संपादकीय
छत्तीसगढ़ विधानसभा में अभी एक सवाल के जवाब में सरकार को ये आंकड़े सामने रखने पड़े कि पिछले महीने राज्य में हुए एक अंतरराष्ट्रीय रामायण मेले में मंच पर जिन कलाकारों का प्रदर्शन हुआ था उन्हें कितना भुगतान किया गया। इसमें कुछ मशहूर कलाकारों को 15 से 25 लाख रूपए के बीच दिए गए, और कुमार विश्वास नाम के एक कवि को अकेले ही 60 लाख रूपए दिए गए। इस मंच पर छत्तीसगढ़ के कलाकारों को जो भुगतान किया गया वह सदमा देता है, यहां के एक सबसे मशहूर गायक दिलीप षडंगी को 1 लाख 13 हजार रूपए, दिए गए, किसी और को एक लाख से भी कम, और राज्य के सबसे मशहूर रामनामी सम्प्रदाय के कलाकार गुलाराम रामनामी को 33 हजार रूपए दिए गए। लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि इस राज्य का रामनामी सम्प्रदाय ऐसे लोगों का है जिनमें सिर से पैर तक एक-एक इंच जगह पर राम-राम गुदवा लेने वाले लोग हैं, और ये रामचरित मानस का गायन करते हैं, उस पर नृत्य करते हैं, और इनका परंपरागत प्रदर्शन देखने लायक होता है। ये लोग छत्तीसगढ़ के दलित समुदाय के हैं, और इस समुदाय के सबसे चर्चित कलाकार गुलाराम रामनामी से 180 गुना अधिक भुगतान कुमार विश्वास को किया गया!
सरकार का रूख सरकारी ही होता है, फिर चाहे यह भाजपा की सरकार हो, या कांग्रेस की। लोगों को याद होगा कि जब भाजपा सरकार ने 2012 में राज्य स्थापना दिवस पर करीना कपूर को 8 मिनट के डांस के लिए करीब डेढ़ करोड़ रूपए दिए थे, तो कांग्रेस ने इसका मुद्दा बनाया था, और छत्तीसगढ़ी कलाकारों को बढ़ावा न देने, संरक्षण न देने का आरोप रमन सरकार पर लगाया था। अब अगर देखें तो रामायण मेले में छत्तीसगढ़ के रामनामी सम्प्रदाय से अधिक और किसका हक होना था? यह सम्प्रदाय इतना महत्वपूर्ण है कि दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में इस पर शोधकार्य हुए हैं, और इन्हें सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई में जगह-जगह पाठ्यक्रमों में रखा गया। इस समाज के सबसे प्रमुख कलाकार को 33 हजार रूपए देना इतना शर्मनाक है कि वह हक्का-बक्का ही करता है। राज्य के ऐसे बहुत से संस्कृति आयोजन होते हैं जिनमें अखबारनवीसों को आदिवासी नृत्य का निर्णायक बनाया जाता है, और बिना किसी विशेषज्ञता के, बिना जानकार हुए, उन्हें महज महत्व देने के नाम पर घंटे-दो घंटे की मौजूदगी के लिए 25-25 हजार रूपए तक दिए जाते हैं। ऐसे में रामायण मेले में रामनामियों के साथ यह सुलूक छत्तीसगढ़ सरकार की राम-नीति के भी ठीक खिलाफ है। माता कौशल्या के मंदिर का जीर्णोद्धार करके उसे पर्यटन स्थल में बनाने को यह सरकार अपनी एक बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि बताती है। राम वन गमन पथ नाम का एक पर्यटन घेरा बनाने में सरकार डेढ़ सौ करोड़ खर्च कर रही है। ऐसे में बदन के रग-रग पर राम गुदवाकर उसी को अपनी कला-संस्कृति बनाकर चलने वाले समुदाय को कुमार विश्वास जैसे मंच के सतही कवि के मुकाबले धूल सरीखा मेहनताना देना माता कौशल्या को तो बिल्कुल ही नहीं सुहाएगा। अंतरराष्ट्रीय रामायण मेले का यह मंच दुनिया के कई देशों के सामने छत्तीसगढ़ की सबसे समृद्ध राम परंपरा को रखने का मौका भी था, और सरकार के अपने आंकड़े साबित करते हैं कि उसने इस परंपरा के साथ क्या सुलूक किया है।
हैरानी की बात यह है कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बढ़ावा देने वाले, और उसे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बनाने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के मातहत ऐसा हुआ है। छत्तीसगढ़ के लोक गायक दिलीप षडंगी के एक-एक कार्यक्रम को सुनने के लिए दसियों हजार लोग जुटते हैं, उनके कैसेट लाखों की संख्या में बिकते आए हैं, और उन्हें कुमार विश्वास से दो-ढाई फीसदी मेहनताना अगर दिया गया है, तो इससे अच्छा यह होता कि एक कुमार विश्वास को न बुलाया जाता, और उनकी जगह छत्तीसगढ़ के दस-बीस कलाकारों का ठीक से सम्मान हो जाता। यह तो विधानसभा में जानकारी मांगने की आजादी है, और सरकार की जानकारी देने की मजबूरी है कि रमन सिंह सरकार का करीना कपूर को करीब डेढ़ करोड़ का भुगतान भी उजागर हुआ, और इस बार के रामायण मेले के भुगतान का हक्का-बक्का करने वाला फर्क भी दिखा।
दरअसल बहुत समय से शास्त्रीय कलाओं की तरह ही लोक कलाएं भी धीरे-धीरे करके सरकारों की मोहताज होकर रह गई हैं। एक वक्त लोक कला लोक जीवन का एक हिस्सा होती थी, लोगों के लिए घरों की दीवारें कैनवास रहता था, समाज के त्यौहार और सुख-दुख के दूसरे मौके नृत्य, संगीत, और दूसरे रीति-रिवाजों के मौके रहते थे। बाद में सब कुछ सरकार की मेहरबानी पर टिकने लगा। कई मंत्री-मुख्यमंत्री और अफसर अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से ऐसे रहते आए हैं कि उन्होंने सरकारी खजाने से ही शास्त्रीय कलाकारों और लोक कलाकारों को संरक्षण दिया। भोपाल का भारत भवन ऐसा ही एक बड़ा केन्द्र था जिसे उस वक्त के मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह और उनके संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी ने तैयार किया था, और जिसने देश के कला नक्शे पर एक अनोखी जगह बनाई थी। हमने उस वक्त के उसके खाता-बही नहीं देखे हैं, और हो सकता है कि उस वक्त भी भुगतान या मेहनताने में इस किस्म का फर्क रहा हो, लेकिन जहां तक याद पड़ता है, एक-एक लोक कलाकार को उसकी कलाकृति के लिए उसकी मांग और उम्मीद से बहुत अधिक भुगतान किया गया था।
कोई सरकार अगर स्थानीय संस्कृति या लोक कलाकारों को बढ़ावा देने की बात करती है, तो उसे बाहर से सितारा कलाकारों को बुलाने का मोह छोडऩा चाहिए। रामायण मेले में रामायण का मंच प्रदर्शन करने वाली देश-विदेश की टीमों का आना तो ठीक था, लेकिन कुमार विश्वास सरीखे नए राम-प्रवचनकर्ता को इतना बड़ा दाम देकर लाना, और स्थानीय लोगों को कुछ टुकड़े डाल देना बहुत ही खराब फैसला था। किसी भी संवेदनशील सरकार को इससे बचना चाहिए, यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति को पिछले दस-बीस बरस से इसी लायक मान लिया गया है कि कोई आईएफएस अफसर उसे जंगल की तरह चलाए। एक वक्त था जब मध्यप्रदेश में कला और संस्कृति को लेकर सरकारें संवेदनशील दिखती थीं, अब यह बात वहां भी खत्म हो गई, और छत्तीसगढ़ में भी खत्म हो गई। यह तो अच्छा हुआ कि विधानसभा में यह बात उठी, और लोगों को इस बारे में सोचने का मौका मिलेगा, और स्थानीय लोक कलाकारों को भी अपनी हैसियत पता लगेगी।
इजराइल के बारे में आज एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यह देश अपने इतिहास के सबसे गंभीर घरेलू संकट से घिरा हुआ है। वहां लाखों जनता सडक़ों पर है, और पुलिस की पानी की बौछारों के सामने भी लाख से अधिक लोग राजधानी में संसद को जाने वाले रास्तों को घेरकर खड़े हैं, देश के बहुत से और शहरों में सरकार के खिलाफ ऐसे प्रदर्शन हो रहे हैं जिन्हें इजराइल में, या दुनिया के अधिकतर लोकतंत्रों में किसी ने देखा-सुना नहीं था। ऐसे विरोध-प्रदर्शन में इजराइल की एयरफोर्स के रिजर्व पायलटों ने भी विमान उड़ाने से इंकार कर दिया था।
यह सारा विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि आज की वहां की सरकार संसद में संविधान में ऐसे बुनियादी फेरबदल का कानून पास कर रही है जिससे देश की अदालतें सरकार के लिए गए फैसलों को असंवैधानिक करार नहीं दे पाएंगी। इस कानून के बाद अब वहां का सुप्रीम कोर्ट सरकारी फैसलों को नहीं पलट सकेगा। इसे इजराइल की जनता देश में लोकतंत्र का खात्मा मान रही है। संसद में विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया है, लेकिन वहां की आज की सरकार इजराइल की इतिहास की सबसे कट्टर, दकियानूसी, और दक्षिणपंथी सरकार मानी जा रही है क्योंकि उसमें शामिल कुछ पार्टियां, और उसके कुछ नेता फिलीस्तीन के खिलाफ भयानक अलोकतांत्रिक और हमलावर नजरिया रखते हैं, और वे धर्मान्ध कट्टरता से भरे हुए हैं। इजराइल में वहां पहले से चले आ रहे एक प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने इस बार बहुमत न मिलने पर सभी किस्म की पार्टियों का एक गठबंधन बनाकर सत्ता पर कब्जा किया है, और इसीलिए वे अधिक से अधिक कट्टर फैसले लेने के लिए मजबूर भी हैं। इस साल के शुरूआत से ही सरकार की इस तथाकथित न्यायिक सुधार योजना के खिलाफ इजराइल की जनता प्रदर्शन करते आ रही है, और देश के तमाम बड़े शहरों और कस्बों में यह चल रहा है। इजराइल के इतिहास में ऐसे प्रदर्शन कभी नहीं हुए थे, और वहां की जनता के एक छोटे हिस्से के शांतिप्रिय होने, और फिलीस्तीन पर हमलों का विरोध करने के बाद भी इजराइली जनता लोकतंत्र को लेकर इतनी संवेदनशील है, यह पहली बार पता लगा है। देश के प्रमुख तबकों के बड़े-बड़े लोग, आज काम कर रहे और रिटायर्ड लोग खुलकर इस सरकारी फैसले के खिलाफ हैं, और जनता का मानना है कि इससे एक किस्म से देश में ऐसी सरकारी तानाशाही खड़ी हो जाएगी जिसके खिलाफ कोई अदालती राहत नहीं मिल सकेगी। जैसा कि किसी भी और लोकतंत्र में होता है, सरकारी मनमानी के खिलाफ अदालतें राहत की एक जगह रहती हैं, लेकिन इजराइल ने यह नया कानून बनाकर इसे खत्म कर दिया है। ऐसा कहा जाता है कि मौजूदा सरकार में प्रधानमंत्री सहित कुछ और लोग भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप और मुकदमे झेल रहे हैं, और इसलिए उन्हें बचाने के लिए सरकार ने यह संवैधानिक फेरबदल किया है।
इजराइल में जनता का इस तरह से लोकतंत्र के पक्ष में उठ खड़ा होना दुनिया भर के बाकी देशों के लिए एक बड़ी मिसाल भी है कि अतिसंपन्न जनता भी लोकतंत्र के पक्ष में अपने आरामदेह घर-दफ्तर छोडक़र इस तरह सडक़ों पर सरकारी फौज के सामने सीना तानकर खड़ी हो सकती है। इजराइल की जनता गरीब और भूखी नहीं है, वहां के लोग दुनिया के सबसे कामयाब कारोबारी हैं, और यही इजराइल जब पड़ोस के फिलीस्तीन पर रात-दिन जुल्म करता है, लोगों की हत्या करता है, हवाई हमले करता है, तब यह इजराइली जनता कभी इस तरह से अपने देश के किए जा रहे ऐसे हमलों के खिलाफ खड़ी नहीं हुई है। लेकिन जब देश के भीतर लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को तोडऩे की यह कार्रवाई चल रही थी, तो पिछले महीनों में इसी जनता ने अपने घरेलू लोकतंत्र के लिए यह ऐतिहासिक और असाधारण प्रदर्शन किया, और ऐसा लगता है कि आज यह सरकार यह सब कर तो पा रही है, लेकिन जनता के ऐसे विरोध के बाद इस सरकार, ऐसे नेताओं, और उनकी पार्टियों का कोई भविष्य नहीं है। अपने देश की न्यायपालिका को इस हद तक कमजोर करने की सरकारी कोशिश के खतरे जनता समझ रही है यह उसकी लोकतांत्रिक समझ का एक सुबूत है। हिन्दुस्तान के एक महान विचारक और नेता राममनोहर लोहिया ने यह कहा भी था कि जिंदा कौमे पांच बरस इंतजार नहीं करतीं, इजराइल की जनता ने यह साबित किया है कि वह अगले चुनाव में इन नेताओं को खारिज करने का इंतजार नहीं करने वाली है, उसने लगातार महीनों से इतना ताकतवर प्रदर्शन करके अपनी लोकतांत्रिक समझ और पक्के इरादों को सामने रखा है। किसी भी जागरूक देश और समाज के लिए ऐसी जागरूक जनता ही सबसे बड़ी ताकत होती है। आज इजराइली जनता ने अपनी ही सरकार को इस हद तक खारिज कर दिया है कि जिसकी कोई हद नहीं। यह देखकर दुनिया के और लोकतंत्रों को एक नसीहत लेनी चाहिए।
यूक्रेन और रूस के मोर्चे पर अभी अमरीका ने यूक्रेन को ऐसे क्लस्टर बम दिए हैं जिनका इस्तेमाल दुनिया के बहुत से विकसित देश कब का बंद कर चुके हैं क्योंकि ये बम जिस जगह गिराए जाते हैं वहां बिना फटे उसके हिस्से बाद में भी नागरिक आबादी को नुकसान पहुंचाते हैं। खुद नाटो देशों में इटली, स्पेन, जर्मनी, और ब्रिटेन इस पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, और दुनिया के सौ देशों में इस पर रोक है। फिर भी अमरीका ने यूक्रेन को इन्हें देना इस तरह न्यायोचित ठहराया है कि इन्हें यूक्रेन अपने ही उन इलाकों पर इस्तेमाल करेगा जिन पर आज रूस ने कब्जा कर रखा है। जाहिर है कि रूस और यूक्रेन के बीच की इस जंग की बारीकियां अमरीका भी देख रहा है, और नाटो सैनिक गठबंधन के 30 और देश भी गंभीरता और फिक्र से यूक्रेन के साथ खड़े हैं, क्योंकि उनकी आशंका यह है कि अगर रूस ने यूक्रेन पर पूरा ही कब्जा कर लिया, तो वह वहां नहीं थमेगा, और दूसरे यूरोपीय देशों की ओर भी बढ़ेगा।
आज नाटो देश जिस फौजी रणनीति की बारीकियों से यूक्रेन को रूस के खिलाफ मदद कर रहे हैं, वह महज यूक्रेन की मदद नहीं है, वह रूस को कमजोर करने की भी एक योजना है, और उसमें अटपटा कुछ नहीं है क्योंकि परमाणु हथियार संपन्न देश जब एक-दूसरे के खिलाफ रहते हैं, तो वे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने से कम की कार्रवाई एक-दूसरे के खिलाफ करना चाहते हैं। अब ऐसी चाहत रूबरू पूरी नहीं हो पाती, और ऐसा मौका कम ही लगता है जब यूक्रेन जैसा रूस का पड़ोसी रूस के खिलाफ मोर्चे पर डटे रहने को तैयार हो, जिससे कि कुल मिलाकर रूस की फौजी ताकत घटती हो। पश्चिमी देशों और नाटो के आर्थिक प्रतिबंधों के चलते रूस का उतना नुकसान नहीं हो पाया है जितने नुकसान की उम्मीद इन देशों ने की थी। अब तक रूस दीवालिया नहीं हुआ है, भारत और चीन जैसे बड़े देशों ने उसके साथ आर्थिक लेन-देन बंद नहीं किया है, और उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था की कमर नहीं टूटी है। ये बातें पश्चिमी देशों को निराश कर रही हैं, और वे यूक्रेन को इस मोर्चे पर मजबूती से डटाए रखना चाहते हैं ताकि उसके कंधों पर बंदूक रखकर रूस की ताकत घटाई जा सके, ताकि किसी और बड़े मोर्चे पर अगर अमरीकी खेमा और रूस आमने-सामने हों, तो रूस खोखला हो चुका रहे।
दुश्मन के दुश्मन को मदद करके अपने सीधे दुश्मन को कमजोर या खोखला करना एक बड़ी स्वाभाविक सोच रहती है, और यह आज यूक्रेन के मामले में खुलकर दिख रही है। यूक्रेन की इस आत्मरक्षा की जंग में इंसानी लहू का नुकसान सिर्फ उसका खुद का हो रहा है, इसलिए उसे फौजी साज-सामान से मदद करना संपन्न देशों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि कोई ताबूत वहां लौटकर नहीं आ रहे हैं। कुछ इतिहासकार इसे यूक्रेन की जमीन से नाटो का प्रॉक्सी-वॉर भी लिखेंगे क्योंकि अपने सैनिकों को झोंके बिना पश्चिम का फौजी मकसद यहां पूरा हो रहा है।
हिन्दुस्तान में आज सुबह तक मणिपुर की जो हालत सुनाई पड़ रही है, उसका उत्तर-पूर्व के कुछ जानकार लोगों का विश्लेषण चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि मणिपुर में आदिवासी कुकी आबादी के खिलाफ इतनी सामूहिक और संगठित हिंसा, इतने महीनों तक, राज्य और केन्द्र सरकार दोनों के संरक्षण में इसलिए चलाई जा रही है कि आदिवासी आबादी के सामने मणिपुर छोडक़र जाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहे, और फिर उसके बाद उनकी जमीनों पर आसानी से कब्जा किया जा सके। क्या यह जमीन के लिए, उसके नीचे के किसी खनिज के लिए मणिपुर की मैतेई-हिन्दू आबादी के हाथों चलवाया जा रहा प्रॉक्सी-वॉर है? क्या यह जातीय हिंसा सोच-समझकर भडक़ाई गई है, और सोच-समझकर इसे जारी रखने दिया गया है? मणिपुर में मैतेई आबादी को झोंककर जिस तरह उसे कुकी आबादी के खिलाफ डटाकर रखा गया है, वह अगर कोई रणनीति है, तो उसमें मैतेई लोग शतरंज के प्यादों की तरह खतरे में पड़ रहे हैं। लोगों का मानना है कि देश के भीतर कोई गृहयुद्ध बिना सरकार की मर्जी के इतना लंबा नहीं खिंच सकता, और इस गहरी साजिश को समझने की जरूरत है। किसी मोर्चे पर परदे के पीछे से रणनीति बना रहे लोगों के अपने व्यापक हित को भी समझने की जरूरत है। आज अमरीका और नाटो के बाकी देश जिस तरह यूक्रेन के हिमायती बने हुए हैं, उसके पीछे उनकी अपनी रूस-विरोधी रणनीति भी समझना जरूरी है जिसमें वे बिना इंसानी जिंदगियां झोंके अपना मकसद पूरा कर रहे हैं। मणिपुर हो, या हिन्दुस्तान का कोई दूसरा आदिवासी इलाका हो, इस तरह के संघर्ष कहीं सरकार, तो कहीं कारोबार के खड़े किए हुए भी रहते हैं, और इनमें स्थानीय समुदायों को प्यादों की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
यूक्रेन के सिलसिले में मणिपुर का जिक्र, या मणिपुर के सिलसिले में यूक्रेन का जिक्र बड़ा अटपटा लग सकता है। लेकिन दुनिया की मिसालों से लोगों को दूसरी जगहों पर कुछ सीखने-समझने की जरूरत रहती है। भारत के उत्तर-पूर्व के अलग-अलग राज्यों के लोग भी केन्द्र सरकार की मणिपुर रणनीति को देखकर हैरान हैं कि आगे जाकर इन बाकी राज्यों में वहां के आदिवासी विवादों पर केन्द्र सरकार का क्या रूख रहेगा? मणिपुर को सिर्फ एक राज्य मान लेना जायज नहीं होगा, वह उत्तर-पूर्व के तमाम राज्यों से एक मिसाल की तौर पर भी जुड़ा हुआ है, और राज्यों की परस्पर आवाजाही, उनके बीच के टकराव का इतिहास तो है ही। क्या मणिपुर की इस हिंसा के अभी-अभी सामने आए वीडियो उत्तर-पूर्व की बाकी आदिवासी आबादी के लिए किसी किस्म की चेतावनी है? ऐसे सवालों का जवाब सतह पर तैरता हुआ तो नहीं दिख रहा है, लेकिन इन पर सोचने की जरूरत है।
धर्म के खिलाफ कुछ लिखा जाए तो अधिक लोग उसे पढऩे तैयार नहीं होते हैं क्योंकि अधिकतर लोग किसी न किसी धर्म से जुड़े रहते हैं, और नास्तिक बहुत कम होते हैं, ऐसे में जब धर्म के बारे में आम बातें लिखी जाएं, बिना किसी एक धर्म के जिक्र के अगर तमाम धर्मों को कोसा जाए, तो उस बारे में पढऩे वाले एकदम कम हो जाते हैं। अभी पिछले दिनों हमने यूरोपीय संसद से लेकर ब्रिटिश पार्लियामेंट तक दुनिया की कुछ सबसे ताकतवर जगहों पर भारत के मणिपुर में चल रही हिंसा पर बहसें सुनीं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस दिन फ्रांस के पेरिस में थे, उसी दिन फ्रांस के एक दूसरे हिस्से में यूरोपीय संसद की एक बैठक में एक-एक करके शायद दर्जनों देशों के प्रतिनिधियों ने मणिपुर की हिंसा पर फिक्र जताई थी, और भारत सरकार से तुरंत कार्रवाई करवाने की अपील की थी। कुछ इसी किस्म की बातें अभी ब्रिटिश पार्लियामेंट से निकले वीडियो में दिख रही हैं जहां कई सांसद मणिपुर के खौफनाक हालात बयां कर रहे हैं। इन दोनों में एक बात जो सबसे ऊपर दिख रही है, वह धर्म है। मणिपुर में ईसाई धर्मस्थानों, यानी चर्चों को सैकड़ों की संख्या में जला दिया गया है, और यूरोप के सांसद इन्हेें ईसाईयों पर हमले की तरह ही देख रहे हैं, जो कि एक हिसाब से सच भी है। लेकिन धर्म के पैमाने से परे कुछ और बातों को लोग नहीं देख रहे हैं, जो कि हमारे हिसाब से उससे ऊपर की बात रहनी चाहिए थी।
लोगों को याद होगा कि मणिपुर में हिंसा शुरू ही हुई थी, और कुछ दिनों के भीतर ही असम रायफल्स के कैम्प में शरण लिए हुए एक परिवार के सात-आठ बरस के बच्चे को बाहर से आई एक गोली लगी थी, और उसे बड़ी गंभीर हालत में अस्पताल ले जाना था, जो कि एक दूसरे समुदाय के कब्जे के इलाके में था। ऐसे में एम्बुलेंस में इस जख्मी और गंभीर बच्चे के साथ उसकी मां जो कि जन्म से मैतेई-हिन्दू थी, लेकिन एक कुकी-ईसाई-आदिवासी से शादी की थी, और उनका यह बच्चा था। ऐसे में जन्म से मैतेई मां, और आधा कुकी, आधा मैतेई बच्चा एम्बुलेंस में अस्पताल जा रहे थे, और उन्हें पहचानकर, मैतेई भीड़ ने एम्बुलेंस को आग लगा दी, और उन्हें निकलने नहीं दिया, मां-बेटे उसमें जलकर मर गए। हमने योरप और ब्रिटेन की पार्लियामेंट के कुछ दर्जन लोगों के बयान सुने, उनमें से तकरीबन हर बयान चर्चों पर हमला, ईसाईयों पर हमला गिना रहा था, लेकिन एक भी बयान ऐसा नहीं था जिसमें कि एम्बुलेंस में जख्मी बच्चे को मां सहित जिंदा जलाकर मार डालने की बात गिनाई हो। यह हिंसा तो एक किस्म से युद्ध-अपराध दर्जे की है क्योंकि मरीज ले जा रही एम्बुलेंस पर किसी देश की फौज भी हमला नहीं करती है, और ऐसे हमले की भी योरप की संसदों में चर्चा नहीं हो रही। मतलब यह कि जिन इंसानों ने धर्म बनाया था, आज यह धर्म उन इंसानों से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
ब्रिटिश संसद में प्रधानमंत्री की धार्मिक स्वतंत्रता पर विशेष दूत ने कहा कि मणिपुर हिंसा में सैकड़ों चर्च जला दिए गए हैं जो कि सोची-समझी साजिश है। उन्होंने कहा कि धर्म इन हमलों के पीछे बड़ा फैक्टर है। उन्होंने कहा कि चर्च ऑफ इंग्लैंड, पीड़ा की तरफ और अधिक ध्यान आकर्षित करने के लिए क्या कर सकता है? उनकी एक रिपोर्ट में कहा गया कि हिंसा की वजह से लोगों का अपने धर्मस्थल में इक_ा होने का अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है, और चर्चों को फिर से बनाने में बहुत खर्च होगा। ब्रिटिश संसद में पेश इस रिपोर्ट में सिर्फ चर्च की बात हुई है, और जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर कोई बात नहीं हुई है।
लगातार यूरोपीय संसद और ब्रिटिश संसद के लोगों के बयान देखते हुए इस मुद्दे पर लिखना आज सुबह इसलिए भी सूझा कि अभी अमरीका में रैशेल स्वार्न्स नाम की एक लेखिका की लिखी हुई एक किताब खबरों में हैं जिसमें इस ऐतिहासिक तथ्य को सामने लाया गया है कि किस तरह 1838 में अमरीका के कुछ सबसे प्रमुख कैथोलिक पादरियों ने वहां जॉर्जटाऊन यूनिवर्सिटी बनाने के लिए चर्च के गुलाम लोगों में से 272 लोगों को बेचा था। यह लेखिका अखबारनवीस थीं, और प्रोफेसर भी, और उन्होंने दो दशकों की गुलामी का इतिहास दर्ज किया है, और अमरीका में कैथोलिक चर्च के इस भयानक काले इतिहास के साथ उसे जोड़ा है। उन्होंने यह पाया है कि किस तरह चर्चों ने अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर गुलाम बनाए, उन्हें खरीदा, उन्हें बेचा, और सदियों तक यह सिलसिला चलते रहा। इस लेखिका ने ऐसे एक परिवार को भी ढूंढकर निकाला जिसके पुरखे सन् 1600 से इसी तरह की गुलामी झेल रहे थे, और सदियों से चर्च गुलाम खरीदने-बेचने का काम कर रहा था।
दुनिया के इतिहास का कोई सा हिस्सा निकालकर देखें, अधिकतर धर्मों का हाल हिंसा से भरा हुआ दिखता है। कुछ धर्म हथियार लेकर हिंसा करते हैं, तो कुछ धर्म बिना हथियार के भी तरह-तरह से गरीबों को तरह-तरह की गुलामी में रखते हैं। कुछ दिन पहले हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल पर हिन्दू मंदिरों में देवदासी प्रथा के बारे में लिखा था जो और कुछ नहीं थी बल्कि दक्षिण के मंदिरों में गरीब लड़कियों से करवाई जा रही वेश्यावृत्ति ही थी। आज अफगानिस्तान जैसे देशों में तालिबान और आईएस को देखें तो वहां पर सबसे कट्टर धार्मिक समूह महिलाओं को सेक्स-गुलामों की तरह रखने को धार्मिक बतला रहे हैं। अब इन महिलाओं का मानवाधिकार लोगों को उतना अपील नहीं करेगा जितना कि धर्म का मामला करेगा। जिन लोगों को इस्लाम के नाम पर ऐसी धर्मान्धता या कट्टरता सुहाती है, वे ऐसी हिंसा को अनदेखा करेंगे, दूसरी तरफ जिन लोगों को इस्लाम की हिंसा या हकीकत दुनिया को बताना है, वे ऐसे जुल्म को महिलाओं के खिलाफ जुर्म की तरह पेश करेंगे। सभी तरह के लोग महिलाओं को महज अपने मकसद के औजार या हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे, और धर्म की अलग-अलग शक्लों का अलग-अलग लोग साथ देंगे, या अपने धर्म को बेहतर बताने के लिए दूसरे धर्म को नीचा दिखाएंगे।
सभ्य और विकसित माने जाने वाले लोकतंत्रों में भी मणिपुर की एम्बुलेंस जलाने की घटना का जिक्र नहीं हुआ, और महज चर्चों का जिक्र हुआ। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि योरप के इन तमाम सांसदों को मणिपुर की एम्बुलेंस के जिक्र से अपने वोटरों का समर्थन शायद न मिलता, और ईसाई बहुल वोटरों के बीच उनके लिए चर्च जलाने का मुद्दा अधिक अहमियत का रहा होगा। किसी चर्च में सलीब पर टंगे हुए ईसा मसीह को जलाए जाने पर कोई तकलीफ नहीं हुई होगी, लेकिन गोली लगे अपने गंभीर-जख्मी बच्चे को अस्पताल ले जा रही मां जब अस्पताल से एक-दो किलोमीटर दूर उस बच्चे के साथ जिंदा जला दी गई, तो अपने उस बच्चे को जलते देख मां को जो तकलीफ हुई होगी, वह तकलीफ तो ईसा मसीह को भी सूली पर चढ़ाए जाने पर नहीं हुई होगी।
25 लाख की आबादी के एक शहर में अभी मणिपुर पर एक प्रदर्शन हुआ तो उसमें 25-50 लोग ही जुटे। भारत के हिन्दीभाषी प्रदेशों का वैसे भी सरहदी सूबों से अधिक लेना-देना नहीं है। उत्तर-पूर्व से तो बिल्कुल भी नहीं। और डल झील न रहे, तो कश्मीर से भी नहीं। अंडमान से भी बाकी हिन्दुस्तान का वास्ता सिर्फ अंग्रेजों के वक्त की कालापानी-कैद के इतिहास से है, और आज कुछ लोगों का उससे नया ताजा वास्ता सावरकर के माफीनामे के विवाद से है। इससे परे लोग देश के अधिकतर हिस्सों से रिश्तेदारी, कारोबार, और पढ़ाई-लिखाई से ही जुड़े हुए हैं, या सैलानियों की तरह। इससे परे लोगों का उन प्रदेशों से कोई लेना-देना नहीं रहता जहां से होकर उनकी मंजिल की ट्रेन नहीं जाती। ऐसे में मणिपुर तो बहुत ही कम लोगों का देखा-सुना है, जबकि देश के हिन्दुओं के लिए उत्तर-पूर्व में अकेला मणिपुर है जहां पर एक वैष्णव आबादी है, जहां कृष्ण पूजा का एक इतिहास है, इसके बावजूद लोग मणिपुर से अधिक लंदन या न्यूयॉर्क की खबरें पढ़ लेते हैं। अमरीका में किसी शूटआउट में दो-चार लोगों के मरने की खबर हिन्दुस्तान के अधिकतर मीडिया में मणिपुर में दो-चार लोगों के मरने से अधिक जगह पाती है।
आज एक समाजशास्त्री ने मणिपुर की आदिवासी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और उनके नंगे जुलूस की तुलना दिल्ली के तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में निर्भयाकांड से की है। उनका मानना है कि दिल्ली का मीडिया निर्भया के साथ के पुरूष-दोस्त के ब्राम्हण होने से इस धोखे में था कि निर्भया भी सवर्ण है, और चूंकि यह पूरी वारदात दिल्ली के कैमरों के एकदम सामने थी, इसलिए भी इसने अनुपातहीन अधिक जगह पाई थी। लेकिन इस एक अकेली हिंसक घटना ने ढाई महीनों में मणिपुर के ढाई महीनों के मुकाबले हजारों गुना अधिक कवरेज पाया था क्योंकि मामला दिल्ली का था। आज मणिपुर देश की आबादी की एक बड़े हिस्से की नजरों में इसलिए भी नहीं दिख रहा था कि देश में सबसे अधिक मशहूर नेता नरेन्द्र मोदी को मणिपुर नहीं दिख रहा था। करोड़ों लोग अपने दिमागी मार्गदर्शन के लिए मोदी की तरफ देखते हैं, और उन्हें मोदी की तरफ से सिर्फ मणिपुर की अनदेखी का सिग्नल मिल रहा था, इसलिए उनकी नजरों से भी इन ढाई महीने मणिपुर अदृश्य था, पारदर्शी था, हवा के रंग का था।
दूसरी तरफ ऐसे भी करोड़ों लोग हैं जो कि यूक्रेन से लेकर चीन तक कई जगहों के मानवाधिकारों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं, सोशल मीडिया पर अक्सर लिखते हैं, उनमें से भी बहुत से लोग मणिपुर के हिज्जे नहीं तलाश पा रहे थे। देश में बहुत से लेखक और कवि हैं जो कि बरगद की छांह के बारे में, तितली की हसरतों के बारे में, गर्म-सूखी जमीन पर बारिश की पड़ती बूंदों से उठने वाली सोंधी महक के बारे में कविताएं लिखते हैं, लेकिन वे भी मणिपुर की उघाड़ी गई देह के साथ सामूहिक बलात्कार पर कुछ नहीं लिख पाए। दरअसल कुदरत और पशु-पक्षियों के बारे में, बादल-बारिश और इन्द्रधनुष के बारे में लिखना महफूज होता है, इनसे नाराज होकर कुदरत किसी के घर भूकंप नहीं ला सकती, और किसी की कुर्सी के नीचे ज्वालामुखी नहीं फोड़ सकती। लेकिन जिंदगी के असल मुद्दों पर लिखने के अपने खतरे रहते हैं, और समझदार लोग खतरों से दूर-दूर चलते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि नक्सल इलाकों में लोग जमीनी सुरंगों से बचकर चलते हैं।
तमाम लिखने-पढऩे वाले, और वोट डालने वाले जरूरत पडऩे पर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर सजग रहते हैं, और तुरंत ही ऐसे नारों का इस्तेमाल करने लगते हैं। लेकिन चार अक्षरों से बना लोकतंत्र, चार अक्षरों से बने मणिपुर से परे कुछ नहीं है। अगर मणिपुर में लोकतंत्र नहीं है, तो देश में कहीं भी नहीं है। लोकतंत्र टापू की तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में कामयाब नहीं हो सकता। उसके लिए तो मुल्क के नक्शे की सरहदों से परे भी लोकतांत्रिक होना जरूरी रहता है। नेहरू ने अपने वक्त यह कर दिखाया था कि उनकी लोकतांत्रिक समझ और जिम्मेदारी देश की सरहदों से बहुत दूर-दूर तक, दुनिया के पूरे गोले में चारों तरफ फैली रहती थी, और इसीलिए वे एक विश्व नेता थे, वे हिन्दुस्तान के ही नेता नहीं थे, वे दुनिया के उस दौर के गिने-चुने सबसे महान नेताओं में से एक थे। लेकिन जिस देश में अब मणिपुर को लेकर करोड़ों हिन्दुस्तानियों की समझ महज मोदी के रूख से तय होती हो, उनकी चुप्पी या उनकी शर्मिंदगी के बिना जिनकी समझ ताक पर धर दी जाती हो, उन्हें अपनी बारी आने पर लोकतंत्र का दावा करने का कोई हक नहीं रहेगा, कोई हक नहीं रहना चाहिए। लोकतंत्र इतना आत्मकेन्द्रित, इतना मतलबपरस्त, इतना आत्ममुग्ध, और इतना जुल्मी नहीं हो सकता कि वह एक पूरे प्रदेश, एक पूरी नस्ल, और कई पीढिय़ों के साथ देश के इतिहास के सबसे बुरे जुल्म को देखते हुए जलसों में मगन रहे। आज हिन्दुस्तानी लोकतंत्र का हाल यही है।
जो राजनीति में नहीं हैं, और जो सरकार में भी नहीं हैं, जो आज कुछ बोल सकते हैं, आज कुछ लिख सकते हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर हौसलामंद लोगों के लिखे हुए को पसंद करते हुए भी कंपकंपी हो रही है। जुल्म के एक दौर में फौजी तानाशाह हुकूमत के खिलाफ जिस तरह पाकिस्तान में बागी तेवरों के साथ इकबाल बानो नाम की गायिका ने फैज़ अहमद फैज़ की एक इंकलाबी कविता गाई थी, उसने तमाम मुल्क की रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर दी थी। वह वक्त पाकिस्तान में फौजी तानाशाह जिया-उल-हक की हुकूमत के खिलाफ विरोध के काले रंग की साड़ी पहनकर इकबाल बानो ने मानो इंकलाब बानो बनकर यह गाया था, और उस वक्त जिया की हुकूमत ने पाकिस्तान में काली साड़ी को प्रतिबंधित करके रखा था। आज के जिन तथाकथित लेखकों, कवियों, सोशल मीडिया के क्रांतिकारियों को और कुछ नहीं तो यह गुनगुना ही लेना चाहिए, सार्वजनिक जगह पर न सही तो बाथरूम में गुनगुना लेना चाहिए कि- हम देखेंगे, लाजि़म है कि हम भी देखेंगे, वो दिन कि जिसका वादा है, जो विधि के विधान में लिखा है, जब जुल्म-ओ-सितम के घने पहाड़, रूई की तरह उड़ जाएंगे, हम जनता के पांवतले, ये धरती धड़-धड़ धडक़ेगी, और सत्ताधीशों के सर पर जब बिजली कड़-कड़ कडक़ेगी, सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे...। यहां पर फैज़ के लिखे गए बहुत से शब्दों को सरल हिन्दी में कर दिया गया है ताकि अधिक लोग समझ सकें। याद रखें कि फैज़ का लिक्खा, और फौजी तानाशाही के दौर में 50 हजार लोगों के बीच स्टेडियम में इकबाल बानो ने विरोध के कपड़े पहनकर यह गाया था, और फौजी हुकूमत कांप उठी थी। आज लोग बिना फौजी हुकूमत के इस कविता को लाइक करने में भी कांप रहे हैं। दोस्तो, गर मणिपुर आज तुम्हारा नहीं है, तो तुम भी लोकतंत्र के नहीं हो, मणिपुर और लोकतंत्र एक ही बंडल में आते हैं, अलग-अलग नहीं मिलते, अब अपनी पसंद तय कर लो। क्या तुम्हें आज भी मणिपुर के जख्मों पर अपने लिक्खे और कहे हुए का कुछ मरहम धरना है, या तुम्हारा सामाजिक सरोकार बारिश के आसमान पर उगते इन्द्रधनुष तक सीमित है?
मणिपुर इस बात का सुबूत बन गया है कि हिन्दुस्तान के लोकतंत्र का आज क्या हाल है। जिस तरह से वहां से ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें कुकी आदिवासी महिलाओं को बिना कपड़ों के एक हिंसक जुलूस में ले जाया जा रहा है, और जिस तरह उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, जिसकी रिपोर्ट कुछ दिनों में पुलिस में की गई, लेकिन महीनों बाद भी जिस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई थी, यह आज का मणिपुर है। और इस बात के बिना मणिपुर का जिक्र अधूरा रहेगा कि यह भाजपा सरकार का मणिपुर है जिसकी कि केन्द्र सरकार भी है। लेकिन सरकार से परे भी कुछ देखने-समझने की जरूरत है। यह एक बड़ा ही विचित्र संयोग रहा कि कल सुबह सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के ऐसे तैरते वीडियो का खुद नोटिस लिया, और मुख्य न्यायाधीश ने खुद होकर केन्द्र और मणिपुर सरकारों को नोटिस जारी किया कि अगर सरकार ने हालात जल्द नहीं सुधारे तो अदालत को दखल देना होगा। सुप्रीम कोर्ट से इस खबर के निकलने के मिनटों के भीतर प्रधानमंत्री ने संसद के अहाते से मणिपुर पर फिक्र जाहिर की। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात के बारे में भी सोचना जरूरी है।
एक वरिष्ठ पत्रकार रहे, और अब सामाजिक मोर्चे पर एक आंदोलनकारी की तरह सक्रिय प्रो.दिलीप मंडल ने इस बात की तरफ ध्यान आकर्षित कराया है कि मणिपुर की यह हिंसा वहां के हाईकोर्ट के जिस आदेश के बाद शुरू हुई है, उसे मद्रास हाईकोर्ट से वहां भेजे गए जस्टिस एम.वी.मुरलीधरन ने दिया था। जब जस्टिस मुरलीधरन को मद्रास हाईकोर्ट से मणिपुर भेजा जा रहा था तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से अपील की थी कि उन्हें मणिपुर नहीं भेजा जाए, उनका मतलब शायद यह था कि वे वहां के समाज, इतिहास, भाषा, और वहां के लोगों से वाकिफ नहीं थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें वहां भेजकर ही दम लिया। हालत यह थी कि मणिपुर हाईकोर्ट की बेंच मेें एक भी आदिवासी जज नहीं था जो कि जस्टिस मुरलीधरन को वहां की ट्राइबल भावनाओं को समझा सके। दिलीप मंडल ने दस्तावेजों के साथ यह लिखा है कि जस्टिस मुरलीधरन को भेजने वाले कॉलेजियम के मुखिया रंजन गोगोई थे। 2019 के इस फैसले के पहले जस्टिस मुरलीधरन के आवेदन पर विचार करने की बात भी कही गई थी, जिसमें उन्होंने कर्नाटक, आन्ध्र, केरल या ओडिशा हाईकोर्ट में से कहीं भेजने की अपील की थी। इस आवेदन को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने यह आदेश निकाला कि उन्हें मणिपुर ही जाना होगा।
हिन्दुस्तान जैसी विविधताओं वाला देश है, और एक-एक हाईकोर्ट के इलाके में, एक-एक राज्य सरकार के इलाके में जितने किस्म के समुदाय आते हैं, धर्म, जाति, और संस्कृति का टकराव रहता है, उसे देखते हुए केन्द्र सरकार को वहां राज्यपाल नियुक्त करने में, और सुप्रीम कोर्ट को वहां हाईकोर्ट के जज नियुक्त करने में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। किसी भी कुर्सी को कोई फैसले महज इसलिए नहीं ले लेने चाहिए कि उसके पास ऐसे फैसले लेने की ताकत है। फैसले ऐसे लेने चाहिए जो कि लोकतांत्रिक संवेदनशीलता को भी दिखाते हों। हम हिन्दुस्तान जैसे सुप्रीम कोर्ट में भी यह कई बार देखते हैं कि एक ही अदालत होने के बावजूद उसके अलग-अलग जजों की अलग-अलग बेंच में जो फैसले लिए जाते हैं वे कई बार उन जजों की निजी सोच और समझ से भी प्रभावित होते हैं। इसलिए न सिर्फ जजों में विविधता होनी चाहिए, बल्कि जब जजों की कोई बेंच बनाई जाती है, तब भी उसमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए हुए जज हों ताकि उनकी संवेदनशीलताओं में एक संतुलन रह सके। कई जजों को उनके कड़े पूर्वाग्रहों के चलते हुए कई किस्म के मामलों से अलग भी रखना चाहिए। और हम तो इस बात में भी कोई बुराई नहीं देखते हैं कि जब कोई जज बिल्कुल ही अनजान इलाके में पोस्ट किए जाएं, तो उन्हें स्थानीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति, और समाज के बारे में कुछ महीनों का एक कोर्स भी करवाया जाए। एक हाईकोर्ट जज के एक आदेश की वजह से, या कम से कम उसके बाद जो बवाल खड़ा हुआ है, वह पूरे मणिपुर को जलाकर भी आगे बर्बादी जारी रखे हुए है। फिर एक बात यह भी है कि केन्द्र और राज्य सरकार एक ही पार्टी की होने से एक किस्म की सहूलियत भी होती है, लेकिन विचार-मंथन की गुंजाइश कम हो जाती है। मणिपुर के साथ यह भी हो रहा है। वहां प्रदेश को बचाना, और अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री को बचाना, इन दो हितों के बीच एक बड़ा टकराव चल रहा है। इन तमाम बातों को देखें और कल वहां की एक आदिवासी राज्यपाल अनुसुईया उईके के वीडियो-बयान को देखें तो लगता है कि नाजुक मौकों पर धर्म या जाति की समझ सचमुच मायने रखती है। अनुसुईया उईके ने हालात पर बड़ा अफसोस जाहिर किया है, और एक किस्म से कल का उनका बयान अपने आपको केन्द्र और राज्य इन दोनों के आज के हाल से कुछ अलग कर लेने वाला दिख रहा है। खैर, इससे कोई फर्क इसलिए नहीं पड़ता कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल को केन्द्र के मातहत ही काम करना है, और मुख्यमंत्री राज्यपाल की किसी बात को मानने के लिए मजबूर नहीं रहते। इसलिए एक आदिवासी महिला राज्यपाल हिंसा शुरू होने के महीनों बाद, खासकर प्रधानमंत्री के अफसोस जाहिर करने के बाद मुंह खोल रही है, और उस वक्त मुंह खोल रही है जब आदिवासी महिलाओं को नंगा करके उनकी परेड निकाली जा रही है, और सामूहिक बलात्कार के महीनों बाद भी कोई कार्रवाई न होने की बात सामने आ रही है। जब पूरी बस्ती जलकर राख हो जाए, तब जाकर किसी का अफसोस किसी काम का नहीं है, न प्रधानमंत्री का, न सुप्रीम कोर्ट का, और न राज्यपाल का। ये सब रस्मी ढकोसले हैं, और सुप्रीम कोर्ट का इतिहास भी इस बात को दर्ज करेगा कि उसने मणिपुर को देश के बाहर का दर्जा देकर रखा था। जब पूरी दुनिया से इन वीडियो को देखकर धिक्कार आने लगा, तब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने एक औपचारिकता पूरी की है। और इसके बाद प्रधानमंत्री ने मुंह खोला है, और राज्यपाल ने एक वीडियो-कैमरा बुलवाकर इतिहास में दर्ज होने की कोशिश की है। लेकिन लोकतंत्र इतिहास को कैलेंडर की तारीखों और घड़ी के घंटों के साथ दर्ज करता है, और ऐसी रस्म अदायगी मणिपुर के किसी काम की नहीं है। हिन्दुस्तान का लोकतंत्र मणिपुर में इस हद तक नाकामयाब साबित हो चुका है कि अब मणिपुर अगर कभी हथियार भी उठा ले, तो इस पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए।
आज सूरज तो पूरब से ही निकला था, लेकिन 75 दिन बाद, चुप्पी के अमृतकाल के पूरे हो जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मणिपुर शब्द का इस्तेमाल किया। 3 मई से वहां जारी हिंसा, मौतें, बलात्कार, आगजनी, और लोगों की बेदखली, उनके विस्थापन का सिलसिला चल रहा था, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने एक बार भी इस पर एक शब्द भी नहीं कहा था। अब जब मणिपुर में आदिवासी महिलाओं को गैरआदिवासी भीड़ द्वारा सडक़ों पर बिना कपड़ों के घुमाने, उनके साथ गैंगरेप करने जैसे वीडियो सामने आए हैं, तब दुनिया भर से हिन्दुस्तान के लिए धिक्कार आ रही है, देश के लोग भी हिल गए हैं, आदिवासी तबके अधिक विचलित हैं, लेकिन थोड़े-बहुत विचलित तो सभी लोग हैं, तब जाकर संसद सत्र के ठीक पहले प्रधानमंत्री ने कहा- मणिपुर की घटना से मेरा हृदय पीड़ा से भरा है, किसी भी सभ्य समाज के लिए ये शर्मसार करने वाली है। उन्होंने कहा बेइज्जती पूरे देश की हो रही है, 140 करोड़ देशवासियों को शर्मसार होना पड़ रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्रियों से अपील की कि वे अपने-अपने राज्यों में कानून-व्यवस्था मजबूत करें।
अब जब संसद का सत्र शुरू हो रहा है, और वहां पर मणिपुर पर जवाब दिए बिना बचने का कोई रास्ता नहीं है, तब प्रधानमंत्री ने सत्र के ठीक पहले मणिपुर पर एक दार्शनिक अंदाज की बात कही है, जो इस बात को कहीं से भी मंजूर नहीं कर रही है कि उस राज्य में उन्हीं का मुख्यमंत्री है, और देश के गृहमंत्री अमित शाह हिंसा शुरू होने के 25 दिन बाद वहां जाकर भी आए थे। उनकी महीनों लंबी चुप्पी के बाद अब जाकर जो बयान आया है, वह भी देश के सभी मुख्यमंत्रियों के नाम से एक नसीहत अधिक है, मणिपुर में क्या हुआ, क्यों हुआ, क्या होना चाहिए, कौन जिम्मेदार है, इन सब मुद्दों को मोदी का बयान एक लंबे बांस से भी नहीं छू रहा है। अभी भी उनके बयान में देश की बेइज्जती और 140 करोड़ देशवासियों की शर्मिंदगी का जिक्र है, मणिपुर में जिन महिलाओं के साथ यह ज्यादती हुई है, उनके लिए हमदर्दी का जिक्र कम है। एक हैरानी की बात यह भी है कि उन्होंने जब सभी मुख्यमंत्रियों से कानून मजबूती से लागू करने की अपील की है, तो उन्होंने राजस्थान, छत्तीसगढ़, मणिपुर, या देश के किसी भी हिस्से की घटना हो, राजनीति से उठकर कानून-व्यवस्था को महत्वपूर्ण बताया है। हैरानी की बात यह है कि उनके मध्यप्रदेश प्रवास के तुरंत बाद जिस तरह वहां एक आदिवासी के चेहरे पर सार्वजनिक रूप से एक भाजपा नेता ने पेशाब की, और जिस वीडियो ने पूरे देश को दहला दिया, उस मध्यप्रदेश का प्रधानमंत्री ने कोई जिक्र नहीं किया। छत्तीसगढ़ का जिक्र किस संदर्भ में उन्होंने किया है, वह याद नहीं पड़ता, क्योंकि यहां ऐसी कोई घटना हाल-फिलहाल में तो हुई नहीं है। ऐसे में मणिपुर के जिक्र के साथ-साथ कांग्रेस के दो राज्यों का उनका जिक्र कुछ हैरान करता है, और यह मुंह से अनायास निकल गए, या मध्यप्रदेश को सायास छोड़ दिए गए मामले नहीं लगते हैं।
मणिपुर को लेकर संसद में हंगामा तय था, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए किसी राज्य में इससे अधिक और इससे बुरा और क्या हो सकता है जो कि आज मणिपुर में रहा है? ऐसे में भाजपा के मुख्यमंत्री वाले मणिपुर में विपक्ष के राहुल गांधी जाकर आए थे, और उन्होंने अपनी मौजूदगी से मणिपुरी लोगों के साथ एकजुटता दिखाई थी। उसके बाद से संसद का सत्र आज ही शुरू हुआ है, और इसमें चूंकि यह बवाल खड़ा होना ही था, सिर्फ उसी वजह से प्रधानमंत्री को मणिपुर पर मौन तोडऩा पड़ा। लेकिन यह तो इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो गया है कि आधा दर्जन देशों में जाकर वे लौट आए, लेकिन उन्होंने मणिपुर का म भी मुंह से नहीं निकाला था। ऐसे ही वक्त पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कही हुई एक बात याद आती है कि इतिहास उनके कार्यकाल को दर्ज करने में कुछ नरमी बरतेगा। उन्होंने अपने आपको मौन मोहनसिंह कहे जाने पर कभी कोई हमलावर बात नहीं कही थी, हालांकि इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि देश के किसी भी बड़े मामले पर वे कभी चुप भी नहीं रहे थे। उन्होंने बिना नाटकीयता सपाट और गरिमापूर्ण भाषा में अपनी तकलीफ जाहिर करने में कभी देर नहीं की थी। जिन लोगों ने उन्हें मौन मोहनसिंह करार दिया था, वे लोग मणिपुर पर मोदी के मौन के अमृतकाल पूरे हो जाने के बाद आई उनकी टिप्पणी के बारे में जाने क्या सोचते होंगे?
प्रधानमंत्री चाहे किसी भी पार्टी या गठबंधन के हों, उन्हें देश की इतनी बड़ी त्रासदी को लेकर कुछ तो बोलना चाहिए था। उनकी दोहरी जिम्मेदारी इसलिए भी होती थी कि मणिपुर डबल इंजन की सरकार वाला प्रदेश था, देश और प्रदेश दोनों जगह भाजपा के पीएम-सीएम, और एचएम हैं। लेकिन शायद यह राज्य सिर्फ देश के नक्शे पर हाशिए पर नहीं है, यह देश की प्राथमिकताओं में भी हाशिए पर है। राजधानी दिल्ली से ढाई हजार किलोमीटर दूर बसे मणिपुर की अनगिनत मौतें भी न दिल्ली की सरकार को हिला पाईं, न सुप्रीम कोर्ट को हिला पाईं, न देश के मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग के माथे पर शिकन पड़ी जहां पर कि मोदी सरकार के मनोनीत लोग बैठे हुए हैं। यह इस देश के लोकतंत्र के सत्ता वाले पक्ष की चेतना के स्तर का सुबूत है जो कि मणिपुर के पिछले 75 दिनों के दर्ज इतिहास की शक्ल में हमेशा ही काले अक्षरों से लिखा रहेगा। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने भी एक दकियानूसी अंदाज में अपने हक को पंछी के पंखों की तरह समेटकर रखा, और सरकारों के काम में दखल न देना तय किया, उन सरकारों के काम में, जो कि अपना काम नहीं कर रही थीं। यह देश की संवैधानिक विफलता का मामला है कि आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक बार भी प्रधानमंत्री या केन्द्र सरकार को बुलाकर मणिपुर पर कोई जवाब-तलब नहीं किया। मणिपुर के आदिवासी सामूहिक बलात्कार झेलते रहे, सडक़ों पर उनका नंगा जुलूस निकाला जाता रहा, लेकिन एक आदिवासी महिला होने के नाते जिसे राष्ट्रपति बनाया गया है, वह राजकीय समारोहों में लगी रहीं। यह सिलसिला संविधान की बहुत सी संस्थाओं की गैरजिम्मेदारी और नाकामी का सिलसिला है। दूसरी तरफ जो राहुल गांधी भाजपा की हिकारत और उसकी हॅंसी के शिकार रहते हैं, उन्होंने तमाम सुरक्षा खतरों को उठाते हुए भी मणिपुर जाकर वहां हिंसा करते दोनों तबकों से अलग-अलग बात-मुलाकात की, और जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश की।
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के तीनों तथाकथित स्तंभों के बारे में एक बार फिर सोचने और लिखने की जरूरत है। सरकार, राष्ट्रपति, और अदालत ने न सिर्फ मणिपुर को, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और इंसानियत दोनों को शर्मसार किया है, न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में शर्मसार किया है। अब संसद आज से शुरू हुई है, जहां विपक्ष का कोई बाहुबल नहीं है, और जहां उसकी आवाज को कुचलना अधिक मुश्किल नहीं है, वहां पहली बार मणिपुर के जख्मों की बात उठ रही है, और ऐसा लग रहा है कि लोकतंत्र के इन तथाकथित स्तंभों में से किसी एक स्तंभ में तो कुछ जिम्मेदारी दिख रही है। हिन्दुस्तान के इतिहास में 75 से अधिक दिनों की यह चुप्पी हमेशा ही चीख-चीखकर अपने अस्तित्व को याद दिलाती रहेगी।
पिछले कुछ महीनों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर दुनिया में बहुत किस्म की फिक्र सामने आई है। हमने भी इसी जगह पर कई बार यह लिखा है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में लगातार रात-दिन चलता रिसर्च इसे एक दानवीय ताकत दे सकता है जो कि इंसानों के काबू के बाहर की हो सकती है। यही वजह है कि दुनिया के बड़े-बड़े टेक्नालॉजी-बादशाहों ने यह सार्वजनिक मांग की है कि एआई में हो रही रिसर्च को रोका जाए, खासकर ऐसी रिसर्च को जो कि इसे पहले इंसान, और फिर खुद टेक्नालॉजी के काबू के बाहर कर दे। लेकिन टेक्नालॉजी की हर रिसर्च कारोबारी कमाई से भी जुड़ी रहती है इसलिए अभी ऐसे किसी रोक की बात बरसों दूर है। हालांकि दुनिया का इतिहास बताता है कि इंसानों की क्लोनिंग के मामले में पूरी दुनिया ने एकमत होकर उस पर रोक लगाई हुई है, जो कि जारी है। इसलिए एआई के और खतरनाक होने के पहले न सही, लेकिन आगे किसी वक्त उस पर रोक पर आम सहमति बन सकती है।
अब आज इस पर एक बार और बात करने की जरूरत इसलिए आ पड़ी है कि ब्रिटेन की नेशनल क्राइम एजेंसी ने अभी अपना एक अंदाज सामने रखा है कि वयस्क पुरूष आबादी का एक हिस्सा धरती के बच्चों के लिए सेक्स-खतरा बन सकता है। इस जांच एजेंसी ने यह पाया है कि अब बच्चों की सेक्स-तस्वीरें असल जिंदगी से आना जरूरी नहीं है, सिर्फ कुछ शब्द लिखकर या बोलकर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से ऐसी तस्वीरें बनाई जा सकती हैं, और इन्हें देख-देखकर बच्चों के यौन शोषण के शौकीन मुजरिम अपनी हसरतें बढ़ा सकते हैं, बच्चों पर असली खतरा हो सकते हैं। एनसीए का यह अंदाज है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी तमाम कोशिशों के बावजूद बढ़ती चल रही थी, और जांच में पता लगता था कि गिरफ्तार दस में से आठ लोग मर्द थे। अब ऐसा लगता है कि दुनिया की दो फीसदी मर्द आबादी बच्चों पर एक यौन-खतरा बन जाएगी। यह अंदाज ब्रिटेन के बारे में ही लगाया गया है, और एजेंसी का कहना है कि पौने सात लाख से सवा आठ लाख वयस्क मर्द बच्चों के लिए किसी तरह का खतरा बन सकते हैं।
आज ही सुबह की एक रिपोर्ट है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से महज कुछ शब्दों से ही बच्चों की असली दिखती और लगती सेक्स-तस्वीरें आसानी से बनाई जा सकती हैं। बीबीसी ने एक जांच में यह पाया है कि बच्चों से सेक्स के शौकीन, पीडोफाईल्स एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, और ऐसी तस्वीरों का कारोबार भी कर रहे हैं। जांच एजेंसियों का यह कहना है कि इंटरनेट के कुछ बड़े प्लेटफॉर्म अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों की फिक्र किए बिना ऐसी तस्वीरों और इनके कारोबार को जगह दे रहे हैं, जबकि टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करके वे ऐसी आवाजाही को रोक सकते थे, अब चूंकि एआई के इस्तेमाल से ऐसी तस्वीरें से आसानी से बनाई जा रही हैं जो असली तस्वीरों को मात दे सकती हैं, तो इनके कारोबार के बढ़ जाने का खतरा है, और ऐसे ग्राहकों को लगातार ऐसी तस्वीरें मिलने के बाद उनका बच्चों के शोषण का खतरा भी बढ़ रहा है। हालत यहां तक आ गई है कि एआई का इस्तेमाल करके पोर्नो सामग्री तैयार करने वाले लोग छोटे-छोटे बच्चों और शिशुओं के साथ बलात्कार के भी फोटो तैयार कर रहे हैं। पुलिस को इन दिनों हो रही जांच में लगातार ऐसी तस्वीरें मिल रही हैं।
ब्रिटेन का कानून ऐसी एआई-निर्मित तस्वीरों को भी बच्चों की खींची गई तस्वीरों के बराबर मानता है, और इनके यौन-शोषण के होने, सेक्स से जुड़े होने पर इन्हें रखने, पोस्ट करने, या किसी को भेजने पर सजा का इंतजाम है। पुलिस का मानना है कि एआई से बनाई गई कृत्रिम चाइल्ड-सेक्स तस्वीरों को कम नुकसानदेह मानना ठीक नहीं है क्योंकि इन्हें देख-देखकर लोग असली जिंदगी में भी यही सब करने के लिए और हौसला पाएंगे, और फिर वे किसी जिंदा बच्चे के यौन-शोषण तक पहुंच जाएंगे। आज बहुत से ऐसे फोटो, और ऐसी तस्वीरों का कारोबार करने वाले लोग इन्हें जापान की एक वेबसाइट पर पोस्ट करते हैं क्योंकि उस देश में बच्चों के सेक्स-कार्टून या उनकी सेक्स-पेंटिंग गैरकानूनी नहीं मानी जाती। अब इस वेबसाइट ने बच्चों की असल दिखने वाली कम्प्यूटर से गढ़ी गई तस्वीरों पर रोक लगाने की घोषणा की है।
दुनिया में किसी भी तरह की टेक्नालॉजी महज औजार होती है, यह तो उसके इस्तेमाल करने वाले लोगों पर रहता है कि वे उसका क्या करते हैं। परमाणु ऊर्जा की तकनीक से परमाणु बिजलीघर भी चलते हैं, और परमाणु बम भी बनाए जाते हैं। चाकू से सब्जी भी काटी जा सकती है, और किसी का गला भी काटा जा सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस दुनिया का सबसे नया, और अब तक का सबसे ताकतवर औजार है, जिसमें हथियार बन जाने के तमाम खतरे मौजूद हैं। अब देखना है कि आगे इस तकनीक से और कैसे-कैसे खतरे खड़े हो सकते हैं। अब ऐसा लगता है कि तरह-तरह की, बच्चों से जुड़ी, और दूसरे तमाम किस्म की भी, सेक्स-सामग्री को बनाने में इसका व्यापक इस्तेमाल होने लगेगा क्योंकि इसके लिए किसी का कलाकार होना जरूरी नहीं है, सिर्फ कम्प्यूटर की मामूली जानकारी बहुत है। ऐसे में कानून को भी एक बार फिर से देखने की जरूरत पड़ेगी कि क्या लोग अपने खुद के लिए ऐसी सामग्री गढ़ेंगे, तो क्या वह भी जुर्म के दायरे में आएगी? यह कुछ उसी किस्म का है कि वयस्क लोग अपनी खुद की नग्न तस्वीरें खींचकर रखें, और उसका कोई कारोबारी इस्तेमाल न करें, तो वह जुर्म के दायरे में नहीं है। अब लोग अपने खुद के सुख के लिए अगर बच्चों की सेक्स-तस्वीरें गढ़ेंगे, और उन्हें न कहीं पोस्ट करेंगे, न बेचेंगे, न भेजेंगे, तो क्या वह भी जुर्म में आएगा? और एक सवाल यह भी उठता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का ऐसा इस्तेमाल क्या जांच एजेंसियों के जांच के दायरे में रहेगा? क्या वह लोगों की निजता का हनन नहीं कहलाएगा? एक नई टेक्नालॉजी आज दुनिया में बहुत सी नई परिभाषाओं की भी जरूरत आन पड़ी है क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बाद अब पुरानी परिभाषाओं में नए खतरों को नापने की गुंजाइश कुछ घट गई है।
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आज देश में दो अलग-अलग जगहों पर सत्तारूढ़ एनडीए के साथी दलों की बैठक है, और उसके खिलाफ विपक्ष में बनने वाले गठबंधन के संभावित भागीदारों की भी। मोदी विरोधी लोग यह तंज कस रहे हैं कि अभी दो दिन पहले तक प्रधानमंत्री खुद को और अपनी पार्टी को काफी बता रहे थे, लेकिन अब आज की तारीख में ही तीन दर्जन से अधिक दलों को इकट्ठा करके यह बैठक करना बताता है कि विपक्षी एकता की संभावनाओं को लेकर हो सकता है कि भाजपा के भीतर एक फिक्र हो। बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि 2024 के चुनाव में भाजपा के पास मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए आक्रामक हिन्दुत्व के अलावा बहुत कुछ नहीं है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में भारत की जो जगह आज दिख रही है, और देश का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) दिख रहा है, उससे आम जनता का बहुत कम लेना-देना है, उसका शेयर मार्केट की ऊंचाई से, और देश के बड़े उद्योगों के मुनाफे से अधिक लेना-देना है। इसलिए ये आंकड़े आम जनता को बहुत सहमत नहीं कर सकेंगे कि उसके अच्छे दिन आ गए हैं। शायद इसीलिए आज विपक्षी दलों की बैठक में 28 दलों की चर्चा है तो उसके मुकाबले भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए ने 38 दलों की एकजुटता दिखाने की कोशिश की है। कुछ खबरें बताती हैं कि एनडीए की बैठक में विपक्षियों से एक दर्जन ज्यादा पार्टियां रहेंगी।
लोकसभा का चुनाव कुछ दूर है, और ऐसे में विपक्ष की एकता इतनी जल्दी और इतनी आसान नहीं हो सकती क्योंकि उसके भागीदारों को बांधकर रखने के लिए सत्ता की तरह का कोई गोंद नहीं है। लेकिन कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे परस्पर-नफरती दल भी अगर कुछ मुद्दों पर सहमति के बाद एक साथ बैठने को तैयार हो रहे हैं, तो यह छोटी बात नहीं मानी जानी चाहिए। चाहे आम आदमी पार्टी कुल दो प्रदेशों में सरकार वाली पार्टी क्यों न हो, इस संभावित गठबंधन की अधिकतर पार्टियां तो किसी प्रदेश में सत्ता में नहीं हैं, इसलिए राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पा चुकी आप को भी विपक्षी गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण मानना चाहिए। आज अगर दोनों तरफ एक ही किस्म की ये बैठक नहीं हुई रहती, तो शायद इस पर लिखने की वजह न बनती, लेकिन आज यह एक किस्म का शक्ति प्रदर्शन है, और शायद यह 2024 के आम चुनाव के पहले दोनों गठबंधनों का आमने-सामने का एक अघोषित मुकाबला है, इसलिए हम इस पर लिख रहे हैं।
हिन्दुस्तान की राजनीति को अगर देखें, तो कभी-कभी अमरीकी राजनीति से इसकी तुलना करने का दिल करता है क्योंकि वहां दो पार्टियों के बीच सीधे-सीधे आमने-सामने मुकाबला होता है, कोई गठबंधन नहीं होते। दूसरी तरफ अमरीकी राजनीतिक व्यवस्था राष्ट्रपति प्रणाली की है जिसमें सरकार और देश के मुखिया को जनता सीधे चुनती है। भारत का इंतजाम उससे बिल्कुल अलग है। यहां पर लोकसभा में पहुंचे हुए सांसदों का बहुमत प्रधानमंत्री तय करता है, और इसलिए वोटरों के वोट का कोई सीधा मतलब प्रधानमंत्री से नहीं होता। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरीखे, मतदाताओं में लोकप्रिय नेताओं के लिए राष्ट्रपति शासन प्रणाली बेहतर लग सकती है क्योंकि उनके मुकाबले कोई एक नेता अभी नहीं है। लेकिन हिन्दुस्तान अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों में बंटा हुआ है, और उन प्रदेशों में उन क्षेत्रीय पार्टियों के नेता मोदी सरीखे करिश्माई दिखते नेता के मुकाबले भी अधिक कामयाब हैं। इसलिए जब चुनावों पर क्षेत्रीय दलों का भी असर अपने-अपने इलाकों में होता है, तो फिर महज लोकप्रियता की वजह से मोदी की पार्टी का देश भर में जीतकर आना उतना आसान नहीं रह जाता जितना आसान उनका राष्ट्रपति प्रणाली में खुद जीतकर आना हो सकता था।
आज हिन्दुस्तान में दर्जनों क्षेत्रीय दल हैं, और ये दो बड़े राष्ट्रीय दलों, भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द इकट्ठे होते दिख रहे हैं। खुद क्षेत्रीय दलों के हित में यह है कि वे किसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ रहें, ताकि केन्द्र में सरकार बनाने के नाम पर जो चुनाव हो, उसमें जनता उन्हें केन्द्र के किसी गठबंधन का हिस्सेदार भी देखे, और एक मजबूत गठबंधन का हिस्सेदार भी देखे। अगर देश में तीन-चार अलग-अलग गठबंधन मोदी के मुकाबले खड़े रहेंगे, तो वे सारे मोदी के लिए रेड कार्पेट बिछाने सरीखा काम करेंगे। अगर एनडीए के मुकाबले एक गठबंधन मजबूती से सामने रहेगा, तो देश की आर्थिक दिक्कतें, लोगों के असल मुद्दे, उठाए जा सकेंगे। लेकिन अगर विपक्ष छिन्न-भिन्न रहेगा, तो फिर भाजपा और एनडीए का हिन्दुत्व का मुद्दा सबसे बड़ा रहेगा।
दरअसल हिन्दुस्तानी वोटरों को नेताओं की लोकप्रियता, पार्टियों के प्रति वफादारी के बाद ही असल मुद्दों की समझ दी जा सकती है। वोटरों की राजनीतिक चेतना कुछ कमजोर है, और वह सबसे पहले प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के नाम पर किए जाने वाले ओपिनियन पोल के इस झांसे में आ जाती है कि वह किसे प्रधानमंत्री देखना चाहती है। इसके बाद तमाम सर्वे और पोल में उससे पार्टियों के बारे में पूछा जाता है। जिंदगी के असल मुद्दों के बारे में सबसे आखिर में पूछा जाता है, और जितनी मुश्किल लोगों की जिंदगी है, उतना ही मुश्किल उनके लिए कोई जवाब देना भी होता है। नतीजा यह होता है कि मीडिया और राजनीतिक दलों के मिलेजुले और प्रायोजित ऐसे तमाम सर्वे पहले तो व्यक्तिवाद पर टिके होते हैं, उसके बाद वे पार्टियों की बात करते हैं, और मुद्दों की बात आने तक तो बात आई-गई हो चुकी रहती है।
भारत के 2024 के आम चुनावों के लिए आज का दिन बहुत अहमियत का है क्योंकि सत्तारूढ़ गठबंधन और संभावित विपक्षी गठबंधन दोनों ही आज मिल रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात है कि एक मजबूत विपक्ष मौजूद रहे, और सत्ता के गलत फैसलों, उसकी नाकामी को चुनौती देते रहे। देखते हैं इन गठबंधनों का अगले एक बरस में क्या हाल होता है, फिलहाल तो पिछले एक-डेढ़ महीने में विपक्ष की यह दूसरी बड़ी बैठक उसके लोगों का बेहतर तालमेल बता रही है।
पाकिस्तान से एक शादीशुदा-बाल बच्चों वाली महिला ऑनलाईन मोहब्बत के चलते पति को छोडक़र, घर-बार बेचकर गैरकानूनी तरीके से हिन्दुस्तान पहुंच गई, और दिल्ली के करीब अपने प्रेमी के साथ रहने लगी, तो हिन्दुस्तानी मीडिया की मानो निकल पड़ी। जिस इलाके में किराए के एक कमरे में यह प्रेमी जोड़ा, प्रेमिका के चार बच्चों समेत रह रहा है, वहां के मोहल्ले के तमाम लोगों के लिए वह गरीब की लुगाई, गांव भर की भौजाई हो गई है। लोगों को ऐसी पाकिस्तानी भाभी को देखने में मजा आ रहा है जो अब तक कानूनी तौर पर किसी और से शादीशुदा है, और अपने चार बच्चों को लेकर ऐसे प्रेमी के पास आ गई है जिसकी तनख्वाह छह हजार रूपए महीने है। हिन्दुस्तान में बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि महज इस बात से गर्व से भर जाएंगे कि उनके एक बेरोजगार हिन्दू नौजवान के प्रेम में पाकिस्तान की शादीशुदा महिला सब छोडक़र सरहद तोडक़र यहां आ गई है। यह आबादी का वही हिस्सा है जो कि सानिया मिर्जा के एक पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी शोएब मलिक से शादी पर शर्मिंदगी से डूब गया था, और सोशल मीडिया पर सानिया पर हमले होने लगे थे कि क्या उसे हिन्दुस्तान में अपने लायक एक मर्द न मिला? जहां राष्ट्रगौरव ऐसे एक-एक निजी मामलों को लेकर प्रभावित होने लगता है, वहां पर लोगों को किसी असल कामयाबी की कोई जरूरत भी नहीं रह जाती है। एक बेवकूफ औरत परले दर्जे की गैरजिम्मेदारी से चार बच्चों को लेकर गैरकानूनी तरीके से हिन्दुस्तान घुस आई, और वह हिन्दुस्तान के निठल्लों और बेरोजगारों की पसंदीदा भाभी बन गई, और मीडिया भी इस ऑनलाईन-मोहब्बत पर इस तरह टूट पड़ा कि मानो सलीम और अनारकली से इंटरव्यू लेने का एक मौका मिल गया है। इस बात को देखने की फिक्र नहीं की गई कि चार मासूम नाबालिग बच्चों का भविष्य इससे किस तरह तबाह हो रहा है, और वे एक परदेस में सरकार के रहमोकरम पर किसी यतीमखाने के होकर रह जाएंगे।
दरअसल हिन्दुस्तान के भीतर हिन्दू लड़कियों के मुस्लिम लडक़ों से शादी करने पर लव-जिहाद का नारा लगाने वाले लोगों को यह रिवर्स लव-जिहाद बड़ा माकूल बैठ रहा है, और इसे दिखाकर वे साबित कर सकते हैं कि मुस्लिम लडक़ों में ऐसा कुछ नहीं रखा हुआ है कि हिन्दू लड़कियां परिवार और समाज के खिलाफ जाकर उनसे शादी करें। पाकिस्तान से आई यह महिला इन लोगों के लिए एक बड़ी मिसाल की तरह औजार या हथियार बन गई है कि एक तकरीबन बेरोजगार और बहुत गरीब हिन्दू-हिन्दुस्तानी नौजवान में भी इतना आकर्षण है कि एक शादीशुदा मुस्लिम-पाकिस्तानी महिला अपनी पूरी दुनिया को लात मारकर उसके पास आ गई है। यह कहानी किसी प्रेम कहानी से अधिक धर्मोन्माद और राष्ट्रवाद की कहानी बन गई है, और इसे पाकिस्तान के खिलाफ हिन्दुस्तान की फतह की तरह पेश करने में बहुत से चैनल और कुछ अखबार लग गए हैं। जिस देश में निठल्लों की जमात को संतुष्ट और खुश करने के लिए इतना ही काफी हो, उन्हें फिर कोई रोजगार देने की जरूरत ही क्या रह जाती है? इसलिए पाकिस्तानी सीमा और हिन्दुस्तानी सचिन की यह प्रेम कहानी हिन्दुस्तान के एक राजनीतिक एजेंडा को भी ठीक बैठ रही है, और इससे उन लोगों का अहंकार भी संतुष्ट हो रहा है जो कि इसे हिन्दुत्व और हिन्दू की जीत समझ रहे हैं। ऐसे लोगों को शायद यह भी उम्मीद होगी कि इस मिसाल के बाद हिन्दुस्तान की मुस्लिम लड़कियां बड़ी संख्या में हिन्दू नौजवानों से मोहब्बत करने लगेंगी, और घर-बार छोडक़र उनके दरवाजे पहुंच जाएंगी।
जब देश में लोगों की समझ को गर्म लोहे की तरह तपाकर, और धर्मान्धता का घन चला-चलाकर भोथरा किया जाता है, तब उनके गले कोई भी बात उतारी जा सकती है। जब मीडिया एक एजेंडा को आसमान तक पहुंचाने में लगा रहता है, तो उस आसमान से उसे धरती की यह हकीकत नहीं दिखती कि ऐसी प्रेम कहानी में चार बेकसूर और मासूम बच्चों का क्या जुर्म है कि वे पल भर में घर से बेघर हो गए, और परदेस में वहां की सरकार की रहम पर रह गए हैं। एजेंडा के आसमान पर पहुंचे हुए ऐसे मीडिया को यह भी नहीं सूझ रहा कि एक मजदूर किस्म के शौहर को इस तरह धोखा देकर, उसके पैसों से ली गई जमीन-जायदाद बेचकर, बच्चों को लेकर गैरजिम्मेदारी दिखाते हुए, जुर्म करते हुए जो महिला हिन्दुस्तान आई है, क्या वह सचमुच ही हिन्दुत्व के लिए गौरव की बात है, या वह हिन्दुस्तान के लिए एक हासिल है?
जब देश की सोच पूरी तरह से खत्म की जा चुकी है, जब लोगों को धर्म और राष्ट्रीयता के नाम पर किसी भी हद तक उकसाया और भडक़ाया जा सकता है, तब इस किस्म की गैरजिम्मेदार, और जुर्म के दर्जे की प्रेम कहानी पर यह देश टूट पड़ा है। कल के दिन हिन्दुस्तानी परिवारों की महिलाएं इसी किस्म का फैसला लेने लगेंगी, अपने पति की जुटाकर दी गई संपत्ति को बेचकर, बच्चों के साथ घर छोडक़र किसी ऑनलाईन और तकरीबन बेरोजगार प्रेमी के पास भाग जाएंगी, तो उस दिन यह मिसाल आज के एजेंडाधारी-मीडिया को कैसी लगेगी? और वह इसे किस तरह पेश करेगा? लोगों की सोच सनसनी के गट्ठरतले इस तरह दबा दी गई है कि पाकिस्तान के इन चार छोटे बच्चों के साथ उनकी ही मां के किए जा रहे इस जुल्म में किसी को खराबी दिखना बंद हो गई है। क्या ऐसे हिन्दुस्तानी मीडिया के लोग अपने घर के बच्चों की कल्पना कर सकते हैं कि वे अगर इसी तरह पाकिस्तान जाकर फंस जाएं, तो वे क्या करेंगे? जब किसी देश में लोगों की वैज्ञानिक समझ को, लोकतांत्रिक मूल्यों को, और इंसाफपसंदगी को इस हद तक खत्म कर दिया जाता है, तो फिर उनकी समझ तभी काम करती है जब उनके साथ इसी दर्जे का कोई हादसा हो जाए।
अब हिन्दुस्तान में मनाई जा रही ऐसी खुशी की एक प्रतिक्रिया पाकिस्तान में सामने आ रही है जहां की शुरूआती खबरें कह रही हैं कि वहां सिंध प्रांत में डाकुओं ने हिन्दुओं के एक मंदिर पर हमला किया है। उन्होंने कुछ दिन पहले धमकी दी थी कि सीमा हैदर को भारत से वापिस नहीं लाया गया तो वे हिन्दुओं के पूजा स्थलों पर हमले करेंगे। अब अभी ऐसे एक मंदिर या दरबार पर भारी गोलीबारी हुई है, और पुलिस को वहां दीवार में धंसा हुआ एक रॉकेट भी मिला है जो फूटा नहीं है। डाकुओं ने खुली चेतावनी दी है कि पाकिस्तानी हिन्दुओं का कोई कुसूर नहीं है, लेकिन अगर सीमा हैदर को वापिस नहीं लाया गया तो ऐसे हमले होते रहेंगे। अब हिन्दुस्तान में जो तबका अभी पाकिस्तानी भाभी के जश्न में डूबा है, उसे झंकझोरकर यह बताने की जरूरत है कि पाकिस्तान में इस एक घटना को लेकर हिन्दुओं पर किस तरह का खतरा मंडरा रहा है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा हर कुछ हफ्तों में सांप्रदायिक बयान का एक नया इतिहास रचते हैं। अभी उन्होंने असम में सब्जियों की बढ़ती कीमतों के लिए मुस्लिम सब्जी बेचने वालों को जिम्मेदार ठहराया है, और कहा है- ‘वे कौन लोग हैं जिन्होंने सब्जियों की कीमत इतनी बढ़ा दी है? वे मियां व्यापारी हैं। गुवाहाटी में मियां व्यापारी असमिया लोगों से अधिक दाम वसूल रहे हैं। अगर आज असमिया व्यापारी सब्जी बेच रहे हो तो वे कभी भी अपने असमिया लोगों से अधिक कीमत नहीं वसूलते।’ असम में मुसलमानों को मियां कहते हैं, और ऐसा कहा जाता है कि वे मूल रूप से बांग्लादेश से आए हैं, बंगाली भाषी हैं। असम में मियां शब्द को एक अपमानजनक हिकारत वाला विशेषण माना जाता है, और इसे गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
आज जब उत्तर-पूर्व में ही एक राज्य मणिपुर में इस बुरी तरह हिंसा फैली हुई है, और हिन्दू मैतेई जाति के लोगों और कुकी ईसाई आदिवासियों के बीच जानलेवा हिंसक संघर्ष चल रहा है, अब तक करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए हैं, करीब 55 हजार लोग बेघर-बेदखल हो गए हैं, वे या तो राहत शिविरों में हैं, या पड़ोसी प्रदेशों में जाकर शरण लिए बैठे हैं, ऐसे में पास के असम में ऐसा घोर साम्प्रदायिक बयान किसी गैरजिम्मेदार नेता को भी नहीं सुहा सकता, उस प्रदेश के मुख्यमंत्री के मुंह से तो ऐसी बात हक्का-बक्का ही करती है। क्या हिन्दुस्तान के बाकी इलाकों में सभी जगह सब्जियों का कारोबार मुसलमानों के हाथ में हैं? या किसी दूसरे गैरहिन्दू समुदाय के हाथ में है? देश इतना बड़ा है और विविधता इतनी अधिक है कि हर धर्म और जाति के लोग कहीं न कहीं कई तरह के कारोबार में लगे हुए हैं, और किसी एक धर्म या जाति को महंगाई बढ़ाने के लिए तोहमत देना सिवाय साम्प्रदायिकता के और कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हेट-स्पीच को लेकर जो बड़े कड़े कहे जा रहे आदेश दिए हैं, वे आदेश असम जैसे राज्य में मुख्यमंत्री की टेबिल के बगल में रखी कचरे की टोकरी में ही दिखते हैं। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को या तो ऐसे आदेश देना बंद कर देना चाहिए जिस पर वह अमल नहीं करवा सकता, और सरकारों की ढेला भर भी नीयत उस पर अमल की नहीं है, या फिर उसे नफरत फैलाने वाले लोगों को कटघरे में लाना चाहिए। इससे कम में लोकतंत्र नहीं बच सकता। अदालत के नाम का एक पाखंड भी जारी रहे, और मुजरिमों के पास यह कहने को रहे कि उनका फैसला अदालत करेगी, और उन्हें यह पता भी रहे कि अदालत कुछ नहीं करेगी, तब देश में कानून नहीं बचे रह सकता। आज हालत यही है।
हम पहले भी यह सुझा चुके हैं कि जज खुद तो रोज अखबारों की कतरनें निकालते नहीं बैठ सकते, और न ही एक-एक टीवी चैनल की फैलाई नफरत की रिकॉर्डिंग कर सकते। उन्हें एक जांच कमिश्नर नियुक्त करना चाहिए जो अदालत के मित्र की तरह, अदालत की ओर से, देश भर के मीडिया और सोशल मीडिया पर हेट-स्पीच के दायरे में आने वाली चीजों के सुबूत इकट्ठा करे, और फिर अदालत को हर कुछ हफ्तों में एक रिपोर्ट दे कि किन प्रदेशों के कौन से नेता या कौन से संगठन लगातार नफरत फैला रहे हैं, और अदालत उन सबको बुलाकर कटघरे में खड़ा करे। आज कहने के लिए अदालत हेट-स्पीच के खिलाफ कड़े आदेश जारी करते दिख रही है, दूसरी तरफ लोग हवा को जहरीली करने वाले बयान दिए ही जा रहे हैं, तो उससे ऐसा लगता है कि साम्प्रदायिकता का यह जहर सुप्रीम कोर्ट को मान्य है, उसे इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लग रहा है। यह सिलसिला आदेश न होने से भी अधिक खतरनाक है। कोई आदेश न रहे तो लोगों के पास यह विकल्प रहता है कि वे अदालत तक दौड़ लगा सकते हैं, लेकिन जब अदालत बार-बार अपने बड़े और कड़े आदेश दुहराते रहती है, तो फिर न तो कोई जनहित याचिका लेकर जाया जा सकता, और न ही कोई जाकर जजों को बता सकता कि आपकी तो दिन में तीन बार अवमानना हो रही है।
जो सोशल मीडिया अपनी अराजकता की संभावनाओं के लिए कोसा जाता था, वह तो अब पीछे रह गया है, अब तो मुख्यधारा का कहा जाने वाला मीडिया नेताओं के जहरीले बयानों को किसी स्टेनो-टायपिस्ट की तरह नोट करता है, और उसे छाप देता है, या टीवी पर दिखा देता है। किसी एक पत्रकार की भी ऐसी हिम्मत नहीं दिखती कि वे जहरीले नेताओं से पूछ सकें कि उनके ये बयान कानून के खिलाफ हैं या नहीं, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पढ़े हैं या नहीं? देश का लोकतंत्र इस हद तक गैरजिम्मेदार हो गया है कि यहां के संविधान की शपथ वाले नेता लगातार अदालत के लिए हिकारत दिखा रहे हैं, संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं, और इंसानियत को छोडक़र कोसों दूर निकल चुके हैं। और उनके ऐसे जुर्म को उनकी पार्टी उनकी काबिलीयत और खूबी मान रही है। जिन हिमंता बिस्वा सरमा की हम बात कर रहे हैं उनको उनकी पार्टी और केन्द्र सरकार उत्तर-पूर्वी राज्यों के सुपर सीएम की तरह पेश कर रही है, और वे दूसरे राज्यों में जाकर वहां के मुख्यमंत्रियों को सलाह दे रहे हैं। लोकतंत्र में ऐसा सिलसिला इस देश की गौरवशाली परंपराओं के लिए हिकारत का है, और शर्मनाक परंपराएं कायम कर रहा है। आज अगर पढ़े-लिखे लोगों की पहुंच सोशल मीडिया तक है, तो उन्हें इस किस्म की नफरती बातों के खिलाफ मुंह खोलना चाहिए, अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए एक बहुत खतरनाक और जानलेवा देश छोडक़र जाएंगे।
हॉलीवुड में फिल्म और टीवी लेखकों की हड़ताल को ढाई महीने हो रहे हैं, और अब फिल्म-टीवी एक्टर्स की यूनियन भी इसमें शामिल हो गई है। निर्माता कंपनियों की शर्तों का विरोध करते हुए यह हड़ताल चल रही है जिसमें बाकी कुछ पहलुओं के साथ-साथ एक पहलू यह भी है लेखक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल का विरोध कर रहे हैं जिससे उनकी जरूरत ही घट जाएगी। इस नई टेक्नालॉजी की अभी शुरुआत ही हुई है, और यह लेखकों जैसे कामगारों को जिस रफ्तार से बेरोजगार करने का खतरा लेकर आई है, उससे हॉलीवुड के लेखक हिले हुए हैं। इसके साथ-साथ कुछ अलग टेक्नालॉजी की वजह से भी कंपनियों की कमाई में इजाफा हुआ है, लेकिन उसका हिस्सा लेखकों तक नहीं आ रहा है, वह भी हड़ताल की एक वजह है। अब सिनेमाघरों और टीवी के अलावा ओटीटी प्लेटफॉर्म कारोबार और कमाई का एक बड़ा जरिया बने हैं, और ऐसे फैलते हुए कारोबार की कमाई में लेखकों और एक्टरों को हिस्सा नहीं दिया जा रहा है। इसलिए यह हड़ताल 1960 के बाद की अकेली ऐसी हड़ताल है जिसमें ये दोनों बड़ी यूनियनें शामिल हुई हैं, और हड़ताल इस कड़ाई से शुरू की गई है कि हॉलीवुड की एक फिल्म का लंदन प्रीमियर अपने तय समय से एक घंटे पहले किया गया ताकि उसके कलाकार शामिल हो सकें, और घड़ी का कांटा देखकर वे प्रीमियर छोडक़र चले गए। वहां यूनियन इतनी तगड़ी है, उसके नियम इतनी कड़ाई से माने जा रहे हैं कि उनके खिलाफ जाकर कोई फिल्म-टीवी इंडस्ट्री में काम नहीं कर सकते। हड़ताल के आकार का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि एक्टरों की यूनियन में 65 हजार लोगों ने इसके पक्ष में वोट डाला था, और यह हड़ताल शुरू हुई। अब हॉलीवुड और न्यूयॉर्क के स्टूडियो के सामने फुटपाथों पर इन दोनों यूनियनों के लोग पोस्टर लिए हुए प्रदर्शन कर रहे हैं, और आवाजाही के सामने बाधा सरीखे बन रहे हैं।
इससे हिन्दुस्तान का सीधे-सीधे तो कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन एक बात जरूर है कि किसी इंडस्ट्री में यूनियन की ताकत क्या होती है, इसे आज दुनिया का सबसे पूंजीवादी देश देख रहा है। और यह यूनियन मजदूरों की नहीं हैं, बड़े-बड़े स्टार लेखकों, और स्टार कलाकारों वाली यूनियन है। इससे यह समझने की जरूरत है कि तरह-तरह के कानूनी अनुबंधों में बांधे गए हॉलीवुड के फिल्मकारों को भी हड़ताल से नहीं रोका जा सका। कंपनियां कह रही हैं कि कोरोना और लॉकडाउन के बाद जब कारोबार बेहतरी की ओर बढ़ रहा था तब यह हड़ताल बहुत बेमौके की है, लेकिन हड़ताल पर जाने वाले लोगों का कहना है कि वे कंपनियों के साथ नए अनुबंधों में पडऩे के बजाय अब नई शर्तों को तय कर लेना चाहते हैं। यह इस मौके पर जरूरी इसलिए भी है कि हॉलीवुड की कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल बढ़ाते चल रही हैं, और उससे बेरोजगारी भी होना तय है, और लेखकों के मौलिक लेखन का आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से अधिक हद तक इस्तेमाल करना भी लेखक के मौलिक काम का नाजायज इस्तेमाल है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस किसी कहानी को आगे बढ़ा सकता है, और लेखक की जरूरत को खत्म कर सकता है। हड़ताली लेखकों का यह मानना है कि उनके लिखे हुए के बाद उसका जिस-जिस तरह भी इस्तेमाल होता है, उस पर उन्हें भी मुनाफे में हिस्सा मिलना चाहिए।
हिन्दुस्तान में भी यह लोगों के सोचने की बात हो सकती है कि एक अखबार के कार्टूनिस्ट अपने कार्टून के उसी कंपनी के दूसरी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल पर अलग से भुगतान की उम्मीद कर सकते हैं क्या? या लेखक, स्तंभकार, और रिपोर्टर ऐसे हक के बारे में सोच सकते हैं। आज हालत खराब है और इस तरह की बात करने वाले लोगों को नौकरी से निकालने में देर नहीं लगेगी, लेकिन दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं को देखकर हिन्दुस्तान जैसे देश के कामगार-तबकों को यह तो सोचना ही चाहिए कि कल जब बाजार ठीक होगा, कारोबारों में मुकाबला रहेगा, तब कामगार अपने किस-किस काम के लिए अतिरिक्त भुगतान की उम्मीद कर सकते हैं। इसके अलावा हॉलीवुड से यह भी सबक लेने की जरूरत है कि एक खालिस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बीच भी किस तरह से महीनों तक इतनी बड़ी हड़ताल चल सकती है। यह भी सबक लेने की जरूरत है कि यूनियनें किस तरह इतनी मजबूत हो सकती हैं कि खरबपति कंपनियां भी उनमें से कुछ लोगों को भी नहीं तोड़ पा रही हैं, काम शुरू नहीं कर पा रही हैं, और लोग घड़ी के कांटे देखकर हड़ताल पर चले जा रहे हैं। यह भी समझने की जरूरत है कि यह सिर्फ कामगारों की हड़ताल नहीं है, इसमें बड़े-बड़े दिग्गज लेखक, और इंडस्ट्री के सबसे बड़े कलाकार भी शामिल हैं, क्योंकि यूनियन के खिलाफ जाकर वे बाद में भी कोई काम नहीं कर सकेंगे।
इससे एक चीज और समझने की जरूरत है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस बिना विनाशकारी हद तक आगे बढ़े हुए भी, आज भी किस तरह से रोजगार खा रही है। दो-चार दिन पहले ही हिन्दुस्तान की एक कंपनी की रिपोर्ट थी कि उसने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर आधारित ग्राहकों के जवाब देने वाले चैटबोट के इस्तेमाल के बाद इस काम में लगे अपने 90 फीसदी लोगों को निकाल दिया है। उसका कहना है कि चैटबोट इंसानी जवाब देने वालों के मुकाबले बेहतर काम कर रहा है, और वह बिल्कुल भी खर्चीला नहीं है। इसलिए ग्राहकों की बेहतर संतुष्टि के साथ-साथ खर्च की कटौती के लिए भी उन्होंने यह फैसला लिया है। अब अगर ग्राहकों के पूछताछ केन्द्रों या शिकायत केन्द्रों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस चैटबोट बात करने लगेंगे, कंप्यूटर पर जवाब टाईप करने लगेंगे, शिकायतों को दर्ज करने लगेंगे, बुकिंग करने लगेंगे, तो इंसानों की नौकरियां बहुत जल्द ही दसियों लाख की संख्या में खत्म होने लगेंगी। यह खतरा अब किसी विज्ञान कथा का नहीं है, यह एक असल खतरा है, जो कि आ चुका है, दरवाजा खटखटा रहा है, और इसकी किफायत की वजह से, इसके तेज रफ्तार और बेहतर कामकाज की वजह से कंपनियां इसे गले लगाने जा रही हैं।
ऐसे बहुत से पहलुओं पर हिन्दुस्तान और बाकी दुनिया के कामगारों को समझने की जरूरत है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस किसी हमाल के बोझ ढोने के काम को तो नहीं कर सकेगा, लेकिन सैकड़ों दूसरे कामों को इंसानों से बेहतर और तेज रफ्तार से करके उन्हें बेदखल जरूर कर देगा। अब यह हॉलीवुड फिल्म की कहानी नहीं है, यह हॉलीवुड के फुटपाथों पर चल रही हड़ताल के पोस्टरों पर लिखी गई बात है।
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केरल के एक एनआई कोर्ट ने एक प्रोफेसर का हाथ काट डालने वाले आधा दर्जन मुस्लिम लोगों को सजा सुनाई है। अब प्रतिबंधित करार दिए जा चुके इस्लामिक संगठन, पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के इन लोगों ने 2010 में केरल के प्रोफेसर का हाथ काट दिए थे क्योंकि वे मानते थे कि प्रोफेसर ने कॉलेज के एक इम्तिहान में एक सवाल पूछा था और वह सवाल मोहम्मद पैगंबर का अपमान था। ये प्रोफेसर अपने परिवार सहित इतवार को चर्च से घर लौट रहे थे कि रास्ते में सात लोगों ने उन्हें रोककर गाड़ी से उतारा, और उनका दाहिना हाथ काट दिया। यह देखते हुए उनकी पत्नी को ऐसा सदमा लगा कि उसने बाद में आत्महत्या कर ली। अदालत ने इसे एक आतंकी हमला बताया, और आतंक को मानव सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा बताया, और हमलावरों में से तीन को उम्रकैद, और तीन को तीन-तीन बरस की कैद सुनाई।
अब देखें तो केरल से कुल पांच सौ किलोमीटर दूर के श्रीलंका में धर्मांधता ने एक अलग किस्म का काम किया है। वहां भी धर्मांधता के मामले में एक दूसरे किस्म से पुलिस और अदालत तक मामला पहुंचा है। हुआ यह है कि श्रीलंका में वहां की बौद्ध बहुसंख्यक आबादी का अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय से कुछ टकराव, कुछ तनाव चलते रहता है। ऐसे में वहां एक मुस्लिम डॉक्टर के बारे में यह अफवाह फैलाई गई कि उसने बौद्ध समुदाय की महिलाओं की नसबंदी कर दी ताकि बौद्ध आबादी बढऩा रूक जाए। उस पर चार हजार ऐसी बौद्ध महिलाओं की जानकारी के बिना उनकी नसबंदी करने का आरोप लगाया गया। और बौद्ध-दबाव में काम करने वाली वहां की सरकार ने 2019 में मोहम्मद शफी को आतंकी धाराओं के तहत गिरफ्तार कर लिया। जमानत के पहले साठ दिन उन्हें जेल में रहना पड़ा, और जांच चलने की वजह से उन्हें जबर्दस्ती छुट्टी पर भेज दिया गया। अब चार बरस बाद श्रीलंका के स्वास्थ्य मंत्रालय ने डॉ.शफी के खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध करने के लिए सुबूत कम होने की वजह बताते हुए उन्हें काम पर वापिस भेज दिया है।
श्रीलंका में 70 फीसदी आबादी बौद्ध है, 10 फीसदी मुस्लिम हैं। 2019 में वहां चर्चों और पर्यटकों पर इस्लामिक स्टेट के आतंकी हमले हुए थे जिनमें ढाई सौ से ज्यादा मौतें हुई थीं, और इसके बाद श्रीलंका में मुस्लिम विरोधी भावनाएं भडक़ गई थीं, मुस्लिमों पर हमले किए गए थे, उनके घर, दुकान, मस्जिद जला दिए गए थे, और एक मुस्लिम की भीड़त्या भी हुई थी। ऐसे में डॉ.शफी पर यह झूठा आरोप लगाया गया कि उन्होंने महिलाओं का प्रसव कराते हुए उनकी नसबंदी भी कर दी ताकि बौद्ध आबादी बढ़ न सके। कुछ अखबारों ने भी ऐसी खबरें छापीं, और बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। ठीक हिन्दुस्तान की तरह श्रीलंका के टीवी चैनलों पर इसे लेकर बहस चलने लगी, और ठीक हिन्दुस्तान की तरह सोशल मीडिया पर झूठी खबरों ने डॉ.शफी का जीना हराम कर दिया। और ठीक हिन्दुस्तान की तरह वहां बौद्ध लोगों ने उनके परिवार को मारने की धमकी देना शुरू कर दिया, उन्हें घर-शहर छोडऩा पड़ा, बच्चों को स्कूल बदलने पड़े, उनके बैंक खाते जब्त कर लिए गए। बीबीसी की एक रिपोर्ट कहती है कि इसके पहले भी श्रीलंका में कई बार मुसलमानों पर ऐसे आरोप लगाए गए कि वे बौद्ध लोगों की आबादी बढऩा रोकने के लिए उनकी नसबंदी करते हैं, या अपने रेस्त्रां में बौद्ध ग्राहकों के खाने में नसबंदी की गोलियां मिला देते हैं। एक दूसरा दावा किया गया था कि जिन मुसलमानों की कपड़े की दुकानें हैं, वे बौद्ध महिलाओं के भीतरी कपड़ों में नसबंदी वाली जैल लगा देते हैं। बाद में संयुक्त राष्ट्र तक को यह स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था कि ऐसी कोई जैल होती ही नहीं है। श्रीलंका के मीडिया ने भारत के मीडिया के एक बड़े हिस्से की तरह भडक़ाने का काम किया, क्योंकि वह बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने का खतरा उठाने की हालत में नहीं था।
हम इन दो मुद्दों पर आज यहां इसलिए लिख रहे हैं कि धर्म लोगों को किस तरह तर्कहीन और बेवकूफ बना देता है, इसकी ये दोनों बहुत अच्छी मिसालें हैं। और धर्म तो हमेशा ही हिंसक बनाता ही है। केरल में मुस्लिम अराजक संगठन के लोगों ने एक प्रोफेसर का हाथ काट दिया क्योंकि उसका बनाया हुआ एक प्रश्नपत्र उन्हें अपने धर्म का अपमान लग रहा था। केरल हिन्दुस्तान का सबसे पढ़ा-लिखा राज्य है, और लोगों के पास अपनी धार्मिक भावनाओं को लेकर अदालत तक जाने का विकल्प मौजूद था। लेकिन उन्होंने हिंसा तय की, क्योंकि धर्म हिंसा सिखाता है। उन्होंने यह तय किया कि इस्लाम जिस तरह की सजा तय करता है, उस तरह की सजा वे देंगे, और उन्होंने ईशनिंदा के आरोप में प्रोफेसर का हाथ काट दिए। दूसरी तरफ श्रीलंका में बेबुनियाद अफवाहों को लेकर एक समर्पित डॉक्टर की जिंदगी तबाह कर दी गई, उसके परिवार का जीना हराम कर दिया गया, लोगों से चार बरस के लिए एक डॉक्टर छीन लिया गया, उस डॉक्टर के बीवी-बच्चों से सामान्य जिंदगी का हक छीन लिया गया। एक तरफ मुसलमानों ने एक ईसाई प्रोफेसर के साथ हिंसा की, दूसरी तरफ बौद्ध बहुसंख्यक लोगों ने एक मुस्लिम डॉक्टर के साथ यह किया। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि धर्मांधता जब बढ़ती है, तो जरूरी नहीं है कि वह किसी एक धर्म के व्यक्ति को ही मारे, वह संक्रामक रोग की तरह दूसरे धर्मों तक भी पहुंचती है, और उनको भी मारती है। धर्मांधता और साम्प्रदायिक हिंसा कुछ बरस पहले दुनिया भर में फैले कोरोना की तरह तेजी से चारों तरफ फैलती हैं, और इनके लिए आमने-सामने संपर्क में आने की जरूरत भी नहीं पड़ती, इन्हें वॉट्सऐप जैसे संदेशों से भी फैलाया जा सकता है। जो लोग आज दुनिया में कहीं भी अपने बाहुबल से किसी एक धर्म का दबदबा कायम करना चाहते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि इसकी प्रतिक्रिया में दुनिया में कई दूसरी जगहों पर दूसरे धर्मों के लोग उस पहले धर्म के लोगों के साथ ऐसा ही सुलूक कर सकते हैं। धर्म के नाम पर हिंसा का कोई अंत नहीं होता है, और दुनिया में सिर्फ इस्लामी आतंकी संगठन नहीं हैं, अलग-अलग बहुत सी जगहों पर दूसरे धर्मों में भी इसकी प्रतिक्रिया में लोग हिंसा कर रहे हैं, श्रीलंका इसकी एक मिसाल है। अब किसी भी देश की कल्पना की जाए कि धार्मिक उन्माद और नफरत से अगर किसी एक इंसान को घेरकर मारने के लिए सरकार, अदालत, समाज, और चिकित्सा सेवा इन सबकी इतनी तबाही की जा सकती है, तो यह बात याद रखनी चाहिए कि ऐसी हिंसा की जवाबी हिंसा में भी इन तमाम पहलुओं की उतनी ही या उससे अधिक बर्बादी की जा सकती है। यह लोगों को तय करना है कि वे इंसान की तरह रहना चाहते हैं, या धार्मिक आतंकी की तरह लोगों को मारना, खुद मरना, और अपनी आने वाली पीढिय़ों को खतरे में डालना चाहते हैं।
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देश के चुनावी राज्यों में कांग्रेस पार्टी बड़ी रफ्तार से काम करते दिख रही है। पहले छत्तीसगढ़ के सबसे बेचैन चल रहे कांग्रेस नेता टी.एस. सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बनाकर पार्टी ने विधानसभा चुनाव के पहले एक बड़ा असंतोष खत्म किया। दूसरी तरफ मानो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ एक संतुलन बनाए रखने के लिए कल शाम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम को हटाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद बस्तर के सांसद दीपक बैज को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। देखने में ये दो फैसले अलग-अलग लगते हैं, लेकिन एक किस्म से ये एक पैकेज का हिस्सा भी लगते हैं। ऐसा लगता है कि सीएम के कंधों पर एक डिप्टी बिठाकर उनके महत्व को जो कम किया गया था, उसकी भरपाई सीएम को नापसंद प्रदेश अध्यक्ष को हटाकर पार्टी ने कर दी है। अब यह भी समझा जा रहा है कि हटाए गए अध्यक्ष मोहन मरकाम को मंत्री बना दिया जाएगा, ताकि उनकी भी भरपाई हो सके। एक पखवाड़े में इस प्रदेश में दो बड़े फैसले लेकर कांग्रेस हाईकमान ने एक बार फिर अपना अस्तित्व साबित किया है, जो कि अभी तक अनिर्णय का शिकार दिखता था।
अब छत्तीसगढ़ की राजनीति के हिसाब से देखें तो बस्तर के विधायक मोहन मरकाम पार्टी अध्यक्ष थे, और उन्हें हटाकर बस्तर के ही सांसद दीपक बैज को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया है, जिसकी चर्चा पिछले कुछ महीनों से चल ही रही थी। ऐसा माना जाता है कि यह फैसला कुछ समय पहले ही लिया जा चुका था, जिस पर अमल अभी हुआ है। अब यह माना जा रहा है कि प्रदेश मंत्रिमंडल में इस कार्यकाल का एक आखिरी फेरबदल जल्द ही होगा जिसमें उपमुख्यमंत्री बने टी.एस. सिंहदेव को कुछ और विभाग दिए जा सकते हैं, और मरकाम को शामिल किया जा सकता है। कुछ मंत्रियों की सेहत और साख को देखते हुए, उनका काम हल्का भी किया जा सकता है। कांग्रेस संगठन के स्तर पर शायद यह आखिरी बड़ा फैसला रहेगा, और उसके बाद पार्टी चाहेगी कि छत्तीसगढ़ के सभी नेता संतुष्ट होकर चुनावी तैयारियों में लगें। पार्टी शायद यह भी देखती है कि एक प्रदेश का कांग्रेस का असंतोष दूसरे प्रदेश में भी पार्टी की घरेलू आग को हवा देता है, और एक-एक करके सभी जगह युद्धविराम की नौबत पार्टी को हिमाचल और कर्नाटक की तरह फतह दिला सकती है।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी बस्तर की दर्जनभर विधानसभा सीटों का पिछले दो चुनावों में कांग्रेस को बड़ा सहारा रहा, लेकिन इस बार हवा यह बनी हुई है कि बस्तर में कांग्रेस की हालत खराब है। मरकाम बस्तर के ही आदिवासी विधायक हैं, और उन्हें विधानसभा चुनाव भी लडऩा है। इसलिए खुद लडऩे वाले व्यक्ति को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बनाए रखने का कोई मतलब नहीं था, और सीएम की मर्जी से परे भी मरकाम को बदलना पार्टी का एक सही फैसला था। दीपक बैज प्रदेश के 11 लोकसभा सदस्यों में से कांग्रेस के 2 लोगों में से 1 हैं। इसके पहले भी वे दो बार विधायक रहे हुए हैं, और उनके नाम पर किसी चुनाव में हार दर्ज नहीं है। वे कमउम्र हैं, और इतने नए हैं कि उनके नाम से कोई विवाद अभी खड़ा नहीं है। यह एक अलग बात है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ पूरा देखा भी नहीं है। उनके करीबी बताते हैं कि अपने शहर जगदलपुर से राजधानी रायपुर के रास्ते में आने वाले जिलों के अलावा वे प्रदेश के किसी भी जिले में शायद ही गए हों। ऐसा प्रदेश अध्यक्ष रहने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का काम आसान भी हो जाता है कि सत्ता और संगठन में किसी टकराव की नौबत से उबरकर अब वे अपनी मर्जी से इन दोनों को चला सकेंगे, और यह चुनाव के वक्त कम से कम उनके लिए सहूलियत की एक बात होगी। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है, तो उसने सिंहदेव को महत्व देकर, डिप्टी सीएम बनाकर छत्तीसगढ़ में एक संतुलन बनाने की कोशिश की है। और इसी संतुलन के चलते दीपक बैज एक ऐसे प्रदेश अध्यक्ष हैं जिनको शायद विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत का भी आशीर्वाद प्राप्त है, और सिंहदेव सरगुजा से बाहर के व्यक्ति को अध्यक्ष चाहते थे, तो वह बात भी इससे पूरी हो जा रही है। सिंहदेव की दिक्कत यह थी कि दीपक बैज के पहले सरगुजा के अमरजीत भगत का नाम प्रदेश अध्यक्ष के लिए सोचा गया था, जो कि सिंहदेव के खिलाफ चलते हैं, और उन्होंने खुद भी मंत्री पद छोडक़र संगठन संभालने से नाखुशी जता दी थी। कुल मिलाकर दीपक बैज में कांग्रेस के तीन ताकतवर और वरिष्ठ नेताओं की सहमति साबित हो रही है, और ऐसी भी चर्चा है कि दीपक बैज को विधानसभा का टिकट नौजवान कोटे से राहुल गांधी के अध्यक्ष रहते दिया गया था। तो कांग्रेस हाईकमान से लेकर छत्तीसगढ़ के नेताओं तक ने सबने अपनी मर्जी साध ली है, और अंग्रेजी में इसे विन-विन सिचुएशन कहा जाता है। मंत्रिमंडल में पहुंचने तक मरकाम का कद कुछ छोटा दिख सकता है लेकिन यह शायद दो-चार दिनों की ही बात हो।
विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस हाईकमान ने छत्तीसगढ़ में अपना घर एकदम ठीक कर लिया है। सत्ता के भीतर सिंहदेव की शक्ल में एक समानांतर महत्व खड़ा किया है, लेकिन संगठन सीएम के हवाले सरीखा कर दिया है। नौबत कुछ वैसी ही है कि एक कारोबारी ने अपने परिवार के लिए बहुत बड़ा मकान बनवाया, हर लडक़े के बीवी-बच्चों के लिए पर्याप्त इंतजाम किया, और फिर लोगों से कहा कि उसने मकान तो जरूरत से अधिक बड़ा बनवा दिया है, अब लडक़े साथ में रहें तो ठीक है, और न रहें तो...। उस कारोबारी की कही गई भाषा दुहराना यहां ठीक नहीं है, लेकिन जिन लोगों को कल शाम का छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष हटाया जाना पार्टी में अस्थिरता दिख रहा है, उन्हें शायद एक अलग नजरिए से इसे देखने की जरूरत है कि यह स्थिरता आई है, बिगड़ी नहीं है। साथ ही छत्तीसगढ़ में कामयाबी से घरेलू बर्तनों की टकराहट रोक लेने का असर मध्यप्रदेश और राजस्थान पर भी होगा, और कांग्रेस हाईकमान की आवाज वहां पर अधिक मायने रखेगी।
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रूस और यूक्रेन में चल रही जंग आज दुनिया की सबसे बड़ी खबर है। आज जब नाटो देशों की बैठक हो रही है, और उसमें यूक्रेन अपनी सदस्यता के लिए बड़े कड़े शब्दों में फैसला लेने वाले तमाम देशों को याद दिला रहा है कि अगर उसे रूस के हाथों और अधिक बर्बाद होने दिया गया, तो उससे रूस के आतंकी हौसले बढ़ते जाएंगे। नाटो की अपनी मजबूरी यह है कि वह सारे सदस्यों की सहमति के बिना तेजी से ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकता, और उसके कुछ वजनदार और ताकतवर सदस्य ऐसे भी हैं जो कि तेज रफ्तार से यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने के इसलिए खिलाफ हैं कि यह रफ्तार रूस को भडक़ा सकती है, और वह एक परमाणु हथियार संपन्न देश होने की वजह से कई और देशों पर खतरा बन सकता है। आज यूक्रेन का साथ दे रहे नाटो देश और खासकर अमरीका जैसी ताकतें बहुत संभल-संभलकर आगे बढ़ रही हैं, और यूक्रेन की फौजी मदद भी उन हथियारों से ही की जा रही है जिन्हें आत्मरक्षा के लिए जरूरी साबित किया जा सके। यूक्रेन को ऐसे हथियार नहीं दिए जा रहे जो कि रूस पर हमला करने के लिए की गई मदद करार दिए जा सकें।
ऐसे माहौल में एक दूसरी खबर रूस की तरफ ध्यान खींचती है कि पिछले पखवाड़े रूस के भीतर उसकी भाड़े की फौज के बगावत करने की जो खबरें आई थीं, उनकी हकीकत क्या थी? यह सवाल ऊपर लिखे गए नाटो की दुविधा के मुद्दे से कुछ परे का भी दिख सकता है, लेकिन यह उससे जुड़ा हुआ भी है क्योंकि यूक्रेन की इस जंग में जो भी हालत होती है, वह नाटो देशों के लिए एक गंभीर फौजी नौबत भी रहेगी। अब रूस के भीतर की ताजा खबर यह है कि रूस में भाड़े की जो फौज वाग्नर ग्रुप के नाम से काम करती है, और रूसी सरकार की मर्जी के मुताबिक वह दुनिया के कई देशों में जाकर फौजी कार्रवाई करती है, उसके बगावत करने वाले नेता प्रिगोझिन रूस में ही है, और उसकी रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात भी हुई है। इस बात को खुद रूसी सरकार ने बताया है और कहा है कि वाग्नर की उस कार्रवाई के हफ्ते भर बाद इन दोनों में तीन घंटे बैठक हुई। वाग्नर ग्रुप यूक्रेन में रूसी सेना की ओर से फौजी कार्रवाई भी कर रहा था, लेकिन वाग्नर के मुखिया प्रिगोझिन का रूसी फौजी जनरलों के साथ लगातार टकराव भी चल रहा था जो कि बताया जाता है कि बगावत की नौबत तक पहुंचा था। अब रूसी सरकार ने जितने खुलासे से इस बैठक की जानकारी दी है, वह भी बड़ी अटपटी लग रही है।
जंग के ऐसे माहौल में किसी भी सरकार के भीतर बहुत सी बातें गोपनीय रहती हैं, और ऐसे में वाग्नर मुखिया के साथ राष्ट्रपति की दूसरे फौजी अफसरों को बिठाकर की गई यह बैठक क्यों प्रचार के लायक समझी गई, इसे भी समझना मुश्किल है। साथ-साथ यह समझना भी मुश्किल है कि वाग्नर ग्रुप ने जिस तरह से रूसी सरकार के खिलाफ बगावत शुरू की, और कुछ घंटों या एक दिन के भीतर ही जिस तरह से वह झाग के बुलबुलों सरीखे शांत हो गई, उसके पीछे मकसद क्या था? यही वह मुद्दा है जिस पर हम आज आगे लिखना चाहते हैं। दरअसल बहुत सी चीजें जो जाहिर तौर पर कुछ दिखती हैं, वे हकीकत में कुछ और भी रहती हैं। और रूस जैसी महाशक्ति एक जंग के बीच में कई तरह के झूठ भी फैला सकती है। वाग्नर की रूस के खिलाफ बगावत जिस तरह रॉकेट की तरह उठी, और बीयर के झाग की तरह बैठ गई, उससे लोगों की यह अटकल तेजी से ठंडी पड़ गई कि अमरीका सहित कुछ पश्चिमी ताकतों ने वाग्नर को पुतिन के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए तैयार किया था। अगर ऐसा होता तो वाग्नर एक दिन में ही शांत न हो गया होता, और इस एक दिन में भी उसने रूस का कोई असल नुकसान नहीं किया था। दूसरी बात यह भी मानी जा रही है कि वाग्नर से एक नकली बगावत पुतिन ने ही करवाई, ताकि पुतिन को यह पता चल सके कि रूसी फौजी जनरलों में कौन उनके खिलाफ हैं। यह कुछ उस किस्म की बात हो सकती है कि भारत में आज चुनावों के कुछ महीने पहले कोई पार्टी या नेता अपने किसी समर्थक को बागी बताते हुए दूसरी पार्टी में भेजने का नाटक करवाए, और फिर चुनाव तक वहां की खबर लेते रहे। बहुत से लोगों का यह मानना था कि पुतिन ने वाग्नर के मुखिया से बगावत का यह नाटक इसीलिए करवाया था कि उस वक्त कोई और रूसी नेता या फौजी जनरल पुतिन के खिलाफ हो, तो उसकी नीयत भी उजागर हो सके।
इस पूरी बात को इतने खुलासे से लिखने का मकसद रूस के भीतर की बारीकियों को लिखना नहीं है, बल्कि दुनिया में कहीं भी इस किस्म की साजिश से सावधान रखना है। किसी भी देश में, किसी भी पार्टी में कोई ऐसा झूठा बागी खड़ा किया जा सकता है जो दूसरे खेमे में, दूसरी पार्टी में जाकर पहले तो वहां की हमदर्दी हासिल करे, और फिर यह पता लगाए कि वहां के कौन-कौन से नेता उसके अपने पुराने नेता के खिलाफ हैं, और उनकी क्या तैयारियां हैं। आज किसी पार्टी में शामिल होने वाले लोगों को लेकर यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे एक जासूस की तरह भी भेजे जा रहे हो सकते हैं, और वे कुछ अरसा नई पार्टी में काम करने के बाद फिर कोई बहाना बनाकर पुरानी पार्टी मेें लौट जाएं, जैसा कि बहुत से नेता करते हैं। इसलिए लोगों को सावधान भी रहना चाहिए कि ताजा-ताजा आए हुए लोग राजदार न बना लिए जाएं। इस बात को लिखना इसलिए भी जरूरी है कि हिन्दुस्तान जैसे देश में वामपंथियों को छोडक़र तमाम पार्टियां किसी भी गंदगी को वापिस लेने के लिए एक पैर पर खड़ी रहती हैं, और फिर अगर कोई जासूसी के ऐसे मकसद से दूसरी पार्टी में भेजे जाएं, तो उनकी घरवापिसी का रास्ता तो हमेशा ही खुले रहता है। इसलिए नए-नए आने वाले लोगों को उनका सम्मान करने के नाम पर इस तरह भीतर तक नहीं ले जाना चाहिए कि वे तबाही का सामान बन सकें।
बात शुरू तो हुई थी यूक्रेन से, फिर वह रूस चली गई, और वहां से हिन्दुस्तान के लिए एक सबक लेकर पहुंची है। जिनको इससे सावधानी सीखनी हो वे सीख सकते हैं, बाकी धोखा खाना तो हर किसी का जन्मसिद्ध अधिकार रहता ही है।
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मध्यप्रदेश में अभी छेडख़ानी से तंग एक लडक़ी ने खुदकुशी की, और उसके बाद पुलिस कार्रवाई न होने से निराश उसके पिता ने खुदकुशी की। अब उस लडक़ी की रोती हुई मां छेडऩे वालों के घर पर बुलडोजर चलाने की मांग कर रही है। यह नौबत मध्यप्रदेश में ही नहीं है, बल्कि कई दूसरे प्रदेशों में भी है। कॉलेज में पढऩे वाली छात्रा, रक्षा गोस्वामी ने गांव के लोगों की छेडख़ानी से थककर आत्महत्या कर ली थी, और उसने सुसाइड नोट में छह लोगों के नाम भी लिखे थे। पुलिस ने इनमें से सिर्फ एक को गिरफ्तार किया था, और जमानत पर छूटने के बाद वह आरोपी खुदकुशी वाली लडक़ी के पिता को धमका रहा था। डरे हुए पिता ने भी आत्महत्या कर ली, और जब उसकी लाश सडक़ पर रखकर लोगों ने चक्काजाम किया, तब कहीं जाकर पुलिस ने सुसाइड नोट में लिखे नामों पर जुर्म दर्ज किया। परिवार का झोपड़े से भी गया-बीता छोटा सा घर जर्जर हो चुका है। और मध्यप्रदेश के सर्वाधिक बड़बोले गृहमंत्री अब जाकर कुछ पुलिसवालों को निलंबित कर रहे हैं, किसी बड़े अफसर को जांच की जिम्मेदारी दे रहे हैं।
मध्यप्रदेश के बारे में यह समझने की जरूरत है कि वहां इस किस्म की अराजक घटनाएं लगातार हो रही हैं, और अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए मुख्यमंत्री निवास पर बुलाकर पांव धोने को इस परिवार की अकेली रह गई महिला एकदम सही व्यक्ति होगी जिसे वे मां या ताई जो चाहे कहें, चाहें तो बहन कहें, और चाहें तो मरने वाली लडक़ी को भांजी कहें। मुख्यमंत्री निवास पर एक बड़े हॉल में कई परातें सजा देनी चाहिए जहां वे बारी-बारी से लोगों के पैर धोते रहें। एक सरकार जिसे कि कानून का राज लागू करना चाहिए, वह कहीं किसी फिल्मी सितारे के पीछे बावलों की तरह पड़ी रहती थी, तो कहीं किसी लेखक या व्यंग्यकार को एफआईआर की धमकी देती रहती थी, तब तक जब तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से अपने एक प्रदेश के गृहमंत्री की ऐसी हरकतों पर नाखुशी जाहिर नहीं कर दी थी।
खैर, कोई पार्टी अगर अपने ही मुख्यमंत्री, बाकी मंत्रियों से बेहतर कामकाज की उम्मीद करती है, तो उसे खुद भी कुछ मिसालें पेश करनी पड़ती हैं। आज तो देश में एक मिसाल बड़ी साफ-साफ है कि ओलंपिक से गोल्ड मैडल लेकर आने वाली पहलवान लड़कियों की छेडख़ानी और यौन शोषण की दर्जनों घटनाओं की शिकायत के बाद भी भाजपा ने अपने एक बाहुबली सांसद बृजभूषण सिंह को आज तक पार्टी से निलंबित भी नहीं किया है, उनको कोई नोटिस भी नहीं दिया है। महीनों तक ये लड़कियां सडक़ों पर प्रदर्शन करती रहीं, भाजपा के समर्थक सोशल मीडिया पर इन लड़कियों पर बदचलनी के साथ-साथ साजिश जैसी तोहमतें लगाते रहे, इनको देशद्रोही करार दिया गया, और कांग्रेस का हथियार बताया गया, लेकिन भाजपा ने अपने इस सांसद को छुआ भी नहीं। मतलब यह कि उसकी मिसाल अपने बाकी मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के लिए साफ थी कि अगर कोई पार्टी में बहुत बड़ा ताकतवर है तो फिर चाहे सुप्रीम कोर्ट ही उसके कुकर्मों पर पुलिस रिपोर्ट लिखने क्यों न कहे, पार्टी उस पर कुछ नहीं कहेगी। और ऐसी मिसाल के बाद अगर मध्यप्रदेश या दूसरे प्रदेश अपने बलात्कारियों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, तो वह किसी तरह से भी पार्टी अनुशासन के खिलाफ नहीं है।
न सिर्फ राजनीतिक दल, बल्कि सरकारें और पुलिस जैसे महकमे भी एक-दूसरे को देखकर सबक लेते रहते हैं, और ऐसा सबक ईमानदार और कड़ी कार्रवाई के लिए तो कम ही लिया जाता है, आमतौर पर कुकर्मों के लिए अधिक लिया जाता है। यही वजह है कि गरीब लडक़ी खुदकुशी कर रही है, उसका पिता खुदकुशी कर रहा है, पुलिस कार्रवाई न होने की वजह से दो जिंदगियां बेबसी में खत्म हो रही हैं, और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रियों के साथ, सपत्नीक पूल लंच या डिनर कर रहे हैं, ऐसा सरकारी वीडियो विदिशा के इस परिवार की मौतों की दशगात्र या तेरहवीं का पूल-भोज लग रहा है।
अभी दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट की कड़ी निगरानी की वजह से, बहुत ही अनमने होने के बावजूद निचली अदालत में भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दायर चार्जशीट में लिखा है कि अब तक की जांच के आधार पर बृजभूषण पर यौन उत्पीडऩ, छेड़छाड़, और पीछा करने के अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, और दंडित किया जा सकता है। इन धाराओं के तहत अपराध सिद्ध होने पर पांच साल तक की जेल हो सकती है। पुलिस ने जिन गवाहों से बात की है, उनमें से पन्द्रह ने पहलवान लड़कियों के आरोपों को सही बताया है। इस भाजपा सांसद पर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में जा चुकीं महिला पहलवानों के यौन उत्पीडऩ के पन्द्रह आरोप लगे हैं।
देखना यह है कि भाजपा अब भी अपने इस सांसद के खिलाफ पार्टी की कोई कार्रवाई करती है या नहीं? ऐसा बताया जाता है कि यह सांसद अपने इलाके में कई सीटों पर भाजपा का भविष्य प्रभावित करने की ताकत रखता है, और इसीलिए पार्टी उसे छू नहीं रही है। इसके पहले भी वह बहुत बड़े-बड़े आरोपों में फंसे रहा, और यह साफ करना बेहतर होगा कि इसके पहले वह समाजवादी पार्टी से भी सांसद बन चुका है। उसके खिलाफ बड़े-बड़े जुर्मों के 38 मामले दर्ज हैं और एक वीडियो इंटरव्यू में उसने खुद यह मंजूर किया था कि वह पहले एक कत्ल कर चुका है। उसने कैमरे के सामने कहा था कि उसने अपने एक दोस्त के हत्यारे की हत्या की थी। देश के राजनीतिक दलों में चुनाव जीतने की संभावना रखने वाले तमाम मवालियों के लिए अपार मोहब्बत पैदा हो जाती है। बहुत कम राजनीतिक दल ऐसे होंगे जिन्हें जीतने की संभावना वाले हत्यारों और बलात्कारियों से परहेज हो, अगर उनके मामले उन्हें चुनाव आयोग के नियमों में अपात्र न बनाते हैं।
हमारा ख्याल है कि देश भर के इंसानों को हर उस पार्टी का जमकर विरोध करना चाहिए जो कि हत्या और बलात्कार जैसे, यौन शोषण और अपहरण जैसे जुर्म में फंसे दिख रहे लोगों को उम्मीदवार बना रही हैं। ऐसी पार्टियों से सार्वजनिक सवाल होने चाहिए, उन्हें सार्वजनिक रूप से धिक्कारना चाहिए, और अगर उन्हीं की सरकारों के मातहत ऐसा हो रहा है, और कार्रवाई नहीं हो रही है, तो सोशल मीडिया पर भी उनके खिलाफ जमकर लिखा जाना चाहिए। ऐसी पार्टियां जहां-जहां सरकार बनाएंगी, वहां-वहां अपने बलात्कारियों को इसी तरह बचाएंगी, ऐसी पार्टियां चाहे वे कोई भी हों, उन्हें पूरी तरह खारिज करना चाहिए, तभी लोगों की बहन-बेटियां हिफाजत से रह सकेंगी। बृजभूषण शरण सिंह का मामला यह बताता है कि कोई पार्टी किस हद तक बेशर्म हो सकती है, और किस हद तक अपने पसंदीदा मुजरिम के साथ खड़े रह सकती है।
हिन्दुस्तान के लोग पिछले दो-तीन दिनों से हिमालय पहाड़ी क्षेत्र में हो रही तबाही के वीडियो देखकर दहले हुए हैं। इनमें जम्मू और श्रीनगर के बीच के हाईवे पर एक सुरंग के मुहाने पर बहकर खत्म हो गई पहाड़ी सडक़ का वीडियो सबसे ही भयानक दिखता है, लेकिन हिमाचल से ऐसे और कई वीडियो आए हैं जिनमें नदियां तबाही फैलाते हुए बस्तियों के भीतर घुस रही हैं, और साथ वे लकडिय़ों के इतने लट्ठे और इतना कीचड़ लेकर आ रही हैं कि पूरा गांव उससे पट जा रहा है। कुछ पुलों पर खड़े हुए लोग बहती हुई कारों के वीडियो बना रहे हैं, और किनारे खड़े कुछ लोग लोहे के बहते हुए पुलों को भी कैमरों पर कैद कर रहे हैं। अभी तो बारिश का पूरा विकराल दौर शुरू भी नहीं हुआ है, और तबाही इस हद तक पहुंची दिख रही है, आगे जाने क्या होगा। और जिस तरह जम्मू-श्रीनगर हाईवे बह गया है, उसकी तो अगले लंबे वक्त तक मरम्मत भी मुमकिन नहीं दिख रही है क्योंकि उसके नीचे की पूरी पहाड़ी ही धसक गई है।
Video which I just got from kasol.#HimachalPradesh #Himachal #kasol #flooding #monsoon pic.twitter.com/6ouluUBl5n
— Sidharth Shukla (@sidhshuk) July 9, 2023
हिन्दुस्तान में हिमालय पर्वतमाला के बहुत से हिस्सों में इतना बेतरतीब विकास हो रहा है कि ऐसी और इससे भी बुरी तबाही का खतरा खड़े ही रहेगा। लोगों को याद होगा कि दस बरस पहले केदारनाथ में जो विकराल बाढ़ आई थी, उसकी भविष्यवाणी भी किसी ने नहीं की थी, और उससे हुई तबाही का ठीक-ठीक अंदाज तो आज तक नहीं लग पाया है, क्योंकि बहुत से बेघर लोग उसके मलबे में कहीं-कहीं दबे पड़े होंगे, और उनकी खबर भी किसी को नहीं होगी। किसी भी धर्म के तीर्थस्थानों के आसपास ऐसे बहुत से गरीब, बेघर, बीमार, बूढ़े रहते हैं जो कि श्रद्धालुओं से मिली भीख पर जिंदा रहते हैं, और जिनके न रहने पर उनके नाम पर रोने वाले लोग नहीं रहते। ऐसे कितने ही लोग केदारनाथ की बाढ़ में मरे होंगे, और उनका हिसाब भी नहीं रहा होगा।
कश्मीर से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड तक केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर और अलग-अलग जितने किस्म के प्रोजेक्ट चला रही हैं, और उनसे जो खतरे खड़े हो रहे हैं, उनके बारे में कुछ दिन पहले इस अखबार के यूट्यूब चैनल पर एक पर्यावरण-पत्रकार हृदयेश जोशी का एक इंटरव्यू पोस्ट किया गया था जिन्होंने केदारनाथ की दस बरस पहले की तबाही के बाद सबसे पहले वहां पहुंचकर रिपोर्टिंग की थी, और किताब लिखी थी। उन्होंने भी पहाड़ी इलाकों के नाजुक पर्यावरण और वहां की जमीन की सीमित क्षमता के बारे में बहुत कुछ कहा था, जिसे अलग से देखा-सुना जा सकता है। ऐसे कई जानकार लोगों का कहना यही है कि नेता, अफसर, और ठेकेदार मिलकर अंधाधुंध प्रोजेक्ट बना रहे हैं जिसमें उनके हाथ मोटा कमीशन लगे, लेकिन प्राकृतिक विपदा का खतरा चाहे कितना ही बढ़ता क्यों न चले। अभी जिस तरह एक मामूली बारिश, जो कि इस मौसम की शुरूआत ही है, वही दिल दहलाने वाले जैसे नजारे दिखा रही है, उससे किसी विकराल बारिश की नौबत में हालत का अंदाज लगाया जा सकता है। जिस तरह सडक़ों को चौड़ा करने, सुरंगें बनाने, नदियों पर बांध बनाने, नदियों के किनारे किसी भी तरह के निर्माण और खुदाई का मलबा पटक देने का काम चल रहा है, वह अभी दो दिनों के वीडियो में दिख रहा है कि पानी कितना कीचड़ और मलबा लेकर आ रहा है। पानी अगर सिर्फ पानी रहता, तो वह अधिक तबाही किए बिना निकल गया रहता, लेकिन जब पानी किनारों पर डाल दिए गए मलबों को बहाकर ला रहा है तो वह नदियों को उससे पाट भी रहा है, और उथली रह गई नदियां बाढ़ का पानी समा नहीं पा रही हैं, और पानी किनारों पर और दूर तक बढ़ रहा है, वह और अधिक मलबा और किनारे का सामान बहाकर ला रहा है। नदियों में गाद का जो भराव हो रहा है, उससे नदियों की पानी ढोने की क्षमता घटती जा रही है, और बाढ़ की नौबत में पानी किनारों पर अधिक दूर तक जाता है, और वहां से अधिक मलबा लाकर नदियों को और पाट देता है। यह सिलसिला बढ़ते ही चल रहा है।
Early Morning Scene Of Kullu manali pic.twitter.com/fRy18nvi7O
— Go Himachal (@GoHimachal_) July 9, 2023
हमने उस यूट्यूब इंटरव्यू पर भी इस खतरनाक नौबत को सामने रखा था, और पर्यावरण के जानकार लोग हमेशा से ही पहाड़ी इलाकों से ऐसा खिलवाड़ करने के खिलाफ चेतावनी देते आए हैं। पहाड़ों का भूगोल, वहां की जमीन के नीचे का ढांचा इस तरह का नहीं रहता है कि उससे ऐसे भयानक और गंभीर खिलवाड़ करने के लिए छूट ली जाए। फिर यह पूरा इलाका जिस तरह भूकंप के खतरे पर भी बैठा हुआ है, उसका भी ध्यान रखना चाहिए। लेकिन कहीं तीर्थयात्रा के लिए अधिक गाडिय़ों को तेजी से पहुंचाने के लिए चौड़े-चौड़े राजमार्ग बनाने पहाड़ों को काटा जा रहा है, तो कहीं पर्यटकों को अधिक ढोने के लिए पेड़ों को काटकर जमीन बनाई जा रही है। इन दोनों तबकों की बेतहाशा ढुलाई के लिए पहाड़ों के भविष्य को दांव पर लगा दिया जा रहा है, और यह भविष्य बहुत दूर का भी नहीं है, यह प्रोजेक्ट बनते-बनते ही तबाही लाने वाला भविष्य है जो कि पांच-दस साल के भीतर ही नतीजे दिखा रहा है। लंबे वक्त में पहाड़ों की ऐसी तबाही से और कितनी बर्बादी होगी, इसका अंदाज अगर लोगों को लग भी रहा है, तो भी वे इसे अनदेखा करने में ही मुनाफा देख रहे हैं। नतीजा यह है कि पहाड़ों पर परे से आने वाले तीर्थयात्रियों और सैलानियों की सहूलियतों के लिए वहां की कुदरत को, वहां के ढांचे को जितना तबाह किया जा रहा है, उसकी भरपाई कोई भी नहीं कर पाएंगे। लोगों को यह मान लेना चाहिए कि पहाड़ों की लोगों और ढांचों को ढोने की एक क्षमता है, और उससे अधिक छूट की उम्मीद करना इंसानों की खुद की तबाही होगी। धरती की सेहत पर पर्यावरण की ऐसी बर्बादी का कोई खास असर नहीं होना है क्योंकि इससे जितने इंसान तबाह होंगे, उससे धरती का पर्यावरण तबाह होना घटेगा भी। इसलिए कुदरत का एक संतुलन तो बने रहेगा।
पहाड़ों पर सडक़ों, सुरंगों, और पुलों को मुम्बई-पुणे एक्सप्रेस हाईवे की तरह का बनाने की जिद ऐसी बहुत सी तबाही ला रही है। फिर सैलानियों के लिए अधिक बिजली, अधिक पानी के लिए जो पनबिजली योजनाएं बनाई जा रही हैं, उनसे एक अलग तबाही आ रही है, और उससे भी बहुत बड़ी तबाही का खतरा खड़ा होते चल रहा है। चूंकि हिन्दुस्तान के बाकी अधिकतर हिस्सों के लोग अच्छे मौसम में पर्यटक-कस्बों को देखने चले जाते हैं, पहाड़ पर वक्त गुजारने चले जाते हैं, या तीर्थयात्रा के लिए चले जाते हैं, इसलिए उन्हें उस इलाके पर हमेशा के लिए खड़ा किया जा रहा खतरा दिखता नहीं है। बाकी देश का रिश्ता पहाड़ों से जिंदगी में कुछ बार बस कुछ-कुछ दिनों के लिए बनता है, इसलिए उन्हें उससे अधिक फिक्र हो भी नहीं सकती। लेकिन ऐसा लगता है कि इन पहाड़ी राज्यों की किसी भी योजना का काम पर्यावरण के बड़े जानकार लोगों की मदद से, बहुत ही तंगदिली से करना चाहिए, जो कि आज ठेकेदारों के नजरिए से, सत्ता की दरियादिली से, और अफसरों के भ्रष्टाचार से किया जा रहा है।
हिन्दुस्तान इंटरनेट बंद करने वाले दुनिया के देशों में सबसे आगे है। जहां कहीं साम्प्रदायिक या किसी दूसरे किस्म का दंगा होता है, वहां तो अफवाहें या हकीकत न फैलें, इसलिए भी इंटरनेट बंद कर दिया जाता है ताकि सोशल मीडिया पर भडक़ाने का काम न हो सके। यह तो समझ आता है। राजस्थान जैसे प्रदेश का इंटरनेट बंद करना भी समझ में आता है, यहां इम्तिहानों में पेपर आऊट करने और नकल करवाने को रोकने का और कोई जरिया नहीं दिखता। लेकिन देश के राष्ट्रपति भवन में इंटरनेट और टीवी के सिग्नल बंद होने की तो कोई वजह नहीं दिखती है। ऐसा भी नहीं लगता है कि राष्ट्रपति को अखबार देखने नहीं मिलते होंगे। फिर राष्ट्रपति हैं कहां? आज देश में पहली बार एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति है, और देश के एक आदिवासी बहुल राज्य में जिस तरह से आदिवासियों के साथ हिंसा हो रही है, जिस तरह वे एक राज्य के घरेलू मोर्चे पर हिंसा में आमने-सामने हैं, उन्हें देखकर लगता है कि क्या आदिवासी महिला राष्ट्रपति को इसकी खबर नहीं लग रही है? मणिपुर के हालात समझने के लिए न मैतेई जुबान जरूरी है, न कुकी या नगा जुबान, हिन्दी और अंग्रेजी में भी इस प्रदेश की हर जानकारी मौजूद है, बस यही लगता है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में आज राष्ट्रपति ही नामौजूद है जिसे कि सशस्त्र सेनाओं का सुप्रीम कमांडर होने का दर्जा भी हासिल है। जिस तरह राजकीय समारोहों में भाले लिए हुए घुड़सवारों के अंगरक्षक दस्ते से घिरी हुई राष्ट्रपति की बग्गी चलती है, उससे याद करने पर ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक जिम्मेदारी क्या महज अपने आपको बचाकर रखने की है? और यह भी लगता है कि राष्ट्रपति के ओहदे के भीतर एक इंसान की गुंजाइश तो हमेशा ही बची रहती है, ओहदे का मोह और उसका आतंक कभी भी इतना अधिक तो नहीं हो सकता कि राष्ट्रपति के भीतर के इंसान की पूरी तरह ही मौत हो जाए। अगर किसी राष्ट्रपति को एक और कार्यकाल का भी मोह है, तो भी सच्ची बात करने लायक इंसान तो भीतर फिर भी बचा होना चाहिए।
हम यह नहीं मानते कि राष्ट्रपति किसी एक तबके के होते हैं, उन्हें राजनीतिक वजहों से किसी एक तबके से लाकर राष्ट्रपति बनाया तो जा सकता है, लेकिन एक बार राष्ट्रपति बन जाने पर देश के तमाम तबकों के प्रति उनका नजरिया एक सरीखा रहना चाहिए। खासकर जो दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, और महिलाओं सरीखे कमजोर तबके हैं, उनका तो खास ख्याल रखना हर राष्ट्रपति की प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत के संविधान में भी कई जगहों पर देश के आदिवासी बहुल चुनिंदा इलाकों के लिए राज्यपालों की एक अतिरिक्त संवैधानिक जिम्मेदारी गिनाई गई है, और उन्हें इसके लिए खास हक भी दिए गए हैं। राज्यपाल जिन अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं, वे राष्ट्रीय स्तर पर एक किस्म से राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हुए करते हैं। इसलिए राष्ट्रपति की तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती ही है। आज हिन्दुस्तान में हम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आदिवासी होने की बात न भी करें, तो अगर कोई ब्राम्हण, क्षत्रिय, या वैश्य राष्ट्रपति भी होते, तो भी हमारा लिखना यही होता कि देश के अल्पसंख्यक और कमजोर तबकों के हक का खास ख्याल रखना उनकी पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए। अगर देश और प्रदेशों की सरकारें पर्याप्त करते हुए नहीं दिख रही हैं, तो राष्ट्रपति को सरकार से इस बारे में पूछताछ करना चाहिए जिसका हक उन्हें संविधान में साफ-साफ दिया गया है, और यह बात साफ है कि संविधान जब कोई हक देता है, तो उसके साथ उसी वाक्य या पैराग्राफ में लिखित या अलिखित कई किस्म की जिम्मेदारियां भी देता है। लोकतंत्र अधिकार और जिम्मेदारी एक-दूसरे के साथ ही चलते हैं। इसलिए आज अगर द्रौपदी मुर्मू के हाथ देश के संवैधानिक प्रमुख होने का अधिकार है, तो उन पर देश में सवैधानिक व्यवस्था लागू होने की जिम्मेदारी भी है। भारत की संसदीय शासन प्रणाली के मुताबिक राष्ट्रपति बहुत से मामलों में सरकार के ऊपर जाकर कोई कार्रवाई नहीं कर सकतीं, लेकिन वे सरकार से जवाब-तलब कर सकती हैं, सरकार को सुझाव दे सकती हैं, और सरकार से अपनी नाखुशी जाहिर कर सकती हैं। राष्ट्रपति की ड्यूटी में लिखा हुआ है कि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी देश के संविधान और देश में कानून की रक्षा और बचाव करना है, जिसकी कि वे शपथ लेते हैं। उन्हें सिफारिश करने और निगरानी रखने (सुपरवाइजरी अधिकार) दिए गए हैं, और संविधान को बनाए रखने के लिए उनसे इनके इस्तेमाल की उम्मीद की जाती है। संविधान में लिखा हुआ है कि राष्ट्रपति का एक प्रमुख काम केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा, संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा लिए जाने वाले असंवैधानिक फैसलों को रोकना है, ताकि वे कानून न बन सकें। राष्ट्रपति संविधान के प्रमुख रक्षक हैं जो कि सरकारों और सदनों के असंवैधानिक कामों को रोक सकते/सकती हैं।
ऐसी संवैधानिक व्यवस्था से परे भी राष्ट्रपति को कई किस्म के संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं जिससे वे सरकार के प्रति अपनी नाराजगी बता सकते हैं, असहमति दर्ज कर सकते हैं, और सरकार के कई फैसलों को अपनी मेज पर आने पर खासे अरसे के लिए रोक सकते हैं। कुल मिलाकर राष्ट्रपति जिस दिन चाहें, उस दिन प्रधानमंत्री को खबर भेज सकते हैं कि वे आकर मिलें, और फिर प्रधानमंत्री की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे जल्द से जल्द जाकर राष्ट्रपति से मिलें, उनके सवालों के जवाब दें, उनकी मांगी गई जानकारियां दें, और उनकी जिज्ञासाओं को शांत भी करें। केन्द्र सरकार, मणिपुर सरकार, मणिपुर के राज्यपाल जैसी कई संस्थाएं हैं जिनसे राज्यपाल सीधे या केन्द्रीय मंत्रिमंडल के माध्यम से जानकारी मांग सकती हैं, या सुझाव भी दे सकती हैं। लेकिन राष्ट्रपति की चुप्पी भारतीय लोकतंत्र के लिए घातक है। अगर राष्ट्रपति ने केन्द्र सरकार से या प्रधानमंत्री से कोई जानकारी मांगी भी है, तो देश को भी उसका पता चलना चाहिए कि सरकार के ऊपर भी एक संवैधानिक व्यवस्था ऐसी है जिसके प्रति केन्द्र सरकार जवाबदेह है। आज ऐसा लगता है कि अगर केन्द्र सरकार ने मणिपुर की तरफ से अपनी आंखें बंद कर ली हैं, तो कोई भी उससे जवाब मांगने की हालत में नहीं हैं। जबकि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी नहीं हैं। उसमें सरकार, संसद, अदालत, और राष्ट्रपति इनके एक जटिल अंतरसंबंधों की व्यवस्था है। राष्ट्रपति का आज न सिर्फ यह हक है, बल्कि उनकी बहुत बड़ी ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है कि वे प्रधानमंत्री को बुलाकर मणिपुर पर चर्चा करें, उस पर जानकारी लें, और अगर जरूरत पड़े तो अपने सवालों की शक्ल में भी वे प्रधानमंत्री को सलाह दे सकती हैं। केन्द्र सरकार अगर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं, या पूरी करते हुए नहीं दिख रही है, तो यह राष्ट्रपति की बारी है।
अगर राष्ट्रपति को लगता है कि उन्हें इस कुर्सी पर बिठाने वाली सरकार उनके किसी सवाल से नाराज हो जाएगी, तो उन्हें प्रेमचंद के पंच परमेश्वर को पढऩा चाहिए जिसमें लेखक ने यह सवाल लिखा था- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?
उत्तर भारत में सरकार के एक किसी सबसे निचले ओहदे पर काम करने वाले आदमी और उसकी अब अफसर बन गई बीवी के बीच का झगड़ा खबरों में छाया हुआ है। इन खबरों की सुर्खियां पढक़र जो समझ आता है वह यह है कि इस नौजवान ने अपने बीवी को शादी के बाद पढ़ा-लिखाकर, या उसकी मदद करके, या उस महिला ने खुद अपनी मेहनत से राज्य की प्रशासनिक सेवा में जगह पाई, और उसके बाद शायद उसे पता लगा कि पति जो अपने को छोटा अफसर बताता है, वह सफाई कर्मचारी है। इसके बाद खबरें बताती हैं कि इस महिला को उसके साथ रहना नहीं जमा, उसका कहना है कि उसे धोखा दिया गया था, पति का कहना है कि अब अफसर बनने के बाद पत्नी का किसी दूसरे अफसर से संबंध हो गया है, और इसलिए यह शादी टूट रही है। मामला सरकारी विभागीय जांच तक भी पहुंच गया है। अब जैसा कि पति-पत्नी के बीच ऐसे किसी विवाद में होता है, दोनों तरफ से जानकारी गलत देने के कई आरोप भी लग रहे हैं, और मामला पुलिस तक भी गया है।
हिन्दुस्तान का खबरों का मीडिया, और सोशल मीडिया, दोनों ही इस खबर पर टूट पड़े हैं। फिर इन दोनों जगहों पर इस मामले को चटपटा बनाने के लिए कुछ घरेलू वीडियो भी आए हैं जिसमें गालियां दी जा रही हैं, और झगड़ा चल रहा है। इस जोड़े की दो बेटियां भी हैं, और जाहिर है कि मां-बाप के बीच के इतने झगड़े, इतने तनाव का बुरा असर उन पर भी पड़ रहा होगा। हर किस्म के मीडिया पर लोगों का यह रूख सामने आ रहा है कि एक गरीब पति ने पत्नी की मदद करके उसे बढ़ावा दिया, और उसने अफसर बनते ही उसे दुत्कार दिया। यह एक निहायत ही निजी मामला था, जिसने सार्वजनिक शक्ल अख्तियार कर ली है। पति-पत्नी के बीच शादी के वक्त किसी जानकारी को छुपाना भी कोई बड़ी बात नहीं है, और पति का पत्नी को आगे बढ़ाना भी बहुत अनहोनी नहीं है। इसके साथ-साथ जब दोनों में से कोई एक खासा ऊपर चले जाए, तो उन्हें दूसरे का बोझ लगना या अपने लायक न लगना भी बहुत अनोखी बात नहीं है। अखिल भारतीय सेवाओं के बहुत से ऐसे अफसर रहते हैं जो अपनी जाति-परंपरा के मुताबिक, गांवों के रिवाजों के मुताबिक कम उम्र में ही शादीशुदा हो चुके रहते हैं, और बाद में जब वे बड़े अफसर बन जाते हैं, तो उन्हें गांव की वह बीवी ठीक नहीं लगती है, और उनमें से बहुत से लोग उसे गांव में छोडक़र एक शहरी बीवी भी ले आते हैं। ऐसा ही बहुत से नेताओं ने भी किया है जिनके नामों की चर्चा की जरूरत नहीं है। इसे जिंदगी का एक हिस्सा ही मानना चाहिए कि शादी के बाद अगर जोड़ीदारों के बीच कोई ऐसा बड़ा फासला आ जाता है, या उनमें से किसी एक की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा बदलाव आता है, कोई दूसरे बहुत ताकतवर लोग उनकी जिंदगी में आ जाते हैं, तो उन्हें अपने जीवनसाथी फीके लगने लग सकते हैं। यह किसी और के आए बिना भी होता है, शादियां भी कई वजहों से टूटती हैं, बहुत सी शादियां इस वजहों से टूटती हैं कि लडक़े या लडक़ी की कोई शारीरिक या मानसिक दिक्कत छुपाकर रखी गई थी जो कि शादी के बाद सामने आई। इसलिए इस शादी का टूटना बहुत सी तोहमतों के साथ जरूर हो रहा है, लेकिन तोहमतों से परे बहुत सी शादियां टूटती ही रहती हैं।
अब कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इससे लोगों का हौसला पस्त होगा, और वे अपने बीवी को आगे बढ़ाने से हिचकेंगे। हिन्दुस्तानी समाज को देखें, तो औरत का हौसला बढ़ाने में आदमी का हौसला हमेशा से ही पस्त रहते आया है। और यह जरूरी भी नहीं है कि किसी औरत को गुलाम की तरह रखा जाए, और वह छोडक़र न जा सके। आज सामाजिक और कानूनी माहौल बदला हुआ है, अब पहले के मुकाबले अधिक लड़कियां और महिलाएं जुल्म के खिलाफ उठ खड़ी हो रही हैं। ऐसे में बिना धोखाधड़ी वाले रिश्ते भी टूट रहे हैं। और रिश्तों के टूटने को हमेशा बुरा भी नहीं मानना चाहिए। कुछ रिश्ते जब ऐसे हो जाते हैं कि वे कैंसर की तरह स्थाई तकलीफ देने वाले बन जाते हैं, तो उन्हें सर्जरी से अलग कर देना ही जिंदगी को बचाने के लिए जरूरी होता है। रिश्तों को बड़ी तकलीफों के साथ अंतहीन ढोते रहना कोई अच्छी बात नहीं होती है, और जब दो जीवनसाथियों के बीच एक दर्जा गुलाम सरीखा हो जाए, तो उसे ऐसे रिश्ते से बाहर आ जाना चाहिए। जब किसी को यह लगे कि बच्चों पर इस रिश्ते का अब सिर्फ बुरा असर पड़ रहा है, तब भी उन्हें ऐसे रिश्तों से बाहर आ जाना चाहिए। शादी के बारे में पंडितों और धर्म की कही हुई यह बात निहायत फिजूल रहती है कि रिश्ते स्वर्ग में बनते हैं, और सात जनम के लिए होते हैं। रिश्ते आधी या तीन चौथाई जिंदगी के लिए ही बनते हैं, और अगर उनको निभाना मुश्किल पड़ रहा है, तो एक-दूसरे को ढोने के बजाय हल्के बदन अलग-अलग रास्तों पर निकल जाना ठीक रहता है।
उत्तर भारत की जिस शादी को लेकर खबरों और सोशल मीडिया पर दुनिया जहान की बहस चल रही है, उसमें बस महिला के अधिकार का मुद्दा काम का है, और यह भी काम का है कि एक सफाई कर्मचारी के काम के लिए एक महिला के मन में अफसर बनने के बाद अगर कोई हिकारत आई है, तो वह कैसी है। बाकी इस मामले पर अधिक लोग इसलिए अधिक उबले हुए हैं क्योंकि इसमें आदमी बेइंसाफी का शिकार दिख रहा है या दिखाया जा रहा है। तकरीबन तमाम मामलों में बेइंसाफी का शिकार होने पर महिला का मानो एकाधिकार रहता है। इस एक मामले के बहुत व्यापक मतलब नहीं निकालने चाहिए। मामले का अधिकांश हिस्सा दो पक्षों की जुबानी बातचीत पर टिका हुआ है, और दोनों में से कोई भी सही या गलत हो सकते हैं। फिर दुनिया में जिन्हें महिलाओं के हक का सम्मान करना है, उन्हें बराबरी का दर्जा देना है, उन्हें बढ़ावा देना है, उन लोगों का हौसला इस मामले से पस्त नहीं होने वाला है। बहस के लिए यह मान भी लें कि इस मामले में बीवी की गलती है जो कि अफसर बनने के बाद अपने पति से हिकारत करने लगी है, तो भी यह बात बहुत अटपटी नहीं है, और उसने मर्दों के दबदबे वाली समाज व्यवस्था में मर्दों की सोच देख-देखकर ही ऐसा सीखा होगा। इस एक घटना से इंसाफपसंद लोगों की सोच पर फर्क नहीं पड़ेगा। जिन लोगों को इस मुद्दे पर और भी बहस करनी है, उससे भी किसी का नुकसान नहीं है क्योंकि बहस से कई मुद्दे सामने भी आते हैं, और तर्क सामने रखने वाले लोगों की दबी-छुपी भावनाएं भी बाहर निकलती हैं। हम इस मामले में इस जोड़े में से किसी के बेकसूर होने के बारे में अटकल लगाना नहीं चाहते। हमारा यही मानना है कि इंसानों के बीच के रिश्ते ऐसे ही रहते हैं, वे कभी भी खराब हो सकते हैं, एक-दूसरे के लिए हिकारत पैदा कर सकते हैं, और इनके टूट जाने को कोई नुकसान नहीं मानना चाहिए। बाकी जो लोग इस पर बहस जारी रखना चाहते हैं, उनके सोशल मीडिया एक मुफ्त की जगह है ही।
नेपाल में प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड ने अभी बयान दिया कि नेपाल में रहने वाले भारतीय मूल के एक कारोबारी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए भारत से बात की थी। उसके इस बयान के बाद नेपाली विपक्ष ने उनसे इस्तीफे की मांग की है, और उनका कहना है कि भारत की ओर से नियुक्त किए गए प्रधानमंत्री को इस पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। संसद में भी इसे लेकर हंगामा चल रहा है, और सत्तारूढ़ गठबंधन की एक पार्टी ने भी इस पर नाराजगी जताई है। इस्तीफे की मांग पर कई दल एक हो रहे हैं। उल्लेखनीय है कि प्रचंड ने एक कारोबारी प्रीतम सिंह पर लिखी किताब के विमोचन के मौके पर कहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रीतम सिंह कई बार दिल्ली गए थे, और कई बार काठमांडू में कई पार्टियों से चर्चा की थी। उन्होंने इस कारोबारी से अपने पारिवारिक संबंधों की चर्चा भी की थी। विपक्ष के विरोध में यह तर्क मजबूत है कि नेपाली प्रधानमंत्री तय करने में भारत की कोई भूमिका क्यों होनी चाहिए?
इस पूरे मामले को देखकर लगता है कि बात सिर्फ भारतीय मूल के कारोबारी की भारत सरकार से बातचीत की नहीं है, यह उस कारोबारी की नेपाली पार्टियों से बातचीत की भी है जो कि खुद नेपाली प्रधानमंत्री ने बताई है। यह बात दबी-छुपी नहीं है कि बहुत से देशों में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या मंत्री बनाने के पीछे बड़े कारोबारियों का हाथ रहता है जो एक पूंजीनिवेश की तरह यह काम करते हैं, और बाद में उसकी कई गुना फसल काटते हैं। हिन्दुस्तान में भी आज केन्द्र सरकार देश के एक सबसे बड़े कारोबारी का साथ देने की तोहमत झेल रही है, और वह कारोबारी मौजूदा सरकार का एक सबसे बड़ा हिमायती है ही। और यह एकदम अनोखी और नई बात भी नहीं है, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, और प्रणब मुखर्जी मंत्री होने के अलावा देश के उद्योगपतियों से संबंध रखने के एक बड़े मध्यस्थ माने जाते थे, उस वक्त भी रिलायंस के धीरूभाई अंबानी के साथ उनके जरूरत से अधिक घरोबे की चर्चा होते रहती थी, और ऐसा माना जाता रहा कि धीरूभाई के आगे बढऩे में इंदिरा सरकार की नीतियों का बड़ा हाथ रहा। तो हाथ और साथ की ऐसी जोड़ी राजनीति और कारोबार में बहुत नई नहीं है, और सिर्फ हिन्दुस्तान में नहीं हैं। लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब खाड़ी के किसी देश से हिन्दुस्तान लौटते हुए अचानक ही पाकिस्तान उतरे, और नवाज शरीफ के परिवार पहुंचे, उनकी मां के लिए तोहफे लेकर गए, उनका आशीर्वाद लिया, परिवार में जन्मदिन और शादी के जलसों में शामिल हुए, तो उस वक्त कहा जाता है कि इस फैसले में देश के एक बड़े इस्पात उद्योगपति सजन जिंदल का बड़ा हाथ था जो कि नवाज शरीफ के परिवार से दो पीढिय़ों से जुड़े हुए थे। सजन जिंदल शायद उस वक्त पाकिस्तान में मौजूद भी थे। इसलिए सत्ता और कारोबारियों का करीबी रिश्ता नया नहीं है, और अब तो इसका विस्तार होकर सत्ता और मुजरिमों के बीच भी करीब रिश्ते तक पहुंच गया है। ऐसे में नेपाल में पीएम प्रचंड ने अगर सरला से कोई बात कह दी है, तो वह कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं है, लेकिन किसी आजाद मुल्क में प्रधानमंत्री की कही हुई यह एक अटपटी बात है, और बड़ी राजनीतिक चूक है। सरकार, राजनीति, और सार्वजनिक जीवन में बहुत किस्म के पाखंड मुखौटे लगाकर खप जाते हैं, लेकिन वे औपचारिक रूप से मंजूर करने वाले नहीं रहते हैं।
हिन्दुस्तानी राजनीति में लाखों-करोड़ों लोग शराब पीते होंगे, लेकिन नेता-कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से इसे मंजूर करने में हिचकिचाते होंगे। कर्नाटक के हेगड़े या उत्तर-पूर्व के संगमा सरीखे नेता कम रहते हैं। लेकिन ऐसी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से परे जब सत्ता की राजनीति में कारोबारियों की बात आती है, तो न तो वह बोलने लायक रहती है, और न ही उजागर होने देने लायक। जब कभी कारोबारियों से ऐसे रिश्तों का भांडाफोड़ होता है, नेताओं की ही बदनामी होती है। इसके बाद अगर कारोबारी की तरक्की का कुछ हिस्सा सत्ता की मेहरबानी के बिना भी हुआ होगा, तो भी वह सत्ता की मेहरबानी से हासिल गिनाया जाता है। लोगों के बीच भी सब मालूम रहते हुए भी ऐसे घरोबे को अच्छा नहीं माना जाता। सार्वजनिक जीवन में पुराने वक्त के राजाओं के लिए नैतिकता का जो पैमाना बनाया गया था कि राजा को न सिर्फ निष्पक्ष रहना चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। नेपाल में तो प्रचंड माओवादियों के बीच से निकलकर आए हैं, और उनके बीच तो बाजार व्यवस्था को लेकर एक अलग हिकारत रहती है। ऐसे में प्रचंड का सार्वजनिक रूप से यह कहना अटपटा भी रहा, और नेपाल के एक देश के रूप में अपमानजनक भी रहा कि नेपाली प्रधानमंत्री तय होने में भारत सरकार का कोई हाथ रहता है।
भारत जैसे देश में संसद और विधानसभा चुनावों में पार्टियों की टिकट तय होते वक्त बहुत से उद्योगपति अपनी दखल रखते हैं, और जो नेता उनके कर्मचारियों और दलालों की तरह काम करते हैं, उन्हें उम्मीदवार बनवाने का काम करते हैं। चूंकि वे पार्टियों को चंदा भी देते हैं, टिकट तय करने वाले बड़े नेताओं के घर नगदी भी पहुंचाते रहते हैं, इसलिए कारोबारियों की पसंद उम्मीदवारी के वक्त से ही काम आने लगती है। ऐसा माना जाता है कि भारत जैसे देश में भी संसद और विधानसभाओं में बड़े कारोबारी घरानों के अघोषित प्रवक्ता मौजूद रहते हैं, जो उनके हितों की बात करते हैं, और जो मंत्रियों और बाकी सरकार से उनके काम करवाने में लगे रहते हैं। कभी-कभी मंत्री और मुख्यमंत्री बनवाने में भी बड़े कारोबारी दखल रखते हैं, और महत्वपूर्ण मंत्रालयों की अफसरों की कुर्सियों पर लोगों को बिठवाने में तो उनका दखल रहता ही है ताकि उनका काम आराम से और तेज रफ्तार से चलता रहे।
क्रोनी कैपिटलिज्म कहे जाने वाले इस तौरे-तरीके से बचना मुश्किल रहता है क्योंकि नेताओं और कारोबारियों ने मिलकर कालेधन से चुनाव लडऩे की व्यवस्था को मजबूत और स्थाई बना दिया है। ऐसे में अगर नेपाल में एक कारोबारी किसी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भारत की राजधानी में अपने संपर्कों का इस्तेमाल करता है, तो उसमें भी कुछ अटपटा नहीं है। अटपटा बस यही है कि पीएम प्रचंड ने इस बात को खुलकर मंजूर कर लिया है। सार्वजनिक जीवन में मुखौटा उतारने के अपने खतरे रहते हैं, अब देखना है कि प्रचंड इससे कैसे उबरते हैं।
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बाजार व्यवस्था का दुनिया के वामपंथी, समाजवादी, और भी कई तबके विरोध करते हैं, लेकिन उसकी कुछ खूबियों में से एक यह भी है कि जब कारोबारी किसी गिरोहबंदी को नहीं कर पाते, और वे एक-दूसरे के मुकाबले में उतरते हैं, तो उससे कम से कम कुछ समय तक तो फायदा ग्राहकों का होता है। सोशल मीडिया के जितने प्लेटफॉर्म हैं, वे एक-दूसरे से मुकाबला करते ही हैं, लेकिन अब ट्विटर ने अपने इस्तेमाल करने वालों को जिस किस्म की कारोबारी बंदिशों में बांधना शुरू किया था, तो कल ही फेसबुक की कंपनी मेटा ने थ्रेड्स नाम का एक नया प्लेटफॉर्म लांच किया है, जिसमें ट्विटर जैसी अधिकतर खूबियां तो रहेंगी ही, वह इससे कई मायनों में आगे भी रहेगा। दरअसल जब सामने कोई एक मॉडल हो, तो फिर उससे आगे निकलना आसान हो जाता है। और मेटा के तीन प्लेटफॉर्म हैं, फेसबुक, इंस्टाग्राम, और वॉट्सऐप? इसलिए इन तीनों के साथ जोडक़र अगर ट्विटर का कोई विकल्प पेश किया जाएगा, तो उसके इस्तेमाल और उसकी कामयाबी की संभावना भी अधिक रहेगी। इससे ट्विटर का अपने किस्म के प्लेटफॉर्म का एकाधिकार तो टूटता है, लेकिन मेटा का लोगों के सोचने, लिखने, संपर्क करने, इन सब कामों पर एकाधिकार बढ़ जाता है। यह एक अलग किस्म का खतरा है, और दुनिया के कुछ विकसित लोकतंत्रों में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग सरकारी और अदालती रोक-टोक झेल भी रहे हैं।
अब तक ट्विटर मेटा से अलग एक कंपनी है, लेकिन अगर ट्विटर का एक विकल्प मेटा के पास आ जाता है, तो दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे मेटा का मानसिक गुलाम हो सकता है। उसका स्वतंत्र सोचना-विचारना, अभिव्यक्त करना, यह सब कुछ खत्म हो सकता है। विचारों के प्रवाह की पहाड़ी नदियों को मानो एक जल सुरंग बनाकर एक खास तरफ मोड़ देना, ऐसी कंपनी के लिए बड़ा आसान हो जाएगा, और एक सदी पहले जिन विज्ञान कथा लेखकों ने ब्रेनवॉश करने जैसी बात लिखी थी, वह हकीकत के एकदम करीब पहुंच जाएगी। आज वैसे भी दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा वही पढ़ता और देखता-सुनता है जो कि मार्क जुकरबर्ग दिखाना चाहता है। इसलिए पहली नजर में आज ट्विटर का मुफ्त या सस्ता विकल्प लोगों को अच्छा लग सकता है, हमें भी एलन मस्क जैसे सनकी मालिक की रोजाना लादी जा रही नई-नई शर्तों से परे कोई दूसरा वैसा या उससे अच्छा प्लेटफॉर्म सुहा रहा है, लेकिन सूचना से लेकर निजी जानकारियों तक का जितना बड़ा जमावड़ा मेटा कंपनी के मातहत हो गया है, वह भयानक है। अब एक ही कंपनी के कम्प्यूटर आपके निजी संदेशों की बातों से इश्तहारी मतलब के शब्द निकाल लेंगे, इसके कम्प्यूटर आपकी निजी पसंद-नापसंद जान लेंगे, यह भी जान लेंगे कि आप किन दोस्तों के साथ उठते-बैठते हैं, और उनकी पसंद क्या है, और कारोबार एक नए हमलावर तेवरों के साथ आप पर टूट पड़ेगा। आपको न सिर्फ अपनी पसंद और जरूरत के सामानों के इश्तहार दिखने लगेंगे, बल्कि आपको आपकी अब तक की खरीदी की ताकत के मुताबिक उस दाम के आसपास के सामान दिखेंगे, आपके नंबर के जूते अगर हैं, तो वही दिखेंगे, पसंद का रंग दिखेगा, पास के रेस्त्रां दिखेंगे, और अगर आपका उपवास है, तो आसपास की ऐसी उपवासी थाली का इश्तहार दिखेगा जो कि जोमैटो जैसे घर पहुंच सेवा वाले लोग कुछ मिनटों में पहुंचा देंगे। मतलब यह कि आपकी पसंद और जरूरत के मुताबिक बाजार आपको इस पूरी तरह जकड़ लेगा कि आपकी उससे परे सोचने की ताकत घट जाएगी।
आज भी होता यह है कि लोग जैसे-जैसे अपने मोबाइल फोन और कम्प्यूटर पर, इंटरनेट और तरह-तरह के एप्लीकेशन का इस्तेमाल करते हुए जितने किस्म की इजाजत उनको देते हैं, उनके कम्प्यूटर यह तक दर्ज करते जाते हैं कि आप तीन महीनों के बाद किस दिन खून की जांच कराने जाते हैं, और किस लैब में जाते हैं, इसलिए उसके दो दिन पहले हो सकता है कि किसी और पैथोलॉजी लैब का इश्तहार आपको दिखने लगे। इसका एक बड़ा अच्छा लतीफा काफी समय से इंटरनेट पर घूमता है जिसमें अलग-अलग कारोबार के कम्प्यूटर लोगों की निजी जानकारी का इस्तेमाल करते हुए उन्हें सुझाते रहते हैं कि उनके लिए क्या खाना ठीक है, और क्या खराब है, क्योंकि उनकी ब्लड शूगर पिछली रिपोर्ट में बढ़ी निकली थी, और कपड़ों का नाप भी पिछले दो बरस में बढ़ गया है, इसलिए उन्हें डबल चीज वाला पित्जा नहीं खाना चाहिए।
आज भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के कम्प्यूटर के एल्गोरिद्म यह तय करते हैं कि आपके किन दोस्तों की पोस्ट आपको दिखे, और किसकी नहीं, आपकी पोस्ट किनको दिखे, और किनको नहीं। कुल मिलाकर वे आपका दायरा तय करने लगते हैं कि आपका संपर्क किन लोगों से होना चाहिए, और कौन लोग आपके आसपास दिखाने लायक नहीं हैं। एक तो हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के कम्प्यूटर अधिक आक्रामक हो रहे हैं, वे अधिक घुसपैठ कर रहे हैं, अधिक ताक-झांक कर रहे हैं। और अब जब ऐसे कई प्लेटफॉर्म एक होकर एक मालिक के तहत आ रहे हैं, तो यह एक किस्म का जाल बन जा रहा है, जिसमें फंसे बिना कोई मछली या मगरमच्छ बच नहीं सकते। हम सोशल मीडिया को लेकर कुछ अधिक बार लिखते हैं क्योंकि लोगों की जिंदगी में इनकी दखल बहुत बढ़ती जा रही है, इसके अलावा दुनिया भर के देशों में लोकतंत्र पर इसका हमला भी बढ़ते जा रहा है। लोगों को याद रहना चाहिए कि कुछ महीने पहले दुनिया के एक सबसे प्रतिष्ठित अखबार गॉर्डियन ने कई दूसरे मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर एक भांडाफोड़ किया था कि किस तरह एक इजराइली कंपनी दुनिया भर के लोगों और संस्थानों के ईमेल हैक कर सकती है, किस तरह उनके पक्ष में, और उनके विरोधियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर जनमत तैयार कर सकती है। जैसे-जैसे सोशल मीडिया अधिक ताकतवर होते चलेगा, वैसे-वैसे उसके मुकाबले लोकतंत्र की हिफाजत कमजोर होते चलेगी। लोगों को अब सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने से तो नहीं रोका जा सकता, लेकिन लोकतांत्रिक सोच को, उसकी विविधता को ऐसे संगठित, कारोबारी, और षडय़ंत्रकारी हमलों से कैसे बचाया जा सकता है इस बारे में जरूर सोचना चाहिए। हिन्दुस्तान में हम देखते ही हैं कि किस तरह आज कुछ ताकतें नफरत और हिंसा फैलाने के लिए, या किसी के महिमामंडन के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही हैं। यह तो सामने दिख रहा है, लेकिन पर्दे के पीछे और भी क्या-क्या हो रहा होगा यह सोचना मुश्किल है। फिर यह है कि ताकतवर लोगों से असहमत जो लोग हैं, उन पर हमलों के लिए भी इसका इस्तेमाल बड़ा आम हो चुका है। ऐसे में लोगों को यह सोचना चाहिए कि जब गूगल जैसी कंपनी उनकी हर सर्च, हर आवाजाही का पल-पल का हिसाब रखती है, जब मेटा जैसी कंपनी उनके हर निजी संदेश, उनके तमाम संपर्क, और विचारों का, पसंद का हिसाब रखती है, तो फिर वे कारोबार के हाथों शोषण के जाल में फंसे हुए हैं, और ये गिने-चुने कारोबार उन्हें जब चाहें तब कठपुतली की तरह धागों से बांधकर चला सकते हैं। यह तस्वीर आज लोगों को भयानक नहीं लगेगी, लेकिन यह कम भयानक नहीं है, और अधिक दूर भी नहीं है।
वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर ऐप जो कि अब सोशल मीडिया की तरह भी गिना जाने लगा है क्योंकि उस पर लोगों के ग्रुप बन रहे हैं जो मुद्दों पर चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, और तरह-तरह के फोटो, वीडियो, और लिंक एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। ऐसे प्लेटफॉर्म पर लोग रात-दिन एक-दूसरे से ऐसे वीडियो पोस्ट करते हैं जिसके साथ गुमनाम अपील भी लिखी रहती है कि कृपया-कृपया-कृपया आखिर तक देखें, और अधिक से अधिक लोगों को बढ़ाएं। नतीजा यह होता है कि बहुत से लोग ऐसे वीडियो या फोटो-लिंक बिना सोचे-समझे आगे बढ़ा देते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह हाईवे पर किसी ट्रक के पीछे हॉर्न प्लीज लिखा देखकर पीछे से आ रही गाड़ी के ड्राइवर हॉर्न बजा देते हैं। ऐसे ही वॉट्सऐप पर पिछले दिनों कई नामी-गिरामी पत्रकारों के ट्वीट फैले थे जिनमें वे कह रहे थे कि किस तरह फ्रांस में चल रही हिंसा को देखते हुए लोगों ने यह अपील की है कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को फ्रांस भेजना चाहिए जहां वे एक दिन में हिंसा रोक देंगे। इसकी शुरूआत एक विदेशी दिखते हुए नाम के वेरीफाईड ट्विटर हैंडल से हुई थी जिस पर प्रो.एन.जॉन कैम ने ऐसी अपील की थी, और इस पर योगी आदित्यनाथ के ऑफिस ने लिखा था कि दुनिया में जहां कहीं भी साम्प्रदायिक दंगे भडक़ते हैं, और कानून व्यवस्था बिगड़ती है तो दुनिया उत्तरप्रदेश में महाराजजी द्वारा स्थापित योगी मॉडल की तरफ देखती है। सीएम के दफ्तर द्वारा किया गया री-ट्वीट वजन की बात होती है। बाद में कुछ फैक्ट चेकर्स ने कहा कि यह अकाऊंट ही फर्जी है, और इसके पीछे एक ऐसा हिन्दू-हिन्दुस्तानी है जिसे हैदराबाद की पुलिस अपने कर्मचारियों से धोखा करने के जुर्म में गिरफ्तार कर चुकी है। विदेशी लगते नाम वाले इस अकाऊंट को देखें तो यह जाहिर है कि यह मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुस्तान में एक अभियान छेड़़े हुए है, और आक्रामक हिन्दुत्व को फैलाने का काम कर रहा है।
एक दूसरा वीडियो हिन्दुस्तान में चारों तरफ घूम रहा है जिसमें बिना कपड़ों की एक महिला लाठी लेकर पुलिस पर हमला करते दिख रही है, और पुलिस वाले कुछ प्रतिरोध करने के बाद मौका छोडक़र भाग रहे हैं। इसके साथ लिखा गया है कि मणिपुर में आंदोलनकारियों ने नंगी औरतों की एक ब्रिगेड बना ली है जो कि पुलिस और सुरक्षा बलों को मारकर भगा रही है। इसे लेकर तरह-तरह की बातें लिखी गईं कि भारत का यह क्या हाल हो गया है, और भारत में ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं। जब एक बड़े प्रकाशन के फैक्ट चेकर ने इस वीडियो की जांच की तो पता लगा कि इसका मणिपुर से कोई संबंध नहीं है, और यह अभी 2023 में उत्तरप्रदेश के म्युनिसिपल चुनावों के दौरान चंदौली में चुनाव लड़ रहे एक ट्रांसजेंडर के समर्थकों का है जो कि धांधली का आरोप लगाते हुए पुलिस से भिड़ गए थे, और वीडियो में महिला दिख रही वैसी ही एक ट्रांसजेंडर है।
किन्नरों के इस भारी विरोध-प्रदर्शन के बाद जब पुनर्गणना की गई, तो किन्नर-प्रत्याशी की जीत घोषित हुई, और पहले जीते घोषित किए गए भाजपा उम्मीदवार की हार हुई। इस वीडियो की जांच करने पर इसमें सोनू किन्नर जिंदाबाद के नारों की आवाज भी आ रही है, और इस फैक्ट चेकर ने पाया कि इसका मणिपुर से कुछ भी लेना-देना नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तैरती बेबुनियाद चीजों को अगर किसी मुख्यमंत्री का कार्यालय अपनी तारीफ मानकर बढ़ाता है, और इस बात को गंभीरता से लेता है कि पूरी दुनिया में जहां-कहीं भी हिंसा भडक़ती है, वहां लोग योगी की तरफ देखते हैं, तो फिर बाकी अफवाहबाजों को क्या कहा जा सकता है? यूपी के सीएम के दफ्तर को शोहरत की इतनी हड़बड़ी भी क्यों होनी चाहिए कि वे ट्विटर पर विदेशी नाम वाले दिख रहे किसी व्यक्ति की लिखी गई बात को एक सर्टिफिकेट की तरह लेकर अपने मुख्यमंत्री का ढिंढोरा पीटें? फिर एक बात यह भी है कि बड़े-बड़े प्रकाशनों के, या मीडिया समूह के नामी-गिरामी पत्रकारों को अनजान नामों वाले फिरंगियों की लिखी बातों को लेकर अपने देश के किसी एक मुख्यमंत्री को महानता का दर्जा देने की इतनी हड़बड़ी क्यों है? कल ही देश के एक साइबर विशेषज्ञ ने एक लेख में लिखा है कि किस तरह इस देश की सरकारें सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों को भुगतान करके अपना प्रचार करवाने के फेर में हैं। मतलब यह कि अब जाने-माने और ईमानदार पत्रकारों की जरूरत किसी को नहीं रह गई है, और जो पेशेवर चारण और भाट की तरह स्तुति-वंदना कर सकते हों, उन्हीं की जरूरत सबको है।
हिन्दुस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जो मालिकान और नामी लोग आज चुनिंदा नेताओं के गुणगान करके फूले नहीं समाते, उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि एक-एक ट्वीट करने पर आज उन्हें जो भुगतान हो रहा है, कल वह सीधे-सीधे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नाम की एक नई नस्ल के पास जाने लगेगा, जो कि नेताओं को अधिक काम के दिखेंगे, सरकारों और पार्टियों के लिए अधिक असरदार ढिंढोरची साबित होंगे। हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में जहां आजादी की लड़ाई की शुरुआत से ही समर्पित और ईमानदार अखबारों की एक लंबी परंपरा रही है, वहां पर आज मामला पत्रकारिता से टीवी और डिजिटल होते हुए अब सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों तक पहुंच गया है, जिनके लिए न किसी ईमान की जरूरत है, न जिसके लिए पेशे के कोई उसूल हैं, बस उनकी पहुंच अधिक लोगों तक है, और नेताओं के लिए यही काफी है।
लेकिन जिस तरह रूस की तरफ से यूक्रेन जाकर मोर्चे पर लड़ाई लडऩे का काम वाग्नर नाम की भाड़े की फौज कर रही थी, कुछ उसी किस्म से मेहनताना पाकर किसी भी बात को आगे बढ़ाने का काम आज हिन्दुस्तान में लोग कर रहे हैं, और यह सिलसिला बढ़ते जा रहा है, और वाग्नर-लड़ाकों की तरह यहां भी अब कुछ लोग औरों के मुकाबले भी अधिक असरदार झूठ फैलाने वाले साबित हो रहे हैं। ये लोग फ्रांस में योगी की मांग खड़ी कर सकते हैं, और ये लोग उसी सांस में योगीराज की मतगणना की बेईमानी को मणिपुरी लोगों की बेशर्म संस्कृति बता सकते हैं। अपनी नालायकी या अपने जुर्म को किस आसानी से किसी और का जुर्म ठहराया जा सकता है, इसे हिन्दुस्तानी सोशल मीडिया पर भाड़े के सैनिकों में देखा जा सकता है।
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दिल्ली से लगे हुए उत्तरप्रदेश के नोएडा की खबर है कि वहां एक हिन्दुस्तानी युवक के साथ अवैध रूप से रह रही एक पाकिस्तानी महिला और उसके चार बच्चों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। सचिन नाम के इस आदमी से इस महिला की ऑनलाईन मुलाकात पबजी नाम के खेल के मार्फत हुई, और वह मोहब्बत में बदल गई। यह युवक किराने की एक दुकान पर नौकरी करता है, और पाकिस्तान की यह महिला 30 साल से कम की है, और चार बच्चों सहित वह पाकिस्तान से पहले नेपाल पहुंची, और वहां से गैरकानूनी तरीके से भारत आकर इस युवक के साथ अपने बच्चों सहित रह रही थी। इसके पीछे जासूसी वगैरह की कोई अधिक साजिश का अंदाज नहीं लगता है क्योंकि कोई महिला जासूस चार बच्चों संग ऐसे काम में क्यों लगेगी, और वह किराना दुकान के एक मामूली नौकर से हिन्दुस्तान की कौन सी जानकारी हासिल कर लेगी? यह सब तो अटकल है जब तक कि पुलिस जांच में पूरी बात सामने नहीं आती है। और हम आज जो तथ्य सामने हैं उन्हीं के आधार पर आगे लिख रहे हैं।
दुनिया के बहुत से समाजों में महिलाओं को सोशल मीडिया की वजह से पहली बार एक इंसान की तरह कई किस्म के हक मिले। उनको घर बैठे ही अपने फोन से फेसबुक दोस्त मिले, इंस्टाग्राम पर वीडियो लेने-देने का हक मिला, और दुनिया के तमाम औरत-मर्द जो कि अपने प्रेमी-प्रेमिका या जीवनसाथी के साथ खुश नहीं थे, उन्हें एक विकल्प भी मिला। खासकर इससे महिलाओं के हक बहुत बढ़े क्योंकि वे ही सबसे अधिक दबी-कुचली रहती थीं, और समाज या परिवार में कैदी की तरह भी रहती थीं। महिलाओं की दबी-कुचली भावनाओं को एक रास्ता मिला, और आज जगह-जगह यह सुनने मिलता है कि लड़कियां अपनी मर्जी से मोहब्बत कर रही हैं, और शादीशुदा महिलाएं भी विवाहेत्तर संबंधों में पड़ रही हैं। यह नैतिक और कानूनी रूप से चाहे कितना ही गलत हो, यह समाज के भीतर लैंगिक समानता का एक दावा भी है, क्योंकि पुरूष तो हमेशा से ही चारों तरफ मुंह मारते रहने के लिए जाने जाते रहे हैं, और महिलाओं के लिए यह उस किस्म की बराबरी की यह एक नई शुुरूआत है।
लेकिन सोशल मीडिया और इस तरह के ऑनलाईन गेम, या किसी दूसरे संपर्क के तरीकों की मेहरबानी से जो नए रिश्ते बन रहे हैं, वे परंपरागत सावधानियों से परे के रहते हैं। पहले जब लोग एक-दूसरे से मिलजुलकर, उनको देखकर, परिवारों के बारे में जानकर संबंध बनाते थे, तो वे अधिक मजबूत बुनियाद पर रहते थे, और सोचे-समझे रहते थे। अब ऑनलाईन पहचान जब बढक़र मोहब्बत तक पहुंच जाती है, तब तक ऐसे साथी एक-दूसरे की कोई हकीकत नहीं जानते, और उन्हें सिर्फ उन्हीं तस्वीरों और जानकारियों की खबर रहती है जो कि उन्हें बताई जाती है। यह सिलसिला एक नए किस्म के खतरे लेकर आ रहा है, और बहुत से लोगों को रिश्तों में दूर तक चले जाने के बाद पता लगता है कि उन्हें जो बताया गया था, उसमें से बहुत सारी बातें झूठ थीं। लेकिन तब तक इतने किस्म के फोटो-वीडियो लेना-देना हो चुका रहता है कि नुकसान की भरपाई आसान नहीं रहती। यह सिलसिला बताता है कि ऑनलाईन दुनिया हकीकत की कड़ी जमीन से बिल्कुल अलग और परे की रहती है, और असल जिंदगी की सीमित समझ से ऑनलाईन रिश्तों के असीमित झूठ को पकड़ पाना आसान नहीं रहता।
अब जिस घटना से हम इस बात को लिख रहे हैं उसी को एक नजर देखें, तो पाकिस्तान जैसे तंगनजरिए वाले समाज में, पुराने खयालों वाले मुस्लिम परिवार की यह महिला अगर अपने चार बच्चों सहित किसी प्रेम में पडक़र हिन्दुस्तान के एक मामूली हैसियत वाले नौजवान के पास आ गई है, पाकिस्तान का अपना घर-परिवार छोडक़र आ गई है, तो आज उसका और उसके बच्चों का क्या भविष्य है? एक तो भारत के कानून के मुताबिक वह मुजरिम भी है क्योंकि वह गैरकानूनी तरीके से यहां पहुंची है, और यहां बसी हुई है। दूसरी बात यह कि उसके बच्चों की हिन्दुस्तान के कानून में कोई हैसियत नहीं है, और सरकार अधिक से अधिक उन बच्चों को सरहद पर ले जाकर पाकिस्तान के हवाले कर सकती है। किसी तरह यह महिला कोई सजा काटकर पाकिस्तान लौटेगी, तो भी उसका वहां परिवार और समाज में क्या भविष्य बचेगा? और यहां किराना दुकान में नौकरी करने वाले नौजवान के साथ उसके चार बच्चों का क्या भविष्य हो सकेगा? ऑनलाईन संबंधों ने लोगों की सामान्य समझबूझ को छीन लिया है। लोग उसे एक हकीकत मानकर, असली दुनिया मानकर उसमें डूब जाते हैं, और जिस तरह बादलों पर चलने पर कंकड़-कांटे नहीं लगते, उसी तरह ऑनलाईन संबंधों में असल जिंदगी की दिक्कतों और खतरों का अहसास नहीं होता। दोनों ही तरफ के लोग अपने को एक खूबसूरत मुखौटे के पीछे पेश करते हैं, और धोखा देते हैं, धोखा खाते हैं।
हिन्दुस्तान में हर दिन ऐसी कई खबरें आती हैं कि किस तरह किसी नाबालिग को भी ऑनलाईन फंसाकर, या किसी शादीशुदा, बच्चों वाली महिला को ऑनलाईन फंसाकर कोई धोखेबाज ले गया। अब बहुत से लोग अपनी पारिवारिक स्थिति के भीतर बेचैन हो सकते हैं, लेकिन उस बेचैनी का ऐसा इलाज ढूंढना बहुत ही खतरनाक है। यह किसी के बताए सट्टा नंबर पर अपनी पूरी जिंदगी लगा देने सरीखा है। लोगों को ऐसी आत्मघाती गलतियां करने से बचना चाहिए क्योंकि यह उनके अपने खिलाफ जाने वाली बात रहती है, और जब वे ऐसी गलती की तात्कालिक सजा को भुगतकर निकलते हैं, तो भी बाकी जिंदगी वे इसकी तोहमत से नहीं उबर पाते। पाकिस्तानी महिला का यह मामला हमें इस बात को लोगों को समझाने के लिए एक अच्छी मिसाल की तरह मिला है, और लोगों को अपने आसपास इस मामले की चर्चा करनी चाहिए, इसके खतरों पर बात करनी चाहिए, ताकि सावधानी का एक सिलसिला शुरू हो सके।
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फ्रांस में 17 साल के एक नौजवान को पुलिस ने सडक़ पर रूकने कहा लेकिन उसने गाड़ी नहीं रोकी, इस पर चौराहे पर जब गाड़ी रूकी, तो पुलिस ने उसे गोली मार दी। इसे लेकर पिछले पांच दिनों से फ्रांस बुरी तरह जल रहा है। चूंकि राष्ट्रपति से लेकर बाकी तमाम लोगों ने पुलिस की इस हड़बड़ कार्रवाई की आलोचना की है, इसलिए पुलिस अभी चारों तरफ चल रही आगजनी पर भी अपने पर काबू रख रही है। यह एक अलग बात है कि देश के विपक्ष से लेकर पुलिसकर्मियों के संगठन तक राष्ट्रपति से कह रहे हैं कि ऐसी भयानक हिंसा के खिलाफ आपात कार्रवाई के कानून का इस्तेमाल करना चाहिए। अफ्रीकी मूल के इस लडक़े को पुलिस ने जिस अंदाज में मारा है उससे लोगों को याद पड़ रहा है कि पिछले बरस भी एक दर्जन से ज्यादा लोगों को पुलिस ने इसी तरह रेडलाईट पर थमी कार में मार डाला था। पुलिस को कड़ी कार्रवाई करने के लिए जो अधिकार दिए गए हैं, उनका जाहिर तौर पर बेजा इस्तेमाल माना जा रहा है। अल्पसंख्यक लोगों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर पहले से रंगभेद और पूर्वाग्रह के आरोप लग रहे थे। अब फ्रांस के अलग-अलग कई शहरों में भारी आगजनी चल रही है, सडक़ों पर गाडिय़ां जल रही हैं, सरकारी इमारतों को जलाया जा रहा है। यह पूरा आंदोलन सिर्फ काले लोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसमें और समुदायों के लोग भी शामिल हैं जो कि पुलिस की कार्रवाई से असहमति रखते हैं। राष्ट्रपति ने पुलिस की इस कार्रवाई की जमकर आलोचना की है, और पुलिस संगठन ने कहा है कि राष्ट्रपति को जांच के पहले इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए था।
योरप के देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलग पैमाने हैं, और पुलिस या समाज में किसी की रंगभेदी-नस्लभेदी दिखने वाली कार्रवाई के खिलाफ कड़े कानून हैं। समाज में नागरिकों, और शरण पाए हुए शरणार्थियों के अधिकार भी बहुत अधिक हैं, और समाज के एक बड़े तबके में यह जागरूकता भी है कि अल्पसंख्यकों और शरणार्थियों को भी हिफाजत और बराबरी का हक है। वहां पुलिस और सरकार अपनी छोटी-छोटी कार्रवाई के लिए भी जनता और कानून के प्रति जवाबदेह रहती हैं। लोगों को याद होगा कि अभी किस तरह लॉकडाउन और कोरोना नियमों के दौरान ब्रिटेन में प्रधानमंत्री निवास पर काम कर रहे लोगों ने एक जगह इकट्ठा होकर एक छोटी पार्टी कर ली, तो वह मामला बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ा कि लंदन की पुलिस ने जाकर प्रधानमंत्री निवास पर जांच की, बयान लिए, और पेनाल्टी के चालान जारी किए। दूसरी तरफ इस विवाद के दौरान ही प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन को पहले प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, और फिर इस बारे में संसद में झूठ बोलने के आरोप में अब संसद से इस्तीफा देना पड़ा है।
दुनिया के सभ्य लोकतंत्रों में जवाबदेही बड़ी होती है, लोगों को अपनी एक-एक सार्वजनिक और निजी हरकत के लिए जनता, कानून, और संसद के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान जैसे देश हैं जहां लोकतंत्र एक ऐसी बदहाली में पहुंच चुका है कि सत्ता पर बैठे हुए लोग, संविधान की शपथ लिए हुए लगातार नफरत फैलाने का काम करते हैं, और कई किस्म के जुर्म करते हैं, लेकिन बिना किसी जवाबदेही के देश की आखिरी अदालत तक लड़ते भी जाते हैं, और सत्ता पर काबिज भी रहते हैं। किसी तरह की कोई शर्म या झिझक अब भारतीय लोकतंत्र में अपने कुकर्मों को लेकर नहीं रह गई है। यह देखकर लगता है कि जहां एक शरणार्थी, या अफ्रीकी मूल के लडक़े की पुलिस के हाथों मौत पर पूरा देश जल उठा है, वहां पर हिन्दुस्तान में सत्ता की मेहरबानी से हिंसा करते हुए लोग सडक़ों पर खुलेआम कैमरों के सामने भीड़त्या करते हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ता। लोग अपनी ऐसी हिंसा के वीडियो बनाकर फैलाते हैं, ईश्वर के नाम के नारे लगाते हैं, देश के तिरंगे झंडे का इस्तेमाल करते हैं, परले दर्जे की साम्प्रदायिक और नफरती हिंसा करते हैं, और उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता। सभ्य समाज वही होता है जो कि अपने सबसे कमजोर तबके के लोगों के हक का भी सम्मान करता है, उनके हक के लिए लड़ता है। आज फ्रांस में सडक़ों पर चल रही आगजनी और तोडफ़ोड़ खराब बात है, हम उसको लोकतंत्र नहीं कह रहे हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि जिस लोकतांत्रिक जागरूकता के चलते हुए फ्रांसीसी जनता सडक़ों पर उतर आई, कानून अपने हाथ में ले रही है, पुलिस के अधिकारों में कटौती की मांग कर रही है, वह सब कुछ एक जिंदा देश होने का सुबूत है। यह एक अलग बात है कि लोगों का गुस्सा इतना अधिक है कि वे लोकतंत्र के तहत मिले हुए अधिकारों का हिंसक इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन यह बात भी है कि इस आक्रोश को देखकर देशों की सरकारें और संसद यह सोचने पर मजबूर होती हैं कि कानून और व्यवस्था में फेरबदल की जरूरत है।
दुनिया के बाकी लोकतंत्रों को भी यह समझना चाहिए कि उनके भीतर के सबसे कमजोर तबके, चाहे वे किसी देश की संस्कृति में दलित और आदिवासी हों, अल्पसंख्यक और गरीब हों, या किसी देश की संस्कृति में वे शरणार्थी हों, या गैरकानूनी रूप से आकर वहां ठहरे हुए हों, उनके बुनियादी मानवाधिकारों का जितना सम्मान जो समाज करता है, वही लोकतांत्रिक समाज के रूप में सम्मान का हकदार होता है। आज हिन्दुस्तान जैसे देशों में जिस तरह का बहुसंख्यकवाद चल रहा है उसमें देश की सबसे बड़ी धार्मिक आबादी वाले समुदाय से परे किसी के कोई हक नहीं माने जा रहे हैं। बाकी तमाम लोगों को चुनावों में खारिज करवाने का काम आसान लगता है क्योंकि जब चुनाव धार्मिक जनमत संग्रह में तब्दील कर दिया जाए, तो अल्पसंख्यक तबकों का कोई भी हक नहीं रह जाता। लेकिन लोगों को याद रखना चाहिए कि लोग धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर समाज के छोटे या कमजोर तबकों को आमतौर पर तो कुचल सकते हैं, लेकिन जब ऐसी हिंसा के खिलाफ वे छोटे तबके एक अलग किस्म की हिंसा पर उतारू होंगे, तो फिर बहुसंख्यक तबका भी अपने को बचा पाना मुश्किल पाएगा। फ्रांस से कई किस्म के सबक भी लेने की जरूरत है।
पहले तो दिल्ली के मंडावली इलाके में एक मंदिर का अवैध निर्माण तोड़ा गया, और अब एक दूसरे इलाके में सडक़ पर रोड़ा बने हुए एक मंदिर और एक मजार को बुलडोजर से हटा दिया गया है। इस दौरान पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की बड़ी तैनाती रखी गई, और अफसरों का कहना है कि लोगों से बात करके उन्हें सहमत कराकर यह काम किया गया है। अब जब किसी बखेड़े या हिंसा की खबर नहीं है तो यह माना जा सकता है कि अफसरों और लोगों ने मिलकर समझदारी का यह काम किया है। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने कई बरस पहले एक फैसले में कड़ा आदेश दिया था कि देश में कहीं भी किसी सार्वजनिक जगह पर कोई धार्मिक अवैध कब्जा या अवैध निर्माण नहीं होना चाहिए, और ऐसा होने पर जिला प्रशासन को सीधा जिम्मेदार ठहराया जाएगा, लेकिन हम अपने आसपास देखते हैं तो कहीं भी इस पर अमल नहीं दिखता है। न सिर्फ सरकारी और सार्वजनिक जगहों पर बल्कि आमतौर पर सडक़ों की चौड़ाई को घेरते हुए, सार्वजनिक बगीचों और तालाब-तीर को घेरते हुए धार्मिक अवैध निर्माण होते हैं। तमाम नदियों के किनारे यही हाल रहता है, और सुप्रीम कोर्ट का हुक्म एक किस्म से कागज के टुकड़े से लुग्दी बनकर दुबारा इस्तेमाल हो रहा है, और अब जिला कलेक्टरों को यह याद भी नहीं होगा कि अदालत ने ऐसा कोई हुक्म दिया था। यह नौबत अदालती फैसला न होने से भी खराब है।
आज देश में धार्मिक मुद्दे जिस तरह हिंसा की वजह बन रहे हैं, साम्प्रदायिक तनाव किसी न किसी धर्म की जगह से शुरू होता है, या धर्म की जगह पर पहुंच जाता है, इन सबको देखते हुए आज की यह एक बड़ी जरूरत है कि धर्मस्थानों का अवैध कब्जा और उनका अवैध निर्माण कड़ाई से रोका जाए ताकि तनाव की वजह कम हो सके। लेकिन किसी धर्म या सम्प्रदाय के वोटरों से राजनीतिक दल इतने डरे रहते हैं कि उस धर्म का कोई मुखिया या गुरू अगर सरकार या पार्टी के खिलाफ कोई फतवा जारी कर दे तो चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे डरे-सहमे नेताओं की वजह से उनके मातहत काम करने वाले अफसर भी चुप बैठे रहते हैं, और सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों में फैसले आने के बाद भी धार्मिक अवैध निर्माण तोड़े नहीं जाते। होना तो यह चाहिए कि लोगों को अपने धर्म का सम्मान करते हुए धर्म के नाम पर गैरकानूनी काम करने से बचना चाहिए, लेकिन तमाम धर्मालु लोगों को यह बात मालूम है कि धर्म का इस्तेमाल ही नाजायज और गैरकानूनी कामों के लिए किया जाना है, और वे इस मकसद को पूरा करने में जी-जान से लगे रहते हैं।
आज देश में धर्म, धर्मान्धता, और सांप्रदायिकता जैसे नफरती जहर की शक्ल ले चुके हैं, उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को धर्मस्थलों के अवैध कब्जे और अवैध निर्माण के अपने ही फैसले पर अमल की एक रिपोर्ट मंगवानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में ऐसा करने के लिए किसी बड़े वकील को अदालत का न्यायमित्र नियुक्त करता है जो कि जानकारी जुटाकर उस पर अपनी राय देकर अदालत को बताते हैं। कुछ व्यापक महत्व के मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट जांच कमिश्नर भी बनाता है जो कि देश भर से जानकारी मांगकर अदालत को रिपोर्ट देते हैं। लोगों को याद होगा कि पीयूसीएल की एक जनहित याचिका पर देश के लोगों के राशन के हक पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही जांच कमिश्नर बनाए थे, और वे बरसों तक देश में पीडीएस पर अमल की नीति बनाकर अदालत को देते थे, और तमाम राज्यों में उसके अमल पर निगरानी भी रखते थे। हमारा मानना है कि आज हिन्दुस्तान में धर्मान्धता से मुकाबले का काम कोई राजनीतिक दल करना नहीं चाहते, कोई एक वामपंथी दल अगर ऐसा चाहता भी होगा, तो उनका प्रभाव क्षेत्र अब तकरीबन खत्म हो चुका है। इसलिए अदालत को ही यह पहल करनी चाहिए, और देश भर में धर्मान्धता को कम करने के लिए जो-जो जानकारी आनी चाहिए, जांच होनी चाहिए, उसके लिए अदालत एक अलग कमिश्नर बनाए। यह बात हमने कुछ महीने पहले अदालत के हेट-स्पीच के खिलाफ दिए गए फैसले और कई आदेशों के बारे में भी लिखी थी कि देश में उस पर अमल कहीं नहीं हो रहा है, और अदालत को चाहिए कि मीडिया और सोशल मीडिया के रास्ते ऐसे अमल के लिए वह एक जांच आयुक्त बनाए। जांच आयुक्त के वैसे ही दफ्तर से धार्मिक अवैध निर्माणों की भी जांच हो सकती है, कुल मिलाकर धर्मान्धता और सांप्रदायिकता, नफरत से जुड़े हुए ऐसे दो-चार पहलुओं को एक साथ देखने की जरूरत है। अदालत से कम और कोई भी संवैधानिक संस्था आज देश को इस जहर से बचाने की ताकत नहीं रखती।


