विचार/लेख
चीन ने दो-बच्चों की कड़ी नीति को समाप्त करते हुए घोषणा की है कि वह अब हर जोड़े को तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति देगा।
सरकारी मीडिया शिन्हुआ ने बताया है कि चीन ने यह फैसला राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में हुई पोलित ब्यूरो की बैठक में लिया है।
यह फैसला तब लिया गया है जब हाल ही में चीन की जनसंख्या के आंकड़े सार्वजनिक किए गए थे जिसमें पता चला था कि उसकी जनसंख्या बीते कई दशकों में सबसे कम रफ्तार से बढ़ी है। इसके बाद चीन पर दबाव बढ़ा कि वह जोड़ों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करे और जनसंख्या की गिरावट को रोके।
इस महीने की शुरुआत में जारी जनसंख्या के आंकड़ों में बताया गया था कि बीते साल चीन में 1.2 करोड़ बच्चे पैदा हुए हैं जो कि 2016 के बाद हुई बड़ी गिरावट है और 1960 के बाद से सबसे कम बच्चे पैदा हुए हैं। 2016 में चीन में 1.8 करोड़ बच्चे पैदा हुए थे।
जनसंख्या के इन आंकड़ों के बाद यह माना जाने लगा था कि चीन बच्चे पैदा करने की पारिवारिक नीतियों में ज़रूर ढील देगा।
परिवार नियोजन और जबरन गर्भपात
2016 में चीन की सरकार ने विवादित वन-चाइल्ड पॉलिसी को खत्म कर दिया था और लोगों को दो बच्चे पैदा करने की अनुमति दे दी थी। लेकिन इस नियम में ढील देने के बाद भी देश में जन्म दर शुरुआती दो सालों में बढ़ी लेकिन फिर गिरने लगी।
द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की प्रमुख अर्थशास्त्री यू सू कहती हैं, ‘दूसरे बच्चे की नीति के सकारात्मक असर जन्म दर पर पड़े लेकिन यह बेहद कम समय के लिए साबित हुए।’
1979 में जनसंख्या वृद्धि को सीमित करने के उद्देश्य से चीन ने वन-चाइल्ड पॉलिसी लागू की थी जिसके कारण जनसंख्या के आंकड़े उसी हिसाब से सामने आते रहे। जो भी परिवार इस नियम का उल्लंघन करते थे उन्हें जुर्माना, रोजग़ार खोने का डर या कभी-कभी जबरन गर्भपात का सामना करना पड़ता था।
लिंग अनुपात में काफी अंतर
वन-चाइल्ड पॉलिसी के कारण देश में लिंग अनुपात में बड़ा अंतर सामने आया है। इसमें वह ऐतिहासिक संस्कृति भी जि़म्मेदार है जिसके तहत लडक़ों को लड़कियों पर अधिक वरीयता दी जाती है।
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर के सोशियॉलोजी डिपार्टमेंट के डॉक्टर मू जेंग कहते हैं, ‘इसके कारण विवाह के बाज़ार के सामने भी दिक्कतें खड़ी हुईं हैं। ख़ासतौर से उन पुरुषों के लिए जिनके पास कम सामाजिक-आर्थिक संसाधन थे।’
विशेषज्ञों का अनुमान था कि चीन के नए आंकड़ों के बाद बच्चों के जन्म पर लगी पाबंदियों को हटा लिया जाएगा लेकिन अब लग रहा है कि चीन इस पर सावधानी से क़दम आगे बढ़ा रहा है।
कुछ विशेषज्ञों ने इस पर भी आपत्ति ज़ाहिर की है कि इस क़दम के कारण ‘अन्य परेशानियों’ की भी संभावनाएं हैं जिनमें उन्होंने शहरी और ग्रामीण लोगों के बीच भारी असमानता की ओर ध्यान दिलाया है।
उनका कहना है कि बीजिंग और शांघाई जैसे महंगे शहरों में रह रही महिलाएं बच्चे पैदा करने में देरी कर सकती हैं लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में रह रहे लोग परंपरा का अभी भी पालन करना चाहते हैं और बड़े परिवार चाहते हैं।
नीतियों पर नजऱ रखने वाले एक विश्लेषक ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, ‘अगर नीति में पूरी तरह छूट दे दी जाए तो देश के ग्रामीण हिस्सों के लोग शहरों के मुक़ाबले अधिक बच्चे पैदा करेंगे और इससे अन्य दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।’
विश्लेषकों का मानना है कि इससे ग्रामीण परिवारों पर गरीबी और रोजगार का दबाव बढ़ेगा।
विशेषज्ञ पहले चेतावनी दे चुके थे कि चीन की जनसंख्या की गिरावट का असर दुनिया के दूसरे हिस्सों पर बुरी तरह से पड़ सकता है।
विस्कॉन्सिन-मेडिसन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉक्टर यी फ़ुक्सियान कहते हैं, ‘चीन की अर्थव्यवस्था बेहद तेज़ी से बढ़ रही है और दुनिया के अधिकतर उद्योग चीन पर निर्भर हैं। जनसंख्या में गिरावट का असर इस मामले में बहुत बड़ा है। (bbc.com)
-कृष्ण कांत
कांगो और रवांडा जैसे देश हमारी जान बचाने के लिए मदद भेज रहे हैं और हमारे प्रधानमंत्री अपने लिए 20 हजार करोड़ का हवा महल बनवा रहे हैं।
इस सरकार ने देश को पाकिस्तान, कांगो और रवांडा से भी पीछे धकेल दिया है। भारत की ऐसी छवि तो तब भी नहीं बनी थी जब हम तीसरी दुनिया के गरीब देशों में गिने जाते थे।
शिवसेना ने एकदम सही कहा है कि ‘देश अभी नेहरू-गांधी के बनाए सिस्टम की वजह से सर्वाइव कर रहा है। कई गरीब देश भारत की मदद कर रहे हैं। पहले पाकिस्तान, रवांडा और कॉन्गो दूसरों से मदद लेते थे। लेकिन भारत के मौजूदा शासकों की गलत नीतियों की वजह से देश इस स्थिति से गुजर रहा है।
छोटे पड़ोसी देश महामारी से निपटने में भारत को मदद दे रहे हैं, वहीं मोदी सरकार दिल्ली में कई करोड़ के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का काम रोकने के लिए तैयार नहीं है। नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका जैसे देश आत्मनिर्भर भारत को मदद की पेशकश कर रहे हैं।’
इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल द लैंसेट ने लिखा है कि मोदी सरकार को अपनी गलतियां स्वीकार करते हुए जिम्मेदार नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। खतरे के बारे में आगाह करने पर सुपरस्प्रेडर इवेंट हुए। अब जब तबाही मची है तो सरकार इसे रोकने के प्रयास करने की जगह फेसबुक और ट्विटर पर अपनी आलोचना करने वालों पर शिकंजा कसने में जुटी है।
दुनिया के सभी बड़े मीडिया संस्थान कोरोना की दूसरी लहर में मची तबाही के लिए भारत में ‘अक्षम सरकार’ और लुंजपुंज नेतृत्व को जिम्मेदार मान रहे हैं जिसने महामारी के समय चुनावी रैलियां कीं, कुंभ आयोजित किया और लोगों के बेपरवाह होने में अहम भूमिका निभाई। जब देश को कोरोना से निपटने की तैयारी करनी थी, तब भारत के प्रधानमंत्री झूठ का कारोबार करने में व्यस्त थे। अब जब मामला हाथ से निकल गया है तो सरकार अपनी छवि चमकाने में व्यस्त है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) स्वास्थ्य मंत्रालय से गुजारिश कर रहा है कि ‘सरकार अब तो जाग जाओ’। एसोसिएशन कोरोना संकट पर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कह रहा है कि वह स्वास्थ्य मंत्रालय की ‘सुस्ती’ देखकर हैरान है।
आईएमए ने कहा है, ‘महामारी की दूसरी वेव की वजह से पैदा हुए संकट से निपटने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की सुस्ती और अनुचित कार्रवाई देखकर हम हैरान हैं...सामूहिक चेतना, सक्रिय संज्ञान और आईएमए समेत दूसरे समझदार साथियों के निवेदन को कूड़ेदान में डालकर और बिना जमीनी हालात समझे फैसले लिए जाते हैं।’
एसोसिएशन का कहना है कि ‘सरकार झूठ बोलना बंद करे। आंकड़ों में पारदर्शिता लाए। कोविड मौतों को गैर-कोविड मौतें बताना बंद करे। देश में ऑक्सीजन का प्रोडक्शन पर्याप्त है, लेकिन दिक्कत उसके डिस्ट्रीब्यूशन में है।’
झूठ के रेत के सहारे नए भारत बनाने की प्रचार-पिपासा ने देश को ऐसे संकट में धकेल दिया है जहां कितने लाख मारे जाएंगे, किसी को अंदाजा तक नहीं है।
-कनुप्रिया
2019 के चुनाव के बाद मोदी जी ने कहा था कि हमारे पिछले 5 साल तो 70 साल के गड्ढे भरने में ही निकल गए। असल काम तो हम अब करेंगे। उसके बाद क्या असल काम किया वो हमें मालूम ही है।
ये 70 साल का रोना पिछले 7 साल में बहुत सुना है, 70 में इतना खराब हुआ, 70 साल की व्यवस्था है अकेले मोदी क्या करेंगे, 70 साल में देश बर्बाद हुआ, तब सोचती हूँ जो मोदी नेहरू से इतनी हसद रखते हैं कि उनकी भौंडी नकल करते हैं, जिन्हें नेहरू से बड़ा कद करने की इतनी हसरत है कि ख़ुद को बहुत से मायनों में पहला प्रधानमंत्री कहते हैं, जो अपनी हर नाकामी का ठीकरा नेहरू पर फोड़ते हैं, जिन्होंने नेहरू की कमियाँ गिनाने में ही 7 साल खर्च कर दिए, उनसे कोई पूछे कि नेहरू से तुलना ही करनी है तो बताइए कि नेहरू को कैसा भारत मिला था।
बकौल खुद संघियों के नेहरू को मिला था 1000 की ग़ुलामी से निकला भारत, 200 साल अंग्रेजों द्वारा बुरी तरह लूटा गया, भयानक अकालों से गुजऱा भारत। वो भारत तो विघटन के जख्म सहला रहा था, एकता के सूत्र ढूँढ रहा था, बना रहा था, जो इतिहास के सबसे बुरे दंगे झेलकर निकला था, साम्प्ररदायिकता और अविश्वास के चरम पर था, संविधान बन रहा था, खजाना खाली था, गरीबी और अशिक्षा फैली हुई थी। चर्चिल ने तो पहले ही संदेह जता दिया था कि इन भारतीयों के बस का कुछ नहीं, चुनौतियाँ आज से कहीं ज़्यादा थीं और कहीं बड़ी थीं, ऐसा भारत मिला था जो नेहरू के नेतृत्व में धीरे धीरे राष्ट्रनिर्माण की ओर बढ़ा, साम्प्रदायिकता पर काबू करके अंदरूनी शांति बहाल हुई, शांति में ही विकास होता है, और इंफ्रास्ट्रक्चर, विज्ञान, तकनीक, कला, फिल्म, साहित्य, खेल सबमे धीरे-धीरे विकास करते हुए राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत स्थिति में पहुँचा।
नेहरू के पास कोसने को बहुत लोग थे, रोने को बहुत कुछ था, मगर न अकेले पड़े न अकेले काम किया,।उन्होंने बढिय़ा टीम बनाई, लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण किया, आलोचनाओं का मुँह बन्द नही किया, चुनौतियों का सामना किया, न जवाबदेही से मुँह मोड़ा, न बहाने बनाए न अपनी विफलताओं का ठीकरा फोड़ा। जिसे वाकई राष्ट्र निर्माण करना होता है वो 70 साल क्या 700 साल को भी नहीं रोता। ये नेहरू की पनपाई सम्पदा ही थी जिसे बेच-बेचकर मोदी अपने लिए नया घर, सेंट्रल विस्ता और 8000 करोड़ के विमानों की।
अय्याशियाँ भोग रहे हैं। हाल ये है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर दो-दो बार बदले गए और ऐसा आदमी गवर्नर बनाया गया जो अर्थशास्त्री भी नहीं है ताकि सारा रिजर्व धन अपने और अपने मालिकों के लिए निकाला जा सके। ये जाएँगे तो देश कितना उजाड़ होगा कल्पना भी नही की जा सकती।
तो मोदीजी तो पिछले क्या आगे के कई साल भी नेहरू को कोसकर निकाल सकते हैं, अपनी जाहिलियत, अक्षमताओं, गैरजिम्मेदारी और कमजोरी का ठीकरा नेहरू पर, विपक्ष पर, जनता पर, राज्यों पर फोड़ सकते हैं। मगर जिन्हें वाकई राष्ट्र निर्माण करना होता है वो वही करते हैं, हर हाल में करते हैं, सफलता का सेहरा और विफलताओं के लिए सर नहीं ढूँढते।
मोदी के पास शुक्र है कि नेहरू हैं, नेहरू के पास कोई नेहरू नहीं था।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर आजकल अमेरिका के नेताओं, अफसरों और विदेश नीति विशेषज्ञों से गहन संवाद कर रहे हैं। यह बहुत सामयिक है, क्योंकि इस कोरोना-काल में सबका ध्यान महामारी पर लगा हुआ है और विदेश नीति हाशिए में सरक गई है। लेकिन चीन-जैसे राष्ट्र इसी मौके को अवसर की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारत के पड़ौसी राष्ट्रों और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन ने अपने पांव पसारने शुरु कर दिए हैं। पाकिस्तान के साथ चीन की इस्पाती-दोस्ती या लौह-मैत्री तो पहले से ही है। पाकिस्तान अब अफगान-संकट का लाभ उठाकर अमेरिका से भी सांठ-गांठ करना चाहता है, इसलिए उसके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने हाल ही में एक ताजा बयान भी दिया है कि पाकिस्तान किसी खेमे में शामिल नहीं होना चाहता है याने वह चीन का चप्पू नहीं है लेकिन उसकी पुरजोर कोशिश है कि अमेरिका की वापसी के बाद वह अफगानिस्तान पर अपना पूर्ण वर्चस्व कायम कर ले।
यों भी अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में पाकिस्तान की असीम दखलंदाजी है। कल ही हेलमंद घाटी में तालिबान के साथ घायल एक पाकिस्तानी फौजी अफसर की मौत हुई है। अफगानिस्तान आजाद रहे, भारत यही चाहता है। इसीलिए हमारे विदेश मंत्री की कोशिश है कि अमेरिका वहां से अपनी वापसी के लिए जल्दबाजी नहीं करे। पाकिस्तान के साथ तो चीन एकजुट है ही लेकिन अब वह श्रीलंका पर भी डोरे डालने में काफी सफल हो रहा है।
अब श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में ‘कोलंबो पोर्ट सिटी’ बन रही है, जिस पर चीन 1.4 बिलियन डॉलर खर्च करेगा। इसकी भव्यता पर 15 बिलियन डॉलर का विनियोग होगा। इसे लेकर श्रीलंकाई संसद ने एक कानून बना दिया है। कानून पर चली बहस के समय कई विपक्षी सांसदों ने कहा कि श्रीलंका की राजधानी में यह ‘चीनी अड्डा’ बनने जा रहा है। इस पूरे क्षेत्र पर अब श्रीलंका की नहीं, चीन की संप्रभुता होगी। श्रीलंका सरकार ने एक चीनी कंपनी को कोलंबो में ऊँची-ऊँची सडक़ें बनाने का भी मोटा ठेका दिया है।
चीनियों ने अभी से अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया है। उनके निर्माण-कार्य जहां-जहां चल रहे हैं, वहां-वहां उन्होंने जो नामपट लगाए हैं, वे सब सिंहल, चीनी और अंग्रेजी में हैं। उनमें से श्रीलंका की दूसरी राजभाषा तमिल को गायब कर दिया गया है, क्योंकि वह भारतीय भाषा भी है। इसे लेकर आजकल श्रीलंका में काफी विवाद चल रहा है। यों तो श्रीलंका के नेता भारत-श्रीलंका मैत्री को बेजोड़ बताते थकते नहीं हैं लेकिन भारत के अड़ोस-पड़ोस में अब चीन का वर्चस्व इतना बढ़ रहा है कि भारत के विदेश मंत्रालय को अब पहले से अधिक सजग और सक्रिय होना होगा। जयशंकर चाहें तो दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के लिए बाइडन-प्रशासन को विशेष सहायता की नई व्यावहारिक पहल भी सुझा सकते हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
सन् 1880 में तहसीलदार के रूप में ठाकुर जगमोहन सिंह ने धमतरी में अपना पदभार ग्रहण किया। ठाकुर जगमोहन सिंह को पहली बार छत्तीसगढ़ को देखने और समझने का अवसर मिला। हालांकि उस समय तक मध्यप्रदेश का ही कोई अस्तित्व नहीं था, छत्तीसगढ़ अभी भविष्य में रूपाकर ग्रहण करने वाले मध्यप्रदेश के गर्भ में ही कहीं अटका हुआ था। मध्यप्रदेश सी.पी.एंड बरार का ही एक अभिन्न हिस्सा था।
ठाकुर जगमोहन सिंह ने कभी सोचा ही नहीं था कि बनारस के क्वींस कॉलेज में पढऩे और विजयराघवगढ़ रियासत के राजकुमार होने के बाद भी उन्हें छत्तीसगढ़ में तहसीलदार के रूप में नौकरी करनी पड़ेगी। कहां विजयराघवगढ़ जैसी रियासत के राजकुमार और कहां अंग्रेजों की गुलामी वाली चाकरी। यह दिन भी उनके नसीब में शायद देखना लिखा था।
ठाकुर जगमोहन सिंह ने अपनी इस मनोव्यथा को अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘श्यामा सरोजनी’ में कुछ इस तरह से व्यक्त करने की कोशिश की है-
‘छूटी धरती धन धाम विराम कछु
यह पूरब जन्म की रेखा
सुशासक जो अब शासित हवे
जगमोहन के यह कर्म को देखा’
ठाकुर जगमोहन सिंह ने धमतरी में रहते-रहते आस-पास के ग्रामीण जनजीवन को भी निकट से देखा-परखा था। नगरी सिहावा भी धमतरी तहसील के अधीन था, सो सन् 1881 में वे दौरा करते हुए नगरी सिहावा की यात्रा पर निकल पड़े थे।
ठाकुर जगमोहन सिंह आज के प्रशासकों जैसे नहीं थे, जो किसी सुरम्य स्थल में ठहरते और रात में विलासिता के संसाधन जुटवाते।
वे एक बेहद संवेदनशील प्रशासक थे, जो मनुष्य और प्रकृति से प्रेम करना जानते थे। धन संचय और विलासिता से जिनका कोसों दूर तक कोई रिश्ता नाता ही नहीं था।
सिहावा पहुंचकर उनके भीतर विद्यमान गंभीर सर्जक और कवि जैसे जाग उठे थे। सिहावा के जंगल, पहाड़ और महानदी के अपूर्व सौंदर्य ने उन्हें सम्मोहित कर लिया था।
दो सतत् अन्वेषणशील चक्षु ने अपनी गहरी दृष्टि के साथ अन्वेषण तथा उत्खनन का कार्य प्रारंभ कर दिया था। उन चक्षुओं ने महानदी के उदगम स्थल का अवलोकन किया। महानदी के उदगम स्थल को देखकर हृदय और मेधा दोनों एक साथ सक्रिय हो उठे। वे पहाड़ों पर अवस्थित श्रृंगी ऋषि आश्रम तक जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने ढेर सारे नोट्स लिए, जिसका उपयोग उन्होंने सन् 1885 में लिखित अपनी सुदीर्घ कविता ‘प्रलय’ में किया है।
सन् 1881 के सिहावा को ठाकुर जगमोहन सिंह की आंखों से देखना हमें किंचित रोमांचित और विस्मित कर सकता है-
‘सिहावा जहां महानदी का स्रोत है एक छोटा सा ग्राम पर्वत के मूल में जिसे लोग श्रृंगी ऋषि का आश्रम कहते हैं, बसा है। यहां ऐसा घोर वन है कि सूर्यास्त के पश्चात व्याघ्र और अनेक वन्य पशु ग्राम के भीतर स्वच्छंद विचरते हैं। ग्रामवासी इनके भय से सांझ ही टट्टी लगाकर घर से बाहर नहीं निकलते।’
आज सिहावा का वह रूप नहीं रह गया है। न वनों को हम बचा पाए हैं और न ही वन्य जीवों को ही। इसके साथ ही प्रकृति के उस नयनाभिराम छवि को ही हम कहां सुरक्षित रख पाएं हैं।
सन् 1881 के आस-पास ही ठाकुर जगमोहन सिंह का स्थानांतरण धमतरी से शिवरीनारायण हो गया।शिवरीनारायण में वे लंबे समय तक रहे। शिवरीनारायण में रहते-रहते ही उन्होंने अपना सर्वोत्तम साहित्य रचा।
कहा जाता है कि शिवरीनारायण में रहते हुए उन्हें श्यामा नामक एक अपूर्व सुंदरी से प्रेम हो गया। श्यामा संभवत: एक विधवा ब्राह्मण स्त्री थी।
ठाकुर जगमोहन सिंह के हृदय में श्यामा की सुंदर छवि इस प्रकार रच बस गई थी कि उन्होंने अपनी प्रमुख कृतियों के शीर्षक श्यामा के नाम पर ही रख दिए।
यथा-
‘श्यामा सरोजनी’, ‘श्यामा स्वप्न, ‘श्यामा लता’।
शिवरीनारायण में रहते-रहते उन्होंने अपने प्रिय सखा भारतेंदु हरिश्चंद्र के भारतेंदु मंडल के तर्ज पर अपना एक मंडल बनाया जिसे उन्होंने नाम दिया ‘सज्जनाष्टक’। ठाकुर जगमोहन सिंह के इस मंडल में आठ प्रमुख कवि सम्मिलित थे जो शिवरीनारायण में ही रहते थे। यह ठाकुर जगमोहन सिंह की सोहबत का कमाल था कि वे सभी कविता लेखन की ओर प्रेरित हुए थे। शिवरीनारायण में रहते-रहते उन्होंने अनेक दुर्लभ साहित्यिक ग्रंथों का सृजन किया।
वे शिवरीनारायण में एक लोकप्रिय तथा संवेदनशील प्रशासक के रूप में जनता में लोकप्रिय हुए। सन् 1885 में शिवरीनारायण में आई हुई बाढ़ के समय उन्होंने वहां की जनता की सुरक्षा के लिए जो भी कारगर कदम उठाए, उसे उनकी सुदीर्घ कविता ‘प्रलय’ को पढ़े बिना नहीं जाना जा सकता है।
‘प्रलय’ एक ऐतिहासिक कविता है। जिसमें ठाकुर जगमोहन सिंह ने शिवरीनारायण में 21, 22, 23 जून सन 1885 में महानदी में आई हुई प्रलयंकारी बाढ़ का सजीव चित्रण किया है। इस कविता के फुटनोट में जिस तरह से महानदी का विशद वर्णन किया गया है, वह देखते ही बनता है।
‘प्रलय’ कविता में बाढ़ की विभीषिका का चित्रण करते हुए ठाकुर जगमोहन सिंह ने सार छंद में यह लिखा है-
‘प्रबल प्रलय के मेघ तीन दिन
बरसे बूंद अटूटे
छहर मूसल सी धार वारि की
जलद न ततिकौ फूटे’
शिवरीनारायण में ही उन्होंने सन 1885 में अपना प्रथम उपन्यास ‘श्यामा स्वप्न’ लिख कर पूर्ण किया। ‘श्यामा स्वप्न’ को उन्होंने ‘चार खंडों में एक कल्पना’ का नाम दिया है।
हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि केदार नाथ सिंह सहित अनेक विद्वानों का यह मत है कि कल्पना शब्द का हिंदी में पहले पहल प्रयोग ठाकुर जगमोहन सिंह ने किया है। उनसे पूर्व कल्पना शब्द का प्रयोग अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता है।
इसी तरह अंग्रेजी के प्रमुख कवि बायरन की सुप्रसिद्ध कविता ‘प्रिजनर ऑफ शिलन’ का हिंदी अनुवाद भी उन्होंने किया है। ठाकुर जगमोहन सिंह हिंदी के ऐसे पहले साहित्यकार हैं, जिन्होंने किसी अंग्रेजी कविता का हिंदी में अनुवाद किया। उनसे पूर्व तब तक हिंदी के किसी अन्य साहित्यकार ने अंग्रेजी से हिंदी में कोई अनुवाद नहीं किया था।
(शेष अगले हफ्ते)
-कनुप्रिया
जीवन रुकता नहीं, प्रलय के बाद भी नहीं, सकारात्मक होने के लिए अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत ही नहीं, वह जीवन नामक इस अपरिहार्यता में शामिल है। आप लाख नकारात्मक होकर चाहें कि साँस रुक जाए तो वह रुकती नहीं, और साँस चलती है तो जीवन की गतिविधियाँ भी चलती हैं। मरा हुआ मन भी चुप मारे पड़े नहीं रह सकता, व्यवहार जगत का निर्वाह वह भी करता रहता है।
सुबह रसोई में काम करते समय रेडियो चलता रहता है, आज विविध भारती जाने कौन से गीत सुना रहा था (फिल्मी नहीं), गीत कह रहा था हम चाहे चले जाएँ भारत बचना चाहिए। कौन सा भारत? कैसा भारत? वो कौन सा भारत है जो सब भारतजनों के शवों पर भी बचा रहेगा? क्या यही देशभक्ति है? यह क्या सिखाया जा रहा है? मैंने चैनल बदल दिया, आशा भोंसले गा रही थी ‘रात बाकी बात बाकी’, मन चाहे उदास हो उस गीत से तो यह गीत चलेगा मैंने सोचा। तभी रेडियो जॉकी ने सकारात्मकता का गान शुरू कर दिया, एक मेंटल ट्रेनर लाया गया जो कहता है अमेरिका में युद्ध के सिपाहियों के अवसादग्रस्त मन को अपने अवचेतन मन की ट्रेनिंग के जरिये ठीक किया गया। सकारात्मक सोचिये, मैं बताता हूँ वो करिए, सोचिये कि मैं स्वस्थ हूँ, मैं स्वस्थ हूँ। इस पागलपन के बाद मैंने रेडियो बन्द कर दिया। इनके लिए कोविड भी युद्ध है जहाँ कोरोना वॉरियर होते हैं सेवियर नहीं।
जीवन के अत्यंत त्रासद दिनो में मैंने पत्थर भाटे सब पूजे, Art of living से लेकर योग ध्यान के कई शिविरों के चक्कर लगाए, न शांति मिली न सवालों के जवाब। ये केंद्र आपको सिखाते हैं कि बाहर से आने वाली नकारात्मकता अपरिहार्य है आप उसे महसूस करना बंद कर दीजिये, ख़ुद को बदलिए और उससे डील कीजिये, उसे बदलने की बात मत कीजिये। कुल मिलाकर ये ज्यादातर सिस्टम के उपकरण होते हैं जो आपकी तर्क और संवेदनशक्ति कुंद करके आपको सिस्टम का अंतिम तौर पर गुलाम बनाते हैं, आपके भीतर उसके प्रति उठने वाले सवाल तक खत्म कर देते हैं। गजब ये है कि सिस्टम के लिये इस कदर अहिंसक ये केंद्र धार्मिक हिंसा और साम्प्रदायिकता पर चुप्पी मार जाते हैं।
कल एक श्रद्धांजलि देती पोस्ट पर मेरे दुख के इमोटिकॉन पर एक भक्त हँसकर चला गया। इनके लिए भले 3 लाख की जगह 5 लाख मर जाएँ, ये अपने लक्ष्य और उद्देश्य के लिए फोकस्ड हैं, वह उद्देश्य जो नागपुर में निर्धारित होता है। ये मृतकों के लिए ‘हमारी बला से भाड़ में जाओ’ की जगह एक पवित्र शब्द चुनते हैं ‘मुक्ति’, इनके लिए शववाहिनी गंगा भी पवित्र बनी रहती है।
प्रेम, ईश्वर, धर्म, मुक्ति, पवित्रता, देशभक्ति, बलिदान, सकरात्मकता, योग आदि-आदि कितने ही शब्द जो अपने निहित मानवीय उद्देश्यों के कारण खूबसूरत माने जाते हैं छल और मूर्ख बनाने के उत्तम औजार बन चुके हैं। शब्द अपने आप में अप्रशनेय नहीं होते, उद्देश्य बदलते ही उनके मायने बदल जाते हैं, असल बात उस उद्देश्य को समझने की है।
हम दु:ख, अवसाद, धक्के से जूझने वाले लोग, जो गतिशील बने रहने के लिये ख़ुद को जीवन की न रुकने वाली अनिवार्य धारा से ही सींचते हैं। ऐसे लोगों से संघर्षरत हैं जो सकारात्मकता और आस्था की आड़ में संवेदनहीन हैं। यह दोधारी लड़ाई निश्चित तौर पर कठिन है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
‘न्यूयार्क टाईम्स’ ऐसी बेसिर-पैर की खबर छाप सकता है, इसका विश्वास मुझे नहीं होता। उसमें 12 विशेषज्ञों के हवाले से यह छापा है कि भारत में पिछले साल भर में कोरोना से लगभग 42 लाख लोगों की मौत हुई है और 70 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित या बीमार हुए हैं। क्या भारत के हर दूसरे आदमी को कोरोना हुआ है? यह आंकड़ा कितना बनावटी है, इसका अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि यह सर्वेक्षण करनेवा लों में पहले समूह ने माना है कि 40 करोड़ लोग संक्रमित हुए और सिर्फ 6 लाख लोग मरे।
इसी सर्वेक्षण के दूसरे समूह ने कहा कि 53 करोड़ रोगी हुए और 16 लाख मरे। अब आप ही बताइए किसे सच मानें ? कहाँ 6 लाख और कहाँ 42 लाख ? इन डाक्टरों ने छलांग भी छोटी-मोटी नहीं लगाई। वे पूरे सात गुनी ऊँचाई पर उछल पड़े। इतनी ऊँची छलांग तो कोई भांग खाकर ही लगा सकता है। वह जान-बूझकर भी लगाई जा सकती है।
‘न्यूयार्क टाईम्स’ अमेरिका का सबसे बड़ा अखबार है। यह यहूदियों का अखबार है। उसे भारत से यह शिकायत हो सकती हैं कि उसके प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद में पहले फिलीस्तीनियों के पक्ष में तगड़ा बयान क्यों दे दिया था? उसने यह चलताऊ खबर छापकर शायद यह संदेश देने की कोशिश की है कि कोरोना-युद्ध में भारत मात खा गया है। अमेरिका उससे कहीं आगे है। लेकिन असलियत क्या है ? अमेरिका में कोरोना से छह लाख लोग मरे हैं तो भारत में कम से कम छह लाख तो मारने ही पड़ेंगे। लेकिन छह लाख भी कम हैं, क्योंकि भारत की जनसंख्या अमेरिका से 6-7 गुनी है।
इसलिए उसे 47 लाख कर दिया गया। यह ठीक है कि 3-4 लाख मौतों का सरकारी आंकड़ा एक दम तथ्यात्मक नहीं हो सकता है, क्योंकि गांवों में कौन कोरोना से मरा है और कौन नहीं, इसका पता करना आसान नहीं है लेकिन भारत को नीचा दिखाने के लिए आप कुछ भी ऊटपटांग सर्वेक्षण हमें परोस दें और हम उसे चुपचाप मान लें, यह कैसे हो सकता है ? यह सर्वेक्षण पेश करने वाले 12 डॉक्टरों को क्या यह पता नहीं है कि एलोपेथी पर अरबों-खरबों रुपया खर्च करके भी अमेरिका इतना पिट लिया जबकि भारत अपने घरेलू मसालों, काढ़ों, आयुर्वेदिक, हकीमी और होम्योपेथी दवाइयों के दम पर कोरोनों से लड़ रहा है।
पिछले साल यदि भारत की सभी सरकारें और जनता लापरवाही नहीं करतीं तो भारत में हताहतों का प्रतिशत नहीं के बराबर ही रहता। भारत ने लगभग 100 देशों को 6 करोड़ टीके दिए हैं और एलोपेथी-चिकित्सा करने में हमारे डाक्टरों और नर्सों ने जबर्दस्त सेवा और कुबार्नियां की हैं लेकिन गैर-सरकारी अस्पतालों ने जो लूट-पाट मचाई है, क्या वैसी लूटपाट भारतीय वैद्यों, हकीमों और होम्योपेथों ने मचाई है ? यदि भारत में अमेरिका-जैसी स्वास्थ्य-सेवाएं होतीं तो कोरोना से हताहतों की संख्या यहाँ सैकड़ों या हजारों तक ही सीमित रहतीं।
इसमें शक नहीं कि इस महामारी ने पूरे भारत को प्रकंपित कर दिया है और हमारी सरकारों और नेताओं की छवि को विकृत भी कर दिया है लेकिन यह भी न भूलें कि लगभग 20 करोड़ लोगों को टीके लग चुके हैं और ज्यादातर राज्यों की स्थिति में काफी सुधार है। केंद्र और राज्यों की सरकारें तथा अगणित जनसेवी संगठन गजब की सेवा और मुस्तैदी दिखा रहे हैं। अमेरिका सहित दर्जनों राष्ट्र भी भारत की यथासंभव सहायता करने में जुटे हुए हैं। भारत इससे जल्दी ही पार पाएगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
सन् 1880 में तहसीलदार के रूप में ठाकुर जगमोहन सिंह ने धमतरी में अपना पदभार ग्रहण किया। ठाकुर जगमोहन सिंह को पहली बार छत्तीसगढ़ को देखने और समझने का अवसर मिला। हालांकि उस समय तक मध्यप्रदेश का ही कोई अस्तित्व नहीं था, छत्तीसगढ़ अभी भविष्य में रूपाकर ग्रहण करने वाले मध्यप्रदेश के गर्भ में ही कहीं अटका हुआ था। मध्यप्रदेश सी.पी.एंड बरार का ही एक अभिन्न हिस्सा था।
ठाकुर जगमोहन सिंह ने कभी सोचा ही नहीं था कि बनारस के च्ींस कॉलेज में पढऩे और विजयराघवगढ़ रियासत के राजकुमार होने के बाद भी उन्हें छत्तीसगढ़ में तहसीलदार के रूप में नौकरी करनी पड़ेगी। कहां विजयराघवगढ़ जैसी रियासत के राजकुमार और कहां अंग्रेजों की गुलामी वाली चाकरी। यह दिन भी उनके नसीब में शायद देखना लिखा था।
ठाकुर जगमोहन सिंह ने अपनी इस मनोव्यथा को अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘श्यामा सरोजनी’ में कुछ इस तरह से व्यक्त करने की कोशिश की है-
‘छूटी धरती धन धाम विराम कछु
यह पूरब जन्म की रेखा
सुशासक जो अब शासित हवे
जगमोहन के यह कर्म को देखा’
ठाकुर जगमोहन सिंह ने धमतरी में रहते-रहते आस-पास के ग्रामीण जनजीवन को भी निकट से देखा-परखा था। नगरी सिहावा भी धमतरी तहसील के अधीन था, सो सन 1881 में वे दौरा करते हुए नगरी सिहावा की यात्रा पर निकल पड़े थे।
ठाकुर जगमोहन सिंह आज के प्रशासकों जैसे नहीं थे, जो किसी सुरम्य स्थल में ठहरते और रात में विलासिता के संसाधन जुटवाते।
वे एक बेहद संवेदनशील प्रशासक थे, जो मनुष्य और प्रकृति से प्रेम करना जानते थे। धन संचय और विलासिता से जिनका कोसों दूर तक कोई रिश्ता नाता ही नहीं था।
सिहावा पहुंचकर उनके भीतर विद्यमान गंभीर सर्जक और कवि जैसे जाग उठे थे। सिहावा के जंगल, पहाड़ और महानदी के अपूर्व सौंदर्य ने उन्हें सम्मोहित कर लिया था।
दो सतत् अन्वेषणशील चक्षु ने अपनी गहरी दृष्टि के साथ अन्वेषण तथा उत्खनन का कार्य प्रारंभ कर दिया था। उन चक्षुओं ने महानदी के उदगम स्थल का अवलोकन किया। महानदी के उदगम स्थल को देखकर हृदय और मेधा दोनों एक साथ सक्रिय हो उठे। वे पहाड़ों पर अवस्थित श्रृंगी ऋषि आश्रम तक जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने ढेर सारे नोट्स लिए, जिसका उपयोग उन्होंने सन् 1885 में लिखित अपनी सुदीर्घ कविता ‘प्रलय’ में किया है।
सन् 1881 के सिहावा को ठाकुर जगमोहन सिंह की आंखों से देखना हमें किंचित रोमांचित और विस्मित कर सकता है-
‘सिहावा जहां महानदी का स्रोत है एक छोटा सा ग्राम पर्वत के मूल में जिसे लोग श्रृंगी ऋषि का आश्रम कहते हैं, बसा है। यहां ऐसा घोर वन है कि सूर्यास्त के पश्चात व्याघ्र और अनेक वन्य पशु ग्राम के भीतर स्वच्छंद विचरते हैं। ग्रामवासी इनके भय से सांझ ही टट्टी लगाकर घर से बाहर नहीं निकलते।’
आज सिहावा का वह रूप नहीं रह गया है। न वनों को हम बचा पाए हैं और न ही वन्य जीवों को ही। इसके साथ ही प्रकृति के उस नयनाभिराम छवि को ही हम कहां सुरक्षित रख पाएं हैं।
सन् 1881 के आस-पास ही ठाकुर जगमोहन सिंह का स्थानांतरण धमतरी से शिवरीनारायण हो गया।शिवरीनारायण में वे लंबे समय तक रहे। शिवरीनारायण में रहते-रहते ही उन्होंने अपना सर्वोत्तम साहित्य रचा।
कहा जाता है कि शिवरीनारायण में रहते हुए उन्हें श्यामा नामक एक अपूर्व सुंदरी से प्रेम हो गया। श्यामा संभवत: एक विधवा ब्राह्मण स्त्री थी।
ठाकुर जगमोहन सिंह के हृदय में श्यामा की सुंदर छवि इस प्रकार रच बस गई थी कि उन्होंने अपनी प्रमुख कृतियों के शीर्षक श्यामा के नाम पर ही रख दिए।
यथा-
‘श्यामा सरोजनी’, ‘श्यामा स्वप्न, ‘श्यामा लता’।
शिवरीनारायण में रहते-रहते उन्होंने अपने प्रिय सखा भारतेंदु हरिश्चंद्र के भारतेंदु मंडल के तर्ज पर अपना एक मंडल बनाया जिसे उन्होंने नाम दिया ‘सज्जनाष्टक’। ठाकुर जगमोहन सिंह के इस मंडल में आठ प्रमुख कवि सम्मिलित थे जो शिवरीनारायण में ही रहते थे। यह ठाकुर जगमोहन सिंह की सोहबत का कमाल था कि वे सभी कविता लेखन की ओर प्रेरित हुए थे। शिवरीनारायण में रहते-रहते उन्होंने अनेक दुर्लभ साहित्यिक ग्रंथों का सृजन किया।
वे शिवरीनारायण में एक लोकप्रिय तथा संवेदनशील प्रशासक के रूप में जनता में लोकप्रिय हुए। सन् 1885 में शिवरीनारायण में आई हुई बाढ़ के समय उन्होंने वहां की जनता की सुरक्षा के लिए जो भी कारगर कदम उठाए, उसे उनकी सुदीर्घ कविता ‘प्रलय’ को पढ़े बिना नहीं जाना जा सकता है।
‘प्रलय’ एक ऐतिहासिक कविता है। जिसमें ठाकुर जगमोहन सिंह ने शिवरीनारायण में 21, 22, 23 जून सन 1885 में महानदी में आई हुई प्रलयंकारी बाढ़ का सजीव चित्रण किया है। इस कविता के फुटनोट में जिस तरह से महानदी का विशद वर्णन किया गया है, वह देखते ही बनता है।
‘प्रलय’ कविता में बाढ़ की विभीषिका का चित्रण करते हुए ठाकुर जगमोहन सिंह ने सार छंद में यह लिखा है-
‘प्रबल प्रलय के मेघ तीन दिन
बरसे बूंद अटूटे
छहर मूसल सी धार वारि की
जलद न ततिकौ फूटे’
शिवरीनारायण में ही उन्होंने सन 1885 में अपना प्रथम उपन्यास ‘श्यामा स्वप्न’ लिख कर पूर्ण किया। ‘श्यामा स्वप्न’ को उन्होंने ‘चार खंडों में एक कल्पना’ का नाम दिया है।
हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि केदार नाथ सिंह सहित अनेक विद्वानों का यह मत है कि कल्पना शब्द का हिंदी में पहले पहल प्रयोग ठाकुर जगमोहन सिंह ने किया है। उनसे पूर्व कल्पना शब्द का प्रयोग अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता है।
इसी तरह अंग्रेजी के प्रमुख कवि बायरन की सुप्रसिद्ध कविता ‘प्रिजनर ऑफ शिलन’ का हिंदी अनुवाद भी उन्होंने किया है। ठाकुर जगमोहन सिंह हिंदी के ऐसे पहले साहित्यकार हैं, जिन्होंने किसी अंग्रेजी कविता का हिंदी में अनुवाद किया। उनसे पूर्व तब तक हिंदी के किसी अन्य साहित्यकार ने अंग्रेजी से हिंदी में कोई अनुवाद नहीं किया था।
(शेष अगले हफ्ते)
-आनंद बहादुर
रामदेव महाशय ने एलोपैथिक चिकित्सा के बारे में जो वक्तव्य दिया है उस पर विचार किया जाना जरूरी है, क्योंकि उन्होंने बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं जिनसे एलोपैथिक पद्धति का तथा उस पद्धति से इलाज करने-कराने वाले लोगों का बहुत अपमान हुआ है। उनके समर्पण और शहादत की खिल्ली उड़ी है और उनका हौसला और साहस टूटा है।
हम सब जानते हैं कि किस तरह अभी साल डेढ़ साल पहले कोरोना आया, और एकदम से, बिल्कुल एक काली आंधी की तरह पूरे विश्व पर छा गया। उससे पहले वायरस के इस म्यूटेंट रूप की कहीं कोई पहचान नहीं थी। पूरे विश्व में लाखों लोग रोज कोरोना से कॉल कवलित होने लगे। सिर्फ एलोपैथी ही नहीं, लोग हर प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों की शरण में गए, और विश्वास तथा अंधविश्वास से भरे हुए बहुत सारे तरीकों से इसका सामना करने की कोशिश की। इनमें से कुछ तो इतने हास्यास्पद हैं कि उनका उल्लेख तक करना उचित नहीं महसूस हो रहा है। दुनिया की सारी चिकित्सा पद्धतियां इसका इलाज करने का तरीका ढूंढने लगीं, जिसमें, जैसा तय ही था, बहुत जल्द एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में बढ़त हासिल कर ली। अन्य पद्धतियां अनुमानों और अटकलों के आधार पर आगे बढ़ीं। उन्होंने दावे तो बहुत किए लेकिन उनकी सफलता का कोई प्रमाणिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। कुछ ने तो बहुत सारी पुरानी पुरानी चीजों को खोजकर सामने रखना शुरू कर दिया, लेकिन उनसे दुनिया का दुख दर्द कम नहीं हुआ, न मरीजों में कोई विश्वास ही पैदा हुआ।
उधर एलोपैथी ने बिल्कुल वैज्ञानिक सोच और चिकित्सकीय तार्किकता के आधार पर अपना अनुसंधान शुरू किया और बहुत तेज गति से अपने रास्ते पर आगे बढ़ी। आज दुनिया में एलोपैथी पर लोगों को सबसे अधिक विश्वास है तो इसका कारण है कि यह बिल्कुल वैज्ञानिक आधार पर खड़ी चिकित्सा पद्धति है और उसकी चंगा करने की क्षमता अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियों से निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ है। जो लोग इसकी आलोचना करते रहते हैं, जब जान पर बन आती है तो वे भी एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के शरण में ही जाते हैं।
जब कोरोना आया तो अन्य चिकित्सा पद्धतियों की ही तरह एलोपैथी के पास भी इसका कोई जवाब नहीं था। लेकिन अपने हजारों सालों के संचित ज्ञान और अनुभव के आधार पर उसने उससे जूझने की कोशिश शुरू की। इसी बीच, जब हम कोरोनावायरस के बारे में अनभिज्ञ के होने के कारण बिल्कुल भंवर में थे, उसने उपलब्ध एंटीवायरल दवाओं और वायरस संबंधि अपने अनुभव तथा ज्ञान के आधार पर व्यावहारिक निष्कर्ष निकालते हुए कोरोना के मरीजों को ठीक करने की कोशिश की। लाखों की संख्या में एलोपैथिक अस्पतालों में उनकी सही देखभाल, सही पद्धति से ऑक्सीजन देने की कोशिश, उनके फेफड़े, हृदय, गुर्दे इत्यादि के संक्रमणों की जांच, सही नर्सिंग और उपलब्ध दवाओं की मदद से करोड़ों लोगों को निश्चित मौत से बचाया। क्योंकि वायरस बिल्कुल अज्ञात और नया था, इसलिए एलोपैथी के पास उस वायरस का कोई ज्ञात और ठोस इलाज नहीं था। लेकिन मरीजों को बरतने का उसका एक तरीका है, वायरस को फैलने से रोकने का जो एक ज्ञान उसके पास है, उसका इस्तेमाल उसने किया। उसने सबसे पहले वायरस की प्रकृति को डिकोड किया और बताया कि जब तक उसका इलाज नहीं निकल आता, तब तक किस तरह मास्क लगाकर,
फिजिकल डिस्टेंसिंग अपना कर, और हाथ को साफ रखकर, उससे बचा जा सकता है। आज हमारे पास इस बारे में जो भी जानकारी है, जिसकी सहायता से ज्यादातर लोग अपने आप को सुरक्षित रखने में कामयाब हुए हैं, वह ज्ञान भी एलोपैथी की ही देन है, किसी अन्य चिकित्सा पद्धति ने यह समझदारी हमें नहीं दी है। इस समझदारी को रामदेव महाशय हमारे लिए लेकर नहीं आए हैं।
इसी बीच, इतने सब को अंजाम देते हुए, एलोपैथी ने इस वायरस से लोगों को बचाने के लिए वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया शुरू की, और मानव इतिहास में जितनी तेजी से किसी एक वायरस की वैक्सीन कभी नहीं बनी थी, एक नहीं, दर्जनों वैक्सीन तैयार कर दुनियाभर को सौंप दिया। आज कोरोना के दंश से घायल, हताश-निराश मानवता के मुंह पर जो हल्की सी आशा की मुस्कान हम-आप देख रहे हैं, वह वैक्सीन और कोरोना की दवाओं की खबरों की बदौलत ही है, जो हम तक लगातार पहुंच रही हैं, और हमारा हौसला बढ़ा रही हैं। अभी हम उस सटीक दवाओं को हासिल नहीं कर पाए हैं जिनको लेते ही हमको रोना से मुक्त हो जाएं, लेकिन एलोपैथिक रिसर्च सतत् उस दिशा में आगे बढ़ रहा है और वह दिन अब ज्यादा दूर भी नहीं है। तब तक के लिए, जानकारी के अभाव में भी एलोपैथी ने बहुत संभलकर और समझदारी के साथ, वायरस के ट्रीटमेंट की एक सटीक तलाश शुरू की है, यह उसी का नतीजा है कि आज विश्व में प्रतिदिन दसियों लाख लोग कोरोनावायरस पीडि़त हो रहे हैं लेकिन मृत्यु दर कुछ प्रतिशत ही है। चूंकि करोड़ों लोग बीमार हो रहे हैं, तो दो चार प्रतिशत की मृत्यु दर भी कई लाख की संख्या हो जाती है। इसी को आधार बनाकर रामदेव महाशय ने ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया है। खुद उनके पास इसका कोई साक्ष्य नहीं है कि जो लोग आयुर्वेद सहित अन्य चिकित्सा की शरण में जा रहे हैं, उनमें कितने प्रतिशत ठीक हो रहे हैं। इसके अलावा कोई प्रणाम नहीं है कि जो लोग आयुर्वेद और अन्य चिकित्सा ले रहे हैं, उदाहरण के लिए जो लोग कोरोनिल ले रहे हैं, या गोबर-गौमूत्र चिकित्सा करवा रहे हैं, वे जरूरत पड़ते ही या साथ ही साथ एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति का सहारा नहीं ले रहे। वे क्रोसिन नहीं खा रहे हैं, वैक्सीन नहीं ले रहे हैं, रेमडेसिवीर नहीं ले रहे हैं। उनका अपना दावा केवल विज्ञापनबाजी और मनगढ़ंत लफ्फाजी पर आधारित है।
इसी बीच हमने देखा है कि कैसे एलोपैथिक मेडिकल स्टाफ, सीमा पर लड़ते सैनिकों की तरह कोरोना से युद्ध में अपना सब कुछ होम कर रहे हैं। वे लाखों अनजाने लोगों को बचाने में अपनी जान तक से खेल जा रहे हैं। उन्हें एहसास हौसला और भरोसा कहां से मिलता है? अपनी चिकित्सा पद्धति के प्रति उनका गहरा विश्वास ही उन्हें यह अदम्य साहस और हौसला दे रहा है। आज रामदेव महाशय के बयान ने उस साहस और हौसले को तोडऩे का प्रयास किया है। आज अगर रामदेव महाशय की बातों को मानकर तमाम एलोपैथिक मेडिकल स्टॉफ हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएं, तो सोचिए दुनिया भर के मरीजों की क्या दशा होगी? और इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? रामदेव महाशय के दम्भ से भरे बयान ने उन सभी शहीद डॉक्टरों, नर्सों, और मेडिकल स्टाफ का ऐसा अपमान किया है जिसे भुलाना मानवता के इतिहास में असंभव होगा।
रामदेव महाशय शायद यह नहीं जानते हैं कि सामान्य लोगों से अलग, उनके जैसे प्रसिद्ध लोग दोहरा जीवन जीते हैं। एक जीवन अपने वर्तमान में और एक और जीवन इतिहास में। वर्तमान में तो अपने ताकतवर मित्रों की सहायता से वे जो चाहे कर लेते हैं, मगर इतिहास उनका हिसाब किताब बराबर कर के रख देता है। उस समय वे ताकतवर दोस्त काम नहीं आते। उस समय अरबों खरबों की वह तिकड़म से कमाई दौलत काम नहीं आती।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
व्हाट्सएप और हमारी सरकार के बीच बड़ा मजेदार और अजीब-सा दंगल चल रहा है। इसी साल फरवरी में बहस चली थी कि व्हाट्सएप और फेसबुक जैसी संस्थाएँ नागरिकों की निजता पर हमला करती हैं। सरकार को उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और व्हाट्सएप ने अब दिल्ली के उच्च न्यायालय में जाकर गुहार लगाई है कि भारत सरकार नागरिकों की निजता भंग करना चाहती है। उस पर रोक लगाई जाए। हमारी सरकार और इन संचार-कंपनियों के अपने अपने तर्क हैं। दोनों कुछ हद तक ठीक लगते हैं और कुछ हद तक गलत !
सरकार का कहना है कि वह जो नया कानून ला रही है, उसके मुताबिक व्हाट्सएप को ऐसे संदेशों का मूल-स्त्रोत खोजकर बताना होगा, जो आपत्तिजनक हैं। आपत्तिजनक वे संदेश माने जाएंगे, जो भारत की सुरक्षा, शांति-व्यवस्था, कानून आदि के लिए खतरनाक हों। आजकल भारत में लगभग 45 करोड़ लोग व्हाट्साप आदि का इस्तेमाल करते हैं। इस पर आने-जानेवाले संदेशों के बारे में पूर्ण गोपनीयता का वादा किया जाता है। इस सुविधा का फायदा उठाकर आतंकवादी, चोर, विदेशी दलाल, जासूस, अपराधी, अफवाहबाज़ और नादान भोले-भंडारी लोग भी ऐसी खबरें, विचार, संदेश, दृश्य आदि भेजते रहते हैं, जिन पर प्रतिबंध न केवल तत्काल आवश्यक होता है बल्कि ऐसे लोगों को तुरंत दंडित भी किया जाना चाहिए। यह तभी हो सकता है, जबकि व्हाट्साप उसकी पटरी पर चल रहे सारे संवादों को सुरक्षित रखे और शिकायत मिलने पर उनकी जाँच करे और सरकार को उनके नाम-पते बताए।
व्हाट्सएप का कहना है कि ऐसा करने से उसका गोपनीय रहने का महत्व खंड-बंड हो जाएगा। दुनिया के करोड़ों लोग फिर उसका इस्तेमाल क्यों करेंगे ? उसका मानना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है। ऐसा हो जाने पर लोग अपने मन की बात खुलकर कभी करेंगे ही नहीं। वे पकड़े जाने के डर से चुप रहेंगे या झूठ बोलेंगे। व्हाट्सएप के इस तर्क में थोड़ा दम जरुर है, क्योंकि दुनिया के ज्यादातर लोग दब्बू हैं। वे अपने विचार प्रकट भी करना चाहते हैं और अपनी खाल भी बचाना चाहते हैं लेकिन मेरा सोच यह है कि सांच को आंच क्या ? किसी भी बात को छिपाना क्यों ? सरकार हमारे जिस भी संवाद को पढऩा चाहे, पढ़े। वह कोई भी गलत कदम उठाएगी तो कानून है, लोकमत है, संसद है, अखबार और चैनल हैं, जो नागरिकों की रक्षा करेंगे। हाँ, व्हाट्साप जैसे सभी संगठन यह मांग रखें तो वह जायज होगी कि यदि सरकार किसी के भी संदेश या बातचीत का सुराग लगाना चाहे तो वह काम मनमाना और निराधार नहीं होना चाहिए। उसके लिए बाकायदा एक उच्च-स्तरीय कमेटी होनी चाहिए और उसका सगुण व ठोस आधार होना चाहिए। ताकि अभिव्यक्ति और उसके साथ-साथ निजता की स्वतंत्रता की रक्षा तो अवश्य हो लेकिन षडय़ंत्र और मूर्खता का पर्दाफाश भी हो जाए।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-जेके कर
भारत में कोविड-19 के संबंध में हाल ही में न्यूयार्क टाइम्स में आंकड़ों का जो तीन अनुमान लगाया गया है उसके अनुसार सबसे बुरी हालत में भारत में 700.7 मिलियन याने करीब 70 करोड़ लोग संक्रमित हुये हैं तथा 42 लाख की मौत हुई है. बतौर न्यूयार्क टाइम्स यदि 70 करोड़ लोग संक्रमित हुये हैं तो इसमें उन करीब 20 करोड़ लोगों को जोड़ लीजिये जिन्हें वैक्सीन लग चुका है. यदि वैक्सीन का 1 डोज़ भी लग जाता है तो एक बार कोरोना से संक्रमित होने के बराबर का एंटीबॉडी बन जाता है. इस तरह से दोनों को मिलाकर करीब 90 करोड़ लोगों में हर्ड इम्युनिटी आ जानी चाहिये. भारत की जनसंख्या को यदि 135 करोड़ मान लिया जाता है तो यह उसका 66.66 फीसदी होता है. इस तरह से भारत में हर्ड इम्युनिटी आ गई है यह माना जाना चाहिये या हम उसके काफी निकट पहुंच चुके हैं. ज्यादा-से-ज्यादा इन्हीं 20 करोड़ या 10-15 करोड़ और लोगों को दोनों टीका लगा देना चाहिये. फिर तो और ज्यादा वैक्सीनेशन की जरूरत ही नहीं है. यह आंकड़ा हज़म करने लायक नहीं है.


25 मई'2021 को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित अखबार माने जाने वाले न्यूयार्क टाइम्स में 'Just How Big Could India’s True Covid Toll Be?' के शीर्षक से एक लेख/खबर प्रकाशित हुई है. जिसके बाद से प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया में इसको लेकर लगातार खबरें आ रहीं हैं. हमने तटस्थ रूप से इन आंकड़ों का अध्ययन किया है. हालांकि, मामला इतना संवेदनशील है कि हम भी किसी नतीजे की घोषणा करने से परहेज कर रहें हैं लेकिन आपके सामने इन आंकड़ों की गहराई में जाकर उन्हें प्रस्तुत कर रहें हैं.
न्यूयार्क टाइम्स में भारत में कोरोना संक्रमण तथा उससे हुई मौतों पर चार तरह के आंकड़ें दिये गये हैं. पहला आंकड़ां सरकारी है. जिसके अनुसार भारत में उस तारीख तक 2 करोड़ 69 लाख संक्रमण तथा 3 लाख 07 हज़ार 231 मौतों की बात की गई है.
दूसरा 'एक रूढ़िवादी परिदृश्य' है. जिसके अनुसार 40 करोड़ 42 लाख संक्रमण एवं 6 लाख मौतें हुई हैं. इसी तारीख को केन्द्र सरकार द्वारा जारी विज्ञप्त्ति के अनुसार 20 करोड़ 04 लाख 94 हज़ार 991 (मोटे तौर पर 20 करोड़) टीके लग चुके हैं. यह आंकड़ा एक तथा दोनों टीके लग जाने का है. अब यदि इन दोनों को जोड़ा जाये तो 60 करोड़ 42 लाख लोगों में कोरोना के प्रति प्रतिरोध विकसित हो जानी चाहिये. यह भारत की आबादी का 44.75 फीसदी होता है. इस तरह से और 26 करोड़ लोगों को टीका लगाये जाने की जरूरत है.
तीसरा, 'एक अधिक संभावित परिदृश्य' है. जिसके अनुसार भारत में 53 करोड़ 90 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं तथा 16 लाख लोगों की मौत हो चुकी है. अब संक्रमण के इस आंकड़ें को टीकाकरण के आंकड़ों से जोड़ देते हैं तो यह 73 करोड़ 90 लाख का हो जाता है जो हमारी आबादी का 54.74 फीसदी है. इसके अनुसार हर्ड इम्युनिटी के लिये और 16 करोड़ लोगों का टीकाकरण करने की जरूरत है. चौथा, 'एक बदतर परिदृश्य' है जिसकी चर्चा हमने सबसे पहले की है.
न्यूयार्क टाइम्स ने यह खबर दर्जनभर विशेषज्ञों तथा बड़े स्तर पर किये गये एँटीबॉडी टेस्टके आधार पर किया है. वहीं इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि "On Friday, a report by the World Health Organization estimated that the global death toll of Covid-19 may be two or three times higher than reported." हम इससे सहमत है कि कोरोना से हुई मौंतों का सही आंकड़ा पेश नहीं किया जा रहा है या ऐसा नहीं हो पा रहा है. हमने अपने अध्धयन में मौतों नहीं न्यूयार्क टाइम्स में छपे संक्रमण के आंकड़ों को लिया है तथा उसके आधार पर अपनी प्रस्तुति दे रहें हैं. (nytimes.com)
-कृष्ण कांत
दिल्ली में कई जगहों पर पोस्टर लगाए गए। इन पर लिखा था, ‘मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया।’ पोस्टर लगाकर ये सवाल पूछने के ‘जघन्य अपराध’ में दिल्ली पुलिस ने पूरी दिल्ली में अब तक 25 एफआईआर दर्ज कर चुकी है। इस सिलसिले में अब तक 25 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
अमर उजाला ने लिखा है कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि इस मामले में अभी और एफआईआर दर्ज की जाएंगी। पुलिस जांच कर रही है कि किसके कहने पर ये पोस्टर शहर भर में लगाए गए और आगे कार्रवाई की जाएगी। अदभुत ये है कि कल से आज तक जो खबरें हैं, वे बताती हैं कि लगातारी एफआईआर और गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ रही है।
उत्तरी दिल्ली में एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया जिसने बताया कि ये पोस्टर लगाने के लिए उसे पांच सौ रुपये दिए गए थे। अब आप सोचिए कि पांच सौ रुपये पर पोस्टर लगाने वाले मजदूर तक की जवाबदेही है, लेकिन पूरे देश में हुए भयानक नरसंहार के लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों समेत किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं है। इस पोस्टर में ऐसा है कि जिसे लेकर इतनी बड़ी कार्रवाई की जा रही है। यही सवाल अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी पूछ रही है। यही सवाल कई विपक्षी नेता पूछ रहे हैं। फिर यही सवाल पूछने वाले नागरिक दोषी कैसे हो गए?
कुछ समय पहले तक हम लोग कहते थे कि दिल्ली पुलिस सबसे स्मार्ट, सबसे कुशल और सबसे अच्छी पुलिस है। दुर्भाग्य से अब इस एजेंसी को अपने ही निर्दोष नागरिकों को प्रताडि़त करने और सरकारी बदला लेने जैसे दुष्कृत्य के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
ये सिर्फ तानाशाही नहीं है, ये घनघोर अत्याचार है। लोगों को गिरफ्तार करने से ये सच्चाई नहीं बदल जाएगी कि देश में जो हुआ है वह पूर्वनियोजित जनसंहार है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
किसान आंदोलन को चलते-चलते आज छह महिने पूरे हो गए हैं। ऐसा लगता था कि शाहीन बाग आंदोलन की तरह यह भी कोरोना के रेले में बह जाएगा लेकिन पंजाब, हरयाणा और पश्चिम उत्तरप्रदेश के किसानों का हौसला है कि अब तक वे अपनी टेक पर टिके हुए हैं। उन्होंने आंदोलन के छह महिने पूरे होने पर विरोध-दिवस आयोजित किया है। अभी तक जो खबरें आई हैं, उनसे ऐसा लगता है कि यह आंदोलन सिर्फ ढाई प्रांतों में सिकुडक़र रह गया है। पंजाब, हरयाणा और आधा उत्तरप्रदेश। इन प्रदेशों के भी सारे किसानों में भी यह फैल पाया है नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता। यह आंदोलन तो चौधरी चरणसिंह के प्रदर्शन के मुकाबले भी फीका ही रहा है। उनके आहवान पर दिल्ली में लाखों किसान इंडिया गेट पर जमा हो गए थे।
दूसरे शब्दों में शक पैदा होता है कि यह आंदोलन सिर्फ खाते-पीते या मालदार किसानों तक ही तो सीमित नहीं है ? यह आंदोलन जिन तीन नए कृषि-कानूनों का विरोध कर रहा है, यदि देश के सारे किसान उसके साथ होते तो अभी तक सरकार घुटने टेक चुकी होती लेकिन सरकार ने काफी संयम से काम लिया है। उसने किसान-नेताओं से कई बार खुलकर बात की है। अब भी उसने बातचीत के दरवाजे बंद नहीं किए हैं। किसान नेताओं को अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने का पूरा अधिकार है लेकिन आज उन्होंने जिस तरह से भी छोटे-मोटे विरोध-प्रदर्शन किए हैं, उनमें कोरोना की सख्तियों का पूरा उल्लंघन हुआ है। सैकड़ों लोगों ने न तो शारीरिक दूरी रखी और न ही मुखपट्टी लगाई। पिछले कई हफ्तों से वे गांवों और कस्बों के रास्तों पर भी कब्जा किए हुए हैं।
इसीलिए आम जनता की सहानुभूति भी उनके साथ घटती जा रही है। हमारे विरोधी नेताओं को भी इस किसान विरोध-दिवस ने बेनकाब कर दिया है। वे कुंभ-मेले और प. बंगाल के चुनावों के लिए भाजपा को कोस रहे थे, अब वही काम वे भी कर रहे हैं। उन्हें तो किसान नेताओं को पटाना है, उसकी कीमत चाहे जो भी हो। कई प्रदर्शनकारी किसान पहले भयंकर ठंड में अपने प्राण गवां चुके हैं और अब गर्मी में कई लोग बेमौत मरेंगे। किसानों को उकसाने वाले हमारे नेताओं को किसानों की जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं है। सरकार का पूरा ध्यान कोरोना-युद्ध में लगा हुआ है लेकिन उसका यह कर्तव्य है कि वह किसान-नेताओं की बात भी ध्यान से सुने और जल्दी सुने। देश के किसानों ने इस वर्ष अपूर्व उपज पैदा की है, जबकि शेष सारे उद्योग-धंधे ठप्प पड़े हुए हैं। सरकार और किसान नेताओं के बीच संवाद फिर से शुरु करने का यह सही वक्त अभी ही है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-मनोहर नोतानी
भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को लेकर तरह-तरह के मनगढंत किस्से-कहानियां प्रचलित हैं और इतिहास को पीठ दिखाने की राजनीति के इस दौर में ये कहानियां और भी चटखारे लेकर सुनी-कही जा रही हैं। ऐसे में भारतीय पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और लंबे समय तक पं. नेहरू के सुरक्षा प्रमुख रहे केएफ रुस्तमजी की किताब ‘’आइ वॉज़ नेहरू'स शैडो’’ उन्हें ज्यादा मानवीय, विद्वान और वैश्विक राजनेता की तरह स्थापित करती है। प्रस्तुत है, किताब के अनुवादक मनोहर नोतानी द्वारा की गई उसकी समीक्षा।
पुस्तक आइ वॉज़ नेहरू'स शैडो’के लेखक स्वर्गीय केएफ रुस्तमजी स्वतंत्र भारत की आइपीएस की पूर्ववर्ती ब्रिटिशकालीन सेवा आइपी (इंडियन पुलिस) के एक अफसर थे। इस किताब का हिन्दी अनुवाद ‘मैं नेहरू का साया था’शीर्षक से मैंने किया है। यह किताब एक तरह से छह साल तक नेहरू के चश्मदीद गवाह रहे रुस्तमजी की रोचक 'आंखों देखी दास्तान' है।
केएफ रुस्तमजी एक लिक्खाड़ व्यक्ति थे। अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए वे नियमित रूप से लिखा करते थे। अपने लेखों में वे पुलिस-प्रशासन और कानून-व्यवस्था, समाज व राजनीति में व्याप्त बुराइयों को बड़े बेबाक ढंग से व्यक्त करते थे। ‘पद्म विभूषण' उन्हें मुख्यत: उनके द्वारा किये गये अनेक भंडाफोड़ों के लिए मिला था।
‘नेहरू की प्रतिष्ठा शायद उनके उत्तराधिकारियों के लिए निरंतर एक बाधा बनी रह सकती है और वे नेहरू को नीचा दिखाने के तरीके और तदबीरें खोजते रहेंगे।’ये शब्द लिखते समय केएफ रुस्तमजी गोया एक नजूमी लगते हैं। उन्होंने लिखा है, जिस तरह से मैंने नेहरू को जाना, उस तरह से बहुत कम लोगों ने उन्हें जाना है; और बहुत कम लोग उन्हें कभी इस तरह जान पाएंगे।
इस पुस्तक में रुस्तमजी द्वारा खींची गयी नेहरू की तस्वीर एकदम अलहदा है। रोज़ाना की छोटी-से-छोटी बात भी उनकी चौकस नज़र से बच नहीं पायी है। तिस पर हर चीज़, हर बात को दिलचस्प अंदाज़ में प्रामाणिक तरीके से दर्ज कर पाने के उनके रसभरे अंदाज़ के चलते नेहरू की विचित्रता और उनकी ख़ब्त की दिलचस्प झलकियां हमें मिलती हैं।
रुस्तमजी के लेखन का सबसे सशक्त पहलू उनके इन शब्दों में बयां होता है मैंने किसी को खुश करने की ख़ातिर नहीं लिखा है, मैंने छपास या प्रसिद्धि के लिए भी नहीं लिखा। मुझे यह सब लिखने में आनंद आया और मैं इसके लेखक होने का गर्व छिपा नहीं सकता। मेरी इच्छा है कि मेरी डायरियों को कोई संपादित करे और अब से बरसों बाद, लोग जब इन्हें पढ़ें तो कुछ पलों के लिए ही सही, वे उस वक्त को महसूस करें जिसमें मैं जिया हूं, उन लोगों की सांसें सुनें जो मेरी जि़ंदगी में महत्व रखते थे।
रुस्तमजी की पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत ही यही है कि यह कोई ‘हैगिओग्राफी’(संत-चरित लेखन) नहीं है। इसमें नेहरू की निडरता, दूरदृष्टि, लोकतंत्र और भारत की एकता में उनकी गहरी आस्था के साथ-साथ उनके अकारण व सकारण गुस्से और उनके अन्य दोषों पर भी बेबाकी से लिखा गया है। इसमें कुल बारह अध्याय हैं।
1952 से लेकर 1958 तक रुस्तमजी प्रधानमंत्री के मुख्य सुरक्षा अधिकारी होने के नाते नेहरू के करीब रहे। नतीजतन, यह पुस्तक हमें नेहरू का एक अनूठा क्लोज़-अप देती है मैंने उन्हें बेझिझक घूरा है, उनके लिए सिगरेटें सुलगायी हैं और यह भी देखा है कि उनका भी कोई नाखून कभी मैला हो सकता है।
उनके जग-विख्यात गुस्से को तो पूरा-का-पूरा एक अध्याय समर्पित है।
नेहरू के साथ रुस्तमजी की नज़दीकियां इस कदर थीं कि पुस्तक में प्राय: वे नेहरू जी के लिए आत्मीय संबोधन जेएन का प्रयोग करते हैं।
जेएन के साथ मेरी सेवाओं की एक अजीब बात यह थी कि उनके साथ मेरे कार्यभार का ब्यौरा देता कोई सरकारी दस्तावेज़ न था। चूंकि वे बहुत कम सामान के साथ चलते थे – उनके साथ बस एक स्टेनो और मैं चलता, साथ में एक और सुरक्षा अधिकारी और उनका नौकर हरि (हम लोग उनकी स्थायी टीम होते थे) इसके चलते मेरे ऊपर कई और ऐसी जि़म्मेदारियां भी आन पड़ीं जो मेरे कार्यभार का हिस्सा न थीं।
प्रधानमंत्री नेहरू के काम और व्य्वहार से जुड़ी इतनी बारीक और करीबी जानकारियां हमें कहीं और नहीं मिलतीं। कुल मिलाकर, यह पुस्तक नेहरू जी के व्यक्तित्व को लेकर एक विहंगम दृष्टि भी देती है और उसकी एक बेहद अंतरंग प्रस्तुति भी। अंतरंग इसलिए कि रुस्तमजी को प्रधानमंत्री का पहला सुरक्षा प्रमुख होने के नाते नेहरू को एक अभूतपूर्व और अन्यथा अनुपलब्ध निकटता से देखने का विशेषाधिकार मिला।
उनका सुरक्षा अधिकारी होने के नाते मुझे उनके करीब रहने का मौका तो मिला ही, साथ ही एक प्रेक्षक के नाते भी मैंने उन्हें भाषण देते, किताबें पढ़ते और सफर व बैठकों में बातें करते सुना है। वे मुझे नियमित रूप से महत्वपूर्ण बैठकों में उपस्थित रहने को कहते। लंबी-लंबी यात्राओं में और नाश्ते के समय भी उनके साथ अकेला मैं ही होता था वे मुझ पर बेहिसाब भरोसा रखते थे।
नेहरू जी अत्यंत लोकप्रिय थे और उन्हें भी लोगों से बेपनाह प्यार था। अपने इस प्यार में बहकर अक्सर वे सुरक्षा उपायों की धज्जियां ही नहीं उड़ाते, बल्कि ऐसा करने में उन्हें एक प्रकार का परमसुख भी मिलता था। जो लोग आज भक्तों का गुणगान करते हैं, उनके लिए एक समूचा अध्याय ‘नेहरू-मेनिआ’ (नेहरू के प्रति दीवानगी) पर भी है।
नेहरू को लेकर रुस्तमजी का समग्र आकलन कुछ यों है
निस्संदेह, वे एक उत्तम पुरुष थे। आज उनकी महानता कुछ लोगों को नहीं दिख सकती, जैसे कि गांधी की महानता उनके जीते जी उनके छुटभैया निंदकों को नहीं समझ आती थी। जिस दिन वे मरेंगे, मैं सोचता, इस देश के दुखी दिल से चीर देने वाली एक कातर रुलाई फूट पड़ेगी। फ़ुज़ूल की चख़-चख़ भुला दी जाएंगी और पीढि़यों तक लोग उन्हें संसार के एक महान स्टेट्समैन का सम्मान देंगे।
नेहरू की छवि मुख्यत: एक ईमानदार और बड़े आदमी की है आधुनिक, ऊर्जावान और बहुत मेहनती इंसान। मैं जब उनकी टीम में शामिल हुआ तब वे 63 बरस के थे, लेकिन उनके जोश-ओ-ख़रोश को देख उनकी उम्र 33 बरस लगती थी और वो भी अच्छे और सेहतमंद 33 बरस वे सादा जीवन जीते थे और खानपान की उनकी आदतें भी बहुत साधारण थीं।
इस पुस्तक में नेहरू की सामान्य दैनंदिनी के इतने अद्भुत और आत्मीय किस्से और संस्मरण हैं जिन्हें पढ़ते हुए आप बरबस मुस्कुराने लगते हैं।
बावजूद अपनी कमियों के नेहरू प्रगतिशील थे।
नेहरू जी की सोच हमेशा भविष्योन्मुखी होती थी। अतीत के बारे में वे बहुत कम बोलते थे। यहां तक कि वर्तमान भी उनको बहुत ज़्यादा भाता नहीं था। भविष्य को लेकर वे दीवाने रहते। हमारा उद्देश्य क्या है? हमें आगे कैसे बढ़ना चाहिए? हमें किन रास्तों पर चलना चाहिए? एक तरह से उनका चित्त ही भविष्यदृष्टा था। वे हमेशा आने वाले कल में झांकते और अपना पथ चुनने के बाद वे उसे लेकर एकदम निश्चिंत रहा करते।
नेहरू-मेनिआ’नामक अध्याय में रुस्तमजी लिखते हैं, आम लोगों में नेहरू का चुंबकीय आकर्षण उन लोगों के लिए अविश्वसनीय है जिन्होंने उसे अपनी आंखों से नहीं देखा है। उनके पास होने, उन्हें देखने और उन्हें छू लेने की तमन्ना इतनी शिद्दत से होती थी कि लोग अपना आपा खो बैठते। उस ज़माने के ज़्यादातर लोगों ने कभी-न-कभी ऐसा महसूस किया होगा।
विश्व इतिहास में शायद ही किसी और इंसान को वह श्रद्धाभाव मिला हो जितना नेहरू को आजीवन नसीब हुआ।
पंडित नेहरू का निष्ठावान सिपाही होने के बावजूद केएफ रुस्तमजी अपनी निरपेक्षता नहीं खोते हैं। नतीजतन, एक पूरा अध्याय वे नेहरू के दोषों पर एकाग्र रखते हैं। देखिये उनके लेखन की बानगी, अपने जीवन के उत्तरार्ध में नेहरू, औरंगज़ेब की तरह हो गये थे। कॉन्ग्रेस के पुराने संरक्षक धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे थे। कॉन्ग्रेस में नये आने वाले लोगों को नेहरू का सामना करने में डर लगता था
जहां तक नेहरू की बात है, वे अक्सर कॉन्ग्रेसियों की मूढ़ता के चलते हैरान-परेशान रहा करते; उन्हें किसी भी दिशा से कोई भी सहारा नहीं मिलता, जबकि उनके सामने तमाम मुश्किल काम होते थे। ऐसे समय में, उन्हें काबिल लोगों को तलाश कर उन्हें परखना चाहिए था, आगे आने के लिए उनकी हौसला-अफ़ज़ाई करनी चाहिए थी, ताकि वे अपने काम उनके ज़रिये पूरे करवा पाते। लेकिन ठीक ऐसे ही क्षणों में, उनकी चुप्पी और तुनकमिज़ाजी बढ़ती जा रही थी। किसी भी किस्म की आलोचना से वे भड़क उठते
हमारे समय का आकलन करने वाले शायद ये कहेंगे कि नेहरू का सबसे बड़ा दोष था कि उन्होंने चहुं-ओर के भ्रष्टाचार को बेधड़क फलने-फूलने दिया।
नेहरू के नकारात्मक आंकलन के इस अध्याय की समाप्ति रुस्तमजी एक सकारात्मक नोट पर करते हैं।
दोषों, कमियों के बावजूद नेहरू में ऐसे सद्गुण थे जो उन्हें महान बनाते थे। उनकी बुद्धि असाधारण रूप से प्रखर थी और उनका परिश्रम तो ग़ज़ब ही था। वे सत्य्वादी थे, दो-टूक थे, और थे बहुत करुणामय। वे एक महान द्रष्टा़ और खरे सिद्धांतवादी थे, इसे लेकर मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं।
भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को लेकर तरह-तरह के मनगढंत किस्से-कहानियां प्रचलित हैं और इतिहास को पीठ दिखाने की राजनीति के इस दौर में ये कहानियां और भी चटखारे लेकर सुनी-कही जा रही हैं। ऐसे में भारतीय पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और लंबे समय तक पं. नेहरू के सुरक्षा प्रमुख रहे केएफ रुस्तमजी की किताब ‘’आइ वॉज़ नेहरू’स शैडो’’ उन्हें ज्यादा मानवीय, विद्वान और वैश्विक राजनेता की तरह स्थापित करती है। प्रस्तुत है, किताब के अनुवादक मनोहर नोतानी द्वारा की गई उसकी समीक्षा। (spsmedia.in)
-रेहान फ़ज़ल
जब जवाहरलाल नेहरू ने 3 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार में शामिल होने का फैसला किया तो उन्होंने आनंद भवन को छोड़ कर अपनी सारी संपत्ति देश को दान कर दी।
नेहरू को पैसे से कोई खास लगाव नहीं था। उनके सचिव रहे एम ओ मथाई अपनी किताब रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज में लिखते हैं कि 1946 के शुरू में उनकी जेब में हमेशा 200 रुपए होते थे, लेकिन जल्द ही यह पैसे खत्म हो जाते थे क्योंकि नेहरू यह रुपए पाकिस्तान से आए परेशान शरणार्थियों में बांट देते थे।
खत्म हो जाने पर वह और पैसे मांगते थे। इस सबसे परेशान हो कर मथाई ने उनकी जेब में रुपए रखवाने ही बंद कर दिए। लेकिन नेहरू की भलमनसाहत इस पर भी नहीं रुकी। वह लोगों को देने के लिए अपने सुरक्षा अधिकारी से पैसे उधार लेने लगे।
ईमानदारी की मिसाल
मथाई ने एक दिन सभी सुरक्षा अधिकारियों का आगाह किया कि वह नेहरू को एक बार में दस रुपए से ज़्यादा उधार न दें।
मथाई नेहरू की इस आदत से इतने आजिज आ गए कि उन्होंने बाद में प्रधानमंत्री सहायता कोष से कुछ पैसे निकलवा कर उनके निजी सचिव के पास रखवाना शुरू कर दिए ताकि नेहरू की पूरी तनख्वाह लोगों को देने में ही न खर्च हो जाए। जहाँ तक सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी का सवाल है जवाहरलाल नेहरू का कोई सानी नहीं था।
जाने-माने पत्रकार कुलदीप नय्यर ने एक ऐसी बात मुझे बताई जिसकी आज के युग में कल्पना नहीं की जा सकती। कुलदीप ने कुछ समय के लिए नेहरू के सूचना अधिकारी के तौर पर काम किया था।
नेहरू शरणार्थियों की हरसंभव मदद करने की कोशिश करते थे
नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के शौक बहुत खर्चीले थे। एक बार वह शिमला के सर्किट हाउस में ठहरीं। वहाँ रहने का बिल 2500 रुपए आया। वह बिल का भुगतान किए बिना वहाँ से चली आईं। तब हिमाचल प्रदेश नहीं बना था और शिमला पंजाब का हिस्सा होता था। तब भीमसेन सच्चर पंजाब के मुख्यमंत्री होते थे। उनके पास राज्यपाल चंदूलाल त्रिवेदी का पत्र आया कि 2500 रुपये की राशि को राज्य सरकार के विभिन्न खर्चों के तहत दिखला दिया जाए। सच्चर के गले यह बात नहीं उतरी। उन्होंने विजय लक्ष्मी पंडित से तो कुछ नहीं कहा लेकिन झिझकते हुए नेहरू को पत्र लिख डाला कि वही बताएं कि इस पैसे का हिसाब किस मद में डाला जाए। नेहरू ने तुरंत जवाब दिया कि इस बिल का भुगतान वह स्वयं करेंगे। उन्होंने यह भी लिखा कि वह एक मुश्त इतने पैसे नहीं दे सकते इसलिए वह पंजाब सरकार को पांच किश्तों में यह राशि चुकाएंगे। नेहरू ने अपने निजी बैंक खाते से लगातार पांच महीनों तक पंजाब सरकार के पक्ष में पांच सौ रुपए के चेक काटे।
शोर मचाने वाला पंखा
नेहरू सोलह शयन कक्षों के तीन मूर्ति भवन में रहते जरूर थे लेकिन वहाँ भी सादगी से रहने पर ही जोर रहता था। उनके शयन कक्ष में एयरकंडीशनर नहीं था।
गर्मी के दिनों में जब वह दिन के भोजन के लिए तीन मूर्ति भवन आते थे तो मुख्य बैठक के सोफे पर बैठकर आराम करते थे। वहाँ पर आगंतुकों के आराम के लिए एयरकंडीशनर लगा हुआ था। इसके बाद वह थोड़ी देर लेटने के लिए अपने शयन कक्ष में चले जाते थे।
उनके बड़े से शयन कक्ष में छत के पंखे के अलावा एक बहुत पुराना टेबल फैन लगा हुआ था जो बहुत आवाज करता था। एक दिन इंदिरा गाँधी की सचिव उषा भगत ने नेहरू की देखभाल करने वाले शख्स से कहा कि इस पंखे को तुरंत बदल दीजिए। पंखा बदल दिया गया।
दूसरे दिन नेहरू का अर्दली दौड़ा हुआ उषा भगत के पास आया कि उन्होंने नया पंखा देखकर कोहराम मचा दिया है। अंतत: नेहरू पुराने शोर मचाने वाले पंखे को दोबारा लगवा कर ही माने।
कैडलक कार
नेहरू ने विदेशी दौरे में भेंट मिली कार राष्ट्रपति के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी।
1956 में नेहरू सऊदी अरब की राजकीय यात्रा पर गए। उन्हें रियाद में शाह सऊद के महल में ठहराया गया। उनके दल के सदस्य के हर बाथरूम में शैनल 5 परफ्यूम की एक बड़ी बोतल रखी गई।
नेहरू रात में कोई किताब पढऩा चाहते थे, इसलिए उन्होंने पूछा कि क्या उनके कमरे में टेबिल लैंप लगाया जा सकता है ?
महल के लोगों ने समझा कि शायद कमरे में रोशनी पर्याप्त नहीं है। इसलिए अगले दिन नेहरू के कमरे में और तेज रोशनी वाला लैंप और बल्ब लगा दिया गया। उसकी चमक को कम करने के लिए नेहरू के साथ गए मोहम्मद यूनुस ने उसके चारों तरफ कपड़ा लपेट दिया।
रोशनी तो कम हो गई लेकिन उससे निकलने वाली गर्मी ने कपड़े को करीब-करीब जला ही दिया। जब नेहरू वहां से वापस आने लगे तो शाह सऊद ने उनके लिए एक कैडलक कार और उनके दल के सदस्यों के लिए स्विस घडिय़ाँ उपहार में भिजवाईं।
नेहरू इससे थोड़ा असहज हो गए। वह नहीं चाहते थे कि वह विदेशी दौरे से कार उपहार में लेकर लौटें।
मोहम्मद यूनुस उनकी परेशानी समझ गए। उन्होंने कहा, ‘इनके पास और क्या है? अगर मोटर न दें तो फिर क्या दें? तेल का पीपा या रेत का बोरा?’ नेहरू इस पर जोर से हंसे। उन्होंने कार का तोहफा स्वीकार कर लिया और शाह सऊद को अपना धन्यवाद भिजवाया।
शाह जानना चाहते थे कि नेहरू को कार के लिए कौन सा रंग पसंद है। वैसे उन्होंने पहले से ही उनके लिए हरे रंग की कैडलक पसंद कर रखी थी।
नेहरू ने कहा आपकी पसंद मेरी पसंद। भारत आते ही उन्होंने यह कार राष्ट्रपति भवन के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी।
57 साल पहले भेंट दी गई यह कार आज भी राष्ट्रपति भवन के कार बेड़े में मौजूद है।
हाजिर जवाबी
बहुत व्यस्त होने के बावजूद वह अपने दोस्तों की चुटकियां लेने से पीछे नहीं हटते थे। एक बार नाश्ते की मेज पर नेहरू छूरी से सेब छील रहे थे।
इस पर उनके साथ बैठे रफी अहमद किदवई ने कहा कि आप तो छिलके के साथ सारे विटामिन फेंके दे रहे हैं। नेहरू सेब छीलते रहे और सेब खा चुकने के बाद उन्होंने सारे छिलके रफी साहब की तरफ बढ़ा दिए और कहा, ‘आपके विटामिन हाजिर हैं। नोश फरमाएं।’
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद नेहरू की इस चंचलता को ग्रहण लग गया। उनकी आँखों की चमक न जाने कहाँ चली गई। वह अपने आप में घुटने लगे।
‘नेहरू जीवित हैं’
नेहरू की सादगी और ईमानदारी की दूसरी मिसाल मिलना बेहद मुश्किल
27 मई ,1964 को सुबह नौ बजे जाने माने लेखक और ब्ल्टिज़ के स्तंभकार ख्वाजा अहमद अब्बास का फ़ोन बजा। ब्लिट्ज़ के संपादक रूसी करंजिया लाइन पर थे।
‘हेलो अहमद।’
‘गुड मॉर्निंग रूसी।’
‘कुछ बहुत खराब या तो हो चुका है या होने जा रहा है।’ अब्बास ने पूछा नेहरू ठीक ठाक तो हैं।
करंजिया ने कहा नहीं उनको एक और स्ट्रोक हुआ है। तुम तुरंत दफ्तर आ जाओ। तुम्हें उन पर चार पेज का फीचर लिखना है।
जैसे ही अब्बास ब्ल्टिज के दफ्तर पहुंचे करंजिया ने कहा तुम्हारे पास नेहरू के ऊपर लेख लिखने के लिए चार घंटे हैं।
ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखना शुरू किया। आर्ट विभाग का एक व्यक्ति उनके पास आकर कहने लगा, ‘पहले हेडलाइन लिखिए ताकि मैं उस पर काम करना शुरू कर दूँ।’
अब्बास ने कांपते हाथों से लिखा... नेहरू... थोड़ी देर सोचा और फिर लिखा... लिव्स। दो बजे नेहरू का देहांत हो गया। अगले दिन ब्ल्टिज की तीन इंच की बैनर हेड लाइन थी... नेहरू लिव्स... (bbc.com/hindi)
- विनीत कुमार
जनवरी 1950 को जयपुर में काग्रेस के 55वां अधिवेशन होने जा रहा था। इसी दौरान नेहरूजी जयपुर के बालिका विद्यापीठ भी गए। जिनके स्वागत में छोटी-छोटी बालिकाएं कई तरह के नारे लगा रही थीं। जिनमें एक नारा बार-बार गूँज रहा था। ‘भारत माता की जय।’ नेहरूजी ने शोर थमने के बाद बालिकाओं से पूछा, ‘मेरे प्यारे बच्चों, बताओ भारत माता कोन है?’ सभी बालिका गुमसुम हो शिक्षकों की ओर देखने लगीं तो....
नेहरूजी ने मुस्कुराकर कहा, ‘अरे! इन्हें कहां मालूम। वास्तव में हमारा देश और उसके निवासी ही भारत माता हैं।’...वे आगे बोले, ‘बच्चों, हमारा पूरा देश, इसके पहाड़, इसकी नदियाँ, गाँव, शहर सभी भारत माता है। देश के उद्योग, मशीनरी, सभी औजार भारत माता है। देश के सभी जाती-धर्म के लोग, अमीर-गरीब, छोटे-बडे, बूढ़े-बच्चे सभी लोग भारत माता हैं। हमें इनकी बेहतरी के लिए काम करना चाहिए। इनको विकास की ऊंचाइयों पर ले जाना चाहिए। संतान का काम माता की देखभाल करना है, उसको खुश रखना है। जिसमें देश के एक भी व्यक्ति की आँखें नम न हो। देश के संसाधनों से खिलवाड़ न हो। यदि आप ऐसा नहीं करते हो तो ये ‘भारत माता’ के साथ धोखा है, छल है।’....यह सुनकर वहाँ उपस्थित शिक्षक, बच्चे, स्वाधीनता सेनानी व उद्योगपति घनश्यामदास विड़ला भाव-विभोर हो गये। सभी ने एक साथ जोर से कहा, भारत माता की जय।
समय के साथ यह नारा काग्रेस से हाथ से निकल गया और इसके मायने ही बदल गये। इसके दम पर आज सरकारें बनने बिगडऩे लगीं, जिसे हम और आप बखूबी देख भी रहे हैं..
27 मई चाचा नेहरू जी की पुण्यतिथि पर नमन
-सुसंस्कृति परिहार
जब भारत आज़ाद हुआ इस वक़्त तक इज़रायल के गठन का कैंपेन अपने चरम पर पहुंच चुका था. इस मसले पर 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र में एक वोटिंग होनी थी. वोटिंग का विषय था, फिलिस्तीन का बंटवारा. इसे दो भाग में बांटना. एक हिस्सा, यहूदियों का देश. दूसरा, अरबों यानी फिलिस्तीनियों का देश. इस वोटिंग से पहले ही यहूदी राष्ट्रवादी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपने लिए समर्थन जुटा रहे थे.
वे ख़ासतौर पर भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समर्थन के इच्छुक थे क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर नेहरू की बहुत प्रतिष्ठा थी. चाइनीज़ गृह युद्ध से लेकर पूंजीवाद और सोवियतवाद, अंतरराष्ट्रीय मसलों में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ़ चल रहे वैश्विक संघर्ष में वो एक बड़ी अथॉरिटी माने जाते थे. स्पष्ट था कि दुनियावी मामलों में उनकी राय का आज़ाद भारत की आगामी विदेश नीति पर भी असर पड़ने वाला था ।
नेहरू जी मानते थे कि जहां आज फिलिस्तीन बसा है, उस ज़मीन से यहूदियों की प्राचीन जड़ें जुड़ी हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आधुनिक काल में भी उस भूभाग पर यहूदियों का अधिकार हो. नेहरू ने 1939 में लिखा था-ये सच है कि यहूदियों के लिए फिलिस्तीन उनकी पवित्र ज़मीन है. मगर फिलिस्तीन कोई निर्जन भूभाग नहीं. वो अरबों का घर, उनका वतन है.
लेकिन ऐसे दृष्टिकोण रखने वाले नेहरु जी से यहूदियों को आज़ाद भारत का समर्थन चाहिए था, तो ज़रूरी था कि नेहरू के विचार बदले जाएं. इसका जिम्मा मिला, मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन को , जो नेहरू के प्रशंसक थे. इसीलिए आइंस्टाइन ने चार पन्नों की एक चिट्ठी भेजी नेहरू को भेजी थी।इसमें उन्होंने हिटलर के हाथों हुए यहूदी नरसंहार का हवाला देते हुए इज़राइल का समर्थन मांगा। तब नेहरू ने साफ साफ लिखा कि वो यहूदियों के लिए हमदर्दी रखने के साथ-साथ अरबों के प्रति भी सहानुभूति रखते हैं. वो फिलिस्तीनी भूमि के बंटवारे और यहूदी राष्ट्र के गठन को सपोर्ट नहीं कर सकते।
कई जानकार मानते हैं कि नेहरू ने भारत का बंटवारा. धर्म के नाम पर भारत के जो दो टुकड़े हुए और सांप्रदायिक नफ़रत के चलते राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता बड़ी चुनौतियां थीं. देश में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की एक बड़ी आबादी थी।उसी के मद्देनजर यह जवाब दिया था ।
यह भी कहा जाता है कि पाकिस्तान को काऊंटर करने के लिए अरब और मुस्लिम देशों का भी समर्थन चाहिए था ये मुस्लिम देश फिलिस्तीन के समर्थक थे. शायद ये भी एक बड़ी वजह थी कि आज़ाद भारत ने फिलिस्तीनी अधिकारों के साथ खड़े होने का विकल्प चुना। 29नवम्बर1947 को जब इस मुद्दे पर UN में वोटिंग हुई, तो भारत ने पार्टिशन रेजॉल्यूशन के विरोध में मतदान किया लेकिन दो सुपरपावर्स के सपोर्ट के चलते इज़रायल का गठन हो गया. 14 मई, 1948 को इज़रायल ने स्वतंत्र देश बन गया।आखिरकार, एक लंबी उठापटक के बाद भारत ने इजरायल को सितम्बर, 1950 में अपनी स्वीकार्यता दे दी। दिल्ली से 1,400 किलोमीटर दूर बम्बई में उसे एक वाणिज्य दूतावास खोलने की अनुमति दी गयी
1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया. ये युद्ध नेहरू की चाइना नीति की करारी हार थी. साथ ही, अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की कोशिश कर रहे भारत के पास चीन का मुकाबला करने की सैन्य क्षमता भी नहीं थी. भारत को हथियारों और कूटनीतिक समर्थन के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद मांगनी पड़ी.
27 अक्टूबर, 1962 को नेहरू ने इज़रायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन को भी पत्र भेजा. जवाब में गुरियन ने भारत के साथ हमदर्दी जताते हुए हथियार देने की पेशकश की. इज़रायल ने भारत को आर्म्स सपोर्ट दिया भी, मगर सीमित. इस प्रकरण के चलते इज़रायल और भारत करीब तो आए, मगर फिर 1967 के सिक्स-डे वॉर के चलते दोनों में दूरी आ गई
पाकिस्तान के सवाल पर इंदिरा गांधी सरकार के आगे भी अमेरिका का बहुत दबाव रहा। गवर्नमेंट को सोवियत के अतिरिक्त भी इंटरनैशनल बैकअप चाहिए था. इस तस्वीर में इज़रायल की एंट्री दिखती है 1971 के बांग्लादेश युद्ध में. इस टाइम भारत को हथियारों की फिर ज़रूरत पड़ी. सरकार ने इज़रायल से मदद मांगी. और उसने भारत को लिमिटेड सपोर्ट भी दिया.
लेकिन इस सपोर्ट के बावजूद भारत ने फिलिस्तीन का पक्ष नहीं छोड़ा. इसी क्रम में 1975 के साल भारत ने यासिर अराफ़ात के PLO, यानी फिलिस्तीनियन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन को फिलिस्तीन देश के प्रतिनिधि की मान्यता दी । तभी से यह सिलसिला जारी है लेकिन मोदी सरकार आने के बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतान्याहू से जो मजबूत रिश्ते बन रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि शायद नेहरू द्वारा स्थापित विदेश नीति परिवर्तित ना हो जाए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ
ताजा घटनाक्रम के अनुसार इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच जो हिंसा का लगभग हफ़्ते भर दौर चला वह बीत चुका है. इस हिंसा में अब तक 58 बच्चों समेत 198 फिलिस्तीनी मारे गए हैं. इज़रायल के कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में भी सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ के हाथों 13 फिलिस्तीनी मारे गए. उधर हमास द्वारा छोड़े गए सैकड़ों रॉकेट्स से इज़रायल में दो बच्चों समेत 10 लोगों की मौत हुई है.फिलहाल संघर्ष विराम जारी है।
इस हिंसा के खिलाफ़ दुनिया के कई शहरों में प्रोटेस्ट हो रहे हैं. कोई फ़िलिस्तीन का पक्ष ले रहा है, कोई इज़रायल का. भारत में भी सोशल मीडिया फीड ‘आई सपोर्ट फिलिस्तीन वर्सेज़ आई सपोर्ट इज़रायल’ से भरी हुई थी कई लोग इज़रायल का सपोर्ट करने के साथ-साथ इस्लामोफ़ोबिया का भी भद्दा प्रदर्शन कर रहे थे। न्यूक्लियर हमले और नरसंहार जैसी भीषण अपीलें भी जा गई। इन सबके बीच एक ट्वीट को लेकर काफी कौतुहल दिखा ये ट्वीट था, इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का. 16 मई के अपने इस ट्वीट में नेतन्याहू ने अमेरिका और ब्रिटेन समेत 25 देशों का झंडा लगाया. इसके साथ नेतन्याहू ने लिखा-इज़रायल के साथ सुदृढ़ता से खड़े रहने के लिए शुक्रिया. आतंकी हमलों के विरुद्ध अपनी सुरक्षा के हमारे अधिकार का समर्थन करने के लिए आपका धन्यवाद.
इस ट्वीट पर भारतीयों के भी कई कमेंट आए. कई भारतीयों ने ताज्जुब जताया कि नेतन्याहू ने अपने ट्वीट में भारत का झंडा क्यों नहीं लगाया? ये बड़ा सवाल है. मगर इसका जवाब नेतन्याहू के पास नहीं. क्योंकि ये मामला जुड़ा है, भारतीय विदेश नीति से । विदेश नीति, यानी किसी दुनियावी मसले पर एक देश का आधिकारिक स्टैंड और यह स्टैंड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा रखी गई सुचिंतित सफल विदेश का ही सुखद प्रतिफल है ।
-प्रकाश दुबे
सबरीमला के अयप्पा लोकसभा क्षेत्र पत्तनंतिट्टा में विराजमान हैं। वीना जार्ज लोकसभा चुनाव हारीं। हिम्मत नहीं हारी। उसी लोकसभा क्षेत्र के एक विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर वीना मंत्री बनीं। वाम मोर्चा के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, उनके दामाद मोहम्मद रियास सहित 15 लोगों ने सत्यनिष्ठा के नाम पर शपथ ली। वीना ने भगवान को याद किया। ईसाई बहुल केरल कांग्रेस के मणि गुट के प्रतिनिधि रोशी आगस्टीन, इंडियन लीग के अहमद दावरकोविल ने अपने अपने आराध्य को याद किया। सबरीमला मिलनसार देवता का स्थान है। इसे शैव और वैष्णव दोनों अपना मानते हैं। वार्षिक यात्रा में करीब दो करोड़ श्रद्धालु आते हैं। 41 दिन की कठिन यात्रा मंडपम को तभी पूरा माना जाता है जब श्रद्धालु वावर बाबा मस्जिद में मत्था टिका कर आए। इस्लाम मानने वाले परिवार में जन्मे वावर अयप्पा के भक्त थे। यूं तो सबके लिए खुला है-मंदिर ये। कुछ महिलाओं को छोडक़र। वीना मंत्री हैं परंतु अयप्पा दर्शन? टीवी पत्रकार रही हैं। दूर से दर्शन सही।
मुक्कों की मार से बरसे सोना
मुक्केबाज मेरी काम सब काम छोडक़र सोने का एक पदक पक्का करने की कोशिश में जी जान से जुटी हैं। बच्चों की बीमारी से बेचैन रहीं। दिल पर हाथ रख अपने को समझाया। कोरोना महामारी के बीच दिल्ली कोचिंग के लिए जाने की तैयारी की। मुक्केबाजी एसोसिएशन ने ही कोचिंग कैम्प रद्द किया। हजारों किलोमीटर पुणे में प्रैक्टिस जारी है। विश्व स्तर की स्पर्धा में आधा दर्जन स्वर्ण पदक बटोर चुकी मेरी काम की आयु 40 से दो साल कम है। 50 किलो वजन वाली मुक्केबाज टोकियो ओलम्पिक में सोना पाने का अवसर गंवाना नहीं चाहतीं। ओलम्पिक से पहले एशियाई मुक्केबाजी स्पर्धा में तैयारी का एक अवसर है। स्पर्धा के लिए दुबई जाने की उनकी तैयारी है। पहुंचना और शामिल होना मेरी काम के वश में नहीं है। भारत और दुनिया की विमान सेवाओं और इस समय महामारी से संबंधित प्रतिबंधों पर बहुत कुछ निर्भर करता है। हम भारतीय किसी को रोता देखकर मोहित हो जाते हैं। स्वर्ण पदक लेते समय रोते हुए देखना चाहते हैं या न जाने और न पाने के कारण आंसू बहाने पर? तय करो।
ठंडे का फंडा
प्रेस क्लब आफ इंडिया का मुख्य काम इन दिनों बंद है। यह मत पूछिए क्या? हर तरह के सोमरस को शीतल और पत्रकार सदस्यों को जोशीला बनाने वाली मशीनें ठंडी पड़ी हैं। प्रेस क्लब के सचिव विनय कुमार सिर्फ पत्रकार के रूप में ही कल्पनाशीलता के लिए प्रख्यात नहीं हैं। उन्होंने प्रेस क्लब की मशीनों का महामारी को मात देने के लिए उपयोग करने का प्रस्ताव रखा। औषधियां, इंजेक्शन, टीके सुरक्षित रखने के लिए इन प्रशीतकों का उपयोग हो सकता है। प्रेस क्लब परिसर का उपयोग सामूहिक टीकाकरण के लिए किया जा सकता है। प्रस्ताव से प्रभावित दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसके एवज में प्रेस क्लब सदस्यों के टीकाकरण की तैयारी दिखाई। शनिवार को अधिकारी मुआयना कर गए। प्रेस क्लब के चार हजार से अधिक सदस्य और उनके परिवारजन आश्वासन से खुश हैं। वे यह भूल गए कि टीके केजरीवाल के घर नहीं बनते। केन्द्र सरकार से मिलते हैं। तिथि की सूचना मिलने के बाद पक्का समझाना। टीके के बजाय पेय पदार्थ से प्रतिरोधक ताकत पाने का विकल्प है। उसके लिए लाक डाउन और क्लब खुलने तक इंतजार करना पड़ेगा।
कुर्सी चाहे कैसी हो
बहुत पुराने जमाने की बात नहीं है जब आला कमान की अनसुनी करने पर पत्ता साफ हो जाता था। जब सत्ता नहीं है तो आलाकमान ही ढीला पड़ा है। विधानसभा चुनाव से पहले सबने सौ सौ बार कसमें खाईं कि आपस में झगड़ा नहीं करेंगे। जीत कर आने के बाद भी। आलाकमान जिसे तय करेगा, उसे मुख्यमंत्री मान लेंगे। आलाकमान मुगालते में रहा हो, केरल के राज्य नेता एक दूसरे पर भरोसा नहीं कर पाए। जनता बेवकूफ नहीं है। उसने भी दावे पर यकीन नहीं किया। सत्ता नहीं मिली। तो क्या हुआ? अब नेता प्रतिपक्ष के लिए खींचतान जारी है। जीतने वाले मोर्चे ने सरकार बना ली। मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाले रमेश चेन्निथला नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी बचाने के लिए दो दर्जन नवनिर्वाचित विधायकों का जुगाड़ करने में जुटे हैं। उनकी कोशिश नाकाम करने कम से कम चार दावेदार राह में अड़े हैं। केरल के प्रभारी महासचिव तारिक अनवर हैरान हैं। इतनी मेहनत चुनाव में की होती तो नतीजे कुछ बेहतर होते। अंतत: चेन्निथला को हटाकर नया चेहरा लाए। वैसे सतीशचंद्रन पहले भी चुनाव जीत चुके हैं। विधानसभा में उनकी सक्रियता से तारिक भाई प्रभावित हुए।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इजराइल और फिलीस्तीनियों के संगठन हमास के बीच पिछले 11 दिनों तक युद्ध चलता रहा। अब मिस्र और अमेरिका के प्रयत्नों से वह युद्ध ऊपरी तौर पर शांत हो गया है लेकिन बुनियादी झगड़ा जहां का तहां बना हुआ है। अल-अक्सा मस्जिद, जो कि दुनिया के मुसलमानों का पवित्र तीर्थ-स्थल है, उसमें इजराइलियों का जाना-आना ज्यों का त्यों बना हुआ है और शेख ज़र्रा नामक पूर्वी यरुशलम से फिलीस्तीनियों को खदेड़ना जारी है। इन दोनों मसलों के कारण ही यह युद्ध छिड़ा था।
इन दोनों से भी बड़ा और असली मुद्दा है- उस फिलीस्तीनी भूमि पर दो राष्ट्रों का स्थापित होना। 1948 में इजराइल वहाँ स्थापित हो गया। उसकी स्थापना में ब्रिटेन और अमेरिका ने जबर्दस्त भूमिका निभाई लेकिन फिलीस्तीनियों का राज्य बनना अभी तक संभव नहीं हुआ है जबकि उसकी स्थापना के लिए संयुक्तराष्ट्र संघ ने प्रस्ताव पारित कर रखा है। सभी पश्चिमी राष्ट्र और यहां तक कि अरब राष्ट्र भी इस मामले में जबानी जमा-खर्च करके चुप हो जाते हैं।
इजराइल में रहने वाले अरबों की दुर्गति तो सबको पता ही है, फिलिस्तीनी इलाकों की गरीबी, अशिक्षा और असुरक्षा शब्दों के परे हैं। इसके अलावा पिछले अरब-इजराइली युद्धों में इजराइल ने जिन अरब इलाकों पर कब्जा कर लिया था, उनमें रहने वाले अरबों की हालत गुलामों जैसी है। वे अपने ही घर में बेगानों की तरह रहते हैं। एक जमाना था, जब दुनिया के मालदार इस्लामी राष्ट्र इन शरणार्थियों की खुलकर मदद करते थे लेकिन अब ईरान के अलावा कोई राष्ट्र खुलकर इनकी मदद के लिए सामने नहीं आता।
तुर्की और मलेशिया जैसे राष्ट्र जबानी बंदूकें चलाने में उस्ताद हैं लेकिन परेशान फिलीस्तीनियों की ठोस मदद करने वाला आज कोई भी नहीं है। खुद फिलीस्तीनी कई गुटों में बंट गए हैं। अल-फतह और हमास– ये दो तो उनके जाने-पहचाने चेहरे हैं। छोटे-मोटे कई गुट सक्रिय हैं जबकि उनके विरुद्ध पूरा का पूरा इजराइल एक चट्टान की तरह खड़ा होता है। इजराइल की पीठ पर अमेरिका की सशक्त यहूदी लाबी का हाथ है।
भारत एक ऐसा देश है, जिसका इजराइल और फिलिस्तीन, दोनों से घनिष्ट संबंध है। भारत ने वर्तमान विवाद में अपनी भूमिका के असंतुलन को सुधारा है और निष्पक्ष राय जाहिर की है। वह किसी का पक्षपात करने के लिए मजबूर नहीं है। फिलीस्तीनियों के प्रसिद्ध नेता यासिर अराफत कई बार भारत आते रहे और भारत सरकार खुलकर उनका समर्थन करती रही है।
नरसिंहराव सरकार ने इजराइल के साथ सक्रिय सहयोग शुरु किया था, जो आज काफी ऊँचे स्तर पर पहुंच गया है। अन्य अरब देश भी भारत का बहुत सम्मान करते हैं। इजराइल सुरक्षित रहे लेकिन साथ-साथ अरबों को भी न्याय मिले, इस दिशा में भारत का प्रयत्न बहुत सार्थक हो सकता है। भारत कोरे बयान जारी करके अपना दायित्व पूरा हुआ, यह न समझे बल्कि दोनों पक्षों से खुलकर बात करे तो वह अमेरिका जो प्रयत्न कर रहा है, उसे सफल बना सकता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-कनक तिवारी
25 मई 2013 को बस्तर की दरभा घाटी में नक्सलियों ने भयानक नरसंहार किया। उसमें कांग्रेस के बड़े नेताओं विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, महेन्द्र कर्मा, उदय मुदलियार और योगेन्द्र शर्मा सहित कई लोगों की हत्या हुई। आनन फानन में तब की कांग्रेसी केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी के जरिए जांच कराने का ऐलान किया। उस पर छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने हामी भरी। तब से दरभा घाटी से भी ज्यादा पेंच भरे घुमावदार कानून के गली कूचों में जांच की प्रक्रिया अपनी मंजिल का पता पूछ रही है। जंगलों के अंधेरे में घनी वादियों के बीच रास्ता नहीं सूझता। कानून की भूलभुलैया में तो अंधेरा ही भटक जाता है।
घटना के पांच साल बाद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आई और उसके चार साल पहले ही केन्द्र में भाजपा की सरकार आ जाने से सत्ता का उलट पलट हो गया। मौजूदा कांग्रेस सरकार ने विशेष जांच दल गठित कर झीरम की जांच करानी चाही लेकिन राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी अधिनियम के तहत केन्द्र को अधिकार है कि वह नक्सली अपराधों सहित राष्ट्रीय नस्ल के अन्य अपराधों में जांच कर सके जिनका अंतराज्यीय फैलाव होता है। केन्द्र ने राज्य सरकार को नकार दिया।
मैंने अधिकृत तौर पर सरकारी फाइलों को देखा है, सलाह दी है और भविष्यवाणी तक कर दी है। उसका फिलहाल यहां खुलासा नहीं करना है। मामला केन्द्र और राज्य के बीच हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपनी ताकत दिखाने का होता रहता है लेकिन न्याय तो पीड़ित परिवारों को चाहिए, जनता को भी चाहिए। सरकारें तो फकत अन्याय करती हैं। उन्हें न्याय पाने की इच्छा कहां होती है। आनन-फानन में भाजपाई राज्य सरकार द्वारा गठित न्यायिक आयोग में भी मामला चला गया। वहां भी वह ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस‘ के मुहावरे का अर्थ पीड़ितों को समझाता रहा। अब भी तो समझा रहा होगा कि क्या हुआ या हो सकता है। सरकारी ऐलान फिर भी होता है झीरम घाटी प्रकरण में न्याय मिलेगा।
सवाल है न्याय किसको मिलेगा और मिलेगा भी तो न्याय होता क्या है? समझ लें अदालती न्याय मु्ट्ठी में हवा को बंद करने जैसा होता है। दिखता नहीं है। घोषणाएं और आश्वासन इसलिए हवा हवाई ही होते हैं। यह अंगरेजी के शब्द एन आई ए और सी बी आई जनता को हातिमताई या देवदूतों की तरह क्यों लगते हैं! इनमें सामान्य पुलिसिया अफसर ही होते हैं। कई बार तो दागी अफसरों को इन केन्द्रीय एजेंसियों की झीरम घाटी में धकेल दिया जाता है। वहां भी ये अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। सी बी आई के दो बडे़ अफसरों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक डांट डपट खाती रही। सुप्रीम कोर्ट ने कह तो यह भी दिया कि ‘सी बी आई सरकार के पिंजरे का तोता है। एन आई ए भी तो वही है। उसकी टांग गलत जगह अड़ा दी जाती है क्योंकि वे अपनी टांगों को अंगद के पैर समझती हैं।‘ बंगाल में सी बी आई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच जिला स्तरीय कोर्ट की अपनी असफलता का रोना रो रही है।
1984 की भोपाल गैस त्रासदी में राजनेताओं और अदालतों के कारण पीड़ितों को आज तक मुकम्मिल न्याय नहीं मिला। तब तो 2013 वाली झीरम घाटी को प्रतीक्षा सूची में रहना है। कठुआ, उन्नाव तथा हाथरस के बलात्कार के जघन्य कांडों मे बेचारी पीड़ित बच्चियों और उनके परिवारों को क्या खाक न्याय मिला है। तेज तर्रार जे एन यू नेता कन्हैय्या कुमार को दिल्ली की अदालत के प्रांगण में वकीलों ने असभ्य तरीके से पिटाई की। क्या न्याय मिला? कपिल मिश्रा जैसे लोगों ने दिल्ली में हिंसात्मक धांधलेबाजी मचाने का आरोप झेला। हाई कोर्ट जज मुरलीधरन ने एफ आई आर कराने का आदेश दिया तो केन्द्र सरकार के कारण सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात को जज का तबादला कर दिया। हां, जस्टिस मुरलीधरन को न्याय मिल गया!
छत्तीसगढ़ सरकार श्वेत पत्र प्रकाशित करेगी कि आज तक भाजपा प्रशासन के बस्तर में आदिवासियों को कितने नरसंहारों में मारा गया है? कितने आयोग गठित किए गए? आयोगों की रिपोर्टें क्या हैं? उनमें कितना धन और समय खर्च हुआ और सरकार ने क्या कार्यवाही की? किसको किसको न्याय मिला? पश्चिम बंगाल की हिंसा में पीड़ित लोग न्याय मांगते दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। जो सक्षम हैं, वे सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ में मरते तो आदिवासी हैं। उनकी तरफ से सरकार अपने खर्च से बडे़ से बडे़ वकीलों को लगाकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ने में मदद क्यों नहीं करती? भाजपा और कांग्रेस की सरकारें तो अदल-बदल के किरदार हैं। एक दूसरे पर दोष लगाने से चुनाव जीते जाते हैं। आश्वासन देने का अधिकार मिल जाता है। राजनीतिक आश्वासन का व्याकरण में अर्थ है झांसा।
अदालतों की कार्यवाही में जब दो पक्ष मिली जुली कुश्ती लड़ते हैं तो बेचारे न्याय को ही न्याय नहीं मिलता। वह दूसरों को क्या न्याय देगा? फिर भी यह लोकतंत्र है। जनता हर बार उसको वोट देगी जो कहेगा तुमको न्याय मिलेगा। न्याय जब नहीं मिलेगा तो विपरीत पार्टी को वोट देगी और उसका आश्वासन मानेगी कि न्याय मिल गया। न्याय एक धुंध है। धुंधलका है। मृगतृष्णा का अरुणोदय है। गोधूलि बेला है। वह झीरम घाटी की टीसती आंत में ठहरा हुआ अहसास है। उस पर आदिवासियों की उम्मीदें उसी तरह कायम हैं जैसे उन्हें लगता है कि अदानी, अंबानी, टाटा, वेदांता, एस्सार, जायसवाल ये सब लोग जनता के रक्षक हैं।
-पुष्य मित्र
अगर कल से फेसबुक-ट्विटर-वाट्सएप बंद हो गये तो सबसे अधिक खुश मैं होऊंगा। हालांकि एक स्वतंत्र पत्रकार होने के कारण ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेरे लिए जॉब काउंटर सरीखे हैं। मेरे लिए कई खबरों के आइडियाज यहीं से मिलते हैं और काम के कई ऑफर भी। मेरे लिए यह सिर्फ टाइमपास, दोस्ती, राजनीति, एक्टिविज्म और अपने आप को प्रमोट करने का जरिया ही नहीं है। यह मेरी रोजी रोटी से जुड़ा है। फिर भी मुझे पूरा भरोसा है कि कोई न कोई जरिया निकल ही जायेगा।
हालांकि मुझे यह भी मालूम है कि इनमें से कोई बंद नहीं होगा। हमसे ज्यादा इन माध्यमों पर सरकार की डिपेंडेंसी है। हमारा काम चल जायेगा, सरकारों का काम इनके बगैर एक दिन नहीं चलेगा। आप देखिये किस तरह इन माध्यमों से जुड़कर देश के बड़े नेता और मंत्री अब इंडिपेंडेंट मीडिया बन चुके हैं। इन्हें अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचाने के लिए अब अखबारों, टीवी चैनलों और दूसरे समाचार माध्यमों की जरूरत नहीं। इन माध्यमों में सरकार के लिए कोई संपादकीय अवरोध भी नहीं। ये जो चाहते हैं, हर किसी तक पहुंचा देते हैं। सही-गलत दोनों तरह की बात। विवादास्पद बयान तक।
फिर इन माध्यमों पर इनके लाखों नासमझ फॉलोअर हैं, जो इनके एक इशारे पर इनके विरोधियों की वाट लगाते रहते हैं। सोशल मीडिया पर सत्ता और विपक्ष का शक्ति संतुलन 90 बनाम दस का है। इनकी आईटी सेल है, जो इनकी हर असफलता, हर गलत फैसले पर कुतर्क गढ़ती है और पल भर में गांव-गांव तक फैला देती है। सत्ताधारी दल के बूथ लेवल तक वाट्सएप ग्रुप हैं। जिनके जरिये चुनाव लड़े और जीते जाते हैं और प्रोपेगेंडा फैलाये जाते हैं।
यही वह ताकत है जिसकी वजह से हद दर्जे की आर्थिक और राजनीतिक असफलता के बावजूद यह सरकार बेफिक्र है। उसे मालूम है कि उसके पास अपने कुतर्क और प्रोपेगेंडा को फैलाने के लिए एक चैनल बना हुआ है। अखबार आज भी नैतिकता के एक मोरल प्रेशर में काम करते हैं, उनके पतन औऱ सत्ताउन्मुख होने की अपनी सीमा है। उस पर फेक न्यूज न फैलाने का दबाव है। ऐसे में जब हर बाजी नाकाम हो जाती है तो वाट्सएप यूनिवर्सिटी काम आती है। सरकार इस ताकत को नहीं गंवा सकती।
हां, अपनी ताकत के जोर पर वह उसे दबाना और झुकाना जरूर चाहती है। जिस तरह उसने ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों को झुका दिया है। वह सोशल मीडिया स्पेस में सीमित हैसियत में मौजूद विरोधी आवाज को कुचलना चाहती है। क्योंकि यही वह आवाज है जो तमाम प्रोपेगेंडा के बावजूद सरकार को प्रेशर में रखती है, उसके अपराधों को सामने लाती है। सरकार का लक्ष्य इन माध्यमों को इतना झुका देना है कि वह इन आवाजों का धीरे-धीरे गला घोंट दे। ताकि सोशल मीडिया पर सिर्फ उसका प्रोपेगेंडा गूंजता रहे।
सोशल मीडिया के होने से विरोधी आवाजों को भी एक भ्रम सा हो गया है कि वे यहां ताकतवर हैं। वे एक ट्विटर कैंपेन या फेसबुक पोस्ट लिखकर सरकार को झुका देते हैं। इस चक्कर में उनका आम लोगों से जुड़ाव घटता जा रहा है। अगर ये माध्यम बंद हुए तो विरोधी ताकतों को फिर से आम लोगों से बतियाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यह उनके लिए लाभदायक होगा। सरकार का पिंड भी मीडियम क्लास फुरसतिये भक्तों से छूटेगा। जो अपनी कल्पना से हर बात के लिए कुतर्क गढ़ते और सारा दोष पब्लिक पर डाल देने के अभ्यस्त हो चले हैं।
- बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक-दो प्रांतों को छोड़कर भारत के लगभग हर प्रांत से खबर आ रही है कि कोरोना का प्रकोप वहाँ घट रहा है। अब देश के सैकड़ों अस्पतालों और तात्कालिक चिकित्सा-केंद्र में पलंग खाली पड़े हुए हैं। लगभग हर अस्पताल में आक्सीजन पर्याप्त मात्रा में है। विदेशों से आए आक्सीजन-कंसन्ट्रेटरों के डिब्बे बंद पड़े हैं। दवाइयों और इंजेक्शनों की कालाबाजारी की खबरें भी अब कम हो गई हैं। लेकिन कोरोना के टीके कम पड़ रहे हैं। कई राज्यों ने 18 साल से बड़े लोगों को टीका लगाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया है। देश में लगभग 20 करोड़ लोगों को पहला टीका लग चुका है लेकिन ये कौन लोग हैं ? इनमें ज्यादातर शहरी, सुशिक्षित, संपन्न और मध्यम वर्ग के लोग हैं। अभी भी ग्रामीण, गरीब, पिछड़े, अशिक्षित लोग टीके के इंतजार में हैं। भारत में 3 लाख से ज्यादा लोग अपने प्राण गवां चुके हैं। यह तो सरकारी आंकड़ा है। इस आंकड़े के बाहर भी बहुत-से लोग कूच कर चुके हैं। अब तक 3 लाख से ज्यादा लोग चले गए। पिछले 12 दिन में 50 हजार लोग महाप्रयाण कर गए। इतने लोग तो आजाद भारत में किसी महामारी से पहले कभी नहीं मरे। किसी युद्ध में भी नहीं मरे।
मौत के इस आंकड़े ने हर भारतीय के दिल में यमदूतों का डर बिठा दिया। जो लोग सुबह 5 बजे गुड़गांव में मेरे घर के सामने सड़क पर घूमने निकलते थे, वे भी आजकल दिखाई नहीं पड़ते। सब लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं। आजकल घरों में भी जैसा अकेलापन, सूनापन और उदासी का माहौल है, वैसा तो मैंने अपने जेल-यात्राओं में भी नहीं देखा। अब 50-60 साल बाद लगता है कि कोरोना में रहने की बजाय जेलों में रहना कितना सुखद था। लेकिन जब हम दुनिया के दूसरे देशों को देखते हैं तो मन को थोड़ा मरहम-सा लगता है। भारत में अब तक 3 लाख मरे हैं जबकि अमेरिका में 6 लाख और ब्राजील में 4.5 लाख लोग ! जनसंख्या के हिसाब से अमेरिका के मुकाबले भारत 4.5 गुना बड़ा है और ब्राजील से 7 गुना बड़ा। अमेरिका में चिकित्सा-सुविधाएं और साफ-सफाई भी भारत से कई गुना ज्यादा है।
इसके बावजूद भारत का ज्यादा नुकसान क्यों नहीं हुआ ? क्योंकि हमारे डॉक्टर और नर्स देवतुल्य सेवा कर रहे हैं। इसके अलावा हमारे भोजन के मसाले, घरेलू नुस्खे, प्राणायाम और आयुर्वेदिक दवाइयां चुपचाप अपना काम कर रही हैं। न विश्व स्वास्थ्य संगठन उन पर मोहर लगा रहा है, न हमारे डाॅक्टर उनके बारे में अपना मुँह खोल रहे हैं और न ही उनकी कालाबाजारी हो रही है। वे सर्वसुलभ हैं। उनके नाम पर निजी अस्पतालों में लाखों रु. की लूट-पाट का सवाल ही नहीं उठता। भारत के लोग यदि अफ्रीका और एशिया के लगभग 100 देशों पर नज़र डालें तो उन्हें मालूम पड़ेगा कि वे कितने भाग्यशाली हैं। सूडान, इथियोपिया, नाइजीरिया जैसे देशों में कई ऐसे हैं, जिनमें एक प्रतिशत लोगों को भी टीका नहीं लगा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान में भी बहुत कम लोगों को टीका लग सका है। कोरोना की इस लड़ाई में सरकारों ने शुरु में लापरवाही जरुर की थी लेकिन अब भाजपा और गैर-भाजपा सरकारें जैसी मुस्तैदी दिखा रही हैं, यदि तीसरी लहर आ गई तो वे उसका मुकाबला जमकर कर सकेंगी। (नया इंडिया की अनुमति से)
-गोपाल राठी
आयुर्वेद भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है। हम सबने बचपन में इस पैथी से इलाज करवाया है। हमारे वैद्यराज अपने खरल में दवाई का चूर्ण बनाकर पुडिय़ा बनाकर देते थे। वैद्यराज इतने दक्ष होते थे कि नाड़ी देखकर रोग की गम्भीरता और रोगी की तासीर जानते थे और उसी अनुसार दवाई दी जाती थी। यह दवा किसी कम्पनी का उत्पादन नहीं होता था। हर वैद्य अपनी दवा स्वयं तैयार करता था। दवाई का कच्चा माल रखने और दवा को घोंटने पीसने के लिए जो कमरा होता था उसे रसायन शाला कहते थे। पिपरिया की मंगलवारा धर्मशाला में चलने वाले धर्मार्थ आयुर्वेदिक औषधालय में आज से 40-50 साल पहिले जिन्होंने भी स्व. वैद्य हरिनारायण तिवारीजी से इलाज करवाया हो वह दृश्य याद कर सकता है। एक स्थिति के बाद वे स्वयं डॉक्टरी इलाज (एलोपैथी) इलाज की सलाह दिया करते थे।
आयुर्वेद की जो सबसे बड़ी कमी यह रही कि उसमें समय-समय पर शोध और अनुसंधान की कोई परंपरा नहीं है। नई बीमारियों और चुनौतियों से निपटने की कोई दृष्टि नहीं रही। वे हर मर्ज का इलाज आयुर्वेद के हजारों साल पुराने उन ग्रंथों में खोजते रहे जो अब धर्मग्रंथ बन गए हैं।
इस कारण आयुर्वेद में आस्था रखने वाले भी अब आयुर्वेद के भरोसे नहीं हैं। गंभीर बीमारियों में कोई रिस्क नहीं लेना चाहता और सीधे डॉक्टर की शरण में जाता है। स्वयं रामदेव जब कोमा में गए तब और बालकृष्ण आचार्य जब बीमार हुए तब एम्स में ही भर्ती हुए थे। 19 शताब्दी की शुरुआत में स्वीडिश फ्लू में करोड़ों भारतीयों की मौत हुई। प्लेग, हैजा, चेचक, टीबी आदि अनेक महामारियों का प्रकोप रहा, पोलियो का जोर रहा, लेकिन इन सब बीमारियों के सामने आयुर्वेद असहाय सिद्ध हुआ। चिकित्सा जगत में वैक्सीन और एंटीबायोटिक का अविष्कार एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने मौत के मुंह में जा रही मानवता को बचाया, बस यही वो समय था जब भारतीय चिकित्सा पद्धति के विकल्प के रूप में आधुनिक चिकित्सा पद्धति का महत्व स्थापित हुआ।
सरकार किसी की भी रही हो सबने आधुनिक चिकित्सा पद्धति को महत्व दिया। बड़े-बड़े अस्पताल और अनुसंधान केंद्र बने, आयुर्वेद का महत्व सिर्फ उतना ही रह गया जितना देवभाषा संस्कृत का है, जो 6 से 10 वीं तक एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है, जिसे पढक़र ना कोई संस्कृत सीखता, ना समझता।
अगर आज कोई कोरोना मरीज आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज कराना चाहे तो नगर स्तर पर जिले स्तर पर और भोपाल स्तर पर ऐसा अस्पताल और वैद्य बताइए जहां जाकर वह भर्ती हो सके और आयुर्वेदिक उपचार से ठीक होने का भरोसा हो।
मध्यप्रदेश में 17 साल से भाजपा की सरकार है, उसने आयुर्वेदिक पद्धति के प्रसार के लिए क्या-क्या किया? जब मुख्यमंत्री कोरोना पॉजिटिव हुए थे तो वे किस आयुर्वेदिक संस्थान का ट्रीटमेंट ले रहे थे ?
भारत में आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली सौ-सौ साल पुरानी कम्पनियां और धर्मार्थ संस्थाएं हैं, सब अपनी दवा बेचते हैं जिनकी आस्था हो फायदा हो वो खरीदते हैं, लेकिन कभी किसी ने इतना हाय-तौबा नहीं मचाया। स्वदेशी ही खरीदनी है तो डाबर, बैद्यनाथ, झंडू जैसी दर्जनों सालों पुरानी और विश्वसनीय स्वदेशी कम्पनियां हैं। उनके उत्पाद खरीदे जा सकते हैं।
कृष्ण गोपाल कालेडा धर्मार्थ संस्थान की दवा सबसे सस्ती है, क्योंकि उनकी पैकिंग आकर्षक और फैंसी नहीं है। लेकिन गुणवत्ता में नम्बर एक है। इस संस्थान ने बहुत सारा आयुर्वेदिक साहित्य भी प्रकाशित किया है जो सस्ता है और उसे पढक़र आप स्वयँ अपने वैद्य बनकर अपना इलाज कर सकते हैं।
भारत में अभी भी रामदेव से बड़े, बहुत बड़े, आयुर्वेद के आचार्य जानकर और वैद्य मौजूद हैं, लेकिन कभी किसी ने एलोपैथी या किसी अन्य पैथी के खिलाफ ऐसा युद्ध नहीं छेड़ा, यह बाबा की बिजनेस स्ट्रेटजी है। लेकिन उसने कोरोना का यह गलत समय चुन लिया इसलिए खलनायक बन गया।
-कश्मीरा शाह चतुर्वेदी
सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल की घंटी का बटन दबाया। ऊपर बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा।
‘बीबी जी! सब्जी ले लो।’ बताओ क्या- क्या तोलना है। कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है क्या? सब्जी वाले ने कहा।
‘रुको भैया! मैं नीचे आती हूँ।’
महिला नीचे उतरकर आई और सब्जी वाले के पास आकर बोली- ‘भैया! तुम हमारे घर की घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।’
‘कैसी बात कर रही हैं बीबी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी?’ सब्जी वाले ने कहा।
‘नहीं भैया! उनके पास अब कोई काम नहीं है। किसी तरह से हम लोग अपने आपको जिंदा रखे हुए हैं। जब सब ठीक हो जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे, तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी। मैं किसी और से सब्जी नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है ! उन्हें अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है। इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।’ इतना कहकर महिला अपने घर में वापिस जाने लगी।
‘बहन जी! तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से आपको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे, तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे। अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे? सब्जी वाले हैं! कोई नेताजी तो है नहीं कि वादा करके छोड़ दें। रुके रहो दो मिनिट।’
और सब्जी वाले ने एक थैली के अंदर टमाटर, आलू, प्याज, घीया, कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया ।
महिला हैरान थी... उसने तुरंत कहा- ‘भैया! तुम मुझे उधार सब्जी दे रहे हो, कम से कम तोल तो लेते और मुझे पैसे भी बता दो। मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी। जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।’ महिला ने कहा।
‘वाह! ये क्या बात हुई भला? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी-भाँजे से पैसे नहीं लेता है और बहिन, मैं कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ। ये सब तो यहीं से कमाया है, इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुडिय़ा के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी। बच्चों का खूब ख्याल रखना, ये बीमारी बहुत बुरी है और आखिरी बात भी सुन लो, ‘घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।’ इतना कहकर सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं।
महिला की आँखें मजबूरी की जगह स्नेह के आंसुओं से भरी हुईं थीं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नेपाल की सरकार और संसद एक बार फिर अधर में लटक गई है। राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने अब वही किया है, जो उन्होंने पहले 20 दिसंबर को किया था याने संसद भंग कर दी है और 6 माह बाद नवंबर में चुनावों की घोषणा कर दी है। याने प्रधानमंत्री के.पी. ओली को कुर्सी में टिके रहने के लिए अतिरिक्त छह माह मिल गए हैं। जब पिछले 20 दिसंबर को संसद भंग हुई थी तो नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय को गलत बताया और संसद को फरवरी में पुनर्जीवित कर दिया था लेकिन ओली उसमें अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर सके।
पिछले तीन महीने में काफी जोड़-तोड़ चलती रही। काठमांडो जोड़-तोड़ और लेन-देन की मंडी बनकर रह गया। कई पार्टियों के गुटों में फूट पड़ गई और सांसद अपनी मनचाही पार्टियों में आने और जाने लगे। इसके बावजूद ओली ने अभी तक संसद में विश्वास का प्रसताव नहीं जीता और अपना बहुमत सिद्ध नहीं किया।
संसद में जब विश्वास का प्रस्ताव आया तो ओली हार गए। राष्ट्रपति ने फिर नेताओं को मौका दिया कि वे अपना बहुमत सिद्ध करें लेकिन सांसदों की जो सूचियां ओली और नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा ने राष्ट्रपति को दीं, उनमें दर्जनों नाम एक-जैसे थे। याने बहुमत किसी का नहीं था। सारा मामा विवादास्पद था। ऐसे में राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी किसे शपथ दिलातीं? उन्होंने संसद भंग कर दी और नवंबर में चुनावों की घोषणा कर दी।
अब विरोधी दलों के नेता दुबारा सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेंगे। उन्हें पूरा विश्वास है कि न्यायालय दुबारा इसी संसद को फिर से जीवित कर देगा। उनकी राय है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय दुबारा संसद को जीवित नहीं करेगा और ओली सरकार इस्तीफा नहीं देगी तो उसके खिलाफ वे जन-आंदोलन चलाएंगे। दूसरे शब्दों में अगले पांच-छह महिनों तक नेपाल में कोहराम मचा रहेगा, जबकि कोरोना से हजारों लोग रोज पीडि़त हो रहे हैं। नेपाल की अर्थ-व्यवस्था भी आजकल डांवाडोल है।
वे मांग कर रहे हैं कि नेपाल की राष्ट्रपति को या तो नया प्रधानमंत्री नियुक्त करके संसद में उससे बहुमत सिद्ध करने के लिए कहना था या कोई संयुक्त सरकार बना देनी थी, जो निष्पक्ष चुनाव करवा सकती थी। अब कार्यवाहक प्रधानमंत्री की तौर पर ओली चुनाव आयोग को भी काबू करने की कोशिश करेंगे। वैसी ओली ने चुनाव आयोग से निष्पक्ष चुनाव करवाने की मांग की है। विपक्ष के नेता राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी और ओली पर मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। ओली की कृपा से ही वे अपने पद पर विराजमान हुई हैं। इसीलिए वे ओली के इशारे पर सबको नचा रही हैं।
इस आरोप में कुछ सत्यता हो सकती है लेकिन सवाल यह भी है कि यदि विपक्ष की सरकार बन भी जाती तो वह जोड़-तोड़ की सरकार कितने दिन चलती ? इससे बेहतर तो यही है कि चुनाव हो जाएं और नेपाली जनता जिसे पसंद करे, उसी पार्टी को सत्तारुढ़ करवा दे। कोरोना के इस संकट के दौरान चुनाव हो पाएंगें या नहीं, यह भी पक्की तौर पर नहीं कहा जा सकता। नेपाली राजनीति बड़ी मुश्किल में फंस गई है।
(नया इंडिया की अनुमति से)


