चर्चा छेड़ देनी चाहिए ,और लोग तुरंत इस बात को उधेडऩे लगते हैं कि कौन-कौन सी बातों की वजह से वे व्यक्ति ऐसे सम्मान के हकदार नहीं हैं।
हमारा ख्याल है कि चिराग पासवान, रामविलास पासवान की रही-सही स्मृतियों को बर्बाद कर रहे हैं। वे जिस बिहार के एक सबसे बड़े नेता रहे हैं, उस बिहार में जिला मुख्यालयों में पासवान की प्रतिमा स्थापित करने के लिए अगर सरकार से अपील करने की नौबत आ गई है तो इसका मतलब है कि पासवान ने अपनी कोई विरासत नहीं छोड़ी है, उनके कोई समर्थक नहीं हैं, और उनके अपने गृह राज्य में भी उनकी कोई जमीन नहीं है। इसी तरह सरकारी बंगले में कब्जा करने की नीयत से पासवान की प्रतिमा स्थापित करना एक खराब नीयत की बात है और चिराग पासवान इससे अपनी भी इज्जत खराब कर रहे हैं। यह भी है कि पिछले चुनाव में जिस नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग पासवान ने बहुत ही निचले दर्जे की आग उगली थी। उसी नीतीश कुमार से आज अपने पिता की स्मृति को आगे बढ़ाने की अपील करना राजनीतिक रूप से एक नाजायज बात है। कम से कम इतना तो सोचना चाहिए था कि अभी-अभी रामविलास पासवान की बरसी पर नीतीश कुमार को बुलाने के लिए जब चिराग पासवान कोशिश करते रहे तो उनको मुख्यमंत्री से मिलने का समय भी नहीं दिया गया और मुख्यमंत्री इस बरसी पर आए भी नहीं। ऐसे रुख के बाद ऐसी अपील, चिराग पासवान की नासमझी साबित करती है, और यह पूरा सिलसिला बहुत ही बदमजा है।
किसी व्यक्ति के गुजरने पर उसका परिवार ही उसकी महानता साबित करने में लगा रहे यह शर्मनाक नौबत है, इससे और चाहे कुछ भी साबित हो जाए, कम से कम यह तो साबित तो हो ही जाता है कि गुजरने वाले व्यक्ति महान नहीं थे, इसीलिए उनकी स्मृतियों को चार कंधा देने के लिए घर के चार लोगों के अलावा और कोई नहीं मिल रहे हैं। ऐसी नौबत से सभी इज्जतदार लोगों को बचना चाहिए लेकिन इज्जतदार हैं कौन यह तो लोग खुद ही साबित करते हैं।
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दुनिया की एक सबसे बड़ी कंप्यूटर और मोबाइल फोन कंपनी, एप्पल ने 2 दिन पहले बाजार में अपने फोन के कुछ नए मॉडल उतारे तो सोशल मीडिया पर फिर यह मजाक चल गया कि शरीर का कौन सा अंग बेचने पर इसका कौन सा मॉडल लिया जा सकता है। जो संपन्न पश्चिमी देश हैं वहां पर फोन की महंगी कीमत के बावजूद लोग कुछ बरस पहले तक तो एप्पल स्टोर के बाहर फुटपाथ पर दो-दो दिन लाइन में सोए रहते थे, अब पता नहीं वहां क्या हालत है। लेकिन दुनिया में और भी कुछ सामान हैं जो इसी किस्म के महंगे हैं, कुछ दूसरी कंपनियों के कुछ फोन भी करीब-करीब ऐसे ही दाम के हैं, और इसलिए यह मजाक उनके साथ भी बनाया जा सकता है, लेकिन ऐसे लतीफे बनते एप्पल के ही हैं।
यह सोचने की जरूरत है कि क्या सचमुच ही रोजाना इस्तेमाल की टेक्नोलॉजी पर इतना खर्च करने की जरूरत है? लेकिन यह कोई नई बात तो है नहीं, एक वक्त जब टीवी आया तो उस वक्त भी बड़ी स्क्रीन के दाम ऐसे ही अंधाधुंध अधिक थे, टीवी पर फिल्म देखने के लिए जो वीसीपी या वीसीआर आते थे, उनके भी दाम ऐसे ही थे। हर टेक्नोलॉजी शुरू में बहुत महंगी रहती है बाद में धीरे-धीरे सस्ती होती जाती है। और अब तो घर-दफ्तर में टीवी पर फिल्म देखने के लिए किसी मशीन को चलाने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। इसी तरह जिनको यह लगता है कि मोबाइल फोन बहुत महंगे होते जा रहे हैं उन्हें यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि मोबाइल फोन की खूबियां इतनी बढ़ाई जा रही हैं कि वे अधिक महंगे हो रहे हैं। हर किसी को इतने महंगे मोबाइल फोन की जरूरत नहीं है, और बाजार में लोगों के काम चलाने लायक मोबाइल 10-12 हजार में भी आराम से मिल जाते हैं। अधिक खर्च वही लोग करते हैं जिन्हें शान-शौकत की आदत है और जो केसर खरीदते हुए भी सबसे महंगी वाली केसर खरीदते हैं, बादाम लेते हुए भी सबसे महंगा बादाम और कुर्ते के लिए सिल्क का कपड़ा लेते हुए सबसे महंगा सिल्क। इसलिए आज बाजार में जो सबसे महंगे सामान आ रहे हैं उन्हें लोगों की जरूरत मानना गलत होगा, और जिन लोगों को अपनी जरूरत के काम के लिए मोबाइल या कंप्यूटर चाहिए, उन्हें तो यह भी देखना चाहिए कि कुछ बरस पहले के दाम पर भी आज उससे बहुत अधिक खूबियों वाले फोन और कंप्यूटर आने लगे हैं।
दरअसल बाजार में सबसे महंगा सामान लेने के शौकीन लोगों को बिना जरूरत ऊंची तकनीक वाले सामान लेने की आदत रहती है। जिन्हें कभी कोई वीडियो एडिटिंग नहीं करनी है वे भी फोन ऐसा चाहते हैं कि उसका प्रोसेसर और उसका रैम सबसे ऊंचा हो। अधिकतर लोगों को यह समझना चाहिए कि उनके पास के मौजूदा फोन या कंप्यूटर पूरी तरह खराब ना हो जाने तक उन्हें नए उपकरणों की जरूरत नहीं रहती है। इसलिए अपने पास के फोन का नया मॉडल आते ही उस पर जाने की कोशिश एक निहायत फिजूल की बात रहती है, और बहुत महंगा शौक भी। जिनको लगता है कि एक किडनी बेचकर भी आईफोन खरीदना चाहिए, उन लोगों को किडनी संभालकर रखनी चाहिए और बाजार के सस्ते फोन से काम चलाना चाहिए, जिससे तकरीबन तमाम काम निपट सकते हैं। बस समाज में उठते-बैठते लोगों को दिखाने के लिए चकाचौंध वाला महंगा ब्रांड उनके पास नहीं रहेगा लेकिन ऐसा ब्रांड दिखाकर किसी को खुश करना जरूरत नहीं रहती है, यह महज घमंड रहता है। इसलिए लोगों को अपनी जरूरत के मुताबिक ही खर्च करना चाहिए क्योंकि एक बार जिस तरह के सामान का इस्तेमाल शुरू किया जाए, बाद में फिर उससे नीचे का सामान लेना जंचता नहीं है। बच्चों को भी उतने ही महंगे सामान दिलवाने चाहिए जिनके खराब होने पर उतने ही महंगे सामान दोबारा दिलाए जा सकें।
दरअसल खुशी सामान बदलने से नहीं आती है, खुशी आती है अपने पास के सामान से संतुष्ट रहने पर। जब तक जरूरत ना हो तब तक और अधिक महंगे, और नए, और बड़े, सामानों पर जाकर और अधिक खूबी पाने के फेर में खुशी खत्म होती है, और जो हासिल है उससे अगर काम चल रहा है, उससे अधिक की जरूरत नहीं है, तो हसरतों को काबू में रखना ठीक है क्योंकि ना तो बाजार में उपकरणों के आने पर काबू रखा जा सकता, और ना ही खूबियां बढ़ते चले जाने को रोका जा सकता है। लोगों को याद रखना चाहिए कि हिंदुस्तान की कुछ सबसे बड़ी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनियों को बनाने वाले और उनके आज के मालिक, अज़ीम प्रेमजी, नारायण मूर्ति, अरबपति-खरबपति होने के बाद भी प्लेन में इकोनॉमी क्लास में सफर करते हैं। वे अगर चाहें तो वह अपनी कंपनी के लिए प्लेन खरीदकर उसका इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन वे आम मुसाफिर विमान में भी महंगी टिकट नहीं खरीदते, साधारण टिकट खरीदते हैं। इसके बाद ये कारोबारी अपनी दौलत से हजारों करोड़ रुपये समाजसेवा पर खर्च करते हैं। ऐसे ही बहुत से ऐसे लोग हैं, दुनिया का एक सबसे बड़ा फुटबॉल खिलाड़ी, सादिओ माने ऐसा है जो अपने घिसे-पिटे पुराने मोबाइल फोन का इस्तेमाल करता है, उसके हाथ में एक पुराना फोन दिखा जिसकी स्क्रीन भी क्रैक हो चुकी थी। वह अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज सेवा पर खर्च करता है। वह अपने फोन को बदलने पर भी जरा सा खर्च करना नहीं चाहता क्योंकि उतने पैसों से किसी और एक की मदद हो सकती है। फुटबॉल से ही उसकी सालाना फीस 75 करोड़ रुपये से अधिक है।
इसलिए लोगों को अपने बच्चों के सामने भी ऐसी मिसाल पेश करने की जरूरत है कि जरूरत जितने ही सामान लिए जाएं, और जरूरत पूरी न होने पर ही उन्हें बदलकर दूसरा सामान लिया जाए। जो अतिसंपन्न लोग हैं उनको छोडक़र बाकी सब लोगों की जिंदगी की प्राथमिकताएं महंगे सामान बदल देते हैं, और सामानों को, ब्रांड को, नए मॉडल को जरूरत से अधिक महत्व देने के बजाय जिंदगी की दूसरी बातों को महत्व देना सीखना चाहिए, जो कि न पैसे से मिल सकती हैं, और न ही पैसे न रहने पर वे कहीं चली जाती हैं। जिंदगी की बुनियादी सोच ऐसी रहनी चाहिए कि जो बाजार में रोज आने वाले नए सामानों से अधिक खूबी रखने वाली हो।
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वामपंथी राज वाले केरल के कन्नूर विश्वविद्यालय में अभी एक नया बवाल चल रहा है कि वहां पर एमए, शासन एवं राजनीति, के पाठ्यक्रम में हिंदुत्व के बड़े-बड़े नामों की लिखी हुई किताबों को शामिल किया गया है। विनायक दामोदर सावरकर, एमएस गोलवलकर, और दीनदयाल उपाध्याय की किताबों को कोर्स में शामिल करने पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग उबल पड़े हैं, और उन्होंने इसे शिक्षा के भगवाकरण का एक काम बताया है। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के कुलपति का यह कहना है कि पोस्ट ग्रेजुएट छात्र-छात्राओं को सभी विचारधाराओं को पढऩे की जरूरत है ताकि वे बाकी विचारधाराओं के साथ तुलना करके एक आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकें। कुलपति का कहना है कि पोस्ट ग्रेजुएट नौजवान छोटे बच्चे नहीं होते हैं कि वे किसी के लिखे हुए को पढक़र उससे सीधे प्रभावित हो जाएं बल्कि अलग-अलग विचारधाराओं को पढऩे के बाद विश्लेषण की उनकी क्षमता बढ़ती है। कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति ने देश के दूसरे प्रमुख विश्वविद्यालयों का नाम भी गिनाये हैं जहां पर सावरकर और गोलवलकर का लिखा हुआ पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
दूसरी तरफ केरल के उच्च शिक्षा मंत्री ने पाठ्यक्रम में इस जोड़-घटाने को अति संवेदनशील मामला बतलाया है और कहा है कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सांप्रदायिक सोच को जोडऩा एक खतरनाक काम है, अगर जरूरत रही तो पाठ्यक्रम से इन चीजों को हटाया जाएगा। इस मुद्दे को लेकर केरल, और केरल के बाहर के भी अलग-अलग तबकों का अलग-अलग कहना है। एक दिलचस्प फेसबुक पोस्ट कांग्रेस के सांसद और कांग्रेस के भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हुए शशि थरूर की है। थरूर एक सुपरिचित लेखक भी हैं और वे केरल से निर्वाचित लोकसभा सदस्य भी हैं। उन्होंने लिखा है कि कुछ दोस्तों ने शैक्षणिक आजादी की हिमायत करते हुए मेरे कथन को खारिज किया है, मेरा यह मानना है कि हमें हर नजरिए को पढऩे की जरूरत रहती है, उस नजरिए को भी जिससे कि हम असहमत रहते हैं। अगर हम सावरकर और गोलवलकर को नहीं पढ़ेंगे तो किस आधार पर उनकी सोच का विरोध करेंगे? उन्होंने कहा कि कन्नूर विश्वविद्यालय तो गांधी और टैगोर को भी पढ़ाता है। थरूर का कहना है कि किसी समाज में दलगत राजनीति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बौद्धिक आजादी रहती है। उन्होंने लिखा कि यह सोचना बेवकूफी की बात होगी कि किसी की विचारधारा से अपरिचित रहने से उस विचारधारा को परास्त करने में मदद मिलेगी। उन्होंने लिखा-मैंने अपनी किताबों में सावरकर, गोलवलकर को काफी खुलासे से लिखा है, और उनका विरोध किया है।
हिंदुस्तान में उच्च शिक्षा ही नहीं प्राथमिक और बाकी स्कूल शिक्षा भी राजनीतिक और धार्मिक सोच से समय-समय पर प्रभावित होती रही हैं। जैसी राज्य सरकार रहती है वैसी सोच में किताबें ढल जाती हैं. पाठ्यक्रम को तय करने में किसी तरह की कोई आजादी नहीं रहती, न ही स्कूलों को, न विश्वविद्यालयों को। आज हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों में स्कूलों में कई किस्म की सांप्रदायिक बातें पढ़ाई जा रही हैं, जिन्हें लेकर लोगों की बड़ी आपत्ति है, लेकिन क्योंकि सरकार चलाने वाली पार्टी की सोच वैसी है, इसलिए वहां पर अब किताबें उस सोच को पढ़ा रही हैं। इस विवाद को हम कुछ दूर से बैठकर देख रहे हैं, अभी हमने कन्नूर विश्वविद्यालय के पूरे पाठ्यक्रम को नहीं देखा है कि वहां पर इनकी किताबें इनकी विचारधारा को बताने की हैं, या उस विचारधारा का प्रोपेगेंडा है? फिर भी है कि यही पैमाना गांधी या दूसरे धर्मनिरपेक्ष सोच रखने वाले लोगों पर भी लागू होगा कि उनकी किताबें या उनके लिखे हुए का कौन सा हिस्सा पढ़ाया जा रहा है? क्या वह हिस्सा उनकी विचारधारा से परिचय कराने वाला है, या इस परिचय से कहीं आगे बढक़र, कहीं अलग जाकर उनकी विचारधारा का प्रचार करने वाला है? यह बहुत नाजुक पक्की बात है, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण बात भी है। केरल के इस विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम तय करने वाली कमेटी ने क्या सोचकर इन चीजों को पाठ्यक्रम में जोड़ा है, यह तो उसकी बैठकों की कार्रवाई में अगर दर्ज हुआ होगा तो उससे समझा जा सकता है, लेकिन हम इस बात को इतना आसान भी नहीं मान रहे हैं जितना इसे शशि थरूर कह रहे हैं। पहली बात तो यह है कि कौन सी विचारधारा कितनी महत्वपूर्ण है इसका मूल्यांकन करना भी पाठ्यक्रम कमेटी का काम होना चाहिए। अब अगर विचारधारा के नाम पर आसाराम या राम रहीम की विचारधारा को भी पढ़ाया जाए और कहा जाए कि जिसे खारिज करना है उसकी विचारधारा को पढऩा जरूरी है तो फिर अलग-अलग किस्मों से कई लोगों की विचारधाराओं को पढ़ाना चाहिए, जिसमें नक्सलियों की विचारधारा भी हो सकती है, जिसमें दूसरे किस्म के कई और अपराधियों की विचारधारा भी हो सकती है, हिटलर की विचारधारा भी हो सकती है, और फूलन देवी की विचारधारा भी हो सकती है। किस विचारधारा का कौन सा हिस्सा किस अनुपात में पढ़ाया जाए, उसे किस संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में पढ़ाया जाए, उसके साथ किस हिसाब से एक तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए, यह एक बहुत जटिल और नाजुक मामला है।
दूसरी बात यह कि पोस्ट ग्रेजुएट छात्र-छात्राओं को बहुत अधिक परिपच् को मान लेना भी ज्यादती होगी। इस देश में नौजवान पीढ़ी की परिपच्ता ऐसी बहुत अधिक दिख नहीं रही है। अगर नौजवान वोटर जो पहली बार या दूसरी बार वोट डाल रहे हैं, वे अगर इतने ही परिपच् रहते, इतने ही जिम्मेदार रहते, उनकी राजनीतिक समझ इतनी मजबूत हो चुकी रहती, तो देश-प्रदेश में कई जगह कई किस्म के लोग, और कई किस्म की पार्टियां भला कैसे जीत जाते? इसलिए पाठ्यक्रम को तय करने वाले लोगों की अपनी सोच और विश्वविद्यालय को चलाने वाली विद्या परिषद और कार्यपरिषद जैसे फोरम को भी अपनी सोच का इस्तेमाल करना चाहिए, और अभिव्यक्ति की, विचारों की सारी स्वतंत्रता के साथ-साथ एक बड़ी बात यह भी है कि नौजवानों के दिल-दिमाग में भारतीय संविधान के मूल तत्व, भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी बातों को बैठाना जरूरी है, जो कि किसी भी दलगत राजनीति से परे की निर्विवाद बातें हैं। अगर देश की कोई सोच है इन बातों को कमजोर करने वाली है, इनके खिलाफ लोगों को सांप्रदायिक बनाती हैं, धर्मांध बनाती हैं, कट्टर बनाती हैं, वैज्ञानिकता से दूर ले जाती हैं, तो उन बातों का एक ऐसा विश्लेषण ही कोर्स में शामिल करना चाहिए जिससे उन बातों को महिमामंडित ना किया जाए, बल्कि उनकी उनका आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाए। इस देश में कुछ किस्म की सोच ने लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है और लोकतंत्र के साथ-साथ इस देश में लोकतंत्र के आने के पहले से जो धार्मिक सहिष्णुता चली आ रही थी, उसे भी हिलाकर रख दिया है। इसलिए वैचारिक उदारता के नाम पर, विचारधारा की विविधता के नाम पर, छात्र-छात्राओं के सामने एक जिम्मेदार विश्लेषण पेश होना चाहिए और किसी भी तरह से विध्वंसक विचारधारा को बढ़ावा देना इस देश के लिए ठीक नहीं होगा। वैसे भी यह देश सामाजिक समरसता की तबाही की कगार पर पहुंचा हुआ है, इसे और धक्का देने की गुंजाइश नहीं है।
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संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों ने अभी दुनिया में खेती पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट इस मायने में दिलचस्प है कि इसका अंदाज कहता है कि 80 फीसदी से ज्यादा सरकारी अनुदान या तो फसल की कीमतों को प्रभावित करते हैं, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, या दुनिया में किसानों के बीच गैर बराबरी को बढ़ाते हैं। यह अंदाज कम खतरनाक नहीं है क्योंकि वैसे भी दुनिया के गैर किसान लोगों के बीच में, टैक्स देने वाले संपन्न लोगों के बीच में, खेती पर दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर हमेशा से एक नाराजगी चली आती है कि इस सब्सिडी की वजह से किसान मेहनत करने के बजाए बैठे हुए सरकारी मदद पा जाते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट की एक बात यह भी है कि यह सब्सिडी को बंद करने के लिए नहीं कह रही है, यह रिपोर्ट कह रही है कि सब्सिडी किन लोगों को किस तरह से दी जा रही है, इसे सरकारों को दोबारा तय करना चाहिए।
आज मोटे तौर पर दुनिया में जगह-जगह किसानों को उनकी उपज अधिक दाम पर खरीदकर सरकारें सब्सिडी देती हैं या उन्हें खाद रियायती दर पर देती हैं, या उन्हें खेती के लिए कर्ज बाजार के भाव से कम ब्याज पर देती है. कई जगहों पर जिनमें हिंदुस्तान के छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी शामिल हैं वहां किसानों के खेती के कर्ज माफ कर दिए गए हैं, यह भी अलग-अलग राज्यों में कुछ जगहों पर कुछ मौकों पर हुआ है, और जाहिर है कि यह पूरा का पूरा खर्च सरकार के उसी खजाने से होता है जिससे विकास के दूसरे काम होते हैं, जिससे समाज के दूसरे तबकों को किसी तरह की सब्सिडी दी जाती है. तो यह पैसा कहीं अलग से नहीं आता है, किसान को किसी भी तरह से मिलने वाली सब्सिडी या कर्जमाफी सरकार की एक ही जेब से निकलती है, जिस जेब से दूसरे विकास काम होते हैं। तो यह बात ठीक है कि सरकारों को इस बारे में सोचना चाहिए कि उस सब्सिडी की वजह से समाज में कोई गैरबराबरी तो नहीं बढ़ रही है, एक दूसरी बात यह कि उस से पर्यावरण को कोई नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है।
अब हम बातचीत की शुरुआत छत्तीसगढ़ में धान की खेती पर राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी से करते हैं क्योंकि इस राज्य में धान की कीमत पूरे देश में सबसे अधिक दी जा रही है। जाहिर है कि इससे धान उगाने वाला यह इलाका और अधिक धान उगाने की तरफ बढ़ता है, और सरकार की और अधिक रकम इस अनुदान पर खर्च होती है। अब इस सब्सिडी को सरकार अलग-अलग न्याय योजना, या किसी और नाम से लोगों तक देती है, और मौजूदा कांग्रेस सरकार ने अपने घोषणापत्र में कर्ज माफी की बात कही थी और सरकार बनने के बाद पहले ही दिन कर्ज माफी का यह फैसला लिया था और कुछ दिनों में ही बैंकों तक किसानों के कर्ज का पैसा पहुंच गया था जिसके लिए राज्य सरकार ने हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। ऐसी बात नहीं है कि छत्तीसगढ़ में पहले से इस बात पर चर्चा न हुई हो कि इस अनुदान की वजह से, अधिक दाम पर धान की खरीदी की वजह से, धान की वह फसल अधिक से अधिक उगाई जा रही है जो अधिक से अधिक पानी भी मांगती है। जबसे यह राज्य बना तबसे एक दूसरा मुद्दा जो चर्चा में था वह था फसल चक्र परिवर्तन का। इसमें यह कोशिश हो रही थी कि धान के बजाय कुछ दूसरी फसलों को कैसे लिया जा सकता है जिससे किसान को उसकी बुनियादी लागत तो थोड़ी सी अधिक लगेगी, मेहनत थोड़ी अधिक करनी पड़ेगी, कुछ नए बीज और नई तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ेगा, लेकिन उसे फसल का धान के मुकाबले अधिक दाम मिलेगा। परंपरागत धान की फसल के साथ जुड़ी हुई किसान की सहूलियत ने उसे किसी दूसरी फसल की तरफ मुडक़र देखने नहीं दिया। और नमूने के तौर पर किसी एक जिले में किसी एक दूसरी फसल की बात को अगर छोड़ दें, तो मोटे तौर पर प्रदेश के तकरीबन तमाम किसान धान पर ही आश्रित हो गए हैं, और उसकी सरकारी खरीद के ही मोहताज हैं। अब इसका पर्यावरण पर असर यह पड़ रहा है कि खूब पानी लग रहा है और जो विविधता होनी चाहिए वह फसलों से खत्म होती चली गई है। फिर छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के लिए 5 हॉर्स पॉवर तक के पंप के लिए मुफ्त बिजली देना तय किया था, जो कि जारी है, और ऐसे पंप तमाम भूजल खींचकर खेतों में डाल देते हैं, और छत्तीसगढ़ में जमीन के नीचे पानी का स्तर हर बरस गिरते चले जा रहा है। पूरी दुनिया में अब किसी भी नई फसल को लेकर पहली चर्चा यह होती है कि उसमें पानी कितना लगेगा। तो धान उगाने वाले इलाके हमेशा अधिक पानी की खपत करते हैं, और धान का अंधाधुंध रकबा बढ़ते चले जाना पर्यावरण पर एक दबाव भी डालता है। लेकिन यह हमने केवल छत्तीसगढ़ की, हमारे सामने की खड़ी हुई बातों का जिक्र किया है, अलग-अलग राज्यों में ऐसे अलग-अलग बहुत से मामले हैं जिन पर स्थानीय स्तर पर भी विचार होना चाहिए और राष्ट्रीय स्तर पर भी, जिस पर कोई नीति या कार्यक्रम बनना चाहिए।
लगे हाथों हम यहां पर एक दूसरी योजना की बात करना चाहते हैं जो भारत सरकार ने अभी-अभी घोषित की है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने भारत में पाम ऑयल की खेती बढ़ाने के लिए एक बहुत बड़ी योजना की घोषणा की है जिसके तहत उत्तर-पूर्व के राज्यों और अंडमान जैसे राज्य में दूसरी खेती की बजाए, दूसरे पेड़ों के जंगल के बजाय, पाम ऑयल के बीज वाले पेड़ लगाने के लिए बहुत बड़ा अनुदान देना तय किया है, जिसके तहत शुरू के कुछ सालों में किसानों की आर्थिक मदद भी की जाएगी, जब तक उसकी फसल ना आने लगे, और किसानों को उसके लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य देना भी तय किया गया है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव होने से भारत के जो किसान पाम ऑयल की खेती करेंगे वह एकदम से नुकसान में ना चले जाएं। इसके कई मायने हैं, एक तो यह यह सब्सिडी क्या भारत में तेल के दूसरे बीज उगाने वाले परंपरागत किसानों को भी हासिल है, या एक विदेशी फसल को हिंदुस्तान में बढ़ावा देने की सरकार की इस योजना के लिए केवल पाम ऑयल के पेड़ लगाने वाले लोगों को ही इसका फायदा मिलेगा? एक दूसरा मामला यह है कि परंपरागत दूसरे तेल बीज की फसल के लिए चल रहे उद्योगों का क्या हाल होगा? ऐसे बहुत से मुद्दे हैं लेकिन इसके साथ-साथ एक मुद्दा यह भी जुड़ा हुआ है कि भारी सरकारी अनुदान के साथ शुरू होने वाली इस फसल में बहुत सारा पानी भी लगेगा जो कि पर्यावरण को प्रभावित करेगा, और एक बड़ी बात यह है कि बड़े पैमाने पर पाम ऑयल के पौधे लगाए जाने पर जैव विविधता खत्म होगी जिससे जंगलों और खेतों दोनों का एक बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। पेड़ों के साथ-साथ बहुत से पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों की जिंदगी भी जुड़ी रहती है, वह किस तरह से नुकसान झेलेगी इसका भी कोई अंदाजा नहीं है। लेकिन यह बात सबको समझ आ रही है कि सरकार की यह अतिमहत्वाकांक्षी योजना पर्यावरण के लिए, अर्थव्यवस्था के लिए, कई किस्म की दिक्कतें खड़ी कर सकती है, और किसी एक खास फसल के लिए केंद्र सरकार की इतनी बड़ी अनुदान योजना क्या देश की बाकी मौजूदा फसलों के साथ एक संतुलन नहीं बिगाड़ेगी? ऐसे कई सवाल हैं।
हम विचारों के इस कॉलम में आज उन पर बहुत विस्तार से टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि वह तकनीकी जानकारी के साथ और उनके विश्लेषण के साथ लिखे जाने वाले लंबे लेख के लायक मुद्दे हैं। लेकिन हम छत्तीसगढ़ में धान की जरूरत से अधिक फसल से लेकर उत्तर पूर्व में दूसरी फसलों और दूसरे पेड़ों के जंगलों की जगह लगाए जाने वाले पाम ऑयल के पेड़ों तक बहुत से मुद्दों के बारे में चर्चा करना चाहते हैं कि सरकारी अनुदान पर आधारित खेती के साथ पर्यावरण के जो मुद्दे जुड़े हुए हैं उन पर जरूर ध्यान देना चाहिए, जैव विविधता से जुड़े हुए जो मुद्दे हैं उनके बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि सरकारी अनुदान लोगों को उसका फायदा लेने उसका फायदा पाने की हकदार फसलों की तरफ बढ़ाता है और उस पर फिर सरकार का भी काबू नहीं रह जाता। सरकारें क्योंकि निर्वाचित रहती हैं इसलिए वे अनुदान को चुनावी फायदे से जोडक़र भी चलती हैं, इसलिए एक बार जब ऐसे अनुदान शुरू हो जाते हैं तो उनका खत्म होना मुश्किल या नामुमकिन हो जाता है। हम किसी भी अनुदान को बंद करने की सिफारिश नहीं कर रहे हैं लेकिन किसी भी अनुदान को शुरू करने के पहले केंद्र या राज्य सरकार को उस अनुदान के शुरू होने के बाद होने वाले पर्यावरण के फेरबदल के बारे में अध्ययन करने के लिए हम जरूर कह रहे हैं। यह जनता का पैसा है इसे जिन लोगों को मदद के लिए देना जरूरी लग रहा है उन्हें देना सरकार का हक है, लेकिन यह धरती का नुकसान करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। पर्यावरण का जो नुकसान सरकारों की नीतियां करती हैं उनमें धरती, पेड़, पानी, जंगल, जानवर, इनकी कोई आवाज इसलिए नहीं सुनी जाती कि इनके हाथ में कोई वोट नहीं होता है। लेकिन आने वाली पीढिय़ों को बहुत बुरी तरह नफा या नुकसान पहुंचाने वाली आज की चुनावी नीतियों के बारे में सरकारों को गंभीरता से सोचना चाहिए। सरकारें शायद कोई कड़वे फैसले ले नहीं सकतीं और लुभावने फैसले लेने के लिए बेताब रहती हैं, इसलिए पर्यावरण के जानकार लोगों को, समाज के जागरूक लोगों को, इन मुद्दों को लगातार उठाना चाहिए और लोगों के सामने रखना चाहिए कि चुनावी घोषणा पत्र के लोकप्रिय मुद्दे या कि लाल किले से की गई घोषणाएं इन 5 वर्षों के बाद अगले सौ-पचास बरस तक इस धरती के पर्यावरण को कैसे प्रभावित करेंगी।
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आज के दिन हिंदी दिवस मनाया जाता है। लोग इस भाषा के बारे में कई तरह की बातें लिखते हैं और सालाना श्रद्धांजलि के अंदाज में इस भाषा के महत्व को याद किया जाता है। ऐसे मौकों पर बहुत से लोग भावुक होने लगते हैं और राष्ट्रभाषा की उपेक्षा गिनाते हुए वे हिंदी सेवा की जरूरत पर बोलने और लिखने लगते हैं। हिंदी सेवा, हिंदी सेवक जैसे शब्द पूरे वक्त कहीं न कहीं हवा में तैरते रहते हैं। बहुत से लोग इसी नाम से बनाए गए संगठनों की कुर्सियों पर काबिज रहते हैं, कुछ लोग इसे एक पूर्णकालिक पेशे की तरह भी बना लेते हैं और वे हिंदी सेवक का दर्जा पाकर एक किस्म की शहादत की कोशिश में लग जाते हैं। यह माहौल कुछ उसी तरह का लगता है जैसे घूरों पर पलती गायों के देश में लोग पूर्णकालिक गौसेवक हो जाते हैं। गाय को सिर्फ पॉलिथीन वाला घूरा नसीब होता है और गौसेवक गाय के हिस्से की रोटी खाने लगते हैं।
हिंदी भाषा की सेवा बड़ा मजेदार शब्द है। हिंदी को कम पढऩे वाले कोई विदेशी अगर सुनेंगे तो वे हिंदी को मां समझेंगे और उन्हें लगेगा कि ऐसे सेवक मां के पैर दबाने में लगे रहते हैं। हम अपनी साधारण समझ से जब यह सोचते हैं कि इस बड़े देश में सबसे बड़ा हिस्सा जब हिंदी बोलने वालों का है, तो फिर हिंदी इस्तेमाल करने वालों का बुरा हाल क्यों है? कुछ लोग इस बात को मुगल राज तक ले जाएंगे जब भारत में उर्दू का प्रचलन शुरू हुआ और सरकारी कामकाज उसमें होने लगा। फिर अगर देखें तो ईस्ट इंडिया कंपनी आई और देश का सरकारी काम, अदालती काम उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी में भी होने लगा। फिर जब भारत के आजाद होने का वक्त आया, देश के संविधान को बनाने की बात आई, तो दुनिया के बहुत से संविधानों की मिसालें अंग्रेजी में थीं, और भारत का उस वक्त का सत्ता का तबका अंग्रेजी जानने-समझने वाला था, तो कानून अंग्रेजी में बना। सरकार का कामकाज भी आजादी के बाद अंग्रेजी में शुरू हुआ, इसलिए देश के बीच के एक बड़े हिस्से को छोडक़र बाकी राज्यों में हिंदी बोलचाल की भाषा भी नहीं थी, बोली भी नहीं थी।
भारत के नक्शे को अगर देखें तो दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान इतने राज्य ही अपने थोड़े या अधिक हिस्से में हिंदी बोलने वाले थे, बाकी के तमाम राज्य हिंदी से परे की दूसरी जुबानों वाले थे। और जिन राज्यों को यहां हम गिना रहे हैं, इनके भीतर भी क्षेत्रीय बोलियां बहुत ताकतवर थीं, जैसे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी, और दो-तीन और बोलियां, ऐसा हाल हिंदी भाषी इन प्रदेशों का भी था। जैसे भोजपुरी में, राजस्थानी में, हरियाणवी और गढ़वाली में कितने ही किस्म की फिल्में बनती हैं, संगीत रिकॉर्ड होता है, साहित्य लिखा जाता है, लोकगीत चले आ रहे हैं। इनकी लिपि देवनागरी होने से इनको हिंदी भाषी मान लिया गया और वह गिनती हकीकत से थोड़ी दूर रही।
लेकिन यह भी बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था, और हिंदी से सत्ताहीन तबके, कमजोर तबके, उद्योग-बाजार और आयात-निर्यात से परे के तबके, तकनीकी शिक्षा और उच्च शिक्षा से परे के तबके अपना काम चलाते रहे और कमजोर बने भी रहे। चूंकि कामयाबी का एक रिश्ता अंग्रेजी से एक सदी से अधिक से बना हुआ था, इसलिए वह चलते रहा, और देश के बाहर हिंदुस्तान का अधिकतर लेना-देना अंग्रेजी भाषी देशों से था इसलिए भी वह चलते रहा। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते-समझते थे, और जिनके लिए हिंदी में ऊंची पढ़ाई करना मुश्किल था, बाहरी दुनिया से संपर्क मुश्किल था, कम्प्यूटर से लेकर टेक्नोलॉजी तक का काम मुश्किल था, वे पीछे रहते चले गए। और जिस तरह पीछे रह गई एक पीढ़ी की अगली पीढ़ी के पीछे रहने का खतरा अधिक रहता है, उसी तरह का हाल हिंदी बोलने वालों का हुआ। दूसरी तरफ हिंदी को एक भावनात्मक मुद्दा मानने वाले लोग उसकी सेवा के नाम पर अंग्रेजी के विरोध को आक्रामक तरीके से बढ़ाते रहे, और हिंदी इलाकों में एक के बाद दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी की जानकारी के बिना, अंग्रेजी में काम करने वाले राज्यों के लोगों से पीछे रहती चली गईं।
भाषा को लेकर आज इस जगह इस चर्चा में अपने विचार लिखने के लिए हमारे पास दो छोटी-छोटी बातें हैं। एक तो यह कि हिंदुस्तान में जो लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं उनको यह भी समझना होगा कि जिस शुद्ध हिंदी को वे राष्ट्रभाषा करार देना चाहते हैं, वह हिंदी यहां की राष्ट्रभाषा नहीं रही, नहीं है, और नहीं रहेगी। मुगलों की उर्दू और अंग्रेजों की अंग्रेजी आने के पहले भी हिंदुस्तान के आज के कुछ हद तक के हिंदी भाषी राज्यों में स्थानीय और क्षेत्रीय बोलियों की इतनी जबर्दस्त पकड़ थी, और आज भी है कि आज की खड़ी बोली जैसी हिंदी, शुद्ध कही जाने वाली हिंदी, मोटे तौर पर बहुत सीमित थी। जिस तरह हिंदी को अलग, और हिंदुस्तानी को अलग मान लिया जाता है, उससे हिंदी का बहुत बड़ा नुकसान हुआ। आज की हिंदी के साथ उर्दू, अंग्रेजी, और हिंदुस्तान की दर्जनों दूसरी भाषाओं और बोलियों ने मिलकर जो हिंदुस्तानी जुबान बनाई है, उसमें से फेंटकर सिर्फ खालिस हिंदी को जब अलग कर लिया जाता है, और उसे एक सेवा की तरह की भावना से जोड़ दिया जाता है तो वह बाकी हिंदुस्तानियों के काम की नहीं रह जाती। जिस तरह किसी मिली-जुली हिंदू-मुस्लिम समाधि या दरगाह पर जब इनमें से किसी एक ही धर्म के रीति-रिवाज, उसी धर्म के रंगों को लेकर हावी हो जाते हैं, तो दूसरे धर्म वहां से हटना बेहतर समझते हैं। इसी तरह का हाल हिंदी का हुआ, और हिंदी इलाकों को यह ठीक से पढऩे-समझने भी नहीं मिला कि गैरहिंदी राज्यों में, खासकर दक्षिण के राज्यों में हिंदी किस हद तक बेकाम की जुबान है। उसका न कोई अस्तित्व है, न उसकी वहां कोई जरूरत है। वहां हिंदी जानने, समझने और बोलने वाले लोग ऐसे कामगार हैं जिनका कि भारत के हिंदी भाषी राज्यों से कामकाज का वास्ता पड़ता है। इससे परे वे अपनी क्षेत्रीय भाषा में खुश हैं और आगे बढऩे की संभावनाएं देने वाली अंगे्रजी जुबान के साथ खुश हैं।
हिंदुस्तानी से अपने-आपको अलग करने के फेर में शुद्धतावादी हिंदी ने अपने दायरे को बहुत सीमित कर लिया। वरना एक वक्त था जब प्रेमचंद जैसे लेखक उर्दू को भी समझते थे, उर्दू में भी लिखते थे, और जब वे हिंदी लिखते थे, तो वह गरिष्ठतावादी, शुद्धतावादी हिंदी से परे की हिंदुस्तानी जुबान होती थी, यही वजह है कि वह आसानी से लोगों के समझ आती थी, और आज पौन सदी बाद भी वह आज के बहुत से हिंदी लेखन के मुकाबले समझने में अधिक आसान है। हिंदी की सेवा या शुद्धता के नाम पर जो लोग लगे रहते हैं, उन्हीं से इस भाषा की संभावनाओं को नुकसान हुआ। किसी भाषा का असरदार होना, उसकी संवाद-क्षमता का अधिक होना जरूरी होता है, न कि उसका शुद्ध होना। हिंदी को जब लगातार शुद्ध बनाए रखने की ऐसी कोशिशें हुईं कि वह अधिक से अधिक लोगों की समझ से परे होती चली गई, तो वह अपना असर और खोती चली गई, क्योंकि वह कम लोगों के इस्तेमाल की रह गई। हिंदी के साथ एक दिक्कत और यह हो गई है कि अंग्रेजी से नापसंदगी के चलते हिंदी के जो लोग अंग्रेजी से परहेज करने लगे, उनका ज्ञान-संसार भी सीमित रहने लगा, और ज्ञान के विकल्प की तरह उन्होंने भावनाओं और विशेषणों का इस्तेमाल अधिक किया।
भाषा इस्तेमाल के लिए होती है, उसका मकसद किसी से अपने पैर दबवाना नहीं है, उसका मकसद किसी एक की बात को दूसरे तक पहुंचाना है। भाषा एक औजार की तरह है जो अगर अच्छी तरह अपना काम करे, हुनरमंद कारीगर के काम में उससे मदद मिले, तो ही उस औजार की इज्जत है। जिस घन से अच्छा वार हो सके, वह लोहे का भी अच्छा। और जिसके वार से चोट न पहुंचे, वह सोने का घन भी किसी काम का नहीं। इसलिए भाषा को बांहें फैलाकर दूसरी भाषाओं और बोलियों से मिलकर चलना चाहिए, उन्हें गले मिलाकर चलना चाहिए। भाषा से बिल्कुल परे की एक मिसाल हम यहां देना चाहेंगे जो कि हमें अपने किस्म की बेमिसाल बात लगती है। सिखों के सबसे महान ग्रंथ गुरूग्रंथ साहिब को देखें तो गुरूनानक देव ने उस वक्त के मुस्लिम, हिंदू, दलित, सभी तबकों के संतों की बातों को सिखों के इस ग्रंथ में उनके नाम सहित जोड़ा। गुरूनानक चाहते तो उन्हें सिर्फ अपनी बातों से ही यह ग्रंथ पूरा कर देने से कौन रोक सकता था? दुनिया के अधिकांश धार्मिक गं्रथ सिर्फ अपनी ही बातों के होते हैं। लेकिन धर्मों की ऐसी दुनिया में जब गुरूनानक देव ने बेझिझक दूसरे धर्मों को इतना महत्व दिया, तो उनकी उस दरियादिली से भी यह ग्रंथ इतना महत्वपूर्ण बन पाया। इसी तरह का हाल जुबान के मामले में अंग्रेजी का रहा, जिसने दुनिया की दर्जन भाषाओं से सैकड़ों शब्दों को हर बरस अपने में शामिल करने का सिलसिला चला रखा है और अंग्रेजी के शब्दकोषों में ऐसी लिस्ट हर साल जुड़ती भी है।
विचार के इस कॉलम में इस बड़े मुद्दे पर पूरा लिखना मुमकिन नहीं है इसलिए हम आधी-अधूरी बात को ही यहां छोड़ रहे हैं, यहां उठाए गए कुछ पहलुओं पर कुछ सोच-विचार की उम्मीद के साथ।
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भारत के ठीक पड़ोस का एक देश श्रीलंका इन दिनों आर्थिक इमरजेंसी से गुजर रहा है। देश की हालत यह हो गई है कि लोग दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं, दुकानों में सामान खाली हो चुका है, लोग खाली झोले लिए हुए दुकानों के सामने लंबी कतारों में हैं, सामानों के दाम आसमान पर पहुंच रहे हैं. जो सामान आयात किया जाता है उसके कारोबारी भी बुरी दिक्कतें झेल रहे हैं क्योंकि श्रीलंका के रुपए का दाम डॉलर के मुकाबले 200 तक पहुंच गया है, और सरकार ने चीजों के आयात या विदेशी मुद्रा के इस्तेमाल पर कई तरह की बहुत ही कड़ी रोक लगा दी है। देश में हालत कितनी खराब है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां की फौज के एक मेजर जनरल को खाने-पीने के सामानों के इंतजाम में लगाया गया है कि वह व्यापारियों की जमाखोरी पर नजर रखे जहां नियमों के खिलाफ सामान इक_े किए गए हैं उन्हें जप्त करे, और सरकारी ढांचे के तहत उन्हें उचित दामों पर ग्राहकों को बेचने का इंतजाम करें। श्रीलंका की सेना अब इस काम को देख रही है। लेकिन यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि श्रीलंका की इस नौबत के लिए कौन सी बातें जिम्मेदार हैं?
इस सिलसिले की शुरुआत कुछ जानकार लोगों के मुताबिक अप्रैल के महीने से होती है जब वहां के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने यह फैसला लिया कि पूरे देश में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद किया जा रहा है। क्योंकि रासायनिक खाद पूरे का पूरा आयात होता था, इसलिए यह सरकार के हाथ में था कि खाद का आयात, और इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया जाए और देश को पूरी तरह जैविक खाद की तरफ ले जाया जाए। खबरें बताती हैं कि राष्ट्रपति राजपक्षे ने संयुक्त राष्ट्र में भाषण देते हुए अपने इस फैसले को ऐतिहासिक फैसला बताया था और दुनिया के भविष्य को बदलने वाला भी। राजपक्षे ने दुनिया के दूसरे देशों को भी यह नसीहत दी थी कि वे भी पूरी तरह रासायनिक खाद को बंद करके पूरी तरह जैविक खाद की तरफ जाएं। अब दिक्कत ये हुई है कि श्रीलंका की खेती जिसमें कई किस्म की फसल देशों से निर्यात होती थी, उनमें चाय पत्ती की फसल इस बार आधी ही रह जाने की आशंका चाय उगाने वाले संगठनों को है. कुछ ऐसा ही किसान संगठनों का मानना है कि देश में चावल की उपज इस साल आधी रह जाएगी। राष्ट्रपति के इस अतिमहत्वाकांक्षी या उन्मादी किस्म के फैसले का नतीजा यह निकला है कि देश में जैविक खाद का उत्पादन तो रातों-रात नहीं बढ़ पाया, लेकिन रासायनिक खाद आना बंद हो गया। श्रीलंका के बाहर के भी बहुत से कृषि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस किस्म का फैसला एक रसायन-विरोधी सोच या पसंद को बताने वाला तो हो सकता है, लेकिन इसका व्यावहारिकता से कोई लेना-देना नहीं है। वैज्ञानिक मानते, और जानते हैं कि दुनिया के किसी देश ने इस तरह रातों-रात रासायनिक खाद को छोडऩे में कामयाबी नहीं पाई, और न ही कोई देश पूरी तरह से जैविक खाद पर जा पाया है। यूरोप के जो सबसे संपन्न देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था सबसे मजबूत है, वे देश भी पूरी तरह जैविक खाद पर नहीं जा पाए हैं।
दुनिया के वैज्ञानिक और अर्थशास्त्रियों का यह अंदाज है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति का यह सनकी, मनमाना, और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के लिया गया यह फैसला देश को तबाह करने जा रहा है, क्योंकि इसके पीछे न किसानी की समझ है, न अर्थशास्त्र की समझ है। यह केवल एक ऐसे शासक के तानाशाह दिमाग से निकला हुआ फैसला है, जो यह सोचता है कि वह कुछ भी कर सकता है। क्योंकि श्रीलंका की सरकार पूरी तरह से राजपक्षे कुनबे तले दबी हुई है, इसलिए कुनबे से भरा हुआ मंत्रिमंडल राष्ट्रपति के साथ है, और कोई वहां पर विरोध कर नहीं पा रहा है। राजपक्षे के छोटे भाई महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री हैं, तीन और मंत्री घर के हैं. कहने के लिए तो देश में आज सिर्फ आर्थिक आपातकाल लगाया गया है लेकिन वहां के कानून के जानकार लोगों का कहना है कि यह पूरी तरह से पूरा-आपातकाल ही है, और इसमें नागरिकों पर वे सारे प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जो इसके पहले के आपातकाल में लगाए गए हैं। इसका मतलब यह है कि लोग वहां सरकार की किसी बात का विरोध नहीं कर पाएंगे, सरकार उन्हें बिना लंबी सुनवाई जेलों में बंद रख सकेगी, और देश की फसल गिरने की जो खतरनाक नौबत वहां आई हुई है, उसे छुपाए रखने के लिए, दबाए रखने के लिए मीडिया और आम लोगों को कुचला भी जा सकता है। श्रीलंका जो कि अभी कुछ अरसा पहले तक इस इलाके की एक अच्छी अर्थव्यवस्था माना जाता था, उसने अपने शासन प्रमुख के इस एक मनमाने फैसले के चलते दम तोड़ दिया है, और लोगों को खाने-पीने तक के सामान नसीब नहीं हो रहे हैं। यह किसी भी देश के लिए एक भयानक नौबत है कि वहां की सेना राशन का इंतजाम देख रही है।
जब कोई देश इस किस्म की भयानक हालत का शिकार रहता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय शिकारियों के लिए एक शिकार भी बन जाता है। भारत के बहुत से लोग पिछले वर्षों की श्रीलंका की चीन नीति देखते हुए कुछ परेशान भी चल रहे थे कि श्रीलंका धीरे-धीरे चीन पर अधिक से अधिक निर्भर होते चल रहा है। अब आज हालत यह है कि श्रीलंका के इस आर्थिक आपातकाल के पहले के एक साल में चीन ने उसे बहुत बड़ा कर्ज दिया हुआ है। श्रीलंका की कोरोना की पहली लहर से जूझने की कई जगहों पर तारीफ हो रही है और इसके साथ ही यह याद रखना जरूरी है कि श्रीलंका को चीन से कोरोना की वैक्सीन मिली, भारत से नहीं मिली। श्रीलंका को चीन से कर्ज मिला, भारत से नहीं मिला। भारत के पिछले कर्ज की वापिसी के लिए श्रीलंका ने कुछ और समय मांगा है, उस पर भी भारत ने अब तक कोई फैसला नहीं लिया है। इसलिए आज चीन आज श्रीलंका के आड़े वक्त पर उसके साथ में खड़ा हुआ देश है, और भारत को यह सोचना चाहिए कि एक तरफ पाकिस्तान, कुछ दूरी पर अफगानिस्तान, और इधर श्रीलंका, क्या यह सब मिलकर भारत की एक चीनी घेराबंदी नहीं बन रहे हैं? दूसरी तरफ आज श्रीलंका जैसी मुसीबत से गुजर रहा है और उसे मदद की जितनी जरूरत है, उसमें हिंदुस्तान को अपनी विदेश नीति के तहत श्रीलंका के किस हद तक काम आना है, इसे तय किया जाना चाहिए। अगर सरकार यह तय करती है कि उसे कुछ भी नहीं करना है, तो यह एक फैसले के तहत होना चाहिए, न की कोई फैसला न लेने से ऐसी नौबत आनी चाहिए।
श्रीलंका दुनिया के तमाम देशों के लिए मनमाने आत्मघाती तानाशाह फैसले का शिकार एक देश बनकर बुरी हालत में सामने खड़ा है, देखें आगे से कौन-कौन से देश और कौन-कौन से शासन प्रमुख क्या-क्या सबक लेते हैं। श्रीलंका की नौबत से दुनिया के दूसरे देशों को चाहे जो सबक लेना हो वे लेते रहें, और शायद यह सबक सबको लेना चाहिए कि कोई शासन प्रमुख अपने बेबुनियाद और मनमाने फैसलों से देश को किस तरह गड्ढे में डाल सकते हैं, और किस तरह लोकतांत्रिक देशों को ऐसे फैसलों, और ऐसे शासकों से बचना चाहिए। श्रीलंका की भुखमरी की नौबत की तरफ जाने के खतरे को देखते हुए भारत सहित दूसरे देशों को मनमाने सरकारी फैसलों के बारे में दोबारा सोचना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों के हिस्से का काम मामूली पढ़े-लिखे नेताओं को नहीं करना चाहिए।
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ऑस्ट्रेलिया में अभी वहां की सबसे बड़ी अदालत ने एक फैसला दिया है जिसमें उसने मीडिया कंपनियों को सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट के नीचे लोगों के किए गए कमेंट के लिए भी जिम्मेदार माना है. मानहानि के एक मामले में निचली अदालत से चलते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, और मीडिया कंपनियों का यह कहना था कि ये टिप्पणियां सोशल मीडिया पर दूसरे लोग करते हैं जिसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अदालत ने यह माना है कि जब मीडिया कंपनियां अपने समाचार या दूसरी सामग्री सोशल मीडिया पर पोस्ट करती हैं, तो उसका मतलब यही होता है कि वह लोगों को वहां पर टिप्पणी करने के लिए आमंत्रित कर रही हैं, या उनका उत्साह बढ़ा रही हैं। इसलिए उनकी टिप्पणियां मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी रहती है। मीडिया और सोशल मीडिया के संगम को लेकर यह एक दिलचस्प फैसला है और दिलचस्प इसलिए भी है कि ऑस्ट्रेलिया एक परिपच् लोकतांत्रिक देश है, और वहां की अदालत का यह फैसला मिसाल के तौर पर दुनिया के दूसरे कई देशों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा जहां की अदालतों के सामने मीडिया कंपनियों के लिए यह एक चुनौती रहेगी कि वे ऐसे तर्क को खारिज करने के लिए कोई दूसरे तर्क दें। फिलहाल ऑस्ट्रेलिया के सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया कंपनियों के इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, और इस पर अंतिम फैसला दे दिया है कि एक सार्वजनिक फेसबुक पेज बनाने और उस पर समाचार सामग्री साझा करने से मीडिया कंपनियां प्रकाशक हो जाती हैं, क्योंकि उन्होंने पाठकों को टिप्पणियां करने के लिए मंच उपलब्ध कराया, और उन्हें टिप्पणियां करने के लिए प्रोत्साहित किया।
अब हिंदुस्तान में इससे मिलती-जुलती नौबत के बारे में अगर देखें तो सोशल मीडिया और इंटरनेट के आने के पहले से अखबारों में पाठकों के पत्र नाम का एक कॉलम बड़ा लोकप्रिय हुआ करता था और अखबार अपने पाठकों का उत्साह बढ़ाते थे कि वे चि_ियां लिखें, और उनमें से चुनिंदा चि_ियां प्रकाशित की जाती थीं। धीरे-धीरे जब लोगों में कानूनी जागरूकता बढ़ी और कुछ मामले मुकदमे होने लगे तो अखबार उसके नीचे यह लाइन लिखने लगे कि पाठकों की राय से संपादक की सहमति अनिवार्य नहीं है। हालांकि उस बात का कोई कानूनी वजन नहीं था, क्योंकि विचार से सहमति हो या असहमति, जब अखबार में छपा है तो उसे तो उसके छपने का फैसला तो संपादक ने ही लिया है. पाठकों के विचारों से संपादक असहमत हो सकते हैं, लेकिन जब छपा है तो संपादक की सहमति छपने में तो थी ही। किसी मामले-मुकदमे में ऐसी नौबत आई या नहीं, ऐसा तो अभी याद नहीं पड़ता है, लेकिन हाल के वर्षों में हिंदुस्तानी मीडिया में एक चलन और बढ़ गया है। अखबारों में या पत्रिकाओं में, या फिर इंटरनेट पर वेब साइटों में भी, लोगों के लिखे गए लेख के नीचे छापा या पोस्ट किया जाता है कि यह लेखक की निजी राय है। यह लाइन अपने आपमें बड़ी हास्यास्पद इसलिए है कि लेखक की अगर निजी राय नहीं होती और वह किसी और की राय को लिखते, तो जाहिर है कि उसे दूसरे के नाम के साथ लिखते। यह फिर अखबार या दूसरे किस्म का मीडिया अपनी जिम्मेदारी से कतराने की कोशिश करते हुए दिख रहा है ताकि किसी कानूनी बखेड़े के खड़े होने पर यह कहा जा सके कि हमने तो पहले ही लिख दिया था कि यह विचार लेखक के अपने हैं। लेखक का तो जो होना है वो होगा, लेकिन मीडिया के प्रकाशक अपनी जिम्मेदारी से कहीं बरी नहीं हो सकते।
ऑस्ट्रेलिया के इस मामले को लेकर यह समझने की जरूरत है कि सोशल मीडिया या वेबसाइटों पर किसी मीडिया कंपनी की सामग्री के नीचे लोग जब अपनी प्रतिक्रिया लिखते हैं, तो उस पेज के प्रबंधक को यह अधिकार रहता है कि वे अवांछित या नाजायज टिप्पणियों को हटा सकें। जो कंपनियां कुछ पोस्ट करती हैं, उन कंपनियों पर यह जिम्मेदारी सही है कि अगर वहां मानहानि या भडक़ाने की बातें लिखी जा रही हैं, तो उन्हें हटाना भी इन कंपनियों की जिम्मेदारी है, और वे अगर इसे नहीं हटाती हैं तो इसे उनकी सहमति या अनुमति माना जाना चाहिए। सोशल मीडिया का तो कहना मुश्किल होगा लेकिन बहुत सी वेबसाइटों पर लोगों की लिखी गई टिप्पणियां तुरंत ही पोस्ट नहीं हो जाती उन्हें वेबसाइट संचालक या उसके मालिक जब देख लेते हैं, और उससे सहमत रहते हैं तभी वे पोस्ट होती हैं।
ऑस्ट्रेलिया के सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे हिंदुस्तान पर लागू न होता हो लेकिन आगे-पीछे क्योंकि इंटरनेट और सोशल मीडिया की विश्वव्यापी मौजूदगी है, इसलिए दुनिया की अदालतों में एक दूसरे की मिसालें दी जाती रहेंगी। इसलिए इस बात से हम सहमत हैं कि पेशेवर मीडिया कंपनियों की पोस्ट की हुई सोशल मीडिया सामग्री पर जो टिप्पणियां होती हैं उनकी जिम्मेदारी से वे कंपनियां बरी नहीं हो सकतीं। कुछ ऐसा ही मामला राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया पेज पर भी होना चाहिए जिन पर लोग हिंदुस्तान में तो तरह-तरह की धमकियां देते हैं, और चरित्र हनन करते हुए लांछन लगाते हैं. ऐसे लोगों की लिखी गई बातों को अनदेखा करने के लिए इन राजनीतिक दलों को जिम्मेदार ठहराना चाहिए जिनके वेबपेज हैं। या तो वे ऐसी तरकीब निकालें कि उन पर पोस्ट होने के पहले उसे देख लें, या उसे पोस्ट होने के बाद हटाने के लिए एक नियमित इंतजाम करके रखें। मीडिया कंपनियों और राजनीतिक दलों को ऐसी रियायत नहीं दी जा सकती कि वे किसी मकान के मालिक की तरह दीवार बनाकर भीतर रहे लेकिन बाहर दीवार पर अगर कोई गालियां लिख जाए तो वे उसके लिए जिम्मेदार करार नहीं दिए जाएं। कारोबारी कंपनियों और पेशेवर राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी आम लोगों के मुकाबले अधिक होनी चाहिए क्योंकि वे अपने धंधे के नफे के लिए ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं।
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अमेरिका में 20 बरस पहले दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ था, और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो इमारतों को ओसामा बिन लादेन के विमानों ने जाकर ध्वस्त कर दिया था, जिसमें 3000 से अधिक लोग मारे गए थे, तब से लेकर अब तक इन 20 वर्षों में अमेरिका ने अफगानिस्तान, इराक के कई जगहों पर आतंक को खत्म करने के नाम पर लाखों लोगों को मारा लेकिन आतंकी हमले खत्म नहीं हुए। दुनिया के अलग-अलग बहुत से इलाकों में आतंकियों ने अमरीकियों पर हमले किए, कहीं उन होटलों को बम का निशाना बनाया जहां पर अमेरिकी ठहरे हुए थे, तो कहीं ऐसे नाइट क्लब में धमाका किया जहां दर्जनों अमेरिकी मारे गए। लेकिन दुनिया का हिंसा का हर बड़ा मामला आतंकवाद से जुड़ा हुआ हो यह भी जरूरी नहीं है, और वह धार्मिक आतंकवाद से जुड़ा हुआ हो यह भी जरूरी नहीं है। लोग जहां जिनके हाथ में जितने गैरजरूरी और जरूरत से अधिक ताकतवर हथियार आ जाते हैं वहां उनके दिमाग में हिंसा शुरू हो जाने का एक खतरा रहता ही है। आज जब चारों तरफ तालिबान की खबरें फैली हुई हैं और हिंदुस्तान जैसा देश इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि क्या कश्मीर में तालिबान की अगुवाई में, या उसकी मदद से बाहर से आतंकी आ सकते हैं, तो भारत अमेरिका और रूस जैसे दूसरे देशों से इस बारे में बात भी कर रहा है। उसने तालिबान से भी कहा है कि अफगानिस्तान को आतंकियों की पनाहगाह नहीं बनना चाहिए। यह एक और बात है कि तालिबान खुद ही दुनिया के सबसे बड़े आतंकी माने जाते हैं, और वे क्या करेंगे इसके बारे में किसी को कोई अंदाज है नहीं।
अब सोचने और समझने की बात यह है कि क्या हर हमला रोकने लायक होता है? न सिर्फ पाकिस्तान या हिंदुस्तान में, बल्कि दुनिया के सबसे अधिक चौकस और तैयार देशों में भी हमले होते हैं, और अमरीका जैसे सबसे अधिक तैयार देश में तो बिना किसी मजहबी आतंक वाले हमले भी हर बरस दर्जन भर तो हो ही जाते हैं, और कोई एक अकेला बंदूकबाज ही जाकर स्कूल-कॉलेज के बहुत से बच्चों को मार डालता है। इसलिए इस दुनिया में कोई अगर यह सोचे कि पुलिस और फौज की बंदूकों से हर जगह पर महफूज किया जा सकता है, तो वह निहायत ही नासमझी की बात होगी। दुनिया का बड़े से बड़ा इंतजाम भी किसी देश को आत्मघाती हमलों से नहीं बचा सकता। जब कोई आतंकी या किसी दूसरी किस्म का हमलावर यह तय कर ले कि उसे अपने-आपको उड़ाकर भी दूसरों को मारना है, तो भीड़ भरी जगहों पर कहीं पर भी लोगों को बड़ी संख्या में मारा जा सकता है। जब हम अपनी साधारण समझ-बूझ से ऐसे हमलों की गुंजाइश के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि दुनिया की आबादी के अधिकतर लोग आज इसीलिए जिंदा हैं, कि किसी ने उनको मारना अब तक तय नहीं किया है। अगर सरकारी इंतजाम से किसी के जिंदा रहने की बात करें, तो हिंदुस्तान जैसे सवा करोड़ से अधिक आबादी के देश में दो-चार करोड़ से अधिक लोगों को बचा पाना मुमकिन नहीं होगा।
इसलिए आज न सिर्फ पाकिस्तान या भारत, बल्कि दुनिया के तमाम देशों को यह सोचना होगा कि किस तरह इंसान और इंसान के बीच गैरबराबरी खत्म की जाए, किसी गरीब के हक छीनना कैसे खत्म किया जाए, किसी जाति या धर्म, किसी नस्ल या नागरिकता के लोगों को मारना किस तरह रोका जाए, ताकि बदले में जवाबी हमले में दूसरे लोग न मारे जाएं। कुल मिलाकर बात यह है कि जब तक दुनिया में आर्थिक और सामाजिक, धार्मिक और नस्लवादी भेदभाव खत्म नहीं होंगे, जब तक सामाजिक न्याय का सम्मान नहीं होगा, तब तक आतंक और हिंसा को खत्म करना मुमकिन भी नहीं होगा। और कल भी हमने इसी जगह भारत के उन लोगों को सावधान किया था जो कि आज यहां धार्मिक और सामाजिक उन्माद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि लोकतंत्र से ऊपर जाकर इस देश में कुछ तबकों के धार्मिक अधिकार खत्म करने की बात कर रहे हैं, कुछ लोग जो कि लोकतंत्र को खत्म करके एक धार्मिक-राज लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनको यह समझ लेना चाहिए कि जब हिंसा और बेइंसाफी बढ़ते हैं, तो फिर बेकाबू मौतें भी होती हैं। और अगर हिंदुस्तान या किसी दूसरे देश को जिंदा रहना है तो उन्हें सामाजिक न्याय की तरफ बढऩा होगा।
धर्म से परे भी समाज में आर्थिक न्याय जहां-जहां नहीं हुआ, भारत ऐसे तमाम इलाकों में आज नक्सल हिंसा से जूझ रहा है। इन इलाकों में सरकार के भ्रष्ट लोगों में गरीब आदिवासियों का जितना हक खाया होगा, आज सरकार नक्सल मोर्चे पर उससे हजार गुना गंवा रही है। हमारा हमेशा से यह मानना है कि सामाजिक न्याय देना, आतंक से जूझने के मुकाबले सस्ता पड़ता है, आसान रहता है, और जिंदगियां भी इसी तरह से बच सकती हैं। आज भारत में जिस तरह से एक सामाजिक अन्याय का माहौल खड़ा किया जा रहा है, उस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपने सांसदों को महज सुझाव देना काफी नहीं है। देश में एक न्यायपूर्ण वातावरण लाने की जरूरत है वरना सरहद पार एक मिसाल सामने है कि लोकतंत्र कमजोर और खत्म होने पर क्या हाल करता है। अफग़़ानिस्तान में अमरीका की बीस बरस की ज्यादती का नतीजा है कि वहां तालिबान कामयाब हुए हैं। हिंदुस्तान के भी देश-प्रदेश की सरकारों को ज्यादती से बचना चाहिए।
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छोटी-छोटी झूठी या नामौजूद चीजों से खुशियां हासिल, जैसे रफाल से अब चीन और पाकिस्तान घुटनों पर आ गए हैं, या थाली पीटने से कोरोना भाग जाएगा, और डॉक्टर का हौसला बढ़ जाएगा। जब लोग फरेब से खुश होने लगते हैं, तो कुछ असली कामयाबी जरूरी नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान में पिछले कई बरसों में लोगों को ऐसी कामयाबी का अहसास कराया गया है जो जमीन पर चाहे हो न हो, लोगों के मन में गुदगुदी करती है, और उनके अहंकार की अच्छी तरह मालिश कर देती है। उनमें देशप्रेम का एक ऐसा अहसास करा देती है जो हकीकत नहीं होता, और जिसकी कोई जरूरत भी नहीं होती। ऐसे देशप्रेम से उस देश का भी कोई भला नहीं होता जिसके लिए वह प्रेम दिखाया जा रहा है। ऐसे अहसास किसी देश की सरकार के कराए हुए ही हों, या किसी देश-प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के करवाए हुए ही होते हों, ऐसा भी नहीं है। किसी अखबार के मालक-चालक, यानी प्रकाशक-संपादक भी अपने आपके भीतर ऐसी खुशफहमी का शिकार हो सकते हैं। अगर वे लिखने में बहुत अच्छे हैं जिससे कि वाहवाही भी होती है, तो प्रकाशक की अपनी जिम्मेदारी में वे नाकामयाब भी हो सकते हैं। अपनी हसरतों को हकीकत मान लेने की यह चूक हर किस्म के लोगों में हो सकती है, इसके लिए किसी का सत्ता पर रहना जरूरी नहीं होता, और अपने मानने वालों की भीड़ को धोखा देना भी जरूरी नहीं होता। अमूमन भीड़ खुद ही धोखा खाने को तैयार रहती है, और अलग-अलग दौर में वह अलग-अलग किस्म के लोगों के लिए दीवानगी दिखाने को एक पैर पर खड़ी रहती है।
नामौजूद चीजों से फख्र और खुशी हासिल करना महज आज की किसी बात से हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है। इतिहास इतना लंबा रहता है, और उसके भी पहले की पुराण कथाएं, बाइबिल की कहानियां, या कुछ दूसरे पुराने धर्मों की कहानियां इतनी पुरानी रहती हैं कि उन्हें सच मानकर लोग अपने स्वाभिमान नाम के अहंकार को पुष्पक पर चढ़ाकर हवाई सफर के लिए भी भेज सकते हैं। विज्ञान की हर खोज पर अपना दावा कर सकते हैं, वे गणेश के धड़ पर हाथी के सिर को प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक मौजूद होने के सुबूत की तरह पेश कर सकते हैं, और कीर्तन में ढोल-मंजीरों की ताल के साथ सिर हिलाते हुए लोग उस सुबूत पर नासा का ठप्पा भी लगा देख लेते हैं। जब गर्व करने के लिए महज ऐसे अहसास काफी होते हैं, तो फिर जिंदगी में कुछ हासिल करना जरूरी कहां रह जाता है? जिस तरह टीवी के सामने बैठकर क्रिकेट में अपने देश की टीम को जीतते देखकर जिन लोगों को अपने खेलप्रेमी होने का अहसास रहता है, और वह बढ़ते-बढ़ते उन्हें खेल में अपनी दिलचस्पी लगने लगता है, और धीरे-धीरे वे अपने को खिलाड़ी भी महसूस करने लगते हैं, तो फिर खेलने की जरूरत कहां रह जाती है? इंसान का मिजाज ही कुछ ऐसा होता है कि वे अपने भीतर पहले से तय कर ली गईं धारणा को मजबूत करने के लिए कतरा-कतरा सुबूत जुटाने लगता है। उसकी पसंद और नापसंद इस पर आ टिकती है कि उसके निष्कर्ष को मजबूत बनाने के लिए कौन सी बातें काम आएंगी, तो फिर सुबूतों की वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत कहां रह जाती है?
सडक़ किनारे फुटपाथ पर तेल या ताबीज बेचने वाले लोग एक बड़े माहिर हुनर के साथ लोगों को पहले तो उस सामान की जरूरत का अहसास कराते हैं, और एक बार यह अहसास हो जाता है, तो फिर वे उसके इलाज की तरह एक सामान पेश कर देते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही राष्ट्रवाद के मामले में भी होता है। एक आक्रामक राष्ट्रवाद पहले तो एक नामौजूद दुश्मन का पुतला पेश करता है जो कि मुमकिन कद-काठी से अधिक बड़ा भी दिखता है। इसके साथ ही दुश्मन से खतरे का एक अहसास खड़ा किया जाता है, और इसके बाद फिर दुश्मनी के बीज बो देना, उसकी फसल को खाद दे देना बड़ा आसान हो जाता है। हिन्दुस्तान इन दिनों लगातार ऐसे अहसास का शिकार है। ऐसा अहसास कि पिछले 70 बरस में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ था, और देश को जो कुछ हासिल हुआ है, यह महज पिछले 5-6 बरस की बात है। जब लोग एक नामौजूद नाकामयाबी पर भरोसा करने उतारू हों, तब उन्हें आज की नामौजूद कामयाबी पर भी भरोसा करवाना आसान हो जाता है। 70 बरस की ‘नाकामयाबी’ पर हीनभावना, और अफसोस पैदा कर दिए जाएं, तो फिर उस जमीन पर आज की ‘कामयाबी’ का बरगद तेजी से खड़ा किया जा सकता है। यह सिलसिला नेता की कामयाबी, और जनता की कमजोरी का सुबूत भी होता है कि उसके सामने कब्ज की दवा, जमालघोटा, को भरकर भी एक कटोरा पेश किया जाए, और वह इस बात को हकीकत मान चुकी हो कि यह पेट भरने का अच्छा सामान है, तो लोगों को कब्ज से छुटकारे के लिए काफी एक बीज की जगह एक कटोरा जमालघोटा भी खिलाया जा सकता है।
दुनिया के इतिहास में बहुत से ऐसे लोग रहे हैं जिनका पेशा कुछ और रहा है, जिसमें वे नाकामयाब रहे हैं, लेकिन वे अपने किसी दूसरे हुनर की वजह से अहमियत पाते रहते हैं। मिसाल के लिए किसी शहर में कोई ऐसे डॉक्टर या इंजीनियर हो सकते हैं, या वकील हो सकते हैं जो अपने पेशे में खासे कमजोर हों, लेकिन जिनका समाजसेवा का बहुत ही बड़ा और सच्चा इतिहास रहा हो। आम लोग ऐसे में उन्हें एक अच्छा इंसान और मामूली पेशेवर मानने के बजाय अच्छा पेशेवर भी मानने लगते हैं। सार्वजनिक जिंदगी में बहुत से ऐसे लोग रहते हैं जो कि अपनी ऐसी अप्रासंगिक और महत्वहीन खूबियों की वजह से महान मान लिए जाते हैं। जब लोगों को खालिस और जरूरी सच से परे की गैरजरूरी और अप्रासंगिक बातों के आर-पार देखने की ताकत हासिल न हो, या उनकी आंखों पर एक ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए जिससे कि वे उसके रंग के अलावा और किसी रंग में दुनिया को देख ही न सकें, तो फिर उन्हें एक खास रंग में रंगी हुई दुनिया को ही सच मनवा देना आसान हो जाता है। लोकतंत्र में लोगों को हकीकत और अहसास में फर्क करना आना चाहिए। लोकतंत्र में लोगों को धर्म और राजनीति के दायरों को अलग-अलग देखना आना चाहिए। लोगों को किसी की निजी ईमानदारी से परे उसकी सार्वजनिक जवाबदेही में बेईमानी को भी अलग पहचानना आना चाहिए। लोगों को किसी धर्म के कपड़ों में लिपटे लोगों की हरकतों को उन धर्मों से अलग करके देखना भी आना चाहिए, वरना हिन्दुस्तान में सैकड़ों-हजारों ऐसे मां-बाप हैं जो कि अपने बच्चों को ले जाकर खुद ही बापू-बाबाओं को समर्पित करते आए हैं, क्योंकि वे उनके धर्म-आध्यात्म के चोगों से परे उनकी हरकतों का अंदाज नहीं लगा पाते हैं, उनकी आंखें बाबाओं के दिव्यप्रकाश से चौंधिया जाती हैं, और उन्हें हकीकत नहीं दिख पाती।
आज जब दुनिया चांद के बाद दूसरे ग्रहों पर पहुंच चुकी है, समंदर के अंदर तलहटी को तलाश रही है, उस वक्त लोग अगर फरेब से गुरेज नहीं करेंगे, और किसी की पेश की गई हसरतों को हकीकत मान लेंगे, तो ऐसे देश या ऐसे लोग कम से कम कुछ सदी पीछे तो पहुंच ही जाएंगे। जिस देश को आगे बढऩा है, वह किसी तस्वीर पर बनाई गई सुहानी सडक़ पर सफर करके उसका आनंद लेते हुए आगे नहीं बढ़ सकता। लोगों को कड़ी और खुरदरी सडक़ पर मेहनत से सफर करके ही आगे बढऩा होता है। सबको मालूम है पुष्पक की हकीकत लेकिन...
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सुप्रीम कोर्ट की कुछ किस्म की रोक के बावजूद हिंदुस्तान में केंद्र सरकार जिस अंदाज में आधार कार्ड से हर चीज को जोड़ती चल रही है, उसे लेकर लोगों में एक बेचैनी है। अब आधार कार्ड से जमीन की खरीदी-बिक्री को भी जोड़ा जा रहा है, उससे पैन कार्ड को भी जोड़ा जा रहा है, और कोरोना वैक्सीन तो उससे जुड़ा हुआ है ही। धीरे-धीरे करके सरकार के पास इतनी डिजिटल जानकारी आ गई है कि उससे पेगासस जैसे मंहगे खुफिया घुसपैठिया हथियार का इस्तेमाल आम लोगों पर करने की जरूरत नहीं है, और आम लोगों पर निगरानी के लिए तो उनका आधार कार्ड अकेला ही उनके खिलाफ सबसे बड़ा मुखबिर बन ही चुका है। आज बैंक, क्रेडिट कार्ड, रेल और प्लेन के रिजर्वेशन, कोरोना टीकाकरण और कई किस्म की खरीदी बिक्री, इन सबको जिस तरह से आधार कार्ड से जोड़ दिया गया है, तो उससे सरकारी कंप्यूटरों पर बैठे हुए लोग, लोगों के बारे में इतनी जानकारियां निकाल सकते हैं, जितनी कल्पना भी लोग नहीं कर सकते। यह सवाल बहुत से लोगों के जेहन में पहले से तैर रहा है। और लोगों को यह भी याद होगा कि आधार कार्ड को जिस तरह से हर चीज में अनिवार्य किया जा रहा है, उससे भी यह नौबत आ रही है कि लोगों की निजी जिंदगी की हर बात सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होती जाएगी, और यह तो जाहिर है ही कि सरकारें, न सिर्फ हिन्दुस्तान की, बल्कि सभी जगहों की, अपने हाथ आई जानकारी का बेजा इस्तेमाल करती ही हैं। जब दूसरों की जिंदगी, कारोबार, खरीददारी, इन सबमें ताकझांक करने का मौका सरकारों को मिलता है, तो वह अपने लालच पर काबू नहीं पा सकतीं।
दस-पन्द्रह बरस पहले अमरीका की एक फिल्म आई थी, एनेमी ऑफ द स्टेट। इस फिल्म में सरकार एक नौजवान वकील के पीछे पड़ जाती है, क्योंकि उसके हाथ सरकार के एक बड़े ताकतवर नेता के कुछ सुबूत लग जाते हैं। अब इन सुबूतों को उससे छीनने के लिए सरकार जिस तरह से टेलीफोन, इंटरनेट, खरीदी के रिकॉर्ड, रिश्तेदारियों के रिकॉर्ड, और उपग्रह से निगरानी रखने की ताकत, जासूस और अफसर, टेलीफोन पर बातचीत और घर के भीतर खुफिया कैमरों से निगरानी रखकर जिस तरह इस नौजवान को चूहेदानी में बंद चूहे की तरह घेरने की कोशिश करती है, वह अपने आपमें दिल दहला देने वाली घुटन पैदा करती है। भारत में जो लोग आधार कार्ड को हर जगह जरूरी करने के कानून के खिलाफ हैं, उनका भी मानना है कि इससे निजता खत्म होगी। भारत में आज जिस तरह आधार कार्ड को जरूरी कर दिया गया है, उससे सरकार हर नागरिक की आवाजाही, सरकारी कामकाज, भुगतान और बैंक खाते, खरीददारी, सभी तरह की बातों पर पल भर में नजर रख सकती है।
और फिर जो बातें बैंकों और निजी कंपनियों के रिकॉर्ड में आती जाती हैं, उनका इस्तेमाल तो बाजार की ताकतें भी करती ही हैं। यह एक भयानक तस्वीर बनने जा रही है जिसमें भारत की सरकार लोगों से यह उम्मीद करती है कि वे अपनी हर खरीद-बिक्री, हर टिकट, हर रिजर्वेशन को कम्प्यूटरों पर दर्ज होने दें। आने वाले दिनों में किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम के लिए किसी शहर में पहुंचने वाले लोगों की लिस्ट रेलवे से पल भर में निकल आएगी, और सत्तारूढ़ पार्टी के कम्प्यूटर यह निकाल लेंगे कि ऐसे राजनीतिक कार्यक्रमों में पहुंचने वाले लोग पहले भी क्या ऐसे ही कार्यक्रमों में जाते रहे हैं, और फिर उनकी निगरानी, उनकी परेशानी एक बड़ी आसान बात होगी।
आज जो दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देश हैं, वहां भी नगद भुगतान उतना ही प्रचलन में है जितना कि क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान करना। भुगतान के तरीके की आजादी एक बुनियादी अधिकार है, और भारत सरकार आज कैशलेस और डिजिटल के नारों के साथ जिस तरह इस अधिकार को खत्म करने पर आमादा है, उसके खतरों को समझना जरूरी है। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी यह याद रखना चाहिए कि उनकी पार्टी के लोग भी आपातकाल में बड़ी संख्या में जेल भेजे गए थे। उस वक्त अगर संजय गांधी के हाथ यह जानकारी होती कि किन-किन लोगों ने क्या-क्या सामान खरीदे हैं, तो उस जानकारी का भी बेजा इस्तेमाल हुआ होता। ठीक उसी तरह जिस तरह जगजीवन राम के अधेड़ बेटे सुरेश राम की अपनी महिला मित्र के साथ अंतरंग तस्वीरों का उस वक़्त मेनका गाँधी ने किया था. आज भारत में निजी जिंदगी की प्राइवेसी या निजता पर चर्चा अधिक नहीं हो रही है, और यह अनदेखी अपने आपमें बहुत खतरनाक है। हिंदुस्तान के लोगों को अभी तक निजता के खत्म होने के खतरों का ठीक से एहसास नहीं है, लोग इसे गंभीरता से ले नहीं रहे हैं। जिस दिन कारोबार के मुकाबले में लोग कारोबारी राज खोने लगेंगे, जिस दिन चुराई गई जानकारी के आधार पर लोगों के परिवार खत्म करवा दिए जाएंगे, रिश्ते टूटने लगेंगे,, लोगों का एक दूसरे से अविश्वास होने लगेगा, उस दिन लोगों को समझ में आएगा कि निजता खत्म होने के खतरे क्या रहते हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी रहेगी।
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