संपादकीय
हिन्दुस्तान में हर बरस पौने दो करोड़ लोग ऐसी बीमारियों से मरते हैं जो कि कमजोर खानपान और कम वजन से जुड़ी हुई हैं। देश की एक सबसे बड़ी पर्यावरण-संस्था, सेन्टर फॉर साईंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने साल की भारत की पर्यावरण-रिपोर्ट में यह बात कही है। यह रिपोर्ट बताती है कि किस तरह ये बीमारियां कमजोर खानपान से जुड़ी हुई हैं, लेकिन साथ-साथ ये बीमारियां अधिक मांस खाने, अधिक कोल्डड्रिंक पीने की वजह से भी हो रही हैं। मतलब यह कि खानपान से जुड़ी मौतें या तो कम खाने की वजह से हो रही हैं, या अधिक खाने की वजह से हो रही हैं। देश में असमानता का यह भी एक नुकसान है कि कुछ के पास खाने को इतना कम है कि वे कुपोषण के शिकार हैं, उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है, दूसरी तरफ कुछ लोग खा-खाकर भी अघा नहीं रहे हैं, और डायबिटीज और कैंसर, सांस की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।
अब इस तस्वीर को इस रिपोर्ट से अलग हटकर भारतीय जिंदगी के अपने तजुर्बे से देखें तो यह साफ लगता है कि हिन्दुस्तान में खानपान को लेकर एक तबके के सामने मजबूरी है, और दूसरे तबके की लापरवाही है। अगर केन्द्र और राज्य सरकारों की राशन योजनाएं न रहें, तो भूख से मौत अभी कुछ दशक पहले की ही बात है, और कुपोषण से मौतें तो आज भी हिन्दुस्तान में दसियों लाख हर साल होती ही हैं। जो लोग सरकारी योजनाओं पर जिंदगी गुजार रहे हैं, उनके बारे में तो कोई अधिक सलाह नहीं दी जा सकती क्योंकि वह सलाह तो सरकार के लिए ही हो सकती है, और वह किसी सलाह से परे है। लेकिन दूसरी तरफ आम लोगों के खानपान में, खाते-पीते और पैसे वाले तबके के खानपान में सुधार की बहुत जरूरत भी है, और बहुत गुंजाइश भी है। हिन्दुस्तान में अगर दसियों लाख लोग हर बरस अधिक खाने से मर रहे हैं, और हर बरस करोड़ों लोग गलत और अधिक खाने से डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं, तो इस नौबत को सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता की जरूरत है। यह जिंदगी का एक इतना बड़ा सच है कि इसे सिर्फ अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
जैसे-जैसे बाजार लोगों की जिंदगी पर हावी होते जा रहा है, वह लोगों की जीवन शैली को अपने हिसाब से ढाल भी रहा है। जिन परिवारों में खर्च उठाने की ताकत है वहां पर सुबह का नाश्ता कारखानों से आए हुए डिब्बा बंद चीजों का होता है, और उन्हें दूध के साथ मिलाकर ऐसा मान लिया जाता है कि यह परिवार के लिए बहुत सेहतमंद खाना है। दूध में मिलाने के कई किस्म के पावडर मां-बाप को यह झांसा देते हैं कि बच्चों को इसे दूध में देने से उनका दिमाग तेज होगा, उनका कद तेजी से बढ़ेगा, वे अधिक मजबूत होंगे। इसी तरह एक-एक करके बहुत सा खानपान अब कारखानों से डिब्बा या पैकेट में बंद होकर बाजार के रास्ते लोगों तक पहुंचता है, और उनके बदन में अंधाधुंध शक्कर, नमक, तेल भर देता है। नतीजा मोटापा होता है, और मोटापे के बाद, या बिना मोटापे के भी डायबिटीज होता है। इसलिए बचपन से ही इस जागरूकता की जरूरत है कि अधिक से अधिक खानपान घर पर बनी हुई चीजों का होना चाहिए, और बाजार का खाना कभी भी घर के खाने से बेहतर नहीं होता। लोगों को अपने बच्चों को कारखाने में बना खाना या कोई भी सामान कम से कम देना चाहिए। अब यह जागरूकता उन बच्चों में तो नहीं आ सकती जिन्हें बाजार के सामान अधिक जायकेदार लगें, इसका इंतजाम कंपनियां करती हैं। यह जागरूकता तो मां-बाप में ही आ सकती है, लेकिन बच्चों को बचपन से ही घर के सेहतमंद खाने का महत्व समझाया जा सकता है ताकि उनके दिमाग में घर के खाने के लिए सम्मान बैठा रहे।
आज हिन्दुस्तान की शहरी जिंदगी में एक बड़ी दिक्कत खाने की घर पहुंच सेवा भी हो गई है। टेलीफोन पर एक संदेश गया, और आधे घंटे के भीतर डिब्बाबंद खाना घर पहुंच गया। ऐसा सारा ही खाना अधिक तेल-नमक का होता है, और इनमें नमक से परे कुछ और रसायन भी डाले जाते हैं ताकि उनसे खाने का स्वाद बढ़े। इन सबका नुकसान बहुत है, लेकिन जो लोग इस खर्च को उठा सकते हैं, उनके लिए घर पर खाना बनाने के बजाय आए दिन बाहर से खाना बुला लेना आम बात है। शहरी और संपन्न जिंदगी के साथ बढ़ती चल रही इस सोच के खतरे लोगों को समझाने की जरूरत है। संपन्नता लोगों के दिमाग को इतना मंद भी कर देती है कि वे सोचने लगते हैं कि ऐसे खानपान से उन्हें जो भी बीमारी होगी उसके इलाज के लिए बड़े-बड़े अस्पताल मौजूद हैं, और उनका खर्च उठाने की उनकी ताकत है। यह लापरवाही आत्मघाती है, और धीमी रफ्तार से खुदकुशी सरीखी है। ऐसा तबका कई तरह के संगठनों से भी जुड़ा रहता है, और वहां पर भी ऐसी जागरूकता की कोशिश हो सकती है। दरअसल खानपान का बाजार पैकेट के सामानों से लेकर रेस्त्रां तक, लोगों को लुभाने का काम करता है, और लोगों को अपनी संपन्नता के इस्तेमाल का यह एक जरिया भी दिखता है कि परिवार को लेकर बाहर जाएं, और खा-पीकर मस्ती करें। ऐसी जिंदगी लोगों को रफ्तार से खतरे की तरफ धकेल रही है, और हिन्दुस्तान जैसे देश में इलाज की सहूलियतों पर ऐसे संपन्न तबके का अनुपातहीन बोझ भी पड़ता है, जिसका नतीजा यह होता है कि गरीबों को जरूरत के वक्त अस्पताल नसीब नहीं होते।
कुल मिलाकर सीएसई की इस रिपोर्ट के बाद ऐसा लगता है कि गरीब तबके में भी इस जागरूकता की जरूरत है कि वह अपनी सीमित कमाई को शराब और गुटखा जैसी चीजों पर बर्बाद न करे, और अपने बच्चों के, परिवार के खानपान को बेहतर बनाने की कोशिश करे। गर्भवती महिला से लेकर कमउम्र के बच्चों तक कमजोर खानपान का ऐसा बुरा असर होता है जो कि अगली पीढिय़ों तक जारी रहता है। इसके साथ-साथ संपन्न तबके को भी समझ देने की जरूरत है। अब इससे ज्यादा हम क्या कहें, सभी लोग समझदार हैं।
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हिन्दुस्तान के आज के माहौल पर लिखना, पिछले दिनों, हफ्तों, महीनों, और बरसों की बातों को दुहराने के अलावा और कुछ नहीं है। वही तनावपूर्ण साम्प्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश हो रही है, और लोगों को लग रहा है कि धर्म से बड़ा कोई कर्म इस देश के लोगों को नसीब नहीं है। ऐसा लग रहा है कि प्रसाद से ही दो वक्त रोजी-रोटी चल जाएगी, और धार्मिक शोरगुल से बड़ी कोई पढ़ाई नहीं रह गई है। लोगों के एक हमलावर तबके को ऐसा लग रहा है कि वक्त की घड़ी की सुई को उल्टा घुमा दिया जाए। हजारों बरस पहले जिस तरह धर्म को लेकर शायद कबीलों में लड़ाई लड़ी जाती थी, सैकड़ों बरस पहले धर्म को लेकर देश एक-दूसरे पर चढ़ाई करते थे, अधिक ताकतवर हमलावर लोग दूसरे देशों पर हमला करके वहां के लोगों को अपने धर्म में शामिल करते थे, और हमले के शिकार देश के अनगिनत लोग खुद होकर भी राजा के कृपापात्र बनने के लिए उसके धर्म में शामिल हो जाते थे, उसी तरह आज भी सत्ता की पसंद के धर्म का राज लोकतंत्र के ऊपर कायम किया जा सकता है। इसी फेर में हिन्दुस्तान में आज हिन्दुओं का एक हमलावर तबका रात-दिन इतना तनाव खड़ा कर रहा है कि दो दिन पहले हिन्दुओं के सबसे बड़े संगठन के मुखिया, मोहन भागवत को यह कहना पड़ा कि हर मस्जिद के भीतर शिवलिंग ढूंढने की जरूरत नहीं है। लेकिन जैसा कि आज के बहुत से लोग यह मानते हैं कि उनके शब्द दिल से कितने निकले हैं, और महज होठों से कितने निकले हैं, इसका अंदाज लगाना चौदह मुल्कों के मनोवैज्ञानिकों के लिए भी मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
अब इस पर लिखने का मौका आज एक बार फिर इसलिए आया है कि कल जब प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, और मुख्यमंत्री तीनों कानपुर में थे, उस वक्त वहां जुमे की नमाज के बाद दो समुदायों में भारी पत्थरबाजी हुई। मुस्लिम इस बात से खफा थे कि कुछ दिन पहले टीवी चैनलों पर आग लगाकर टीआरपी तापने के लिए चलाई जा रही बहसों के बीच भाजपा की एक तेजाबी प्रवक्ता नुपूर शर्मा ने जिन शब्दों में मोहम्मद पैगंबर के बारे में ओछी बातें कही थीं, उनसे आमतौर पर ऐसे ही चैनल देखने वाले लोग भी हक्का-बक्का थे। किसी और किस्म की जरा सी भी बात देश के आज के किसी नेता के बारे में की होती, तो अब तक उस पर एफआईआर दर्ज हो गया रहता, और किसी राज्य की पुलिस देश के दूसरे सिरे पर जाकर बोलने वाले को गिरफ्तार करके ला चुकी होती। लेकिन चूंकि यह बात आज इस देश में अवांछित साबित किए जा रहे मुस्लिम तबके के खिलाफ थी, उनकी धार्मिक आस्था के खिलाफ थी, इसलिए नफरतजीवी हमलावरों ने उसे जायज मान लिया। भाजपा प्रवक्ता के उसी बयान को लेकर कल कानपुर में दो तबकों के बीच पथराव हुआ, और वह कई इलाकों में घंटों तक चलते रहा। यह पथराव चूंकि दो तबकों में था इसलिए यह तो माना ही जा सकता है कि इसमें से एक तबके के पत्थर उठाने के हौसले को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने को सीधी चुनौती मानेंगे, और इस वक्त वे यह साबित करने में जुटे होंगे कि हर हाथ को पत्थर उठाने का हक नहीं है।
देश का यह माहौल बहुत भयानक है। और बहुत से लोगों का यह अंदाज बेबुनियाद नहीं है कि आज देश की असल दिक्कतों को दूर कर पाना चूंकि सरकार के काबू के बाहर की बात हो गई है, इसलिए उन असल मुद्दों को हाशिए पर धकेलकर धर्म और इतिहास के मुद्दों को सामने लाया जाए। जब सामने आग की लपटें दिखती हैं, तो उनके पीछे की दिक्कतें वैसे ही आंखों से दूर हो जाती हैं। इन्हीं सब बातों को देखकर अखिलेश यादव ने अभी यह कहा है कि इतिहास के आटे से वर्तमान की रोटी नहीं बन सकती। अखिलेश की बात ठीक है, लेकिन इसके साथ-साथ इसमें एक बात और जोड़ी जानी चाहिए, इतिहास के आटे से वर्तमान के लोगों की लाशों पर सेंकी गई रोटी आखिर खिलाई किसे जाएगी, सारे तो मारे जाएंगे।
हिन्दुस्तान की यह नौबत बहुत भयानक है, जिसमें हमलावर हिन्दू संगठन कर्नाटक में यह साबित करने में लगे हैं कि स्कूल-कॉलेज में पढऩे वाली मुस्लिम लड़कियों को तब तक पढऩे का हक नहीं रहेगा जब तक वे हर किसी को अपने बाल और अपने कान नहीं दिखाएंगी। वरना हिजाब से और क्या फर्क पड़ता है? लड़कियों के बाल और कान ही तो उससे ढंकते हैं, और उन्हें देखे बिना हिन्दू तबके को चैन क्यों नहीं पड़ रहा है? लेकिन ऐसी एक-एक बात की फेहरिस्त बनाना नामुमकिन है क्योंकि अब तो भाजपा के राज वाले कई राज्यों में बुलडोजर भी बिना ऑपरेटर खुद यह जानने लगे हैं कि उन्हें किन बस्तियों में जाना है, और किन घर-दुकानों को जमींदोज करना है। यह माहौल पूरे देश में फैलते चल रहा है, बढ़ते चल रहा है, और मानो इसकी एक प्रतिक्रिया कश्मीर के आतंकियों की तरफ से आ रही है जो कि इस केन्द्र प्रशासित राज्य में हिन्दुओं को चुन-चुनकर मार रहे हैं, और कुछ तस्वीरें सामने आई हैं कि किस तरह हिन्दू कर्मचारी कश्मीर छोडक़र बाहर निकल रहे हैं। धारा 370 के रहते भी हिन्दुओं की ऐसी छांट-छांटकर हत्याएं नहीं हुई थीं, और इन्हें देश के बाकी माहौल से अलग करके देखना सच से मुकरना होगा।
इस सिलसिले को अगर थामा नहीं गया तो यह आग जाने कहां तक पहुंचेगी। लेकिन आज एक झूठे इतिहास को फिल्मों के जरिए, टीवी सीरियल और किताबों के जरिए नफरत की आग फैलाने में पेट्रोल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। अखंड भारत की बात करते-करते आज भारत खंड-खंड हो चला है, और समाज के भीतर जिस कदर टुकड़े हो रहे हैं, उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराकर किसे टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा जाएगा? इतिहास को खोदकर वहां से हथियार निकालकर उससे जंग लड़ी जाएगी, तो ईसाई और मुस्लिम तो तमाशबीन ही रहेंगे, असली जंग तो हिन्दुओं और बौद्धों के बीच लड़ी जाएंगी क्योंकि भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के तथ्य बताते हैं कि इस जमीन पर मुगलों के पैर भी पडऩे के पहले बौद्ध मंदिरों को तोडक़र वहां हिन्दू मंदिर बनाए गए थे। अब किस धर्म के ढांचे के भीतर किस धर्म की मूर्ति और प्रतीक तलाशे जाएं, क्या इसी में हिन्दुस्तान की इस पीढ़ी का भविष्य है? सच तो यह है कि जिन कंधों पर इस देश और इसके प्रदेशों के लोगों का भविष्य तय करने का जिम्मा वोटरों ने दिया है, वे अपने बच्चों को तो विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाकर आत्मगौरव से फूले नहीं समा रहे हैं, और आम लोगों को सडक़ों पर लाकर साम्प्रदायिकता की मशाल थमा रहे हैं कि सब कुछ जला डालें। इतिहास अच्छी तरह दर्ज कर रहा है कि इस दौर में इस देश के कौन-कौन लोग चुप थे। इतिहास कही गई बातों को तो छोटे अक्षरों में दर्ज करता है लेकिन चुप्पी को बड़े-बड़े अक्षरों में। लोगों को याद रखना चाहिए कि फिल्मों और किताबों में झूठा इतिहास लिखने वाले लोग दुनिया का भविष्य तय नहीं करते हैं, और न ही उनके लिखे से, परदे पर उनके लिखाए से इतिहास बदलता है। यह जरूर है कि आज देश में फैलाए जा चुके साम्प्रदायिक उन्माद से देश की नौजवान पीढ़ी की संभावनाएं बदल गई हैं, और अब वे लंबे वक्त खाली हाथ रहने वाले हैं, अधिक से अधिक उन हाथों को पत्थर नसीब होंगे।
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हिन्दुस्तान अब धर्म की अफीम के नशे में डूब गया दिखता है। और लोग महज अपने धर्म की अफीम के नशे में डूबते तो भी ठीक होता, लोग अब अपने से अधिक दूसरे धर्म की अफीम के नशे में डूब रहे हैं। अभी उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ के एक निजी कॉलेज के कैम्पस में वहां के एक प्रोफेसर ने बगीचे में एक खुली जगह पर नमाज पढ़ी, और इसका वीडियो फैला, तो भाजपा और कुछ दूसरे दक्षिणपंथी संगठनों ने इसका विरोध किया। कॉलेज प्रशासन ने प्रोफेसर को एक महीने की छुट्टी पर भेज दिया। अब कुछ लोग इस प्रोफेसर पर और कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, दूसरी तरफ बहुत से लोग इसे देश में बनाए जा रहे मुस्लिम विरोधी माहौल की एक कड़ी बता रहे हैं। इस मुस्लिम प्रोफेसर ने प्रिंसिपल को बताया कि वे जल्दी में थे, और नमाज का वक्त हो गया था तो बगीचे के एक कोने में उन्होंने नमाज पढ़ी थीं। इसका विरोध कर रहे लोगों का तर्क है कि कॉलेज परिसर का इस्तेमाल धार्मिक आस्थाओं के लिए नहीं किया जाना चाहिए। भाजपा के एक नेता ने थाने में इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है कि आज अगर इसे नहीं रोका तो कल बच्चे क्लास में भी नमाज पढ़ेंगे।
इस ताजा विवाद में बस घटना नई है, बाकी तो सब कुछ देश में इन दिनों चले ही आ रहा है, और उसी फैलाए जा रहे तनाव की यह अगली कड़ी है। हिन्दुस्तान के अधिकतर राज्यों में स्कूलों में सरस्वती पूजा एक आम बात है, और उसे लेकर कभी कोई धार्मिक या साम्प्रदायिक विवाद नहीं हुआ। उत्तर भारत और हिन्दीभाषी प्रदेशों में थानों में बजरंग बली का मंदिर, या दीवारों पर उनकी तस्वीरें आम बात हैं, और इस पर भी कभी कोई विवाद नहीं हुआ। सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के जितने दफ्तरों में नगदी रखने के लिए तिजोरी या कैशबॉक्स होते हैं, वहां पर लक्ष्मी पूजा होती ही है, और इसे कभी एक धर्म का काम मानकर दूसरे धर्मों के लोगों ने विवाद नहीं किया। दशहरे पर देश भर में पुलिस और दूसरे सशस्त्र बल हथियारों की पूजा करते हैं, और इनमें गैरहिन्दू मंत्री और अफसर भी शामिल होते हैं। देश के बहुत बड़े हिस्से में सरकारी कारखानों में भी दशहरे पर मशीनों की पूजा होती है, और विश्वकर्मा पूजा के दिन समारोह होता है, जिनमें सभी धर्मों के कामगार शामिल होते हैं। यह सिलसिला अंतहीन है, और इसे इस देश में धर्म नहीं माना गया, संस्कृति मान लिया गया, और इसका कभी कोई विरोध नहीं हुआ। लेकिन अब हाल के बरसों में बदले हुए माहौल में एक कॉलेज के बगीचे के एक कोने में एक प्रोफेसर के एक दिन नमाज पढ़ लेने का वीडियो फैलाया जा रहा है, और उसे लेकर बवाल खड़ा किया जा रहा है।
जिन संगठनों के लोग यह बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं, वे लोग शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक आयोजन करने के आदी रहे हैं। जब कर्नाटक में स्कूल-कॉलेज में लड़कियों के हिजाब पहनने को लेकर साम्प्रदायिक दंगा चल रहा था, छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में प्राध्यापक धोती-कुर्ता पहनकर पूजा में बैठे थे, और पंडित के मार्गदर्शन में सरस्वती पूजा कर रहे थे। अभी इस विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह हुआ तो उसमें मंच पर हिन्दू धर्म से जुड़े हुए एक संगठन के मुखिया, रावतपुरा सरकार कहे जाने वाले व्यक्ति को अतिथि बनाकर रखा गया। देश भर में अनगिनत सरकारी स्कूलें ऐसी हैं जहां कक्षाओं में सरस्वती की तस्वीरें लगी रहती हैं, या क्लास खत्म होने पर अलग-अलग शिक्षक अपनी मर्जी से बच्चों से सरस्वती वंदना या पूजा करवा लेते हैं, और क्लास में मौजूद दूसरे धर्मों के बच्चे भी बिना किसी विवाद के, बिना किसी झिझक के उसमें शामिल हो जाते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हिन्दुस्तान एक लोकतंत्र न होकर एक धर्मराज है जिसमें बहुसंख्यक धर्म के त्यौहारों, रीति-रिवाजों, और प्रतीकों का राज रहेगा, और दूसरे धर्म के लोगों को कोई आजादी नहीं रहेगी?
हम किसी भी स्कूल-कॉलेज, सरकारी या सार्वजनिक दफ्तर, या सार्वजनिक जगह के धार्मिक इस्तेमाल के खिलाफ हैं। जो स्कूल-कॉलेज किसी धर्म के लोग चलाते हैं, उन्हें सरकारी नियमों में अलग दर्जा मिला हुआ है, और वहां भी अगर धर्म का दखल न हो, तो भी हम उससे सहमत रहेंगे। हम तो सार्वजनिक रूप से धर्म के किसी भी तरह के प्रदर्शन के भी खिलाफ हैं क्योंकि वह आस्था का प्रदर्शन नहीं रहता, वह दूसरे धर्मों के लोगों को दिखाने के लिए बाहुबल का प्रदर्शन अधिक रहता है। लेकिन फिर भी जब तक इस देश में तमाम किस्म के धार्मिक काम प्रचलन में हैं, हमारे सरीखे गिनती के लोग उन पर कोई रोक तो लगवा नहीं सकते। लेकिन जब बिना आवाज किए घास पर बैठकर किसी के एक दिन नमाज पढ़ लेने पर इतना बवाल खड़ा किया जा रहा है, तो सवाल यह उठता है कि क्या देश में बहुसंख्यक धर्म का दर्जा अलग है, और इस राष्ट्रवादी व्यवस्था में क्या अल्पसंख्यक धर्मों की जगह वैसी ही है जैसी मनुवादी व्यवस्था में दलितों की रखी गई है? देश का संविधान तो धार्मिक बराबरी देता है, लेकिन देश का माहौल इस बराबरी को कुचल-कुचलकर उसका चूरा बना चुका है, और सद्भाव को और बारीक पीस देने पर आमादा है।
स्कूल-कॉलेज से धर्म को पूरी तरह से निकाला दे देना अच्छी बात है। इस प्रोफेसर को भी कॉलेज के बगीचे में एक दिन भी नमाज नहीं पढऩे देनी चाहिए। लेकिन साथ-साथ देश भर के स्कूल-कॉलेजों में बाकी भी किसी धर्म के कोई आयोजन नहीं होने चाहिए, और वह देश के लिए एक बेहतर माहौल होगा।
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बिहार में एक अजीब सी नौबत आ गई है कि वहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जाति-आधारित जनगणना करवाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई और उसमें सत्तारूढ़ गठबंधन के भागीदार भाजपा सहित सभी 9 प्रमुख पार्टियों ने जाति आधारित जनगणना का समर्थन किया। यह काम करने के लिए बिहार, और खासकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से केन्द्र सरकार से मांग करते आ रहे थे, और अब बिहार सरकार ने खुद ही इसे करवाने का फैसला लिया है। केन्द्र सरकार इससे सहमत नहीं है, और बरसों से इस मांग पर वह कोई फैसला नहीं ले रही है, लेकिन बिहार के इस प्रदेश स्तरीय फैसले का वहां की बीजेपी ने भी साथ दिया है, अगर खुलकर साथ नहीं भी दिया है तो भी इसका विरोध भी नहीं किया है, क्योंकि जातियों को नाराज करके चुनाव लडऩा नामुमकिन हो जाएगा। बिहार की सभी पार्टियों का यह कहना है कि जाति-आधारित जनगणना से सत्ता में कमजोर जातियों की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।
उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे दो बड़े हिन्दीभाषी उत्तर भारतीय राज्य जाति की राजनीति करते हैं। पंचायत और वार्ड के चुनाव से लेकर संसद और मुख्यमंत्री के चुनाव तक में जाति को अनदेखा नहीं किया जा सकता। तमाम बड़ी पार्टियां या तो खुलकर जाति की बात करती हैं, या फिर टिकटें बांटते हुए जाति के आधार पर जीत की संभावना देखकर ही उम्मीदवार तय करती हैं। सरकारी नौकरियों में भी ताकत की किसी कुर्सी पर तैनाती जाति के आधार पर होती है, और लोग खुलकर इसकी चर्चा करते हैं, इसका असर सरकारी कामकाज और फैसलों पर भी देखने मिलता है। लेकिन इस जाति-आधारित जनगणना से दलितों और आदिवासियों का अधिक लेना-देना इसलिए नहीं है कि उनके तबके पहले से अच्छी तरह पहचाने हुए हैं, उनकी गिनती भी साफ है, और उनके लिए सीटों का आरक्षण भी बिल्कुल साफ है। इससे मोटेतौर पर पिछड़ों का लेना-देना है जिनमें पिछड़ों और अतिपिछड़ों के बीच अनुपात और संभावना की खींचतान चलती रहती है।
अभी तो लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद राज्य सरकार ने केन्द्र की किसी सहमति-अनुमति की परवाह किए बिना अपने अधिकार क्षेत्र में इस जनगणना का फैसला लिया है। लेकिन एक बार इसके आंकड़े सामने आ जाने के बाद जाहिर तौर पर पिछड़ा वर्ग आरक्षण के भीतर अलग-अलग तबके बनाने की मांग होगी ही। इस जनगणना का घोषित या अघोषित मकसद भी वही है कि ओबीसी के भीतर परिवार की सालान कमाई के आधार पर विभाजन के अलावा यह एक विभाजन भी किया जाना चाहिए कि जाति के आधार पर अतिपिछड़े लोग कौन हैं? इससे यह एक अलग सवाल खड़ा हो सकता है कि आज ओबीसी के भीतर आय-आधारित दो तबके हैं, तो क्या इस नई जनगणना के बाद आय-आधारित चार तबके हो जाएंगे, जिनमें से ओबीसी में दो, और अतिओबीसी में दो तबके रहेंगे? क्या इस जनगणना से पढ़ाई और नौकरी के आरक्षण दुबारा तय होंगे, चुनाव में आरक्षण दुबारा तय होगा, या फिर उसके लिए वंचित तबकों को अलग से एक संघर्ष करना पड़ेगा? क्योंकि अब जो जनगणना होने जा रही है, वह किसी धर्म के भीतर जाति, और उपजाति की अलग-अलग आबादी दिखाएगी। उसके बाद यह सवाल खड़ा होगा कि क्या पढ़ाई, सरकारी और राजनीतिक बंटवारा सिर्फ जाति के आधार पर उस अनुपात में हो, या वंचित तबकों को उसमें अधिक हक मिले ताकि वे आधी-एक सदी में कुछ ऊपर आ सकें, या फिर कुछ जातियों के भीतर ही यह संघर्ष होगा, अभी कुछ साफ नहीं है। यह जरूर है कि ऐसे किसी भी वर्ग और वर्ण संघर्ष के लिए एक जमीन इस जाति-आधारित जनगणना से बनेगी जिस पर हक की लड़ाई लड़ी जा सकेगी।
बिहार की राजनीति में यह भी माना जाता है कि हिन्दू धर्म के तहत आने वाली जातियों के बीच जब कभी विभाजन की बात आती है, तो वह भाजपा की हिन्दू पहचान को नुकसान पहुंचाती है। जब सवर्ण और ओबीसी, दलित और आदिवासी जैसे तबके खड़े होते हैं, तो उनके भीतर अपने स्थानीय लीडर तैयार होते हैं, और वे भाजपा को एक साथ हासिल होने वाले हिन्दू तबके की तरह काम नहीं करते। इसलिए जब कभी हिन्दुओं के बीच जाति और गरीबी के आधार पर अलग-अलग तबके बनेंगे, तो वे व्यापक हिन्दू समाज की धारणा को कमजोर करेंगे। इसलिए भाजपा अपनी चुनावी राजनीति के हिसाब से, हिन्दू समाज को अलग-अलग तबकों में देखना नहीं चाहती है। देश के जो प्रदेश जाति की इतनी तंग सरहदों से वाकिफ नहीं हैं, उन्हें दूर बैठकर यूपी-बिहार के जातिवाद का अंदाज नहीं लग सकता है। लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि बिहार की यह जाति-आधारित जनगणना धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में भी मांग पैदा करेगी, और वहां भी खासकर ओबीसी पर आधारित पार्टियां इसकी मांग कर सकती हैं। आने वाला वक्त यह बताएगा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किस तरह जाति-आधारित जनगणना के इस फैसले की पहल करके इसका राजनीतिक फायदा पाने वाले नेता बनते हैं, फिलहाल उन्होंने पहल नाम की यह जीत तो हासिल कर ही ली है।
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हिन्दुस्तान में नरेन्द्र मोदी सरकार ने हर बरस दो करोड़ नए रोजगार का वादा किया था, और हर बरस करोड़ों रोजगार कम हो रहे हैं। लेकिन रोजगार का मतलब सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं होता है। निजी दुकान भी बंद हो रही है, और उसके दो कर्मचारी भी नौकरी खो रहे हैं, तो वह भी बेरोजगारी बढऩा है। ऐसे में यह खबर भी आ रही है कि पिछले छह बरस में रेलवे ने तीसरे और चौथे दर्जे के करीब पौन लाख पद खत्म कर दिए हैं, और इससे अधिक पद खत्म करने की तैयारी चल रही है। फौज में नौकरियां लगना बंद सा हो गया है, और जगह-जगह फौज में जाने की राह देख रहे नौजवान प्रदर्शन कर चुके हैं कि उनकी उम्र निकली जा रही है, और फौजी भर्ती हो नहीं रही है। वहां भी इसी तरह लाख-पचास हजार पद खाली पड़े हैं। फिर यह भी है कि एयरपोर्ट से लेकर रेलवे स्टेशन तक, और केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों तक की बिक्री हो रही है, और उनके नए मालिक छंटनी भी कर रहे हैं, और वहां मशीनों से काम बढ़ रहा है। कुल मिलाकर यह है कि सरकार और पब्लिक सेक्टर पद भी खत्म करते चल रहे हैं, और अपने काम को अधिक से अधिक ठेके पर भी देते चल रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि एक समय हिन्दुस्तान में सरकारी नौकरी को जिंदगी की गारंटी मानकर चलने वाले लोग अब निराश हैं क्योंकि सरकारी नौकरियों की संभावना अब घटती चली जा रही है।
बेरोजगारों और सरकारी कर्मचारियों के नजरिये से परे होकर अगर देखें तो सरकारी अमले से जिनका वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि सरकारी कार्य संस्कृति भारी निराश करने वाली और जनविरोधी है। सरकारी कर्मचारी तभी तक जनता रहते हैं जब तक वे बेरोजगार रहते हैं, और सरकारी नौकरी पाने के लिए आंदोलन करते हैं। एक बार वे सरहद के दूसरी तरफ चले जाते हैं, तो फिर उनका मिजाज राजा का हो जाता है जिसके लिए बाकी जनता प्रजा रहती है। सरकारी अमले का काम बाजार के किसी भी पैमाने के मुकाबले बड़ा कमजोर रहता है, और उसकी लागत बहुत अधिक रहती है। एक ही देश-प्रदेश में, एक ही समाज में, एक सरीखे काम के लिए तनख्वाह का इतना बड़ा फर्क सरकारी और निजी नौकरी में रहता है कि वह सरकारी को दामाद की तरह, और निजी को गुलाम की तरह दिखाता है। एक निजी नौकरी के ड्राइवर को आठ-दस हजार रूपए महीने मिलते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकारी ड्राइवर को काम आमतौर पर चौथाई होता है, और सरकार पर उसकी लागत चार गुना आती है। तनख्वाह, पेंशन, इलाज का खर्च, और बाकी चीजें मिलाकर सरकारी ड्राइवर को निजी ड्राइवर के मुकाबले चार गुना या अधिक महंगा बना देते हैं। कुछ इसी तरह का हाल अधिकतर किस्म के काम का होता है जिनमें दिखता है कि सरकारी कर्मचारी की लागत इतनी अधिक है कि लोग निजी नौकरी करने के बजाय बेरोजगार बैठे रहकर भी सरकारी नौकरी का इंतजार करते हैं।
अब अगर सरकार के नजरिये से देखें, तो वह एक कर्मचारी की जिंदगी भर की जिम्मेदारी उठाने के बजाय यह बात आसान पाती है कि वह किसी निजी एजेंसी को काम आऊटसोर्स कर दे, और फिर निजी एजेंसी सस्ते कर्मचारी रखकर उन्हें न्यूनतम वेतन देकर सरकार का वही काम सस्ते में कर दे। धीरे-धीरे देश-प्रदेश में अधिकतर विभागों में आऊटसोर्स एक पसंदीदा शब्द बनते जा रहा है, और सरकार की सीमित कमाई में यह शायद उसकी मजबूरी भी होते चल रहा है। देश के अलग-अलग प्रदेश अंधाधुंध नौकरियां बढ़ाकर अपने खर्च को इतना अधिक कर चुके हैं कि अपनी कमाई का तीन चौथाई से ज्यादा हिस्सा वे वेतन, ईंधन, और दफ्तर के खर्च पर लगा दे रहे हैं, और बहुत से प्रदेशों में तो सरकार के पास विकास के लिए एक चौथाई बजट भी नहीं बचता है। सरकारों को नौकरियां देने से लोकप्रियता मिलती है, लेकिन ये नौकरियां अगर विकास और जनकल्याण के खर्च में कटौती करके दी जा रही हैं, तो इनसे नौकरी पाने वालों को तो फायदा है, लेकिन जनता का इसमें व्यापक नुकसान है। इसलिए सरकारों को उनका स्थापना व्यय कहा जाने वाला खर्च घटाना चाहिए, और ऐसा करने का एक आसान रास्ता सभी जगह यह दिखता है कि गैरजरूरी कुर्सियों पर लोगों के रिटायर होने पर उन ओहदों को खत्म कर दिया जाए। वैसे भी अब मशीनीकरण और कम्प्यूटरीकरण की वजह से उतने अधिक कर्मचारियों की जरूरत नहीं रह गई है, और आज नौकरी चाहने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि आने वाला वक्त और मुश्किल होने वाला है, और सरकारी नौकरियों के भरोसे बैठे रहना अपनी जिंदगी तबाह करने से कम कुछ नहीं होगा।
अब ऐसे में सरकार और बेरोजगार, इन दोनों के सामने जो आसान रास्ता बचता है, वह स्वरोजगार का है। लोग अपनी क्षमता और अपने पसंद के ऐसे काम देखें जिन्हें वे अधिक पूंजीनिवेश के बिना कर सकें। हो सकता है कि यह पढ़-लिखकर डिग्री लेने के बाद पकौड़ा बेचने से होने वाली बेइज्जती जैसा लगे, लेकिन अगर सरकारी नौकरियां रहेंगी ही नहीं, तो फिर अपना काम देखना ही एक रास्ता बचता है। ऐसे में सरकार को लोगों के सामने स्वरोजगार के कई विकल्प रखने चाहिए, और उनके लिए लोगों को तैयार भी करना चाहिए। अभी कुछ हफ्ते ही पहले हमने इसी जगह पर लिखा था कि सरकारी नौकरियों में पहुंचे हुए लोगों की हर आठ बरस में दुबारा परीक्षा होनी चाहिए, उनका मूल्यांकन होना चाहिए, और हर आठ बरस में सरकारी अमले में से एक चौथाई की छंटनी होनी चाहिए। सरकारी नौकरी निकम्मेपन के लिए आश्रम की तरह नहीं होनी चाहिए, और इसे लेकर लोगों के मन में बैठी हुई सुरक्षा की गारंटी खत्म होनी चाहिए। इस गरीब देश में जनता अपने पैसों पर जिन कर्मचारियों को रखती है, वे अगर उसी से पैसों की उगाही में लग जाते हैं, तो ऐसे लोगों की छंटनी होनी ही चाहिए। कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह लिखते हैं कि सरकारी कर्मचारी काम न करने की तनख्वाह लेते हैं, और काम करने की रिश्वत। ऐसी नौबत में सरकारी नौकरियां अधिक रहना जनविरोधी काम है। सरकारी अमला कम से कम रहना चाहिए ताकि टैक्स का पैसा सीधे जनकल्याण या विकास कार्यों में लग सके। ये बातें बेरोजगारों को कड़वी लग सकती हैं, लेकिन जिन लोगों को सरकारी दफ्तरों में धक्के खाने पड़ते हैं, और जायज काम के लिए भी नाजायज रिश्वत देनी पड़ती है, वे जानते हैं कि सरकारी कुर्सियां कितनी बेरहम होती हैं। इस बेरहमी की कीमत जनता चुकाए यह बिल्कुल भी ठीक नहीं है। सरकारी अमले को सुधारने के बाकी सारे तरीकों के साथ-साथ उनकी गिनती को कम करके लोगों को स्वरोजगार के मौके जुटाकर देना किसी भी देश के लिए एक बेहतर बात होगी।
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आज दुनिया में तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जा रहा है। तम्बाकू से सेहत पर होने वाले खतरों के प्रति जागरूकता पैदा करने की एक सालाना कोशिश इस दिन होती है, और सालाना कोशिशों का कोई असर लोगों पर होता है, इसका कोई सुबूत तो रहता नहीं, फिर भी इस दिन कुछ लिख लिया जाता है, या कहीं और कुछ चर्चा हो जाती है। बीबीसी पर आज 75 बरस की एक महिला की कहानी आई है जिसके पति धूम्रपान करते थे, और इस महिला को यह अहसास नहीं था कि उस घर की हवा में आसपास रहते हुए भी उस पर इसका असर हो रहा होगा। पति के मरने के पांच बरस बाद जाकर उन्हें इस पैसिव स्मोकिंग की वजह से कैंसर हुआ, और अब वे नाक से सांस नहीं ले पातीं, गले में किए गए एक छेद से उन्हें सांस लेनी पड़ती है। लेकिन यह हादसा अकेला नहीं है। दुनिया भर के विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि हर बरस तम्बाकू से 80 लाख मौतें हो रही हैं, जिनमें 12 लाख लोग खुद तम्बाकू का सेवन नहीं करते थे, यानी मोटेतौर पर वे पैसिव स्मोकर थे।
हिन्दुस्तान तम्बाकू उगाने और तम्बाकू की खपत करने वाला दुनिया का अव्वल देश है। जाहिर है कि यहां पर मुंह का कैंसर, फेंफड़े का कैंसर, और सांस नली का कैंसर भी बहुत अधिक है। ऐसा भी लगता है कि बहुत से गरीब लोग जांच में कैंसर न निकल जाए इस डर से बुढ़ापे में जांच नहीं करवाते कि परिवार इलाज कराते हुए बर्बाद हो जाएगा। फिर यह भी है कि पैसिव स्मोकिंग से कैंसर के खतरे का अहसास भी कम लोगों को है, इसलिए लोग अपने आसपास के लोगों को बीड़ी-सिगरेट पीने के लिए मना नहीं करते। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने बड़े साहब या नेता की गाड़ी चलाते हुए, मालिक की सिगरेट को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर रहते हुए पैसिव स्मोकिंग झेलते हैं, और बेकसूर मारे जाते हैं। आज भी हिन्दुस्तान में सरकारों के भीतर तमाम लिखित प्रतिबंधों के बावजूद बड़े लोग दफ्तर या गाडिय़ों में सिगरेट पीते हैं, और उनके मातहत उन्हें झेलने के लिए मजबूर होते हैं। कहने के लिए सरकारी दफ्तर में सिगरेट पीने पर हजारों का जुर्माना है, लेकिन यह जुर्माना किसी पर कभी लगा हो, यह सुनाई नहीं पड़ता।
हिन्दुस्तान में तम्बाकू को लेकर एक और बहुत बड़ी दिक्कत है जो कि दुनिया के कई विकसित देशों में यहां के मुकाबले बहुत कम है। यहां तम्बाकू और सुपारी मिलाकर बनाया गया गुटखा गली-गली बिकता है, और उन राज्यों में भी धड़ल्ले से बिकता है जहां पर इस पर कानूनी रोक लगा दी गई है। दरअसल सिगरेट, तम्बाकू, और गुटखा का कारोबार इतना बड़ा और संगठित है कि वह किसी भी राज्य की सरकारी मशीनरी को भ्रष्ट बना देता है, और यह संगठित भ्रष्टाचार गुजरात जैसे ड्राई-स्टेट में एक टेलीफोन कॉल पर पहुंचने वाले शराब के हर देशी-विदेशी ब्रांड से उजागर होता है। इसलिए जहां लोगों की तम्बाकू-गुटखा की खपत रहेगी, वहां पर पुलिस और दूसरे अफसरों की मिलीभगत से इसकी तस्करी नहीं होगी, यह सोचना ही बेकार है। इसलिए जब तक देश के किसी भी प्रदेश में सिगरेट-गुटखा की बिक्री जारी रहेगी, तब तक वह पूरे देश में मिलते रहेंगे।
भारत की सडक़ों पर इन दिनों सिगरेट पीने वाले लोग कुछ कम दिखते हैं क्योंकि उतने ही दाम में वे गुटखा खरीदकर देर तक तम्बाकू का नशा पाते हैं। यह सिलसिला इतना फैला हुआ है कि लोगों को कैंसर से बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है। एक तरीका यही दिखता है कि लोगों में कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए, और उनकी अपनी सेहत को खतरे के साथ-साथ उन्हें यह भी समझाना जरूरी है कि कैंसर होने की हालत में पूरा परिवार किस तरह तबाह होता है, और खाते-पीते घरों से भी कामकाजी लोग बेवक्त छिन जाते हैं, परिवार की जमापूंजी इलाज में खर्च हो जाती है, और जिंदगी के रोज के संघर्ष के बीच लोग इलाज के लिए बड़े शहरों के चक्कर लगाते टूट जाते हैं। ऐसा लगता है कि सरकार और समाज दोनों को मिलकर और अलग-अलग लोगों के बीच तम्बाकू से सेहत को सीधे होने वाले खतरे, परोक्ष धूम्रपान से होने वाले खतरे, और परिवार पर पडऩे वाले आर्थिक बोझ की असल जिंदगी की कहानियां रखनी चाहिए। यह भी किया जा सकता है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों के पहले और बाद में कुछ मिनटों के लिए ऐसे परिवारों के किसी व्यक्ति से उनकी तकलीफ बयान करवाई जाए ताकि बाकी लोगों पर उसका असर पड़ सके। दूसरी तरफ यह भी हो सकता है कि सार्वजनिक जगहों और दफ्तरों पर सिगरेट-तम्बाकू पर रोक को कड़ाई से लागू करवाने के लिए लोग पहल करें, क्योंकि तम्बाकू-प्रदूषण से मुक्त साफ हवा पाना हर किसी का बुनियादी हक है।
भारत चूंकि गरीब देश है, आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो परिवार में कैंसर के एक मरीज को ढो नहीं सकता है। कमाने वाला सदस्य अगर कैंसर का शिकार हो जाए, तो पूरे घर के मरने की नौबत आ जाती है। इसलिए सरकार और समाज को कैंसर के इलाज के साथ-साथ उससे बचाव पर जोर देना चाहिए जिससे कि इलाज के ढांचे पर भी जोर न पड़े, और जिंदगियां बेवक्त खत्म न हो।
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कांग्रेस पार्टी के लिए राज्यसभा के नाम तय करना इस बार आसान भी नहीं था क्योंकि कुल दो राज्यों में उसकी सरकार है, और उसके अनगिनत नेता अपने-अपने राज्यों में हारे बैठे हैं जो कि कांगे्रस विधायकों वाले राज्यों से राज्यसभा पहुंचना चाहते थे। ऐसे में पार्टी ने थोड़े बहुत नेताओं को खुश करने की जो कोशिश की है उससे छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को बड़ा सदमा पहुंचा है और उसे एक किस्म से बड़ी बेइज्जती झेलनी पड़ी है। इसके पहले छत्तीसगढ़ के बीस बरस के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी पार्टी की दोनों सीटों को प्रदेश के बाहर के लोगों को दे दिया जाए। इस बार छत्तीसगढ़ पर कांग्रेस पार्टी के एक पुराने नेता राजीव शुक्ला को थोपा गया है जो कि कांग्रेस से अधिक क्रिकेट संगठन की राजनीति में लगे रहते हैं, और जिन पर पहले कई तरह के गंदे आरोप लग चुके हैं। अरबपतियों के कारोबारी खेल आईपीएल के विवाद उनके नाम चढ़े हुए हैं, वे अपनी पारिवारिक हैसियत में अरबपति मीडिया कारोबारी भी माने जाते हैं, और कई बार राज्यसभा में रह चुके हैं, और अब छत्तीसगढ़ पर उन्हें लादा गया है। दूसरी तरफ बिहार के एक बाहुबली नेता पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को भी कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ से उम्मीदवार बनाना तय किया है जो कि बिहार में कई चुनाव जीत और हार चुकी हैं, और अभी पिछली लोकसभा में वो कांग्रेस की सांसद थीं। अब कांग्रेस पप्पू यादव के नाम से जानी जाने वाली उनकी पत्नी को छत्तीसगढ़ पर लादकर क्या साबित करना चाहती है? यह राज्य जिस ओबीसी तबके के मुख्यमंत्री का है, जहां पर मुख्यमंत्री पद के चार में से तीन दावेदार ओबीसी तबके के थे, जहां पर पिछले विधानसभा चुनाव में ओबीसी तबके के साहू समाज ने कांग्रेस को थोक में विधायक दिए थे, वहां पर आज प्रदेश में कई अच्छे ओबीसी नाम खबरों में तैरते रहे, और पार्टी ने बाहर के दो लोगों को यहां भेज दिया। अभी दो दिन पहले तक कांग्रेस छत्तीसगढ़ से किसी दलित महिला का नाम तलाश रही थी, अब एकाएक दो बाहरी लोगों को यहां डाल दिया गया। राजीव शुक्ला की मानो पूरी जिंदगी ही राज्यसभा में गुजरने के लिए बनी है, और पप्पू यादव का बाहुबल उन्हें छत्तीसगढ़ तक में ताकतवर बना रहा है। कांग्रेस की ऐसी पसंद से छत्तीसगढ़ के लोगों में भारी निराशा है, और यहां की कांग्रेस पार्टी में निराशा होना तो जायज है ही। भारत की राजनीति में बड़ी या छोटी पार्टियां जिन लोगों को राज्यसभा के लिए मनोनीत करती हैं उनके पीछे देश के किस उद्योगपति का हाथ रहता है, इसे साबित करना तो नामुमकिन रहता है, लेकिन उसकी चर्चा होते रहती है, और इस बार भी वह चर्चा हो रही है।
लेकिन इस पार्टी की समझ हैरान करती है कि दो विधायकों वाले यूपी से वह राज्यसभा के तीन उम्मीदवार दूसरे राज्यों पर थोप रही है। और जो छत्तीसगढ़ और राजस्थान डेढ़ बरस बाद एक साथ चुनाव में जाएंगे, जहां पर आज कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां पर एक भी स्थानीय नाम राज्यसभा के लिए सही नहीं समझा गया, और इन दोनों राज्यों पर दूसरे राज्यों के नेताओं को थोपा गया है। राजस्थान से तीन सदस्य राज्यसभा में जाएंगे, जिनमें पंजाब के रणदीप सिंह सुरजेवाला, महाराष्ट्र के मुकुल वासनिक, और राजस्थान के प्रमोद तिवारी के नाम हैं। यह बात भी हैरान करती है कि जिन मुकुल वासनिक की दस्तक से कांग्रेस उम्मीदवारों की लिस्ट जारी हुई उन्हें अपने गृहप्रदेश महाराष्ट्र से जगह नहीं मिली, उन्हें राजस्थान भेजा गया, और उत्तरप्रदेश से इमरान प्रतापगढ़ी को महाराष्ट्र भेजा गया। ऐसा शायद इसलिए किया गया है कि राजस्थान कांग्रेस के कुछ विधायकों ने गुलाम नबी आजाद की नाम की चर्चा होने पर उनका विरोध किया था, और शायद उसे देखते हुए ही इमरान प्रतापगढ़ी को महाराष्ट्र के रास्ते राज्यसभा लाया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को छप्पर फाडक़र सीटें दी थीं, और उसी का नतीजा है कि आज राज्यसभा की दोनों सीटों के लिए कांग्रेस के उम्मीदवारों का जीतना तय है, और भाजपा ने यहां उम्मीदवार खड़े न करना तय किया है। लेकिन अपार जनसमर्थन को अगर कांग्रेस पार्टी अपना हक मानकर इस तरह की मनमानी करती है, तो राज्य के ऐसे अपमान को वोटर अगले चुनाव में अच्छी नजर से नहीं देखेंगे। कल ये नाम आने के बाद से अभी तक सोशल मीडिया पर भी छत्तीसगढ़ कांग्रेस के छत्तीसगढ़ीवाद का मजाक उड़ रहा है कि क्या यही सबसे बढिय़ा छत्तीसगढिय़ा हैं?
हमने इसके पहले भी छत्तीसगढ़ के बाहर के थोपे गए लोगों को देखा है जिनसे इस राज्य को एक धेले का भी कोई फायदा नहीं हुआ था। कांग्रेस पार्टी ने यहां से 2004 और 2010 में मोहसिना किदवई को राज्यसभा भेजा था, जिनका एक भी काम कांग्रेस पार्टी को भी याद नहीं होगा। अभी दो बरस पहले ही दिल्ली के एक बड़े वकील केटीएस तुलसी को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा था, और दो बरस पूरे होने पर भी उनका कोई अस्तित्व छत्तीसगढ़ को नहीं मालूम है। यह नौबत इस प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत खराब है जिसने कि एक बहुत ही अभूतपूर्व ताकत हासिल की हुई है। यह मौका छत्तीसगढ़ के ऐसे लोगों को राज्यसभा में भेजने का था जो कि देश की संसद में इस प्रदेश के मुद्दों को बेहतर तरीके से उठा सकते थे। आज लोकसभा में छत्तीसगढ़ के कुल दो सांसद हैं, और पिछले लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़, राजस्थान, और मध्यप्रदेश में कुल मिलाकर 65 लोकसभा सीटों पर तीन कांग्रेस सांसद चुने गए थे, जिनमें से दो छत्तीसगढ़ से थे। ऐसे छत्तीसगढ़ को कांग्रेस ने ऐसी हिकारत से देखा है कि यहां की दोनों राज्यसभा सीटें बाहर के निहायत गैरजरूरी लोगों को दे दीं। इस बार राज्य में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आसपास ही राज्यसभा के लायक कई अच्छे नाम थे, जिनमें उनके सलाहकारों के नाम भी थे, लेकिन इनमें से किसी को मौका नहीं मिला, और विवादों से जुड़े हुए दो नाम इस राज्य पर डाल दिए गए। छत्तीसगढ़ी वोटर यह भी सोच रहे होंगे कि क्या किसी पार्टी को इतना बहुमत देने का मतलब राष्ट्रीय स्तर पर इतनी उपेक्षा झेलना भी हो सकता है? अब राज्यसभा में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से जो चार लोग रहेंगे उनमें से सिर्फ फूलोदेवी नेताम ही छत्तीसगढ़ी रहेंगी। यह राज्य ऐसे राजनीतिक फैसले का दाम चुकाएगा जब इसके हक की बात करने वाले राज्यसभा में नहीं रहेंगे।
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राजस्थान से दिल दहलाने वाली खबर आई है कि एक ही परिवार की तीन बहनों की शादी एक ही घर में हुई थी, और अब उन्होंने एक साथ अपने दो बच्चों को लेकर आत्महत्या कर ली है। ये सब बहनें 20-25 बरस के आसपास की थीं, और दोनों बच्चे बहुत छोटे थे, दो बहनें गर्भवती भी थीं। लड़कियों के मायके का कहना है कि तीनों को ससुराल में दहेज के लिए बार-बार पीटा जाता था, और तंग आकर उन्होंने सामूहिक आत्महत्या कर ली। मायके के पास अपनी जुबानी शिकायत के अलावा एक बहन का वॉट्सऐप स्टेटस है जिसमें उसने लिखा है- हम अभी जा रहे हैं, खुश रहें, हमारी मौत का कारण हमारे ससुराल वाले हैं, हर दिन मरने से बेहतर है कि एक बार में ही मर जाएं। तमाम लाशें मिल जाने के बाद इन तीनों बहनों के पतियों और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज प्रताडऩा और आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मामला दर्ज किया गया है, और गिरफ्तार किया गया है।
आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि आत्महत्या की कगार पर पहुंचे हुए लोगों को अगर मन हल्का करने के लिए कोई भरोसेमंद मिल जाए, तो उनकी आत्महत्या की सोच टल भी सकती है, खत्म भी हो सकती है। लेकिन यहां तो एक साथ रहती तीनों बहनें इस तरह प्रताडि़त थीं कि आत्महत्या का फैसला शायद एक-दूसरे से बात करके और पुख्ता ही हो गया। आत्महत्या के विश्लेषकों का यह मानना रहता है कि महिलाएं आत्महत्या करते हुए बच्चों को पहले इसलिए मार देती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके बाद बच्चों की जिंदगी और खराब रहेगी, और उससे अच्छा उनका मर जाना रहेगा। भारत में महिलाओं की आत्महत्या में से बहुत की वजह दहेज प्रताडऩा रहती है जिसके चलते उसके दिमाग में ससुराल के लोग बार-बार यह बात बिठाते हैं कि वह मर जाए तो ससुराल सुखी रहेगा। बहुत सी लड़कियों की जिंदगी में शादी के बाद मायके लौटने का विकल्प नहीं रहता क्योंकि हिन्दुस्तानी समाज में उसके दिमाग में यह बात बार-बार कूट-कूटकर भरी जाती है कि उसकी डोली मायके से उठी है, और उसकी अर्थी उसके ससुराल से उठनी चाहिए। भारत का कानून शादीशुदा लडक़ी को भी अपने माता-पिता की संपत्ति में हक दिलाने की बात करता है, लेकिन असल जिंदगी में यह माहौल बना दिया जाता है कि लडक़ी का हक उसके दहेज की शक्ल में दिया जा चुका है, और बची हुई दौलत भाईयों की होती है। यह सब चलते हुए बहुत सी लड़कियां ससुराल में घुट-घुटकर मर जाती हैं, आत्महत्या कर लेती हैं, या उनकी दहेज-हत्या हो जाती है, लेकिन मां-बाप के घर लौटने की नहीं सोच पातीं।
एक दूसरी बड़ी वजह शादीशुदा लड़कियों की आत्महत्या की यह भी है कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं रहती हैं, उनकी नौकरी या कामकाज ससुराल ही छुड़वा देता है, या मां-बाप लगने ही नहीं देते हैं, और ससुराली प्रताडऩा के बीच भी उसके पास वहां से बाहर निकलकर अपने पैरों पर खड़े होने और जिंदगी गुजारने का विकल्प नहीं रहता है। जो लड़कियां शादी के बाद भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहती हैं, शायद उनकी आत्महत्या की नौबत कम आती होगी। इसलिए ऐसी हत्या या आत्महत्या की खबरें पढ़ते हुए भारतीय समाज में लडक़ी और उसके मां-बाप को चाहिए कि वे उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर ही उसकी शादी करें। जिस राजस्थान से ऐसी सामूहिक आत्महत्या की खबर आई है, वहां पर अभी भी बाल विवाह का चलन है, और एक समाचार बताता है कि इस आत्महत्या में शामिल तीनों बहनों की शादी बचपन में ही तीनों भाईयों से हो गई थी, और कुछ बड़ी होने के बाद वे अपने पतियों के पास रहने आई थीं। बाल विवाह हिन्दुस्तान में एक बड़ी वजह है कि लडक़ी न शादी के पहले आत्मनिर्भर हो पाती, और न शादी के बाद। बाल विवाह के खिलाफ कानून कड़ा है, लेकिन इसका प्रचलन खत्म ही नहीं हो रहा है, और ऐसे बाल विवाह लडक़ी के व्यक्तित्व का कोई विकास नहीं होने देते, उसकी पूरी जिंदगी ससुराल में गुलाम कैदी की तरह बना देते हैं।
यह मामला इतना बड़ा है जिसमें तीन सगी बहनें दो बच्चों के साथ आत्महत्या कर रही हैं, और दो की कोख में अजन्मे बच्चे पल भी रहे थे। इस तरह सात जिंदगियां एक साथ खत्म हुई हैं। इस मामले से भारतीय समाज की आंखें खुलनी चाहिए, और अलग-अलग जात-बिरादरी के भीतर इस मिसाल को लेकर चर्चा होनी चाहिए कि लड़कियों की बदहाली कैसे घटाई जा सकती है, और कैसे उसे आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनाया जा सकता है। एक अकेली आत्महत्या शायद लोगों को जगाने के लिए काफी न होती, लेकिन अभी यह मामला जितना भयानक है उससे समाज की व्यापक सोच में बदलाव आना चाहिए।
ऐसा भी नहीं हो सकता कि इस परिवार के और लोगों को, या पड़ोस के लोगों को इतनी पारिवारिक हिंसा की जानकारी न हुई हो। अब या तो वे सीधी दखल देना नहीं चाहते होंगे, या फिर पुलिस पर उनका भरोसा नहीं होगा कि उससे शिकायत करके उनका नाम गोपनीय रह सकेगा। एक पूरे परिवार की ऐसी नौबत आने के बाद भी उसे बचाने के लिए कुछ न करना, आसपास के लोगों की बेरूखी भी बताता है, और बाकी समाज में इस पर भी चर्चा होनी चाहिए कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी ऐसे में क्या बनती है। आखिर में हम इसी बात को दुहराना चाहेंगे कि देश के कानून के मुताबिक मां-बाप को लडक़ी को उसका हक देना चाहिए, और अगर ऐसा हक मिलने का भरोसा रहेगा, तो बहुत सी लड़कियां आत्महत्या करने के बजाय मायके लौटने की सोच सकेंगी।
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अमरीका में नागरिकों के निजी हथियार सदियों से बहस का सामान रहे हैं। अठारहवीं सदी में अंग्रेजों की गुलामी से आजादी पाने के लिए नागरिकों ने भी अपने हथियारों सहित लड़ाई में हिस्सा लिया था, और बाद में जब अमरीका का संविधान बना तो नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की फेहरिस्त में निजी हथियार रखना दूसरे ही नंबर पर था। तब से बहस भी चल रही है कि क्या नागरिकों को इतनी आसानी से हथियार खरीदने की छूट रहनी चाहिए, लेकिन हथियार निर्माताओं की तगड़ी लॉबी कभी इस छूट के खिलाफ कोई कानून बनने नहीं देती। अभी एक पखवाड़े के भीतर अमरीका में दो बड़ी शूटिंग हुईं, एक में दस काले लोगों को मार डाला गया, और दूसरी में बीस स्कूली बच्चों की हत्या कर दी गई। इसके बाद एक बार फिर यह बहस चल रही है कि अमरीका में हथियारों को लेकर कुछ नए प्रतिबंध लगाए जाएं, और जैसा कि हमेशा से होते आया है, वहां की रिपब्लिकन पार्टी किसी भी नियंत्रण का विरोध कर रही है क्योंकि इस पार्टी का हाल यह है कि कोई इसके सांसद बनने के लिए पार्टी का उम्मीदवार बनना चाहे, तो उस उम्मीदवारी के लिए भी उसे गन लॉबी से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना पड़ता है। इसलिए देश की एक सबसे बड़ी पार्टी खुलकर हथियारों की आजादी की हिमायती है, और ऐसे में वहां की संसद से नागरिकों के बुनियादी अधिकार पर किसी किस्म के संशोधन की कोई गुंजाइश किसी को दिखती नहीं है।
लेकिन अमरीका के इस घरेलू खतरे की बारीकियों से परे इस मुद्दे पर एक व्यापक नजर डालें तो यह दिखता है कि अमरीका में अभी चालीस करोड़ या उससे अधिक बंदूकें हैं, और इनमें से अधिकतर नागरिकों के पास हैं जिन्हें अठारह बरस का होने पर एक से अधिक हमलावर हथियार खरीदने की आजादी है। 2018 के आंकड़े बताते हैं कि वहां सौ नागरिकों के बीच 120 हथियार हैं, मतलब यह कि बहुत से लोगों के पास एक से अधिक हथियार भी हैं। अभी स्कूल में बच्चों को मार डालने वाले नौजवान ने कुछ समय पहले ही अपने अठारहवें जन्मदिन पर अपने को दो बंदूकें तोहफे में दी थीं, जो कि अमरीका में हमलावरों की सबसे पसंदीदा बंदूक है। अब जब वहां के फिक्रमंद मां-बाप में से कुछ लोग हथियारों पर कुछ रोक की बात कर रहे हैं, तो एक बार फिर हथियार उद्योग लोगों को सुझा रहा है कि वह तो स्कूल के शिक्षकों को हथियार बंद करने की बात बहुत समय से करते आया है। लेकिन कुछ समझदार लोगों का यह मानना है कि ऐसी कोई वजहें नहीं हैं जिनसे यह मान लिया जाए कि शिक्षकों के हथियार बंद होने से स्कूलों में हिंसा घट जाएगी। दूसरी तरफ हथियारों पर किसी भी रोक के खिलाफ जो लोग हैं उनका तर्क यह है कि हत्याएं हथियार नहीं करते हैं, उनके पीछे के दिमाग करते हैं, और सरकार को मानसिक रूप से बीमार या हिंसक ऐसे लोगों को इलाज की जरूरत है, और जब कभी वे कोई धमकी या चेतावनी पोस्ट करते हैं तो उस पर नजर रखने की जरूरत भी है ताकि उन्हें कोई सामूहिक हिंसा करने से रोका जा सके।
आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि क्या अमरीका को सचमुच ही कम हथियारों से अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है? क्या यह तर्क जायज है कि चालीस करोड़ हथियारों वाले देश में पिछले बीस बरस में कुल सौ सामूहिक हत्याएं हुई हैं। इसका एक मतलब यह भी है कि हथियार रखने वाले अधिकतर लोगों ने कोई सामूहिक हत्याएं नहीं की हैं, बल्कि कोई भी हत्याएं नहीं की हैं। लेकिन एक दूसरा आंकड़ा बताता है कि 2020 में ही 45 हजार अमरीकियों की मौत पिस्तौल-बंदूक की गोलियों से हुई हैं, चाहे वे आत्महत्या हुई हों, या हत्याएं। मतलब यह है कि सामूहिक हत्या की घटनाओं को देखें तो ऐसा लगता है कि हथियार के मुकाबले उसके पीछे के दिल-दिमाग की अधिक बड़ी भूमिका हिंसक फैसलों में रही हैं। अगर हथियार रखने से ही लोग हिंसा पर उतारू हो जाते तो चालीस करोड़ हथियारों वाले, या सौ की आबादी पर 120 हथियारों वाले देश में कोई जिंदा ही नहीं बचते। अब अमरीकी बुनियादी अधिकार की बात को अगर अलग रखें, तो हिन्दुस्तान जैसे देश की मिसाल सामने है जहां गिने-चुने नागरिकों के पास ही हथियार रहते हैं क्योंकि एक-एक लायसेंस के लिए लोगों को बरसों तक सरकार में संघर्ष करना पड़ता है। और हिन्दुस्तान में हथियारों की हिंसा में ऐसी कोई कमी भी नहीं है, रोजाना दर्जनों लोग हथियारों की गोलियों से मारे जाते हैं। यह एक अलग बात है कि अमरीका की तरह की सामूहिक हत्याएं यहां पर नहीं होती हैं, और दिलचस्प बात तो यह है कि अमरीका की तरह के जो दूसरे पश्चिमी देश हैं उनमें भी कहीं पर भी ऐसी हत्याएं नहीं होती हैं, सिर्फ अमरीका में ही होती हैं।
ऐसे हत्यारे आमतौर पर किसी नस्ल या धर्म के लोगों के खिलाफ रहते हैं, और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी रहे हैं जिनकी कुछ बुरी यादें अपने स्कूल को लेकर रही हैं, और वे उसका हिसाब चुकता करने के लिए वहां जाकर सामूहिक हत्या कर आए हैं। लोगों के पास बड़ी संख्या में हथियार रहना अच्छी बात नहीं है क्योंकि उससे दूसरे लोग भी मारे जाते हैं, खुद भी मरते हैं, और लंबी-चौड़ी सजा भी होती है। लेकिन सामूहिक हत्या को लेकर अगर हथियारों की कमी की बात की जाए, तो अमरीका में कभी भी ऐसा तो हो नहीं सकता कि निजी हथियारों पर पूरी रोक लग जाए। उनमें अगर कमी या कटौती होगी, हथियार लेने के पहले लोगों का मानसिक परीक्षण होगा, तो चालीस करोड़ लोगों का मानसिक परीक्षण, या उनके सामाजिक बर्ताव पर निगरानी किसी भी सरकार की क्षमता के बाहर का काम होगा। हम निजी हथियारों के खिलाफ हैं, क्योंकि उनका इस्तेमाल आत्मरक्षा के लिए तो बहुत ही कम होता है, अपने आपको या किसी दूसरे बेकसूर को मारने के लिए अधिक होता है। लेकिन अमरीका में आज जिस तर्क के साथ, सामूहिक हत्याओं को रोकने के लिए निजी हथियारों पर किसी किस्म की रोक की बात की जा रही है, वह ऐसी सामूहिक हत्याओं का इलाज नहीं दिख रही है। सामूहिक हत्याओं के पीछे की वजहों को तलाशना भी जरूरी होगा। और इस मुद्दे पर चर्चा का एक मकसद यह भी है कि दुनिया में जहां कहीं जटिल समस्याएं रहती हैं, वहां पर जाहिर तौर पर समस्या की जड़ जो दिखती है, उसकी असली जड़ शायद उससे अलग भी हो सकती है। यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।
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दिल्ली के एक बड़े अखबार, इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के बाद दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस जोड़े का तबादला दिल्ली से दूर लद्दाख और अरूणाचल कर दिया गया है। अखबार की खबर थी कि एक बड़े सरकारी स्टेडियम, त्यागराज स्टेडियम में ये अफसर शाम को अपना कुत्ता घुमाने ले जाते थे, और इस वजह से वहां खेल की प्रैक्टिस कर रहे सभी सैकड़ों खिलाडिय़ों को सात बजे के पहले स्टेडियम से बाहर निकाल दिया जाता था। नौकरशाही की बददिमागी की यह एक आम मिसाल है, और देश भर में जगह-जगह आईएएस और आईपीएस अफसरों की ऐसी तरह-तरह की मनमानी चलती रहती है, जिस पर बड़े वजनदार सत्तारूढ़ राजनेताओं का भी कोई बस नहीं चलता। अखिल भारतीय सेवाओं के अफसर सत्ता की तमाम ताकत का बुरी तरह इस्तेमाल करने के लिए बदनाम रहते हैं, और जाहिर तौर पर सरकारी नियमों के खिलाफ होने पर भी वे तकरीबन हर मामले में बचे ही रहते हैं।
एक वक्त इन नौकरियों को देश की सेवा करने का एक मौका माना जाता था, लेकिन वक्त ने यह साबित किया कि यही स्थाई शासक हैं, और निर्वाचित नेता तो पांच-पांच बरस में आते-जाते रहते हैं। दूसरी बात देश-प्रदेश में यह भी देखने मिलती है कि सरकार चला रहे मंत्रियों में खुद में समझ की इतनी कमी रहती है कि वे अपने मातहत आने वाले बड़े अफसरों के राय-मशविरे के मोहताज रहते हैं, नीतियां बनाने में भी नेताओं को अफसरों की मदद लगती है। इसके अलावा एक बड़ी बात जिसने हिन्दुस्तान में सरकारी कामकाज को तबाह किया है, वह नेताओं की भ्रष्टाचार की चाहत है, जिसके चलते हुए वे अपने अफसरों के साथ गिरोहबंदी में लग जाते हैं, और पार्टनरशिप फर्म की तरह साझा कमाई में हिस्सा बांटा होने लगता है। जब ऐसी नौबत आ जाती है तो अफसरशाही और बेलगाम हो जाती है क्योंकि रिश्वत और कमीशन खाने-कमाने के तरीके उन्हें नेताओं से ज्यादा आते हैं।
हिन्दुस्तान में सत्ता के बेजा इस्तेमाल का हाल इतना खराब है कि देश की राजधानी में बड़े से सरकारी स्टेडियम में अपने-अपने खेल की प्रैक्टिस कर रहे सैकड़ों खिलाडिय़ों को सात बजे के पहले हर हाल में बाहर करके अफसर परिवार अपना कुत्ता घुमाता है, और आधी-अधूरी प्रैक्टिस छोडक़र खिलाडिय़ों को चले जाना पड़ता है। ऐसा राज्यों में भी अधिकतर जगहों पर होता है जहां अफसर पूरी तरह बेलगाम रहते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में जहां गरीब आदिवासी बसते हैं, वहां पर एक आईएफएस ने अपने सरकारी बंगले में सरकारी पैसे से स्वीमिंग पूल बनवा लिया था, जिसका खूब हंगामा हुआ, जांच का भी नाटक किया गया, लेकिन अफसर का कुछ भी नहीं बिगड़ा। प्रदेश के अधिकतर बड़े अफसर एक की जगह आधा-आधा दर्जन तक गाडिय़ां रखते हैं, बड़े बंगलों में दर्जनों सिपाही-कर्मचारी बेगारी करते हैं, और ऐसे हर छोटे कर्मचारी का सरकार पर बहुत बड़ा बोझ रहता है। अधिकतर बड़े अफसर अपनी तनख्वाह से कई गुना अधिक का बोझ सरकार पर डालते हैं, और बंगलों के रख-रखाव के अलावा कहीं सिपाही और कर्मचारी सब्जियां उगाने का काम करते हैं, कहीं कुत्ता घुमाते हैं, और कहीं बच्चों को खिलाते हैं।
केन्द्र सरकार ने दो आईएएस अफसरों की इस तरह सजा वाली पोस्टिंग करके एक अच्छी मिसाल कायम की है, और राज्यों को भी इससे सीखना चाहिए। अखिल भारतीय सेवाओं का पूरा ढांचा पूरे देश में एक जैसी कार्य संस्कृति के लिए भी बना है, और वह बीते दशकों में धीरे-धीरे धराशाही होते रहा। बहुत से जानकार लोगों का यह भी मानना है कि यह प्रशासनिक ढांचा अंग्रेजों के वक्त काले हिन्दुस्तानियों पर राज करने के लिए तो ठीक था, लेकिन अब यह काउंटर प्रोडक्टिव हो गया है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम नौकरशाही की सबसे ताकतवर कुर्सी, जिला कलेक्टरी का नाम बदलने की वकालत करते आए हैं। अब कलेक्टर कुछ कलेक्ट नहीं करते हैं, बल्कि राज्य की और केन्द्र की कमाई को जिलों में खर्च करने का काम करते हैं। इसलिए कलेक्टर या जिलाधीश पदनाम को बदलकर जिला जनसेवक नाम रखना चाहिए ताकि नाम की तख्ती से उनकी सोच पर भी फर्क पड़ सके। आज उनका रूतबा इस नाम और उसके साथ जुड़ी हुई ताकत की वजह से बने रहता है, और इस सामंती ढांचे को तोडऩे की जरूरत है। जब कलेक्टरों का नाम जिला जनसेवक रहेगा, तो वे अस्पताल में बीमारों को देखते हुए उनके पलंग पर अपने जूते वाले पैर रखना भूल जाएंगे। लोगों को यह अहसास लगातार कराने की जरूरत रहती है कि उनका काम क्या है और उनकी जिम्मेदारी क्या है। राज्य सरकारें अपने स्तर पर भी अफसरों के पदनाम बदल सकती हैं, और इसमें देर नहीं करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लगातार गांव-गांव का दौरा कर रहे हैं, और उनके भी देखने में आया होगा कि कई जगहों पर कलेक्टर बहुत बददिमागी से काम करते हैं। इसलिए इस एक कुर्सी के नाम और काम में इतनी सारी ताकत बनाए रखना सही नहीं है। दिल्ली में एक अखबार की रिपोर्टिंग से इस आईएएस जोड़े की बददिमागी सामने आई है, लेकिन देश भर में इस बददिमागी को खत्म करने की जरूरत है।
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हिन्दुस्तान का सोशल मीडिया नफरत और मोहब्बत के बीच जीता है। और इनके बीच भी वह मोटेतौर पर सिरों पर ही जीता है, इन दोनों के बीच का हिस्सा अमूमन खाली रहता है। इसलिए अभी जब ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सैकड़ों छात्र-छात्राओं के सवालों के बीच राहुल गांधी अकेले जवाब देते बैठे थे, तो भी उनके जवाबों को लेकर हिन्दुस्तान में उनसे नफरत करने वाले लोग टूट पड़े हैं। राहुल गांधी के सामने कोई चुनिंदा पत्रकार पहले से तय सवालों की लिस्ट लेकर नहीं बैठा था, बल्कि सभी किस्म के असुविधाजनक सवाल करने वाले छात्र-छात्राओं की वहां भीड़ थी, और वे छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य जंगल के कटने को लेकर भी राहुल गांधी को घेर रहे थे, जो कि आज कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी असुविधा का सवाल है क्योंकि इससे उसकी दो राज्य सरकारें जुड़ी हुई हैं, और कांग्रेस के पास आज यही दो राज्य हैं भी। सवाल-जवाब के ऐसे खुले दौर में जब राहुल गांधी को व्यक्तिगत त्रासदी से जुड़े हुए सवालों का भी सामना करना पड़ा, और ऐसे एक सवाल के जवाब में जब वो कुछ देर चुप रहे, तो उस चुप्पी का भी हिन्दुस्तान में उनसे नफरत करने वाली भीड़ ने मजाक उड़ाया है। एक विरोधी विचारधारा के नेता का मजाक उड़ाने में कुछ भी अटपटा नहीं है, लेकिन जब व्यक्तिगत और पारिवारिक त्रासदी से जुड़ी बातों पर किसी को जवाब देने में कुछ वक्त लगता है, तो उस तकलीफ को भी न समझकर, उसकी खिल्ली उड़ाना इंसानियत के उसी घटिया दर्जे का सुबूत है, जिसके नमूने आज हिन्दुस्तानी सडक़ों पर झंडे-डंडे लिए बहुतायत से दिखते हैं।
राहुल गांधी से पूछा गया था कि वे भारतीय समाज में हिंसा और अहिंसा के बीच उलझन को किस तरह देखते हैं? सवाल पूछने वाली शिक्षिका ने यह भी जिक्र किया था कि राहुल की पीढ़ी में हिंसा का एक अहम रोल रहा है, और उनके मामले में यह व्यक्तिगत भी है, अभी-अभी उनके पिता, राजीव गांधी, की बरसी गुजरी है। इस सवाल के जवाब में राहुल कुछ पल चुप रहे, और फिर उन्होंने कहा- ‘मुझे लगता है, जो शब्द दिमाग में आता है, वह क्षमा करना है। हालांकि वह सबसे सटीक शब्द नहीं है।’ इसके बाद राहुल चुप हो गए, और कुछ लोगों ने इस पर तालियां बजाईं, राहुल ने यह भी कहा कि वो अभी भी कुछ सोच रहे हैं। उन्होंने इसके बाद अपने पिता के निधन का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी जिंदगी में वह सबसे बड़ी सीख देने वाला अनुभव था, और कहा कि इस घटना ने उन्हें वो चीजें भी सिखाई हैं जो कि वे किसी भी और परिस्थिति में कभी नहीं सीख सकते थे।
राहुल गांधी से किया गया सवाल उनके पिता की आतंकी हत्या से जुड़ा हुआ था, और यह भी याद रखने की जरूरत है कि बहुत कम उम्र में ही उन्होंने अपनी दादी के गोलियों से छलनी शरीर को देखा था, जिसे उन अंगरक्षकों ने ही छलनी किया था जिनके साथ राहुल उसी घर में क्रिकेट भी खेला करता था। हिन्दुस्तान में और ऐसे कितने लोग होंगे जिन्होंने अपने बचपन से जवानी के बीच अपनी दादी और पिता दोनों की आतंकी हत्या देखी होगी? ऐसे कितने लोग होंगे जिन्होंने परिवार के दो लोगों को इस तरह खोने के अलावा पिता के नाना का आजादी की लड़़ाई में बरसों जेल में रहना जाना होगा? और ऐसे राहुल से जब सवाल-जवाब के एक खुले दौर में उनके पिता की मौत के जिक्र के साथ हिंसा और अहिंसा पर सवाल किया जाए, और जवाब देते हुए वे कुछ चुप रहें, और उस चुप्पी का मखौल बनाया जाए, तो खिल्ली उड़ाने वाले ऐसे लोगों को कुछ देर शांत बैठकर अपने परिवार में ऐसी त्रासदी की कल्पना करना चाहिए, और फिर खुद के बारे में सोचना चाहिए कि क्या इनके लिए उसके बाद ऐसे किसी सवाल का जवाब देना आसान रहेगा? अपने पिता के हत्यारों को माफ कर देना आसान रहेगा?
आज हिन्दुस्तान में जिस तरह लोग एक धर्म के लिए, एक विचारधारा के लिए, और एक नेता के लिए बुनियादी मानवीय कहे जाने वाले मूल्यों को भी जिस तरह नाली में फेंक चुके हैं, उससे यह हैरानी होती है कि क्या यह देश सचमुच महान है? क्या ये महानता के सुबूत हैं कि लोग देश की बड़ी त्रासदी रहने वाली शहादतों का नुकसान झेलने वाले परिवारों के त्रासद पलों की खिल्ली उड़ाना भी अपनी जिम्मेदारी मानते हैं? जिस देश की संस्कृति महानता के कई पैमाने गढ़ती थी, आज वहां हैवानियत कही जाने वाली सोच इस तरह, इस हद तक सिर चढक़र बोल रही है कि लोग देश के शहीदों का मजाक उड़ा रहे हैं, उनके परिवारों की खिल्ली उड़ा रहे हैं, और शहादत की वजह बनी हुई हिंसा की चर्चा को लेकर ही अपनी ऐसी हिंसक सोच दिखा रहे हैं। यह सिलसिला इस देश के जिम्मेदार, सरोकारी, और लोकतांत्रिक लोगों को डूब मरने जैसी हीनभावना देता है कि अपनी जिंदगी में इस लोकतंत्र और इस समाज का ऐसा हिंसक संस्करण देखना भी बाकी था?
आज हिन्दुस्तान में विचारहीन जुबानी हिंसा में पेशेवर अंदाज में जुटे हुए भाड़े के ट्वीटरों या नफरत के आधार पर बिना भुगतान समर्पित भाव से काम करने वाले ट्वीटरों का सैलाब आया हुआ है। यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि इनमें मजदूर कितने हैं, और स्वयंसेवक कितने हैं। लेकिन आज की यह फौज आने वाली पीढ़ी को घर-दुकान, कारोबार से परे सबसे बड़ी विरासत नफरत की देकर जा रही है, और आने वाली कई पीढिय़ां इसकी फसल काटने को मजबूर रहेंगी। एक ऐसा नौजवान या अधेड़, जो कि हर किसी के हर सवाल का जवाब देने मौजूद रहता है, जो सार्वजनिक मंचों पर बागी तेवरों वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के सवालों से भी मुंह नहीं चुराता है, उसका मखौल कौन लोग उड़ा रहे हैं, उन्हें आईने में खुद को भी देखना चाहिए।
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-सुनील कुमार
अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा क्रांतिकारी आदेश दिया है जिससे हिन्दुस्तान में वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की लंबे समय से चली आ रही एक सोच को शक्ल मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने देश की पुलिस को हिदायत दी है कि बालिग और सहमति से यौन संबंध बनाने वाले सेक्सकर्मियों के काम में दखल न दे। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस को इनके खिलाफ जुर्म भी दर्ज नहीं करना चाहिए। तीन जजों की एक बेंच ने वेश्यावृत्ति को एक पेशा मानते हुए कहा कि कानूनन इस पेशे को भी इज्जत और हिफाजत मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के बुनियादी हक का जिक्र करते हुए कहा कि पेशा चाहे जो हो, देश में हर व्यक्ति को संविधान इज्जत की जिंदगी जीने का हक देता है, और दूसरे किसी भी नागरिक की तरह यौनकर्मी भी समान रूप से हिफाजत के हकदार हैं। अदालत ने यह भी साफ किया है कि अगर किसी वेश्यालय पर छापा मारा जाए तो वेश्याओं को गिरफ्तार या दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
वेश्या नाम से ही नफरत करने वाली आम मर्दाना हिन्दुस्तानी सोच, और हिन्दुस्तान के एक गढ़े हुए फर्जी इतिहास के दावेदारों को सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से भारी सदमा लगेगा। अब तक कोई वेश्या अपना बदन बेचकर जितनी कमाई करती थी, उसका एक बड़ा हिस्सा चकलाघर चलाने वाले लोग, दलाल, और पुलिस के लोग ले जाते थे। उसके बदन पर पलते कई लोग थे, लेकिन गालियां महज उसका बदन पाता था। आज जब लोग देश को बेच रहे हैं, सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए ईमान को बेच रहे हैं, दूसरे पेशों और धंधों में लगे हुए लोग हर नीति-सिद्धांत को बेच रहे हैं, वहां गाली खाने लायक बिक्री महज एक वेश्या की देह मानी जाती है। और इसी का नतीजा है कि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अरसा पहले सेक्सकर्मियों को लेकर सिफारिशें देने के लिए एक पैनल बनाया था, और अभी उस पैनल की सिफारिशें आने पर केन्द्र सरकार की राय लेकर कुछ सिफारिशों पर आदेश जारी किया है, और कुछ दूसरी सिफारिशों पर केन्द्र की असहमति देखते हुए उन पर केन्द्र सरकार से छह हफ्ते में जवाब मांगा है।
यह फैसला हिन्दुस्तान के नागरिकों के बीच समानता को कुचलने वाले बूट को हटाने वाला दिख रहा है। हम इस अखबार में बीते बरसों में कई बार वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की वकालत करते आए हैं, और कल सुप्रीम कोर्ट ने ठीक वही किया है। अभी इस पर आखिरी फैसला नहीं आया है, लेकिन जिन सीमित बातों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ आदेश सभी राज्यों और केन्द्र प्रशासित प्रदेशों को दिया है, वह क्रांतिकारी है। वह समाज के सबसे अधिक कुचले हुए, और सबसे अधिक शोषित तबके को इंसानी हक देने वाला है। सुप्रीम कोर्ट जजों ने यह साफ किया है कि किसी वेश्यालय पर छापा मारा जाए तो भी किसी सेक्स वर्कर को गिरफ्तार, दंडित, परेशान, या पीडि़त नहीं करना चाहिए, क्योंकि सिर्फ वेश्यालय चलाना अवैध है, वेश्यावृत्ति नहीं। इसलिए कार्रवाई सिर्फ वेश्यालय चलाने वाले पर की जाए। अदालत ने इस मामले में दो बड़े सीनियर वकीलों को न्यायमित्र नियुक्त किया था, और उनकी इस सिफारिश को भी अदालत ने माना है कि अधिकारी किसी वेश्या को उसकी मर्जी के खिलाफ लंबे समय तक सुधारगृह में रखते हैं, और यह सिलसिला गलत है। अदालत ने यह सुझाया है कि मजिस्ट्रेट के सामने पेश की गई सेक्स वर्कर अपनी मर्जी से यह काम कर रही है या किसी दबाव में, यह तुरंत ही तय किया जा सकता है, और उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ किसी सुधारगृह में रखना गैरकानूनी है।
जब देश की संसद कड़वे फैसले लेने से कतराती हो, जब राजनीतिक दल देश के झूठे गौरव का गुणगान करके अपनी दुकान चलाते हों, तब संसद के हिस्से के कई काम अदालतों को करने पड़ते हैं। वेश्यावृत्ति को लेकर अदालत का यह आदेश, और उसका रूख इसी बात का सुबूत है। देश के एक इतने खुले हुए सच के अस्तित्व को ही मानने से तमाम सत्तारूढ़ ताकतें जिस हद तक परहेज करती हैं, उसे देखना हक्का-बक्का करता है। इस देश में वेश्या शब्द की मौजूदगी को ही नकार देने का मतलब उन्हें मुजरिमों, दलालों, और पुलिस के हाथों शोषण का शिकार करने के लिए छोड़ देने के अलावा कुछ नहीं है। जिस समाज में कोई महिला अपनी पसंद या बेबसी के चलते अपनी देह बेच रही है, उसे खरीदने को तो पूरी मर्द-जमात खड़ी है, लेकिन फारिग हो जाने के बाद उन्हें इंसान भी मानने से इंकार कर देने की मर्दानी सोच इस देश पर हावी है। इसलिए यह लोकतांत्रिक फैसला लेने का फख्र संसद को हासिल नहीं हो पाया, अदालत को हासिल हुआ है। इस देश की संसद, और उसे हांक रही सरकार अभी कुदाली लेकर डायनासॉर की हड्डियों तक पहुंचने की खुदाई में लगी हुई है, इसलिए 21वीं सदी के 22वें बरस की हकीकत का सामना करने का काम अदालत को करना पड़ रहा है।
इस फैसले से हिन्दुस्तान की पुलिस को एक सदमा लगेगा क्योंकि अभी तक देह के धंधे को जुर्म बनाने का उसका आसान सिलसिला खत्म हो गया है। किसी होटल या किसी घर में साथ रहने वाले दो बालिग लडक़े-लडक़ी या आदमी-औरत को परेशान करने के लिए उन पर कई बार ऐसा जुर्म कायम कर दिया जाता था, और यह आसान हथियार अब उसके हाथ से निकल गया है। हम अदालत के इस आदेश और इस रूख की तारीफ करते हैं, और यह उम्मीद करते हैं कि वेश्याओं के पुनर्वास के लिए, उनके नाबालिग बच्चों की भलाई के लिए जिन मुद्दों पर अभी फैसला आना बाकी है, उन मुद्दों पर देश के इस सबसे बेजुबान तबके को उसका जायज हक मिलेगा। भारतीय लोकतंत्र को यह आत्मविश्लेषण भी करना चाहिए कि क्यों उसकी संसद, और सरकार अपनी जिम्मेदारी से इस हद तक मुंह चुराती हैं कि अदालत को आगे आकर नागरिकों को उनका बुनियादी हक दिलाना पड़ता है?
हिन्दुस्तान में कभी देश की सरकार तो कभी किसी प्रदेश की सरकार को लेकर राजनीतिक स्थिरता पर बातचीत होती है। पश्चिम बंगाल में हिन्दुस्तान की सबसे लंबी वाममोर्चा सरकार तीन दशक से अधिक तक लगातार चली थी। अभी हाल तक छत्तीसगढ़ में बीजेपी की डॉ. रमन सिंह सरकार पन्द्रह बरस चली थी, और कुछ दूसरे राज्यों में किसी एक पार्टी या एक मुख्यमंत्री की सरकार इससे भी अधिक समय तक चली हैं। सरकार की लंबाई एक बात होती है, और सरकार का संसदीय बाहुबल एक दूसरी बात होती है। इस देश में कुछ पार्टियों का संसदीय बाहुबल देश या प्रदेश की सरकारों को चलाने के लिए जरूरत से खासा अधिक था, और वैसे में संसदीय कामकाज पर इस अतिरिक्त बाहुबल का कैसा असर पड़ता है, यह सोचने की बात है।
जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की सहानुभूति लहर के चलते उन्हें कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा संसदीय बाहुबल मिला था। वह सरकार विशुद्ध कांग्रेस की सरकार थी, किसी साथी दल की कोई जरूरत नहीं थी, और उसी का नतीजा था कि शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए राजीव सरकार ने एक संविधान संशोधन किया था जो कि मुस्लिम कट्टरपंथी मर्दों को तो खुश करने वाला था, लेकिन जिसने मुस्लिम महिला के हक पर लात मारी थी। उस वक्त तो फिर भी संसद में इस मुद्दे पर खासी बहस हो गई थी, और अलग-अलग पार्टियों और विचारधाराओं को बोलने का मौका मिला था। लेकिन अभी की मोदी सरकार में जब तीन कृषि कानून बनाए गए, तो उन पर कोई सार्थक चर्चा नहीं होने दी गई, और एनडीए सरकार के भीतर भी भाजपा ने महज अपने ही बाहुबल से इन विधेयकों को कानून बनवा दिया, और इस मुद्दे पर गठबंधन छोडऩे वाले अपने एक सबसे पुराने साथी, अकाली दल के अलग होने से भी भाजपा की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि गठबंधन सरकार के भीतर भी भाजपा अकेली ही सरकार बनाने की गिनती रखती थी।
समय-समय पर देश की संसद ने, और कभी-कभी राज्यों की विधानसभाओं ने भी ऐसे मौके दर्ज किए हैं जब व्यापक जनहित और महत्व वाले विधेयकों को बिना जरूरी चर्चा के बाहुबल के ध्वनिमत से पारित करा दिया गया। लोकतंत्र में संसद को बनाया इसलिए गया है कि वहां पर सरकार से सवाल पूछे जा सकें, देश-प्रदेश के हालात पर जानकारी मांगी जा सके, सरकार को जहां अपने बजट को सामने रखकर लोगों को सरकारी खर्च की योजना बताई जा सके, और कमाई के तरीके गिनाए जा सकें। इसके अलावा जब कभी कोई नए विधेयक आते हैं, संविधान संशोधन की जरूरत रहती है, तो अलग-अलग प्रदेशों, अलग-अलग पृष्ठभूमि, अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा से आए हुए सांसदों की बात को सुना और समझा जा सके, तब उसके बाद कोई नया कानून बनाया जाए, या पुराने को बदला जाए। देश भर से आए हुए सैकड़ों सांसदों की राय सुनना संसदीय लोकतंत्र की एक बुनियाद है, और इस बुनियाद के बिना जब कोई इमारत खड़ी की जाती है, तो एक आंदोलन की आंधी से वह उसी तरह गिर सकती है जिस तरह कृषि कानून औंधे मुंह गिरे।
संसदीय बाहुबल की अधिकता का एक बड़ा खतरा यह रहता है कि सत्तारूढ़ पार्टी किसी संसदीय फैसले के लिए किसी भी असहमति को सुनने को मजबूर नहीं रहती, उसे किसी को सहमत कराने की जरूरत नहीं रहती, और वह संसद के भीतर ठीक उसी तरह कोई कानून बना या बिगाड़ सकती है जिस तरह वह अपनी पार्टी की बैठक के भीतर कोई मनमाना फैसला ले सकती है। यह सिलसिला बहुत तानाशाह और खतरनाक तो है ही, इससे संसदीय व्यवस्था का एक सीधा-सीधा नुकसान भी होता है। जिन लोगों ने राजनीति और सामाजिक जीवन में दशकों गुजार दिए हैं, ऐसे लोगों से संसद भरी रहती है। ये लोग हर दिन सैकड़ों लोगों से मिलते हैं, और अलग-अलग मुद्दों पर जनता की राय से वाकिफ रहते हैं। वैसे तो भारत के मौजूदा संसदीय कानून के मुताबिक सभी सांसद या विधायक अपनी पार्टी के फैसलों से बंधे रहते हैं, और उन्हें किसी भी मुद्दे पर अपनी पार्टी के हुक्म के मुताबिक ही वोट डालना होता है, वरना उनकी सदस्यता खतरे में रहती है। लेकिन ऐसी सीमाओं के भीतर भी सांसदों की निजी सोच, उनके निजी तजुर्बे बहस में सामने आते हैं, और एक-एक सांसद बीस-तीस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उनके मार्फत उनके इलाकों के लोगों की सोच संसद के रिकॉर्ड में आने की एक संभावना तो रहती ही है।
सदन में पार्टी व्हिप से बंधे सांसदों का एक नुकसान देश के संसदीय लोकतंत्र को यह होता है कि वे पार्टी की घोषित सोच से परे शायद ही कुछ बोल पाते हैं। ऐसे में देश की जनता के बीच से चुनाव की अग्निपरीक्षा से होते हुए जो सांसद संसद में पहुंचते हैं, वे अपनी मौलिक बातें वहां बहुत कम कर पाते हैं। उन्हें पार्टी की तरफ से पहले से बता दिया जाता है कि किस मुद्दे पर क्या कहना है। इस तरह देश के सबसे चुनिंदा दिल-दिमागों का मौलिक योगदान संसद और लोकतंत्र को बहुत कम मिल पाता है। पार्टी अनुशासन के नाम पर भारतीय संसदीय व्यवस्था में सांसदों को इस तरह बांध दिया जाता है कि लोकतंत्र में विचारों की जो विविधता होनी चाहिए, वह महज पार्टियों की विविधता तक सीमित रह जाती है। एक तो निजी सोच का खुलकर सामने आना बहुत कम रह गया है, और फिर पार्टियों के बीच किसी मुद्दे पर बहस भी गैरजरूरी मान ली गई है क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी बिना बहस भी किसी विधेयक को पास कराने का बाहुबल रखती है।
भारत के ताजा इतिहास के जानकार लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या अपने भीतर जरूरत से अधिक कड़े अनुशासन वाली पार्टी संसदीय विचार-विमर्श में कम योगदान देने वाली पार्टी भी हो जाती है? दूसरी बात यह कि क्या किसी पार्टी या गठबंधन की जरूरत से अधिक मजबूती पूरी संसद में ही किसी विचार-विमर्श को हाशिए पर धकेल देती है? और चूंकि हिन्दुस्तान ऐसे एक से अधिक दौर देख चुका है जहां सांसदों या पार्टियों की बातों को अनसुना करना किसी दिक्कत की बात नहीं रह गई है, इसलिए ऐसे तरीकों के बारे में सोचना चाहिए कि सांसदों की निजी सोच को देश की बहस की मेज पर किस तरह लाया जा सकता है? पार्टियां इस बात को शायद ही पसंद करें, क्योंकि वे सदन के भीतर अपने सदस्यों को निर्वाचित जनप्रतिनिधि की तरह देखना नहीं चाहतीं, बल्कि पार्टी के एक अनुशासित सिपाही की तरह देखना चाहती हैं। इस तरह जनता के प्रति सांसद की जवाबदेही खत्म हो जाती है, और वह पार्टी के प्रति सौ फीसदी अनुशासन की नौबत बन जाती है। ऐसे में क्या संसद के बाहर एक समानांतर बहस के बारे में सोचा जा सकता है? या फिर पार्टियों का अनुशासन ऐसी भी किसी बात को होने नहीं देगा? लोकतंत्र के भीतर हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर सोच की विविधता वाली बहस का जो महत्व होना चाहिए, वह किसी गठबंधन की सरकार में विपक्ष के वोटों की जरूरत के बीच तो कायम रह सकता है, लेकिन अंधाधुंध गैरजरूरी बाहुबल रहने पर उसकी संभावना शून्य हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र इसका क्या रास्ता निकाल सकता है?
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पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक बवंडर में फंसी हुई दिख रही है। जाहिर तौर पर रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद दोनों के बीच छिड़ी जंग एक बड़ी वजह है क्योंकि ये दोनों ही देश गेहूं, खाने के तेल, मक्का, रासायनिक खाद के अलावा भी बहुत सी चीजों के बड़े निर्यातक देश थे, और आज यूक्रेन के बंदरगाहों पर अनाज फंसा हुआ है, गोदाम भरे हुए हैं, लेकिन जंग के चलते जहाजों की आवाजाही बंद है। एक अंदाज यह है कि यूक्रेन से चालीस करोड़ लोगों को अनाज पहुंचता था, जो कि अब बंद है, और यह जंग कब तक चलेगी इसका कोई ठिकाना भी नहीं है। दुनिया की अर्थव्यवस्था के बवंडर में फंसने की एक-दो और वजहें भी हैं। कोरोना की महामारी, और उससे जुड़े लॉकडाउन के चलते दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था चौपट हुई है, और श्रीलंका-पाकिस्तान सहित सत्तर ऐसे देश हैं जो अपनी किस्त चुकाने की हालत में नहीं हैं। इसके ऊपर यह मुसीबत भी आ खड़ी हुई है कि चीन ने कोरोना को लेकर जितने कड़े लॉकडाउन की नीति अपनाई है, उसका सबसे बड़ा कारोबारी शहर, शंघाई हफ्तों से पूरे लॉकडाउन में चल रहा है, और चीन से कारोबारी संबंधों वाले देशों पर भी बुरा असर पड़ा है क्योंकि वहां से कच्चा माल और पुर्जे निकलना बुरी तरह प्रभावित हुआ है, और जाने कब तक यह जारी रहेगा। एक अर्थशास्त्री के मुताबिक ऐसी ही बाकी सारी मुसीबतों के बीच में क्रिप्टोकरेंसी का बाजार भी चौपट हो गया है, और उसमें भी बहुत से कारोबारी डूब सकते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान पूरी दुनिया में बढ़ती हुई महंगाई के साथ-साथ उसकी मार खा रहा है, और लोगों के लिए रोज की जिंदगी जीना भी मुश्किल हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े एक अलग बात रहते हैं क्योंकि वे अम्बानी-अडानी और बेरोजगारों की कमाई को मिलाकर उसका एक औसत पेश करते हैं, और इन आंकड़ों में हिन्दुस्तान अभी बहुत बुरी हालत में नहीं दिख रहा है, कम से कम दुनिया के और देशों के मुकाबले वह ठीक-ठाक हालत में दिख रहा है।
लेकिन इस तस्वीर को समझते हुए यह भी देखने की जरूरत है कि दुनिया के बहुत से देश कुपोषण और भुखमरी के इस बुरी तरह शिकार हैं, कि वे उसी से नहीं उबर पा रहे हैं, इसलिए वैसे देशों के साथ हिन्दुस्तान की तुलना जायज नहीं होगी, जो कि अपने आपको विकासशील देशों से ऊपर मानता है। दूसरी तरफ दुनिया के बहुत से विकसित और संपन्न देशों की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि वहां के सबसे गरीब लोग भी हिन्दुस्तान के गरीब लोगों के मुकाबले बिल्कुल ही अलग दर्जे के हैं, और वहां सबसे गरीब और बेरोजगार भी ऐसी दिक्कतें नहीं झेलते हैं जैसी कि हिन्दुस्तान में ऐसे तबकों के लोग झेलते हैं। इसलिए अर्थव्यवस्थाओं और देशों की तुलना आसान नहीं है, और पिछले दो-तीन बरस में उनमें क्या तुलनात्मक फर्क पड़ा है, उसे भी महज आंकड़ों से समझ पाना मुश्किल है। हिन्दुस्तानी गरीब इतने गरीब हैं कि उनकी कमाई में पचीस फीसदी की गिरावट उनका एक वक्त का खाना छीन सकती है। आज हिन्दुस्तान में विदेशी मुद्रा के भंडार में रिकॉर्ड गिरावट आई है, और रूपये की डॉलर के मुकाबले कीमत इतिहास में सबसे कम हो गई है। इन दो बातों से आयात और निर्यात दोनों पर फर्क पड़ रहा है, और यह फर्क नीचे गरीब तक और अधिक पड़ रहा है, अमीरों की रोटी पर तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है।
लेकिन पूरी दुनिया में चल रहे ऐसे बवंडर के बीच हिन्दुस्तान अपने कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर अपने आपमें मस्त है कि जिसे देखकर हैरानी और दहशत दोनों ही होते हैं। जिस देश के पास बिना सरकारी रियायती अनाज के दो वक्त पेट भरने का तरीका नहीं है, उस देश को सरकारी गेहूं-चावल से बांधकर रखा गया है, और उसे सौ-दो सौ बरस पहले ले जाकर बिठा दिया गया है। जिस तरह कम्प्यूटरों के ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर को पहले की किसी तारीख पर भी सेट किया जा सकता है, ताकि उसके बाद के जो फेरबदल नापसंद हैं, उनसे पीछा छूट जाए, कुछ वैसा ही आज हिन्दुस्तान में हो रहा है। सरकारी मुफ्त अनाज नहीं मिलेगा तो कल का खाना कहां से बनेगा, जहां पर ऐसा अनिश्चित भविष्य हो, वहां एक काल्पनिक भूतकाल को प्रमाणिक मानकर बहुसंख्यक आबादी को विज्ञान कथाओं की तरह टाईम-ट्रैवल करवाया जा रहा है। हिन्दुस्तान के इतिहास में एक ऐसा दौर बताया जाता है जब यहां के राजा रास-रंग में डूबे हुए थे, महलों को बनाने और नर्तकियों को नचवाने के शगल से उन्हें फुर्सत नहीं थी, और वैसे में ही विदेशी हमलावर आकर यहां काबिज हो गए थे। हिन्दुस्तान में आज राजकाज इतिहास के चुनिंदा और पसंदीदा गड़े मुर्दों को उखाडक़र एक ऐसे इतिहास को फैलाने के शगल में डूबा हुआ है जिससे न भविष्य का कोई लेना-देना है, न वर्तमान का। एक वक्त कार्ल मार्क्स ने लिखा था कि धर्म अफीम की तरह इस्तेमाल की जाती है, उनकी विचारधारा वाली पार्टियां चाहे आज चुनाव हार रही हों, उनकी यह बात सही साबित हो रही है। जिस तरह किसी बहुत जख्मी या किसी बड़ी बीमारी की तकलीफ से गुजरते हुए इंसान को दर्द भुलाने के लिए नशे के इंजेक्शन लगाए जाते हैं, उसी तरह आज हिन्दुस्तान में लोगों को उनकी मौजूदा तकलीफें भुलाने के लिए, कल की अनिश्चितता का आभास न होने देने के लिए, और आने वाले परसों की प्राथमिकता की तरफ से बेफिक्र रखने के लिए इस अफीम का इस्तेमाल किया जा रहा है। हिन्दुस्तानी बहुसंख्यक आम लोगों को इस अफीम के चलते, इस अफीम से बने हुए एक काल्पनिक इतिहास के चलते तमाम दुख-दर्द से मुक्ति मिल गई है। इस मायने में हिन्दुस्तान दुनिया के बाकी तकलीफजदा देशों से बिल्कुल ही अलग है, क्योंकि धर्म का ऐसा इस्तेमाल तो धर्म आधारित राज वाले हिन्दू या मुस्लिम, या ईसाई देशों में भी नहीं हो रहा है। इतिहास के आटे से बनी रोटी, सदियों पहले ऊगी सब्जी के साथ परोसकर लोगों को तृप्त कर दिया जा रहा है, और बहुसंख्यक जनता का धर्मान्ध हिस्सा डकार भी ले रहा है। ऐसा लगता है कि हकीकत के कुपोषण के शिकार हो जाने तक इस तबके की यह खुशफहमी जारी रहेगी कि वह खा-खाकर अघा रहा है, और उसे अपचन भी हो रहा है, और सोशल मीडिया के मुताबिक उसके लिए हाजमोला लेना प्रतिबंधित भी है क्योंकि उसमें हज भी है, और मौला भी है।
हिन्दुस्तान में एक ऐसे जानवर की बात बहुत से मुस्लिम इलाकों में कही जाती है जो कि कब्र तक सुरंग बनाकर दफनाई हुई लाशों को खाकर अपना काम चलाता है, उसे कबरबिज्जू कहा जाता है। दफनाए हुए इतिहास को खाकर जिंदा रहने वाले जानवरों को पता नहीं कौन सा बिज्जू कहा जाएगा।
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देश में यह बहस चल रही है कि किस तरह बहुसंख्यक आबादी के मुकाबले अल्पसंख्यक आबादी बढ़ते चल रही है, और कितने दशक में वह आज की बहुसंख्यक आबादी को पार कर जाएगी। इसे देश के भीतर आज के अल्पसंख्यकों में अधिक प्रजनन दर से भी जोडक़र देखा जा रहा है, और देश की सरहद के पार से आकर वैध या अवैध रूप से बसने वाले लोगों की वजह से बढ़ती हुई आबादी भी माना जा रहा है। इन दोनों ही मिलीजुली वजहों से ऐसा अंदाज लगाया जा रहा है कि आज की बहुसंख्यक आबादी 2045 तक बहुसंख्यक नहीं रह जाएगी, वह आधे से कम रह जाएगी, वह सबसे बड़ा तबका तो रहेगी, लेकिन बाकी तमाम तबके मिलकर उससे अधिक आबादी के हो जाएंगे। आबादी की शक्ल बदलने के इस अंदाज को एक राजनीतिक साजिश भी करार दिया जा रहा है, और यह व्याख्या फैलाई जा रही है कि वोटों को पाने के लिए कुछ राजनीतिक ताकतें, पार्टियां सोच-समझकर एक साजिश की तरह यह काम कर रही हैं, और आज के अल्पसंख्यक समुदायों को बढ़ावा दे रही हैं, और वैसे ही समुदायों के लोगों को अवैध रूप से या वैध रूप से देश में घुसा भी रही हैं।
जिन लोगों को यह लग रहा होगा कि आज हम भारत की यह चर्चा क्यों कर रहे हैं, उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि यह हिन्दुस्तान नहीं, अमरीका के बारे में है। वहां पर श्वेत नस्लवादी समूहों के बीच, उनके द्वारा चारों तरफ यह व्याख्या बरसों से फैलाई जा रही है कि वहां के गोरे अमरीकियों के मुकाबले काले और दूसरे अश्वेत तबके बढ़ते जा रहे हैं, और वे आने वाले दशकों में गोरे अमरीकियों को बहुसंख्यक नहीं रहने देंगे। इस प्रोपेगंडा को इतने हिंसक तरीके से फैलाया जा रहा है कि अभी एक अठारह बरस के गोरे नौजवान ने इसी सिद्धांत को मानते हुए, इसी पर लिखी गई अपनी डायरी और अपने बयान को ऑनलाईन पोस्ट करते हुए, बंदूक और कैमरे से लैस होकर, ऑनलाईन लाईव प्रसारण करते हुए दस काले लोगों को मार डाला। अमरीका में इस सोच को रिप्लेसमेंट थ्योरी कहा जाता है, और यह गोरे नस्लवादी लोगों के लिए उनके सबसे बड़े धार्मिक ग्रंथ की तरह है। डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी इसी थ्योरी को बढ़ावा देते हुए गोरे अमरीकियों को एक करने में लगी रहती है, और इसी वजह से गोरे नस्लवादी हिंसक समूहों के बीच रिपब्लिकन पार्टी पसंदीदा तो है ही, इसके अधिक नस्लवादी नेता, डोनल्ड ट्रंप ऐसे हिंसक समूहों के आदर्श नायक भी रहे हैं। यहां यह समझने की जरूरत है कि हिंसक गोरे नस्लवादियों का यह विरोध एक समय काले लोगों के खिलाफ शुरू हुआ था, फिर वह सभी किस्म के गैरगोरों को निशाने पर लेकर चलते रहा, और अब तो उसने अमरीका में बसे हुए यहूदियों को बहुत बड़ा खतरा माना है, और वह उनके भी खिलाफ हिंसक तेवरों के साथ सोशल मीडिया, और सडक़ों पर बराबरी से लगा हुआ है।
अब एक गोरे नस्लवादी जवान ने हर अमरीकी को आसानी से हासिल भारी खतरनाक ऑटोमेटिक हथियार की सहूलियत का इस्तेमाल करके छांट-छांटकर एक काले इलाके में डेढ़ दर्जन लोगों को गोलियां मारी, और उसमें से दस लोग मारे गए, उस खतरे को हिन्दुस्तान जैसी जगह पर भी समझने की जरूरत है जहां पर हथियार इतनी आसानी से हासिल नहीं है। लेकिन लोगों को यहां पर हिंसक सोच को रखने और उससे गौरवान्वित हुए घूमने की आजादी हासिल है। लोगों को याद रखना चाहिए कि आजाद हिन्दुस्तान के पहले आतंकी नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की, तो उसे कई लोगों का साथ और सहयोग हासिल था। उसने भी एक साम्प्रदायिक नफरत की सोच लिए हुए इस देश के सबसे महान इंसान को मारा था। उस वक्त अमरीका में ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी लिखी भी नहीं गई थी, लेकिन वह नस्लवादी नफरत और हिंसा की शक्ल में जर्मनी के हिटलर से हासिल थी, और हिन्दुस्तान के भीतर भी उस सोच की एक मौलिक जगह थी। आज यह समझने की जरूरत है कि अमरीका में अठारह बरस का एक नौजवान दुनिया के सबसे अधिक मौकों वाले देश में नफरत के चलते जिस किस्म का हत्यारा बनने में गौरव हासिल कर रहा है, उस किस्म का हत्यारा बनने का गौरव हिन्दुस्तान में भी जगह-जगह देखने मिल रहा है। लोगों को याद होगा कि राजस्थान में एक मुस्लिम को जिंदा जलाकर मारने वाले ने उसका वीडियो बनाकर खुद ही फैलाया था, उसमें और इस अमरीकी नौजवान में फर्क सिर्फ ऑटोमेटिक रायफल की उपलब्धता का था। अभी दो दिन पहले मध्यप्रदेश में जिस तरह एक भाजपा नेता ने मुस्लिम होने के शक में एक मानसिक विचलित बुजुर्ग जैन को पीट-पीटकर मार डाला, उसकी सोच में अगर अमरीकी हथियार को जोड़ दिया जाए, तो वह भी धर्म के आधार पर दर्जन भर लोगों को मार डालने की मानसिकता तो रखता था।
हम हिन्दुस्तान के सिलसिले में इस बात को इसलिए उठा रहे हैं कि आज देश के करोड़ों नौजवानों को नस्लवादी नफरत से लैस किया जा रहा है। ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी उन्हें पढ़ाई जा रही है, बचपन से ही चुनिंदा स्कूलों में यह बात उनके दिमाग में भरी जा रही है, सोशल मीडिया पर भाड़े के लोगों से या समर्पित लोगों से इस थ्योरी का कीर्तन करवाया जा रहा है, और ढोल-मंजीरे पर झूमते हुए सिर इस थ्योरी से ब्रेनवॉश हुए चल रहे हैं। जिस तरह गोमांस के शक में मुस्लिमों, दलितों, और आदिवासियों को मारा जा रहा है, वह इसी थ्योरी का नतीजा है। अब यह समझने की जरूरत है कि जिन बड़े-बड़े नेताओं ने देश के करोड़ों अनपढ़ या शिक्षित, बेरोजगार या छोटी-मोटी नौकरी करने वाले नौजवानों को इस नस्लवादी हिंसा में झोंक दिया है, उनकी अपनी औलादें दुनिया की सबसे बड़ी या महंगी यूनिवर्सिटी से महंगी तालीम पाकर आती हैं, और हिन्दुस्तान या कहीं और करोड़ों कमाती हैं। झंडे-डंडे और त्रिशूल लेकर सडक़ों पर झोंकने के लिए इन नेताओं की औलादें मौजूद नहीं हैं क्योंकि वे उनके प्रति जिम्मेदार अपने मां-बाप की मेहनत से ऊंची पढ़ाई करके जिंदगी में ऊपर पहुंचने में लग गई हैं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तानी ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी पढ़-पढक़र सडक़ों पर नफरत का सैलाब फैलाने वाले लोग अमरीका के बफेलो में अभी दस काले लोगों को मारने वाले गोरे नौजवान की तरह ढलने के लिए तैयार हो रहे हैं।
हिन्दुस्तान में आज ऐसी हिंसक सोच, और शायद उसकी प्रतिक्रिया में पैदा होने वाली दूसरे तबकों की ऐसी ही हिंसक सोच को महज लाइसेंसी हथियार ही तो हासिल नहीं हैं, बाकी तो भीड़त्या करने के लिए उनके पास लाठियां ही काफी हैं, और काफी लाठियां हर जगह मौजूद हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि इस देश के भीतर और इस देश के बाहर कई किस्म के आतंकी संगठन काम कर रहे हैं, और ऐसे संगठन अमरीका की बंदूकों के मुकाबले अधिक बड़ा खून-खराबा करने के विस्फोटक हथियार लोगों को मुहैया करा सकते हैं, और पूरे देश में आबादी के बीच अगर मरने और मारने का ऐसा मुकाबला चल निकलेगा, धर्म के आधार पर हिंसा का सैलाब धमाकों का साथ पाने लगेगा, तो क्या होगा? आज जिन लोगों को अपने मजबूत मकानों में अपने को महफूज महसूसने की खुशफहमी है, वह खुशफहमी किसी एक धमाके से खत्म हो सकती है। हम अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे अनगिनत देशों में धर्मान्धता के चलते जैसे आत्मघाती विस्फोट देखते हैं जिनमें एक-एक में सौ-पचास लोग मारे जाते हैं, क्या हम इस देश को उस तरफ बढ़ाना चाहते हैं? इस लिखे हुए को कोई धमकी या चेतावनी मानना एक नासमझी होगी क्योंकि हम एक खतरे के अंदेशे के प्रति लोगों को सजग करना अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं। हिन्दुस्तान में यह नस्लवादी हिंसक धर्मान्धता का सिलसिला खत्म होना चाहिए, वरना यहां के कुछ नौजवान अमरीका के बफैलो के नौजवान से प्रेरणा पा सकते हैं, कुछ लोग अफगानिस्तान-पाकिस्तान के आत्मघाती दस्तों से प्रेरणा पा सकते हैं, और उस दिन देश में किसी तबके के कोई लोग सुरक्षित नहीं रह जाएंगे।
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मध्यप्रदेश में अभी एक विचलित बुजुर्ग को भाजपा के एक नेता, भाजपा पार्षद के पति ने पकड़ा। यह बुजुर्ग अपना नाम-पता भी नहीं बता पा रहा था, बहुत कमजोर और बीमार हालत, खाली हाथ किसी को कोई नुकसान पहुंचाए बिना बैठा था। परिवार से बिछड़ा हुआ विचलित इंसान, जाहिर है कि दाढ़ी कुछ उग आई होगी। उसे मुसलमान समझकर उसे लगातार थप्पड़ें मारते हुए यह भाजपा नेता उससे पूछते रहा कि क्या उसका नाम मोहम्मद है? लगातार पीटते रहा, और खबरों के मुताबिक उसने खुद ने इस पिटाई का वीडियो फैलाया। वीडियो फैलने के बाद यह पता लगा कि यह बुजुर्ग मरा पड़ा मिला है। अब मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने इसे गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी भी आसान नहीं रही, इसे खबर भेजी गई कि अगर वह समर्पण नहीं करेगा तो उसके घर को बुलडोजर से जमींदोज कर दिया जाएगा, इसके बाद जाकर वह पुलिस तक पहुंचा। चूंकि वीडियो चारों तरफ फैल चुका था, लाश सामने थी, मरने वाला एक जैन परिवार का था, इसलिए बात दबना मुमकिन नहीं था। अभी हाल ही के हफ्तों में मध्यप्रदेश में दो अलग-अलग वारदातों में दबंगों ने जाकर आदिवासियों को घरों से निकाला, और पीट-पीटकर मार डाला। चूंकि सारे सुबूत मौजूद थे इसलिए उनमें भी गिरफ्तारियां हुई हैं। मारने वाले एक उग्रवादी हिन्दू संगठन बजरंग दल के थे, और उनका ऐसे संदेह का आरोप था कि ये आदिवासी गाय मारते हैं। न कोई गाय बरामद हुई, न गोमांस बरामद हुआ, दो आदिवासी जरूर मार दिए गए।
आदिवासियों को तो फिर भी यह आरोप लगाकर मारा गया कि वे गाय मारते हैं, लेकिन बहुत कमजोर, विचलित, और बूढ़े इंसान से तो मक्खी भी ठीक से नहीं मारी जाती होगी, उसे भी उसका नाम मोहम्मद मानकर पीट-पीटकर मार डाला गया। हिन्दुत्व की प्रयोगशाला के कुछ प्रयोग उत्तरप्रदेश में हो रहे हैं, कुछ प्रयोग कर्नाटक में, और कुछ का जिम्मा मध्यप्रदेश को दिया गया है। इन प्रदेशों में सरकार, सत्तारूढ़ संगठन, और उनके सहयोगी संगठन तरह-तरह के प्रयोग कर रहे हैं, और उन पर देश की जनता का, अदालतों का बर्दाश्त तौलते भी जा रहे हैं। अलग-अलग दिखती इन घटनाओं को जो लोग अलग-अलग समझते हैं, उन्हें कुछ दूर बैठकर, आसमान पर उड़ते एक पंछी की निगाहों से इन राज्यों को देखना चाहिए, तो इन घटनाओं के बीच एक सीधा रिश्ता दिखेगा। यह रिश्ता मुस्लिमों या दूसरे अल्पसंख्यकों, दलितों, और आदिवासियों, महिलाओं को दहशत में लाने का सिलसिला है। दहशत में लाना इसलिए जरूरी है कि इन तबकों में से कोई सवर्ण हिन्दुओं, मर्दों, और उग्रवादी संगठनों के सामने सिर न उठा सकें। अभी मारा गया बुजुर्ग जैन न होकर मोहम्मद ही हुआ होता, तो भी उससे मुस्लिम आबादी में एक की कमी आई होती। लेकिन जिस तरह उसे पीटकर बार-बार उससे यह पूछकर कि क्या उसका नाम मोहम्मद है, और फिर इस वीडियो को खुद फैलाकर जिस दहशत को फैलाने की कोशिश की गई थी, वह तो कामयाब हो गई। इससे यह साफ हो गया कि जिसके मुस्लिम होने का शक होगा, उसके कमजोर, विचलित, और बुजुर्ग होने पर भी उसे छोड़ा नहीं जाएगा, और पीट-पीटकर मार डाला जाएगा। जिसका आदिवासी होना तय होगा, उसके गाय न मारने पर भी उसे मारा जा सकेगा, और कहीं पर बजरंग दल, कहीं भाजपा, कहीं आरएसएस, अलग-अलग तरीके से लोगों को मार सकते हैं, और इस माहौल को परखने का काम अलग-अलग राज्यों में एक साथ जारी है। लोगों की बर्दाश्त तौली जा रही है, और लोगों की दहशत नापी जा रही है। मकसद पूरा होने तक बर्दाश्त और दहशत दोनों को बढ़ाते चलना है, और जहां-जहां हमखयाल सरकार है, वहां-वहां पर न्याय की प्रक्रिया भी अपने ही हाथ है। इसलिए देश भर में भीड़त्याओं और दूसरे किस्म की नफरती हत्याओं पर अदालती फैसले मनमाफिक होते हैं। जांच करने वाली पुलिस, मौजूदा गवाह, गढ़े गए सुबूत, ये सब मिलकर तय कर लेते हैं कि किसी नफरतजीवी का बालबांका न हो।
मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का ताजा बयान अगर इस बुजुर्ग की हत्या पर देखें, तो वह एक थानेदार के जारी किए गए प्रेस नोट सरीखा पथरीला है। प्रदेश में कानून व्यवस्था जिस मंत्री की जिम्मेदारी है, उस मंत्री के मुंह से अफसोस का एक शब्द नहीं निकला है, बल्कि मंत्री की कही हुई इस बात को मृतक के परिवार ने गलत बताया है कि मंत्री ने उनसे फोन पर बात की है। मंत्री का पूरा बयान देखें तो बिना अफसोस वाला यह बयान सत्ता की जिम्मेदारी पर अपनी पूरी चुप्पी के साथ ऐसे और हमलावरों की हौसला अफजाई करने वाला दिखता है, क्योंकि इसमें ऐसी घोर साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ एक शब्द भी नहीं है।
इस देश की न्यायपालिका पर धिक्कार है जो कि साम्प्रदायिकता के ऐसे बढ़ते चल रहे, अधिक और अधिक हिंसक होते चल रहे प्रयोगों को इस तरह देख रही है जिस तरह कि कोई क्रिकेटप्रेमी टीवी पर मैच देखते हैं। सत्ता से जुड़े हुए दूसरे संवैधानिक संगठनों की बोलती भी बंद है, न मानवाधिकार आयोग का मुंह खुला, न अल्पसंख्यक आयोग का मुंह खुला, और तो और जैन समाज के संगठनों का भी मुंह नहीं खुला, शायद इसलिए कि उन्होंने भी बुलडोजरों के वीडियो देखे हुए हैं। यह सिलसिला बहुत ही भयानक है। यूपी, कर्नाटक, और मध्यप्रदेश में यह शुरू तो मुस्लिमों के खिलाफ हुआ, लेकिन अब उसमें जैन हत्या भी होने लगी है। राहत इंदौरी नाम के इसी मध्यप्रदेश के एक शायर ने ठीक ही लिखा था- लगेगी आग तो आएंगे कई घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।
आज जिन लोगों को सिर्फ मुस्लिम, ईसाई, दलित, आदिवासी, और औरतें निशाने पर दिख रहे हैं, और बाकी लोग अपने आपको बेफिक्र पा रहे हैं, वे इस बात को अच्छी तरह समझ लें कि इनसे परे एक जैन की बारी भी आ चुकी है, और उसकी हत्या के वीडियो को भी देख लें, फिर अपनी हिफाजत के प्रति बेफिक्र हों।
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सोशल मीडिया कुछ ईश्वर की तरह हो गया दिखता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। खुद हमें कई बार सोशल मीडिया एक सबसे बड़ा लोकतांत्रिक औजार लगता है, लेकिन अधिक दिन नहीं गुजरते कि यह साबित होने लगता है कि यह आज का सबसे बड़ा पूंजीवादी और तानाशाह हथियार है। जब अलग-अलग लोगों को बिना खर्च किए हुए सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने का मौका मिलता है, तो यह एक अभूतपूर्व लोकतांत्रिक ताकत लगती है। लेकिन जब हवा के इन झोंकों को एक ताकत और योजना के साथ एक ऐसी तरफ मोड़ दिया जाता है कि लोकतंत्र को पीछे छोडक़र तरह-तरह के बाहुबल दुनिया का जनमत अपने हिसाब से हांकने लगें, तब इस लोकतांत्रिक दिखते औजार का खतरा समझ आता है। आज जब दुनिया में रूस और यूक्रेन को लेकर जनमत बनने की बात आती है, या दूसरे एक अलग मोर्चे पर फिलीस्तीनियों पर इजराइली जुल्म जारी हैं, और इस पर अमरीकी जुबानी जमाखर्च दिख रहा है, तो ऐसे में जनमत को प्रभावित करने वाले औजारों की लोकतांत्रिकता के बारे में सोचने की जरूरत लगती है। फिर बाहर ही क्यों देखें, हिन्दुस्तान के भीतर हिन्दू-मुस्लिम से लेकर पप्पू और फेंकू नाम के खेमों में बंटे हुए लोगों के बीच सोशल मीडिया पर जिस तरह की जंग छिड़ी है, क्या वह सचमुच ही एक लोकतांत्रिक औजार को लेकर जनमत बनाने की कोशिश है, या कि इस औजार को लूटकर उसे हथियार बनाकर एक संगठित गिरोह की तरह किया जा रहा हमला है? इस हथियार के साथ एक दूसरी दिक्कत यह है कि हमलावर जब चाहे अपनी फौज को और इस हथियार को लोकतांत्रिक औजार बता सकते हैं, और ऐसे औजार से मानवीय मूल्यों का सामूहिक मानव संहार भी कर सकते हैं। दिखने में जो सडक़ किनारे प्याऊ के पानी की गिलास है, वह एक साजिश के तहत नफरत के जहर का सैलाब फैलाने के काम में लाई जा रही है, और सोशल मीडिया नाम का यह प्याऊ जनसेवा की वाहवाही भी पा रहा है।
इसने लोकतंत्रों में एक इतनी भयानक नौबत ला दी है जितनी भयानक नौबत अमरीका में सबसे विनाशकारी बवंडरों से आते दिखती है, जिससे शहर के शहर उजड़ जाते हैं। लोकतंत्र और सभी किस्म के बेहतर मूल्यों और सिद्धांतों को खत्म करने के लिए सोशल मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बनकर सामने आ गया है, और ट्विटर पर जब चाहे तब नफरतजीवी लोग अपनी मर्जी के एजेंडा को ट्रेंड करवा सकते हैं, यानी उस एक पल उनके पसंदीदा शब्दों के साथ नफरत की सुनामी बाकी तमाम मुद्दों के पैर उखाड़ सकती है, उन्हें बहाकर किनारे कर सकती है। दिखने में जो लोकतांत्रिक दिखता है उस पर पूंजीवादी, तानाशाह, और नफरतजीवी ताकतों ने इतने संगठित तरीके से कब्जा कर लिया है और उसके बेजा इस्तेमाल की तकनीक विकसित कर ली है कि अहिंसा की बातें हाशिए पर ही बनी रहती हैं, वे कभी ट्रेंड नहीं हो पातीं।
कहने के लिए यह एक लोकतांत्रिक आजादी है जो कि हर किस्म के लोगों को मिली हुई है, और नफरत के विरोधी भी चाहें तो अपने पसंदीदा मुद्दों को ट्रेंड करवा सकते हैं। लेकिन सच तो यह है कि अमन-चैन की बातों को आगे बढ़ाने के लिए साथ देने वाले आएंगे कहां से? हिन्दुस्तान में हम देखते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव और मोहब्बत की बातें करने वाले लोगों पर नफरतजीवियों का झुंड इस तरह टूट पड़ता है कि जैसे जंगल में कोई अकेला कमजोर प्राणी मांसाहारियों से घिर गया हो। और यह हमलावर झुंड जब अपने धर्म से अधिक, दूसरों से नफरत से भरा हुआ रहता है, तो उसके नाखून और दांत अधिक तेज रहते हैं, उसके पंजों की ताकत अधिक रहती है, और जब ऐसे झुंड को एक संगठित समर्थन भी हासिल रहता है, सत्ता से लेकर न्याय प्रक्रिया तक उसे हिफाजत हासिल रहती है, तो फिर उसके हमले बुलडोजर पर सवार रहते हैं, और वह इतिहास के भी नीचे पुरातत्व तक को खोद डालने पर आमादा रहता है।
अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से लेकर हिन्दुस्तान के राजनीतिक और साम्प्रदायिक एजेंडा को तय करने में सोशल मीडिया जिस भयानक तरीके से एक हथियार की तरह कुछ लोगों को हासिल है, उससे लगता है कि मार्क जुकरबर्ग से लेकर ट्विटर के पंछी तक ने अपने आपको सुपारी लेकर भाड़े के हत्यारे की तरह काम करने के लिए पेश किया हुआ है। चूंकि हिन्दुस्तान में इन चीजों को लेकर कुछ तो लोगों की समझ कम है, और कुछ आज की सत्ता को इनसे सहूलियत हासिल है, इसलिए यहां इनके खतरों पर अधिक चर्चा नहीं हो रही है। दूसरी तरफ अमरीका और पश्चिम के कई देशों में सोशल मीडिया की बेकाबू दिखती, लेकिन पूरी तरह से काबू में काम करती विनाशकारी ताकत पर संसदों में सवाल किए जा रहे हैं। हिन्दुस्तान आज अपने इतिहास की सबसे अधिक हिंसक धमकियां सोशल मीडिया पर ही देख रहा है, लेकिन इस देश का बहुत कड़ा बनाया गया सूचना तकनीक कानून भी सोशल मीडिया पर चुन-चुनकर लोगों का शिकार कर रहा है, और हिंसक खूनी जत्थों को अनदेखा भी कर रहा है।
लोकतंत्र में चुनाव प्रचार के लिए या बाकी वक्त भी जनमत को प्रभावित करने के लिए जो परंपरागत तरीके चले आ रहे थे, वे एकाएक पेनिसिलीन की तरह बेअसर हो गए दिखते हैं। अब लोगों को भडक़ाने के लिए जिस तरह सोशल मीडिया की ताकत का इस्तेमाल हो रहा है, वह लोकतंत्र के नाम पर बाहुबल और नफरत की एक नई इबारत लिख रहा है। और आज जब हिन्दुस्तान जैसे देश में लोगों की निजी और सामूहिक जनचेतना का अधिकतर हिस्सा मिट्टी में मिल चुका है, तब संगठित हिंसा को सोशल मीडिया की लहरों पर सवार करके उसे आसमान तक पहुंचाना आसान हो गया है। लोकतंत्र के लिए यह बहुत फिक्र की बात है कि करीब एक सदी में इस देश में जो लोकतांत्रिक चेतना विकसित हुई थी, वह पिछले एक दशक की सोशल मीडिया की सुनामी में पूरी तरह शिकस्त पा चुकी है। यह सोच कुछ लोगों के लिए थोड़ी सी जटिल लग सकती है, लेकिन इस पर सोचा जाना जरूरी है।
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देश की दो बड़ी-बड़ी पार्टियों में बड़े-बड़े ओहदों पर रह चुके, संसद सदस्य रहे हुए, कामयाब क्रिकेटर और कॉमेडियन नवजोत सिंह सिद्धू ने सुप्रीम कोर्ट से कल मिली एक साल की कैद बा मुशक्कत पर सरेंडर करने के लिए कुछ हफ्तों का समय मांगा है। सिद्धू के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने उनकी सेहत का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से यह रियायत मांगी है। सिद्धू को यह सजा 34 बरस पुराने एक मामले में हुई थी जिनमें उन्होंने पार्किंग के झगड़े में एक बुजुर्ग की पिटाई की थी जिसके बाद उसकी मौत हो गई थी। कई अदालतों से सजा पाते और छूटते सिद्धू आखिर में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, और वहां भी एक बार बरी हो जाने के बाद जब मृतक के परिवार ने दुबारा पिटीशन लगाई, तो इस ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक साल की कैद सुनाई है। कानून के जानकारों का कहना है कि अभी भी इस मामले में सिद्धू की तरफ से कोई और पिटीशन लगाने की थोड़ी सी संभावना बाकी है, और अगर ऐसी कोई याचिका अदालत में मंजूर होती है तो यह मामला आगे और कई बरस तक टल सकता है, और सिद्धू कई पार्टियों में आ-जा सकते हैं, हिन्दुस्तानी संसद में चाहे न पहुंच पाएं, वे टीवी पर पहुंचकर ठोको ताली कह सकते हैं।
दूसरी तरफ कल की ही एक और खबर है जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 9 बरस से जेल में बंद तीन ऐसे गरीब आदिवासी विचाराधीन कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया है जो गरीबी की वजह से अपनी जमानत नहीं करा पा रहे, और 9 साल से मुकदमा झेलते हुए जेलों में बंद हैं। ये बहुत गरीब हैं, परिवार से संपर्क नहीं है, और जमानत की रकम जमा कराने वाले कोई नहीं हैं, इसलिए 2016 में अदालत से मिली सशर्त जमानत की शर्त पूरी करने की हालत में नहीं हैं, और अब हाईकोर्ट ने इन तीनों को व्यक्तिगत बॉंड पर रिहा करने का आदेश दिया है। बहुत कम ही ऐसे जुर्म रहते हैं जिनकी सजा 9 बरस से अधिक की कैद रहती हो, इसलिए इन गरीब आदिवासियों पर चाहे जिस जुर्म का मुकदमा चल रहा हो, शायद सजा मिलने पर जो कैद हो, उससे अधिक कैद वे गुजार चुके होंगे।
हिन्दुस्तान की जेलों में ऐसे बेबस गरीब बड़ी संख्या में बंद हैं जो मुकदमे झेल रहे हैं लेकिन उनकी जमानत नहीं हो पा रही है। और जो ताकतवर लोग सुबूतों को बर्बाद कर सकते हैं, गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं, उनके लिए लाखों रूपए फीस लेने वाले अरबपति वकील खड़े होते हैं, बड़ी-बड़ी अदालतों के बड़े-बड़े जज आधी रात को भी अपने बंगले में उनके केस सुनते हैं, और उन्हें तुरंत ही जमानत या अग्रिम जमानत मिल जाती है। एक ही किस्म के जुर्म के आरोपों पर अलग-अलग ताकत के लोगों के बीच कानून का फायदा पाने, उससे रियायत पाने में जितना बड़ा फर्क हिन्दुस्तान में दिखता है वह किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत शर्मनाक नौबत है। कोई विकसित लोकतंत्र ऐसा नहीं हो सकता जिसमें कमजोर की पूरी जिंदगी मुकदमे का सामना करते निकल जाए, बिना जमानत जेल में निकल जाए, और ताकतवर और पैसे वाले मुजरिम सजा पाने के बाद भी कानून से लुका-छिपी खेलते रहें। देश की एक बड़ी कंपनी, जो कि देश भर में मुकदमे झेल रही है, उसके चार बड़े डायरेक्टरों को अभी छत्तीसगढ़ पुलिस गिरफ्तार करके लाई, और जेल पहुंचते ही कुछ घंटों के भीतर वे चारों एक साथ अस्पताल पहुंच गए। जेल की जगह अस्पताल में रहने में बहुत सी सहूलियत रहती है, और हर ताकतवर या पैसे वाले कैदी बिजली की रफ्तार से यह सहूलियत पा जाते हैं।
हिन्दुस्तान में आर्थिक असमानता सिर चढक़र बोलती है। लेकिन पढ़ाई, इलाज, नौकरी, या चुनावी जीत की संभावनाओं से भी अधिक बढक़र यह असमानता अदालतों में दिखती है जहां गरीब से जेल में भी अमीर कैदियों की खातिरदारी करवाने के लिए बंधुआ मजदूरों सरीखा काम लिया जाता है। उसे आराम के लिए अस्पताल नसीब होना तो दूर रहा, जरूरी इलाज भी नसीब नहीं होता, उसके मामले की पेशी पर उसे अदालत ले जाने के लिए पुलिस नहीं मिलती, अदालत पहुंचकर भी उसका मामला आगे नहीं खिसकता, क्योंकि गरीब विचाराधीन कैदी भारतीय लोकतंत्र के हाथ गरम करने की ताकत नहीं रखते। हमारा ऐसा मानना है कि भारतीय लोकतंत्र में अगर लोगों की आस्था न्यायपालिका पर से खत्म करवानी है, तो उन्हें किसी मुकदमे में उलझाकर अदालती चक्कर लगवाए जाएं, वहां पर इंसाफ के नाम पर बेइंसाफी दिखाई जाए, वहां पैसों की ताकत का नंगा नाच उसे देखने मिले, और मुकदमा खत्म होने के पहले लोकतंत्र में उसकी आस्था खत्म हो जाए।
अमरीका जैसे देश में काले लोगों पर चल रहे मुकदमों में उनका कानूनी साथ देने के लिए सामाजिक संगठन बने हुए हैं जो कि उनके हक के लिए लड़ते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में जहां पर आमतौर पर दलित, आदिवासी, और मुस्लिम मुकदमों के सबसे अधिक शिकार हैं, वहां पर इन तबकों के हक के लिए लडऩे वाले कोई संगठन सुनाई नहीं पड़ते। सामाजिक बराबरी तो तभी आ सकती है जब लोगों को उन पर लगाए गए आरोपों से निपटने के लिए बराबरी का मौका मिले। भारतीय न्याय व्यवस्था में तो ऐसी किसी बराबरी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस देश में और इसके तमाम प्रदेशों में हर बड़े राजनीतिक दल से जुड़े हुए बहुत से वकील हैं, लेकिन किसी पार्टी ने भी अब तक गरीबों की कानूनी मदद के लिए कोई कार्यक्रम नहीं बनाया है, किसी सत्तारूढ़ पार्टी ने भी नहीं, और न ही किसी विपक्षी पार्टी ने। आमतौर पर किसी भी पार्टी के बड़े नेता के फंसने पर उसे बचाने के लिए अरबपति वकीलों की फौज खड़ी हो जाती है, लेकिन कोई पार्टी अपने प्रभाव के इलाके में सबसे गरीब लोगों की कानूनी मदद की कोई कोशिश नहीं करती।
भारत में आज जाहिर तौर पर कमजोर तबकों, दलित, आदिवासी, मुस्लिम, और महिलाओं की कानूनी हिफाजत के लिए ऐसे मजबूत संगठन बनने और सामने आने चाहिए जो कि उन्हें बराबर का कानूनी हक दिलाने के लिए लड़ाई लड़ें। अमरीका जैसे देश से इस बात की मिसाल ली जा सकती है, और इस देश के जागरूक लोगों में से कुछ का सामने आना जरूरी है, उसके बिना किसी तरह का इंसाफ कमजोर लोगों को नहीं मिल सकेगा, और ताकतवर लोग अदालत से सजा मिलने के बाद भी ताली ठोंकते हॅंसते रहेंगे।
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हिन्दुस्तान में चारों तरफ से लगातार आ रही बुरी खबरों के बीच कोई एक अच्छी सरकारी खबर भी आ सकती है, इसकी उम्मीद कम ही रहती है। लेकिन आज महाराष्ट्र से ऐसी ही एक खबर आई है। वहां राज्य सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से प्रदेश की एक ग्राम पंचायत, हेरवाड़, की मिसाल देते हुए सभी पंचायतों के लिए यह आदेश निकाला गया है कि किसी भी महिला के पति की मृत्यु होने पर उसकी चूडिय़ां तोडऩे, माथे से सिंदूर पोंछने, और मंगलसूत्र निकालने की प्रथा खत्म की जाए। एक ग्राम पंचायत ने ऐसी मिसाल कायम की है, और उसकी चारों तरफ तारीफ भी हो रही है। उसका जिक्र करते हुए सरकार ने पूरे प्रदेश से इस प्रथा को खत्म करना तय किया है। यह बात कुछ लोगों को सरकार के दायरे के बाहर की लग सकती है क्योंकि ऐसे लोगों को यह लगता है कि सामाजिक प्रथाएं सरकार के काबू के बाहर रहनी चाहिए, ठीक उसी तरह जिस तरह कि हिन्दुस्तान में आज बहुत से लोगों को लगता है कि बहुसंख्यक तबके की धार्मिक भावनाएं संविधान से ऊपर हैं। हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक मर्दों को यह लगता है कि औरतों को कुचलने के लिए जितने तरह के रीति-रिवाज बनाए गए हैं वे जायज हैं, और धार्मिक या जातिगत संस्कारों के अंगने में सरकार का क्या काम है?
इस देश में महिलाओं के बराबरी के कानूनी दर्जे, और उनके लिए बनाए गए तरह-तरह के कानूनों के बावजूद उनकी स्थिति बहुत कमजोर है। परिवार में न सिर्फ गृहिणी को आखिर में खाना नसीब होता है, बल्कि किसी लडक़ी को भी अपने भाई के मुकाबले कम पढ़ाई, कम इलाज, और यहां तक कि कम खाना भी नसीब होता है। मुम्बई के टाटा कैंसर अस्पताल का एक सर्वे है कि वहां पहुंचने वाले कैंसर पीडि़त बच्चों में से लडक़ों को तो अधिकतर मां-बाप इलाज के लिए लेकर आते हैं, लेकिन बहुत ही कम लड़कियों को जांच के नतीजे के बाद इलाज के लिए लाया जाता है। दोनों ही किस्म की संतानें उन्हीं मां-बाप की रहती हैं, लेकिन जन्म के पहले अगर कन्या भ्रूण हत्या करने की सहूलियत नहीं रहती, तो बाद में भेदभाव करके उस गंवाए हुए मौके को दुबारा हासिल कर लिया जाता है। भारतीय समाज में पत्नी खोने वाले किसी आदमी के कपड़े, हुलिए, या उसकी किसी और बात से उसके विधुर होने का पता नहीं लगता है, लेकिन पति खोने वाली महिला को सती बनाना अब मुमकिन नहीं रह गया है, इसलिए उसे विधवाश्रम के लायक बनाकर, खुशी के मौकों पर घर के पीछे के बंद कमरे में धकेलकर, उसके रंगीन कपड़े छीनकर, उसका सिर मुंडाकर, उसके गहने और सिंदूर हटाकर, उसका मांसाहार और प्याज-लहसुन तक छीनकर समाज एक औरत को उसकी औकात दिखा देता है। इसलिए ऐसे समाज में सुधार के लिए महिलाओं के मुद्दे चर्चा में भी बने रहना जरूरी है, और जैसा कि महाराष्ट्र सरकार ने इस ताजा फैसले में किया है, सरकार और समाज को इस सुधार के लिए लगातार कोशिश करना भी जरूरी है।
महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए इस देश में महिला आरक्षण जैसे मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहिए था, लेकिन आज देश में कोई भी राजनीतिक दल इसकी चर्चा भी नहीं करते। और तो और जिस कांग्रेस पार्टी ने उत्तरप्रदेश में अभी प्रियंका गांधी की अगुवाई में 40 फीसदी उम्मीदवार महिलाओं को बनाया था, उसने भी अपने ताजा तीन दिनों के चिंतन शिविर में महिलाओं के बारे में कुछ भी नहीं कहा। इंदिरा गांधी के बाद सोनिया गांधी इस पार्टी की दूसरी महिला मुखिया हैं, और प्रियंका गांधी को अगली मुखिया बनाने की सलाह हवा में तैर ही रही है। लेकिन इस पार्टी के राज वाले गिने-चुने बचे प्रदेशों में भी विधानसभा में महिला आरक्षण लागू करने का कोई प्रस्ताव तक नहीं उठाया जा रहा जिससे कि केन्द्र के पाले में गेंद फेंककर महिला आरक्षण को एक बार फिर चर्चा में लाया जा सकता था। कांग्रेस पार्टी के सामने यह एक ऐतिहासिक मौका था कि उसके पास देश में खोने के लिए कोई सीटें भी नहीं हैं, कुल पचासेक सीटें उसके पास लोकसभा में रह गई हैं, और ऐसे में वह उत्तरप्रदेश वाले महिला उम्मीदवारी के फॉर्मूले को पूरे देश के लिए घोषित कर सकती थी, लेकिन यह जाहिर है कि इस पार्टी के भीतर भी महिलाओं का अनुपात कोई मुद्दा नहीं रह गया है, और उत्तरप्रदेश का चुनाव खोने के बाद पार्टी ने बड़ी सहूलियत से महिलाओं के मुद्दे को भुला दिया है। कम ही लोगों को यह याद होगा कि पिछले आम चुनाव में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, इन तीनों कांग्रेस-प्रदेशों में कुल तीन कांग्रेस सांसद चुने गए थे जिनमें छत्तीसगढ़ की श्रीमती ज्योत्सना महंत भी एक थीं। इसी तरह उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में दो कांग्रेस विधायक चुने गए जिनमें से एक आराधना मिश्रा थीं। गांव-गांव में महिला पंच-सरपंच अलग-अलग जाति आरक्षण के साथ भी उम्मीदवारी के लिए भी मिल जाती हैं और जीतकर भी आती हैं। लेकिन कोई राजनीतिक दल उन्हें आबादी के अनुपात में टिकट देने को तैयार नहीं होते। भारतीय लोकसभा में आज कुल 14 फीसदी महिला सांसद हैं जबकि अफ्रीका में सबसे कम महिला सांसद केन्या में हैं, जो कि 22 फीसदी हैं। इसलिए आज जब महाराष्ट्र सरकार के इस महिला के हक के फैसले की हम तारीफ कर रहे हैं, तब देश की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूख पर अफसोस भी जाहिर कर रहे हैं कि जब इस पार्टी के पास खोने को कुछ नहीं बचा है, तब भी उसने महिलाओं के हक की बात करने का यह मौका खो दिया है।
आज जब इस बारे में हम लिख रहे हैं तब भारत का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण सामने है। केन्द्र सरकार के आंकड़े कहते हैं कि सर्वेक्षण में शामिल हुए 80 फीसदी हिन्दुस्तानी कम से कम एक बेटा होने की चाह रखते हैं। और इस चाहत के चलते दो बेटों के बाद तीसरी बेटी हो या न हो, दो बेटियों के बाद तीसरा बेटा तो हो ही जाता है। बच्चों के जन्म के समय लडक़े और लडक़ी का फर्क समाज में जीवनसाथी खो चुके आदमी और औरत के बीच फर्क तक जारी रहता है, और इसे टुकड़े-टुकड़े में नहीं सुधारा जा सकता। महाराष्ट्र सरकार की यह ताजा पहल देश के बाकी प्रदेशों में भी आगे बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि वृन्दावन के विधवाश्रमों में बेसहारा विधवा महिलाएं तो पूरे देश से ही भेजी जाती हैं।
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चिंतन शिविर से कांग्रेस की चिंता कम होते नहीं दिख रही है। जिस दिन राजस्थान में तीन दिन का यह चिंतन शिविर जारी ही था, उसी दिन पंजाब कांग्रेस के एक बड़े नेता सुनील जाखड़ ने पार्टी से इस्तीफा दिया, और कल की खबर यह थी कि जाखड़ के समर्थन में बहुत से और कांग्रेस नेता आवाज उठा रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने उसी वक्त यह ट्वीट किया था कि कांग्रेस को सुनील जाखड़ को नहीं खोना चाहिए जो कि अपने वजन जितने सोने के बराबर कीमती हैं, हर मतभेद को बातचीत से सुलझाना चाहिए। अब आज सुबह की ताजा खबर है कि गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल ने बड़े गंभीर आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपनी उपेक्षा गिनाने के साथ-साथ कांग्रेस की नीतियों और तौर-तरीकों की कड़ी निंदा की है। उनके इस्तीफे की भाषा राहुल गांधी पर सीधा हमला करने वाली है, और उन्होंने कहा कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी की किसी भी बैठक में नहीं बुलाया जाता, कोई भी निर्णय लेने से पहले वो मुझसे राय-मशविरा नहीं करते, तब इस पद का क्या मतलब है? उन्होंने कहा कि हाल ही में पार्टी ने राज्य में 75 नए महासचिव, और 25 नए उपाध्यक्ष घोषित किए हैं, और उनसे एक बार भी कोई राय नहीं ली गई।
कांग्रेस के चिंतन या संकल्प शिविर से लंबे-लंबे भाषण तो निकलकर आए हैं, लेकिन पार्टी अपने सामने अपने घर के जलते-सुलगते मुद्दों पर कोई भी फैसला लेने की हालत में नहीं दिख रही है। आज कांग्रेस पार्टी अपने आपको भाजपा का विकल्प बता रही है, लेकिन वह अपने खुद के ढांचे को अपने पैरों पर खड़ा करने की हालत में नहीं दिख रही है। हार्दिक पटेल जैसे नौजवान आंदोलनकारी को उसकी भारी लोकप्रियता देखकर कांग्रेस बड़ी उम्मीद और बड़े वायदों के साथ उन्हें पार्टी में लाई थी, और गुजरात में कांग्रेस अपने संगठन से इस हद तक निराश थी कि रातों-रात हार्दिक पटेल को पार्टी का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। इसके अलावा ऐसा कोई दूसरा मामला कांग्रेस में याद नहीं पड़ता कि पहली बार सदस्य बने व्यक्ति को एकदम से कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया हो। लेकिन पिछले कई महीनों से हार्दिक पटेल अपनी उपेक्षा की बात कह रहे थे, कुछ दिन पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया पेज से कांग्रेस का नाम हटा दिया था, और उनकी इस्तीफे की बात हैरान करने वाली नहीं है। यह बात भी हैरान करने वाली नहीं है कि जिंदगी के सबसे खराब दौर से गुजर रही कांग्रेस पार्टी ऐसे दौर में भी अपने साथ आने वाले लोगों को सम्हालकर नहीं रख पा रही है, और न ही पुराने लोग अपनी आज की पार्टी से खुश रह गए हैं। इन तमाम लोगों पर किसी सत्तारूढ़ पार्टी से जुडऩे की तोहमत लगाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि बंगाल के बाहर के कई कांग्रेस नेता भी तृणमूल कांग्रेस में गए हैं, और बंगाल के बाहर तो तृणमूल की सत्ता का कोई फायदा उन्हें होते नहीं दिखता है।
कांग्रेस अपने संकल्प शिविर में संगठन के मुद्दों पर कितनी ही बात करे, हकीकत यह है कि उसने मुद्दों को, जलते-सुलगते मुद्दों को ताक पर धर देने की आदत बना रखी है। किसी भी समस्या पर कुछ भी न करके अपने आप उसके खत्म हो जाने या टल जाने की उम्मीद करते हुए कांग्रेस लीडरशिप चीजों को इस नौबत तक ला रही है। हो सकता है कि हार्दिक पटेल संभावनाविहीन दिखती कांग्रेस में अपनी संभावनाविहीनता से थक गए हों, लेकिन अगर उनकी कही यह बात सही है कि उन्हें संगठन की किसी बैठक में नहीं बुलाया जाता, दर्जनों पदाधिकारी नियुक्त करते हुए उनसे पूछा भी नहीं जाता, पार्टी के लीडर उनसे बात करते हुए अपने मोबाइल फोन पर व्यस्त रहते हैं, तो फिर हार्दिक पटेल की उस पार्टी को क्या जरूरत है, और हार्दिक पटेल को उस पार्टी की क्या जरूरत है? यह सिलसिला टूट जाना ही ठीक था।
कांग्रेस पार्टी की दुर्गति पर लिखना आज का मकसद नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की जरूरत पर लिखना जरूरी है, और इसी नाते हम कई बार कांग्रेस पर लिखने को मजबूर हो जाते हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के पिछले एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने औपचारिक इंटरव्यू में यह कहा था कि राहुल गांधी से मिले उन्हें साल भर से अधिक हो चुका था। यह नौबत देश के बहुत से कांग्रेस नेताओं की रहती है जिन्हें पार्टी लीडरशिप से मिलने का वक्त नहीं मिलता। पार्टी की लीडरशिप में राहुल गांधी क्या हैं, यह एक रहस्य बना हुआ है। वे कुछ न होते हुए भी सब कुछ हैं, और सब कुछ होते हुए भी उन पर किसी बात की जिम्मेदारी नहीं है। बिना जिम्मेदारी सिर्फ अधिकार ही अधिकार, यह किसी भी लोकतंत्र में अच्छी नौबत नहीं है, और किसी संगठन के लिए तो यह आत्मघाती से कम नहीं है। नतीजा यही है कि पार्टी को जिन मामलों पर तुरंत फैसला लेना चाहिए, वे मामले बरसों तक पड़े रहते हैं, क्योंकि जिनसे फैसले लेने की उम्मीद की जाती है, उनसे कोई सवाल पूछने की संस्कृति कांग्रेस पार्टी में नहीं है। यह तुलना कुछ लोगों को नाजायज लग सकती है कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कोई ईमानदार सवाल पूछने का हक मीडिया को नहीं है, ठीक उसी तरह कांग्रेस के भीतर सोनिया-परिवार से कोई सवाल पूछने का हक भी किसी नेता का नहीं है। मोदी तो अपनी अपार लोकप्रियता या अपार कामयाबी के चलते सवालों को टाल सकते हैं, लेकिन सोनिया-परिवार देश के चुनावों में पार्टी के हाल को देखते हुए सवालों को कब तक टाल सकता है, कब तक टालते रहेगा?
एक सुनील जाखड़, या एक हार्दिक पटेल मुद्दा नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस अपने बड़े नेताओं को जिस लापरवाह और निस्पृह भाव से चले जाने दे रही है, वह पार्टी के एक खराब भविष्य का आसार है। दो दिन पहले हमने कांग्रेस शिविर में राहुल गांधी के भाषण में क्षेत्रीय पार्टियों के खिलाफ कही गई अवांछित बातों की आलोचना की थी, और उसके तुरंत बाद से देश भर में ऐसी आलोचना जगह-जगह से आ रही है, बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बारे में लिखा है, और तेजस्वी यादव जैसे कांग्रेस के दोस्त ने भी इसके खिलाफ बयान दिया है। कांग्रेस जितने किस्म की गलतियां कर रही है, गलत काम कर रही है, उन सबके नुकसान से उबरने के लिए ऐसे कोई संकल्प काफी नहीं हो सकते, जो कि अभी तीन दिनों के शिविर में लिए गए हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधारने चाहिए, वरना उसका रहा-सहा वर्तमान भी भविष्य में उसका साथ नहीं दे पाएगा।
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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से साइबर ठगी की एक भयानक खबर सामने आई है। एक महिला को 25 लाख रूपए की लॉटरी लगने का झांसा देकर ठगों ने उससे 9 लाख रूपए अपने बैंक खातों में जमा करा लिए, और फिर जब महिला को समझ आ गया कि उसे ठगा जा चुका है तो उससे यह रकम वापिस करने के नाम पर उसका एक नग्न वीडियो बनवाकर ठगों ने बुलवा लिया। इसके बाद ठगों ने उससे 5 लाख रूपए और मांगे, और यह रकम न भेजने पर यह वीडियो उसके पति के मोबाइल पर भेज दिया गया। इसके बाद पुलिस में शिकायत करने के अलावा और कुछ बचा नहीं था, और इस तरह यह मामला उजागर हुआ।
हर दिन सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के रास्ते लोगों को ठगने और ब्लैकमेलिंग में फंसाने के अनगिनत मामले हो रहे हैं। देश भर में हर दिन हजारों ऐसे मामलों की पुलिस में रिपोर्ट भी हो रही है। किसी भी आम मोबाइल फोन पर कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब ठगी और जालसाजी के कुछ फोन न आएं, और लोगों को फंसाने की कोशिश न की जाए। अभी लगातार एक नए किस्म का जाल इस्तेमाल हो रहा है जिसमें वॉट्सऐप कॉल पर लड़कियां अपनी नग्न तस्वीरों और नग्न वीडियो से लोगों को फंसा रही हैं। पहले वे कपड़े उतारते अपने वीडियो दिखाती हैं, और फिर लोगों को उकसाती हैं कि वे भी कपड़े उतारकर दिखाएं। सेक्स को लेकर भड़ास और कुंठा से लबालब हिन्दुस्तानी मर्द तुरंत इस जाल में फंस रहे हैं, और एक बार बिना कपड़ों का उनका वीडियो मुजरिमों के हाथ लग जाता है, तो उनके बदन की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेने तक उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है, और ऐसे कई मामलों में आत्महत्याएं भी हो चुकी हैं।
यह पूरे का पूरा मामला सोशल मीडिया, मोबाइल फोन, और सेक्स या पैसों की चाह से जुड़ी जालसाजी और धोखाधड़ी का है। मामूली ठगी से लेकर ब्लैकमेल करके आत्महत्या को मजबूर करने तक का काम धड़ल्ले से चल रहा है, लेकिन इस देश की सरकारें अपनी सारी तकनीकी क्षमता के रहते हुए भी ऐसे साइबर-मुजरिमों को पकडऩे में महीनों का वक्त लगा देती हैं, तब तक ऐसे लोग दर्जनों और लोगों को फंसा चुके रहते हैं। देश के कुछ चुनिंदा गांव ऐसे साइबर अपराधों के लिए इतनी अच्छी तरह शिनाख्त में आ चुके हैं कि वहां की पूरी नौजवान पीढ़ी इसी काम को एक पेशे की तरह अपना चुकी है। झारखंड का जामताड़ा नाम का गांव इसी धंधे के लिए तरह-तरह के मोबाइल फोन चोरों से जुटाता है, और एक-एक व्यक्ति दर्जनों सिमकार्ड रखकर रात-दिन ठगी में लगे रहता है। टेक्नालॉजी के मामले में पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां मुजरिमों से कई कदम पीछे चलती हैं, और मुजरिम जगह भी बदलते रहते हैं, और तरीके भी।
आज सरकार और समाज दोनों को लोगों को जागरूक करने की बहुत जरूरत है। हर तरह के सामाजिक संगठन अपने सदस्यों को इक_ा करके पुलिस के किसी जानकार व्यक्ति को बुलाकर उससे भाषण करवा सकते हैं कि साइबर अपराधों से किस तरह बचा जाए, और सोशल मीडिया पर अनजाने लोगों के जाल में फंसने से कैसे बचा जाए। जागरूकता अभी भी जांच, अदालती कार्रवाई, और नुकसान के मुकाबले बहुत सस्ती पड़ेगी। ऐसे मुजरिमों से पूरी रकम तो कभी भी बरामद नहीं हो पाती है, और सरकार का बहुत सारा खर्च ऐसी जांच और बाद की कार्रवाई में होता है। इसलिए राज्य सरकारों को अपने स्तर पर सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, या तरह-तरह के क्लबों, कर्मचारी संघों के साथ मिलकर जागरूकता कैम्प चलाने चाहिए, अभी पकड़ाए जा रहे जुर्म के तरीके भी बताने चाहिए, और लोगों को सावधान रहने को कहना चाहिए। दरअसल देश में डिजिटल तकनीक, मोबाइल पर बैंकिंग, आधार कार्ड या टीकाकरण जैसे कामों का ऑनलाईन होना ऐसी बातें हो गई हैं कि लोगों के फोन पर कई तरह के संदेश आते हैं, उनसे टेलीफोन पर कई तरह की जानकारी ली जाती है। कहने के लिए तो भारत सरकार ने ऑनलाईन ठगी की खबर देने के लिए अपना नंबर दिया हुआ है, लेकिन उसकी जानकारी अधिक लोगों को अभी भी नहीं है, या फिर लोगों का सरकारी इंतजाम पर उतना भरोसा भी नहीं है। चूंकि ऑनलाईन बैंकिंग जैसे काम और सोशल मीडिया का इस्तेमाल लगातार बढ़ते जाना है, इसलिए जागरूकता के अलावा दूसरा कोई बचाव का रास्ता नहीं है। सरकारें अगर चाहें तो स्कूल की बड़ी कक्षाओं और कॉलेज में छात्र-छात्राओं को साइबर-जुर्म की ओर से जागरूक करने का अभियान चला सकती हैं क्योंकि इस उम्र के अधिकतर बच्चे मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, और एटीएम वगैरह का इस्तेमाल करते ही रहते हैं। अब साइबर जुर्म मोबाइल ऐप के मार्फत कर्ज देकर हिंसक तरीके से उसकी वसूली जैसा विस्तार कर चुका है, इसलिए सरकारों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
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कांग्रेस पार्टी का तीन दिनों का विचार-विमर्श राजस्थान में पूरा हुआ, और पार्टी कई नए इरादों के साथ लौटी है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की दुहराई गई शिकस्त के बाद अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसके जमींदोज हो जाने पर पार्टी के भीतर बड़ी फिक्र चल रही थी, और तीन दिनों का यह चिंतन शिविर अपने आपको नवसंकल्प शिविर कहते हुए पूरा हुआ है। कल जब शिविर का तीसरा और आखिरी दिन चल रहा था, तो बहुत से लोगों के मन यह सवाल खड़ा हो रहा था कि कांग्रेस उसके सामने आज खड़े हुए सबसे बड़े सवाल का सामना करने से क्यों कतरा रही है? कांग्रेस में राहुल गांधी के भविष्य का क्या होगा, या राहुल के रहते हुए कांग्रेस का भविष्य क्या होगा, इस सबसे बड़े सवाल पर कोई चर्चा नहीं हुई। शायद पार्टी अपने ढांचे को लेकर इतने बड़े सवाल पर किसी चर्चा के लिए तैयार नहीं थी, और इसीलिए अगले छह महीनों में देश भर में पार्टी के खाली ओहदों पर तैनाती करने की बात कही गई। लेकिन एक और मुद्दा कांग्रेस के खिलाफ हमेशा से चले आ रहा है, और पार्टी पर कुनबापरस्ती की तोहमतें लगती ही रहती हैं, और इस बार फिर उस मुद्दे पर ऐसा ढुलमुल फैसला किया गया है जिसका कि कोई मतलब नहीं है। पार्टी ने यह तय किया कि संगठन में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत लागू होगा, और इसी तरह एक परिवार, एक टिकट का नियम भी लागू होगा। किसी परिवार में दूसरे कोई सदस्य राजनीतिक तौर से सक्रिय हैं, तो पांच साल के संगठनात्मक अनुभव के बाद ही वे कांग्रेस टिकट के लिए पात्र माने जाएंगे। इसका मतलब यह हुआ कि एक परिवार के एक से अधिक लोग आज सांसद, विधायक, या संगठन में पदाधिकारी हैं, तो पांच साल इन ओहदों पर रहने पर एक परिवार से एक से अधिक लोग भी टिकट पा सकते हैं। इस रियायत के बाद इस रोक का कोई भी असर हॅंसी के लायक ही रह जाता है। कांग्रेस के प्रस्ताव की भाषा तो संगठन के ओहदे की बात भी नहीं कहती, संगठनात्मक अनुभव की बात कहती है जिसे किसी के भी नाम के साथ जोड़ा जा सकता है। खैर, कांग्रेस से ऐसे किसी भी फैसले की उम्मीद नहीं की जा सकती थी जो कि सोनिया परिवार की पकड़ को जरा भी कमजोर करने वाला हो। तीन दिनों की सारी कार्रवाई को देखें तो उसका लब्बो-लुआब यही है कि सोनिया, राहुल, और प्रियंका जैसा चाहें, वैसा रह सकते हैं।
लेकिन कल राहुल गांधी के एक लंबे भाषण में उन्होंने एक बात कही जो कि 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ जाती हुई बात दिखती है। राहुल ने कहा कि देश में चल रही यह राजनीतिक लड़ाई लंबी है, यह लड़ाई क्षेत्रीय पार्टियां नहीं लड़ सकतीं, क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी को नहीं हरा सकतीं क्योंकि उनके पास विचारधारा नहीं है। राहुल ने कहा कि यह लड़ाई केवल कांग्रेस ही लड़ सकती है। इस सदी में कांग्रेस ने दस बरस लगातार देश पर राज किया है, और वह मोटे तौर पर क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से ही यूपीए नाम का गठबंधन बनाकर किया है। पिछले दो आम चुनावों में तो कांग्रेस इस तरह मटियामेट हुई है कि उसकी अपनी गिनती उसे अगले कुछ चुनावों तक देश पर राज करने के करीब ले जाने की कोई संभावना नहीं दिखाती। मनमोहन सिंह सरकार पूरी तरह से क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से बनी और चली थी, और उन दस बरसों के गठबंधन को अपनी पार्टी के एक मंच से इस तरह औपचारिक रूप से खारिज कर देना समझदारी की बात नहीं है। फिर यह कांग्रेस पार्टी का अहंकार ही दिखता है कि वह क्षेत्रीय पार्टियों को बिना विचारधारा का कह रही है, और यह कह रही है कि क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी को नहीं हरा सकतीं, और यह लड़ाई केवल कांग्रेस ही लड़ सकती है।
राहुल सहित तमाम कांग्रेस नेताओं के सामने यह बात साफ है कि कांग्रेस की मौजूदगी देश भर में बिखरी हुई जरूर है, लेकिन उसकी कोई ताकत बहुत से राज्यों में बची नहीं है। अभी उत्तरप्रदेश में चार सौ से अधिक सीटों पर पंजा छाप के उम्मीदवार थे, और इक्का-दुक्का सीटें पाकर कांग्रेस तकरीबन तमाम सीटों पर जमानत खो चुकी है। ऐसे में उत्तरप्रदेश में एक क्षेत्रीय पार्टी, समाजवादी पार्टी, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां कांग्रेस के मुकाबले अधिक मजबूत दिखती हैं, और क्षेत्रीय पार्टियों के महत्व को कम आंकना, खारिज कर देना, कांग्रेस की अदूरदर्शिता के अलावा कुछ नहीं है। ऐसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ कौन सी क्षेत्रीय पार्टियां जाना चाहेंगी जिसका भूतपूर्व और भावी अध्यक्ष क्षेत्रीय पार्टियों को विचारधाराविहीन कहता है।
कांग्रेस के इस आयोजन में पार्टी को लेकर कई किस्म के छोटे-छोटे फैसले लिए गए, जो कि चेहरे को सजाने की कोशिश अधिक दिख रहे हैं। पिछले एक बरस से अधिक से पार्टी के दो दर्जन बड़े नेताओं ने लीडरशिप के सामने कई सवाल खड़े किए हैं, और तीन दिन लंबी इस चर्चा में भी पार्टी उन सवालों से बचकर निकल गई है, न तो पार्टी लीडरशिप पर उसने कुछ कहा, और न ही सोनिया परिवार पर। इन दोनों मुद्दों पर तमाम संभावनाओं को खुला रखकर, और अपने हाथ में रखकर आज की कांग्रेस लीडरशिप ने यथास्थिति कायम रखी है। कांग्रेस का ऐसा शिविर 2013 के बाद, यानी करीब दस बरस बाद हो रहा है, और यह कांग्रेस के मौजूदा खतरों को कहीं से भी कम करते नहीं दिखता है, न ही पार्टी की ऐसी नीयत दिखती है कि वह अपनी बुनियाद में आ चुकी कमजोरी को मंजूर करने को तैयार है। किसी भी समस्या का समाधान तभी निकल सकता है जब उस समस्या के अस्तित्व को माना जाए। आज कांग्रेस अपनी किसी भी बड़ी समस्या के अस्तित्व को ही मानने के लिए तैयार नहीं है, ऐसे में वे ही कांग्रेस नेता खुश होते हुए लौटे होंगे जिन्हें किसी पैमाने के तहत इस चिंतन शिविर में जाने का मौका मिला होगा। लेकिन ऐसी ही खुशी है जो कि पार्टी को अंधेरे में रखती है, खतरों की तरफ से उसकी आंखों को बंद रखती है। इस शिविर के बारे में तीन दिन पढऩे के बाद आज भी हमारे पास यह मानने की कोई वजह नहीं है कि यह पार्टी तीन दिन पहले के मुकाबले आज अधिक जागरूक और अधिक तैयार पार्टी है।
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भारत सरकार का एक और फैसला लोगों को हैरान भी कर रहा है, और अनाज की कमी का सामना कर रही दुनिया को सदमा भी पहुंचा रहा है। लेकिन खुद हिन्दुस्तान के भीतर अभी यह साफ नहीं है कि केन्द्र सरकार ने एक हफ्ते के भीतर अपनी खुद की नीतिगत घोषणाओं पर इतना बड़ा यूटर्न क्यों लिया है? दुनिया में गेहूं की एक तिहाई सप्लाई अकेले यूक्रेन-रूस से होती थी, और अब वहां चल रही जंग की वजह से वहां से कुछ भी अनाज निकलना बंद है। ऐसे में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है, और दुनिया की निगाहें भारत की ताजा फसल पर लगी हुई थी। हिन्दुस्तानी किसान, हिन्दुस्तानी कारोबारी, सभी को यह उम्मीद थी कि बढ़े हुए अंतरराष्ट्रीय दामों पर उनका गेहूं दूसरे देशों में हाथों हाथ लिया जाएगा, और सबको कमाई होगी। खुद सरकार ने इसी हफ्ते गेहूं रिकॉर्ड निर्यात के लक्ष्य की घोषणा की थी, और यह कहा था कि भारत अपने कारोबारी प्रतिनिधि मंडल को किन-किन देशों में भेजने जा रहा है जिससे कि निर्यात को मजबूत करने के नए तरीके निकाले जा सके। लेकिन हफ्ता भी पूरा नहीं गुजरा, और केन्द्र सरकार ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया।
दुनिया के कई विकसित देशों ने भारत के इस फैसले पर अफसोस जाहिर किया है। जी-7 देशों ने खुलकर भारत के इस फैसले की निंदा की है। जर्मन कृषि मंत्री ने कहा है कि अगर हर देश इसी तरह निर्यात प्रतिबंध लगाते चलेगा तो उससे हालात बहुत बुरे होंगे। दुनिया को हिन्दुस्तानी यूटर्न पर हैरानी इसलिए भी हो रही है कि भारत में इस बरस गर्मी का मौसम आने के पहले पड़ी भयानक गर्मी से गेहूं की फसल घट जाने का अनुमान कई हफ्ते पहले ही आ चुका था। भारत की अपनी घरेलू जरूरत, यहां लोगों को सरकारी राशन में मुफ्त या रियायती दिया जाने वाला अनाज भी सरकार की फाइलों में अच्छी तरह दर्ज था। सरकार के पास अनाज का कितना स्टॉक है, और अगले बरस की फसल आने तक कितने स्टॉक की जरूरत रहेगी, किसी प्राकृतिक विपदा की नौबत में कितना अनाज सुरक्षित रखा जाना जरूरी है, ये तमाम आंकड़े कृषि अर्थव्यवस्था और अनाज के कारोबारी में लगे आम लोगों की भी जुबान पर हैं। इसलिए यह कल्पना नहीं की जा सकती कि भारत सरकार में बैठे हुए पूरी तरह से जानकार लोगों को इस एक हफ्ते में अचानक कोई नई जानकारी मिली है जिससे कि सरकार का रूख इतना बदल गया है।
इस तस्वीर को देखने के कई अलग-अलग पहलू हैं। पहली बात तो यह कि आज दुनिया में जब दसियों करोड़ लोगों के भूख से मरने की नौबत आई हुई है, उस वक्त हिन्दुस्तान को अपना अंतरराष्ट्रीय सरोकार भी निभाना चाहिए। दूसरी बात यह कि निर्यात पर रोक लगने से भारतीय किसान को भी उसकी उपज का अच्छा दाम नहीं मिल सकेगा, और इसीलिए किसान संगठनों से लेकर कांग्रेस पार्टी तक ने सरकार के इस निर्यात प्रतिबंध का विरोध किया है। कांग्रेस नेता पी.चिदम्बरम ने सार्वजनिक रूप से इस प्रतिबंध को किसान-विरोधी कहा है, और कहा है कि आज बढ़े हुए दामों पर निर्यात से जो फायदा किसानों को हो सकता था सरकार उन्हें उससे वंचित कर रही है। उनका कहना है कि सरकार खुद गेहूं की खरीदी करने में पीछे रही है, और इसीलिए आज वह निर्यात को रोक रही है। दूसरी तरफ देश में गरीबों को मुफ्त या रियायती अनाज देने के हिमायती तबके की प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है कि सरकार की कल्याण योजनाओं में जाने वाले अनाज को लेकर हालात क्या हैं, और गरीबों को ध्यान में रखते हुए सरकार को अनाज कितना बचाकर रखना चाहिए।
लेकिन इन सबसे परे सबसे अधिक सदमा पहुंचाने वाली बात केन्द्र सरकार के फैसले का तरीका है। चार दिन पहले जो हिन्दुस्तानी अनाज निर्यात का एक नया रिकॉर्ड बनाने की घोषणा कर रही थी, जिसने देशों की शिनाख्त कर ली थी कि किन देशों में गेहूं निर्यात संभावना के लिए हिन्दुस्तानी प्रतिनिधि मंडल जाएंगे, और सरकार की निर्यात घोषणा के पहले से भी दुनिया को उम्मीद थी कि रूस-यूक्रेन से आई कमी की भरपाई में भारत मददगार होगा। ऐसी तमाम बातों को चार दिन के भीतर ही कूड़े के ढेर में डाल देने का केन्द्र सरकार का यह फैसला समझ से परे है, यह लापरवाह, मनमाना, और सरोकारविहीन फैसला लगता है। न तो इससे हिन्दुस्तानी किसान खुश हैं, और न ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी। भारत वैसे भी यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर अपनी चुप्पी की वजह से दुनिया के एक बड़े हिस्से की आलोचना झेल रहा है। बहुत से लोगों को यह निराशा हो रही है कि भारत विश्व शांति के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं कर रहा है, या कोई भी कोशिश नहीं कर रहा है। भारत के बारे में ऐसा भी लग रहा है कि उसने अपने लोगों की जरूरतों को सबसे ऊपर रखा है, और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से वह पीछे हट गया है। उस विश्वधारणा में अब गेहूं को लेकर सरकार का फैसला और जुड़ गया है। आज जब दुनिया में अनाज की नौबत यह है कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की मदद से जिन देशों में लोग जिंदा हैं, उन देशों में भी अब अनाज की कमी के चलते हर व्यक्ति को एक वक्त का खाना देने के बजाय कुछ आबादी को दोनों वक्त का खाना देकर जिंदा रखा जा रहा है, और कुछ लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है कि सबकी मौत के बजाय कुछ को जिंदा रखना बेहतर है। ऐसी भयानक नौबत के वक्त हिन्दुस्तान पहले तो खुद होकर अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही और जिम्मेदारी का दावा करता है, और फिर हफ्ता गुजरने के पहले ही इतना बड़ा फैसला बदल लेता है जिससे दुनिया की भूख जुड़ी हुई है। भारत सरकार का यह फैसला हमारे जैसे लोगों को भी सदमा देता है जो कि भारत को आजाद इतिहास में अंतरराष्ट्रीय मुखिया देखते आए हैं, और जिन्हें आज भी इस देश से अधिक जिम्मेदार रहने की उम्मीद थी।
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अब मानो कि हिन्दुस्तान में महंगाई, बेरोजगारी, मंदी जैसी सुबह से शाम तक की दिक्कतें खत्म हो चुकी हों, अब एक और बड़ा विवाद शुरू हुआ है। कल ही तमिलनाडु के शिक्षामंत्री का एक दीक्षांत समारोह में दिया गया भाषण टीवी पर छाया हुआ था जिसमें वे हिन्दी को पानीपूरी (गुपचुप) बेचने वालों की भाषा करार दे रहे थे, और अंग्रेजी पढऩे की वकालत कर रहे थे। आज वहां के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना को चि_ी लिखकर तमिल को मद्रास हाईकोर्ट की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग की है। उन्होंने इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंच की भी मांग की है। कल जब दीक्षांत समारोह में हिन्दी के बारे में कुछ हल्की जुबान में मंत्री का भाषण हुआ तो देश की कुछ पार्टियों के नेताओं ने इसकी आलोचना की थी। अब मुख्यमंत्री ने जो मांग की है, उसमें हिन्दी के खिलाफ तो कुछ नहीं है लेकिन तमिल के हक की बात जरूर है। उन्होंने तर्क दिया है कि राजस्थान, एमपी, बिहार, और यूपी के हाईकोर्ट में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी भी आधिकारिक भाषा है, इसलिए हैरानी होती है कि अन्य राज्यों की राजभाषा को अंग्रेजी के साथ-साथ हाईकोर्ट की राजभाषा बनाने में क्या दिक्कत है?
इस मांग का एक दिलचस्प ताजा इतिहास अभी हफ्ते भर पहले प्रधानमंत्री मोदी का एक भाषण है जिसमें उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश और केन्द्रीय कानून मंत्री की मौजूदगी में कहा था कि देश भर में मौजूद अदालतों में स्थानीय भाषाओं में सुनवाई होनी चाहिए ताकि वहां के स्थानीय लोगों को कोर्ट की कार्रवाई और उसके काम करने के तरीके के बारे में समझ आ सके। मोदी का कहना शायद जिला अदालतों के बारे में था जहां आमतौर पर स्थानीय लोगों के मुकदमे चलते हैं, और स्थानीय भाषा जानने वाले वकील रहते हैं। अगर उनकी बात राज्यों के हाईकोर्ट के बारे में भी थी, तो भी यह बात समझ आती है क्योंकि जब अदालतों की भाषा लोगों की समझ से परे की रहती है तो उन पर वकीलों, जांच अधिकारियों, गवाहों, और कोर्ट कर्मचारियों के हाथों शोषण का खतरा मंडराने लगता है। वे यह भी नहीं समझ पाते कि उनके बारे में उनके वकील अदालत को क्या समझा रहे हैं। ऐसे में स्थानीय भाषा को मजबूती देना, स्थानीय लोगों को मजबूत करना होगा। इसलिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की यह मांग देश के हर हिस्से पर लागू हो सकती है, और अंग्रेजी के अलावा हिन्दी या उस प्रदेश की भाषा को अदालती भाषा बनाया जा सकता है।
आज देश के तमाम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी में काम करते हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भी देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं, और वहां वकालत करने वाले वकील भी गैरहिन्दी भाषी भी रहते हैं। ऐसे में बड़ी अदालतों की भाषा अंग्रेजी रखना एक सहूलियत की बात है क्योंकि तमिलनाडु से कोई जज उत्तराखंड जाकर वहां मामलों की हिन्दी सुनवाई शायद न समझ सकें। अगर भाषाओं की ऐसी व्यवस्था हाईकोर्ट में की जाती है, तो उससे फिर जजों के तबादलों पर भी एक किस्म की सीमा तय करनी होगी ताकि स्थानीय भाषा को समझने वाले जज ही वहां के हाईकोर्ट में तैनात किए जाएं। इसके बाद अदालती कार्रवाई, कागजात, आदेश और फैसले के अनुवाद का एक बड़ा काम शुरू हो जाएगा, और उसके बारे में भी सोचने की जरूरत पड़ेगी। आज तो किसी एक हाईकोर्ट की सुनवाई में दूसरे प्रदेशों की हाईकोर्ट के फैसले भी विस्तार से गिनाए जाते हैं, अलग-अलग प्रदेशों में क्षेत्रीय भाषाओं में काम होने से इस बारे में भी एक दिक्कत आ सकती है, लेकिन सभी दिक्कतों से पार पाने का भी रास्ता ढूंढा जा सकता है।
एम.के. स्टालिन ने जो दूसरा मुद्दा उठाया है वह सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंच का है। यह बहुत नई मांग नहीं है, और दक्षिण के लिए इसकी मांग लंबे समय से होते आई है। दक्षिण के आधा दर्जन राज्यों के लिए अगर सुप्रीम कोर्ट की ऐसी क्षेत्रीय बेंच बनती है, तो उससे दिल्ली पर बोझ भी घटेगा। लेकिन बड़ी संवैधानिक पीठ के लिए फिर भी मामलों को दिल्ली की सुप्रीम कोर्ट तक आना पड़ेगा, और यह व्यवस्था किस तरह काम करेगी यह कानून-प्रशासन के बेहतर जानकार लोग बेहतर तरीके से बता सकेंगे। इतना जरूर है कि जब एक राज्य में हाईकोर्ट की अलग बेंच बन सकती है, तो देश में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच बनाने की सोच में कोई खामी नहीं दिखती है, उस पर अमल के तरीके ढूंढने होंगे। तमिलनाडु की आज की सत्तारूढ़ द्रमुक पार्टी द्रविड़-अस्मिता के मुद्दे वाली पार्टी है, और भाषा से लेकर सुप्रीम कोर्ट के विकेन्द्रीकरण तक की बात उसकी विचारधारा से मेल खाने वाली उसकी पुरानी मांग है। आज देश की राजनीति और देश का वातावरण जिस तरह से हिन्दू, हिन्दुत्व, उत्तर भारत के मुद्दों से लद गया है, उसमें ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही है कि दक्षिण अपनी मौजूदगी भी दिखाना चाहे, और अपने हक का दावा भी करे।
हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि दिल्ली के विकेन्द्रीकरण की जरूरत है। केन्द्र सरकार, संवैधानिक संस्थाएं, और विदेशी दूतावास, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जिस अनुपातहीन तरीके से दिल्ली में केन्द्रित हैं, वह तस्वीर बदलनी चाहिए। आज दिल्ली एक दमघोंटू शहर हो गया है, और इसे जीने लायक बनाने का तरीका यही है कि केन्द्र सरकार राज्यों से प्रस्ताव बुलवाए कि वे केन्द्र सरकार, और संवैधानिक संस्थाओं, राष्ट्रीय संगठनों के दफ्तरों के लिए अपने राज्य में जमीन या ढांचागत सुविधा, क्या दे सकते हैं। जिन दफ्तरों का एक-दूसरे से रोजाना वास्ता नहीं पड़ता है, उन्हें देश के अलग-अलग प्रदेशों में ले जाना चाहिए, इससे कामकाज का ढांचा तो बिखरेगा, लेकिन लोगों की आवाजाही से देश की एकता और अखंडता बढ़ेगी। आज हर बात के लिए दिल्ली की दौड़ लगाने से बेहतर यह होगा कि अलग-अलग दफ्तर अलग-अलग प्रदेशों में रहें ताकि वहां पर क्षेत्रीय विकास भी हो सके, और लोगों के बीच नकली राष्ट्रीयता के बजाय असली राष्ट्रीय एकता की भावना आ सके। ऐसा न होने का ही नतीजा है कि आज दक्षिण भारत अपने आपको उत्तर से कटा हुआ मानता है, उपेक्षित मानता है, और उसे यह लगता है कि राष्ट्रीय योजनाओं में उसे महत्व नहीं मिलता। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की कही बातों को भाषा और बेंच से परे भी भावना के स्तर पर समझने की जरूरत है, और फिर देश की शहरी योजना तो यह सुझाती ही है कि दिल्ली का विकेन्द्रीकरण किया जाए।
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मध्यप्रदेश का डिंडौरी जिला छत्तीसगढ़ के करीब है, और इसकी पहचान एक आदिवासी इलाके के रूप में होती है। लेकिन अभी चार दिन पहले की एक खबर बताती है कि ऐसे इलाके में भी हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक तनाव इतना बढ़ गया है, और मध्यप्रदेश की भाजपा की शिवराज सिंह सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में बुलडोजर को अल्पसंख्यकों के खिलाफ जिस तरह एक राजकीय हथियार बनाकर चल रही है, वह नौबत कितनी भयानक हो सकती है। एक हिन्दू लडक़ी और मुस्लिम लडक़े के बीच स्कूल के समय से मोहब्बत चली आ रही थी, और दोनों के परिवारों को भी यह बात मालूम थी। लेकिन लडक़ी का परिवार इस शादी के लिए तैयार नहीं था, इसलिए लडक़ी खुद घर छोडक़र चली गई और उसने फोन करके लडक़े को बुलाया, और दोनों ने जाकर एक हिन्दू मंदिर में शादी कर ली। इस पर लडक़ी के परिवार ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई और हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों ने प्रदर्शन करते हुए प्रशासन से यह मांग की कि इस लडक़े के परिवार के घर-दुकान गिराए जाएं। चूंकि भारत में हिन्दुत्व के सबसे कट्टर राज, उत्तरप्रदेश से यह सिलसिला शुरू हो चुका है कि मुस्लिमों को खत्म करने के लिए उनके सिर की छत और उनके रोजगार को बुलडोजर से खत्म कर दिया जाए, इसलिए हिन्दुत्व टीम के उपकप्तान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी इसी श्लोक का पाठ करते हैं, और उन्होंने जगह-जगह यही काम किया भी है। यह किसी और का आरोप नहीं है बल्कि डिंडौरी के कलेक्टर रत्नाकर झा ने खुद होकर कई तस्वीरें पोस्ट की हैं, और यह लिखा है- डिंडौरी जिले में छात्रा के अपहरण के मामले में आरोपी आसिफ खान के दुकान और मकान को जमींदोज कर दिया गया है। दो दिन तक आरोपी आसिफ खान की दुकानों सहित उसके अवैध मकान पर कार्रवाई की गई है। इसके साथ माफियामुक्तएमपी का हैशटैग भी लगाया गया है, और इस ट्वीट को सीएममध्यप्रदेश को टैग भी किया गया है। कलेक्टर ने लिखा है कि उन्होंने कार्रवाई करते हुए बुलडोजर/जेसीबी चलवाकर दुकानों और मकान को तोड़ दिया है। अब हिन्दू लडक़ी और मुस्लिम लडक़े की शादी पर साम्प्रदायिक संगठन तो अभी तक खुद बुलडोजर नहीं चला पा रहे हैं, लेकिन उनके लिए यह अधिक सहूलियत की बात है कि उनकी फरमाईश को प्रशासन विविध भारती की तरह पूरा कर रहा है, और सरकारी खर्च पर, पुलिस की मौजूदगी में मुस्लिमों के घर-दुकान जमींदोज किए जा रहे हैं। इस लडक़े के परिवार को पूरा गांव छोडक़र चले जाना पड़ा है, और रिश्तेदारों के यहां दिन गुजार रहे हैं। परिवार का कहना है कि 1992 में पंचायत ने सभी की सहमति से उन्हें यह घर आबंटित किया था।
हिन्दुस्तान में इन दिनों चल रहे बुलडोजर-इंसाफ पर सुप्रीम कोर्ट का रूख भी बड़ा ही हैरान करने वाला है। सीपीएम की नेता बृन्दा करात दिल्ली में मुस्लिमों बस्तियों पर बुलडोजर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची हुई हैं, और उन्हें अदालत ने प्रभावित पक्ष मानने से इंकार कर दिया, और हाईकोर्ट जाने कहा है। तब तक दिल्ली में छांट-छांटकर मुस्लिमों इलाकों में बुलडोजर चलाना जारी है, अधिकतर जगहों पर लोगों का कहना है कि उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला था। अब डिंडौरी के मामले से तो यह जाहिर है कि हिन्दू-मुस्लिम शादी के चार दिन के भीतर अगर प्रशासन बड़े गर्व के साथ मुस्लिम परिवार के मकान-दुकान को जमींदोज करने की कामयाबी लिख रहा है, और मध्यप्रदेश को माफियामुक्त कराने का दंभ भी दिखा रहा है, तो इसके लिए अब क्या किसी अमरीकी अदालत में जाकर अपील की जाए? अगर हिन्दुस्तान में बड़ी अदालतों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास है, तो अब तक मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को खुद होकर इस मामले में राज्य सरकार और डिंडौरी कलेक्टर को नोटिस जारी करना था, और पूछना था कि दो वयस्क लोगों की शादी में कौन सी माफिया हरकत शामिल है, और किस तरह प्रशासन किसी के मकान-दुकान को जमींदोज करने का काम कर सकता है? अगर अदालत इतना भी पूछने का सरदर्द नहीं ले रही है, तो फिर इंसाफ की गुंजाइश कम ही दिखती है। कायदे की बात तो यह होती कि सीधे सुप्रीम कोर्ट को ऐसे नोटिस जारी करने थे, और पगड़ी बांधे प्रोफाइल फोटो वाले कलेक्टर को कटघरे में बुलाना था। अदालतों को और कुछ नहीं तो कम से कम यह तो सोचना ही चाहिए कि एक बुलडोजर उनका विकल्प बना दिया गया है, और हिन्दुस्तान में न्यायपालिका का एकाधिकार एक कलेक्टर या म्युनिसिपल कमिश्नर छीन ले रहे हैं। ऐसा लगता है कि आंखों पर पट्टी बांधी हुई न्याय की देवी की आत्मा गुजर चुकी है, और एक मुर्दा बदन से तराजू टंगा रह गया है।
सुप्रीम कोर्ट बृन्दा करात के मामले की सुनवाई करते हुए इस बात को जाने क्यों अनदेखा कर रहा है कि भाजपा के राज वाले कई प्रदेशों में एक सिलसिले से ऐसे बुलडोजर चल रहे हैं। फिर हिन्दुस्तान में बीते कई दशकों में धीरे-धीरे करके अल्पसंख्यक समुदायों की रिहाईश हर शहर में कुछ चुनिंदा इलाकों में होती चली गई है। ऐसी मुस्लिम बस्तियों को कई शहरों में साम्प्रदायिक जुबान में मिनी पाकिस्तान कहा जाता है, और यहां तक म्युनिसिपल की सहूलियतें, या राज्य सरकार की इलाज और पढ़ाई की सहूलियतें बहुत कम पहुंच पाती हैं। ऐसे में मुस्लिम इलाकों की शिनाख्त एकदम साफ रहती है, और अब जब सरकारी बुलडोजरों को मुस्लिमों के कपड़े सुंघाकर उनके खिलाफ छोड़ा जा रहा है, तो भी इस नौबत को देखने से सुप्रीम कोर्ट इंकार कर रहा है। जब लोगों की जिंदगी भर की कमाई, रोजगार का अकेला जरिया, सिर छुपाने की अकेली छत, इन सबको बड़े गर्व के साथ खत्म किया जा रहा है, तब भी सुप्रीम कोर्ट के माथे पर शिकन नहीं आ रही है। ऐसे ही बुलडोजर किसी दिन असहमति वाले जजों के गाऊन सुंघाकर उनके पीछे छोड़े जाएंगे, तो उस दिन जजों के पास कोई नोटिस जारी करने के कलम-कागज भी नहीं बचेंगे।
यह नौबत ऐसी दिख रही है कि हिन्दुस्तानी अदालतों से कोई राहत न मिलने पर अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या संयुक्त राष्ट्र संघ में अपील की जाए, और अभी कम से कम राजद्रोह के नए मामले दर्ज करने पर रोक लगी है, इसलिए ऐसी अपील करने वालों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा तुरंत दर्ज नहीं हो सकेगा। लेकिन आज जिस तरह धर्म देखकर बुलडोजर हांका जा रहा है, उसके खिलाफ अदालतों में जैसा सन्नाटा दिख रहा है, वह नौबत लोकतंत्र में बर्दाश्त करने लायक नहीं है। ऐसी अदालती चुप्पी और अनदेखी के खिलाफ भी लोगों को सडक़ों पर आना चाहिए।
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