संपादकीय
पंजाब में स्वर्ण मंदिर में कल शाम हुई वारदात बहुत ही भयानक है। एक बहुत कमजोर सा दिख रहा कोई नौजवान स्वर्ण मंदिर के गुरु ग्रंथ साहब के पास तक पहुंचा और रेलिंग पर से कूदकर वह ग्रांट साहब के करीब पहुंच गया। इसके बाद उसने कुछ उठाने की कोशिश की, जिसे लेकर अलग-अलग लोगों का अलग-अलग कहना है। कुछ का कहना है कि उसने वहां रखी हुई सोने की एक ऐतिहासिक तलवार उठाने की कोशिश की थी, कुछ का कहना है कि उसने वहां से फूल उठाने की कोशिश की थी। जो भी हो वहां से उसे तुरंत दबोच कर मंदिर के ऑफिस में ले जाया गया और उसे इतना मारा गया कि उसकी मौत हो गई। मारने वालों में से एक व्यक्ति ने मीडिया से बतलाया-‘मैंने इस नौजवान की दो उंगलियां तोड़ दी। जब हमने उससे उसकी पहचान के बारे में पूछा तो उसने कहा कि वह खुद के बारे में नहीं जानता है, इसके बाद संगत के लोगों ने उसे मारना शुरू किया और वह मर गया।’ मरने वाले की लाश को देखें तो वह बहुत ही कमजोर दिख रहा है, और मारने वालों की भीड़ के बीच देर तक उसकी लाश बिना ढके हुए खुली पड़ी हुई थी। बाद में जब पुलिस ने उसकी लाश को अस्पताल पहुंचाया तो वहां हथियारबंद सिखों ने प्रदर्शन किया और लाश बाहर ले जाने का विरोध किया।
पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने भी गुरु ग्रंथ साहब की बेअदबी की इस घटना पर दुख जाहिर किया है, हालांकि मुख्यमंत्री के ट्वीट में मरने वाले नौजवान का कोई जिक्र नहीं है। ऐसा ही हाल अकाली दल के ट्वीट का है, अरविंद केजरीवाल के ट्वीट का है, और बाकी तमाम लोगों का है। तमाम लोगों ने गुरु ग्रंथ साहब की बेअदबी पर तो दुख जताया है, लेकिन वहां भक्तों के मारे इस नौजवान के बारे में मुख्यमंत्री ने भी कुछ नहीं कहा है, और ना ही बाकी नेताओं ने। चारों तरफ यही माहौल है कि सिखों के सबसे बड़े धार्मिक ग्रंथ के अपमान की यह साजिश थी, कुछ लोगों का कहना है कि पंजाब में चुनाव होने जा रहे हैं और किसान आंदोलन खत्म होने के बाद अब बदले हुए हालात में किसी राजनीतिक मुद्दे की तलाशो में साजिशन ऐसा किया गया हो सकता है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले जब दिल्ली की सरहद पर किसान आंदोलन चल रहा था उस वक्त उसके पास ही डेरा डाले हुए निहंगों ने एक दलित नौजवान को पकड़ा था और उस पर आरोप लगाया था कि वह सिखों के एक धार्मिक ग्रंथ का अपमान कर रहा है और उसके हाथ-पैर काट-काटकर उसे रस्सियों पर बांधकर टांग दिया गया था और बाद में शहीद के अंदाज में हत्यारे निहंगों ने पुलिस के सामने अपने को पेश किया था। पिछले कुछ वर्षों से पंजाब में कोई न कोई ऐसी घटना हो रही है जिसे लेकर सिक्खों के धर्म प्रतीकों की बेअदबी की बात उठती है, और वह राजनीतिक मुद्दा बने रहती है।
दुनिया में कुछ धर्मों के लोग अपने धार्मिक ग्रंथों के लिए दूसरे धर्म वालों के मुकाबले अधिक संवेदनशील हैं। इनमें से सिक्ख हैं और मुस्लिम भी हैं। धार्मिक ग्रंथों को लेकर जगह जगह इन दोनों धर्मों के लोगों के लिए खुद भी परेशानी खड़ी होती है, और फिर इनकी की हुई हिंसा सबके लिए परेशानी खड़ी करती है। अब सवाल यह है कि आज के वक्त में जब धार्मिक ग्रंथ आसानी से चारों तरफ हासिल किए जा सकते हैं, तब उनकी बेअदबी किसी अनजानी वजह से भी हो सकती है, और सोच-समझकर किसी साजिश के तहत भी हो सकती है। लोगों को याद होगा कि बांग्लादेश में अभी कुछ महीने पहले दुर्गा पूजा के वक्त हिंदुओं के खिलाफ जितने दंगे हुए और हिंदुओं को जिस तरह से मारा गया, उस वक्त भी यही तोहमत लगाई गई थी कि एक किसी पूजा मंडप में किसी हिंदू देवी-देवता की गोद में कुरान रखी हुई मिली थी और उसे देखकर मुस्लिमों का गुस्सा भडक़ा था। कल स्वर्ण मंदिर में जो हुआ है उसे सत्ता की राजनीति करने वाले लोगों में से तो कोई भी हिंसा की एक घटना करार नहीं देंगे क्योंकि सिख धर्म के धर्मालुओं के बीच अपने वोटों को बरकरार रखना है। लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी नौजवान ने ऐसी कोई बेअदबी कर भी दी थी, तो उसे कानून के हवाले करना चाहिए था, न कि धर्म को कानून से ऊपर साबित करते हुए इस तरह वहां मंदिर परिसर में ही उसकी हत्या कर देना। सिक्खों की कौम दुनिया में हर किस्म की मुसीबत में मदद करने के लिए सबसे आगे रहने वाली कौम है। हिंदुस्तानी फौज में किसी एक कौम के लोग सबसे ज्यादा हैं, तो वह भी शायद सिक्ख ही होंगे। इसलिए ऐसी बहादुर और ऐसी सेवाभावी कौम को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। किसी ने भी धार्मिक प्रतीकों का अपमान किया है यह आरोप लगाकर जगह-जगह दुनिया में लोगों को मारा जाता है। पाकिस्तान में भी ईशनिंदा का एक ऐसा कानून बना हुआ है कि जो कोई इस्लाम का, या मोहम्मद पैगंबर का अपमान करते दिखे उसे सजा दिलवाई जाती है, या भीड़ अगर चाहती है तो उसे घेरकर मार डालती है। लेकिन हिंदुस्तान एक मजबूत न्याय व्यवस्था वाला देश है और यहां पर किसी धर्म के लोगों को कोई शिकायत अगर है, तो उन्हें ऐसे नौजवान को पकडक़र कानून के हवाले करना था और वीडियो कैमरों के सबूतों के साथ उसे सजा दिलवाना मुश्किल काम भी नहीं होता। धर्म के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेना एक खराब बात है और उससे उस धर्म की सकारात्मक छवि भी खराब होती है।
यह सिलसिला पंजाब चुनावों के ठीक पहले सामने आया है इसलिए वहां का मुख्यमंत्री भी यह बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है कि जिस नौजवान की हत्या हुई है उसकी भी जांच की जाएगी। अभी तक जितनी जानकारी सामने आई है उसमें यह भी खुलासा नहीं हुआ है कि इस नौजवान की नीयत क्या थी और जिस तरह उससे पूछताछ में समझ में आया है, वह विचलित या अस्थिर चित्त का दिख रहा है। ऐसे में प्रदेश का मुख्यमंत्री भी ऐसी खुली हत्या की जांच की बात करने से भी अगर डर रहा है तो यह राजनीति और सरकार पर धर्म के दबदबे का एक बड़ा सबूत है, यह सिलसिला ठीक नहीं है। किसी भी धर्म के लोगों को यह बात मानकर चलना चाहिए कि अगर उसे मानने वाले लोग अपनी धार्मिक किताब की सीख और नसीहत पर अमल कर रहे हैं, तो उस किताब का कोई अपमान नहीं हो सकता। एक किताब या उसके कुछ पन्ने मान-अपमान से ऊपर रहते हैं। धार्मिक ग्रंथ का अपमान तभी होता है जब उस धर्म के लोग हिंसा करते हैं, कोई आतंक फैलाते हैं, या बेकसूरों को मारते हैं। कोई और व्यक्ति किसी धर्म की बेअदबी नहीं कर सकते। कल की घटना बहुत ही तकलीफदेह है और एक धर्म स्थान में ऐसी हिंसा होना अपने-आपमें बहुत बुरी बात तो है ही, यह बात भी बहुत तकलीफ देती है कि कोई संगठन, कोई सरकार, कोई नेता, राजनीतिक दल, कोई भी इस हत्या के बारे में कुछ बोलने को ही तैयार नहीं है। चुनाव सामने हैं लेकिन फिर भी ऐसी भीड़त्या को अनदेखा नहीं करना चाहिए, और हर धर्म के लोगों को यह चाहिए कि वे अपने धार्मिक ग्रंथों की हिफाजत और कड़ी करें ताकि उन तक पहुंचना आसान काम ना रहे।
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हिंदुस्तान में तो अभी कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा सीमित मन जा रहा है क्योंकि न अधिक पॉजिटिव मिले हैं और न ही इससे मौतें हो रही हैं। लेकिन दुनिया के वैज्ञानिकों और जानकार लोगों का यह मानना है कि 77 देशों में तो यह अभी तक जाँच में मिल चुका है, लेकिन अगर जांच के अलावा भी अंदाज लगाएं तो यह हर देश में पहुंच चुका होगा। ऐसे में हिंदुस्तान में भी इसका हमला कितना हो चुका है इसका अंदाज जांच के नतीजों से नहीं निकल सकता क्योंकि इस देश में लोग जांच से बचते हुए इधर-उधर घूमते रहते हैं। लेकिन कोरोना की यह नई किस्म कितनी खतरनाक है इसका अंदाज लगाने के लिए ब्रिटिश सरकार का यह अंदाज देखना चाहिए कि वहां पर अगले 4 महीनों में 75 हजार लोगों की मौत ओमिक्रॉन से होने की आशंका है। यह आंकड़ा भारत के मुकाबले यूके की छोटी आबादी के अनुपात में देखने की जरूरत है, और अगर ऐसी नौबत हिंदुस्तान में आती है तो इस संख्या से कई गुना अधिक लोगों की मौत यहां हो सकती हैं, हिंदुस्तान की आबादी यूके से 13 गुना अधिक है। फर्क सिर्फ यही है कि हिंदुस्तान में सरकार जितनी वैक्सीन लगा पा रही हैं, उससे अधिक लोग वैक्सीन लगवाने के लिए तैयार हैं। दूसरी तरफ पश्चिम के देशों में लोग वैक्सीन को लेकर कई तरह की आशंकाओं से भरे हुए हैं और उन्हें अपनी संवैधानिक आजादी की अधिक फिक्र है कि वैक्सीन लगवाना कानूनी अनिवार्य नहीं है। सरकारें लोगों को मना-मना कर थक गई हैं और यूरोप के कई विकसित देशों में तो जब सरकार ने यह तय किया कि सार्वजनिक जगहों पर लोगों की आवाजाही उसी हालत में हो सकेगी जब उन्होंने वैक्सीन लगवा ली होगी, तो लोगों ने वहां दंगा कर दिया, पुलिस को गोलियां भी चलानी पड़ी। लोगों का वैक्सीन पर भरोसा कम है, और अपने नागरिक अधिकारों पर अधिक। नतीजा यह हो रहा है कि सबसे विकसित देश आज सबसे अधिक खतरनाक हालत में हैं, क्योंकि वहां तमाम आबादी को लगाने के लिए टीके तो हैं, लेकिन आबादी का एक बड़ा हिस्सा टीके लगवाने को तैयार नहीं है।
जब लोगों की सोच ऐसी हो जाती है तो उससे किस तरह का खतरा पैदा होता है यह समझने की जरूरत है। यूरोप और अमेरिका में बहुत सी जगहों पर लोग खुलकर टीकों के खिलाफ खड़े हुए हैं। और वे अपनी मर्जी के पक्ष में संविधान में दिए गए अधिकारों को भी गिनाते हैं। हो यह रहा है कि लोग टीके नहीं लगवा रहे हैं और जब संक्रमण बढ़ रहा है तो यह लोग अस्पताल जा रहे हैं। टीके लगवाने के पीछे इनका तर्क है कि उन्हें विज्ञान पर भरोसा नहीं है, कि यह वैक्सीन अभी पूरे ट्रायल से गुजरी नहीं है। दूसरी तरफ जब वह बीमार पड़ते हैं तो इसी चिकित्सा विज्ञान पर पूरा भरोसा हो जाता है, और वे इलाज के लिए अस्पताल जा रहे हैं, और किसी भी देश में इलाज की सीमित क्षमता को खत्म कर दे रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि टीके लगवाए हुए लोग जब कोरोनावायरस से संक्रमित होकर या किसी और बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं तो वहां उन्हें जगह नहीं मिल रही। अब विज्ञान पर जिन्हें भरोसा नहीं है, और जो बिना टीकों के रहना चाहते हैं, उन्हें इलाज के लिए विज्ञान पर पूरा भरोसा है। यह नौबत इन तमाम देशों में टीके लगवाए हुए लोगों के लिए अधिक बड़ा खतरा बन रही है जो कि सामाजिक जिम्मेदारी से काम ले रहे हैं। लेकिन दूसरे गैरजिम्मेदार लोगों की लापरवाही की सजा भुगत रहे हैं। यह कुछ वैसा ही है कि सडक़ पर ठीक से गाड़ी चलाते हुए लोग किसी नशेड़ी ड्राइवर की लापरवाह ड्राइविंग की सजा भुगतते हैं।
हिंदुस्तान दुनिया के उन देशों में है जहां पर वैक्सीन के लिए प्रतिरोध सबसे ही कम है। लोगों को हैरानी भी हो सकती है कि यह देश धर्म के बोझ से दबा हुआ है, यहां तरह-तरह के अंधविश्वास हैं, यहां लोगों की वैज्ञानिक सोच को लगातार खत्म किया जा रहा है, फिर भी लोग वैक्सीन के खिलाफ क्यों नहीं है? और क्यों लंबी-लंबी कतारें लगाकर भी लोग वैक्सीन लगा रहे हैं, जबकि इसके लिए किसी तरह के कोई इनाम नहीं रखे गए हैं। दुनिया के कई देशों में तो बड़े-बड़े इनाम रखने के बाद भी लोग वैक्सीन लगवाने सामने नहीं आ रहे हैं। दरअसल हिंदुस्तान में आजादी के बाद से लगातार आधी सदी तक तो लोगों की सोच को वैज्ञानिक बनाकर रखा गया था, और हर तरह के विज्ञान के लिए लोगों के मन में बड़ा सम्मान था। लोगों ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी, चिकित्सा विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, कृषि विज्ञान जैसे बहुत से क्षेत्रों में विकास देखा था, और उसके फायदे भी देखे थे। लोगों ने भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो को उस समय से काम करते देखा था जब उपग्रह को साइकिल और बैलगाड़ी पर ले जाकर वहां से अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी की जाती थी। इसलिए लोगों की सोच वैज्ञानिक बनी हुई थी, और देश के हर बच्चे को जब पोलियो ड्रॉप्स दिए गए तो भी तमाम आबादी ने उत्साह के साथ इस वैक्सीन को मंजूर किया। इसके अलावा भी कई और तरह की वैक्सीन इस देश में बच्चों को दी गई और कम पढ़े-लिखे, गांवों में रहने वाले, जंगलों में रहने वाले लोगों ने भी अपने बच्चों को सारे टीके लगवाए थे। उसी समय की सोच अब तक काम आ रही है और कोई कोरोना वैक्सीन प्रतिरोध नहीं कर रहा है। आबादी में जिन लोगों को अभी वैक्सीन लगना शुरू नहीं हुआ है या जिस उम्र के लिए शुरू भी हो गया है और उनकी बारी नहीं आई है, वे सारे लोग वैक्सीन का इंतजार कर रहे हैं, उससे कतरा नहीं रहे हैं। पश्चिम के विकसित देशों के मुकाबले कम पढ़े-लिखे हिंदुस्तान से दुनिया को आज बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। भारत की आज की इस हालत से यह भी साबित होता है कि लोगों के वैज्ञानिक का सोच जो कि बहुत लंबे समय में ढलकर मजबूत हुई है, उसे आनन-फानन रफ्तार से खत्म भी नहीं किया जा सकता है।
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जब कभी ऐसा लगने लगे कि कोई नेता या कोई पार्टी अपने सबसे घटिया बयान दे चुके हैं तो उसी वक्त वह कुछ और नया लेकर आते हैं जो गंदगी का एक नया रिकॉर्ड कायम करने के लिए काफी रहता है। कर्नाटक में कांग्रेस के एक बड़े नेता और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रमेश कुमार ने विधानसभा के भीतर अध्यक्षों से बातचीत करते हुए यह बयान दिया कि एक बात कही जाती है कि जब बलात्कार होना एकदम तय हो, तो लेट जाओ और इसका मजा लो। इस बयान के बाद रमेश कुमार खुद हँसते हुए दिखते हैं, दूसरे सदस्य भी हँसते हुए दिखते हैं, और तो और विधानसभा अध्यक्ष भी जोरों से हँसते हुए दिखते हैं जिनकी हँसी देर तक चलती है। सच तो यह है कि दूर बैठे हुए विधानसभा की कार्यवाही के इस हिस्से का कन्नड़ भाषा का जितना वीडियो देखा जा सकता है और सदन की कार्रवाई के इस हिस्से को जितना सुना जा सकता है उससे ऐसा लगता है कि आज के विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में चल रहे हंगामे से थककर सामने बैठे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार को देखा और कहा आप जानते हैं रमेश कुमार, मुझे लगता है कि अब हमें सिर्फ इस स्थिति का आनंद लेना चाहिए मैंने फैसला लिया है कि अब न मैं उन्हें शांत कराने की कोशिश करूंगा और न ही स्थिति को व्यवस्थित करने की। विधानसभा अध्यक्ष की इस बात का एक पुराना संदर्भ दिखता है कि जब 2 साल पहले रमेश कुमार स्पीकर थे तब भी उन्होंने इसी किस्म का एक बयान बलात्कार को लेकर दिया था। और हो सकता है कि इस बार विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार से बात करते हुए उसी बात के बारे में बोल रहे हों। लेकिन जो भी हो, ऐसा न भी हो तो भी कम से कम यह तो देखा ही जा सकता है कि एक भूतपूर्व विधानसभा अध्यक्ष के रेप को लेकर महिलाओं के खिलाफ ऐसे भयानक हिंसक और अश्लील बयान पर सदन में और सदस्य भी हँसते हैं, और मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष भी हँसते हैं, जबकि ऐसा घटिया बयान सदन की कार्यवाही से तुरंत ही निकाल दिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया। यह ताजा मामला यह याद दिलाता है कि किस तरह इसी कर्नाटक विधानसभा में बैठकर ब्लू फिल्म देखने का मामला सामने आया था।
जिस कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रही हों, जिसकी मौजूदा अध्यक्ष सोनिया गांधी हों, उस पार्टी का इतना बड़ा नेता, जो कि 2 बार विधानसभा अध्यक्ष था, वह इतनी गंदी और घटिया बात कहकर एक लुकाछिपी वाली माफी मांगकर बच निकल रहा है। कल के विधानसभा के अपने बयान के बारे में आज रमेश कुमार ने कहा -‘अगर मेरे बयान से महिलाओं की भावनाएं आहत हुई हैं तो मुझे माफी मांगने में कोई दिक्कत नहीं है’। दूसरी तरफ लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने कहा है कि रमेश कुमार को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए थी, लेकिन आप जब उन्होंने माफी मांग ली है तो इस मामले को और तूल नहीं देना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष जो कि जाहिर तौर पर भाजपा के हैं, उन्होंने कहा कि जब रमेश कुमार ने माफी मांग ली है तो इस मामले को और नहीं खींचना चाहिए। खैर यह दोनों हँसी-ठहाके में भागीदार रहे हैं तो दोनों की एक दूसरे के साथ हमदर्दी भी जायज है।
विधानसभा और संसद देश के यह दोनों ही निर्वाचित सदन अपने-आपको तरह-तरह के विशेष अधिकारों के घेरे में रखते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कि सुप्रीम कोर्ट के जज अदालत की अवमानना के कानून को छोडऩा ही नहीं चाहते हैं, फिर चाहे वे जज की कुर्सी पर बैठकर किसी की भी अवमानना क्यों ना करते हों। ऐसे में देश के ताकतवर तबकों ने अपने-आपको विशेषाधिकार और अवमानना के कानूनों से घेर कर रखा हुआ है क्योंकि उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम है कि उनके बीच में जो गड़बडिय़ां चल रही हैं, जो खामियां हैं, उन्हें लेकर लोग उन पर हमले कर सकते हैं। और आम लोगों पर भले भीड़ के हमले ऐसे होते चलें कि उनमें किसी को चिथड़े उड़ाकर मार डाला जाए, लेकिन संसद और अदालत की तरफ कोई नजर उठाकर भी ना देख सके, इसलिए ऐसे कानून बनाए गए हैं। और यही वजह है कि गंदगी की बातें कहकर भी सांसद और विधायक बच जाते हैं क्योंकि इन सदनों के भीतर कही गई बातों को लेकर उनके खिलाफ कोई अदालती कार्यवाही नहीं की जा सकती, किसी अदालतों में कही गई जुबानी बात के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। तमाम देश के तमाम किस्म के कानून महज आम जनता के लिए हैं, जिसे कुचलना बहुत आसान है, जिसे कानून भी मार सकता है और जिसे गैरकानूनी हिंसक भीड़ भी घेरकर मार सकती है, और फिर अगर संसद या विधानसभा के भीतर बाहुबल हो तो ऐसी हत्यारी भीड़ को बचाने का काम भी हो सकता है।
हिंदुस्तान में इतने बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए लोग भी महिलाओं से होने वाले बलात्कार को लेकर जिस तरह का हँसी-ठट्ठा करते हैं, वह देखना भी भयानक है। या उससे कहीं कम नहीं है जिन मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने गई महिला से थाने के पुलिस वाले भी बलात्कार करने में जुट जाते हैं। विधानसभा के भीतर जहां देश के कानून के लिए महिलाओं के लिए सबसे अधिक सम्मान की सोच रहनी चाहिए, वहां पर ऐसी घटिया और हिंसक सर्वदलीय सोच सामने आती है तो यह जाहिर है कि ऐसे नेता सदन के कैमरे और माइक्रोफोन से परे महिलाओं के बारे में कैसी सोच रखते होंगे। यह तो कांग्रेस पार्टी के आज दुर्दिन चल रहे हैं कि वह अपने नेताओं के खिलाफ किसी कार्रवाई करने की ताकत आज नहीं रखती है, वरना ऐसे विधायक को कांग्रेस पार्टी को तुरंत ही निलंबित करना चाहिए था।
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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तय किया है कि भारत में शादी के लिए निर्धारित कानूनी उम्र, लड़कियों के लिए भी 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष कर दी जाए। अभी लडक़ों के लिए यह 21 बरस और लड़कियों के लिए 18 बरस है। अब शादी के कानून में संशोधन के लिए यह मामला संसद में जाएगा और संशोधन के बाद यह लागू हो जाएगा। इसके पीछे केंद्र सरकार की बनाई हुई एक कमेटी की सिफारिशें हैं जिसने यह कहा था कि कम उम्र में लड़कियों की शादी होने से वे कम उम्र में मां बनती हैं, और मां-बच्चे दोनों की सेहत पर उससे फर्क पड़ता है। इस कमेटी ने अपनी सिफारिशों में यह भी कहा था कि उसने देश भर में नौजवान पीढ़ी के लोगों से बात की है, जिनमें शहरी और ग्रामीण दोनों किस्म के लोग बराबरी से शामिल किए गए थे, और उस कमेटी का यह कहना था कि शादी की उम्र को लड़कियों के लिए भी 21 बरस कर देना चाहिए। दूसरी तरफ जब यह चर्चा छिड़ी थी उस वक्त कुछ लोगों ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि देश के जिन समुदायों में कम उम्र में बच्चों की शादी का चलन है, वहां अभी भी 18 बरस से कम उम्र के बच्चों की शादी करने पर वे शादियां कानून में अवैध करार दी जाती हैं, और ऐसे में अगर लड़कियों की उम्र भी 21 वर्ष कर दी जाएगी तो अवैध या गैरकानूनी करार दी जाने वाली शादियां अधिक हो जाएंगी और लोगों को कानून तोडऩे वाला माना जाएगा जो कि अच्छी बात नहीं होगी। इस समुदाय का यह भी तर्क था कि भारत में तो आज भी एक चौथाई शादियां तय की गई उम्र से कम उम्र में ही होती हैं, और कानून से इसमें कोई गिरावट नहीं आ रही है, इसमें जो बहुत मामूली गिरावट आ रही है वह लड़कियों के लिए पढ़ाई-लिखाई के मौके बढऩे से और उनके कामकाज की संभावनाएं बढऩे से आ रही है।
यह मामला बड़ा ही जटिल है और सीधे-सीधे इस फैसले का समर्थन या इसका विरोध करना इस मुद्दे का अतिसरलीकरण होगा जो कि ठीक नहीं रहेगा। भारत में बाल विवाह एक समय तो गरीब और अमीर सभी तबकों के बीच चलता था लेकिन हाल के दशकों में यह गरीबों के बीच अधिक होता है। इसकी एक वजह होती है कि जहां मां-बाप दोनों मजदूर रहते हैं, दोनों काम करने बाहर जाते हैं, वहां मजदूर बस्ती में या किसी अकेले झोपड़े में किसी लडक़ी को छोडक़र जाना खतरे का मामला लगता है। भारत में जितनी बड़ी संख्या में बलात्कार दर्ज हो रहे हैं उन्हें देखते हुए मां-बाप दहशत में भी रहते हैं, इसलिए भी वे चाहते हैं कि कम उम्र में लडक़ी की शादी हो जाए ताकि बिना किसी विवाद के, बिना किसी हंगामे के, लडक़ी अपने ससुराल चली जाए और उसके बाद वह अपने पति और ससुराल की जिम्मेदारी रहे। इस सोच में कुछ बहुत गलत भी नहीं है क्योंकि यह गरीबी की बेबसी पर उपजी हुई सोच है जिसे इस बेबसी के खत्म होने तक बदलना मुमकिन नहीं है। दूसरी तरफ आज देश के एक बड़े हिस्से में लड़कियों की पढ़ाई के मौके बढ़ रहे हैं, वे स्कूलों में पढऩे के बाद कॉलेजों में अधिक संख्या में जा रही हैं, और कामकाज करने के लिए भी लड़कियां बड़ी संख्या में आगे आ रही हैं। ऐसे में 18 बरस की उम्र के बाद अगर कानूनी शादी करना मां-बाप के हाथ में रहता है तो लडक़ी की अधिक पढ़ाई के बिना, लडक़ी के कामकाज या रोजगार की संभावनाओं के बिना उसकी शादी कर दिए जाने की आशंका ही अधिक रहती है। यहां पर गरीब मां-बाप जैसी बेबसी तो नहीं रहती है, लेकिन संपन्न मां-बाप के लिए भी यह जरूरी नहीं रहता कि लडक़ी इतना पढ़े कि वह किसी कामकाज के लायक हो सके, और ऐसे बहुत से मामलों में जल्द शादियां हो जाती हैं। ऐसे मामलों में शादी की उम्र बढ़ जाने से लड़कियों के अधिक पढऩे की एक संभावना तो पैदा होगी ही, लड़कियों के 21 वर्ष के बाद शादी होने से, उसके बाद ही उनके मां बनने से, जच्चा-बच्चा दोनों की सेहत पर एक सकारात्मक असर पड़ेगा जो कि छोटी बात नहीं रहेगी। जैसा कि चिकित्सा वैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों का अध्ययन कहता है कि लड़कियों की शादी की उम्र 3 वर्ष बढ़ जाने से उनका कम उम्र में मां बनना बंद होगा और देश की शिशु मृत्यु दर, मातृ (जननी) मृत्यु दर भी घटेगी, बच्चों में कुपोषण भी घटेगा, क्योंकि कम उम्र की मां अपने बच्चे को बेहतर पोषण नहीं दे पाती है। इसलिए लडक़ी की पढ़ाई-लिखाई के हिसाब से, उसके कामकाज और रोजगार की संभावनाओं के हिसाब से, और उसके मां बनने के हिसाब से भी, आयु सीमा को बढ़ाया जाना एक अच्छा फैसला लगता है। भारत में क्योंकि समाज व्यवस्था ऐसी है कि स्कूल कॉलेज में सेक्स एजुकेशन से परहेज किया जाता है, और कम उम्र की लड़कियों को शादी के बाद की शारीरिक जिम्मेदारियों की इतनी समझ नहीं रहती, इसलिए भी 18 बरस के बजाय 21 बरस की उम्र बेहतर लग रही है।
लेकिन अब सवाल यह रहता है कि देश की आधी आबादी जितनी गरीब है और उस तबके में अगर किसी लडक़ी के मां-बाप दोनों ही मजदूर हैं या बाहर काम करते हैं तो वहां पर किस तरह लडक़ी का ख्याल रखा जा सकेगा? इस कड़वी सामाजिक हकीकत को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा। बच्चियों की सामाजिक सुरक्षा पर अधिक ध्यान देने के साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि शादी की उम्र को 3 बरस बढ़ाने के बाद गरीब बच्चियों के लिए 18 से 21 वर्ष की उम्र तक क्या-क्या पढऩे और सीखने के लायक संभावनाएं सरकार मुहैया करा सकती है? सरकार की जिम्मेदारी संसद में उम्र बढ़वाने के संविधान संशोधन तक नहीं है, इससे बढ़ी हुई उम्र का बेहतर इस्तेमाल कैसे हो सकता है यह भी देखना होगा, और इससे भारत में एक बहुत बड़ी कामयाबी भी हासिल हो सकती है। जच्चा-बच्चा की सेहत अपने-आपमें एक बड़ी कामयाबी रहती है और उसके अलावा अगर लडक़ी की पढ़ाई-लिखाई, उसके रोजगार, उसके शिक्षण-प्रशिक्षण में इन 3 वर्षों में कोई महत्वपूर्ण बात जोड़ी जा सकती है, तो उससे भारत की लड़कियां अधिक आत्मनिर्भर भी हो सकेंगी। आज भी देश में एक चौथाई शादियां 18 वर्ष से कम उम्र में हो रही हैं, उन्हें भी सरकार को ठीक से रोकना होगा और 3 बरस की यह बढ़ी हुई जिम्मेदारी मोटे तौर पर राज्य सरकारों पर आएगी कि 21 बरस के पहले लडक़ी की शादी ना हो सके।
अब हम नौजवान पीढ़ी के दिल-दिमाग की बात करें तो उनके लिए भी यह फैसला इसलिए बेहतर है कि पुराने वक्त में तो कम उम्र में शादियां हो जाती थीं, और लड़कियां एक गुलाम की तरह ससुराल चली जाती थीं, और शादियां किसी तरह से निभ जाती थीं। आज हालत यह है कि लड़कियां कुछ पढ़-लिखकर शादी करती हैं, लेकिन उनका रोजगार शुरू होने के पहले शादी हो जाती है, और शादी के बाद अगर उनकी कोई महत्वाकांक्षा कुचलने से बची रहती है तो शादियों में कभी-कभी दिक्कत भी आती है। इसलिए 18 बरस के बजाय 21 बरस की उम्र में शादी लड़कियों के लिए इसलिए बेहतर होगी कि वे तब तक मानसिक रूप से अधिक परिपच् हो चुकी रहेंगी, दुनिया को अधिक देख चुकी रहेंगी, और शादी में उनकी अपनी मर्जी भी कुछ हद तक काम कर पाएगी। 18 बरस की लडक़ी के मुकाबले 21 बरस की लडक़ी पर मां-बाप की मनमर्जी कुछ कम हद तक चलेगी, इससे समाज का परंपरागत ढांचा तो निराशा होगा, लेकिन इससे लड़कियों का भला होगा। कुल मिलाकर आखिर में कहने के लिए यही एक बात रह जाती है कि गरीब परिवारों में बेबसी में लड़कियों की जो शादी कम उम्र में की जाती है उस बारे में क्या होगा इसकी फिक्र करनी चाहिए, और देश की संसद और विधानसभाओं में इसकी फिक्र कम हो पाएगी क्योंकि वहां गरीब ही कम बच गए हैं, लगभग नहीं।
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अभी हिंदुस्तान में आधार कार्ड को लेकर लोगों की जिंदगी की निजता भंग होने की फिक्र टली नहीं है कि एक और फिक्र का सामान तैयार होने लगा है। केंद्र सरकार यह योजना बना रही है कि भारतीय डाक-तार विभाग देश के हर घर, दुकान, मकान का एक डिजिटल नंबर तैयार करेगा जो कि उस घर का पोस्टल एड्रेस रहेगा। यह बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है कि लोगों को लंबा-चौड़ा पता लिखने के बजाय सिर्फ एक डिजिटल नंबर डाल देना काफी होगा लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं रहेगी। हर मकान, दुकान, दफ्तर का एक नंबर रहेगा और उस नंबर से वहां पहुंचने वाली चिट्टियां, वहां पहुंचने वाले सामान पहुंच जाएंगे। आज जिस तरह से लोग खाने-पीने का सामान बुलाते हैं, ऑनलाइन आर्डर करके खरीदे गए सामानों को कूरियर कंपनियां पहुंचाती हैं, और जिस तरह से किसी पते को गूगल मैप पर लोगों को भेजकर उन्हें वहां आने का रास्ता बताया जाता है, या टैक्सी बुलवाई जाती है, उन सबको देखें तो लगता है कि एक डिजिटल नंबर से जिंदगी बड़ी आसान हो जाएगी। लेकिन दूसरी तरफ यह भी है कि ऐसे एक डिजिटल नंबर से सरकारी एजेंसियां आज नहीं तो कल, पल भर में यह पता लगा लेंगी कि किस पते पर किस कूरियर एजेंसी से कब क्या सामान पहुंचा, कब कहां से चिट्ठी आई, कब खाने का क्या-क्या सामान बुलवाया गया और फिर तो निजी कारोबारियों के कंप्यूटरों से सरकारी एजेंसियां ये जानकारी निकाल ही लेंगी कि हिंदुस्तान के किस पते पर किस टैक्सी से लोग पहुंच रहे हैं, कितने देर बाद वहां से वापस निकल रहे हैं। इस तरह की तमाम संभावनाएं सरकार के लिए तो संभावनाएं रहेंगी, लेकिन निजता की बात उठाने वाले लोगों के लिए ये आशंकाएं रहेंगी। यह कम खतरे की बात नहीं रहेगी कि सरकारी एजेंसियों के कंप्यूटर किसी घर पर चिट्ठियों से लेकर टैक्सियों की आवाजाही तक सभी चीजों को एक साथ जोडक़र एक स्क्रीन पर देख सकेंगी और उससे अपने नतीजे निकाल सकेंगी। लोगों की जिंदगी पर निगरानी रखने का काम केंद्र सरकार के लिए और अधिक आसान हो जाएगा क्योंकि ऐसे पोस्टल एड्रेस के नंबर का जब-जब जहां-जहां इस्तेमाल होगा, उनको एक साथ देखा जा सकेगा, उनका विश्लेषण किया जा सकेगा और लोगों की जिंदगी की कोई निजता नहीं बचेगी।
आधार कार्ड की अनिवार्यता की वजह से आज हिंदुस्तान में लोगों की आवाजाही, लोगों की खरीदी बिक्री, उनके बैंकों और दूसरे सरकारी कामकाज की कोई निजता नहीं रह गई है। लोग एयरपोर्ट पर कितने बजे कहां पहुंच रहे हैं, कहां सफर कर रहे हैं, किस बैंक खाते से भुगतान कर रहे हैं, किस खाते से खरीदारी कर रहे हैं, मोबाइल फोन से होने वाले भुगतान में वे किस वक्त किस जगह पर किस सामान को खरीद रहे हैं, इसे पल भर में जाना जा सकता है। आज आम तो आम, अच्छे खासे जानकार लोगों को भी इस बात का एहसास नहीं हो रहा कि उनके डिजिटल पद चिन्ह किस तरह सुबह से रात तक चारों तरफ निशान छोड़ते चल रहे हैं, और आधार कार्ड, सिम कार्ड, एटीएम कार्ड, क्रेडिट कार्ड, और टेलीफोन पर आधारित भुगतान के दूसरे तरीके हर व्यक्ति के 24 घंटों में सैकड़ों निशान बना जाते हैं। जब सरकार देश के लोगों की नागरिकता तय करने पर जुटी हुई हो, तो फिर ऐसी जानकारी उसके हाथ में एक बहुत बड़ा औजार या हथियार बनना भी तय है।
अभी केंद्र सरकार की डिजिटल एड्रेस की तैयारी एक प्रस्ताव के स्तर पर है, लेकिन यह जाहिर है कि जिस तरह संसद में केंद्र सरकार पर सत्तारूढ़ गठबंधन का विशाल बहुमत है, वह अपनी किसी भी बात को वहां से पास करवा सकती है। अब सवाल यही उठेगा कि निजता के मुद्दे उठाने वाले सामाजिक संगठन किस तरह अदालत में जाकर कई सवालों के जवाब केंद्र सरकार से मांगने की कोशिश करते हैं। दुनिया के अधिक देशों में ऐसे किसी डिजिटल एड्रेस का तजुर्बा भी नहीं है। ऐसे में इससे ऑनलाइन कारोबार करने वाले लोगों को तो फायदा हो सकता है कि उन्हें पता ढूंढने के बजाय मोबाइल फोन पर नक्शा सीधे किसी घर पर ले जाकर खड़ा कर दें, लेकिन ऐसे कारोबारियों से परे किसका फायदा इससे होगा यह अभी साफ नहीं है। और फिर बहस के लिए यह मान भी लें कि जिनके घर-दफ्तर का पता डिजिटल हो जाएगा उन्हें खुद भी कोई सहूलियत होगी, तो भी यह सवाल तो रहता ही है कि ऐसे डिजिटल पते के हर इस्तेमाल की जानकारी सरकार के कंप्यूटरों पर दर्ज होगी या कारोबारियों के। और फिर सरकार जब चाहे तब उन पतों की पूरी जिंदगी को खंगाल सकती है, उस पर अपने कंप्यूटरों से ही पूरी निगरानी रख सकती है। किसी भी सरकार के हाथ इतनी ताकत से उसके बेजा इस्तेमाल की गारंटी हो जाती है। आज भी भारत की सरकार पेगासस जैसे खुफिया फौजी घुसपैठिए सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कोई हलफनामा देने से मना कर चुकी है और मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट को एक जांच कमेटी बनानी पड़ी है कि सरकार ने इसका इस्तेमाल किया है या नहीं। ऐसे में डिजिटल एड्रेस को अगर केंद्र सरकार अनिवार्य कर पाती है, तो उसके लिए लोगों पर नजर रखना, लोगों की जासूसी करना एक बहुत आसान काम हो जाएगा। देखना है कि ऐसे किसी औजार को बनाकर उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने से केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट रोक पाता है या नहीं।
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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई ने अभी दसवीं के अंग्रेजी के पर्चे में अपनी एक किताब के कुछ पैराग्राफ दिए और उन पर सवाल किए। इस मामले को लोकसभा में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उठाया और इसके हिस्से पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि यह महिलाओं के लिए बहुत ही अपमानजनक बात है कि एक केंद्रीय बोर्ड इस तरह के सवाल कर रहा है। उन्होंने इसके हिस्से पढक़र सुनाए जिसमें कहा गया है कि महिलाओं को स्वतंत्रता मिलना कई तरह की सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं का मुख्य कारण है। इसी पर्चे में यह बात भी लिखी गई है कि पत्नियां अपने पतियों की बात नहीं सुनती हैं जिसकी वजह से बच्चे और नौकर अनुशासनहीन होते हैं। सोनिया गांधी ने संसद में इस पर कड़ी आपत्ति की और संसद के बाहर प्रियंका गांधी ने इस प्रश्न पत्र की कॉपी ट्विटर पर पोस्ट करते हुए यह लिखा कि यह बात अविश्वसनीय है कि हम अपने बच्चों को इस तरह की चीजें पढ़ा रहे हैं, भाजपा सरकार महिलाओं पर इस तरह के दकियानूसी ख्याल रखती है और इसी वजह से सीबीएसई में ऐसी बातें पढ़ाई जा रही है। इस बात पर कांग्रेस से परे के लोगों ने भी सोशल मीडिया पर खूब जमकर लिखा। संसद में भी बहुत से लोगों ने सोनिया गांधी के उठाए गए मुद्दे का साथ दिया और सीबीएसई की जमकर आलोचना की गई। आखिर में सीबीएसई को अपने पर्चे से इस सवाल को हटाना पड़ा और कहना पड़ा कि सभी परीक्षार्थियों को इस सवाल की जगह पर पूरे नंबर दिए जाएंगे।
हिंदुस्तान में महिलाओं का अपमान खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। लोगों के मिजाज में यह बात सदियों से बैठी हुई है और रीति-रिवाज, कहावत-मुहावरे, हर किस्म की बातों में महिलाओं को पांव की जूती की तरह मानकर चलना इस 21वीं सदी में भी जारी है। अभी दो दिन पहले मैथिलीशरण गुप्त की एक कविता एक महिला ने फेसबुक पर पोस्ट की जिसकी पहली ही लाइन यह है- ‘नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो कुछ काम करो, जग में रहकर कुछ नाम करो, कुछ तो उपयुक्त करो तन को, नर हो न निराश करो मन को’। मतलब यह कि अभी पिछली ही सदी के मैथिलीशरण गुप्त को भी केवल नर ही दिख रहे थे, उनके पास नारियों को प्रेरणा देने के लिए कुछ नहीं था। मानव प्रेरणा पाने के हकदार सिर्फ नर ही रहते हैं। अखबारों को देखें तो उनकी सुर्खियों में कहीं पर महिला का नरकंकाल मिल जाता है, तो कहीं पर नरसंहार में महिला मारी जाती है। यानी लाशों और कंकालों में भी एक नारी को जगह नहीं मिल पाती है। इस बात को पहले भी हम यहां पर लिख चुके हैं कि शेर आदमखोर होता है, मानो वह सिर्फ आदमियों को खाएगा और औरतों को नहीं छुएगा। लेकिन यह दिक्कत महज उर्दू की नहीं है, यह दिक्कत हिंदी की भी है, जहां पर शेर नरभक्षी होता है, और कभी भी नारीभक्षी नहीं होता। और यह दिक्कत अंग्रेजों की भी है जहां पर एक टाइगर मैनईटर होता है और वह कभी भी वह वुमनईटर नहीं होता। काम-काज की दुनिया में मैनपावर होता है, कभी भी वूमेनपावर नहीं होता। गांधी का लिखा पढ़ें या पिछली सदी के बहुत से दूसरे दार्शनिकों का, हिंदुस्तान के जे कृष्णमूर्ति की बातों को पढ़ें, तो उनमें भी आदमी का जिक्र ही तमाम इंसानों का जिक्र मान लिया जाता है, मानो औरत तो उस आदमी के भीतर समाहित है ही। भारत के कानून की भाषा को देखें तो पूरे कानून में सिर्फ आदमी के हिसाब से लिखा गया है सिर्फ ‘ही’ लिखा गया है कहीं भी ‘शी’ की गुंजाइश नहीं है। नतीजा यह है कि औरत को गिना ही नहीं जाता। बच्चों के जन्म का सर्टिफिकेट बनाना हो या स्कूल का दाखिला हो या उसकी नौकरी हो, हर जगह बाप का नाम ही पूछा जाता है। मां का नाम दर्ज करना अब 21वीं सदी में आकर तमाम कानूनी लड़ाई लडऩे के बाद रियायत के तौर पर मर्जी पर छोड़ा गया है, न कि किसी कानूनी जरूरत के तहत मां के नाम का जिक्र जरूरी है।
देश का सबसे बड़ा केंद्रीय स्कूली बोर्ड अगर इस तरह की घटिया बातों को बढ़ा रहा है और उन्हें इम्तिहान में पूछने का भी हौसला रखता है, तो यह बात जाहिर है कि देश की राजनीति की हवा और फिजा उसी तरह की है। उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ से लेकर हरियाणा के मनोहर लाल तक कितने ही ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो कि महिलाओं के बारे में एक से बढक़र एक घटिया बातें बोलते आए हैं, और कभी उनकी पार्टी ने उन बातों का विरोध नहीं किया। और तो और, पिछले वर्षों में कई पार्टियों और गठबंधनों ने केंद्र सरकार की अगुवाई की है, लेकिन किसी ने भी महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाने की कोई फिक्र नहीं की। अब तो ऐसा दिखता है कि इसकी मांग भी कोई राजनीतिक दल नहीं करता। आज जब चुनाव सामने खड़ा हुआ है तो हर पार्टी अलग अलग राज्य में अलग-अलग किस्म के वायदे महिलाओं के लिए कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी ने 40 फीसदी उम्मीदवार महिलाएं रखने की घोषणा की है। पंजाब में कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने महिलाओं के लिए कई किस्म की मदद की घोषणा की है। उत्तराखंड में केजरीवाल ने आज ही कहा है कि उनकी पार्टी की सरकार बनी तो हर महिला को हजार रुपया महीना दिया जाएगा। लेकिन गोवा की महिला के लिए अधिक फायदे की घोषणा ममता बनर्जी की टीएमसी ने की है जिसमें वहां कहां है कि हर महिला को पांच हजार रूपया हर महीने दिया जाएगा। लेकिन तोहफे या खैरात की शक्ल में ऐसी नगदी देने से परे कोई पार्टी आज संसद में यह मांग भी नहीं कर रही कि महिला आरक्षण बिल पास किया जाए। जो कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में 40 फ़ीसदी सीटें महिलाओं को दे रही है वह पार्टी भी संसद में एक तिहाई सीटें महिलाओं को देने के विधेयक का नाम भी लेना बंद कर चुकी है। सरकारों में अगर देखें तो जहां-जहां पर नौकरियों में महिलाओं को उम्र की छूट है वहां पर जिस टेबिल पर फाइल जाती है, वहां बैठे हुए मर्द उसका विरोध करना शुरू कर देते हैं, उस फाइल को खोलते ही गालियां बकना शुरू कर देते हैं और सरकार में किसी महिला को उसका हक पाने के लिए बरसों तक लडऩा पड़ता है।
यह पूरा सिलसिला देश के कड़े कानून के बावजूद जमीन पर महिला की फजीहत का सुबूत है। कानून चाहे जो कहता हो, महिला को आपसी रंजिश निपटाने के लिए बलात्कार करने का एक सामान मान लिया जाता है कि किसी परिवार की महिला से बलात्कार करके उस परिवार से दुश्मनी का हिसाब चुकता किया जा सकता है। देशभर में जगह-जगह ऐसा सुनाई पड़ता है कि पुरानी दुश्मनी के चलते किसी महिला से बलात्कार किया गया और यह मान लिया गया कि दुश्मन के परिवार की इज्जत खत्म हो गई। हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि इज्जत तो बलात्कार और बलात्कारी के परिवार की खत्म होनी चाहिए जिसने एक जुर्म किया है, जबकि हिंदुस्तानी सोच बलात्कार की शिकार लडक़ी की इज्जत खत्म होने की बात सोचती है। सीबीएसई में जिन लोगों ने ऐसी बातें पढ़ाना तय किया था, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, अगर वे सरकारी नौकरी में हैं तो उनकी तनख्वाह कटनी चाहिए, उनका प्रमोशन खत्म होना चाहिए, और उन्हें सस्पेंड करना चाहिए। महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह और अपमान के ऐसे पुख्ता सुबूत कम मिलते हैं, इसलिए सरकार को इसे एक मिसाल मानकर लोगों के सामने कड़ी कार्यवाही की एक मिसाल पेश करनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
भारत के एक भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश और आज के राज्यसभा सदस्य जस्टिस रंजन गोगोई अपने एक टीवी इंटरव्यू में कही गई कुछ बातों को लेकर विशेषाधिकार हनन के एक मामले में घिर गए हैं। तृणमूल कांग्रेस ने रंजन गोगोई के खिलाफ राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन और सदन की गरिमा गिराने की शिकायत की है। दरअसल अभी-अभी रंजन गोगोई की लिखी हुई एक किताब आई है जिसमें उन्होंने अयोध्या पर अपनी अगुवाई में एक बेंच द्वारा दिए गए फैसले के बारे में भी लिखा है, और जैसा कि आजकल बाजार में आमतौर पर होता है कि किसी किताब की बिक्री को बढ़ाने के लिए उसके लेखक बिक्री शुरू होने के आसपास कई तरह के इंटरव्यू देते हैं, वैसा ही एक इंटरव्यू रंजन गोगोई ने भी एनडीटीवी को दिया था। इसमें जब उनसे पूछा गया था कि पिछले बरस राज्यसभा में मनोनीत होने के बाद से अब तक वे कुल 10 फ़ीसदी बार ही सत्र में गए हैं, तो इस पर उनका कहना था कि वे कोरोना की वजह से भी वहां नहीं गए थे, और संसद में बैठने की व्यवस्था भी उन्हें बहुत आरामदेह नहीं लगी.उन्होंने कह कि इसके अलावा वे राज्यसभा तभी जाते हैं जब उन्हें जाने की इच्छा होती है, जब उन्हें लगता है कि ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे वहां पर हैं जिस पर वे बोल सकते हैं। उन्होंने कहा कि मैं एक मनोनीत सदस्य हूं और किसी पार्टी की व्हिप से नहीं चलता हूं, इसलिए वहां जाना और वहां से निकलना यह मेरी मर्जी का है। उन्होंने टीवी के इस इंटरव्यू में यह भी कहा-राज्यसभा में ऐसा कौन सा जादू है, अगर मैं किसी ट्रिब्यूनल का चेयरमैन रहता तो मैं वहां से वेतन-भत्ते अधिक पाते रहता मैं राज्यसभा से एक पैसा भी नहीं ले रहा हूं।
रंजन गोगोई की इन बातों को तृणमूल कांग्रेस ने तो संसद के लिए अपमानजनक माना ही है उसके अलावा भी कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद रहे जयराम रमेश ने भी इन बातों पर आपत्ति की है। जयराम रमेश ने कहा कि एनडीटीवी के इंटरव्यू में जस्टिस गोगोई ने जो कहा है कि वह राज्य सभा तब जाते हैं, जब उन्हें जाने को दिल करता है, यह संसद का अपमान है। जयराम रमेश ने ट्वीट करके यह बात कही और कहा कि जिस सदन में उन्हें मनोनीत किया गया है, उस सदन में लोग न सिर्फ बोलने के लिए जाते हैं बल्कि सुनने के लिए भी जाते हैं।
जस्टिस रंजन गोगोई ने पहली बार कोई स्तरहीन काम किया हो ऐसी बात भी नहीं है, इसके पहले भी जब वे भारत के मुख्य न्यायाधीश थे और उनके खिलाफ मातहत काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने सेक्स शोषण की शिकायत की थी, तो उन्होंने परंपराओं और नैतिकता से परे जाकर खुद ही उस मामले की सुनवाई पर बैठना तय किया। उस बात ने भी लोगों को हक्का-बक्का कर दिया था, और लोगों ने उसकी जमकर आलोचना भी की थी। उसके बाद अयोध्या का फैसला आया और कुछ महीनों के भीतर ही रंजन गोगोई ने राज्यसभा सदस्य मनोनीत होना मंजूर कर लिया। बहुत से लोगों ने इन दोनों बातों को जोडक़र देखा, बहुत से लोगों ने यह कहा कि रंजन गोगोई के बहुत से अदालती फैसले सरकार को खुश करने वाले थे, और उन्हीं के एवज में उन्हें राज्यसभा की सदस्यता दी गई है। अभी उन्होंने इस इंटरव्यू में जिस तरह से यह कहा कि राज्यसभा में ऐसा कौन सा जादू है और वह बाहर किसी ट्रिब्यूनल के चेयरमैन होकर अधिक फायदा पाते, यह बात भी राज्यसभा की गरिमा के बहुत खिलाफ है। और राज्यसभा का कोई सदस्य यह कहे कि जब उसकी मर्जी होती है, या जब उसका दिल करता है, तब वह राज्यसभा जाता है, यह निश्चित रूप से राज्यसभा की अवमानना है। अब संसदीय व्यवस्था में नियमों की बारीकी के तहत इसे अवमानना माना जाएगा या नहीं इससे हमारा अभी बहुत लेना-देना नहीं है, लेकिन हमारी मामूली समझ यही कहती है कि देश की इस सबसे ऊंची संस्था के उच्च सदन राज्यसभा के बारे में इस अंदाज में कुछ कहना, और इस अंदाज में वहां आना-जाना, यह कहना कि उनकी जब मर्जी होती है तब वहां जाते हैं, और जब मर्जी होती है तब वहां से आते हैं, यह पूरा सिलसिला बड़ा खतरनाक है। यह सिलसिला बताता है कि देश का जो उच्च सदन देश के, दुनिया के मुद्दों पर गौर करता है, विचार करता है, फैसले लेता है, वहां का एक सदस्य इस तरह अपने आपको मनमर्जी का मालिक बताता है, खासकर सदन के मामलों को लेकर।
हो सकता है कि तृणमूल कांग्रेस की शिकायत के साथ कई और पार्टियां भी इस नोटिस के समर्थन में जुट जाएं क्योंकि जिस तरह रंजन गोगोई ने राज्यसभा की सदस्यता मंजूर की थी उसने कई पार्टियों की भावनाओं को चोट पहुंचाई थी और लोगों को लगा था कि यह देश में एक बहुत ही खराब परंपरा शुरू हुई है कि रिटायर होने के कुछ ही समय के भीतर भारत के मुख्य न्यायाधीश राज्यसभा की सदस्यता को मंजूर करें। उनके इस फैसले से लोगों को यह भी याद पड़ गया था कि अदालत में जज की कुर्सी पर बैठकर उन्होंने ऐसे कौन-कौन से फैसले और हुक्म दिए थे जिनसे सरकार का खुश होना लाजिमी था। ऐसे तमाम राजनीतिक दल जिन्होंने रंजन गोगोई की आलोचना की थी आज उनके पास यह सोचने का एक मौका है कि क्या वे इस विशेषाधिकार हनन और अवमानना के मामले में तृणमूल कांग्रेस के साथ खड़े होंगे या नहीं। यह भी हो सकता है कि कांग्रेस जैसी पार्टी जिसके भीतर घुसकर तृणमूल कांग्रेस लगातार शिकार कर रही है, वह ममता बनर्जी की पार्टी के इस फैसले के साथ खड़ा होना ना चाहे। फिर भी दूसरी और पार्टियां हैं, और आगे देखना है कि कौन-कौन सदन की गरिमा की फिक्र करती हैं।
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जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और वहां की एक प्रमुख पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला ने अभी जम्मू में अपनी पार्टी के अल्पसंख्यक संगठन के कार्यक्रम में कश्मीरी पंडितों के बीच कहा कि राज्य में अगर हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत बढ़ती है तो इसका फायदा दुश्मनों को होगा। उन्होंने दुश्मन का नाम तो नहीं लिया लेकिन यह जाहिर है कि उनका इशारा पाकिस्तान की तरफ था। यह एक और बात है कि उन्होंने पिछले दो दिनों में दो-तीन अलग-अलग कार्यक्रमों में एक जगह यह भी कहा है कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत करनी चाहिए। लेकिन उन्होंने बड़े खुलासे से यह कहा कि जिस वक्त कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को दहशत पैदा करके बाहर किया गया उस वक्त उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति आज ऊपर ईश्वर के पास है, और वहां अपना हिसाब दे रहा होगा। उनका इशारा 1990 के दौर में वहां पर राज्यपाल रहे हुए जगमोहन की तरफ था जिन्होंने कश्मीरी पंडितों के कश्मीर छोडऩे के लिए गाडिय़ों का इंतजाम भी किया था। लोगों को याद होगा कि यही जगमोहन इमरजेंसी के दौरान तुर्कमान गेट पर लोगों पर बुलडोजर चलवाने के जिम्मेदार दिल्ली के अफसर थे, संजय गांधी के चहेते थे। बाद में वे भारतीय जनता पार्टी के पसंदीदा अफसर रहे और जम्मू-कश्मीर में उनके रहते हुए ही कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोडऩा पड़ा और आज तक वे घर लौट नहीं पाए हैं। आज की बात फारुख अब्दुल्ला के बयान पर है जिन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह भी कही है कि अगर इस देश के नेता राजनीति और धर्म को एक-दूसरे से अलग नहीं करेंगे, तो यह देश नहीं चल पाएगा। उनका हमला बिल्कुल साफ था और उन्होंने केंद्र सरकार की अगुवाई कर रही भाजपा के बारे में कहा कि उनके पास संसद में 300 सदस्य हैं, लेकिन वह महिला अधिकार विधेयक क्यों पारित नहीं करते, वे नहीं चाहते कि महिलाओं को वह दर्जा मिले जो मर्दों को मिला हुआ है।
फारुख अब्दुल्ला की कही हुई बातों की गंभीरता को समझने की जरूरत है। उन्होंने अपने रहते हुए कश्मीर में कभी हिंदू और मुस्लिम के बीच में फर्क नहीं किया था, और कश्मीरी पंडितों को जिन हालात में कश्मीर छोडऩा पड़ा उसके पीछे दूसरे लोग थे। आज अगर वे इस बात को कह रहे हैं कि धर्म और राजनीति को अगर अलग नहीं किया गया तो यह देश चल नहीं पाएगा, उस बात की गंभीरता को समझना चाहिए। हिंदुस्तान में धर्म की राजनीति करने वाले लोगों की कमी नहीं है, और धर्म के बिना राजनीति करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। दिक्कत यह होती है कि जब दूसरे धर्म से नफरत से सिखाकर अपने धर्म के लोगों को एक करने का काम किया जाता है, तो नफरत में लोगों को जोडऩे की ताकत अधिक रहती है। मोहब्बत जब तक लोगों को कुछ समझा पाती है तब तक नफरत लोगों को एकजुट कर चुकी रहती है, और खासकर जब एक काल्पनिक दुश्मन को सामने पेश करके उसके खिलाफ आत्मरक्षा के लिए एक होने की बात लोगों को समझाई जाती है तो कमअक्ल लोग ऐसी बात को तेजी से समझ लेते हैं। और फिर हिंदुस्तान तो है ही ऐसे लोगों का देश जिनके बारे में सुप्रीम कोर्ट के एक भूतपूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा था कि 90 फीसदी हिंदुस्तानी बेवकूफ हैं। यहां के आम लोग जिस तरह धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर, एक दूसरे के खिलाफ हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं, उससे यह बात साबित होती है कि लोगों की बहुतायत बेवकूफों की है। अब कश्मीर तो एक बहुत नाजुक मुद्दा हो गया, वहां के लिए तो हिंदू-मुस्लिम की एकता बहुत जरूरी है ही क्योंकि लाखों कश्मीरी पंडित अपना घर खोकर, बेवतन होकर कश्मीर के बाहर पड़े हुए हैं, और एक शरणार्थी की तरह की जिंदगी जी रहे हैं। जिन पार्टियों ने अपनी पूरी जिंदगी कश्मीरी पंडितों की वापिसी के नारे के साथ गुजारी है उन पार्टियों को भी आज कश्मीरी पंडितों की कोई परवाह नहीं रह गई है। इसलिए जब फारुख अब्दुल्ला कश्मीर के एक मुस्लिम नेता की हैसियत से और एक धर्मनिरपेक्ष भूतपूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से यह बात कहते हैं कि राजनीति और धर्म को अलग करना चाहिए तो उसके मतलब समझने की जरूरत है।
आज हिंदुस्तान में जगह-जगह जिस तरह धर्म के नाम पर राजनीति की जा रही है और धर्मों को आपस में बांटकर उनका ध्रुवीकरण करके राजनीति की जा रही है उसका एक असर कश्मीर पर भी पड़ रहा है। कश्मीर हिंदुस्तान का हिस्सा है और उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह बाकी हिंदुस्तान के हिंदू-मुस्लिम मुद्दों से अछूता रह जाएगा। आज देश के कुछ राज्यों में चुनाव हैं जिनमें से एक उत्तर प्रदेश भी है और उत्तर प्रदेश को लेकर जितने किस्म के धार्मिक कर्मकांड लेकर, जितने किस्म के धर्मांध ध्रुवीकरण की कोशिश वहां पर की जा रही है, उसका असर देश में जगह-जगह न सिर्फ मुस्लिमों पर पड़ रहा है, बल्कि दूसरे गैर हिंदू अल्पसंख्यकों पर भी पड़ रहा है। फारुख अब्दुल्ला ने कश्मीर के संदर्भ में भी कहा है और पूरे हिंदुस्तान के सिलसिले में भी उन्होंने इस बात को कहा है और उसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। आज हिंदुस्तान का कोई राजनीतिक दल यह सोचे कि यहां लोगों की नागरिकता खत्म करके उन्हें प्रताडऩा शिविरों में रखा जाएगा और उनके धर्म के लोगों पर कश्मीर या दूसरे प्रदेशों में कोई असर नहीं होगा, तो यह सोचना बहुत ही अलोकतांत्रिक है। आज देश में जगह-जगह कुछ राजनीतिक दलों और कुछ सरकारों का रुख जिस हद तक मुस्लिमों के खिलाफ दिखता है और मुस्लिमों के खिलाफ एक हमलावर तेवर बनाए रखने के लिए हिंदू धर्म का जैसा इस्तेमाल किया जा रहा है उसका असर भी न सिर्फ हिंदुस्तान के मुस्लिम समुदाय पर पड़ता है, बल्कि दुनिया में कई देशों में वहां की मुस्लिम आबादी पर भी पड़ता है जो कि हिंदुस्तानी लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार देती है। भारत में मुस्लिमों के साथ अगर ज्यादती होती है तो खाड़ी के देशों में काम करने वाले गैर मुस्लिम हिंदुस्तानियों को भी उसका दाम चुकाना पड़ता है।
हमने दुनिया के बहुत से देशों को देखा है जहां पर सत्ता की राजनीति धर्म के आधार पर की गई और उसका क्या नतीजा हुआ। यह पाकिस्तान में भी देखने मिल रहा है और इस्लामी नारों के साथ चलाए जा रहे आतंक के दूसरे देशों में भी। धर्म का मिजाज ही ऐसा रहता है कि वह किसी भी लोकतंत्र और किसी भी संविधान के ऊपर हावी होने की कोशिश करता है और हिंदुस्तान को इससे बचना भी चाहिए। फारुख अब्दुल्ला की कही बातें देशभर में सोचने-विचारने लायक हैं। उन्होंने और भी बहुत से मुद्दों को लेकर कहा है, जिसमें उन्होंने यह भी याद किया है कि जिस वक्त उनके पिता शेख अब्दुल्ला कश्मीर के सबसे बड़े नेता थे, उस दौर में, 1947 में जब भारत पाकिस्तान का विभाजन हुआ, उस पूरे दौर में भी पूरे कश्मीर में एक भी हिंदू को नहीं मारा गया। वहां की स्थानीय लीडरशिप थी जिसने इस बात की गारंटी की थी कि वहां सांप्रदायिक दंगे ना हों। लेकिन बाद के वर्षों में जब केंद्र सरकार के तैनात किए हुए राज्यपाल ने वहां रहते हुए कश्मीरी पंडितों के कश्मीर छोडऩे का माहौल बनने दिया, उनके निकलने का इंतजाम किया, तो यह देखना तकलीफदेह रहा कि उसके बाद उसी अफसर जगमोहन को पद्म भूषण और पद्म विभूषण दिया गया। ऐसी तमाम बातों से सीख और सबक लेना चाहिए क्योंकि कश्मीर आज भी कश्मीरी पंडितों के वापस लौटने लायक प्रदेश नहीं बन पाया है। पूरी तरह से केंद्र सरकार के काबू में उसे कई बरस हो चुके हैं। लेकिन अब तक कश्मीरी पंडितों की वापिसी के मुद्दे पर बात दो कदम भी आगे नहीं बढ़ी है। हिंदुस्तान में धर्म को राजनीति से अलग किए बिना इस देश को न तो चलाया जा सकता है और न ही बचाया जा सकता है। इस बात को नेता समझें न समझें, जनता को गंभीरता से समझ लेना चाहिए और यह मानकर चलना चाहिए कि धर्म के नाम पर जो लोग राजनीति कर रहे हैं वह हिंदुस्तान को खत्म करने का काम कर रहे हैं।
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भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना अपने सामाजिक सरोकार को लेकर कई बार हैरान करते हैं कि क्या उन्हें रिटायरमेंट में किसी और पुनर्वास की कोई चाह नहीं है? उनकी बातें सत्ता को बगावती तेवरों की बातें लग सकती हैं। अभी उन्होंने दिल्ली नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एक समारोह में छात्रों के बीच कहा कि पिछले कुछ दशकों से छात्र बिरादरी से कोई बड़े नेता निकलकर नहीं आए हैं, और यह एक ऐसे देश का हाल है जहां छात्र, देश की आजादी के आंदोलन का चेहरा थे। उन्होंने कहा कि आर्थिक उदारीकरण के बाद ऐसा लगता है कि सामाजिक मुद्दों को लेकर उनमें छात्रों की भागीदारी घटती चली गई है। मुख्य न्यायाधीश ने निजी हॉस्टल-स्कूलों और कोचिंग सेंटरों में भेज दिए जाने वाले छात्रों के बारे में कहा कि वे कटी हुई ऐसी जिंदगी जीते हैं जिन्हें उनके आसपास की सामाजिक हकीकत का भी एहसास नहीं रहता, उनके भीतर की प्रतिभा भी बस आगे करियर बनाने में झोंक दी जाती है। उन्होंने कहा कि आज चारों तरफ ऐसे पेशेवर कोर्स की चाह रह गई है जिनसे ऊंची तनख्वाह वाले काम मिल सकें, दूसरी तरफ इंसानों से जुड़े हुए विषयों और कुदरत से जुड़े हुए विषयों की पढ़ाई पूरी तरह उपेक्षित होती जा रही है। जस्टिस रमना ने कहा कि प्रोफेशनल कोर्स वाले विश्वविद्यालयों में जाने के बाद बच्चे वहां पर क्लास रूम की पढ़ाई में रह जाते हैं, और पता नहीं ऐसे में सामाजिक सरोकारों से उनके कट जाने की तोहमत किसे दी जाए। उन्होंने कहा कि आज हिंदुस्तान की आबादी का एक चौथाई हिस्सा बुनियादी तालीम पाने से भी दूर है और विश्वविद्यालयों में पढऩे की उम्र वाले कुल 27 फीसदी लोग ही यूनिवर्सिटी की पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पढ़े-लिखे लोग बड़ी पूंजी होते हैं, और हिंदुस्तान में उसी की कमी दिखाई पड़ती है। उन्होंने छात्र-छात्राओं की समाज में भूमिका के बारे में एक बड़ी बात कही कि छात्र ही आजादी, इंसाफ, समानता, नैतिकता, इन सबके रखवाले होते हैं, और जब यह पीढ़ी, इस उम्र के लोग, सामाजिक और राजनीतिक रूप से चेतनासंपन्न होते हैं, तब समाज और देश में शिक्षा, भोजन, कपड़े, इलाज, और रहने जैसे बुनियादी मुद्दे राष्ट्रीय बहस के बीच में बने रहते हैं। पढ़े-लिखे नौजवान सामाजिक हकीकत से कटे नहीं रह सकते हैं।
जस्टिस रमना आए दिन कभी अदालत के फैसले में, कभी सुनवाई के दौरान अपनी टिप्पणियों से, और कभी बाहर किसी जगह पर भाषण देते हुए सामाजिक इंसाफ की बहुत सारी बातें कहते हैं। बहुत समय बाद भारत का कोई प्रमुख न्यायाधीश लीक से हटकर और अपनी न्यूनतम जिम्मेदारी से बाहर जाकर इस तरह की बातें कहते हुए सुनाई पड़ रहा है। हम उनकी इन बातों के एक छोटे से हिस्से से कुछ असहमत हैं, लेकिन उनकी पूरी सोच के साथ हैं, और यह भी समझने की जरूरत है कि आज हिंदुस्तान में ऐसा हो क्यों रहा है। हम उनकी यह बात ठीक नहीं मानते कि हिंदुस्तान में हाल के दशकों में कोई बड़ा छात्र नेता उभरकर सामने नहीं आया। ताजा इतिहास गवाह है कि जिस वक्त देश की सरकार और दिल्ली की पुलिस जेएनयू के छात्र-छात्राओं पर तरह-तरह की झूठी और साजिशन तोहमत लगाकर उनके खिलाफ फर्जी मामले दर्ज कर रही थी, उस वक्त भी जेएनयू में कन्हैया कुमार जैसे छात्र नेता सामने आए और उन्होंने देश को हिलाकर रख दिया। कन्हैया कुमार अभी कुछ अरसा पहले तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में थे और उसी पार्टी की छात्र शाखा में वे राजनीति कर रहे थे। उन्होंने बार-बार खुलकर इस बात पर जोर दिया था कि विश्वविद्यालयों के छात्र राजनीति में हिस्सा लेंगे ही। और जो लोग विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं को राजनीति से परे रखने की बात करते हैं, उनको यह भी समझना चाहिए की 18 बरस की उम्र में जब वोट देने का अधिकार दिया गया है तो छात्र राजनीति से परे कैसे रहेंगे? और फिर विश्वविद्यालयों में न सिर्फ वामपंथी दलों के छात्र संगठन हैं, बल्कि कांग्रेस और भाजपा इन दोनों का छात्र संगठनों का लंबा इतिहास रहा है. इसलिए वहां जेएनयू की मिसाल दे-देकर छात्रों को राजनीति से दूर रखने की बात करना एक बड़ी बेवकूफी की बात रही है, और वह मोटे तौर पर वामपंथी रुझान के छात्र-छात्राओं को कुचलने की सोच रही है। लेकिन ऐसी तमाम साजिशों के पीछे से उबरकर जेएनयू के और जामिया मिलिया के छात्र नेता जिस तरह से पिछले वर्षों में सामने आए हैं, हमारा ख्याल है कि जस्टिस रमना को इन्हें अनदेखा नहीं करना था। कन्हैया कुमार ने जेल से रिहा होने के बाद जेएनयू के कैंपस में करीब 1 घंटे का जो भाषण दिया था और जो देश के कई चैनलों पर लाइव दिखाया गया था उसने लोगों को यह बतलाया था कि छात्र नेता भी कितने समझदार और गंभीर हो सकते हैं, और बाद में भी कन्हैया कुमार ने लगातार एक परिपच् नेता के रूप में अपने आपको पेश किया। उनकी निजी राजनीति सीपीआई से निकलकर कांग्रेस तक आ गई लेकिन उससे हमारी आज की बात का कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे और भी छात्र नेता वहां पर रहे, लेकिन सवाल यह है कि जब देश या प्रदेशों की सरकारें छात्र आंदोलनों को कुचलने में लगी रहें, और जब उनके खिलाफ झूठे जुर्म दर्ज किए जाएं, उनके खिलाफ देशद्रोह के नारों वाले झूठे वीडियो गढ़े जाएं, जिन्हें अदालतें ही फर्जी साबित करें, तो फिर ऐसी सरकारों के खिलाफ छात्र आंदोलन कितने चल सकते हैं? ऐसा भी नहीं है कि ज्यादती से डरकर कन्हैया कुमार जैसे लोग किसी सत्तारूढ़ दल में चले गए हैं। लेकिन जब जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में कुलपति बनाने से लेकर बाकी तमाम फैसलों तक में सरकार की नीयत साफ दिखती है कि छात्र आंदोलन को किस तरह कुचला जाए, तो फिर वहां से कोई बहुत बड़ा आंदोलन निकलना कुछ मुश्किल भी रहता है. फिर अलग-अलग राज्य में राज्यों में सरकारों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ जिस तरह का रुख दिखाया है, उससे भी नौजवान पीढ़ी और छात्रों का हौसला पस्त हुआ है।
लेकिन जस्टिस रमना की इस बात से हम पूरी तरह सहमत हैं कि जिस देश में छात्रों की पीढ़ी जागरूक रहेगी और सामाजिक-राजनीतिक चेतना संपन्न रहेगी, वहां पर जमीनी हकीकत भी बेहतर होगी। देश के बुनियादी मुद्दों से नौजवान पीढ़ी को जुड़े रहना चाहिए और उसे अपने-आपको कभी हाशिए पर नहीं जाने देना चाहिए। जब नौजवान कॉलेज और विश्वविद्यालय में रहते हैं उस वक्त भी कुछ खतरे उठाने का हौसला भी रखते हैं। लेकिन आज आर्थिक उदारीकरण के बाद जिस तरह से हिंदुस्तान में उच्च शिक्षा के नगदीकरण का सिलसिला चल रहा है उसमें मां-बाप और नौजवान पीढ़ी को ऊंची तालीम पाने के लिए पूंजी निवेश करना पड़ता है, और फिर उस पूंजी निवेश की वापिसी के लिए ऊंची तनख्वाह, ऊंची कमाई वाले काम करने पड़ते हैं, और इन सबका नतीजा यह रहता है कि वे सामाजिक सरोकार से कटते चले जाते हैं। आज देश में अधिकतर छात्रों का हाल यह है कि वे महंगे मोबाइल और महंगी मोबाइक से परे कम ही सोच पाते हैं। और डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, कानून या मैनेजमेंट जैसी पढ़ाई करने वाले लोग तो अपने-आपको जमीन से काट ही लेते हैं। जेएनयू या जामिया जैसे संस्थानों के, या सामाजिक विज्ञान के विषय पढऩे वाले दूसरे छात्र-छात्राओं के बीच जागरूकता का एक बेहतर स्तर दिखता है और वहीं से कुछ उम्मीद भी की जा सकती है।
जस्टिस रमना के पूरे दीक्षांत-भाषण को पढऩा या सुनना चाहिए और छात्रों के बीच इसे लेकर एक चर्चा भी छिडऩी चाहिए। नौजवान पीढ़ी अगर भारत के 2-4 राजनीतिक दलों से जुड़े हुए छात्र संगठनों की सोच के कैदी होकर रह जाएगी, तो भी उससे छात्र आंदोलनों का नुकसान होगा। होना यह चाहिए कि छात्रों के बीच से अधिक असरदार आंदोलन शुरू हों, और इस बात को खारिज कर दिया जाए कि छात्रों का काम केवल पढ़ाई करना है, राजनीति करना नहीं है। जिस दिन से लोगों को वोट डालने का हक मिलता है उस दिन से ही उन्हें राजनीति करने का हक भी मिल जाता है, और आज देश के तमाम प्रमुख राजनीतिक दलों के छात्र संगठन इसीलिए हैं कि वे छात्र-छात्राओं के राजनीति में आने की उम्मीद करते हैं, उसे बढ़ावा देते हैं।
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दुनिया में बहुत सी जगहों पर ऐसे मौलिक फैसले लिए जाते हैं जिनसे बाकी दुनिया कुछ सीख सकती है। हर फैसला तो हर जगह लागू नहीं हो सकता क्योंकि अलग-अलग देशों के कानून अलग होते हैं, वहां की लोकतांत्रिक या दूसरे किस्म की व्यवस्था अलग होती है, लेकिन फिर भी कई बातों को लेकर एक-दूसरे से सीखा जा सकता है। अब जैसे आज की खबर है कि न्यूजीलैंड दुनिया में सबसे कड़ा धूम्रपान कानून लागू करने जा रहा है, और इस प्रस्तावित कानून में 14 साल या उससे कम उम्र के लोग 2027 के बाद कभी सिगरेट नहीं खरीद पाएंगे। अभी 2 दिन पहले न्यूजीलैंड में इस नए कानून का मसौदा पेश किया गया और स्वास्थ्य मंत्री ने यह कहा कि हम इस बात की गारंटी करना चाहते हैं कि नौजवान कभी धूम्रपान न करें। वहां की सरकार का यह कहना है कि धूम्रपान घटाने की बाकी कोशिशें इतना धीमा असर करती हैं कि उससे लोगों का सिगरेट पीना छूटने में कई दशक लग जाएंगे, और सरकार लोगों का इतना लंबा नुकसान नहीं चाहती है। आज न्यूजीलैंड में 15 साल से अधिक उम्र के लोगों में 11 फ़ीसदी लोग सिगरेट पीते हैं और वहां के मूल निवासी माओरी आदिवासियों में यह अनुपात 29 फ़ीसदी तक है। अभी लोगों के सामने पेश किया गया यह मसौदा अगले साल संसद में पेश होगा और 2024 से इस पर कड़ाई से अमल किया जाएगा, और 2027 से धूम्रपान मुक्त पीढ़ी आने लगेगी ऐसा सरकार का कहना है। इसी खबर में यह जानकारी भी मिलती है कि न्यूजीलैंड की तरह यूनाइटेड किंगडम भी 2030 तक धूम्रपान मुक्त होने का एक लक्ष्य लेकर चल रहा है।
हिंदुस्तान में हाल के वर्षों में ऐसा लगने लगा है कि सिगरेट पीना तो इतना बड़ा खतरा शायद नहीं रह गया है जितना बड़ा खतरा तंबाकू और सुपारी का मिला हुआ गुटखा बन गया है। हिंदुस्तान में गुटखा जेब में रखकर चलना आसान है, खरीदने के लिए तो कदम-कदम पर दुकानें हैं, और गांव-देहात के बहुत से लोग तो खाली तंबाकू को मसलकर उसे मुंह में दबाकर घंटों तक उसका मजा और नशा लेते रहते हैं, यह एक अलग बात है कि मुंह के कैंसर को न्यौता देने का यह सबसे असरदार तरीका है। हिंदुस्तान में मुंह के कैंसर की एक सबसे बड़ी वजह मुंह में तंबाकू दबाकर रखने वाले लोग हैं, लेकिन देश और प्रदेश की किसी भी सरकार की फिक्र में यह नहीं दिखता है क्योंकि बड़े-बड़े नेता भी इस तरह से तंबाकू खाते हुए दिखते हैं। बहुत से नेताओं की तो ऐसी तस्वीरें आती है जिनमें उनके कमरों में पीकदान रखे रहते हैं और जो बात करते हुए मुंह को आसमान की तरफ उठाकर पीक को मुंह में समाए हुए बात करते हैं। कहने के लिए हिंदुस्तान में धूम्रपान के खिलाफ कानून है और यहां सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट-बीड़ी पीने वाले लोगों पर जुर्माना है लेकिन इस कानून का कभी कोई अमल होता हो ऐसा दिखाई नहीं पड़ता है. अभी जब कोरोना की वजह से पिछले डेढ़-दो बरस में लोगों को अधिक साफ-सफाई और सावधानी बरतने की जरूरत लगने लगी, तब भी सड़कों पर भूख और पीक उगलते हुए लोगों की भीड़ दिखती ही है। हर चौराहे पर जहां लाल बत्ती पर गाड़ियां रूकती हैं वहां कारों के दरवाजे खुलने लगते हैं, और अगर किसी ने हेलमेट लगाया हुआ है तो उसे हटाकर भी, थूकने का सिलसिला चलता है. कोरोना वायरस को यह देश बड़ा पसंद भी आता होगा क्योंकि यहां लोग खूब सारा थूक चारों तरफ फैलाते चलते हैं, और सड़कों पर बड़े-बड़े हिस्से तंबाकू की पीक के रंग के दिखते हैं।
भारत में कैंसर के आंकड़े अगर देखें तो मुंह के कैंसर के शिकार लोग बहुत हैं। सिगरेट-बीड़ी पीने से फेफड़ों का कैंसर भी होता है और उनकी गिनती अलग है। सिगरेट-बीड़ी पीने वालों के आसपास के लोग भी उनके धुएं के बुरे असर के शिकार होते हैं और पैसिव स्मोकिंग से भी बहुत से लोगों को कैंसर होता है। न्यूजीलैंड ने जिस तरह का कड़ा फैसला सामने रखा है उसे देख कर दुनिया के बाकी देशों को भी अपने बारे में सोचना चाहिए और सिगरेट-बीड़ी, तंबाकू-गुटखा, या शराब पर किस तरह काबू पाया जाए, उस बारे में सोचना चाहिए।
जिन सरकारों को यह लगता है कि तंबाकू या शराब से इतना टैक्स मिलता है कि सरकार उसी कमाई से चलती है, तो उन्हें इन चीजों से होने वाली बीमारियों की पारिवारिक और सामाजिक लागत के बारे में भी सोचना चाहिए, और यह भी सोचना चाहिए कि गरीब जनता इन पर कितना खर्च करती है, और उसके बाद उनमें से कितने लोगों की उत्पादकता किस बुरी तरह प्रभावित होती है, कितने लोगों को महंगे इलाज की जरूरत पड़ती है, कितने लोगों की जिंदगी घट जाती है। सरकारें बुराइयों से, नशे से कमाई के आंकड़े गिनते हुए ऐसे खर्च के आंकड़ों को अनदेखा कर देती है जिनका एक बड़ा बोझ सरकार पर ही पड़ता है। आज एक-एक कैंसर मरीज के इलाज में लाखों रुपए खर्च होते हैं, और गरीब मरीजों को तो सरकारी इंतजाम का ही सहारा रहता है। भारत में केंद्र सरकार को और राज्य सरकारों को भी तंबाकू से जुड़ी हुई चीजों के बारे में कड़े फैसले करने चाहिए और ऐसा करते हुए तंबाकू उत्पादक किसानों की फिक्र नहीं करनी चाहिए। ऐसे किसानों को दूसरी फसलों तक ले जाने में सरकारें मदद कर सकती हैं, और उन्हें अधिक नुकसान से बचा सकती हैं, लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी अगर तंबाकू का चलन इसी तरह चलता रहेगा तो उससे आने वाली पीढ़ियों के नुकसान की भी गारंटी रहेगी।
न्यूजीलैंड ने जिस तरह अगली पीढ़ी की फिक्र करते हुए इस नए कानून का मसौदा सामने रखा है, उसे देखना चाहिए और भारतीय परिस्थितियों में उस बारे में क्या हो सकता है यह सोचना चाहिए। किसी एक प्रदेश के लिए ऐसा फैसला लेना आसान नहीं होगा क्योंकि भारत के प्रदेश एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और किसी एक अकेली जगह प्रतिबंध लागू करना मुश्किल होता है। इसलिए देशभर में ऐसी किसी व्यवस्था के बारे में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक सहमति होना भी जरूरी है तभी जाकर लोगों की जिंदगी बच पाएगी।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में एक दलित युवती को बंधक बनाकर उससे गैंग रेप करने वाले 2 गैर दलितों को अदालत से उम्रकैद की सजा हुई है, लेकिन बलात्कार के 8 बरस बाद जाकर निचली अदालत का यह फैसला आया है, और जाहिर है कि सजा पाने वाले लोग ऊपर की अदालतों में जाएंगे, और एक पूरी जिंदगी वहां लड़ाई चलती रहेगी। इस बीच इस मामले में मुकदमे के कुछ पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है। यह युवती दलित थी इसलिए यह मामला एसटी-एससी अधिनियम की विशेष अदालत में चला। यह एक विशेष अदालत थी जहां इस अधिनियम के तहत दर्ज मामले ही चलते हैं, लेकिन उसमें भी इस मामले को 8 बरस लग गए। मामले की जानकारी बताती है कि बलात्कारियों ने घटना के बारे में किसी को बताने पर परिवार की हत्या की धमकी भी दी थी। अब ऐसे दबंग लोगों के बीच एक दलित परिवार अदालत में लड़ते हुए 8 बरस किस तरह गुजार रहा होगा यह सोचना आसान भी है, और मुश्किल भी। लेकिन इस फैसले के एक और पहलू पर हम बात करना चाहते हैं कि दोनों बलात्कारियों को उम्र कैद सुनाते हुए अदालत ने 20 हजार रुपयों का जुर्माना भी लगाया। यह जुर्माना किसके काम का रहेगा? बलात्कार की शिकार युवती को देने के लिए तो यह मुआवजा किसी तरह से काफी नहीं है और न ही एक राजपूत और एक ब्राह्मण बलात्कारी को यह जुर्माना बहुत भारी पड़ रहा होगा। सजा के अलावा इस जुर्माने के बारे में भी चर्चा की जरूरत है।
हम पहले भी इसी जगह पर कई बार लिख चुके हैं कि जब कभी गैर बराबरी के दो लोगों के बीच कोई जुर्म होता है, और अमूमन ताकतवर लोग ही कमजोर लोगों के खिलाफ कोई जुर्म करते हैं, तो वैसे में ताकतवर को आम सजा देना बहुत ही नाकाफी होता है। ताकतवर को सजा अधिक बरस की कैद की शक्ल में भी मिलनी चाहिए, और उसकी संपत्ति की ताकत को भी नहीं छोडऩा चाहिए। भारत जैसे समाज में पैसे की ताकत से भी कई लोगों को बलात्कार का हौसला मिलता है, इसलिए उनकी इस ताकत को भी सजा मिलनी चाहिए। जो जितना अधिक संपन्न हो, उसकी संपन्नता का एक हिस्सा बलात्कार की शिकार लडक़ी को मिलना चाहिए। शायद उस व्यक्ति की संपत्ति के बंटवारे में उसकी एक-एक औलाद या उसकी बीवी को जितना हिस्सा मिले, उतना ही हिस्सा जुर्म साबित हो जाने के बाद बलात्कार की शिकार लडक़ी को मिलना चाहिए। ऐसा होने पर ही समाज में संपन्न और ताकतवर लोगों के बीच खौफ बैठेगा कि वे खुद तो जेल जाएंगे, परिवार भी दौलत के एक बड़े हिस्से से हाथ धो बैठेगा। बलात्कार के दिन बलात्कारी की जितनी दौलत है, उसे अदालत को तुरंत ही अपनी निगरानी में लेना चाहिए, और उसके एक हिस्से का कब्जा भी बलात्कारी के परिवार से परे कर लेना चाहिए। यह बात इसलिए जरूरी है कि देश में न सिर्फ बलात्कार, बल्कि किसी भी तरह के अपराध, संपन्न और ताकतवर लोगों द्वारा कमजोर और विपन्न लोगों पर अधिक होते हैं। यह ताकत ओहदे की ताकत भी होती है कि मानो कोई सुप्रीम कोर्ट का जज हो जो अपनी मातहत कर्मचारी का सेक्स शोषण करता हो, या कि कोई बड़ा अफसर या मंत्री हो जो कि किसी बेरोजगार या जरूरतमंद के साथ बलात्कार करता हो। इसलिए ताकत का जितना बड़ा हौसला हो उतना ही बड़ा जुर्माना होना चाहिए, कैद तो होनी ही चाहिए। ऐसा बड़ा जुर्माना ही बलात्कार या हत्या के शिकार परिवार के पुनर्वास में काम आ सकता है
भारत की न्याय प्रक्रिया में ऐसा इंतजाम भी होना चाहिए कि जब कोई गरीब परिवार किसी जुर्म के खिलाफ शिकायत करके अदालत आने-जाने के लिए मजबूर होता है तो उसकी कुछ भरपाई भी सरकार की तरफ से होनी चाहिए। आज भी अदालत से गरीबों को रोजाना कुछ छोटी सी रकम पेशी पर आने के लिए मिलने का प्रावधान तो है लेकिन शायद ही उसका कहीं कोई भुगतान होता है, अदालत के बाबू ही उसे रख लेते हैं। जब पूरे-पूरे दिन पुलिस थानों में, वकीलों के पास, और अदालत के गलियारों में खराब होते हैं तो गरीबों को उसकी भरपाई भी होना चाहिए। इसके बिना लोग भूखे मरने के डर से भी कई बार शिकायत नहीं कर पाते कि उनकी उस दिन की मजदूरी का क्या होगा, दिनभर अदालत में रहेंगे शाम को चूल्हा कैसे जलेगा? जब जुल्म और जुर्म की शिकार गरीब जनता की तकलीफें इतनी बड़ी रहती हैं कि वे अदालत में पूरा दिन गंवाना भी बर्दाश्त नहीं कर पाते, तो उनके लिए अदालत की तरफ से एक गुजारा भत्ते का इंतजाम होना चाहिए। यह इंतजाम कम से कम एक दिन की सरकारी रोजी जितना होना चाहिए ताकि गरीब लोग जिंदा रह सके। इसके साथ-साथ गरीबों को अदालत में मिलने वाली मुफ्त कानूनी मदद के ढांचे को भी मजबूत करने की जरूरत है ताकि उन्हें इंसाफ मिलने की थोड़ी सी गुंजाइश बढ़ सके। दुनिया के बहुत से विकसित देशों में बड़े-बड़े वकील भी अपने वक़्त का कुछ हिस्सा गरीबों के लिए मुफ्त में देते हैं। हिंदुस्तान में भी ऐसी मदद को बढ़ावा मिलना चाहिए।
कुल मिलकर जिस बात से आज की यह चर्चा शुरू हुई है, बलात्कार के मामलों की सुनवाई तेज होनी चाहिए और कोशिश होनी चाहिए कि साल भर के भीतर बलात्कारी को सजा मिल जाये, और उसकी संपत्ति का एक हिस्सा जुर्माने की शक्ल में वसूलकर बलात्कार की शिकार को दिया जाये।
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दुनिया के सौ प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने मिलकर विश्व असमानता रिपोर्ट जारी की है, इस रिपोर्ट की प्रस्तावना भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ने लिखी है। रिपोर्ट को देखें तो समझ आता है कि दुनिया में गरीब और अमीर के बीच फासला कितना बड़ा है, और कितना बढ़ते चल रहा है। लेकिन इससे बड़ी बात हिंदुस्तान के लिए यह है कि हिंदुस्तान गरीब और अमीर के बीच बहुत बड़ी असमानता वाला देश है। यहां पर अमीर लोग बहुत अधिक अमीर हैं, और गरीब लोग बहुत गरीब, और पिछले एक-दो बरस में गरीबों की हालत खराब हुई है. भारत में आर्थिक आधार पर नीचे की 50 फीसदी आबादी की कमाई गिर गई है, और संपन्न तबके की कमाई बढ़ गई है। रिपोर्ट की जानकारी को देखें तो यह दिखाई पड़ता है कि भारत में सबसे ऊपर के 10 फ़ीसदी लोग 57 फीसदी कमाई पर काबिज हैं, और इनमें भी एक फीसदी ऐसे हैं जो राष्ट्रीय आय के 22 फीसदी पर काबिज हैं। दूसरी तरफ देश की 50 फीसदी गरीब आबादी पिछले एक बरस में 13 फीसदी कमाई खो बैठी है। रिपोर्ट में इस बात को खुलकर कहा है कि भारत गरीबी और अमीरी के बीच फासले की एक जलती हुई मिसाल है।
भारत में आर्थिक असमानता के ये आंकड़े बहुत भयानक हैं, लेकिन इनको समझते हुए यह भी देखना होगा कि जब-जब इस देश में कुपोषण से गरीबों की बदहाली की रिपोर्ट आती है तो पता लगता है कि उसी के एक या दो दिन बाद भारतीय शेयर बाजार आसमान पर पहुंच जाता है। जब पता लगता है कि देश में बेरोजगारी बढ़ गई है, लोगों के पास खाने-पीने को नहीं है, लोगों को महंगाई बर्दाश्त नहीं हो पा रही है, और उस वक्त शेयर मार्केट एक नया रिकॉर्ड बनाने लगता है, पुराने रिकॉर्ड तोडऩे लगता है. जाहिर है कि देश की सबसे बड़ी कंपनियां, या देश का सबसे संपन्न तबका, इनका कोई भी लेना-देना जमीनी हकीकत से नहीं है, आम जनता से तो बिल्कुल भी नहीं है। जब लोगों के पास खाने को नहीं है उस वक्त हिंदुस्तानियों को शेयर बाजार में पूंजी निवेश से फुर्सत नहीं है। आज जो रिपोर्ट दुनिया भर में छपी है उस रिपोर्ट की हकीकत हिंदुस्तानी शेयर बाजार पहले ही साबित करते आया है। आम जनता की तकलीफ, उसकी बदहाली, उसकी भूख, और उसकी बेरोजगारी इन सबके बीच हिंदुस्तान में एक-एक बड़ी कंपनी एक-एक दिन में दसियों हजार करोड़ रुपए की पूंजी बढ़ा लेती है। यह पूरा सिलसिला हिंदुस्तान को दो हिस्सों में बांटता है। और अभी जब एक किसी कॉमेडियन ने किसी दूसरे देश में जाकर हिंदुस्तान के दो हिस्सों के बारे में कविता पढ़ी, तो उसे गद्दार और देशद्रोही करार देते हुए उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने की कोशिश की गई कि उसने देश को बदनाम किया है। अब अभिजीत बनर्जी के खिलाफ भी कोई जाकर पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं कि हिंदुस्तान में गरीबी और अमीरी के इस फैसले को इस तरह से दिखाना हिंदुस्तान के साथ गद्दारी है। यह एक अलग बात है कि अभिजीत बनर्जी का हिंदुस्तान से कोई खास लेना-देना रहा नहीं है वे अमेरिका में रहते हैं, वहीं के विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, और वहीं पर उनके काम के लिए उन्हें और उनकी पत्नी को, एक और सहयोगी के साथ नोबेल अर्थशास्त्र पुरस्कार मिला है। लेकिन फिर भी वे भारतवंशी हैं इसलिए उन्हें गद्दार करार देने का हक तो इस देश के लोगों का बनता है, फिर चाहे वे एक आईना दिखाने की कोशिश कर रहे हो। हिंदुस्तान की हकीकत बताती है कि बहुत गरीब लोगों के पास तो आईना खरीदने के लिए पैसे भी नहीं रहते, और न ही उनकी अपनी हालत आईने में देखने लायक रहती इसलिए अगर कोई आईना दिखा रहे हैं तो जाहिर तौर पर वह संपन्न तबके को दिखा रहे हैं, और ऊंची कमाई वालों को नीचा दिखाना देश के साथ एक किस्म की गद्दारी तो करार दी ही जा सकती है।
लेकिन हिंदुस्तान की यह हकीकत सडक़-चौराहों से लेकर फुटपाथ, और मजदूर बस्तियों से लेकर देश की संसद और विधानसभाओं तक सभी जगह दिखती है। आज हालत यह है कि देश की आधी गरीब आबादी की जरूरतों पर जिन सदनों में चर्चा होनी चाहिए, वहां करोड़पति भीड़ हो चुकी है। इतने संपन्न लोगों की मजलिस भला क्या खाकर देश के सबसे गरीब लोगों की जरूरतों पर बात कर सकती है? इसलिए यह पूरा सिलसिला जनतंत्र के नाम पर धनतंत्र का एक ऐसा शिकंजा है जो गरीबों को जकडक़र रखता है ताकि वे अमीरों पर कोई हमला न कर बैठें, कहीं उनके हितों में हिस्सा न बताने लगें, कहीं वहां अपना हक न मानने लगें। असमानता की रिपोर्ट दिल दहलाती है, और बताती है कि हिंदुस्तान के लोकतंत्र में लोक की जगह नहीं रह गई है, अब तंत्र ही तंत्र रह गया है जो कि सबसे महंगे जूतों की पॉलिश करने में लगा हुआ है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
घरेलू हिंसा के मामलों पर कितना लिखा जाए और कितना उन्हें अनदेखा किया जाए, यह फैसला आसान नहीं होता। घरेलू हिंसा की खबरों को भी कितना छापा जाए और कितना छोड़ दिया जाए यह बात भी परेशान करती है, और क्या हिंसा की ऐसी खबरों से और लोगों को हिंसा सूझती है या फिर ऐसी खबरों से लोग सावधान होते हैं, यह समझना भी कुछ मुश्किल रहता है। बहुत से लोग तो टीवी पर अपराध के कार्यक्रम इसलिए देखते हैं कि उन्हें लगता है कि इन्हें देखकर भी अपराध के शिकार होने से बच सकते हैं, कई दूसरे लोगों का मानना रहता है कि इससे लोगों को अपराध करना सूझ सकता है या जिन्होंने अपराध करना तय कर लिया है उन्हें यह सुझा सकता है कि अपराध कैसे किया जाए। जो भी हो, बीच-बीच में कुछ खबरें ऐसी आती है जिन्हें अनदेखा करना मुमकिन नहीं होता, न समाचार के रूप में, न विचार के रूप में. ऐसी ही एक खबर महाराष्ट्र की है जहां औरंगाबाद जिले में एक हिंदू लडक़ी ने एक हिंदू लडक़े से परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी की, और कुछ महीनों बाद जब वह गर्भवती थी, उसकी मां उससे मिलने आई। उसे बेटी के गर्भवती होने का पता लगा और उसके बाद दोबारा वह अपने बेटे के साथ वहां आई, और उन दोनों ने मिलकर उसका कत्ल कर दिया, मां ने पैर पकड़े, बेटे ने बहन का सिर धड़ से अलग कर दिया और फिर उसके घर के बाहर आकर लोगों को उसका कटा हुआ सिर दिखाया, उसके साथ सेल्फी ली और फिर मोटरसाइकिल से थाने जाकर मां के साथ अपने को कानून के हवाले कर दिया। ऐसा लगता है कि मां और बेटे की तसल्ली इस कत्ल से ही पूरी हुई कि बेटी ने अपनी मर्जी से शादी की थी तो उन्होंने बेटी को ही खत्म कर दिया। गांव के लोगों का कहना है कि लडक़ा आर्थिक रूप से कमजोर था और लडक़ी की मां अपने बेटे सहित इस बात को अपना अपमान मान रही थी और परिवार की प्रतिष्ठा खराब होने की सोच ने उन्हें इस हत्या तक पहुंचा दिया। यह दूसरी ऑनर किलिंग के मुकाबले कुछ अधिक खतरनाक है जहां पर पिता और भाई मिलकर हत्या करते हैं, इसे एक मामले में तो मां और बेटे ने मिलकर ऐसा कत्ल किया, इतने खूंखार तरीके से किया, और उस पर फख्र भी किया। अपनी गर्भवती बेटी को इस तरह मारने वाली मां के मन में क्या रहा होगा और यह समाज की कैसी व्यवस्था है जो कि मां और भाई को इस हद तक हिंसक बना देती है, इस बारे में सोचने की जरूरत है।
हिंदुस्तान में हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से में परिवार की प्रतिष्ठा को लडक़ी या महिला से जोडक़र देखा जाता है। अगर लडक़ी ने दूसरे धर्म या जाति में शादी की या कि किसी गरीब से शादी की, या कि अपनी मर्जी से शादी की, तो उसका परिवार उसके कत्ल पर उतारू हो जाता है। लेकिन शायद ही कहीं ऐसा सुनाई पड़ता होगा कि किसी लडक़े ने यही काम किया हो और उस लडक़े को उसके परिवार ने मारा हो। ऐसी हिंसा कहीं सुनाई नहीं पड़ती कि लडक़े के किसी काम को परिवार अपने खानदान की बेइज्जती मानता हो। लडक़ा भले बलात्कारी हो, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, उससे कोई अपमान नहीं होता, लेकिन लडक़ी के साथ अगर बलात्कार कोई और कर दे तो भी उससे लडक़ी का अपमान होता है, और उसे डूब मरने लायक मान लिया जाता है, और लडक़ी को भी इस बात का एहसास होता है कि उसका परिवार और समाज उसके बारे में क्या सोच रहा है और इसीलिए वह अपने बलात्कार के बाद बिना किसी जुर्म के खुद फंदे पर टंग जाती है। किसी बलात्कारी के परिवार का कोई भी फंदे पर टंगता हो ऐसा कहीं सुनाई नहीं पड़ता। बलात्कारी के माँ-बाप को भी औलाद के कुकर्म पर ऐसी शर्म नहीं आती कि वे आत्महत्या कर लें। हम कहीं भी यह बात नहीं सुझा रहे हैं कि बलात्कारी के मां-बाप को आत्महत्या करना चाहिए, लेकिन हम बलात्कारी के जुर्म को, परिवार और समाज को देखते हैं, और दूसरी तरफ बलात्कार की शिकार लडक़ी को मुजरिम की तरह देखने वाले परिवार और समाज को भी देखते हैं। जब कभी दो धर्मों के या दो जातियों के लोगों के बीच शादी होती है, तो ऑनर किलिंग के नाम पर केवल लडक़ी को मारा जाता है। या फिर लडक़ी के घर वाले लडक़े को भी मारते हैं। लडक़े का परिवार कभी लडक़ी को नहीं मारता कि लडक़े ने नीची जाति या दूसरे धर्म में शादी की, उससे परिवार का अपमान हो गया है। कुल मिलाकर किसी भी पहलू से देखें तो दिखता यही है कि परिवार या समाज के सम्मान का बोझ लडक़ी के सिर पर रखा जाता है, और लडक़ा या मर्द मानो कुछ भी कर ले, उनका सम्मान कभी बिगड़ नहीं सकता, न ही उनकी वजह से परिवार का सम्मान बिगड़ सकता।
मर्दवादी सोच से बना हुआ यह समाज किसी कोने से बदलते हुए नहीं दिखता है, और महाराष्ट्र की यह ताजा हिंसा अकेली नहीं है। हिंदुस्तान में शायद हर बरस सौ-पचास ऐसी ऑनर किलिंग कहीं जाने वाली हिंसा होती है जिसमें लडक़ी को मार दिया जाता है, या लडक़ी के मां-बाप लडक़े-लडक़ी दोनों को मार देते हैं। इस बात पर लिखने की जरूरत हमें इसलिए लग रही है कि यह हिंसा की एक पराकाष्ठा है, लेकिन अगर हम इस तनाव को देखें तो समाज में जब लडक़े लडक़ी को अपनी मर्जी से मोहब्बत करने, उठने-बैठने, साथ रहने या शादी करने से इस तरह रोका जाता है, तो इससे उनकी दिमागी हालत पर जो फर्क पड़ता होगा उसका अंदाज लगाना चाहिए। नौजवान पीढ़ी की महत्वाकांक्षाओं को निजी जिंदगी में भी खत्म किया जाता है और उनके सार्वजनिक जीवन में भी। वे अपनी मर्जी की पढ़ाई नहीं कर सकते, अपनी मर्जी का काम नहीं कर सकते, अपनी मर्जी से मोहब्बत और शादी नहीं कर सकते, और वे जवान होकर अधेड़ होने लगते हैं, तब तक उन्हें मानो पतलून भी अपने मां-बाप के पसंद किए हुए कपड़े से सिलानी पड़ती है। यह पूरा सिलसिला मानसिक रूप से बीमार एक समाज का सुबूत है जो कि अपनी अगली पीढ़ी को अपने पूर्वाग्रहों का कैदी बनाए रखना चाहता है। यह सिलसिला न सिर्फ अहिंसक है बल्कि यह सिलसिला समाज के आगे बढऩे की राह में बहुत बड़ा रोड़ा है। आज दुनिया में जो भी देश आगे बढ़ रहे हैं वहां पर नौजवानों को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने की आजादी है। दुनिया में खुशहाली के पैमानों पर आज जो देश सबसे ऊपर हैं वहां पर लोगों को यह भी आजादी है कि वे बच्चे पैदा करने के लिए शादी करें या ना करें। ऐसे देश जहां पर कोई पूछते भी नहीं है कि बच्चों के मां-बाप शादीशुदा है या नहीं, उन्हीं देशों का नाम खुशहाल देशों के पैमाने पर सबसे ऊपर आता है। वे देश व संपन्नता और विकास में भी ऊपर रहते हैं। एक खुशहाल युवा पीढ़ी एक उत्पादक युवा पीढ़ी भी रहती है जो राष्ट्रीय संपन्नता में योगदान दे पाती है, और जो अगली पीढ़ी को भी एक खुशहाल भविष्य देकर जाती है।
हिंदुस्तान में शहंशाह अकबर की कहानी जिस तरह सलीम और अनारकली की हसरतों को कुचलने वाली रही है, वही कहानी कई पीढिय़ों बाद भी, सैकड़ों बरस बाद भी घर-घर में दोहराई जाती है जहां मोहब्बत के दुश्मन बनकर खड़े हुए मां-बाप अगली पीढ़ी पर लगातार हिंसा करते हैं, लेकिन चूंकि वह हिंसा मरने और मारने तक नहीं पहुंचती है, इसलिए उसकी अधिक चर्चा नहीं होती है। हिंदुस्तान में यह सिलसिला कैसे खत्म होगा पता नहीं, क्योंकि दूसरे धर्म या दूसरी जाति में शादी करने के खिलाफ परिवार के अलावा समाज भी खड़ा हो जाता है, राजनीतिक दल भी खड़े हो जाते हैं, और सांप्रदायिक संगठन तो लाठी लिए हुए खड़े ही रहते हैं। हिंदुस्तान का यह बीमार समाज अगली पीढिय़ों को लगातार बीमार किए जा रहा है। ऐसे ही मौकों पर शहरीकरण काम आता है जहां जाकर रहते हुए लोग अपनी मर्जी से कुछ कर सकते हैं। जहां कहीं गांव की बात आती है तो वहां पर अपनी मर्जी का कुछ भी नहीं हो पाता क्योंकि लोगों को यह लगता है कि अपनी बराबरी में, अपनी जाति में, और अपने धर्म में शादी अगर नहीं होगी तो परिवार की नाक कट जाएगी। यह सिलसिला पता नहीं कब खत्म होगा क्योंकि जब परिवार अपनी गर्भवती बेटी को मारकर फख्र हासिल करता है तो फिर वैसी सोच को समझाकर क्या बदला जा सकता है?
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भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य नागालैंड में दो रात पहले गश्त पर निकली भारतीय थल सेना की पैरामिलिट्री, असम राइफल्स के जवानों ने कोयला खदान में काम करके लौटते हुए मजदूरों की एक गाड़ी पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, आधा दर्जन से अधिक लोग मारे गए. इसके बाद जब गांव के लोगों ने बेकसूर लोगों की इस तरह हत्या करने का विरोध किया तो इस विरोध को कुचलने के लिए जवानों ने फिर गोलियां चलाईं और 1 दर्जन से अधिक लोग अब तक मारे जा चुके हैं। असम राइफल्स का कहना है कि गांव के लोगों ने पहली गोलीबारी के बाद जब जवानों पर हमला किया तो उसमें कई जवान घायल हुए, एक जवान की मौत भी हो गई है। पूरा मामला केंद्र सरकार, और राज्य सरकार, दोनों के बयानों से साफ होता है कि पैरामिलिट्री के लोगों ने बिना पहचान किए हुए रात के अंधेरे में बेकसूर और निहत्थे मजदूरों को भून डाला। फौज ने इस पर अफसोस जाहिर किया है और ऊंची जांच शुरू की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस पर बहुत अफसोस जाहिर किया है जिनके मातहत थल सेना की यह पैरामिलिट्री वहां काम कर रही थी। नागालैंड के मुख्यमंत्री ने तुरंत ही सशस्त्र बलों की सुरक्षा के लिए बनाए गए एक विशेष कानून, अफ्सपा को खत्म करने की मांग की है। नागालैंड की पुलिस ने जो मामला इन हत्याओं के बाद दर्ज किया है उसकी रिपोर्ट साफ-साफ कहती है- ‘घटना के दौरान सुरक्षा बलों के साथ कोई पुलिस गाइड नहीं था, और न ही सुरक्षाबलों के इस अभियान में पुलिस गाइड देने के लिए थाने से मांग की गई थी, इससे यह साफ है कि सुरक्षाबलों का इरादा आम लोगों को मारना और घायल करना था।’ इन 13 मौतों के बाद नागालैंड में भारी जन आक्रोश बना हुआ है और देश भर से राजनीतिक दलों ने इस अंधाधुंध हिंसा के खिलाफ बहुत सी बातें कही हैं. नागालैंड में बहुत सालों से उग्रवाद चले आ रहा है और जिससे निपटने के लिए तैनात सेना लोगों के साथ ज्यादती करती है ऐसे आरोप हमेशा से लगते आए हैं। नागालैंड में सरकार ने विशेष जांच के आदेश दिए हैं, और जनता जगह-जगह नाराजगी में कैंडल मार्च निकाल रही है। फौज ने इस घटना पर बड़ा अफसोस जाहिर किया है और कहा है कि आम लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत की वजह की उच्च स्तरीय जांच की जा रही है।
लोगों को याद होगा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में, जिनमें उत्तर-पूर्वी राज्य भी शामिल हैं, और कश्मीर भी, वहां से सुरक्षाबलों को किसी कानूनी कार्यवाही से विशेष संरक्षण देने के लिए बनाया गया एक खास कानून, आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल प्रोटेक्शन एक्ट खत्म करने के लिए मणिपुर में एक सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने 16 बरस तक अनशन किया था, जो कि दुनिया के इतिहास का सबसे लम्बा अनशन था। और मणिपुर की महिलाओं ने सार्वजनिक जगहों पर कपड़े उतारकर प्रदर्शन करके भी दुनिया का ध्यान खींचा था। फिर भी फौज और दूसरे सुरक्षाबलों के दबाव में केंद्र सरकारों ने इस कानून को जारी रखा हुआ है और इसकी वजह से सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर में भारी ज्यादती होते ही रहती है. लोगों को याद होगा कि अभी कुछ समय पहले कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एक प्रदर्शनकारी को जीप के सामने बांधकर वहां से अपने लोगों को बाहर निकाला था ताकि पत्थर चलाने वाले लोग इस गाड़ी पर पत्थर न चलाएं क्योंकि इससे कश्मीरी समुदाय के एक व्यक्ति के घायल होने का खतरा रहेगा। इस तरह की मानवीय ढाल बनाकर कार्रवाई करने के खिलाफ बहुत कुछ कहा और लिखा गया, लेकिन केंद्र सरकार ने अपनी फौज की इस कार्रवाई को जायज ठहराया था।
सुरक्षाबलों पर उत्तर-पूर्व के राज्यों से लेकर कश्मीर तक और छत्तीसगढ़ के बस्तर तक तरह-तरह के जुल्म और ज्यादती के आरोप लगते रहते हैं, और ऐसे आरोपों में स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार भी शामिल है और बेकसूरों की हत्या तो मानो सभी जगह होती ही रहती है। यह पूरा सिलसिला और खासकर यह कानून भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के ठीक खिलाफ है, लेकिन उग्रवाद से निपटने के नाम पर सरकार सुरक्षा बलों के हाथ में अंधाधुंध हथियार चलाने का हक देती है, और फिर उनकी ज्यादती पर किसी कानूनी कार्रवाई से उन्हें बचाने के लिए उन्हें इस खास कानून की ढाल भी देती है। मानवाधिकार आंदोलनकारी दशकों से इस कानून के खिलाफ बोलते आए हैं, आंदोलन करते आए हैं। अनगिनत अंतरराष्ट्रीय संगठन भी समय-समय पर भारत की पिछली कई सरकारों से इस कानून का विरोध करते आए हैं, लेकिन सरकारों को ऐसा हथियार सरीखा एक कानून ठीक लगता है ताकि सुरक्षा बल कड़ी कार्रवाई कर सकें। यह कानून पूरी तरह अलोकतांत्रिक और हिंसक है और यह सुरक्षा बलों पर से जवाबदेही को हटा देता है। नागालैंड की यह ताजा घटना जिसमें एक दर्जन से अधिक बेकसूर ग्रामीणों को इस तरह भून दिया गया है, यह एक मौका रहना चाहिए जब देश के राजनीतिक दल और देश के ऐसे तमाम फौज-प्रभावित राज्य मिलकर केंद्र सरकार पर दबाव डालें और इस कानून को खत्म करवाएं। लोकतंत्र में किसी हिंसा से निपटने के लिए सुरक्षाबलों के हाथ में ऐसा हिंसक हथियार नहीं दिया जा सकता जिसका कि व्यापक का बेजा इस्तेमाल दशकों से जो होते चल रहा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दो-तीन जगहों पर पिछले कुछ वर्षों से लोगों के लिए ऐसी दीवारें बनाकर रखी गई हैं जिन्हें नेकी की दीवार का नाम दिया गया है और जहां पर लोग अपने पुराने कपड़े छोड़ सकते हैं, जिन्हें जरूरतमंद लोग ले जा सकते हैं। लेकिन यहां से गुजरते हुए जब-जब देखना होता है, तो दिखता यही है कि लोगों के छोड़े गए कपड़े भी पड़े-पड़े सडऩे लगते हैं, और उन्हें भी ले जाने वाले लोग नहीं हैं। या तो शहरों में इतने गरीब नहीं रह गए कि उन्हें फेंके गए कपड़े काम के लगते हों, फिर यह है कि शहरी लोग इतना कमा लेते हैं कि बाजार में मिलने वाले सस्ते या इस्तेमाल किए हुए कपड़ों को मर्जी और पसंद से खरीद लेते हैं, और छोड़े गए कपड़ों को लेने वाले लोग कम दिखते हैं। पड़े-पड़े कपड़े इतने बड़े-बड़े ग_े बन जाते हैं कि शायद उन्हें म्युनिसिपल उठाकर कचरे में डाल देता हो।
लेकिन यह बात भी है कि लोग जितने कपड़े नेकी की इन दीवारों पर ले जाकर छोड़ते हैं, उससे कहीं अधिक कपड़े अपने आसपास के काम करने वाले लोगों के बीच, या गरीब लोगों के बीच सीधे ही बांट देते हैं, और हिंदुस्तान में हर कपड़ा एक से अधिक बार शायद इस्तेमाल हो भी जाता होगा। लेकिन पूरी दुनिया का तजुर्बा देखें तो वह कपड़ों को लेकर बहुत खराब है। दुनिया का कपड़ा-उद्योग धरती पर पानी की बर्बादी में से 20 फीसदी का हिस्सेदार है। कपड़ा-उद्योग खूब सारा प्रदूषण फैलाता है, पानी में बहुत सारे रसायन डालता है, और इतने कपड़े बनाता है जिसके कि कोई ग्राहक नहीं हैं। एक दक्षिण अमेरिकी देश चिली को पूरी दुनिया का कपड़ों का घूरा माना जा रहा है और अभी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वहां पर हर वर्ष 60 हजार टन से अधिक कपड़े ऐसे पहुंचते हैं जिन्हें कंपनियों ने बना लिया है, लेकिन जिनके ग्राहक नहीं मिले। इसके बाद चिली के लोग इन कपड़ों में से छांटकर कुछ तो खुद इस्तेमाल कर लेते हैं, और कुछ आसपास के देशों में बेचने के लिए मरम्मत करके तैयार कर लेते हैं। लेकिन वहां के एक रेगिस्तान में ऐसे कपड़ों का कबाड़ बढ़ते चल रहा है, और पर्यावरण वैज्ञानिकों का यह हिसाब है कि प्लास्टिक या दूसरे कई सामानों की तरह ऐसे कपड़े भी जल्द खत्म नहीं होते और ये कपड़े 200 बरस तक धरती पर बोझ बने रह सकते हैं। इनकी वजह से धरती में कई किस्म के रसायन मिलते हैं, और प्रदूषण फैलता है।
लोगों को यह भी मालूम है कि कपड़ों का कारोबार फैशन पर चलता है, और जरूरत तो बहुत थोड़ी सी रहती है लोग कपड़ों को फैशन की वजह से बदलते हैं। इश्तहारों से, और फिल्मी सितारों को तरह-तरह के कपड़े पहनाकर फैशन को जल्दी-जल्दी बदलाया जाता है, और कपड़ों के बाजार को बढ़ावा दिया जाता है। आज लोगों की जरूरत सीमित है लेकिन फैशन की चाहत असीमित है। ऐसी नौबत में एक बार फिर लोगों को अपने-अपने स्तर पर कपड़ों को बदल लेने और अधिक से अधिक खरीदने की अपनी चाह को काबू में करने की जरूरत है। और यह कोई नई बात नहीं है और माओ के वक्त चीन में गरीबी इतनी थी कि वहां एक ही किस्म के कोट और पैंट, औरत और मर्द सभी के लिए तय किए गए थे, जिनका एक ही रंग तय कर दिया गया था, और साइकिल पर जाते हुए मजदूर और कामगार एक फौज की तरह, एक ही किस्म के कपड़ों में दिखते थे। वह गरीबी का ऐसा दौर था कि वहां अगर फैशन का सिलसिला चलता तो लोगों पर भारी पड़ता, देश की अर्थव्यवस्था पर भरी पड़ता। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में गांधी ने किफायत की एक मिसाल भी सामने रखी थी और वे खुद सामानों की कम से कम खपत करते थे। इसके साथ-साथ उन्होंने लोगों को जिंदगी में सादगी बरतने का रास्ता भी दिखाया था, और खुद उस पर चलकर दिखाया भी था कि कामयाब और महान बनने के लिए सामानों की जरूरत नहीं रहती है।एक जोड़ी चप्पल, दो जोड़ी आधी लंबाई की धोती, एक कमर घड़ी, एक चश्मा, और शायद एक कलम। बस इतने ही सामानों से गांधी ने अपनी बाद की पूरी जिंदगी गुजार ली थी। लेकिन आज दुनिया का कारोबार धरती को तबाह करने की कीमत पर भी कपड़ों, जूते-चप्पलों, और फैशन के दूसरे सामानों को इस कदर बढ़ावा दे रहा है, लोगों को इस कदर उकसा रहा है कि लोग अपनी अलमारियां भरते चले जा रहे हैं, और सामानों की उनकी चाह कम ही नहीं हो रही है।
यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है। जो लोग इंटरनेट पर सर्च कर सकते हैं उन्हें कपड़ा उद्योग का पर्यावरण पर बुरा असर जैसे शब्द सर्च करने चाहिए, और उन्हें डराने वाली जानकारियां दिखने लगेंगी। लेकिन दिक्कत यह है कि पूरी दुनिया में जो बड़े-बड़े फिल्मी सितारे हैं, बड़े-बड़े कलाकार, मॉडल, और खिलाड़ी हैं, वे सारे के सारे कपड़ों के इश्तहारों में जूते-चप्पलों को बेचने में लगे रहते हैं। अभी दो दिन पहले हिंदुस्तान के लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में उसके प्रस्तुतकर्ता अमिताभ बच्चन का परिवार मौजूद था। और अमिताभ के घर के लोग अमिताभ के कपड़ों के रंग और फैशन को लेकर चर्चा कर रहे थे जो कि पिछले 1000 एपिसोड में कभी ना दोहराए गए कपड़ों की बात थी। एक शाम के लिए एक जोड़ी अलग किस्म के कपड़े पहन-पहन कर कपड़ों के फैशन को बढ़ावा देना, ऐसा काम बहुत से फिल्मी सितारे करते हैं। लेकिन लोगों को याद रखना चाहिए कि आज दुनिया भविष्य के जिन सितारों की तरफ देख रही है उनमें से एक स्वीडन की एक छात्रा, और पर्यावरण आंदोलनकारी ग्रेटा थनबर्ग ने बरसों से कोई नए कपड़े नहीं खरीदे हैं और जरूरत पडऩे पर वह अपने आसपास के दोस्तों से कपड़े लेकर पहन लेती है, और बहुत जरूरी होता है तो ही वह बाजार से कोई सेकंड हैंड कहे जाने वाला पुराना कपड़ा खरीदती है।
धरती को तबाह होने से अगर बचाना है तो लोगों को अपनी खर्च करने की ताकत का बेजा इस्तेमाल बंद करना होगा, और किफायत बरतनी होगी। आज बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि पर्यावरण को तबाह करने का काम सिर्फ कोयले और लोहे के कारखाने करते हैं, या कि जंगलों को काटने से ही पर्यावरण खत्म होता है। इस बात को लोग अपने से जोडक़र बिल्कुल नहीं देख पाते कि उनके अंधाधुंध कपड़े-जूते खरीदने से भी पर्यावरण खत्म हो रहा है क्योंकि एक जींस खरीदते हुए किसी को यह अंदाज नहीं होता कि उसे बनाने में 75 सौ लीटर पानी खर्च होता है। ऐसे आंकड़े न तो लोगों के सामने रखे जाते हैं, और न लोगों को खुद होकर ऐसा सूझता कि अपने इस्तेमाल किए जा रहे सामानों के पर्यावरण बोझ के बारे में कुछ सोचें क्योंकि ऐसा सोचने के बाद उन सामानों के इस्तेमाल का मजा भी घट जाएगा। लेकिन यह जरूरी है. अभी-अभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चिली के बारे में तस्वीरों सहित जो रिपोर्ट आई है, वह डरावनी है कि इस देश में हर वर्ष 60 हजार टन कपड़े पहुंच रहे हैं, जिसमें से कुल 20 हजार टन कपड़ों का इस्तेमाल हो रहा है, और बाकी की भीड़ वहां के रेगिस्तान पर अगले सैकड़ों बरस के लिए बोझ बनकर जुड़ती चली जा रही है।
पश्चिम के विकसित देश अपने पर्यावरण को बचाने के लिए अपनी सरहद के भीतर इस किस्म के कपड़े नहीं बनाते, उस पर पानी खर्च नहीं करते, और ऐसे अधिकतर कपड़े तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देशों में बंधुआ मजदूरों जैसी मजदूरी पर बनवाए जाते हैं, जिन पर वहां पर पानी खर्च होता है, जिनके रसायनों से वहां का पानी खराब होता है, और उस सस्ती मजदूरी से बने कपड़ों से अंतरराष्ट्रीय ब्रांड विकसित और सभ्य कही जाने वाली दुनिया में कारोबार करते हैं। इसलिए जब अगला कपड़ा खरीदें तो यह याद रखें कि आपका पुराना कपड़ा धरती पर बोझ बनने जा रहा है, और अगले सैकड़ों बरस के लिए यह बोझ रहने वाला है। यह अंदाज लगाना जरूरी है कि आज छोड़े गए कपड़े या जूते अगले 2 सौ बरस के लिए, यानी तकरीबन आठ-दस पीढिय़ों के लिए बोझ बनकर रहेंगे, पर्यावरण का नुकसान बनकर रहेंगे। इसलिए आज फैशन की चाह लोगों की अगली आठ-दस पीढिय़ों के भविष्य को नुकसान पहुंचाने वाली रहेगी। आज कुछ सामान खरीदते हुए महज यह सोचना जरूरी नहीं है कि उसे खरीद पाना आपके लिए मुमकिन है या नहीं, यह सोचना भी जरूरी है कि क्या आज सचमुच उसकी जरूरत है, और क्या उसका निपटारा अपने जीते-जी देख भी पाएंगे?
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अभी 2 दिन पहले बीबीसी ने एक मुद्दा उठाया कि उत्तर प्रदेश में गरीबी का ऐसा हाल है, लेकिन उसके बावजूद उत्तर प्रदेश के चुनाव में कई किस्म के दूसरे मुद्दे तो हावी हैं, गरीबी चर्चा में नहीं है। और बात सही भी है, देश के 3 सबसे गरीब राज्यों में से एक, उत्तर प्रदेश चुनाव में जा रहा है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भाजपा की सरकार लोगों को कई तरह के आर्थिक फायदे देने की घोषणा भी कर रही है, लेकिन लोगों के बीच जो चुनावी मुद्दे हावी हैं उनमें गरीबी या उत्तर प्रदेश की आर्थिक बदहाली का कोई जिक्र नहीं है। जिन्ना का जिक्र जरूर हो रहा है और अखिलेश यादव के नाम को भाजपा के दिग्गज नेता बिगाडक़र अखिलेश अली जिन्ना कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी को मुस्लिमपरस्त साबित करने की खूब कोशिश हो रही है और एक ऐसी चुनावी आशंका दिख रही है कि उत्तर प्रदेश के वोटरों के बीच धार्मिक आधार पर एक बड़ा धु्रवीकरण हो जाए। चुनाव में हैदराबाद के एक इलाके के नेता असदुद्दीन ओवैसी भी उत्तर प्रदेश पहुंचकर मुस्लिम वोटों के ऐसे धु्रवीकरण के काम में जुट गए हैं जो कि भाजपा के हाथ मजबूत करने वाला साबित हो। उनका जाहिर तौर पर यही मकसद भी रहता है। कांग्रेस वहां पर महिलाओं के धु्रवीकरण में लगी है और महिलाओं के लिए वह इतने किस्म के वायदे कर रही है जिनके आधे वायदे भी वह उन राज्यों में नहीं छू सकती जहां पर उसकी अपनी सरकार है। बहुत से लोगों का मानना है कि चूंकि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने का क्योंकि कोई भी माहौल नहीं है, इसलिए कांग्रेस वहां पर आसमान छूती हुई घोषणा और वायदे करने में लगी हुई है। हो सकता है यह बात सच भी हो, लेकिन कांग्रेस के राज वाले दूसरे राज्यों में यह तो भाजपा का या दूसरे विपक्षी दलों का जिम्मा बनता है कि वह वहां कांग्रेस से पूछें कि क्या 40 फीसदी टिकटें वहां भी महिलाओं को दी जाएंगी और बाकी किस्म के वायदे वहां की महिलाओं से भी किए जाएंगे?
लेकिन हम उत्तर प्रदेश की गरीबी पर लौटें, और उसकी चर्चा करें तो देश के बाकी राज्यों को भी देखने की जरूरत है जो उत्तरप्रदेश जितने गरीब चाहे ना हों, लेकिन जहां गरीब बड़ी संख्या में है। पूरे ही देश में अधिकतर राज्यों में गरीबी की रेखा के नीचे आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। ऐसे में हर चुनाव के पहले हर बड़ी पार्टी अलग-अलग प्रदेशों में गरीबों के लिए कई किस्म के वादे करती हैं, जिनमें कहीं मौजूदा मुख्यमंत्री, या मुख्यमंत्री बनने का महत्वाकांक्षी अपने को मामा बताकर प्रदेश की तमाम गरीब लड़कियों की शादी सरकारी खर्च पर करवाने की बात करता है, तो कहीं पर तमिलनाडु की तरह अम्मा इडली और अम्मा मेडिसिन सेंटर चलते हैं, तो कहीं पर महिलाओं को मंगलसूत्र चुनाव में ही बांट दिए जाते हैं क्योंकि सरकार शायद ऐसा नहीं कर सकती। हर पार्टी यह मानती है कि गरीबी बहुत है और गरीबों को चुनाव के पहले और चुनाव के बाद इस किस्म के झांसे देकर या इस किस्म की खैरात बांटकर उनके वोट पाए जा सकते हैं, लेकिन पार्टियां आर्थिक पिछड़ेपन को चुनावी मुद्दा बनाएं ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता। ऐसा लगता है कि गरीबी का मुद्दा अलग है और गरीबों को बांटी जाने वाली खैरात, या उन्हें दिए जाने वाले तोहफे एक अलग ही मुद्दा हैं, जिनका गरीबी को हटाने या खत्म करने से कुछ भी लेना देना नहीं है। गरीबों का आर्थिक विकास कोई मुद्दा ही नहीं है लेकिन गरीबों को खैरात देना जरूर मुद्दा है।
ऐसे माहौल में छत्तीसगढ़ ने जरूर पिछले चुनाव में एक अलग मिसाल पेश की थी जब गरीब किसानों से लेकर करोड़पति और अरबपति किसानों तक को, सभी को धान का बढ़ा हुआ दाम मिला था और किसानों की कर्ज माफी हुई थी, और ग्रामीण विकास के लिए सरकार ने गोबर खरीदना शुरू किया, और गांव-गांव में खाद बनाकर उसे सरकार को ही बेचना शुरू किया। इस किस्म के आर्थिक कार्यक्रम कम ही राज्यों में हुए, और छत्तीसगढ़ में 15 बरस तक सत्तारूढ़ रही भाजपा आज इस बात को लेकर परेशान हैं कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से बड़ा गौभक्त देश में कोई नहीं रह गया, उससे अधिक गौसेवा और कोई नहीं कर रहा, तो अगले चुनाव में भूपेश बघेल को हटाने के लिए भाजपा के परंपरागत हिंदू मुद्दे काम नहीं आने वाले हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा की एक फिक्र यह भी है कि उत्तरप्रदेश में तो राम मंदिर बन रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने राम की मां कौशल्या का बड़ा सा मंदिर बनवा दिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए वे छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े हिंदू साबित हो रहे हैं। अब उनके खिलाफ धार्मिक मुद्दा कुछ भी नहीं बचा। छत्तीसगढ़ में मुस्लिम या ईसाईयों का धु्रवीकरण इतना बड़ा मुद्दा नहीं हो सकता, तो यह राज्य कुछ चुनावी परेशानी में घिर गया है कि भाजपा यहां से भूपेश बघेल की सरकार को हटाए तो कैसे हटाए। लेकिन उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में भाजपा के सामने ऐसी कोई परेशानी नहीं है। वहां समाजवादी पार्टी की छवि हिंदू विरोधी बनी हुई है, वहां पर अखिलेश यादव को अपने पिता मुलायम सिंह यादव के समय से मुस्लिमपरस्त माना जाता है, वहां पर कांग्रेस की छवि हिंदू पार्टी से बिल्कुल अलग है और वहां पर बसपा अपना जनाधार चारों तरफ खोते दिख रही है। तो ऐसे में योगी आदित्यनाथ की भगवा सरकार हिंदुत्व को एक आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रही है और वहां पर प्रियंका गांधी को हर सांस में प्रियंका वाड्रा कहा जाता है ताकि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा की यादें ताजा बनी रहें। उत्तरप्रदेश में मंदिर का मुद्दा है, बनारस का मुद्दा है, घाटों का मुद्दा है, महाआरती का मुद्दा है, मथुरा और वृन्दावन की मस्जिदों का मुद्दा है, लेकिन वहां पर गरीबी कोई मुद्दा नहीं है।
दरअसल गरीब हिंदुस्तान में कोई तबका नहीं रह गया। गरीबों को तोहफे जरूर बांटे जाते हैं, कभी खैरात की शक्ल में तो कभी चुनावी वायदों की शक्ल में, लेकिन गरीब की कोई जाति नहीं है, गरीब का कोई धर्म भी नहीं है। और हिंदुस्तान की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों ने लोगों को धर्म और जाति के आधार पर वोट देना सिखा दिया है। नतीजा यह हुआ है कि लोग अपने आर्थिक स्तर को भूलकर अपनी धार्मिक और जातिगत पहचान को याद रखते हैं, उसी के आधार पर नेता चुनते हैं, उसी के आधार पर अपना तबका तय करते हैं, उसी के आधार पर जाति या धर्म की अपनी फौज तय करते हैं। हिंदुस्तान के तमाम नाकामयाब राजनीतिक दलों की यह एक बड़ी कामयाबी रही कि सरकारें उन्होंने चाहे जैसी चलाई हों, उन्होंने गरीब को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह सबसे पहले गरीब है। उसे सबसे पहले मुस्लिम, बताया हिंदू बताया, उसे दलित और आदिवासी बताया, उसे पिछड़े वर्ग का बताया, लेकिन उसे कभी आर्थिक आधार पर एक नहीं होने दिया क्योंकि हिंदुस्तान में आर्थिक आधार पर अगर सबसे गरीब लोग एक हो जाएं तो उस तबके की ही चुनी हुई एक सरकार देश और हर प्रदेश में बन सकती है। इससे बड़ा खतरा किसी पार्टी के लिए और किसी सरकार के लिए और कुछ नहीं हो सकता कि लोग अपने आर्थिक स्तर को लेकर जागरूक हो जाएं। ऐसा अगर हो जाए तो सरकारों के सामने यह चुनौती रहेगी कि वह आर्थिक विकास करके दिखाएं, वरना पिछड़े हुए लोग एक होकर उसे पलट देंगे। ऐसा लगता है कि देश की बड़ी-बड़ी तमाम पार्टियों की यही निजी और सामूहिक कामयाबी है कि उन्होंने लोगों के मन से गरीब की उनकी पहचान को छीन लिया और उन्हें उनके जाति और धर्म के आधार पर ही बैठे रहने का एक माहौल जुटाकर दे दिया। यह सिलसिला पता नहीं कैसे खत्म हो सकेगा क्योंकि आर्थिक आधार पर जन चेतना का विकास करके चुनावी राजनीति करने वाली वामपंथी पार्टियों के दिन तकरीबन तमाम जगहों पर लद गए दिख रहे हैं। हो सकता है कि लोगों के बीच जनचेतना की धार को बाकी पार्टियों ने इस हद तक खत्म कर दिया है, इस हद तक भोथरा कर दिया है कि उन्हें धर्म और जाति से ऊपर अपनी गरीबी का एहसास ही नहीं रह गया।
फिर एक और बात को अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। भारतीय आम चुनावों को या किसी प्रदेश के चुनाव को जब कभी जनमत कहा जाता है तो उसके साथ ही एक बात को नहीं भूलना चाहिए कि यह सबसे ताकतवर और सबसे संपन्न पार्टी का खरीदा हुआ जनमत भी रहता है। पूरा का पूरा जनमत तो खरीदा हुआ नहीं रहता लेकिन जिन लोगों ने चुनावों को जमीनी स्तर पर करीब से देखा है वे इस बात को जानते हैं कि मामूली जीत-हार वाली सीटों पर फैसला वोटों को खरीदकर बदला जा सकता है, बदला जाता है। लोगों को वोट बेचने में दिक्कत नहीं है, और तकरीबन तमाम पार्टियों को वोट खरीदने में भी कोई दिक्कत नहीं है। बेचने वालों की यह बेबसी है कि वे थोड़े से पैसों को भी अपना एक सहारा मान बैठते हैं, और उनके बीच इतनी समझ ही बाकी नहीं रहने दी गई है कि वे 5 साल की अपनी आर्थिक बेहतरी की भी फिक्र करें। इसलिए मतदान के 2-3 दिन पहले से लगने वाली बोली और होने वाले भुगतान के झांसे में भी बहुत से लोग आते हैं। इसलिए हिंदुस्तान के चुनाव देश के सबसे जलते-सुलगते मुद्दों से बहुत दूर, सांप्रदायिकता और जाति, चाल-चलन और व्यक्तित्व के झूठे और फर्जी आरोपों पर टिके हुए ऐसे चुनाव हो गए हैं कि जिनका जमीनी हकीकत से कुछ भी लेना-देना नहीं रह गया। अगर कोई पार्टी किसी चुनाव में जीत का आसमान छूने लगती है, तब तो यह माना जा सकता है कि उसे उसके काम के आधार पर भी वोट मिले हैं। लेकिन नतीजों के फासले जब मामूली रह जाते हैं, तब ये तमाम लोकतांत्रिक मुद्दे चुनावों को बहुत बुरी तरह प्रभावित करते हैं, और उस वक्त चुनाव परिणाम को जनमत कहना एक फिजूल की बात रह जाती है।
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पाकिस्तान में धर्मांध मुसलमानों ने श्रीलंका के एक नागरिक को पीट-पीटकर मार डाला, और उसके बाद उसे जलाते हुए उसके साथ सेल्फी भी खींची। उस पर यह आरोप लगाया गया था कि उसने खुदा का अपमान किया है। पाकिस्तान में ऐसे आरोपों को ईशनिंदा कहा जाता है और ईशनिंदा का कानून ऐसा कड़ा बनाया गया है कि कई अल्पसंख्यक लोगों को पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के आरोप में फांसी भी दी गई है, और कई लोगों को पीट-पीटकर मार डाला गया है। ऐसा कहा जाता है कि जब किसी अल्पसंख्यक के खिलाफ कोई साजिश रचनी हो तो उस पर ईशनिंदा की तोहमत जड़ दी जाती है, और फिर न तो उसके कानूनी रूप से बचने की कोई गुंजाइश रहती है और न ही गैर कानूनी हिंसा से। अभी श्रीलंका का यह नागरिक पाकिस्तान में एक जगह कारखाने में मैनेजर था और पुलिस के मुताबिक वहां फैक्ट्री की इमारत की मरम्मत चल रही थी इसके लिए वहां की दीवार से कुछ पोस्टर हटाए गए, जिनमें शायद ऐसे भी पोस्टर रहे होंगे जिन पर पैगंबर मोहम्मद का नाम लिखा था. इसी वजह से श्रीलंकाई मूल के इस फैक्ट्री मैनेजर को पीट-पीटकर मारा गया।
इस पर श्रीलंका के प्रधानमंत्री ने अपनी तकलीफ और अपना गुस्सा जाहिर किया है और उन्होंने इस बात के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की तारीफ की है कि उन्होंने कड़ी कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया है। श्रीलंका ने इस हिंसा पर कहा है कि अगर चरमपंथी ताकतें ऐसी ही आजादी से घूमेंगी तो यह किसी के साथ भी हो सकता है। उसने पाकिस्तान में काम कर रहे अपने नागरिकों की हिफाजत की उम्मीद जताई है और इस भयानक जुर्म के जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है। खुद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस हिंसा को एक बेहद शर्मनाक दिन बताया है. पाकिस्तान के लोग एक-दूसरे से यह भी पूछ रहे हैं कि हम लोग यह क्या हो गए हैं। सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के लोग ही अपने भीतर के ऐसे हिंसक और कट्टर लोगों पर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, और वहां के राष्ट्रपति ने लिखा है कि यह घटना बहुत ही दुखद और शर्मनाक है, यह किसी भी तरह से धार्मिक नहीं है, इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो मॉब लिंचिंग की जगह विचारात्मक न्याय का सिद्धांत स्थापित करता है। पाकिस्तान की मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी ने इस घटना को भयानक और निंदनीय बताया है और कहा है कि सरकार की कार्रवाई बहुत मजबूत और स्पष्ट होनी चाहिए। ऐसे सैकड़ों ट्वीट किए गए हैं और लोगों ने लिखा है कि हर पाकिस्तानी का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए
हाल के वर्षों में हिंदुस्तान ने भी इस किस्म की कई भीड़त्याएं देखी हैं. कोई ईश्वर का अपमान करने के नाम पर, कोई लव-जिहाद नाम का आरोप लगाकर, तो कोई गाय का अपमान करने के नाम पर। हिंदुस्तान में गाय की हत्या करने पर भी ऐसा कोई कानून नहीं है कि भीड़ किसी को घेरकर मार डाले। कुछ प्रदेशों में गाय काटने के खिलाफ कानून हैं, और कई प्रदेशों में यह कानूनी है। इसलिए किसी भी प्रदेश में गौमांस की तोहमत लगाकर जब लोगों पर हमला किया जाता है, उन्हें घेरकर मार डाला जाता है, तो ऐसी धर्मांध हिंसा कानून के राज को हिकारत से देखते हुए अपनी धार्मिक भावनाओं को कानून से ऊपर करार देती है. जबकि ऐसी धार्मिक भावना का दावा करने वाले लोगों के जो आदर्श विनायक दामोदर सावरकर थे, वे लगातार गौमांस खाने के हिमायती रहे, और गौहत्या का विरोध करने वाले लोगों को वे लगातार कोसते रहे। आज भी देश के कुछ हिस्सों में भाजपा के राज में गौमांस कानूनी है, और कई राज्यों में भाजपा की सरकार ने गौ मांस को गैरकानूनी करार दिया हुआ है। ऐसी हालत में देश में जगह-जगह हिंसक लोग गौमांस की तोहमत लगाकर अनचाहे लोगों को निशाना बनाते हैं, और सार्वजनिक रूप से घेरकर मारते हैं। लोगों को कुछ अरसा पहले राजस्थान के एक मुस्लिम की हत्या भी याद होगी जिसे एक हिंदू सांप्रदायिक ने सार्वजनिक रूप से मारा था, और जिंदा जला दिया था. बाद में उसकी गिरफ्तारी भी हुई और बाद में उसका संाप्रदायिक लोगों के बीच खूब जमकर गौरवगान हुआ।
पाकिस्तान में तो ईशनिंदा के नाम पर ऐसी हिंसा कोई नई बात नहीं है और बहुत से लोगों को इस तरह से सार्वजनिक रूप से वहां मारा गया है, लेकिन हिंदुस्तान एक अधिक हद तक कानूनी राज वाला देश है और यहां पर ऐसी भीड़त्या के खिलाफ कड़े कानून है। फिर भी इस देश की बहुत सी राजनीतिक ताकतें ऐसी हैं जो भीड़त्या करने वाले लोगों का जगह-जगह अभिनंदन करती हैं और बहुत सी सत्तारूढ़ राजनीतिक ताकतें ऐसे अभिनंदन पर चुप्पी बनाए रखती हैं। कुछ लोगों को यह कहना बुरा लग सकता है लेकिन पाकिस्तान में धर्मांधता और कट्टरता का यह हिंसक नजारा देखते हुए भी जिन लोगों को हिंदुस्तान में ऐसी हिंसा को रोकने की जरूरत नहीं लग रही है, उनके सिर पर नफरत सवार है, और उन्हें अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए एक अमन-चैन का माहौल छोडक़र जाने की कोई हसरत नहीं है। हिंदुस्तान ही नहीं किसी भी देश को यह सोचना चाहिए कि आज पाकिस्तान जिस हालत में पहुंच गया है उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ धर्मांधता और धार्मिक हिंसा का है। इसका जो असर पाकिस्तान पर हुआ है वैसा ही असर दुनिया में दूसरे देशों पर भी होना तय है। आज पाकिस्तान में बदअमनी बेकाबू है, लेकिन दूसरे देश भी कट्टरता को बढ़ावा देते हुए ऐसी हिंसा से अछूते नहीं रह सकते। हिंदुस्तान जैसे देश जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में ही धार्मिक हिंसा में बढ़ोतरी देखी है, उन्हें चौकन्ना होना चाहिए उन्हें कट्टरता के खतरों को समझना चाहिए।
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कोरोना के एक नए खतरे के बीच हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रदेशों में स्कूलें खुलती जा रही हैं। छत्तीसगढ़ में भी 1 दिसंबर से तमाम स्कूल-कॉलेज खोल दिए गए हैं और सडक़ों पर आते-जाते बच्चे खेलते हुए दौड़-भाग करते हुए दिखने लगे हैं। लेकिन इसके साथ साथ यह खबर भी आते जा रही है कि इस राज्य के कई जिलों में स्कूली बच्चे कोरोना पॉजिटिव मिल रहे हैं। देश के कुछ प्रदेशों में जहां अंतरराष्ट्रीय यात्रियों का आना-जाना होता है, वहां पर कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन के मरीज भी मिल रहे हैं। अभी वायरस के इस नए वेरिएंट को लेकर दुनिया के वैज्ञानिकों के पास भी जानकारी कम है कि यह कितना खतरनाक है और यह कितनी तेजी से फैलेगा। अलग-अलग जानकार लोग अलग-अलग बातें कर रहे हैं और यह एक नया खतरा सामने है। आज ही सुबह बीबीसी पर दक्षिण अफ्रीका की एक मेडिकल कॉलेज प्रोफेसर बता रही थी कि कोरोना शुरू होने के बाद से यह पहला मौका है जब घुटनों पर चलने वाले बच्चों से लेकर 20 बरस तक के लोगों की संख्या अस्पतालों में पहुंचने वालों में सबसे अधिक है। और बच्चों के लिए अस्पताल में कोरोना वार्ड में कहीं जगह नहीं रह गई है, और इस बार आने वाले लोगों की हालत अधिक गंभीर है, और ओमिक्रॉन के शिकार लोगों को गंभीर इलाज की जरूरत पड़ रही है।
हिंदुस्तान एक तरफ तो अब अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए आम जिंदगी की तरफ लौट रहा है, और दूसरी तरफ स्कूल-कॉलेज लंबे समय तक बंद रहने के बाद अब शुरू हो रहे हैं। लेकिन इन दोनों के सिर पर कोरोना वायरस मंडरा रहा है। यह एक अलग मजबूरी है कि जिंदगी को कोरोना के साथ चलना सीखना होगा क्योंकि बच्चों को भी कितने बरस स्कूलों से दूर रखा जाए? और कामगार मजदूर भी कब तक काम से बचें। इसलिए पिछले कुछ महीनों में कामकाज तो पूरी रफ्तार से शुरु हो चुका है, स्कूल-कॉलेज अब शुरू हो रहे हैं। लेकिन दुनिया का तजुर्बा यह है कि जब सावधानी के साथ जीना बहुत लंबा खिंचने लगता है, तो फिर धीरे-धीरे लोगों को सावधानी से थकान होने लगती है। जापान सहित दुनिया के कई देशों में यह देखने में मिला था कि कोरोना को लेकर साफ-सफाई और परहेज जब बहुत लंबा चलने लगा, तो लोगों को उसकी थकान होने लगी और लोग लापरवाह होने लगे। हिंदुस्तान के सामने आज ऐसा एक खतरा मौजूद है। यहां देश और प्रदेशों की सरकारों को सावधान रहना होगा कि लोगों के मन में यह बात न बैठ जाए कि वे कोरोना से जीत चुके हैं, और थाली-चम्मच बजाना काफी होगा। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि कोरोना वायरस तरह-तरह की शक्लें ले-लेकर आ रहा है और ऐसे नए खतरों के लिए हो सकता है कि हम बिल्कुल तैयार ना हों। आज ही एक खबर यह है कि भारत में कोरोना से रोकथाम के लिए केंद्र सरकार ने देश भर की प्रयोगशालाओं का जो नेटवर्क तैयार किया है, उसने सिफारिश की है कि 40 वर्ष से ऊपर के लोगों को कोरोना का बूस्टर डोज़ लगाया जाए और जो फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं उन्हें भी बूस्टर डोज दिया जाए। अब हिंदुस्तान में अठारह बरस से कम उम्र के लोगों को तो अब तक टीके लगना शुरू भी नहीं हुआ है, बूस्टर डोज की बारी कैसे आएगी?
आज केंद्र और राज्य सरकारों के पास कोरोना के मोर्चे पर तैयारी के लिए तरह-तरह के विशेषज्ञ हैं इसलिए हम मेडिकल जानकारी को लेकर अधिक बोलना नहीं चाहते लेकिन चूंकि स्कूल-कॉलेज कब तक खुले रहेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं दिख रही है, और मां-बाप आज भी दहशत से भरे हुए हैं कि वे बच्चों को स्कूल भेजें या ना भेजें। फिर यह भी समझ नहीं आ रहा है कि कोरोना वायरस वेरिएंट ओमिक्रॉन भारत पर कब तक कितना हमला कर सकता है, इसलिए स्कूल-कॉलेज को एक सावधानी यह बरतनी चाहिए कि वह ऐसे किसी संक्रमण के आने के पहले का अपना समय कुछ इस किस्म की तैयारी में लगाए कि अगर स्कूल-कॉलेज दोबारा बंद करने की नौबत आई तो वैसी हालत में बच्चे घर पर रहकर क्या-क्या पढ़ सकते हैं, किस तरह पढ़ सकते हैं। आज के माहौल में यह मानकर चलना कुछ गलत होगा कि स्कूल-कॉलेज अब लंबे समय तक बंद नहीं होंगे। उन पर एक खतरा तो कायम है ही। इसलिए स्कूल-कॉलेज को पढ़ाई के तरीकों में कुछ ऐसा बदलाव तुरंत लेकर आना चाहिए कि कुछ हफ्तों बाद अगर हफ्तों या महीनों के लिए अगर बच्चों का आना बंद हो जाए तो घर पर उनकी पढ़ाई ठीक से हो सके। अगर स्कूल-कॉलेज बंद नहीं होते हैं तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर ऐसी नौबत आती है तो उसके हिसाब से कोर्स को बांटकर और पढऩे-पढ़ाने की तकनीक को विकसित करके काम करना चाहिए। राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे अपने इलाज और जांच के ढांचे को एक बार फिर परख लें क्योंकि सरकारी इंतजाम खाली पड़े हुए बहुत तेजी से खराब भी हो जाते हैं। कुछ राज्यों से ऐसी खबर आ रही है कि वहां पर ऑक्सीजन बनाने के कारखानों का ट्रायल फिर से लिया जा रहा है, लेकिन देश के सभी राज्यों को ऐसी तैयारी करनी चाहिए कि अगर कोरोना की तीसरी तीसरी लहर या उसका कोई नया वेरिएंट आए, तो उसे कैसे निपटा जाए। अभी इस नए वायरस का दाखिला भर हिंदुस्तान में हुआ है, उसका हमला नहीं हुआ है, इसलिए यह समय एकदम सही है कि हर प्रदेश अपने-अपने घर को ठीक से संभाल ले, और हर स्कूल कॉलेज भी।
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भारतीय मूल के पराग अग्रवाल को अभी दुनिया की एक सबसे चर्चित और कामयाब कंपनी ट्विटर का मुखिया बनाया गया है. वे पिछले करीब 10 बरस से इस कंपनी में अलग-अलग हैसियत से काम कर रहे थे, और कंपनी के एक संस्थापक और मौजूदा मुखिया ने उनकी बहुत तारीफ करते हुए अपनी कुर्सी उनके हवाले की है। इसे लेकर हिंदुस्तान में खुशी की एक नई लहर दौड़ पड़ी है, और यह बात जायज भी है कि हिंदुस्तानी मूल का कोई व्यक्ति अगर दुनिया की किसी सबसे बड़ी कंपनी का मुखिया बने तो उससे हिंदुस्तानियों की शोहरत और इज्जत दोनों ही बढ़ती है। हिंदुस्तानियों ने इस खबर के बाद अधिक वक्त नहीं लगाया और मिनटों के भीतर ही इस पर तरह-तरह से खुशियां जाहिर करने लगे। कुछ लोगों ने ऐसे पोस्टर बनाए कि हिंदुस्तान की अग्रवाल स्वीट्स मिठाई दुकान के नाम के बोर्ड में अग्रवाल ट्वीट्स कर दिया गया।
खैर यह हंसी-मजाक तो चलता ही रहता है लेकिन हिंदुस्तान के लिए यह फख्र की एक बात तो है ही कि गूगल के मुखिया सुंदर पिचाई सहित कई बड़ी कंपनियों के मुखिया आज भारतवंशी हैं। इनमें से तमाम लोग भारत के आईआईटी या आईआईएम से पढक़र गए हुए लोग हैं, और जिन्होंने कुछ ही वक्त में अमेरिका में अपना कामयाब ट्रैक रिकॉर्ड कायम कर लिया। ऐसा लगता है कि आईआईटी, आईआईएम जैसे देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान नौजवानों को इतना तैयार करके निकालते हैं कि वे कहीं भी जाकर कामयाब हो सकते हैं। हिंदुस्तानियों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि ऐसे संस्थानों की बुनियाद देश में कब रखी गई थी। यह भी याद रखने की जरूरत है कि इन संस्थानों में नफरत और सांप्रदायिकता से परे, धर्मांधता और गंदी राजनीति से परे जो पढ़ाई होती है वही लोगों को अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक चुनौतियों के लिए तैयार करती है। देश के आम विश्वविद्यालयों में नौजवानों को जिस तरह से आज सांप्रदायिक गंदगी में झोंक दिया जा रहा है, उससे यह बात बहुत साफ है कि देश के 99 फीसदी कॉलेज और विश्वविद्यालय छात्र-छात्राओं को कभी ऐसी ऊंचाइयां देखने नहीं मिलेगी, क्योंकि उन्हें भीड़ बनाकर धर्मांध और कट्टर भीड़ की शक्ल में दूसरे मोर्चों पर झोंक दिया जा रहा है। इसलिए यह तो याद रखना ही चाहिए कि आईआईटी और आईआईएम की शुरुआत हिंदुस्तान में किसने की थी, यह भी याद रखना चाहिए कि आज देश का माहौल किस तरह पूरी पीढ़ी को खत्म किए दे रहा है।
अब अगर यह सोचें कि हिंदुस्तान के बाहर जाकर ये नौजवान दुनिया की इतनी बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुखिया बनाए जा रहे हैं, जहां पर न तो कोई पारिवारिक विरासत काम आती है, और न ही इन नौजवानों की कोई पारिवारिक विरासत अपने खुद के जन्म के देश में भी थी। यह सारे लोग बिना किसी बुनियाद के अमेरिका गए और अपनी काबिलियत को आसमान तक पहुंचा दिया। क्या इससे यह सोचने की जरूरत खड़ी नहीं होती कि ये नौजवान या इनकी तरह के और नौजवान जो कि हिंदुस्तान में ही रह गए हैं, वे इतने कामयाब क्यों नहीं हो पाते? क्योंकि ये पढक़र तो एक साथ निकले हैं और हिंदुस्तान में भी आज बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं, फिर फर्क कहां पर रह जाता है? क्यों दुनिया की अधिकतर बड़ी कंपनियां अमेरिका या दूसरे कुछ देशों में पहली पीढ़ी के कारोबारियों द्वारा खड़ी की गई हैं? हिंदुस्तान में तो दो-दो, तीन-तीन पीढ़ी पहले से जो कारोबार चले आ रहे हैं उनमें भी लोग आज अधिक कामयाब नहीं हो पाते हैं। तो कामयाबी की फसल जिस जमीन पर यहां खड़ी होती है, क्या उस जमीन के मिट्टी पानी में ही कोई दिक्कत है? क्या हिंदुस्तान में कारोबार करने के माहौल में कोई कमी है? क्या भारत में सरकार के नियम-कायदों में, राजनीतिक दखल में, और काम करने के सामाजिक वातावरण में कोई फर्क है?
ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जिसके बारे में हिंदुस्तानियों को पहले सोचना चाहिए, और उसके बाद यह सोचना चाहिए कि अमेरिकी कंपनियों में मुखिया बनने वाले हिंदुस्तानियों पर गर्व किया जाए, या हिंदुस्तान के माहौल पर शर्म की जाए कि क्यों यहां पर वह कामयाबी पाना मुमकिन नहीं हो पाता? आज अमेरिका में न सिर्फ कारोबार के नियम अलग हैं बल्कि किसी कारोबारी के लिए यह बड़ी आसान बात है कि वे अपनी राजनीतिक विचारधारा में वहां के राष्ट्रपति के खिलाफ जितना बोलना चाहे बोलें, उनका कोई नुकसान सरकार नहीं कर सकती। तो क्या विचारधारा की ऐसी आजादी लोगों के व्यक्तित्व विकास में भी मदद करती है? आज हिंदुस्तान में जब जगह-जगह खानपान को लेकर, पहनावे को लेकर लोगों के बीच हिंसा भडक़ा दी जाती है, लोगों को भीड़ में घेरकर मारा जाता है, तो क्या उससे काम करने वाले नौजवानों का हौसला पस्त नहीं होता? क्या उनकी कल्पनाशीलता खत्म नहीं होती? जहां बोलने और लिखने की आजादी खत्म हो जाती है, जहां पर विचारों को लेकर भारी असहिष्णुता हिंसक होती रहती है, वहां पर काम करना भी लोगों की पसंद नहीं रहती। इसलिए अमेरिका में आजादी के साथ लोग काम करना भी चाहते हैं और अपने बच्चों के लिए आने वाली एक बेहतर दुनिया छोडक़र जाना चाहते हैं।
शायद ऐसी भी कोई वजह होगी कि अधिक होनहार और अधिक काबिल लोग हिंदुस्तान में रहना नहीं चाहते। अभी पार्लियामेंट में एक जानकारी पेश की गई है कि पिछले तीन-चार बरसों में 6 लाख से अधिक लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी है। यह जानकारी सीमित है इससे हम यह अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि मौजूदा मोदी सरकार के पहले कितने लोगों ने नागरिकता छोड़ी थी? आज पहले के मुकाबले कम लोग नागरिकता छोड़ रहे हैं, या अधिक लोग छोड़ रहे हैं? इस बात का भी पता लगाना चाहिए। इतना तो है कि लोग हिंदुस्तानी नागरिकता छोड़ रहे हैं, ये लाखों लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या वे हिंदुस्तानी सरकारी नियमों से परे चले जाना चाहते हैं? लेकिन कुल मिलाकर एक भारतवंशी के ट्विटर का मुखिया बनने के मौके पर खुशी मनाते हिंदुस्तानियों को अभी समझने की जरूरत है कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते हुए इसी ट्विटर ने उनका अकाउंट बैन कर दिया था, और राष्ट्रपति कुछ भी नहीं कर पाया था, कंपनी का कुछ भी नहीं बिगड़ा था। भारत की कोई कंपनी भारत में इस तरह की कोई कल्पना भी कर सकती है? शायद सोचने और करने की अमेरिकी आजादी है को कि वहां की कंपनियों को भी दुनिया में सबसे बड़ा बनाती है, और वहां काम कर रहे भारतवंशी या दुनिया के दूसरे देशों के लोग भी आसमान तक पहुंचते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि नेहरू के वक्त के बने हुए आईआईटी और आईआईएम की वजह से एक काबिल पढ़ाई करके निकले हुए नौजवान जब अमेरिका के खुले कारोबारी माहौल में इतने कामयाब होते हैं, तो फिर गर्व करने का हक किन-किनको मिलना चाहिए? लोग हिंदुस्तान की आज की हालत को देखें, अमेरिका में विचारों और काम की आजादी को देखें, और उसके बाद यह तय करें कि उन्हें किस बात पर गर्व करना है और किस बात पर शर्म करनी है।
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दुनिया में नास्तिकों और तर्कवादियों की जरूरत हमेशा ही बनी रहती है। अभी हिंदुस्तान का एक सबसे लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ चल रहा है और अमिताभ बच्चन के पेश किये इस कार्यक्रम को करोड़ों लोग देखते हैं। उसमें आने वाले किसी एपिसोड का एक प्रोमो दिखाया गया जिसमें अमिताभ बच्चन के सामने खड़ी एक लडक़ी की आंखों पर पट्टी बंधी होती है, और वह लडक़ी दावा करती है कि वह किताब को सूंघकर ही उसे पूरा पढ़ सकती है। इसे देखते ही फेडरेशन ऑफ इंडियन रेशनललिस्ट एसोसिएशन ने तुरंत ही एक खुला खत लिखकर इस कार्यक्रम से इसका विरोध किया और कहा कि आमतौर पर मिड ब्रेन एक्टिवेशन का नाम लेकर बच्चों के मां-बाप को बेवकूफ बनाने का काम कारोबारी करते हैं, इसलिए ऐसे अंधविश्वास या धोखाधड़ी को इस कार्यक्रम में बढ़ावा देना गलत होगा। इस विरोध पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के चैनल ने एक बयान भी जारी किया कि उसने इस खास एपिसोड के कुछ सीन हटा दिए हैं, और भविष्य में इस तरह की चीजों का ख्याल भी रखेगा।
कल ही सोशल मीडिया पर एक दूसरी कंपनी का एक इश्तिहार लोगों ने पोस्ट किया था जिसमें छोटे-छोटे बच्चों के लिए पब्लिक स्पीकिंग का कोर्स चलाने वाली कंपनी का दावा था, और माइक लिए हुए बच्चे की तस्वीर थी कि सार्वजनिक जीवन में भाषण देने या मंच और माइक संचालन करने जैसी बातों की ट्रेनिंग छोटे बच्चों को कैसे दी जा सकती है। जिस मिड ब्रेन एक्टिवेशन के बारे में रेशनलिस्ट फेडरेशन ने विरोध दर्ज कराया है, वह एक और बड़े अंधविश्वास की तरह लोगों के बीच में फैलाया जाता है कि इससे बच्चों की पढऩे की रफ्तार बढ़ जाती है उनके याद रखने की क्षमता बढ़ जाती है। ऐसे कारोबारी मोटी फीस के एवज में बच्चों को आँखों पर पट्टी बांधकर पढ़वाने का दवा भी करते हैं। लेकिन पहले जब कभी तर्कवादियों ने ऐसे कारोबारियों को इसके सार्वजनिक प्रदर्शन की चुनौती दी, ये कारोबारी भाग लिए।
इसी वजह से हम इन दो बातों को लेकर, मिलाकर एक साथ देख रहे हैं कि बच्चों को क्या याद रखने का एक कंप्यूटर बना दिया जाए, या कि पढऩे का एक स्कैनर बना दिया जाए, या कि बचपन से ही उन्हें मंच संचालन सिखा दिया जाए? क्या-क्या किया जाए ? छोटे-छोटे बच्चों को आखिर इस उम्र में ही किन बातों के लिए तैयार किया जाए? मां-बाप तो आईआईटी, आईआईएम जैसे दाखिलों के कई-कई बरस पहले से बच्चों की कोचिंग शुरु करवा देते हैं, और उनकी पढ़ाई तो किनारे धरी रह जाती है। मां-बाप उन्हें पूरी तरह से कोचिंग सेंटर की मशीन में झोंक देते हैं। जो स्कूली पढ़ाई बच्चों के लिए जरूरी होना चाहिए उसे खींच-तानकर पास होने लायक कर दिया जाता है, और बच्चों को सिर्फ अगले दाखिले के इम्तिहान के लिए तैयार किया जाता है। पढ़ाई के अलावा भी कई किस्म की दूसरी बातों के इश्तहार फिल्मी सितारे कर रहे हैं और मां-बाप अपने बच्चों को कुछ खास और कुछ अधिक देने के चक्कर में उन्हें तरह-तरह के कोर्स में झोंक दे रहे हैं। हिंदुस्तानी संपन्न मां-बाप इस बात को नहीं समझ पाते कि दुनिया में सबसे आगे बढऩे वाले बच्चे बस्ते के या तरह-तरह के कोर्स के बोझ के साथ आगे नहीं बढ़ते, वे उनकी कल्पना को खुला आसमान मिलने की वजह से आगे बढ़ते हैं, उन्हें मौलिक सोच का मौका मिलता है तो वे आगे बढ़ते हैं।
आज जिस तरह इस देश में बच्चों के लिए इश्तहारों के रास्ते पढ़ाई के तरह-तरह के औजार बेचे जा रहे हैं, जिस तरह उनकी पढऩे की ताकत और स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए मिड ब्रेन एक्टिवेशन जैसी एक कल्पना को अंधविश्वास की तरह बढ़ाया और बेचा जा रहा है, उस बारे में हिंदुस्तानी मां-बाप को सावधान करने की जरूरत है। हिंदुस्तान के रेशनलिस्ट लोगों के संघ ने जिस तरह से अमिताभ बच्चन के कार्यक्रम में अंधविश्वास बढ़ाने का विरोध किया, वैसी पहल जगह-जगह उठानी पड़ेगी तब जाकर मां-बाप की आंखें खुलेंगी। आज कोई हिंदुस्तानी मां-बाप अपने बच्चों को उनकी अपनी कल्पना के मुताबिक आगे बढऩे देना नहीं चाहते, मां-बाप खुद तय करते हैं कि उन्हें अपने बच्चों को डॉक्टर बनाना है या इंजीनियर, या एमबीए करने भेजना है। ऐसे मां-बाप अपनी हसरत को अपने बच्चों की हकीकत पर थोप देते हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए और लोगों को अपने आसपास के ऐसे अति उत्साही और अति महत्वाकांक्षी मां-बाप को समझ देने की कोशिश करनी चाहिए।
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कांग्रेस के चर्चित लोकसभा सदस्य शशि थरूर ने कल दोपहर संसद भवन से अपनी एक तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट की जिसमें वे छह अलग-अलग महिला सांसदों के साथ दिख रहे हैं। ये सभी इस तस्वीर में खुश दिख रही हैं, और शशि थरूर ने इस तस्वीर को लेकर भाजपा के लोगों द्वारा किए हमले के बाद अपनी पोस्ट में यह बात जोड़ी है कि ऐसी सेल्फी लेने की पहल महिला सांसदों की ओर से की गई थी, और यह अच्छे मजाक के रूप में ली गई फोटो थी, और उन्होंने मुझसे यह फोटो पोस्ट करने के लिए भी कहा था, अब यह देखकर दुख होता है कि कुछ लोग इस तस्वीर से आहत हैं। लेकिन मुझे काम की अपनी जगह पर अपनी साथी सांसदों के साथ ली गई इस तस्वीर से खुशी है। दरअसल शशि थरूर ने फेसबुक पर इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए लिखा था कि कौन कहते हैं कि लोकसभा काम करने के लिए आकर्षक जगह नहीं है। उनकी लिखी हुई इसी बात को लेकर भाजपा के लोग उन पर तमाम किस्म के हमले कर रहे हैं और प्रियंका गांधी से जवाब मांग रहे हैं कि उनका सांसद संसद को एक आकर्षक जगह कह रहा है। महिलाओं के सम्मान में कही बातों की समझ भी भाजपा के ये नेता शायद खो चुके हैं।
भारत की आज की राजनीति इस कदर घटिया हो चुकी है कि अपनी साथी सांसदों के साथ ली गई एक ऐसी मासूम तस्वीर, जिसे जाहिर तौर पर एक गैर कांग्रेसी महिला सांसद ही ले रही है, उसे लेकर एक बवाल खड़ा करना यह न सिर्फ शशि थरूर के लिए अपमानजनक है बल्कि जितनी महिला सांसद इस तस्वीर में दिख रही हैं, ऐसा विवाद उनका भी बड़ा अपमान है। अगर महिला सांसदों के लिए शशि थरूर ने संसद को काम करने की एक आकर्षक जगह लिखा है, तो ना तो उन्होंने कोई ओछी बात लिखी है, न ही किसी का अपमान किया है। अभी दो-चार ही दिन हुए हैं कि किसी एक राज्य में एक मंत्री ने सडक़ों की चिकनाई को लेकर ऐसा बयान दिया है कि उन्हें कैटरीना कैफ के गानों की तरह चिकना बनाया जाए। लोगों को यह भी याद होगा कि लालू यादव ने एक समय बिहार की सडक़ों को हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकना बनाने की बात की थी। लंबे समय तक भाजपा और एनडीए के साथ काम कर चुके शरद यादव ने संसद के भीतर ही शहरी महिलाओं के लिए परकटी जैसे शब्द इस्तेमाल किए थे। और जहां तक शशि थरूर का सवाल है तो उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी आमसभा में 100 करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसे शब्द कहे थे। शशि थरूर ने महिला सांसदों के अलावा दूसरे सांसदों के साथ भी खींची गई इसी तरह की ग्रुप फोटो पोस्ट की है और लिखा है कि इन तस्वीरों को कोई वायरल नहीं करेगा।
अब सोशल मीडिया पर जगह-जगह ऐसी तस्वीरें दिखती हैं कि किसी कार्यक्रम में या किसी स्टेडियम में लड़कियां और महिलाएं जाकर शशि थरूर के साथ अपनी सेल्फी लेती हैं और पोस्ट करती हैं। हो सकता है बहुत से लोगों को उनकी निजी जिंदगी के कुछ विवादों के बावजूद उनका व्यक्तित्व आकर्षक लगता हो, उनकी किताबें पठनीय लगती हों, संसद या और उसके बाहर उनके भाषण अच्छे लगते हों, या फिर अक्सर चर्चा में रहने वाली उनकी अंग्रेजी आकर्षक लगती हो। राह चलते और सार्वजनिक जगहों पर अगर लड़कियां और महिलाएं शशि थरूर के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवाने में गर्व महसूस करती हैं तो उनमें कोई बात तो ऐसी होगी। ऐसे में प्रियंका गांधी का नाम ले लेकर जिस तरह से मध्य प्रदेश के दिग्गज भाजपा मंत्रियों ने शशि थरूर को लेकर सवाल पूछे हैं, वह बहुत ही ओछी बात है। ऐसे विवाद खड़े करने वाले नेताओं को यह भी याद रखना चाहिए कि वह महिला सांसदों की सहमति मर्जी और पहल से खींची गई ऐसी तस्वीर को लेकर जब बखेड़ा खड़ा करते हैं, तो वे उन तमाम महिलाओं का भी अपमान करते हैं, और यह भी बताते हैं कि सभ्य समाज के तौर-तरीके बखेड़ेबाज लोगों को छू नहीं गए हैं। यह वही मध्यप्रदेश तो है जहां से आज शशि थरूर के खिलाफ ये बयान जारी किए जा रहे हैं और जहां पर भाजपा सरकार के पिछले एक मंत्री रहे हुए राघवजी को अपने ही नौकर के साथ जबरिया बलात्कार या सेक्स के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। ऐसे और भी कई सेक्स स्कैंडल मध्य प्रदेश में हुए थे, लेकिन हम शशि थरूर और महिला सांसदों की इस इस तस्वीर के संदर्भ में किसी सेक्स स्कैंडल को याद करना नहीं चाहते, हम भाजपा के नेताओं की बयानबाजी को लेकर इसे याद कर रहे हैं. राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इतना नीचे नहीं गिरना चाहिए कि जिन लोगों से वैचारिक असहमति हो उन पर हमला करते हुए देश की संसद की आधा दर्जन महिला सांसदों का भी इस तरह अपमान किया जाए।
भारत के राजनेताओं को लेकर समय-समय पर जितने किस्म के विवाद सामने आए हैं उनकी लिस्ट अगर बनाई जाए तो भाजपा कहीं भी कांग्रेस के पीछे नहीं रहेगी। इसलिए किसी एक दिन की सुर्खियां कब्जाने के लिए इस तरह की बकवास बहुत ही घटिया बात है, और सार्वजनिक जीवन के लोगों को, गैरराजनीतिक भी, ऐसी बकवास के खिलाफ खुलकर बयान देना चाहिए। शशि थरूर एक अच्छे लेखक हैं एक अच्छे वक्ता हैं उनका लंबा अंतरराष्ट्रीय तजुर्बा है वह संयुक्त राष्ट्र संघ में लंबा काम कर चुके हैं और सार्वजनिक जीवन में उन्हें घटिया बोलने के लिए नहीं जाना जाता। वह दरियादिली के साथ सभी पार्टियों के नेताओं को जन्मदिन या दूसरे मौकों पर बधाई देने से नहीं चूकते फिर चाहे इसे लेकर राजनीति के लोग उनकी आलोचना ही क्यों न करें। भाजपा के जिन नेताओं ने इस तस्वीर को लेकर शशि थरूर के खिलाफ उनके चरित्र की तरफ इशारा करते हुए घटिया बातें कही हैं उन्होंने राजनीति में गिरावट का एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। शशि थरूर के साथ इस तस्वीर में अलग-अलग पार्टियों की महिला सांसद हैं और सांसदों का सम्मान करना अगर भाजपा के नेता नहीं सीख पाए तो उन्हें कम से कम महिला का सम्मान तो करना चाहिए क्योंकि वे भारत माता के गुणगान करते हुए थकते नहीं हैं। कांग्रेस के एक सांसद से अपने विरोध का चुकारा करने के लिए ऐसा घटिया काम भाजपा के नेताओं को नहीं करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
जो लोग हिंदुस्तान में नेताओं को देख-देखकर थक गए हैं उन लोगों के लिए एक अलग किस्म की खबर है. जब अपने यहां इतना अच्छा कुछ न होता हो तो कम से कम दूसरी किसी जगह की किसी बात को देखकर खुश हो जाना चाहिए। न्यूजीलैंड की एक सांसद जूली एन जेंटर ने अभी फेसबुक पर अपनी खुद की, 27 नवम्बर की, एक दिलचस्प कहानी लिखी है। उन्होंने लिखा है कि आज सुबह 3:00 बजे हमारे परिवार में एक नए सदस्य का आना हुआ। रात 2:00 बजे मुझे दर्द उठने लगा था तो मैं साइकिल से ही अस्पताल गई, और 10 मिनट में वहां पहुंच गई, और जल्द ही एक बिटिया को जन्म दिया। इस सांसद ने अपने फेसबुक पेज पर सबसे पहली लाइन यही लिखी है कि वह ग्रीन सांसद है और अपनी साइकिल से मोहब्बत करती है। आज ही की एक दूसरी खबर सोशल मीडिया पर ही जर्मनी की भूतपूर्व चांसलर एंजेला मर्केल को लेकर है जो एक फ्लैट में पूरे कार्यकाल तक रहती थीं, और अभी भी वहीं रह रही हैं. खुद बाजार जाकर अपना सामान खरीदती थीं, और जब एक फोटोग्राफर ने उनसे कहा कि 10 बरस पहले भी उसने इन्हीं कपड़ों में उनकी फोटो खींची थी, तो उन्होंने कहा कि मैं जनसेवक हूं, कोई मॉडल नहीं हूं जिसे बार-बार कपड़े बदलने पड़ते हैं। यूरोप के बहुत से देशों में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति, या मंत्री और सांसद, साइकिलों पर दिखते हैं, बड़े-बड़े प्रोफेसर, नोबेल पुरस्कार विजेता भी साइकिल चलाते दिखते हैं। भारत के ही बगल में भूटान के एक से अधिक प्रधानमंत्री, भूतपूर्व प्रधानमंत्री साइकिल चलाते दिखते हैं। लेकिन हिंदुस्तान ऐसा है कि जहां किसी छोटे से राज्य का कोई बहुत छोटा सा मंत्री भी निकले तो पांच-दस गाडिय़ों का काफिला साथ चलता है। हिंदुस्तान में सत्ता की मेहरबानी से जो शान-शौकत चलती है, वह हिंसक किस्म की हो गई है क्योंकि वह देश की गरीबी की रेखा के नीचे की एक बड़ी आबादी के हक के पैसों को लूटकर उसका बेजा इस्तेमाल करके की गई शान-शौकत रहती है। सरकारी खर्च पर चलने वाले छत्तीसगढ़ के एक बंगले में पिछली भाजपा सरकार के वक्त लोगों ने 58 एसी गिने थे, पता नहीं उसके बाद के वर्षों में उनकी गिनती और बढ़ी थी या नहीं। लेकिन जनता के पैसों पर जब नेता फिजूलखर्ची करते हैं, तो उर्दू की एक लाइन याद आती है, माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम।
दुनिया के जिन देशों में न्यूजीलैंड की इस महिला सांसद की तरह सादगी से जीने वाले लोग रहते हैं, उन्हें देखकर लगता है कि सभ्यता को दिखावे की शान-शौकत की कोई जरूरत नहीं रहती, और लोग ताकत के बावजूद सचमुच ही सादगी से रह सकते हैं, आम जनता की तरह रह सकते हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्र प्रमुखों में से एक जर्मनी की चांसलर लंबे समय तक रहने वाली एंजेला मर्केल जिस सादगी से पूरी जिंदगी रहीं और आज भी रह रही हैं, वह एक मिसाल है कि देश का ताकतवर और संपन्न होना, खुद नेता का बहुत ताकतवर होना, उसका स्थाई होना, और उसकी निरंतरता होना, इनमें से किसी भी बात को लेकर दिखावे की शान-शौकत की जरूरत नहीं रहती। और हम यह भी नहीं कहते कि हिंदुस्तान में ऐसे लोग बिल्कुल भी नहीं है। लाल बहादुर शास्त्री की जिंदगी इसी किस्म की सादगी की थी, आज भी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिंदगी ऐसी ही सादगी की है। त्रिपुरा के मार्क्सवादी मुख्यमंत्री रहे माणिक सरकार इसी किस्म की सादगी वाले रहे, और कम्युनिस्टों में ऐसे बहुत नेता हुए जिन्होंने अपने पूरे परिवार को भी सादगी से रखा। लेकिन हिंदुस्तान में आज जिस तरह सरकारी खर्च पर सत्तारूढ़ नेता, और विपक्ष के भी दर्जा प्राप्त नेता, जिस शान-शौकत का मजा लेते हैं वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, गांधीवाद के खिलाफ है, और गरीब जनता के साथ बेइंसाफी भी है।
अब अगर दुनिया के एक संपन्न देश न्यूजीलैंड की एक महिला सांसद अपने बच्चे को जन्म देने के लिए अस्पताल जाते हुए जन्म के घंटे भर पहले भी साइकिल चला कर जा रही है, तो यह बात एक आईने की तरह दुनिया भर के देशों के उन नेताओं को दिखाने लायक है जो कि बड़े-बड़े काफि़लों में चलते हैं, बड़े ऐशो-आराम से जीते हैं और जिनका पूरा बोझ उनकी जनता उठाती है। हिंदुस्तान को देखें तो लगता है कि गांधी को राष्ट्रपिता बनाकर चबूतरे पर बैठाया, या खड़ी की गई मूर्ति के भीतर गांधी को कैद करके उससे छुटकारा पा लिया गया है। किसी धातु की या पत्थर सीमेंट की मूर्ति में गांधी की आत्मा को कैद कर दिया और उसके बाद उसकी किफायत का भी मानो पिंडदान कर दिया क्या हिंदुस्तान में सत्ता को सादगी सिखाने का कोई काम हो सकता है? बीते दशकों में कई ऐसे सत्तारूढ़ नेता आए और गए जो एक-एक दिन में आधा दर्जन अलग-अलग कपड़ों में सार्वजनिक जगहों पर दिखते हैं। क्या ऐसे नेताओं को जर्मनी की एंजेला मर्केल से कुछ सीखना चाहिए?
जिस दिन हिंदुस्तान पर सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ था और शिवराज पाटिल केंद्रीय गृह मंत्री की हैसियत से दिल्ली से मुंबई गए थे, उस दिन सार्वजनिक जगहों पर उनकी खींची गई तस्वीरों को जब साथ रखकर देखा गया था तो यह साफ-साफ दिखा कि उन्होंने आधा दर्जन से अधिक बार अपने कपड़े बदले थे और ये कपड़े हमले में किसी खून के दाग लग जाने पर बदले गए हों ऐसा भी नहीं था, ये कपड़े अलग-अलग सार्वजनिक कार्यक्रमों में अलग-अलग पहने गए थे। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अनगिनत रंगों के, अनगिनत किस्मों के कपडे पहनने के लिए जाने जाते हैं. उनका एक सूट तो बहुत ख़बरों में रहा किसकी धारियों में उनका नाम गूंथकर वह कपड़ा ही अलग से बनाया था, और कहा गया था कि वह दस लाख रुपियों का कपडा था। यह किस किस्म का दिखावा है, और किस कीमत पर दिखावा है? क्या यह गरीबी की रेखा के नीचे की देश की एक बहुत बड़ी आबादी की खिल्ली उड़ाने तरीका नहीं है? जब हिंदुस्तान के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय के मामले में दर्जनों गुना आगे चलने वाले देशों के सांसद, प्रधानमंत्री, और राष्ट्रपति सादगी के साथ साइकिलों पर चलते हैं तो हिंदुस्तान में राशन की मदद पाने वाली जनता के हक छीनकर नेता अंधाधुंध खर्च करते हैं। हिंदुस्तान के लोगों को अपने नेताओं के ऐसे मिजाज के बारे में जरूर सोचना चाहिए। हिंदुस्तानी वोटरों को भी चाहिए कि न्यूजीलैण्ड की इस सांसद की सादगी की कहानी अपने नेताओं को भेजें।
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उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक दलित परिवार के चार लोगों की कुल्हाड़ी से मारकर हत्या कर दी गई। इसके अलावा ऐसी आशंका है कि उस परिवार की एक नाबालिग बच्ची के साथ गैंगरेप भी किया गया है, क्योंकि उसकी लाश उसी तरह से मिली है। इस परिवार ने कुछ दबंग ठाकुर लोगों पर पहले से आशंका जताते हुए पुलिस रिपोर्ट लिखाई थी, लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है, पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की थी, और यह दबंग लोग इस परिवार से पहले भी मारपीट कर चुके थे, जान से मारने की धमकी दे चुके थे। अब पुलिस तमाम किस्म की कार्रवाई करने का वायदा कर रही है। मरने वालों के करीबी संबंधियों का कहना है कि पुलिस हमलावरों से समझौता करने के लिए दबाव डाल रही थी, और पुलिस ने ही हौसला बढ़वाकर ये कत्ल करवाए हैं। दो दिन पहले जब यह खबर आई तो उसी दिन राजस्थान से एक दूसरी खबर आई कि वहां पर एक दलित दूल्हे की बारात पुलिस की हिफाजत में घोड़ी पर निकल रही थी और उसे घोड़ी पर चढ़ा हुआ देखकर, जाहिर तौर पर, सवर्णों की तरफ से पथराव किया गया। दूल्हा पुलिस के घेरे में था फिर भी उस पर पथराव हुआ।
इन दो मामलों के अलावा भी कोई ऐसा दिन नहीं होता है जब उत्तर भारत और काऊ बेल्ट कहे जाने वाले हिंदी भाषी प्रदेशों से दलित प्रताडऩा की कई-कई खबरें न आएं। रोजाना ही इस किस्म के जुल्म होते हैं जो हजारों बरस पहले की जाति व्यवस्था से उपजे हुए एक हिंसक अहंकार का नतीजा होते हैं, और जो आज भी दलितों के सिर उठते देखना नहीं चाहते। लोगों को याद होगा कि एक वक्त दक्षिण भारत में दलित महिलाओं को अपने सीने ढंकने के लिए एक टैक्स देना पड़ता था, जो टैक्स नहीं दे पाती थीं उन्हें अपने सीने खुले रखने पड़ते थे। और यह व्यवस्था उसे दक्षिण भारत में थी जहां पर ब्राह्मणवादी व्यवस्था बड़ी मजबूत थी। भारत का आज का केरल एक वक्त इस हिंसक प्रथा का गवाह था और वहां पर एक दलित महिला ने इस टैक्स के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए हंसिये से अपने स्तन काट दिए थे। वहां के एक कलाकार मुरली ने उस इतिहास को दर्ज करते हुए पेंटिंग्स बनाई हैं। नीच कहीं जाने वाली जातियों की महिलाओं को अपना सीना ढंकने की इजाजत नहीं थी, और अगर वे ऐसा करना चाहती थीं तो उन्हें एक बड़ा टैक्स देना पड़ता था। यानी ऊंची समझिए जाने वाली जातियों के मर्दों ने दलित महिलाओं के स्तनों को देखने को अपना हक़ बना रखा था।
हिंदुस्तान में आज बहुत से लोगों को लगता है कि जातिगत आरक्षण की कोई जरूरत नहीं है और इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए क्योंकि जातियों की व्यवस्था को खत्म हुए जमाना हो चुका है। लेकिन हालत यह है कि जातियों की व्यवस्था आज इस मजबूती से कायम है कि राजस्थान जैसे कांग्रेस के राज वाले प्रदेश में भी एक दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढऩे के लिए पुलिस के घेरे में भी पथराव झेलना पड़ता है, यही हाल उत्तर प्रदेश के योगीराज में एक दलित परिवार का है जहां पर कि दबंग ठाकुर लोग इस दलित परिवार को सबक सिखाने के लिए उसकी नाबालिग बच्ची को मारने के पहले उससे सामूहिक बलात्कार करते हैं, और घर के सारे लोगों को एक साथ काट कर फेंक देते हैं। बहुत से प्रदेशों में बहुत सी पार्टियों के सरकारों में दलितों का इसी किस्म का हाल है और शायद यही वजह है कि पंजाब में जब कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने के बाद कांग्रेस ने एक दलित को मुख्यमंत्री बनाया तो उसे एक बड़ा हौसले वाला कदम बताया गया और यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब तक कांग्रेस के विरोधियों के लिए इसका जवाब देना मुश्किल पड़ेगा। अब राजनीति में किसी दलित के मुख्यमंत्री बनने से फर्क पड़ेगा या नहीं पड़ेगा यह तो नहीं मालूम, लेकिन कांग्रेस का राज हो या भाजपा का, दलितों का हाल मोटे तौर पर इन कुछ प्रदेशों में ऐसा ही बुरा चले आ रहा है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे कई राज्य हैं जहां दलितों को आज भी मानो मनु के राज में जीना पड़ रहा है। वहां मानो उनके कान में वेद का कोई वाक्य पड़ जाए तो अब भी उन कानों में पिघला हुआ सीसा भर दिया जाएगा।
भारत में पता नहीं अपराध के शिकार लोगों की जाति का कोई विश्लेषण हुआ है या नहीं, लेकिन बलात्कार और हिंसा के शिकार लोगों की जातियों का कोई विश्लेषण अगर किया जाए तो उसमें दलितों की बारी सबसे पहले और सबसे ऊपर आते हुए दिखेगी जो कि बलात्कार के लिए सवर्णों की पहली पसंद रहते हैं। यह बात भी बड़ी अजीब सी है कि जो दलितों छूने के के लायक भी नहीं रहते हैं, जिनकी छाया से भी सवर्ण अशुद्ध हो जाते हैं, उन दलित महिलाओं के बदन का एक तंग हिस्सा सवर्णों को छुआछूत नहीं लगता है और वहां पहुंचकर सवर्णों के बदन का एक हिस्सा अचानक समाजवादी बराबरी का हिमायती हो जाता है। यह सिलसिला आंकड़ों की शक्ल में निकाला जाकर एक विश्लेषण के बाद लोगों के सामने आना चाहिए कि दलितों पर जुल्म कितने तरह के हो रहे हैं, किन राज्यों में अधिक हो रहे हैं, किन पार्टियों के राज में यह अधिक होते हैं, किन जातियों द्वारा यह जुल्म अधिक किए जाते हैं, और यह भी कि क्या मुख्यमंत्री की जाति का इस पर कोई फर्क पड़ता है? यह वही उत्तर प्रदेश है जहां पर बात-बात पर आरती होने लगती है और हिंदू धर्म के भीतर की ब्राह्मणवादी व्यवस्था के मुताबिक पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में पूरी की पूरी सरकार झोंक दी जाती है। इस बात के फर्क को भी समझने की जरूरत है कि क्या हिंदुत्व का ऐसा चेहरा जो कि इस तथाकथित हिंदू तबके के भीतर भी जाति के एक हिस्से की मर्जी से लदा हुआ चलता है, और क्या यह हिस्सा दलितों पर जुल्मों के लिए अधिक जिम्मेदार है? जाति व्यवस्था का कौन सा हिस्सा दलितों को बलात्कार और पत्थरों के मरने लायक मानता है, इसका एक सामाजिक विश्लेषण सामने आना चाहिए जिसमें जातियों की खुलकर चर्चा होनी चाहिए क्योंकि जातियां हिंदुस्तान में न तो इतिहास हैं, न कल्पना हैं, वे एक कड़वी हकीकत हैं जिनका कि लंबे वक्त तक कायम रहना भी तय है। यह सिलसिला इस सदी के अंत तक भी थमते नहीं दिखता है क्योंकि अभी तक तो यह बढ़ते ही दिख रहा है। जब देश का सुप्रीम कोर्ट भी दलित और आदिवासी मामलों में दर्ज होने वाली रिपोर्ट पर कार्रवाई को लेकर एक वक्त दलित विरोधी रुख दिखा चुका है, और उसके बाद मजबूरी में उसे अपना फैसला वापस लेना पड़ा था, तो ऐसी तमाम चीजों से देश के हालात को समझना जरूरी है। जो लोग ऐसा समझते हैं कि हिंदुस्तान में जातिगत आरक्षण खत्म होना चाहिए उन्हें दलितों पर होने वाले ऐसे जुल्म की खबरों को ध्यान से पढऩा चाहिए, और अपनी सोच को दोबारा तय करना चाहिए।
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कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से एक बड़ी खूनी खबर आई है, जितनी भयानक खबर सुनने और मानने को दिल नहीं करता है। लेकिन हकीकत किसी अपराध कथा से भी अधिक डरावनी होती है, और अपराध कथा तो किसी न किसी हकीकत से उपजी होती है, उसमें कल्पना कम होती है, हकीकत ज्यादा होती है। कर्नाटक में एक कंपनी में काम करने वाला एक सुरक्षा मैनेजर पिछले 2 साल से अपनी 17 साल की बेटी से बलात्कार करते आ रहा था। अब जांच पड़ताल में पुलिस ने पता लगाया है कि लडक़ी की मां को यह मालूम था कि बाप अपनी बेटी का यौन शोषण कर रहा है। उसने अपने पति से बात भी की थी, लेकिन कोशिश बेकार गई, और मामला संबंधों को तनावपूर्ण बना गया। यह पूरा मामला इस तरह सामने आया कि इस लडक़ी ने थककर स्कूल में अपनी क्लास के एक दोस्त से इस जुल्म के बारे में बताया और फिर उस सहपाठी ने क्लास के तीन और दोस्तों से इसकी चर्चा की, और इन चारों ने मिलकर अपनी सहपाठी को इस तकलीफ से आजादी दिलाना तय किया। वे चारों रात उस लडक़ी के घर पहुंचे, दरवाजा खुलवाया और उसके बाप को कुल्हाड़ी से काटकर चले गए। जब लहूलुहान लाश मिली और आसपास के कैमरों से इन लडक़ों के घर आने और निकलने के सुबूत मिले, तो पुलिस ने इन सबको पकड़ा और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश करने के बाद उन्हें रिमांड होम भेज दिया गया है।
इस मामले के अलग-अलग के कई पहलू हैं. पहली बात तो यह कि अपनी सहपाठी एक लडक़ी के लिए सहपाठी लडक़ों के मन में इतनी हमदर्दी पैदा होना और फिर उसका इतना हिंसक भी हो जाना कि कत्ल करने की सजा के बारे में कुछ न कुछ अंदाज रहते हुए भी इस तरह का जुर्म करना। यह तो एक पहलू हुआ, दूसरा एक पहलू यह है कि दो बेटियों वाली एक माँ का अपनी एक बेटी से उसके बाप द्वारा लगातार बलात्कार देखते हुए भी पर्याप्त विरोध नहीं करना, उसे छोडक़र नहीं निकलना। पुलिस की दी हुई जानकारी बताती है कि यह मां कपड़ा बनाने वाली एक मजदूर है, और दोनों बेटियां पढ़ रही हैं। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि बलात्कारी पति के खिलाफ इस महिला ने कुछ और कड़ा कदम क्यों नहीं उठाया? अपनी बच्चियों को बचाने के लिए वह घर छोडक़र निकल क्यों नहीं गई? इस बारे में जज बनकर नतीजा निकालना तो बड़ा आसान है लेकिन उस महिला की जगह रहकर देखें तो पति को खोने के साथ-साथ उसे दोनों बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई बंद हो जाने और तीनों की भारी सामाजिक बदनामी का खतरा भी दिखा होगा जो कि झेलने में आसान नहीं है। उसने यह भी देखा होगा कि किस तरह देश भर में जगह-जगह बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला से पुलिस वाले और बलात्कार करने लगते हैं, और रिश्वत वसूलने लगते हैं, किस तरह उन्हें अदालतों में सामाजिक और मानसिक प्रताडऩा झेलनी पड़ती है। जाने ऐसी कितनी ही बातें उस महिला के दिमाग में रही होंगी जो वह खुद अपने पति को न मार पाई न अपनी बच्चियों के साथ उसे छोडक़र निकल पाई।
एक महिला के लिए ऐसा कोई भी फैसला आसान नहीं होता है और एक कम कमाने वाली महिला की बहुत ही सीमित ताकत के साथ ऐसा कोई कड़ा फैसला लेना भी मुमकिन नहीं होता। इसलिए उस महिला ने क्या-क्या नहीं किया ऐसा सोचने के बजाए हम यह सोचना बेहतर समझेंगे कि उस महिला के लिए क्या-क्या कर पाना मुमकिन नहीं हुआ। आज भी कानून की बनाई हुई सारी व्यवस्था के बावजूद कानूनी मदद के लिए हौसला दिखाने वाली महिला का जितने किस्म का शोषण और बढ़ जाता है, वह अच्छी-खासी हिम्मती महिला का हौसला भी तोडऩे लायक रहता है। एक महिला किस वजह से अपने साथ हुए बलात्कार की रिपोर्ट तुरंत नहीं लिखा पाती है, किस तरह वह अपने यौन शोषण का तुरंत विरोध नहीं कर पाती है, इस बारे में सोचने के लिए एक महिला की नजर से देखना जरूरी होता है। एक आदमी की नजर से देखकर तो यही लग सकता है कि एक बड़ी पत्रिका के चर्चित संपादक से जब उसकी मातहत कर्मचारी को यौन शोषण की शिकायत थी, तो वह उसके मातहत कई घंटे और काम क्यों करती रही, और तुरंत पुलिस तक क्यों नहीं पहुंची। एक महिला का नजरिया, उसकी बेबसी और मजबूरी, और उसकी आशंकाएं समझ पाना आसान नहीं होता है। इसलिए हम कर्नाटक के इस मामले में बिना अधिक जानकारी के इस नतीजे पर कूदना नहीं चाहते कि बलात्कार देखती इस महिला को अपने पति के खिलाफ रिपोर्ट लिखाकर अपनी बच्ची को बचाना था, या पति को छोडक़र घर से निकल जाना था। जिंदगी में लोगों को कई किस्म के समझौते करने पड़ते हैं और इन समझौतों को करते हुए किन्हीं कड़े पैमानों पर खरा उतर पाना बड़ा आसान नहीं रहता है।
कुल मिलाकर बात यह बनती है कि हिंदुस्तान में कानून की व्यवस्था और समाज की व्यवस्था इतनी मजबूत नहीं है कि कोई 17 बरस की लडक़ी आसानी से अपने पिता के खिलाफ शिकायत का हौसला जुटा सके। व्यवस्था ऐसी भी नहीं है कि एक महिला शिकायत करने के बाद जिंदा रहने का कोई इंतजाम पा सके। इसलिए समाज के लोगों को और सरकार को यह सोचना चाहिए कि जुल्म के ऐसे लंबे दौर के बाद, दो बरस तक चलने वाले बलात्कार के बाद भी अगर पुलिस तक जाने का हौसला नहीं जुट पा रहा है तो इस हौसले का इंतजाम कैसे किया जाए? महज कानून से यह इंतजाम नहीं हो सकता क्योंकि कानून के इस्तेमाल के लिए एक जमीन लगती है, एक समाज लगता है, अगर यह जमीन ही कानून के इस्तेमाल को हिकारत की नजर से देखे, और समाज ऐसे कानून के इस्तेमाल पर सजा देने लगे, तो जाहिर है कि लोग ऐसे कानून का कोई इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। आज भी हमारा अंदाज यह है कि समाज के लोग अपवाद के रूप में ही शिकायत का हौसला जुटा पाते हैं, अधिकतर लोग तो बिना हौसले के ही जुल्म झेलते रह जाते हैं।
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वैसे तो किसी सालाना दिन पर उस दिन के हिसाब से लिखना बड़ा बोरियत का काम होता है, लेकिन फिर भी आज संविधान दिवस है और हिंदुस्तान में रहते हुए कानून को लेकर मन में भड़ास कितनी भरी हुई रहती है कि संविधान दिवस पर कुछ लिखने को दिल कर रहा है। 26 नवंबर के इस दिन को भारत में राष्ट्रीय कानून दिवस भी कहा जाता है और 1949 में आज ही के दिन भारत की संविधान सभा ने देश के संविधान को मंजूरी दी थी ,जो कि 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ था। मोटे तौर संविधान का जलसा 26 जनवरी को मनाया जाता है लेकिन आज के दिन का एक अलग महत्व है जब संविधान सभा का काम पूरा हुआ था और संविधान के मसौदे को मंजूरी दी गई थी। इन ऐतिहासिक तथ्यों से परे यह सोचने और समझने की जरूरत है कि यह संविधान भारत के किस काम आया है?
संविधान को लागू करने की जिम्मेदारी भारत की तीनों संवैधानिक संस्थाओं पर बराबरी की है, कार्यपालिका यानी सरकार, न्यायपालिका यानी अदालत, और विधायिका यानी संसद। लेकिन हाल के बरसों में इन तीनों का जो बदहाल रहा है, वह मन को बैठा देता है। खासकर सरकार और संसद ने हम लोगों को जिस हद तक निराश किया है, और यह निराशा पिछले कई वर्षों से लगातार जारी है। इन दोनों से परे सुप्रीम कोर्ट में कभी किसी अच्छे चीफ जस्टिस के आ जाने पर बाकी जजों का मिजाज भी बदला हुआ दिखता है और ऐसा लगता है कि संविधान को लेकर जो बुनियादी जिम्मेदारी अदालत पर है, उसे पूरे उसे पूरा करने की नीयत अदालत की दिख रही है। लेकिन जब इन तीनों संस्थाओं के आपस के रिश्तों को देखें तो अनगिनत मामलों में यह लगता है कि सरकार और संसद ये दोनों संविधान के खिलाफ किस हद तक काम कर रही हैं कि बीच-बीच में अदालत को दखल देकर इन दोनों के इंजन और डिब्बे पटरी पर लाने पड़ते हैं। संसद के काम में दखल देने की अदालत की अपनी एक सीमा है, लेकिन संसद के बनाए हुए कानूनों की व्याख्या करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में है, इसलिए जब कभी संसद अलोकतांत्रिक कानून बनाती है, या बेईमानी के कानून बनाती है, तब अदालत को दखल देकर उसकी मरम्मत करनी पड़ती है। यह एक अलग बात है फिर संसद में अगर किसी सरकार की ताकत जरूरत से अधिक हो, तो वह शाहबानो जैसे फैसले को पलटकर सुप्रीम कोर्ट से कह सकती है कि तुम्हारी औकात हमारे मुकाबले कुछ नहीं है। फिर भी इन सबके बीच यह देखने की जरूरत है कि ये तीनों संस्थाएं संविधान को लेकर क्या कर रही हैं?
इन तीनों में जो सबसे कम गुनाहगार दिख रही है उस अदालत की बात करें तो वह भी 100 फीसदी पाक साफ नहीं है, और बहुत से जज भ्रष्ट जाने जाते हैं, बहुत से जज सरकार को खुश करके रिटायरमेंट के बाद अपने पुनर्वास के लिए फैसले देते हुए दिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तमाम ताकतें रहने के बावजूद कभी यह नहीं सोचा कि देश के सबसे कमजोर लोग इंसाफ पाने के लिए देश की सबसे छोटी अदालतों की सीढिय़ों तक भी नहीं पहुंच पाते, और वैसे में वे किसी ताकतवर के खिलाफ लड़ रहे हों, या कि किसी सरकार के खिलाफ, उनकी जीत की कोई गुंजाइश नहीं रहती। तो ऐसा संविधान किस काम का जो एक दस्तावेज की शक्ल में एक ऐसा ढकोसला हो जो कि ताकतवरों के पैर दबाता है, उनके सिर पर चंपी मालिश करता है, और जो सबसे कमजोर तबका है उसके पेट की भूख को भी अनदेखा करता है, ऐसा संविधान किस काम का? अदालत की बात करते हुए यह याद रखने की जरूरत है अभी हाल के बरसों के एक सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश ने जिस तरह से, जिस बेशर्मी से अपने खुद पर लगे यौन शोषण के आरोपों की सुनवाई खुद करना तय किया था, वह संविधान की किसी भी किस्म की भावना के सख्त खिलाफ था, उसके शब्दों के भी खिलाफ था। लेकिन कई वजहें ऐसी थीं कि वह मुख्य न्यायाधीश सत्तारूढ़ पार्टी के संसद के बाहुबल से भी बचे रहा, और सुप्रीम कोर्ट के जजों के भीतर भी उसे लेकर कोई बगावत नहीं हुई। जब सरकार मेहरबान तो किसी महाभियोग का तो सवाल ही नहीं उठता। यह मुख्य न्यायाधीश अपने चर्चित फैसलों के बाद सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से राज्यसभा सांसद बन गया !
लेकिन सुप्रीम कोर्ट से परे अगर सरकार को देखें तो पिछले कुछ दशकों में सरकारों के फैसले लगातार उन चोरों की तरह रहे जो कि रात को पुलिस गश्त से बचते हुए तंग गलियों से निकलकर अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। सरकारों ने संविधान के खिलाफ, अपनी शपथ के खिलाफ, और देश के हितों के खिलाफ, जनता के खिलाफ लगातार फैसले लिए, और उन्हें ऐसी शक्ल दी कि अदालत से उन्हें पलटा जाना आसान न हो। जब संसद में बहुमत जरूरत से अधिक बड़ा होता है तो बददिमागी भी उसी अनुपात में बड़ी हो जाती है। इसलिए आज संविधान दिवस पर यह याद करना जरूरी है कि देश की पिछली सरकारों ने संविधान की भावना के खिलाफ और जनहित के खिलाफ कौन-कौन से फैसले लिए, उन्हें अध्यादेश और कानून का दर्जा दिया, अदालतों को अपने काबू में रखा, और जनता के संवैधानिक अधिकारों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कुचलने का काम किया।
अब अगर संसद की बात करें तो संसद ने अपने-आपको दल-बदल कानून के दायरे में लाकर अपने हाथ-पैर इस तरह काट दिए हैं कि किसी पार्टी के गलत फैसलों को भी उस पार्टी के कोई ईमानदार सांसद कोई चुनौती नहीं दे सकते। संसद के भीतर जब किसी वोट की नौबत आती है तो हर पार्टी के सांसद को अपनी पार्टी के हर सही-गलत फैसले के पक्ष में वोट देना होता है, वरना उसकी सदस्यता खत्म हो सकती है. मतलब यह कि जिस संसद को होनहार और प्रतिभावान, अनुभवी और जन कल्याणकारी सांसदों का फायदा मिलना था, वह संसद अब सांसदों की पार्टियों की गिरोहबंदी की जगह रह गई है, और निजी प्रतिभा का कोई फायदा उसे मिलना बंद हो गया है। संसद में तो दरअसल विचार-विमर्श और बहस होना भी बंद हो गया है और अब वह गंदी तोहमतों की एक जगह रह गई है जहां पर बहुमत के नाम पर एक ध्वनिमत को लादकर लोकतंत्र का गला घोंट दिया जाता है। यह संसद संविधान की भावना के तो बिल्कुल ही खिलाफ हो चुकी है, और लोगों की आम समझ-बूझ भी बताती है कि यह संसद अब अरबपतियों और करोड़पतियों का एक क्लब बन चुकी है, जिसमें दाखिल हो पाना देश के किसी गरीब और मध्यमवर्गीय के लिए नामुमकिन सा हो गया है। वामपंथी दलों के कुछ गिने-चुने गरीब सांसद वहां जरूर हैं लेकिन न उनकी कोई ताकत वहां पर रह गई है, और न उनकी बातों को सुनकर भी उन्हें सुनना जरूरी रह गया है। संसद को जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी जगह बना देना संविधान की सोच में तो नहीं रखा गया था।
सरकार भ्रष्ट, बाहुबली संसद बददिमाग, और सुप्रीम कोर्ट हांकने वाले लोग अपने-अपने पुनर्वास के लिए फिक्रमंद, देश में संविधान दिवस पर संविधान को बनाने वाली, और संविधान को लागू करने वाली संस्थाओं का यह हाल बड़ा निराश करने वाला है। यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों से लदा हुआ है जो कि सरकार के असंवैधानिक फैसलों के खिलाफ जनता या जन संगठनों द्वारा दायर किए गए हैं। आज कुल मिलाकर संविधान की फिक्र जनता और जन संगठनों को दिख रही है जिनकी अलग से कोई ताकत नहीं है, और जिन्हें चुनाव में भी जब यह विकल्प मिलता है कि उन्हें बुरे और बहुत बुरे में से किसी एक को चुनना है, जब उन्हें भ्रष्ट पार्टी और सांप्रदायिक पार्टी में से किसी एक को चुनना है, तो उनका सरकार चुनने का संवैधानिक अधिकार भी भला किस काम का रह गया है। दरअसल भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में संविधान ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसके पन्नों को फाडक़र लोग पखाना पोंछने का काम करते रहें, और वह फिर भी असरदार बना रहे। यह पूरी संसदीय व्यवस्था एक ऐसे संविधान के ढांचे से ली गई है जहां पर संविधान का सम्मान करना एक परंपरा की बात रही है, एक गौरव की बात रही है। इस संविधान को छड़ी लेकर लागू करवाना मुमकिन नहीं है, यह संविधान को अपनी जिम्मेदारी मानकर खुद लागू करना तो मुमकिन है। लेकिन हिंदुस्तान की हालत बहुत खराब है और ऐसा संविधान दिवस याद दिलाता है इस देश में यह संविधान किसी काम का नहीं रह गया है, या कि यह देश किसी काम का नहीं रह गया है। यह संविधान बाहुबलियों की लाठी बन चुका है, यह संविधान संसद में बाहुबल का गुलाम हो चुका है, और यह संविधान अक्सर ही सुप्रीम कोर्ट के जजों के रिटायर होने के बाद की महत्वाकांक्षा का शिकार हो चला है। इस दिन पर संविधान के साथ, और उससे कहीं अधिक इस देश की आम जनता के साथ हमारी हमदर्दी है, जिसके किसी काम का यह संविधान नहीं रह गया है।
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