विचार/लेख
-तारन प्रकाश सिन्हा
बाढ़ जैसे-जैसे उतरती है, तबाही का असली मंजर वैसे-वैसे प्रकट होने लगता है। कोरोना की नदी भी उतर रही है। चरम को छूकर संक्रमण दर लगातार कम हो रही है। छत्तीसगढ़ में यह 6 प्रतिशत से नीचे आ चुकी है। नये संक्रमितों का आंकड़ा भी 3 हजार प्रतिदिन के आस-पास आ चुका है। उम्मीद है कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। हम अपनी सामान्य दिनचर्या की ओर लौट आएंगे।...लेकिन तब क्या सचमुच सब कुछ सामान्य हो चुका होगा ?
बाढ़ के उतरने के बाद के बाद भी जो वृक्ष बचे रह जाते हैं, उनकी शाखाओं में बरबादी का कहानियां अटकी रह जाती हैं।
हम सबको अकल्पनीय पीड़ाएं देकर कोरोना लौट रहा है। संक्रमण में सिर से पांव तक डूबे रहने के बाद हमारे जीवन की शाखाएं फिर प्रकट होने लगी हैं। इन शाखाओं में उन जिंदगियों की निशानियां रह गई हैं, जो अब कभी प्रकट नहीं होंगी। छत्तीसगढ़ में ही कोरोना ने हम सबसे 12 हजार से ज्यादा लोगों को छीन लिया। ये हजारों लोग जिस दिन इस धरती पर आए रहे होंगे, धरती ने उनके आने की खुशियां मनाई होगी। इनकी विदाई में उसी धरती के आंसू कम पड़ गए।
एक जीवन का मिट जाना केवल एक व्यक्ति का चले जाना नहीं होता। यह एक दुनिया का तबाह हो जाना होता है। ऐसे ही हजारों-लाखों दुनियाओं से मिलकर एक पूरी-दुनिया बनती है।
जो लोग चले गए, वे अपने पीछे उजड़ी हुई दुनिया छोड़ गए हैं- बिलखती हुई माताएं, रोती हुई बहनें, अनाथ हो चुके बच्चे। इन छूटे हुए लोगों के सामने अब जीवन के नये सवाल उपस्थित हैं। घर का कमाने वाला चला गया, तो घर कैसे चलेगा। बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी। बेटियों और बहनों का ब्याह कैसे होगा। बुजुर्गों की देखभाल कैसे होगी....ये दुख अपनों को खो देने से कहीं ज्यादा बड़ा है।
कोरोना-संकट का हम सबने मिलकर सामना किया है। समाज ने सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस चुनौती का मुकाबला किया है। हम जीत रहे हैं, लेकिन इस जीत के बाद हमें जश्न मनाने की इजाजत यह समय नहीं देने वाला। तब हमारी लड़ाई दूसरे मोर्चे पर शुरू हो चुकी होगी, और जाहिर है कि हम इसके लिए तैयार भी हैं।
बचे हुए लोगों को बचाए रखना तभी संभव हो पाएगा, जब हम पुरानी गलतियों को न दोहराएं। कोरोना एप्रोप्रिएट बिहेवियर का ध्यान रखें, ताकि संक्रमण को दुबारा फैलने से रोका जा सके। टीकाकरण के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित करें, ताकि हम सबको एक मजबूत सुरक्षा कवच मिल सके। चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि इस वायरस की वापसी गांवों की गलियों और सड़कों से हो रही है, जहां अशिक्षा और अज्ञानता का अंधकार है। हमें वहां भी रौशनी करनी होगी। छत्तीसगढ़ में टीकाकरण अब काफी तेजी हो रहा है। शासन ने पंजीकरण की प्रक्रिया को आसान करने के लिए सीजी-टीका पोर्टल भी तैयार किया है। ज्यादा से ज्यादा लोग टीकाकरण करवाएं, यह जिम्मेदारी हम सबको उठानी पड़ेगी, ताकि बचे हुओं को बचाया जा सके।
कोरोना-संकट ने हम सबको मानसिक रूप से भी चोट पहुंचाई है। समाज इस समय सामूहिक अवसाद का सामना कर रहा है। जो लोग कोरोना-मुक्त हो चुके हैं, उन्हें पोस्ट-कोविड इफेक्ट झेलना पड़ रहा है। कोरोना के समानांतर अब ब्लैक-फंगस के संक्रमण जैसी चुनौतियां भी उपस्थित हो रही हैं। लॉकडाउन का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर होना ही था। हजारों लोगों का व्यवसाय चौपट हो चुका है। सैकड़ों लोग रोजगार गंवा चुके हैं। बच्चों से उनका बचपन ही छिन गया है। और भी बहुत कुछ....इसीलिए संक्रमण-दर में कमी की खबरें हमारे लिए केवल एक फौरी राहत हैं, असल चुनौतियों से उबरने के लिए हमें अभी बहुत कुछ करना होगा।
हमने अब तक जैसे एक-दूसरे का हाथ कसकर थाम रखा है, वैसे ही आगे भी कस कर थामे रखना होगा। अनाथ हो चुके बच्चों, उजड़ चुके परिवारों को संभालने के लिए हमें मिलजुलकर कुछ करना होगा। छत्तीसगढ़ शासन ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है। कोरोना की वजह से जिन बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया है, छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी पढ़ाई का खर्च उठाने का निर्णय लिया है, साथ ही इन बच्चों को छात्रवृत्ति भी देने की घोषणा की है, चाहे ये बच्चे किसी भी स्कूल में पढ़ते हों। उन बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा भी सरकार लेगी जिनके परिवार के कमाने वाले सदस्य को कोरोना ने छीन लिया है। यदि ऐसे बच्चे स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल में प्रवेश के लिए आवेदन करते हैं तो उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी, उनसे कोई फीस नहीं ली जाएगी। छत्तीसगढ़ के प्राइवेट स्कूलों ने भी एक संवेदनशील पहल करते हुए उन बच्चों की फीस माफ करने का निर्णय लिया है, जिनसे कोरोना ने उनके माता-पिता को छीन लिया है।
ये बच्चे हमारे भविष्य की धरोहर हैं, इन्हें सहेजना-संवारना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। इसी तरह की दृष्टि और संवेदना की जरूरत प्रत्येक क्षेत्र में है। न केवल बच्चों के लिए, बल्कि कोरोना से बरबाद हो चुकी हरेक जिंदगी के लिए भी।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमास और इस्राइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फलस्तीनियों और इस्राइली पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फलस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फलस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इस्राइल राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फलस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं।
वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इस्राइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके। यदि इस्राइल के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-डॉ. परिवेश मिश्र
मेरे मित्र हैं श्री गिरीश केशरवानी। पत्रकार हैं। युवा हैं। भाजपा के समर्थक हैं (और संभवत: आर.एस.एस. से संबद्ध हैं)। वैचारिक रूप से मित्र गिरीश तथा मैं विपरीत ध्रुवों पर रहे हैं किन्तु मैं उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का सम्मान करता हूं।
उनकी एक पोस्ट है जिसका सार संक्षेप कुछ यूं है : 1991 में देश की डूबती आर्थिक नैया को बचाने के लिये वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री नरसिंहराव को रुपये के अवमूल्यन का सुझाव दिया। केबिनेट में विरोध की संभावना थी सो नरसिंहरावजी ने पहले अटल बिहारी वाजपेयीजी को विश्वास में लिया। अटलजी ने देश हित में कांग्रेस सरकार का साथ दिया और अवमूल्यन हो सका। इसके विपरीत वर्तमान में नोटबंदी और कोरोना जैसी स्थिति में वही कांग्रेस सरकार के विरोध में दिख रही है, जोकि उचित नहीं है, आदि।
गिरीशजी ने बहुत सी बातें याद दिला दीं।
श्री नरसिंहराव या/और अटलजी ने कुछ नया या अनूठा नहीं किया था। देश को प्रभावित करने वाला एक बड़ा फैसला लेने से पूर्व विपक्ष को विश्वास में लिया गया यह अच्छा कदम था। यहां दो बातें स्पष्ट होती हैं। यदि श्री अटल बिहारी का समर्थन मिला तो सिर्फ इसलिए क्योंकि श्री नरसिंहराव और वे, दोनों की स्पष्ट राय थी कि निर्णय देश के व्यापक हित में है। (वाजपेयी का समर्थन मिलने से कैबिनेट के संभावित विरोध पर पानी फिरता हो ऐसा नहीं था)। देश हित का बड़ा निर्णय अकेले लेकर ‘श्रेय’ की अकेले दावेदारी का अवसर श्री राव के सामने था किन्तु उन्होंने वही किया जो राजधर्म था।
श्रीमती इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के लिए हुए युद्ध से पूर्व तत्कालीन जनसंघ समेत सभी विपक्षी दलों को विश्वास में लिया था।
1980 के दशक में श्री अटल बिहारी वाजपेयी किडनी की बीमारी से जूझने के बाद 1985 में एक किडनी गवां चुके थे। कुछ समय में दूसरी भी जवाब देने लगी। श्री वाजपेयी का जीवन संकट में आ गया था। 1988 में श्री राजीव गांधी को इस बात की जानकारी मिली। उन दिनों लोकसभा में कांग्रेस के 410 और भाजपा के 2 (दो) सदस्य थे। अटलजी 1985 में ग्वालियर में सिंधिया के हाथों लोकसभा चुनाव हारने के बाद राज्यसभा में पहुंचे थे। राजीवजी ने अटलजी को अपने कार्यकाल में बुलाकर बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजे जा रहे भारतीय प्रतिनिधिमंडल में वे उन्हे (अटलजी को) बतौर सदस्य शामिल कर रहे हैं। राजीवजी ने आगे बताया कि उनके इलाज की व्यवस्था कर दी गयी है। साथ ही राजीवजी ने अधिकारियों को हिदायत दी कि यूएन का सत्र जब कभी भी समाप्त हो अटलजी तभी लौटेंगे जब उनका इलाज पूरा हो जाए। उम्र में 20 वर्ष बड़े अटलजी को राजीवजी अपना बड़ा भाई मानते हुए वैसा ही सम्मान देते थे।
राजीवजी के जीतेजी यह सब बातें कभी बाहर नहीं आयीं। राजीवजी की हत्या के बाद स्वयं अटलजी ने ही अपने साक्षात्कार में यह सब बताया था। अटलजी के शब्द थे ‘यदि मैं आज जीवित हूं तो राजीव गांधी के कारण’। उनका यह साक्षात्कार ‘द अनटोल्ड वाजपेयी : पॉलिटिशियन एन्ड पैराडॉक्स’ में उद्धृत है।
कोई ऐसा निर्णय जो देश की समूची जनता को प्रभावित करता हो, उसे लेने से पूर्व प्रधानमंत्री के द्वारा विपक्षी नेताओं को विश्वास में लेने तथा आपस में मधुर संबंध बनाये रखने तथा एक दूसरे के प्रति आदर भाव एवं प्रेमपूर्ण रिश्ते बनाए रखने की परम्परा भारत में हमेशा से रही है। जहां पहले संभव न हो पाया वहां निर्णय लेने के बाद विपक्ष को उसकी आवश्यकता और उसके औचित्य का विवरण देने का प्रयास किया गया। 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यही किया था।
23 जून 1981 के दिन इंदिराजी को सूचना मिली कि उनके घर से कुछ ही दूरी पर बेटे संजय गांधी का प्लेन क्रैश हुआ है। तत्काल वे दुर्घटनास्थल पर पहुंचीं। उस समय फायर ब्रिगेड वाले बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुके शरीर को विमान के मलबे में से निकालकर एम्बुलेंस में रख रहे थे। इंदिराजी उसी एम्बुलेंस में बैठ कर राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचीं। सूचना पाकर उसी समय अटलजी और चंद्रशेखरजी भी इंदिराजी को सांत्वना देने अस्पताल पहुंचे। चंद्रशेखरजी को देखते ही इंदिराजी उन्हें एक तरफ ले गयीं और कहा : ‘अच्छा हुआ आप मिल गये। मैं बहुत दिनों से आप से बात करना चाह रही थी। असम में हालात ठीक नहीं हैं। आपसे सलाह करना है।’
चंद्रशेखरजी अवाक रह गये। वे जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। उस पार्टी के जिसे कुछ माह पूर्व चुनाव में हराकर इंदिराजी ने सत्ता में वापसी की थी। इस तरह का परस्पर संवाद अजूबा नहीं था। चूंकि इस घटना की पृष्ठभूमि असाधारण थी (जवान बेटे के शव को डॉक्टरों को सौंपने के तत्काल बाद एक मां से बात हो रही थी) इसलिए इसकी जानकारी बाहर आयी। अन्यथा कुछ भी असामान्य नहीं था।
विपक्ष को विश्वास में लेने की परम्परा के जनक श्री जवाहरलाल नेहरू थे। सामूहिकता के सिद्धांत के पालन में तो वे बाकी से अनेक कदम आगे थे। गांधीजी की समझाईश थी कि 1947 में स्वतंत्रता के बाद जो सरकार बन रही थी वह देश की थी। अकेले कांग्रेस की नहीं। हालांकि संविधान सभा (इसके लिए देश में चुनाव हुए थे) में कांग्रेस के पास 82% का बहुमत था।
14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद रात में नेहरू जी ने अपने 14 सदस्यीय मंत्रिमंडल की सूची गवर्नर जनरल को सौंपी। 15 की सुबह 8 बजे शपथ ग्रहण हुआ। नेहरू और पटेल के अलावा बाकी 12 सदस्यों के नामों ने सबको आश्चर्य में डाल दिया। इनमें तीन मंत्री थे जो न केवल कांग्रेस के सदस्य नहीं थे बल्कि कांग्रेस के घोर आलोचक रहे थे। बाकी 9 में से 5 अन्य व्यक्ति भी कांग्रेस से बाहर के थे।
नेहरू ने हिन्दू महासभा के श्यामाप्रसाद मुखर्जी, भीमराव अम्बेडकर, जस्टिस पार्टी के आर के शन्मुखम चेट्टी, अकाली दल के सरदार बलदेव सिंह, राजकुमारी अमृत कौर, पारसी उद्योगपति व्यवसायी सी.एच. भाभा तथा एन. गोपालस्वामी आयंगर को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) और राममनोहर लोहिया ने शामिल होने का आमंत्रण स्वीकार नहीं किया था।
एक वर्ष बीतते ही वित्त मंत्री श्री चेट्टी को मंत्रीमंडल छोडऩा पड़ा। (क्यों जाना पड़ा यह एक महत्वपूर्ण किन्तु अलग कहानी है)। उनकी जगह नेहरू ने बंगाल से हिन्दू महासभा के श्री के.सी. नियोगी को वित्तमंत्री बनाया।
अब आते हैं वर्तमान पर। मित्र गिरीशजी की पोस्ट पर। नोटबंदी एक ऐसा फैसला था जो भारत की शत-प्रतिशत जनता को प्रभावित करता था (किया भी)। वही हाल कोरोना में भी था। श्री नरेन्द्र मोदी ने इन दोनों अवसरों पर विपक्ष को विश्वास में लेने आवश्यक नहीं समझा।
लोकतंत्र में जो राज करता है वह पूरी/शत-प्रतिशत जनता के द्वारा चुना हुआ या वोट प्राप्त नहीं होता। पचास प्रतिशत भी हो जरूरी नहीं। भाजपा ने 2014 और 2019 में चुनाव जीते। दोनों बार उसे देश के 30 प्रतिशत के आस-पास लोगों ने वोट दिया। ‘जन-मत’ और ‘मैन्डेट’ जैसे भारी भरकम शब्दों का जितना भी प्रयोग हो, सच्चाई यह रही कि देश के 70 फीसदी लोग मोदीजी को नहीं चाहते थे।
ऐसी स्थिति में उन 70 फीसदी लोगों की नुमाईन्दगी करने वाली पार्टियों और नेताओं को विश्वास में लेना तो समझदारी ही मानी जाती।
ऐसे मौकों पर प्रधानमंत्री जी थोड़ा बड़प्पन क्यों नही बताते भाई ? यदि बताते तो क्या हुआ होता : जनवरी-फरवरी में भाजपा उन्हे (तथा वे स्वयं को) कोरोना को शिकस्त देने वाले विश्व के एकमात्र नेता का खिताब दे रहे थे। वैसा करने में शायद परेशानी हुई होती यदि विपक्ष के सहयोग से कोरोना का सामना किया होता। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि दूसरी वेव की घोर असफलता का पूरा ठीकरा अकेले मोदी जी के सिर न फूटता।
मेरा मानना है लोकतंत्र के मैदान में चुनाव एक खेल है जिसमें जीत हार होती रहती है। आज का जीता कल का हारा हो ही सकता है। मैदान को हारने वाली टीमों से मुक्त-विमुक्त-विलुप्त-नेस्तनाबूद करने का सपना देखने या ऐसी दुआएं करने वाली टीम आगे किस के साथ खेल आगे बढ़ाएगी? विपक्ष का अस्तित्व तो पक्ष के लिए भी जरूरी है।
साथ ही, यदि खेल के मैदान प्रभावित हो रहा हो तो जीतने वाले का कर्तव्य है कि हारी हुई टीमों से सहयोग प्राप्त करे।
- बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राजीव गांधी को गए, आज तीस साल हो रहे हैं। 21 मई 1991 की वह रात मुझे आज भी ज्यों की त्यों याद है। उन दिनों मैं पीटीआई (भाषा) का संपादक था। अपने दफ्तर से मैं रात को घर पहुँचा और सोने के लिए बिस्तर पर लेटा ही था कि श्रीपेरेम्बदूर से हमारे संवाददाता का फोन लगभग सवा दस बजे आया कि राजीव गांधी की यहाँ हत्या हो गई है। मैंने उससे कहा कि आप होश में तो हैं ? आप क्या बोल रहे हैं ? उन्होंने अपनी बात फिर दोहराई और कहा कि मैं यही खड़ा हूँ। राजीवजी का सिर फट गया है। खून में लथपथ हैं। अब कुछ बचा नहीं है। यह सुनते ही मैंने अपने दफ्तर फोन किया और जो कपड़े पहने थे, उनके साथ ही मैं संसद मार्ग पर स्थित अपने दफ्तर के लिए निकल पड़ा। मेरे बेटे सुपर्ण ने 100 की स्पीड पर कार भगाई और कुछ ही मिनिट में प्रेस एनक्लेव से दफ्तर पहुँच गया।
वहाँ मुश्किल से मैं पाँच-सात मिनिट रुका और 10, जनपथ पहुँच गया। राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद वहीं रहते थे। 10, जनपथ पर एकदम अंधेरा था। मेरा बेटा कार को अंदर तक ले गया। मैंने घंटी बजाई। प्रियंका बाहर निकली। उसने मुझे उस समय वहाँ देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। ज्यों ही मैं अपना नाम बताने लगा, सोनियाजी अंदर से बाहर आ गईं। मुझे देखते ही वे पूछने लगीं कि आप इस वक्त यहाँ कैसे ? मैंने उन्हें सिर्फ इतना ही बताया कि श्रीपेरम्बदूर में राजीव जी के साथ कुछ दुर्घटना हो गई है। आपको कुछ पता चला क्या ? मैं अपने दफ्तर से मालूम करके आपको सारी बात बताता हूँ। हम बात कर ही रहे थे कि इतने में चैन्नई से चिदंबरम का फोन आया और उन्होंने सोनियाजी को सारी बात बता दी। इस बीच शायद टीवी चैनलों ने भी खबर जारी कर दी थी। देखते-ही देखते 10 जनपथ पर नेताओं की भीड़ जमा हो गई। थोड़ी ही देर में राष्ट्रपति वेंकटरमन भी आ गए।
सुरक्षाकर्मियों ने मेरे बेटे से अपनी कार बाहर ले जाने के लिए कहा। वेंकटरमनजी की कार ज्यों ही अंदर घुसी, कई कार्यकर्ताओं ने उसका शीशा तोड़ दिया। श्री सीताराम केसरी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी की तरफ से अखबारों को श्रद्धांजलि भेजी जाए। श्री रमेश भंडारी ने लंबा ड्राफ्ट तैयार किया। केसरीजी ने उसे रद्द कर दिया। उन्होंने मुझे कहा कि आप ही एक संक्षिप्त भावपूर्ण श्रद्धांजलि तैयार करके पीटीआई से जारी करवा दीजिए। उधर सोनियाजी ने तमिलनाडु पहुंचने की तैयारी की और सुबह तक नेता लोग 10, जनपथ पर आते रहे। मैंने वहीं से अपने मित्र नरसिंहरावजी को फोन किया।
राव साहब उस रात मेरे साले रमेशजी और रागिनीजी के घर नागपुर में भोजन कर रहे थे। वे हतप्रभ रह गए। दूसरे दिन सुबह वे दिल्ली पहुँचे। हम दोनों दोपहर को डेढ़-दो घंटे साथ रहे। उसी दिन सुबह प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी, चौधरी देवीलालजी और मैं राष्ट्रपति भवन परिसर में चौधरी साहब के घर पर विचार-विमर्श करते रहे। चंद्रशेखरजी कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे। उन दिनों चुनाव चल रहे थे। चुनाव के दौरान ही श्रीलंका के तमिल उग्रवादियों ने श्रीपेरम्बदूर में राजीवजी की हत्या कर दी थी। (नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘फांकि’ कविता पर लिखते हुए मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि गुरुदेव और उनकी यह कविता इतिहास की अनेक गुमनाम विथिकाओं में मुझे बहुत दूर तक अपने साथ बहा ले जायेंगी, जहां से सही सलामत लौट आना मेरे तथा मेरे जैसे संवेदनशील पाठकों के लिए एक दुष्कर कार्य सिद्ध होगा।
गुरुदेव की ‘फांकि’ कविता के बिना छत्तीसगढ़ की खोज मेरे लिए संभव नहीं था। यह सत्य है कि कोई भी राष्ट्र या राज्य अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजे बिना राष्ट्र या राज्य का वास्तविक रूप नहीं ले सकता है।
‘फांकि’ कविता हमारे इस नए प्रदेश के लिए जो बीस वर्ष का युवा हो चुका है, केवल एक मूल्यवान कविता भर नहीं है, बल्कि एक मूल्यवान धरोहर भी है।
गुरुदेव का इस प्रदेश की भूमि पर पग रखना ही छत्तीसगढ़ के गौरव को विश्व क्षितिज पर प्रतिष्ठित कर देना है।
बहुत सारे मित्रों ने मुझसे कहा कि वे अभी तक गुरुदेव और ‘फांकि’ कविता के प्रभाव से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाएं हैं और वे जल्द ही इससे मुक्त होना भी नहीं चाहते हैं, इसलिए मैं किसी नई कड़ी का प्रारंभ अभी न शुरू करूं। वे चाहते थे कि दो तीन सप्ताह के लिए मैं छत्तीसगढ़ एक खोज को स्थगित कर दूं।
छत्तीसगढ़ एक खोज पहली कड़ी से लेकर सत्रहवीं कड़ी तक प्रत्येक रविवार को मेरे फेसबुक पर और ‘दैनिक छत्तीसगढ़’ तथा ‘आज की जनधारा’ में जगह पाता रहा है। नियमानुसार प्रत्येक शुक्रवार तक मैं इसे लिख भी लेता हूं, भले ही इसके लिए मुझे अन्य कार्यों को स्थगित करना पड़े।
इसलिए मुझे लगा कि दो तीन सप्ताह तक इसे मैं स्थगित रखूं, यह उन सबके प्रति एक तरह से ज्यादती होगी जो मेरी तरह छत्तीसगढ़ की खोज में लगे हुए हैं।
सो सिलसिला अविराम जारी है दोस्तों।
पता नहीं छत्तीसगढ़ की उर्वर भूमि में ऐसा कौन सा प्रबल आकर्षण छिपा हुआ है कि देश के अनमोल रत्न छत्तीसगढ़ की भूमि की ओर खींचे चले आते हैं।
छत्तीसगढ़ की भूमि केवल रत्नगर्भा ही नहीं है, दूसरे राज्य के रत्नों को भी चुंबकीय शक्ति से अपनी ओर खींच लाने की शक्ति रखने वाली अलौकिक भूमि भी है। यह छत्तीसगढ़ के साथ-साथ कोशल और महाकोशल भी है। जहां कोई साधारण नदी नहीं, अपितु महानदी जैसी नदी बहती है। महानदी जिसे हमारे आदि ऋषि मुनियों ने चित्रोत्पला की संज्ञा से विभूषित किया था।
स्वामी विवेकानन्द, हरिनाथ डे, रवींद्रनाथ ठाकुर, विभूतिभूषण बंदोपाध्याय जैसी विभूतियां यों ही छत्तीसगढ़ नहीं आ गए थे।
इसी तरह की एक और विभूति थे ठाकुर जगमोहन सिंह। आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनन्यतम सखा और विजयराघवगढ़ रियासत के होनहार राजकुमार ठाकुर जगमोहन सिंह।
विजयराघवगढ़ कोई साधारण रियासत नहीं थी। हमारे इस कड़ी के महानायक राजकुमार ठाकुर जगमोहन सिंह किसी साधारण रियासत के कोई साधारण राजकुमार नहीं थे, अपितु विजयराघवगढ़ जैसी एक ऐसी रियासत का प्रतिनिधित्व करने वाले राजकुमार थे, जिस रियासत ने 1857 की क्रांति में बढ़-चढक़र हिस्सा लिया था।
सन 1857 की क्रांति की चिंगारी मेरठ, झांसी, जबलपुर होते हुए विजयराघवगढ़ पहुंच गई थी। सन 1857 में विजयराघवगढ़ रियासत के राजकुमार सोलह वर्षीय ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह थे।
ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह अभी किशोर ही थे, ठीक से युवा भी नहीं हुए थे लेकिन स्वतंत्रता की चिंगारी उनके भीतर दावानल की भांति सुलगने लगी थी। वे दूसरी रियासतों के राजकुमार की तरह अंग्रेजों की जी हुजूरी करने और उनकी गुलामी में जीने के लिए नहीं पैदा हुए थे।
सो उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया। मात्र सोलह वर्षीय राजकुमार ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह ने झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, कुंवर सिंह और तात्या टोपे का मार्ग चुना। यह मार्ग था। देश की स्वतंत्रता के लिए मर मिटने का। किशोर राजकुमार के मन में देशप्रेम और देश की स्वतंत्रता से बढक़र और कुछ नहीं था। पर इतिहास में कुछ और लिखा हुआ था। देश की कई रियासतों ने देश के साथ गद्दारी की। उन्होंने अंग्रेजों के सामने घुटने टेक दिए थे। सन 1857 की क्रांति भी अपनी नियत समय से पहले ही प्रारंभ हो गई थी। देश अभी पूरी तरह से इस क्रांति के लिए तैयार भी नहीं हुआ था। इसलिए सन 1857 की क्रांति विफल हो गई।
राजकुमार ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह भी अंग्रेज सरकार द्वारा बंदी बना लिए गए। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें काला पानी की सजा सुनाई।
सरयू सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत में सजा भोगने से बेहतर अपने प्राणों का उत्सर्ग कर लेना उचित समझा। उन्होंने आत्महत्या कर अपनी देह लीला समाप्त कर ली।
ऐसे वीर और क्रांतिकारी राजकुमार ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह के सुपुत्र हैं, हमारी इस कड़ी के महानायक ठाकुर जगमोहन सिंह।
ठाकुर सरयू सिंह की मृत्यु के पश्चात् विजयराघवगढ़ की रियासत अंग्रेजों के अधीन हो गई। ठाकुर जगमोहन सिंह के नौ वर्ष पूर्ण होने पर सन् 1866 में पढऩे के लिए बनारस स्थित क्वींस कॉलेज भेजा गया।
ठाकुर जगमोहन सिंह बचपन से ही मेधावी एवं प्रतिभाशाली छात्र थे। मात्र चौदह वर्ष की उम्र में ही उन्होंने महाकवि कालिदास कृत ‘गंगाष्टक’ तथा अपनी मौलिक कविता ‘द्वादश मासी’ को एक साथ एकत्र कर ‘प्रेम रत्नाकर’ के नाम से सन 1873 में बनारस प्रिंटिंग प्रेस से प्रकाशित करवाया।
क्वींस कॉलेज बनारस में अध्ययन के दरम्यान ही पंद्रह वर्ष की अल्पायु में उन्होंने कालिदास के सुप्रसिद्ध काव्य ‘ऋतु संहार’ का संस्कृत से हिंदी में न केवल अनुवाद किया अपितु सन 1875 में उसे प्रकाशित भी करवा लिया।
सन 1878 में क्वींस कॉलेज बनारस से शिक्षा पूरी कर वे विजयराघवगढ़ वापस लौटे। तब तक वे संस्कृत, हिंदी तथा अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य में निष्णात हो चुके थे।
दो वर्षों तक विजयराघवगढ़ में बिताने के पश्चात सन 1880 में उनकी तहसीलदार के पद पर नियुक्ति हो गई। तहसीलदार के रूप में उनकी पहली पदस्थापना छत्तीसगढ़ के धमतरी में हुई।
(शेष अगले हफ्ते...)
शुक्रवार को सुंदरलाल बहुगुणा के निधन के साथ हिमालय में पर्यावरणीय संघर्ष और चेतना के एक अध्याय का समापन हो गया.
डॉयचे वैले पर हृदयेश जोशी की रिपोर्ट
93 साल के सुंदरलाल कोरोना से पीड़ित थे और पिछली 8 मई को उन्हें ऋषिकेश के एम्स में भरती किया गया था. बहुगुणा को सत्तर के दशक में उत्तराखंड में चले चिपको आंदोलन से जुड़े होने के कारण "चिपको” नेता के नाम से जाना जाता है लेकिन आमजन और पर्यावरण के लिए उनके संघर्ष की कहानी की तो यह बहुत छोटी कड़ी है.
सच्चे गांधीवादी
नौ जनवरी 1927 को उत्तराखंड के टिहरी ज़िले के मरूड़ा गांव में जन्मे बहुगुणा का जीवन पर्यावरण, राजनीति, समाज सेवा और पत्रकारिता समेत बहुत सारे अनुभवों को समेटे था. उनकी समझ गांधी के विचारों से प्रेरित थी. उन्होंने 13 साल की उम्र में आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया. किशोरावस्था में कौसानी में गांधी सरला बहन के आश्रम में उनका वक्त गुजारा और वहीं उनकी चेतना विकसित हुई. यह गांधी का प्रभाव ही था कि बहुगुणा ने अपने पूरे जीवन में इस बात के लिये प्रयत्न किया कि कथनी और करनी में अंतर ना हो. वह अपना छोटे से छोटा काम भी स्वयं ही करते और जब उनकी पर्यावरणीय चेतना विकसित हुई तो उन्होंने एक सस्टेनेबल और प्रकृति के अनुरूप जीवन शैली अपनाई.
बहुगुणा ने एक बार कहा, "मैं चावल नहीं खाता क्योंकि धान की खेती में बहुत पानी की खपत होती है. मुझे पता नहीं कि इससे पर्यावरण संरक्षण की कोशिश कितनी मजबूत होगी लेकिन मैं प्रकृति के साथ सहजीविता के भाव के साथ जीना चाहता हूं ताकि कोई अपराध बोध न हो.”
युवावस्था में बहुगुणा ने स्यालरा में पर्वतीय जन जीवन मंडल की स्थापना की और दलित बच्चों और बालिकाओं को शिक्षित करने का काम शुरू किया. उन्होंने उत्तराखंड के बूढ़ा केदार में दलित परिवारों के साथ जीवन बिताया. एक ही घर में सोये और भोजन किया. यह वह दौर था जब जाति की बेड़ियां बहुत मजबूत थीं और और गांधीवादी छुआछूत के खिलाफ संघर्ष तेज कर रहे थे.
इसी दौर में उनकी मुलाकात सामाजिक कार्यकर्ता विमला नौटियाल से हुई जो उत्तर भारत के जाने-माने नेता विद्यासागर नौटियाल की बहन भी हैं. साथ में काम करते हुये दोनों ने जीवन साथ बिताने का फैसला किया. बहुत से लोगों को लगता है कि विमला नौटियाल ने विवाह से पहले ही सुंदरलाल को राजनीति के बजाय समाजसेवा के लिये प्रेरित किया.
कांग्रेस नेता और उत्तराखंड के गांवों में वनाधिकार आंदोलन चला रहे किशोर उपाध्याय कहते हैं, "वो पत्रकार भी रहे. यूएनआई और पीटीआई के लिये रिपोर्टिंग की. उन्होंने श्रीनगर (गढ़वाल) से अरुणाचल तक की पैदल यात्रा की. उन पर विनोबा भावे का बड़ा प्रभाव था लेकिन अगर वह राजनीति में बने रहते तो वह पंडित गोविन्दबल्लभ पन्त के बाद या हेमवती नंदन बहुगुणा से पहले यूपी के मुख्यमंत्री बन गये होते.”
पर्यावरण संरक्षण को दिया नया आयाम
सत्तर के दशक में सुंदरलाल बहुगुणा का दिया एक नारा लोगों की चेतना का आधार बना:
क्या हैं जंगल के उपकार,
मिट्टी, पानी और बयार,
जिंदा रहने के आधार.
इस नारे से हिमालय को बचाने के लिये ग्रामीणों और आमजन की चेतना काफी प्रभावित हुई और उन्हें समझ में आया कि जंगल का मानव जीवन के साथ कितना गहरा रिश्ता है. सामाजिक कार्यकर्ता चारु तिवारी कहते हैं कि चिपको हिमालय को पहला वन आंदोलन नहीं था बल्कि आजादी के बाद से ही कुमाऊं और गढ़वाल में ऐसे आंदोलन चल रहे थे. उनके मुताबिक बहुगुणा ने इन संघर्षों को संगठित, व्यावहारिक और योजनाबद्ध रुप दिया.
तिवारी कहते हैं, "हमारे यहां आजादी के आंदोलन में जल, जंगल और जमीन के सवाल प्रमुख रहे हैं. गढ़वाल में कम्युनिस्ट और कुमाऊं में समाजवादी ऐसे कई आंदोलनों को चला रहे थे. चिपको असल में इन्हीं वन आंदोलनों का परिमार्जित रूप है. बहुगुणा के बारे में समझने की अहम बात ये है कि उन्होंने पर्यावरणीय आंदोलनों के साथ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी काम किया। मिसाल के तौर पर सत्तर के दशक में उन्होंने शराबबंदी के खिलाफ 16 दिन का अनशन किया क्योंकि उस वक्त शराब पहाड़ी समाज में एक बड़ी समस्या थी.”
मुआवज़े का फलसफा
विकास परियोजनाओं में प्रभावित लोगों को बिना किसी क्षतिपूर्ति के बच निकलना सरकारों और कंपनियों की आदत रही है. किशोर उपाध्याय कहते हैं कि टिहरी आंदोलन में भले ही एक विशाल बांध बन गया और टिहरी डूब गया लेकिन बहुगुणा ने जिन सवालों को उठाया उससे सत्ता में बैठे कई लोगों को ऐसे विराट परियोजनाओं का अमानवीय चेहरा दिखाई दिया और कम से कम वह मुआवजे के लिये तैयार हुए. उपाध्याय कहते हैं कि बहुगुणा को इतने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों के बावजूद आत्मचिंतन करने और अपनी गलतियों को सुधारने में कोई हिचक नहीं थी।
"पर्यावरण कार्यकर्ताओं के दबाव से जंगलों, नदियों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को बचाने के लिये कानून तो बने लेकिन इन क्षेत्रों में रह रहे लोगों के सरोकार पीछे छूट गये. उन्हीं जंगलों से लोगों को अलग कर दिया गया जिनका जीवन उस पारिस्थितिकी पर टिका था. एक बार मैंने बहुगुणा जी से इस बात को कहा तो उन्होंने दरियादिली से कमी को स्वीकार किया और कहा कि आप जैसे युवाओं को इस लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहिये. ये उस आदमी की महानता थी और इसलिये उनके जाने से भारत की ही नहीं पूरे विश्व की क्षति हुई है.” (dw.com)
(मलयालम से अनुवाद रति सक्सेना द्वारा)
5 बेहद व्यस्तता वाले वर्ष बीत गए हैं। मेरे लिए कामरेड पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वाम सरकार का हिस्सा बनना मेरे जीवन का सबसे गौरवपूर्ण अध्याय है। इसी काल में निपाह वायरस, ओखी और कोविड सभी ने मिलकर समस्याएं पैदा की, ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य विभाग का कार्यभार संभालना आसान नहीं था। हालांकि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बने गठबंधन, सह-मंत्रियों और विभागीय सहयोग ने जिम्मेदारियों को निभाने में काफी मदद की.जिससे प्रान्त में दुनिया के बड़े देशों की तुलना में कोविड का प्रभाव कम हुआ है। हरित केरल, सरकार द्वारा घोषित चार मिशन, जीवन, सार्वजनिक शिक्षा और कोमलता, लोगों के जीवन में किए गए परिवर्तन आशान्वित हैं। केरल के स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन सरकार की नीति और इच्छाशक्ति के कारण पैदा हुए।
1957 में पहली वाम सरकार के दौरान शुरू किए गए सुधारों का परिणाम केरल के स्वास्थ्य विभाग पर भी पड़ा। सबसे महत्वपूर्ण कार्य था बहुत व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य नेटवर्क। 2016 में जब पिनाराई सरकार सत्ता में आई तो पीएचसी के अतिरिक्त कोई पंचायत नहीं थी। 5000 जनसंख्या के लिए एक एक सबसेन्टर था। प्रत्येक जिले में एक सीएचसी सेन्टर, हर जिले में तालुक जनरल अस्पताल था। केरल बाल मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में कमी के कारण भी देश के लिए एक मॉडल था। फिर भी स्वास्थ्य क्षेत्र में कुछ समस्याएं थीं जिन्हें तत्काल हल करने की आवश्यकता है। जब 2016 की जांच की गई, तो यह पाया गया कि केरल के 67 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य देखभाल के लिए निजी चिकित्सा क्षेत्र पर निर्भर हैं। स्थिति यह थी कि मध्यम वर्ग के परिवार भी इलाज का खर्च वहन नहीं कर पा रहे थे।
विभिन्न प्रकार की महामारियों और जीवन शैली की बीमारियों ने बड़े पैमाने पर समाज पर ग्रहण लगा लिया था। केरल को भारत की मधुमेह राजधानी के रूप में जाना जाने लगा था। उच्च रक्तचाप, कैंसर, थायराइड आदि जैसी बीमारियों से न गुजरने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक थी। यह नहीं कहा जा सकता था कि इस त्रासदी में भूमिगत सुधार के बिना केरल के स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार हुआ है। इतनी सारी फर्म और उपकरण होने का कोई फायदा नहीं होता है। यही नहीं इनके प्रति सचेत भी रहना जरूरी है, किस तरह इनका लाभ उठाया जाये। इसके लिए विशेषज्ञों की सलाह और विभिन्न विभागों के गठबंधन के माध्यम से स्वास्थ्य क्षेत्र में पिनाराई सरकार द्वारा किए गए हस्तक्षेप ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की हैं।
Ardram Mission. की सहायता से प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को पारिवारिक स्वास्थ्य केन्द्र में परिवर्तित किया जाने लगा। लोगों ने देखा कि उनके गांवों में बेहतरीन लैब के साथ आधुनिक अस्पताल बनते जा रहे हैं। वे लोग न केवल विस्मय में देख रहा था बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र पर विश्वास भी करने लगे, और जल्द ही बीमारियों की जांच और इलाज की मांग भी करने लगे। इस तरह सरकारी अस्पताल में आने वालों की संख्या 33 फीसदी से बढ़कर 51 फीसदी हो गई है. प्रसव में शिशु मृत्यु दर 12 से घटकर 6 हो गई। मातृ मृत्यु दर 67 से घटकर 30 . हो गई।
KIFB की मदद से, हमारे तालुक अस्पताल और जिला अस्पताल आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न हैं , जो किसी भी कॉर्पोरेट अस्पताल को मात देते हैं। उनमें से कुछ पहले बन चुके थे। लेकिन अभी भी बड़े पैमाने पर अस्पतालों का निर्माण कार्य चल रहा है। प्रत्येक अस्पताल का मास्टर प्लान विशेषज्ञ कमेटी बनाकर और कई बार जांच कर तैयार किया गया। विपक्ष को आलोचना का मौका दिए बिना कि कुछ नहीं हो रहा है,इस तरह लोगों के सम्मुख सार्वजनिक अस्पताल निर्मित हो रहे हैं, , उन में से अधिकांश दो साल के भीतर पूरे हो जाएंगे। फिर हमारा सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र दुनिया के लिए आश्चर्य होगा। पहले से ही बहुत से लोग इस प्रणाली को सीखना चाहते हैं। हमारे मेडिकल कॉलेज आधुनिक समय के अनुसार सुविधाओं की कमी से परेशान थे। उन्हें भी परिमार्जित किया था। सभी के लिए विस्तृत परियोजना डिजाइन बनाये गये।
आज आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित मेडिकल कालेज का कार्य पूरा हो जायेगा,तभी समझ में आएगा कि हमने स्वास्थ्य क्षेत्र में कितना निवेश किया है। हमने मेडिकल कॉलेज को शिक्षा उत्कृष्टता और अनुसंधान का केंद्र बनाने की शुरुआत भी की। केरल द्वारा कोरोना वायरस के आनुवंशिक परिवर्तन पर किया गया अध्ययन उल्लेखनीय था। हम इमरजेंसी के इलाज में पीछे थे। इससे सड़क दुर्घटनाएं और अधिक हुईं। इसी संदर्भ में पिछली सरकार के दौरान संपूर्ण ट्रॉमा केयर योजना शुरू की गई थी। सभी मेडिकल कॉलेजों और जिला तालुक अस्पतालों में सर्वश्रेष्ठ ट्रैज सिस्टम और ऑपरेशन थिएटर सहित आपातकालीन उपचार विभाग शुरू किए । मौजूदा इमारतों को गिरा कर, अथवा मरम्मत करके पुनर्निर्माण आरम्भ किया । कुछ जगहों पर निर्माण कार्य चल रहा है।
केरल में 315 बीएलएस एंबुलेंस तैनात की गई हैं। अब हर 30 किलोमीटर के दायरे में 108 एंबुलेंस उपलब्ध हैं।ये एंबुलेंस कोविड काल में मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाकर हजारों लोगों की जान बचाने के लिए जिम्मेदार रही हैं। तिरुवनंतपुरम में जो एपेक्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च सेंटर बनाया गया है, वह एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है।
ई-स्वास्थ्य प्रणाली बनाइ गई, जिसके कारण रोगियों शीघ्र इलाज मिल सके, अस्पतालों में भीड़ को नियंत्रित करने, सुचारू अस्पताल प्रशासन आदि के लिए ई, सिस्टम का उपयोग किय ा जा रहा है। मरीजों को इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ कार्ड दिए जा रहे हैं। तीन सौ से ज्यादा अस्पतालों में लागू इस प्रोजेक्ट को सभी अस्पतालों में बढ़ाया जा रहा है. सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में यह आधुनिकीकरण दुनिया में दुर्लभ है।
वायनाड में हीमो ग्लोपिनोपैथी नामक गंभीर बीमारियों का समाधान खोजने के लिए स्थापित उपचार अनुसंधान केंद्र भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगी। यह केंद्र सिकलसेल एनीमिया, थैलेसीमिया, हीमोफीलिया जैसी बीमारियों से पीड़ित लोगों की के लिए आशा का केन्द्र होगा।
संपूर्ण स्वास्थ्य बचाव योजना की घोषणा करते हुए 42 लाख परिवारों को इसके दायरे में लाया। स्वास्थ्य विभाग ने बीमा कंपनियों से परहेज कर सीधे करुणा स्वास्थ्य सुरक्षा योजना चलाने की शुरुआत की है। इसके लिए राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने एसएचए का गठन किया है। कोविड काल के दौरान, एसएचए ने कई निजी अस्पतालों को कैस्प के तहत लाने और कई को सरकारी खर्च पर इलाज देने के लिए हस्तक्षेप किया।
आनुवंशिक हृदय विकारों वाले बच्चों के जीवन को बचाने के लिए हृदय योजना, सभी लोगों की जीवन शैली की बीमारियों का पता लगाने के लिए अमृतम स्वास्थ्य योजना, तपेदिक उन्मूलन के लिए अश्वमेघम, कुष्ठ उन्मूलन योजना, महामारी नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम, कैंसर के उपचार को सुनिश्चित करने के लिए पूर्ण कैंसर नियंत्रण सूत्र और व्यावहारिक गतिविधियाँ आदि समस्त प्रोजेक्ट चल रहे हैं। प्रमुख स्वास्थ्य व्यवहार में व्यायाम की आदत को सुनिश्चित करने की योजना शुरू की गई है।
आयुष खंड में अंतरराष्ट्रीय मानक अनुसंधान केंद्र का निर्माण शुरू हो गया है जो अनुकंपा फार्मेसियों, डायलिसिस केंद्रों, स्ट्रोक इकाइयों और प्रतीक्षा प्रयोगशालाओं को विस्तृत करने में सक्षम हैं। नए अस्पतालों की योजना में ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र भी शामिल हैं। 125 से अधिक अस्पतालों ने राष्ट्रीय गुणवत्ता प्रत्यायन पुरस्कार प्राप्त किया है जो ऐतिहासिक है।
हमें सावधान रहना चाहिए कि बीमारी का इलाज ही न करें बल्कि अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएं। प्रत्येक व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के मुद्दों का मूल्यांकन करना भी जरूरी है। इस लक्ष्य से शुरू की गई सैकड़ों गतिविधियों को अपनी मंजिल तक पहुंचाने के साथ-साथ हमें नई व्यवस्थाओं को शुरू करने में सक्षम हो जायेंगे। यह उस समूह की सफलता है जो स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व रखती है।
यह सामूहिक प्रयत्नों की जिससे स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐतिहासिक लाभ मिला। आदरणीय मुख्यमंत्री, स्थानीय सरकार के मंत्री जिन्होंने प्रत्येक जिले में स्थानीय सरकार के हस्तक्षेप को मजबूत किया, वित्त मंत्री, विधायक, नगर अध्यक्ष, पंचायत अध्यक्ष, डीएमओ डीपीएम अन्य जिला स्तर के अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी, नर्स, आशा वर्कर, लैब तकनीशियन, फार्मासिस्ट, सफाई कर्मचारी अस्पताल में, और स्वास्थ्य कर्मी, मैं सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करती हूं। स्वास्थ्य विभाग के सचिवों, निदेशकों, चिकित्सा सेवा निगम के पदाधिकारियों आदि के प्रति प्रेम और आभार।
कार्यालय के कर्मचारी जिन्होंने लगातार काम किया, वे मेरे लिए परिवार की तरह हैं। जिन्होंने संकट के समय मेरा साथ दिया, उनकी कड़ी मेहनत के लिए उन्हें धन्यवाद भी नहीं दे सकती। इन सबसे ऊपर कैबिनेट, पार्टी और एलडीएफ मोर्चे में मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के समर्थन से स्वास्थ्य विभाग का काम और मजबूत हुआ है. एक बार फिर राहत के साथ सभी का धन्यवाद कि स्वास्थ्य विभाग अधिक शक्तिशाली हाथों में है।
-ओम थानवी
सुंदरलाल बहुगुणा सुंदर शख़्सियत थे। छरहरे बदन, रजत दाढ़ी, मृदुभाषा या उनकी पहचान बने सफ़ेद पटके भर के कारण नहीं, पर्यावरण के प्रति ईमानदार सरोकार, गांधीवादी जीवन-शैली, यायावर मन और लेखन के प्रति सतत लगाव के कारण।
चिपको आंदोलन से उनका संसार में नाम हुआ। चण्डीप्रसाद भट्ट ने भी उस आंदोलन को जिया। लोगों ने दोनों के बीच दीवार खींचनी चाही। जबकि दोनों का काम बड़ा था। पूरक था।
बहुगुणाजी में भी ग्रामसुलभ विनय बहुत थी। एक दफ़ा जोधपुर आए। खेजड़ली गए। अमृतादेवी और पेड़ों के लिए लड़ने वाली अन्य स्त्रियों की दास्तान सुनी। निस्संकोच बोले — हमारा नाम लिया जाता है; पर असल चिपको आंदोलन तो यहाँ (खेजड़ली) से शुरू होता है। उनका बड़प्पन था।
वे स्वाधीनता सेनानी थे। पत्रकार भी थे। हिंदुस्तान के बरसों स्ट्रिंगर रहे। अस्सी के दशक में जब मैं इतवारी पत्रिका (राजस्थान पत्रिका समूह का एक राजनीतिक-सांस्कृतिक साप्ताहिक) का काम देखता था, उन्होंने हमारे लिए अनेक लेख लिखे। बाद में जनसत्ता के लिए भी। मुझे उनकी बड़े-बड़े अक्षरों वाली पर्वत-रेखा सी ग़ैर-समतल लिखावट बख़ूबी याद है।
एक बार जयपुर में हमारे घर भोजन पर आए हुए थे। मैं अपनी यज़दी मोटरसाइकल पर बाद में स्टेशन छोड़ने गया। उनका टिकट पक्का नहीं हुआ था। रात का वक़्त था। वे फ़िक्रमंद हुए। किसी तरह दिल्ली जा पहुँचें। एक मित्र मिले। बोले टीटी से बात करते हैं, कुछ ले-दे कर शायद बात बन जाए। बहुगुणाजी ने बात वहीं रोक दी — इस तरह बिलकुल नहीं। वे साधारण डिब्बे में चढ़ने को तैयार थे। पर टीटी को उनका परिचय मात्र देने से बात बन गई; एक ख़ाली शायिका मिल गई थी। हमें सिद्धांत के लिए अड़ने की सीख मिली।
वे 94 की वय में गए हैं। कोरोना काल में शतायु ही समझिए। उनके जीवन और काम को स्मरण करने का वक़्त है। विदा कहने का नहीं।
-कमल ज्योति
शासन-प्रशासन भले ही लॉकडाउन के माध्यम से कोरोना को नियंत्रित कर रही है, लेकिन हम सभी को चाहिए की हम अपनी आदतों को बदले और शासन-प्रशासन से इत्तर अपनी जिम्मेदारी भी समझे। हमारा जीवन जीने का जो तरीका है वह बेपरवाह और दूसरों को खतरे में डालने वाला न हो। ताकि लॉकडाउन की नौबत ही न आए। यदि हम कोरोना की पहली लहर में बनी आदतों और दूसरी लहर में हुई गल्तियों से सीख लेकर जीवन का सलीका बदल लेंगे और टीका लगवायेंगे तो निश्चित ही कोरोना की आने वाली तीसरी लहर हमारा ज्यादा कुछ नुकसान नहीं कर पाएगी। हम स्वस्थ भी रहेंगे और आने वाले कल को भी देख पाएंगे क्योंकि ‘जान है तो जहान है...
टीका का नाम आते ही एक विश्वास का भाव पैदा होने लगता है। यह टीका भले ही उस मासूम के चेहरे के किसी हिस्से में लगने वाला काजल का टीका हो या फिर किसी संक्रामक बीमारी से बचने के लिए हो। परम्परानुसार चली आ रही धारणा आज भी प्रचलन में है कि मां अपने मासूम बच्चों को किसी के नजर से बचाने टीका लगाती है। बहरहाल यह धारणाओं और परम्पराओं पर आधारित है, इसलिए इसे लगाने के बाद सौ फीसदी विश्वास कायम हो, डर-भय समाप्त हो जाए यह शायद ही संभव है। यदि ऐसा होता तो निश्चित ही कोई बच्चों को संक्रामक बीमारी से बचाने के लिए अस्पताल में टीकाकरण नहीं कराता। आप पाएंगे कि जागरूकता के साथ ही बच्चों में टीकाकरण का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। टीकाकरण बचपन में होने वाली कई जानलेवा बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावशाली एवं सुरक्षित तरीका है। टीकाकरण बच्चे के रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाता है और उन्हें विभिन्न जीवाणु तथा विषाणुओं से लडऩे की शक्ति प्रदान करता है।
नि:संदेह टीका या वैक्सीन वैज्ञानिकों, चिकित्सकों द्वारा जांची और परखी गयी वह खोज है, जो हमें संक्रामक बीमारी से लडऩे की शक्ति प्रदान करती है। वर्तमान में हम सभी को मालूम है कि कोविड-19 को एक संक्रामक रोग घोषित किया गया है। चिकित्सा वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है कि को-वैक्सीन और कोविशील्ड का टीका लोगों को लगाया जा रहा है। यह वैक्सीन कोरोना के संक्रमण से बचने में प्रभावी हो रही हैं। इसलिए कोरोना की रोकथाम के लिए टीकाकरण का अभियान हर जगह जोर-शोर से जारी है।
बहरहाल टीकाकरण जारी है और वैक्सीन का जो उत्पादन तथा उपलब्धता है, उससे संभावना है कि शतप्रतिशत टीकाकरण का कार्य लंबे समय तक जारी रहेगा। कोरोना की पहली लहर के बाद दूसरी लहर और इस लहर में हमें अपनों से लेकर आसपास के वे लोग जो कोरोना की जंग हार गए तथा ऐसे लोग जो कोरोना से लड़ते हुए जंग जीत गए, इन दोनों से मिली सीख को हमें जीवन में उतार लेना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि तीसरी लहर जब आए तो हम उससे कैसे अपने आपको और अपने परिवार को इससे बचा सकें। हम में से बहुत लोगों की धारणा है कि एक बार टीका लगने के बाद हम कोरोना से आसानी से लड़ सकते हैं, टीका लगने के बाद कोरोना का वायरस हमारा बाल भी बांका नहीं कर सकता। इस संबंध में अनेक चिकित्सा विशेषज्ञों की राय, अपील, पढऩे, जानने समझने के बाद वर्तमान परिपेक्ष्य में इतना तो कहा जा सकता है कि टीका हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। हमें बीमारी से लडऩे में सहायता करता है। कोरोना संक्रमितों के सम्पर्क में आने के बाद हम संक्रमित होते भी हैं तो हमारी स्थिति उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी बिना वैक्सीन वाले संक्रमितों की होती है।
कहने का अर्थ यहीं है कि वैक्सीन लगने के बाद आप संक्रमित न हो इसकी कोई ठोस गारंटी नहीं है। ऐसे में हमें टीका लगवाने के साथ अपने जीवन जीने का सलीका बदलने की आवश्यकता है। यह जीवन जीने का सलीका हमारे घर के भीतर खान-पान, योगा-व्यायाम और मास्क लगाकर चलने तक ही सीमित नहीं है। दरअसल हम में से बहुत लोग भूल जाते हैं कि घर से बाहर निकलते ही सडक़ पर चलते हुए हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। भले ही मुहं में मास्क पहने हुए होते हैं, लेकिन गुटखा और तंबाकू, पान इत्यादि चबाते होते हैं और जब मर्जी पड़ी, बिना आगे-पीछे देखे कही भी थूक देते हैं। जब छींक या खांसी आती है तो मास्क हटाकर छींकते-खांसते हैं। हमें हमारे पीछे चलने वालों की जरा भी परवाह नहीं होती।
हम तब भी लापरवाह होते हैं, जब किसी दुकान में कोई सामान लेना हो, हमें किसी बीमारी की डर से ज्यादा जल्दी सामान लेने की होड़ होती है और इस जल्दबाजी में हम सोशल-फिजिकल डिस्टेसिंग का पालन नहीं करते। हम में से बहुतों को बेवजह घूमने-फिरने का शौक भी है। घर से बाहर जरूरी काम का बहाना बनाकर सडक़ पर, किसी चौराहों पर, गुमटी-ठेलों पर अनावश्यक खड़े हो जाते हैं, घूमते-फिरते होते हैं और इस तरह भीड़ बढ़ाकर हम अपने साथ घर परिवार को भी संकट में डालने का काम करते रहते हैं। कोरोना संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा गंदगी और लापरवाही पर टिका हुआ है। स्वयं की स्वच्छता के प्रति हमारी कमी ही हमेें संक्रमित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बीमार होने के बाद हम हजार रुपए से लेकर कई लाख रुपए तक अपनी जान बचाने के लिए अस्पताल और दवाई में खर्च कर देते हैं।
हम अनावश्यक चीजे खाना बंद करते हैं। फल खाते हैं। जूस पीते हैं। मल्टी विटामिन लेते हैं। हम यह जानते भी है कि स्वच्छ रहकर भी बहुत से बीमारी से बचा जा सकता है, इसके बावजूद क्या हम अपना गंदा हाथ बार-बार धोने के लिए 10 से 20 रुपए का साबुन अपने साथ नहीं रख सकते? क्या मास्क और रोज पहनने वाले कपड़े घर जाते ही साफ नहीं कर सकते?
कोरोना की पहली लहर खत्म होने के बाद शायद हम उतने सतर्क और सावधान नहीं हुए, पहली लहर में हमने सीखा था कि मास्क पहनना है। हाथ लगातार धोना है। खान-पान पर ध्यान देना है। काढ़ा पीना है। गले साफ रखने के लिए गरारा करना है। बाजार या बाहर से कोई सामान लाए तो उसे कुछ देर घर के बाहर रखना है और अच्छी तरह से धोकर ही उपयोग करना है। सोशल डिस्टेसिंग का पालन करना है। लेकिन दुर्भाग्यवश पहली लहर का असर कम होने के साथ हम सभी के भीतर से कोरोना का भय मिटता चला गया और हमारी लापरवाही जारी रही। इस दौरान शासन-प्रशासन की सख्ती की वजह से मुंह पर केवल दिखावटी मास्क ही हमारे बचाव के लिए रह गए थे। इसलिए दूसरी लहर सभी के लिए चुनौतियों के साथ पीड़ादायक रही। कोरोना की पहली लहर ने जहां हमें बहुत कुछ सिखाने का काम किया है वहीं दूसरी लहर ने हमें अपनी गल्तियों और लापरवाही का अहसास कराते हुए फिर से कठिन चुनौतियों से लडऩे के लिए तैयार किया है। शासन-प्रशासन भले ही लॉकडाउन के माध्यम से कोरोना को नियंत्रित कर रही है, लेकिन हम सभी को चाहिए की हम अपनी आदतों को बदले और शासन-प्रशासन से इत्तर अपनी जिम्मेदारी भी समझे। हमारा जीवन जीने का जो तरीका है वह बेपरवाह और दूसरों को खतरे में डालने वाला न हो। ताकि लॉकडाउन की नौबत ही न आए। यदि हम कोरोना की पहली लहर में बनी आदतों और दूसरी लहर में हुई गल्तियों से सीख लेकर जीवन का सलीका बदल लेंगे और टीका लगवायेंगे तो निश्चित ही कोरोना की आने वाली तीसरी लहर हमारा ज्यादा कुछ नुकसान नहीं कर पाएगी। हम स्वस्थ भी रहेंगे और आने वाले कल को भी देख पाएंगे क्योंकि ‘जान है तो जहान है...(सहायक जनसंपर्क अधिकारी)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत जबसे आजाद हुआ है, कोरोना-जैसा संकट उस पर कभी नहीं आया। इस संकट ने राजा-रंक, करोड़पति-कौड़ीपति, औरत-मर्द, शहरी-ग्रामीण, डॉक्टर-मरीज किसी को नहीं छोड़ा। सबको यह निगल गया। श्मशानों और कब्रिस्तानों में लाशों के इतने ढेर देश में पहले किसी ने नहीं देखे। भारत में यों तो बीमारियों, दुर्घटनाओं और वृद्धावस्था के कारण मरने वालों की संख्या 25 हजार रोज की है। उसमें यदि चार-पांच हजार ज्यादा जुड़ जाएं तो यह दुखद तो है लेकिन कोई भूकंप-जैसे बात नहीं है लेकिन सरकारी आंकड़ों पर हर प्रांत में सवाल उठ रहे हैं।
देश में ऐसे लोग अब मिलना मुश्किल है, जिनका कोई न कोई रिश्तेदार या मित्र कोरोना का शिकार न हुआ हो। यों तो भारत के दो प्रतिशत लोगों को यह बीमारी हुई है लेकिन सौ प्रतिशत लोग इससे डर गए हैं। इस डर ने भी कोरोना को बढ़ा दिया है। मृतकों की संख्या अब भी रोजाना 4 हजार के आस-पास है लेकिन मरीजों की संख्या तेजी से घट रही है। संक्रमण घट रहा है और संक्रमित बड़ी संख्या में ठीक हो रहे हैं।
यदि यही रफ्तार अगले एक-दो हफ्ते चलती रही तो आशा है कि हालात काबू में आ जाएंगे। 15-20 दिन पहले जब कोरोना का दूसरा हमला शुरु हुआ था तो आक्सीजन, इंजेक्शन और पलंगों की कमी ने देश में कोहराम मचा दिया था। कई नर-पिशाच कालाबाजारी पर उतर आए थे। निजी अस्पताल और डॉक्टरों को लूटपाट का अपूर्व अवसर मिल गया था लेकिन सरकारों की मुस्तैदी, लोकसेवी संस्थाओं की उदारता और विदेशी सहायता के कारण अब सारा देश थोड़ी ठंडक महसूस कर रहा है।
लेकिन चिंता अभी कम नहीं हुई है। राज्य-सरकारें कोरोना के तीसरे हमले के मुकाबले के लिए कमर कस रही हैं। दिल्ली और हरियाणा की सरकारों ने हताहतों के संबंध में कई अनुकरणीय कदम उठाए हैं। केंद्र और राज्यों ने पहले हमले के समय की गई लापरवाही से कुछ सबक सीखा है। लेकिन हमारे राजनीतिक दलों के नेतागण अभी भी एक-दूसरे की टांग खींचने में लगे हुए हैं। वे यह नहीं सोचते कि वे अपने विरोधी की जगह होते तो क्या करते?
यदि केंद्र में भाजपा की सरकार है तो लगभग दर्जन भर राज्यों में विरोधियों की सरकारें हैं। कोरोना के पहले दौर के बाद क्या उन्होंने कम लापरवाही दिखाई? अब यदि उनके नेता कहते हैं कि कोरोना का यह दूसरा हमला ‘मोदी हमला’ है तो ऐसा कहकर वे अपना ही मजाक उड़ा रहे हैं। भाजपा के प्रवक्ता भी विरोधी नेताओं के मुँह लगकर अपना समय खराब कर रहे हैं।
यह समय युद्ध-काल है। इस समय हमारा शत्रु सिर्फ कोरोना है। उसके खिलाफ पूरे देश को एकजुट होकर लडऩा है। देश के लगभग 15 करोड़ राजनीतिक कार्यकर्ता, 60 लाख स्वास्थ्यकर्मी और 20 लाख फौजी जवान एक साथ जुट जाएं तो कोरोना की कमर तोडऩा आसान होगा। डर के बादल छंटे तो आशा की किरण उभरे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रदीप सुरीन
कोरोना महामारी के बीच भले लोगों की जान बचाने के लिए टीकों की बहुत जरूरत है। लेकिन संकट की इस घड़ी में फार्माकोविजिलेंस की जरूरत पहले से भी ज्यादा है। महामारी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अफरा-तफरी में टीकों के इस्तेमाल की मंजूरी दे दी। लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी इन टीकों के सभी क्लिनिकल ट्रायल पूरे नहीं हुए हैं। इन टीकों के साइड इफेक्ट्स भी जरूर होंगे।
आप में से कई लोगों के लिए फार्माकोविजिलेंस शब्द नया होगा। इसमें कोई गलत बात भी नहीं क्योंकि ज्यादातर लोगों का इससे सीधा वास्ता भी नहीं होता। दुनियाभर की दवा कंपनियां इसी विभाग से डरती हैं। लोगों की जान बचाने के लिए इस विभाग को किसी भी देश में होना अनिवार्य है। लेकिन भारत में बस कुछ साल पहले ही फार्माकोविजिलेंस विभाग का गठन किया गया है।
चलिए पहले जान लेते हैं कि आखिर ये फार्माकोविजिलेंस होता क्या है। दरअसल किसी भी देश में मिलने या बिकने वाली दवाओं और टीकों के साइड इफेक्ट्स पर निगरानी रखने के लिए ही फार्माकोविजिलेंस का गठन किया जाता है। दवा और टीके लोगों की जान बचाने के ही काम आते हैं। लेकिन सभी दवाओं और टीकों के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं जिनसे लोगों की जान भी जा सकती है। फार्माकोविजिलेंस पूरे देश में किसी दवा या टीके से होने वाले हादसों और अप्रिय घटनाओं का लेखा-जोखा रखती है।
भारत में इस विभाग द्वारा जुटाए आंकड़ों के आधार पर कई दवाओं और टीकों को बैन किया जा चुका है। कोरोना महामारी के बीच भले लोगों की जान बचाने के लिए टीकों की बहुत जरूरत है। लेकिन संकट की इस घड़ी में फार्माकोविजिलेंस की जरूरत पहले से भी ज्यादा है। महामारी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अफरा-तफरी में टीकों के इस्तेमाल की मंजूरी दे दी। लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी इन टीकों के सभी क्लिनिकल ट्रायल पूरे नहीं हुए हैं। इन टीकों के साइड इफेक्ट्स भी जरूर होंगे।
मुझे बस एक बात खटक रही है, जब कोरोना टीकों के सभी ट्रायल नहीं हो पाए थे तो फिर फार्माकोविजिलेंस विभाग को मुस्तैद क्यों नहीं किया गया। देश में कोरोना के टीके लॉन्च होने के साथ ही फार्माकोविजिलेंस विभाग को लगभग निष्क्रिय किया जा चुका है।
अब फार्माकोविजिलेंस विभाग भी सूचना के अधिकार कानून की तरह हो गया है। सिर्फ दिखावे के लिए ही मौजूद है।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कोविशिल्ड और कोवैक्सीन लाखों लोगों की जान बचा रहे हैं। लेकिन इनके साइड इफेक्ट्स पर खुद सरकार का आंख मूंद लेना बिलकुल भी सही नहीं है।
अभी तक जो होता आ रहा है उससे भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन आने वाले दिनों के लिए चिंतित होना लाजमी है। अगले कुछ महीनों में 2 साल के बच्चों से लेकर लगभग सभी उम्र के लोगों पर टीकों का क्लिनिकल ट्रायल होगा। लेकिन अगर इन टीकों से मासूम और बेजुबान बच्चों में कोई साइड इफेक्ट होता है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
पूरी दुनिया में बेजुबान बच्चों पर बेहद कम क्लिनिकल ट्रायल होते हैं। कोरोना वायरस के लिए कई देशों में छोटे बच्चों पर क्लिनिकल ट्रायल की मंजूरी दी गई है। भारत ने भी इसी नियम को फॉलो किया है। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि बच्चों पर होने वाले हर पांच में से एक क्लिनिकल ट्रायल असफल साबित हुआ है। यानी बच्चों पर होने वाले ट्रायल पर खास नजर रखने की जरूरत होती है।
पिछले कुछ महीनों से ज्यादातर हेल्थ रिपोर्टर्स फार्माकोविजिलेंस विभाग को ट्रैक करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिल पा रही है। फार्माकोविजिलेंस विभाग के नंबर गोल-मोल घुमाकर बंद हो जाते हैं। जब टीकों के साइड इफेक्ट्स की रिपोर्टिंग ही नहीं होगी तो इनसे हो रही मौतों के बारे में भी कोई चर्चा ही नहीं होगी।
-कृष्ण कांत
बिहार के बक्सर जिले में सोमवार को गंगा में 40 लाशें बहती देखी गईं। आज गाजीपुर में यूपी-बिहार बॉर्डर के गहमर गांव के पास गंगा में दर्जनों लाशें मिली हैं। गंगा में नाव चलाने वाले गहमर के बुजुर्ग नाविक शिवदास का कहना है कि चालीस साल से नाव चला रहे हैं, लेकिन गंगा में इस तरह बिखरी लाशों का मंजर कभी नहीं देखा। एक वीडियो वायरल है जिसे शेयर करना मुनासिब नहीं है। वह भयावह है। कई गांवों में 40, 50, 60 मौतों की खबरें आ रही हैं।
ऐसा महसूस होता है कि हमारे चारों तरफ लाशें ही लाशें बिखरी हैं। जहां से भी सूचनाएं मिल सकती हैं सिर्फ मौत का तांडव दिख रहा है। हमारी सरकारों ने कोरोना रोकने की जगह खबरों को रोकने में ताकत लगा दी है। जिस भी श्मशान में रिपोर्टर चेक कर रहे हैं, सरकारी और वास्तविक आंकड़ों में जमीन आसमान का अंतर है। बक्सर में रविवार को सरकारी आंकड़ों में 76 शव दर्ज हुए, जबकि 100 से ज्यादा अंतिम संस्कार हुए।
इससे हमारे गांवों की भयावह हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। खबरें बता रही हैं कि गांवों में श्मशानों में जगह कम पड़ गई है। दिन रात लाशें जल रही हैं। इसके बावजूद कई जगह लोग शवों को गंगा में प्रवाहित कर रहे हैं। वे शव बहकर कहीं पर किनारे लग रहे हैं।
यूपी और बिहार के गांव-गांव में लोग खांसी और बुखार से पीडि़त हैं। एक-एक गांव में दर्जनों मौतें हो रही हैं। अभी तक शहरों के हाहाकार से निपटने का ही कोई खास इंतजाम नहीं है। गांवों का क्या होगा, कोई नहीं जानता।
गांव में न टेस्ट हो रहे हैं, न दवाएं हैं, न डॉक्टर हैं, न अस्पताल हैं। जो लोग बीमार हो रहे हैं, वे छुआछूत के डर से बीमारी छुपा रहे हैं। हर जिले में बिना सुविधाओं के कम से कम एक जर्जर जिला अस्पताल या हर ब्लॉक में एक खंडहरनुमा प्राथमिक चिकित्सा केंद्र तो है ही, जहां कुछ लोगों के टेस्ट हो सकते हैं। लेकिन लोग टेस्ट कराने से भी बच रहे हैं।
खबरें कहती हैं कि लकड़ी और जगह की कमी के चलते लोग शवों को जलाने की जगह गंगा में प्रवाहित कर रहे हैं।
इस तरह गंगा में तैरते शवों से संक्रमण और ज्यादा फैल सकता है। सरकार के पास ऑक्सीजन और दो-चार दवाओं जैसी मामूली चीजों का अब तक कोई इंतजाम नहीं है तो गांव-गांव तक महामारी रोकने के बारे में कुछ किया जाएगा, यह सोचना भी आसमान से फूल तोडऩे की कल्पना करना है।
चुनाव हवसियों और सत्तालोभियों ने पूरे भारत को श्मशान में बदल डाला है।
-वीरेंदर भाटिया
‘कौन-सा नंबर है तुम्हारा?’, एक मुर्दे ने पास पड़े मुर्दे से पूछा!
‘मालूम नहीं’, दूसरे ने बेतकल्लुफ जवाब दिया।
‘कौन-से नम्बर का दाह हो रहा है?’
‘अरे मालूम नहीं बोला न? तुम्हें क्या जल्दी पड़ी है, दाह संस्कार की? जि़ंदा था, तब राशन, टिकट, बैंक की लाइन में घंटों खड़ा रह लेता था, आज क्या हुआ?’
‘उस लाइन में मैं खुद लगता था। यहाँ बच्चे लगे हैं, लाइन में।’
‘एक काम कर, खड़ा होकर बजा डाल सबकी। एकदम से नम्बर आएगा।’
‘जब खड़ा हो सकता था तब नहीं बजाई। काश! तब बोलते हम।’
‘तो अब पड़ा रह शांति से। चुप्पी मारने की सजा यही होती है। जब आदमी कुछ नहीं बोलता, तब ही आदमी मर जाता है।’
‘तुम्हारी जान कैसे गई?, एक मुर्दे ने दूसरे से पूछा’
‘ऑक्सीजन नहीं मिली!’
‘तुम कैसे मरे?’
‘मुझे हॉस्पिटल में बेड नहीं मिला!’
‘कितने सस्ते में मर गए न हम लोग’, पहले ने आह भरी!
‘हम यही डिज़र्व करते थे, भाई। चुपचाप जैसे मर गए, वैसे चुपचाप अंतिम संस्कार का इंतजार करो।’
‘मुझे एक बार जीने का मौका मिल जाये, तो चीख़-चीख़ कर कहूँ कि हमें सिस्टम ने मारा है। हम इतने बीमार नहीं थे, जितना सिस्टम बीमार निकला’, एक मुर्दे ने खीझ कर दूसरे मुर्दे से कहा।
‘चुपचाप पड़ा रह। मुर्दे कभी बोलते नहीं। यह मुर्दों का देश है साधो। जब जिंदा थे, तब भी मुर्दा ही थे हम। अब हेकड़ी दिखाने का कोई लाभ नहीं!’
‘यार कितने संस्कार हो चुके, कितने बाकी हैं?’ एक मुर्दे ने दूसरे से पूछा।
‘अभी 7 हुए हैं, 27 बाकी हैं। देख ले आजु-बाजू, कितने मुर्दे पड़े हैं?’
‘कितना बुरा हाल हो गया है देश का?", पहला मुर्दा सुबकने लगा!
‘दिख गया देश का हाल? अब मुर्दों के जलने की लपटें देख और ऊँचाई नाप मुल्क की तरक्की की!’
‘सुनो!’
‘बोलो!’
‘हमारे बच्चे इस देश में कैसे रहेंगे? हर तरफ महामारी और नफरत फैल चुकी है।’
‘हाँ, हमने क्या योगदान दिया कि नफरत न फैले?’
‘सच में कुछ भी नहीं!’
‘तो एक काम करते हैं। खुद को लानत भेजते हैं और फिर से मर जाते हैं।’
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना महामारी के इस दौर में हमारी अदालतें, सरकार और पुलिस कई ऐसे काम कर रही हैं, जो उन्हें नहीं करने चाहिए और कई ऐसे काम बिल्कुल नहीं कर रही हैं, जो उन्हें एकदम करने चाहिए। जैसे वह ऑक्सीजन, इंजेक्शन और दवाइयों के कालाबाजारियों को फांसी पर लटकाने की बजाय उन्हें पुलिस थानों और जेल में बिठाकर मुफ्त का खाना खिला रही है और जो लोग मुफ्त में दवाइयाँ बांट रहे हैं, मरीज़ों को पलंग दिलवा रहे हैं, अपनी एंबूलेंस में अस्पताल पहुंचा रहे हैं, उन पर मुकदमे चला रही है।
उनके खिलाफ कार्रवाई इसलिए हो रही है कि वे विरोधी दलों के हैं। यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास के खिलाफ इसीलिए जांच बिठा दी गई थी। जांच में मालूम पड़ा कि वे और उनका संगठन शुद्ध परोपकार और जन-सेवा में लगे हुए थे। अदालतों में बैठे न्यायाधीश आजकल ऐसे-ऐसे फैसले दे रहे हैं और इतनी आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे हैं, जो निश्चित रुप से संविधान की मर्यादा के अनुकूल नहीं हैं लेकिन उनमें इतना दम नहीं है कि इस वक्त के कालाबाजारी हत्यारों को वे फांसी पर लटकवाएं ताकि ठगी करनेवाले इन हजारों हत्यारों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाए।
अब दिल्ली की पुलिस का एक कारनामा और देखिए। उसने दिल्ली में 27 ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर लिया है, जो दीवालों पर पोस्टर चिपका रहे थे। उन पोस्टरों में ऐसा क्या छपा था, जिससे दंगे भडक़ सकते थे ? उनमें ऐसा क्या लिखा था, जो घोर अश्लील या अशोभनीय था ? उन पोस्टरों में क्या लोगों को अराजकता फैलाने के लिए उकसाया गया था ? हीं, उनमें ऐसा कुछ नहीं लिखा था। उनमें सिर्फ यह लिखा था ‘‘मोदीजी, हमारे बच्चों की वेक्सीन विदेश क्यों भेज दी ?’’
यह सवाल पोस्टर चिपकाने वाले आप पार्टी और कांग्रेस के लोग ही नहीं कर रहे हैं बल्कि कई साधारण लोग भी कर रहे हैं। अब वेक्सीन की कमी भुगत रहे लोग यह सवाल करें, यह स्वाभाविक है। इससे नाराज होने की बजाय उनके सामने अपनी तर्कपूर्ण सफाई पेश की जानी चाहिए लेकिन जी हजूर पुलिसवालों ने या तो सत्तारुढ़ और मूढ़ नेताओं के इशारे पर उनके खिलाफ कार्रवाई कर दी या उनकी खुशामदबाजी के खातिर पोस्टरबाजों को गिरफ्तार कर लिया।
यदि गिरफ्तार ही करना था तो उन नेताओं को गिरफ्तार क्यों नहीं किया, जिन्होंने ये पोस्टर लगवाए थे या जो इनका समर्थन कर रहे हैं ? वास्तव में 6 करोड़ टीके सरकार ने उस समय दूसरे देशों को भेंट किए थे या बेचे थे, जब कोरोना की लहर भारत में एकदम उतरी हुई लग रही थी। उस समय तो किसी विरोधी नेता ने मुंह तक नहीं खोला था।अब जबकि भारत में विदेशों से करोड़ों टीके आ रहे हैं, हम अपने टीका-दान की निंदा कैसे कर सकते हैं ? लेकिन जो लोग हमारे टीका-दान पर सवाल खड़े कर रहे हैं, उन्हें गिरफ्तार करना तो बिल्कुल अनुचित है। दिल्ली पुलिस की यह सफाई हास्यास्पद है कि पोस्टरबाजों की गिरफ्तारी इसलिए की गई है कि वे तालाबंदी का उल्लंघन कर रहे थे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-कनक तिवारी
अनुच्छेद 153:-प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। अनुच्छेद: 154:- ‘‘राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा। (2) इस अनुच्छेद की कोई बात-(क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी अन्य प्राधिकारी को प्रदान किए गए कृत्य राज्यपाल को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी; या (ख) राज्यपाल के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद या राज्य के विधान-मंडल को निवारित नहीं करेगी।’’ मशहूर बौद्धिक चिंतक और समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने संविधान में राज्यपाल पद की स्थिति को देखते हुए कड़ी टिप्पणी की थी कि इन लाट साहबों की ज़रूरत ही क्या है?
ऐसे राजनेता भी राज्यपाल नियुक्त होते रहे हैं जिन्होंने सियासी हाराकिरी करने में कंजूसी नहीं बरती। आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रामलाल ने एन.टी. रामाराव सरकार को बर्खास्त करने में हड़बड़ी और असंवैधानिकता दिखाई। केन्द्र की कांग्रेसी सरकार की जगहंसाई हुई। कर्नाटक के पी. वेंकटसुबैया ने राज्य विधानपरिषद में मनोनयन के तीन सदस्यों की राज्य सरकार का प्रस्ताव तीन महीने ठंडे बस्ते में डाले रखा। केरल की रामदुलारी सिन्हा ने कालिकट विश्वविद्यालय संबंधी राज्य शासन का अध्यादेश महीनों तक पढऩे की जहमत तक नहीं उठाई और बिना मंजूर किए वापस किया। रोमेश भंडारी ने त्रिपुरा के असाधारण पक्षपात, अदूरदर्शिता और गैरबुद्धिमत्ता की मिसाल कायम की। 1966 में केरल के तत्कालीन राज्यपाल अजित प्रसाद जैन के खुले आम इंदिरा गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता बनाने के लिए प्रचार करने से अपनी कुर्सी छोडऩी पड़ी।
शीला कौल और कुमुद बेन जोशी ने संवैधानिक कदाचार करने में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया। शीला कौल के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों कुलदीप सिंह और फैजानुद्दीन की बेंच ने कहा उन्हें पदावनत हो जाना चाहिए। कुमुद बेन जोशी ने आंध्रप्रदेश के लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर पद की गरिमा की काफी छीछालेदर की। संतोषमोहन देव और कल्पनाथ राय के सर्वख्यात उदाहरण हैं। पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सावधानी, दूरदर्षिता और भविष्य दृष्टि का नायाब उदाहरण पेश करते अपने दोस्त तथा बंबई के गवर्नर श्रीप्रकाश को समझाईश दी कि वे रफी अहमद किदवई स्मृति स्मारक कोष से खुद को अलग रखें। उन्होंने आंध्रप्रदेश के गवर्नर वी.वी. गिरि को भी पत्र लिखा कि बहुत लंबी छुट्टियां नहीं लिया करें। ऐसा ही पत्र मध्यप्रदेश के गवर्नर एच.वी. पाटस्कर को भी लिखा। पंजाब के गवर्नर एन.वी. गाडगिल को भी डॉ. प्रसाद ने चेतावनी दी थी कि सार्वजनिक रूप से विवादग्रस्त राजनीतिक विषयों पर कोई बात नहीं कहें।
केरल के राज्यपाल वी. विश्वनाथन ने तो राज्य मंत्रिपरिषद द्वारा प्रस्तावित राज्यपाल के अभिभाषण का टेक्स्ट ही बदल दिया था। तमिलनाडु गवर्नर सुरजीत सिंह बरनाला ने अपना तबादला बिहार किया जाने पर ऐतराज किया। तो उनकी जगह कांग्रेस नेता भीष्मनारायण सिंह को राज्यपाल बना दिया गया। बिहार के राज्यपाल मोहम्मद यूनुस सलीम ने तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कहने पर बिहार की लालू प्रसाद यादव सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश करने से मना कर दिया था। जनता दल सरकार में भी कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू करने राज्यपाल भानुप्रताप सिंह का उपयोग किया गया। हरियाणा के गवर्नर जी.डी. तपासे ने देवीलाल को बहुमत सिद्ध करने के लिए विधायकों को लाने का निर्देश दिया लेकिन बिना प्रक्रिया पूरी हुए भजनलाल को मुख्यमंत्री बना दिया। जम्मू कश्मीर में जगमोहन का अलग अलग समय पर लगातार राजनीतिक इस्तेमाल होता ही रहा है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल धर्मवीर ने अजय मुखर्जी मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार राज्यपाल का अभिभाषण पढऩे से इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि उसमें केन्द्र की आलोचना के अतिरिक्त खुद धर्मवीर की उलाहना थी। यह बात उन्होंने अपने संस्मरणों की किताब में दर्ज की है।
राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल नियुक्त करने के लिए अनुच्छेद 74 के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह मानना आवश्यक है। लेकिन राज्यपाल को केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि, नुमाइंदा एजेन्ट या सेवक संविधान के अनुसार नहीं समझा जा सकता। उसकी संवैधानिक जवाबदेही संविधान की प्रतिज्ञा के अनुसार है, राष्ट्रपति या केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के प्रति नहीं। केन्द्र की राजनीतिक विचारधारा, आदर्श आदि से सामंजस्य नहीं होने के आरोप पर पद से नहीं हटाया जा सकता। किसी मुद्दे पर केन्द्र और राज्य शासन की दृष्टियों में फर्क हो तो संवैधानिक मीमांसाओं को छोडक़र अन्य विवादास्पद मुद्दों पर राज्यपाल के लिए लाजि़मी होगा कि राज्य मंत्रिपरिषद की राय को तरज़ीह दे। राज्यपाल के द्वारा चलाए जा रहे प्रशासन में सहयोग और सहायता के लिए मंत्रिपरिषद होती है। राज्यपाल की मंजूरी के बिना विधानसभा कोई विधायन प्रभावशील नहीं कर सकती। आवश्यक होने पर वह पारित अधिनियमों को भी दुबारा विचार के लिए वापस कर सकता है। राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता के बिना भी राज्यपाल पर कई संवैधानिक जिम्मेदारियों का पालन करने का दायित्व है। सरकारिया आयोग ने राजनीतिज्ञों को यथासंभव राज्यपाल नहीं बनाए जाने की सिफारिशें की हैं।
राज्यपाल के विवेक पर एक विवादास्पद सवाल उत्तराखंड प्रदेश से आया था। कांग्रेस के नौ दागी विधायक ‘चौबे जी छब्बे बनते बनते दुबे बन गए।‘ अपील पर सुप्रीम कोर्ट टस से मस नहीं हुआ। कोर्ट की भृकुटि से लगा कि उत्तराखंड में राज्यपाल के कहने पर राष्ट्रपति शासन लगाना उसे गवारा नहीं था। महाराष्ट्र में विवाद था कि रांकापा के अजित पवार द्वारा 54 विधायकों के समर्थन की कथित चि_ी के कारण आनन फानन में राज्यपाल कोश्यारी ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार को शपथ दिला दी।
न्यायमूर्तियों रमन्ना, अशोक भूषण और संदीप खन्ना की सुप्रीम कोर्ट के खुद के न्यायिक आचरण के पूर्व उदाहरणों से अलग हटने पर नहीं हो सकती थी। बहरहाल इस वजह से महाराष्ट्र की राजनीति की धुंध चौबीस घंटे में ही साफ हो गई। दिल्ली के लिए संशोधित अनुच्छेद 239-क क के संदर्भ में भी जस्टिस चंद्रचूड़ ने बेहतर लिखा कि राज्य मंत्रिपरिषद की शक्ति और दिल्ली विधानसभा की कार्यपालिका शक्ति को एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अमित शाह तब गुजरात के मंत्री थे। उनको लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सदाशिवन ने फैसला दिया जिससे अमित शाह षडय़ंत्र के आरोप से बरी हो गए। इसके तत्काल बाद उन्हें केरल का राज्यपाल बना दिया गया। अमित शाह ने केरल की कानूनसम्मत सरकार को धमकी दी वह गिरफ्तारियों को लेकर परहेज और नियंत्रण करे, वरना भाजपा कार्यकर्ता केरल की सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे। राजनीतिक पार्टी के द्वारा सरकार को उखाड़ फेंकने की धमकी देना कैसे संविधानसम्मत है? राज्यपाल सदाशिवन फिर भी चुप रहे।
संविधान में यही प्रावधान है कि राज्यपाल अपनी सरकार की कार्यवाहियों में किए जा रहे विलोप को राष्ट्रपति को सूचित करते रहेंगे। इस लिहाज से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संवैधानिक कर्तव्यों से स्वयमेव संबद्ध हो जाते हैं। वे फिर भी चुप हैं। राज्यपाल धनकड़ कलकत्ता हाईकोर्ट की संविधान पीठ के सामने बंगाल की चुनावी हिंसा के मामले की सुनवाई और टिप्पणी के बावजूद बंगाल के क्षेत्राधिकार के बाहर असम का दौरा क्यों कर रहे हैं? लगता है बंगाल को संवैधानिक युद्ध का कुरुक्षेत्र बनाया जा रहा है। जो संविधान के आड़े आएगा, संविधानविरोधी आचरण करता कहलाएगा। संविधान और उसकी मर्यादाओं की रक्षा करना राज्यपाल का पदेन कर्तव्य है। अन्यथा पद पर बने क्यों रहें? संविधान संलिष्ट, विरोधाभासी और अंतर्संबंध प्रावधानों का कुतुबनुमा है। मुख्यधारा से रिटायर राजनीतिज्ञों को डॉ. लोहिया के जुमले में लाट साहबी की आसंदी सौंपने की फितरतें होती ही रहती हैं। ‘नागनाथ गए तो सांपनाथ आए,‘ या ‘गुड़ खाएं, गुलगुले से परहेज़ करें‘ जैसी कहावतों का बाज़ार गर्म होता रहता है। केन्द्र सरकार के पास जादू की पुडिय़ा और अदृश्य छड़ी होती है। मंत्रिपरिषदों को राज्यपालों से भिड़ा दिया जाता है। मीडिया प्रबंधन तो मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है ही।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यदि जर्मनी के अखबार ‘डेर स्पीगल’ में छपी यह खबर सही है तो मानकर चलिए कि अब अफगानिस्तान ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया के अच्छे दिन आने ही वाले हैं। जो बात मैं पिछले 25-30 साल से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों से कहता रहा हूं, उसके परवान चढऩे के लक्षण अब दिखाई पडऩे लगे हैं। तीन दिन पहले मैंने लिखा था कि पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा अचानक काबुल क्यों पहुंच गए हैं। अब मालूम पड़ा है कि वे अशरफ गनी और डॉ. अब्दुल्ला की सरकार से तलवार भिड़ाने नहीं, हाथ मिलाने गए हैं। बाजवा ने अफगान नेताओं से कहा है कि अफगानिस्तान में इस्लामी अमीरात या तालिबान का राज फिर से कायम होना न तो दक्षिण एशिया के लिए अच्छा है और न ही पाकिस्तान के लिए। पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली आदमी के मुंह से अगर यह बात निकली है तो इससे अधिक खुशी की बात क्या हो सकती है।
पाकिस्तान की छत्रछाया में ही तालिबान आंदोलन पनपा है। 1983 में जब मैं पहली बार पेशावर के जंगलों में मुजाहिदीन नेताओं से मिला था तो वह मुलाकात राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक के कहने से ही हुई थी। उन्हीं में से कई तालिबान नेता बन गए। अब पाकिस्तान में तरह-तरह के तालिबान हैं। कोई क्वेटा शूरा है, कोई पेशावर शूरा है और कोई मिरानशाह शूरा है। अफगानिस्तान में भी तालिबान के कई स्वायत्त गिरोह हैं। मेरी अफगानिस्तान और पाकिस्तान-यात्राओं के दौरान इन तालिबानियों से मेरा बराबर संपर्क बना रहा है। 1999 में हमारे अपहत जहाज को कंधार से छुड़वाने में भी इन तालिबान और मुजाहिदीन नेताओं ने हमारी मदद की थी। वे मूलत: भारत-विरोधी नहीं हैं। वे पाकिस्तान के कारण अभी भारत का विरोध करते रहे हैं। वे स्वायत्त और स्वेच्छाचारी हैं। वे सत्ता में आते ही पाकिस्तान के ‘पंजाबी राज’ को धता बता सकते हैं। पाकिस्तान को यह बात समझ में आ गई है। इसीलिए काबुल की जो गनी-सरकार एकदम भारतपरस्त लग रही थी, अब पाकिस्तान उससे संबंध सुधार रहा है। अशरफ गनी ने भी साफ-साफ कहा है कि अफगानिस्तान में शांति रहेगी या अराजकता, यह पाकिस्तान के हाथ में है। यह बात मैं अपने प्रधानमंत्रियों से पिछले 40 साल से कहता रहा हूं। यदि भारत पाकिस्तान को आगे करे और खुद पीछे चले तो अफगानिस्तान को दोनों राष्ट्र मिलकर दक्षिण एशिया का स्विटरजरलैंड बना सकते हैं। मुझे खुशी है कि भारत और पाकिस्तान के अफसर गोपनीय तौर पर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दोनों देशों के गुप्तचर विभाग दुबई आदि शहरों में गुपचुप मिल रहे हैं। भारत कश्मीर पर बात करने से मना नहीं करेगा और पाकिस्तान भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के राष्ट्रों तक पहुंचने के लिए थल मार्ग उपलब्ध कराएगा। यदि ऐसा हो जाए तो अगले दस वर्षों में दक्षिण एशिया यूरोप से भी अधिक संपन्न हो सकता है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि भारत और पाकिस्तान मिलकर अफगान-संकट को हल कर लें तो कश्मीर का मसला तो अपने आप ही हल हो जाएगा।
(लेखक, पाक-अफगान मामलों के विशेषज्ञ हैं)
(नया इंडिया की अनुमति से)
-बादल सरोज
इतिहास में इसरायल नाम का देश दुनिया के नक़्शे पर कभी नहीं रहा। यहूदी धर्म के अनुयायी दुनिया भर के देशों में, कहीं थोड़े, कहीं बहुत थोड़े, रहे और रहते रहे। करीब 4000 वर्ष पहले अब्राहम के संदेशे और उनके पोते यहूदा के नाम पर बने यहूदियों को न कभी देश बनाने की सूझी, ना ही उसकी जरूरत पड़ी। इसकी असल वजह तो और भी दिलचस्प है और वह यह है कि आज जिस यहूदी धर्म के लोगों का देश बनाने की बात की जा रही है, उस यहूदी धर्म में देश या राष्ट्र का कांसेप्ट ही नहीं रहा। बल्कि ज्यादा सही यह है कि भौगोलिक अस्तित्व वाले देश की अवधारणा का निषेध रहा है।
अचानक कोई सवा सौ साल पहले ये "अपना देश" बनाने की खुराफात शुरू हुयी। 1897 में पहली जिओनिस्ट कांग्रेस हुयी ; ध्यान दें यह यहूदी सम्मेलन नहीं, यहूदीवादी सम्मेलन था। यह अंतर मार्के का है : जैसे हिन्दू और हिंदुत्ववादी के बीच का अंतर है, जैसे इस्लाम और तालिबान का अंतर है। वैसे ही यहूदी और यहूदीवादी में आकाश पाताल का फर्क है। उस समय के ज्यादातर यहूदियों ने, ऑर्थोडॉक्स और सुधारवादी दोनों तरह के यहूदियों ने, इस सम्मेलन के आयोजन का विरोध किया। विरोध इतना मुखर और तीखा था कि यह सम्मेलन सबसे घनी यहूदी आबादी वाले जिस शहर म्यूनिख (जर्मनी) में होना था, वहां यहूदियों ने ही नहीं होने दिया। आयोजकों को स्विट्ज़रलैंड के शहर बासेल Stadicasino Basel में यह सम्मेलन करना पड़ा या कहें उनसे करवाया गया। इस सम्मेलन की सारी कार्यवाही जर्मन भाषा में चलीं और इसने यहूदियों का अपना देश बनाने का प्रस्ताव पारित किया।
ज्यादातर यहूदियों ने इस आव्हान को खारिज कर दिया। उनकी आपत्ति दो थीं ; एक - धर्म में ही देश या राष्ट्र की अवधारणा का नहीं होना, और दो - यह मानना कि अलग देश बनाने के नारे से मिलेगा तो कुछ नहीं, लेकिन दुनिया भर में रहने वाले यहूदियों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। दुनिया भर में यहूदी भेदभाव का निशाना बनेंगे। मजदूर मजदूरी नहीं कर पाएंगे, यहूदी व्यापारी धंधा नहीं कर पाएंगे। उनकी आशंका सही थी - बाद में यही हुआ भी।
इस जिओनिस्ट कांग्रेस के समय यानि 1897 में फिलिस्तीन की कुल आबादी 6 लाख थी। इसमें 95% अरब थे (सारे अरब मुस्लिम नहीं थे, ईसाई भी थे) और केवल 5% यहूदी थे। उस जमाने में फिलिस्तीन ऑटोमन साम्राज्य - मोटा-मोटी तुर्की साम्राज्य - का हिस्सा हुआ करता था। पहले विश्वयुद्ध (194-1919) में विजेता गठबंधन ने इस साम्राज्य को बिखेर दिया था।
दूसरे विश्वयुद्ध (1939-1945) के बाद हिटलर के नरसंहारों का शुरुआती और निर्मम निशाना बने यहूदियों के प्रति (यहूदीवादियों के प्रति नहीं) उपजी हमदर्दी का फायदा लूट के लिए दुनिया के बंटवारे की जुगाड़ में लगे साम्राज्यवादी गिरोह ने उठाया और 1947 में "नए देश" के लिए जमीन का एक हिस्सा देने की बात हुयी। उस समय यानी 1947 में फिलिस्तीन में फिलिस्तीनी अरब 13 लाख 50 हजार थे और फिलिस्तीनी यहूदी करीब साढ़े छः लाख थे और इनका कब्जा सिर्फ 6% जमीन पर था।
1948 में इन्ही ज़िओनिस्टों ने दुनिया भर के यहूदीवादियों को इकठ्ठा करने का नारा दिया और ब्रिटेन, अमरीका, फ़्रांस, आस्ट्रिया आदि देशों के हथियारों की मदद और सैन्य शक्ति के साथ फिलिस्तीन में युद्ध छेड़ दिया गया। इस लड़ाई के बाद इसरायल नाम के देश का जन्म हुआ। इस थोपे गए युद्ध में आधी से ज्यादा - करीब साढ़े सात लाख - फिलिस्तीनी आबादी शरणार्थी बन गयी। अपने देश में ही बेघर या बाहर के देशों में बिना नागरिकता के रहने के लिए मजबूर कर दी गयी। अब इन शरणार्थियों की तादाद कोई 35 से 40 लाख है। इसे उस वक़्त भी सारी दुनिया ने धिक्कारा था। अब तक के सबसे प्रकाण्ड वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन को इस नए देश - इसरायल - का दूसरा राष्ट्रपति बनने का न्यौता दिया गया था, जिन्हे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था।
गौतम बुद्ध से लेकर मार्क्स से होते हुए दुनिया भर के विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के सिद्धांतों ने अब बिना किसी संशय के साबित कर दिया है कि घटनायें, सामाजिक-राजनीतिक परिघटनायें अपने आप नहीं घटतीं। हरेक के पीछे एक या एकाधिक कारण होते हैं। 1897 की पहली जिओनिस्ट कांग्रेस, 1947 के संयुक्त राष्ट्र के नए देश के फैसले, 1948 में फिलिस्तीन पर हमले और इसरायल नाम के देश के बनने और उसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा की गयी सैकड़ों निंदाओं, आलोचनाओं, भर्त्सनाओं के बावजूद इसरायल की बर्बर गुण्डागर्दी और बाकी जमीन पर बस्तियां बसाने, इस बीच हुए मैड्रिड, ओस्लो, कैंप डेविड समझौतों सहित दर्जन भर अंतर्राष्ट्रीय करारों और पचास, सौ आपसी करारों को इसरायल द्वारा बार-बार हर बार तोड़ने के पीछे भी कारण है। इस कारण का नाम है साम्राज्यवादी लूट की लिप्सा और दुनिया पर कब्जा करने की हवस।
पहले विश्व युद्ध के ठीक पहले हुयी जिओनिस्ट कांग्रेस के स्पांसर और फाइनेंसर उस वक़्त के साम्राज्यवादी देश थे। 1948 के हमले के रणनीतिकार थे ब्रिटेन और अमरीका। उसके बाद से जारी सारे हमलों में इसरायल का संरक्षक, मददगार है संयुक्त राज्य अमरीका। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने पूरे इतिहास में जितने प्रस्ताव इसराइल की करतूतों और मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ पारित किये हैं, उतने किसी और मामले में नहीं किये। संयुक्त राष्ट्र संघ में फिलिस्तीन की समस्या को लेकर जब-जब भी वोटिंग हुयी है, तब-तब ज्यादातर मामलों में इसरायल के पक्ष में सिर्फ एक वोट पड़ा है और यह वोट अमरीका का रहा है। ट्रूमैन, आइजनहॉवर, केनेडी, जॉनसन, निक्सन से लेकर फोर्ड, कार्टर, रीगन, बड़े-छोटे बुश, क्लिन्टन, ओबामा से होते हुए डोनाल्ड ट्रम्प के अमरीका तक, इस मामले में पूंछ हमेशा टेढ़ी रही है। मई 2021 ने साबित कर दिया है कि बाइडेन का अमरीका भी इससे अलग नहीं रहने वाला।
ज़रा से फिलिस्तीन को खण्ड-खण्ड करके उस भूभाग में इसरायल को स्थापित करने में साम्राज्यवाद की इतनी दिलचस्पी क्यों है?
सिम्पल-सी बात है : दुनिया पर कब्जा जमाने के लिहाज से पश्चिम एशिया (पश्चिमी मीडिया वाले इसे मध्य-पूर्व कहते हैं) का रणनीतिक महत्त्व है। एशिया और अरब देशों की छाती पर सवार रहने के लिए यह मुफीद जगह है - उस पर प्राकृतिक तेल और गैस का अपरिमित भण्डार भी यहीं है। इसलिए तेल अबीब और पश्चिम यरुशलम में चौकी कायम करना उसके लिए धंधे का सवाल है। कुछ लाख लोग मरते हैं तो मरें - अंतर्राष्ट्रीय क़ानून कुचलते हैं, तो कुचल जाएँ!
ठीक यही कारण है कि भारत की जनता हमेशा से इसरायल की बर्बरता के खिलाफ फिलिस्तीन की जनता और उसके मुक्ति आंदोलन के साथ रही है। उसने साम्राज्यवाद को भुगता है, इसलिए वह फिलिस्तीनी जनता का दर्द जानती है। गांधी से लेकर कम्युनिस्टों तक, नेहरू से लेकर पटेल तक, जयप्रकाश से लेकर चौधरी चरण सिंह तक साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने वाली सारी धाराएं फिलिस्तीनी जनता के मुक्ति आंदोलन के साथ रहीं। आज भी हैं। सिर्फ वही लोग इसरायल के साथ रहे/हैं, जो तब ब्रिटिश साम्राज्य का चरणवन्दन करते टेढ़े हुए जा रहे थे,अब नमस्ते ट्रम्प करते-करते औंधे पड़े हैं। इन्हे इसरायल बड़ा भाता है - इतना ज्यादा कि वे दुनिया की कुख्यात हत्यारी एजेंसी मोसाद के साथ भारतीय सुरक्षा में साझेदारी तक करने को तत्पर हो जाते हैं। इसरायल के हथियारों का सबसे बड़ा खरीददार (9 अरब डॉलर) भारत को बना देते है। (साढ़े चार अरब डॉलर का बाकी व्यापार अलग है।) मोदी के आने के बाद 70 साल में पहली बार ऐसा हुआ है, जब संयुक्त राष्ट्र संघ में इसरायल के विरुद्ध आये प्रस्तावों पर भारत तटस्थ रहा है। सैकड़ों देश इसरायल की निंदा करते रहे, मगर हम 135 करोड़ आबादी वाले दुनिया के दूसरे सबसे बड़े राष्ट्र कभी ट्रम्प, तो कभी ओबामा का मुंह ताकते रहे।
इसरायल की यह बर्बरता सारे अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और पारित किए गए विभिन्न प्रस्तावों को अंगूठा दिखाना है। इन हमलों के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है। मौजूदा सरकार की चुप्पी शर्मनाक है - यह भारत की आम स्वीकृति वाली विदेश नीति का निषेध है। सरकारें जब विफल होती हैं, तो जनता को आगे आना होता है। इसलिए जनता और उसके संगठनों को फिलिस्तीन की हिमायत में आवाज उठानी होगी। आवाज उठानी होगी फिलिस्तीनी जनता के हक़ के लिए, अंतर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए और सबसे बढ़कर दुनिया को खुद अपने जीने लायक बनाये रखने के लिए -- क्योंकि भेड़िये सिर्फ एक जगह तक महदूद नहीं रहते। जिस "तर्क" पर इसरायल की धींगामुश्ती चल रही है, वह तर्क सिर्फ रामल्ला या गाज़ा या येरुशेलम तक ही नहीं रुकेगा। आँच दूर तक जाएगी।
*और अंत में*
एक बात गाँठ बाँधने की है और वह यह कि फिलिस्तीन पर हमलों का किसी भी तरह के धार्मिक विवाद से कोई संबंध नहीं है। यह सीधे-सीधे फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा कर उसे अपना उपनिवेश बनाने की साजिश है। जिस पूर्वी यरूशलम पर कब्जे के लिए यह मई 2021 का हमला शुरू हुआ है, वह एक ही पुरखे की निरंतरता में आये दुनिया के तीन धर्मों से जुड़ा ऐतिहासिक शहर है। उस एक किलोमीटर से भी कम दायरे में तीनो धर्मो के जन्म और उनके पैगम्बरों के साथ जुड़ाव के महत्वपूर्ण तीर्थ हैं। यहूदी मान्यताओं के हिसाब से अब्राहम यहीं के थे। ईसा मसीह को यहीं सूली पर चढ़ाया गया था और ईसाई मान्यताओं के हिसाब से यहीं वे पुनर्जीवित हुए थे। मक्का, मदीना के बाद इस्लाम का यह तीसरा सबसे पवित्र धार्मिक स्थल है। इस्लाम धर्म की घोषणा यहीं हुयी थी और इस्लामिक मान्यताओं के हिसाब से पैगम्बर हजरत मोहम्मद यहीं से खुदा के पास गए थे।
-अपूर्व गर्ग
हिंदी में आत्मा कथाएँ फिर भी काफी हैं पर डायरी का प्रचलन कम है। मुझे श्रेष्ठ डायरी मोहन राकेश और दिनकरजी की लगी।
कमलेश्वर ने मोहन राकेश की डायरी के आमुख में लिखा है ‘डायरियाँ एक लेखक का अपना कब्रिस्तान होती हैं ...जिस लेखक ने अपने कब्रिस्तान को नहीं जिया है वह अधूरा ही रहा है।’
दिनकरजी ने आत्मकथा नहीं लिखी डायरी लिखी और कहा था ‘आदमी अपने सही रूप को उस तरह आँक नहीं सकता जिस तरह कोई तटस्थ व्यक्ति आंक सकता है।’
दिनकरजी ने अपनी डायरी में ये भी लिखा ‘मुझे लगता है, मैंने अगर आत्मकथा लिखी, तो वह भी आत्म प्रशंसा से भरी होगी। आत्मकथा में ये रोग स्वाभाविक है। अवगुण दो-एक इसलिए दिखाए जाते हैं कि वर्णन पर शंका न रहे’
बच्चनजी की भी आत्मकथा पर टिप्पणी कर उन्होंने लिखा है कि ‘आत्मकथा में आदमी अपनी प्रशंसा को रोक नहीं सकता यही इस विधा का दोष है।’
कमलेश्वरजी ने संडे मेल में संस्मरण लिखने शुरू किये थे जिन पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी बाद में उन्होंने इन सबको समेटकर तीन भागों में अपनी आत्मकथा लिखी। कमलेश्वरजी ने जो जिया वो अपनी आत्मकथा में खुलकर निर्भीक तरीके से लिखा-
रविंद्र कालिया की ‘ग़ालिब छुटी शराब’ की तरह सबसे दिलचस्प आत्मकथा उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी की है ‘यादों की बरात’।
जोश ने अपनी आत्मकथा लिखने पर कहा है ‘अपना हाल सुनाकर मैं भी हिचकियाँ ले लेकर रो रहा हूँ। ...हाय माजी (अतीत) के डंक!!
अपने कभी के रंग महल में जो हम गए
आंसू टपक पड़े दरों-दीवार देखकर!
राजेंद्र यादव ने अपनी आत्मकथा ! ‘मुड़-मुडक़र देखते हुए’ को आत्मकथ्यांश कहा। उन्होंने लिखा ‘आत्मा कथा वे लिखते हैं जो स्मृति के सहारे गुजरे हुए को तरतीब दे सकते हैं। लम्बे समय तक अतीत में बने रहना उन्हें अच्छा लगता है।’
मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा ‘एक कहानी ये भी’ के लिए साफ-साफ कहा है ‘ये मेरी आत्मकथा कतई नहीं है। कहानी की तरह जि़ंदगी का एक अंश है’
पद्मा सचदेव ने अपनी आत्मकथा ‘बूँद बावड़ी’ के लिए कहा ‘दुनिया की कहानी ही मेरी कहानी है’
पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने खुलकर और बेबाकी के साथ ‘अपनी खबर’ दुनिया को दी है।
अमृता प्रीतम की आत्म कथा ‘रसीदी टिकट’ तथा ‘अक्षरों के साए’ सबसे खूबसूरती से लिखी गयी हैं। अमृताजी अपने जीवन की परतें और व्यक्तिगत जीवन को बहुत कलात्मक सुंदरता और साहस के साथ दुनिया के सामने रखा।
इस्मत चुगताई की आत्मकथा ‘कागज़ी है पैरहन’ बोल्ड और साफग़ोई से बहुत दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गयी है। उन्होंने लिखा है ‘लिखते हुए मुझे ऐसा लगता है जैसे पढऩेवाले मेरे सामने बैठे हैं, उनसे बातें कर रही हूँ और वो सुन रहे हैं। मेरे कुछ हमखयाल हैं, कुछ मोतरिज़ हैं, कुछ मुस्कुरा रहे हैं, कुछ गुस्सा हो रहे हैं। कुछ का वाकई जी जल रहा है। अब भी मैं लिखती हूँ तो यही अहसास छाया रहता है कि बातें कर रही हूँ।’
बच्चनजी की आत्मकथा ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ से ‘दशद्वार से सोपान तक’ का सफर सर्वाधिक चर्चित रहीं। चार खंडों की तीन-तीन सौ पृष्ठों में है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने बच्चन की आत्मकथा के बारे में कहा था कि ‘बच्चनजी की आत्मकथा में केवल व्यक्तित्व और परिवार ही नहीं, समूचा देशकाल और क्षेत्र भी गहरे रंगों में उतरा है।’ डॉ. धर्मवीर भारती ने इसे हिन्दी के हजार वर्षों के इतिहास में ऐसी पहली घटना बताया जब अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से कह दिया है।
अमृत लाल नागर ने ‘टुकड़े- टुकड़े दास्तान’ में बिना किसी आत्मश्लाघा के बहुत सरल शब्दों में अपने जीवन के बारे में लिखा है। नागरजी ने लिखा है ‘टुकड़े-टुकड़े दास्तान’ में भी मैंने खुद को झूठ और बनावट से दूर रखने की हरचंद कोशिश की है। ...आत्मकथा को कोरी- अहम कथा बनाकर लिखने से बेहतर है न लिखना।
भीष्म साहनी की आत्मकथा-‘आज के अतीत’, ‘अपनी बात’ सिर्फ आत्मकथा ही नहीं देश के विभाजन, प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा का एक अहम दस्तावेज है। बंटवारे से लेकर ‘तमस’ तक का उन्होंने जिस तरह सांप्रदायिक घटनाओं वर्णन किया, उसका जवाब नहीं। रूस में उन्होंने जो दिन गुजारे या अफ्रो-एशियाई लेखक संघ की यात्राओं का वर्णन ऐतिहासिक है। ट्यूनीसिया में यासर आराफात भीष्म साहनी से कहते हैं- ‘गांधीजी आपके ही नहीं, हमारे भी नेता हैं। उतने ही आदरणीय जितने आपके लिए।’
परसाईजी ने तो अपनी आत्मकथा ‘हम इक उम्र से वाकिफ हैं’ में सीधे-सीधे पाठकों से कह दिया है- ‘मैं न सैडिस्ट, न मेसाफिस्ट, न तपस्वी, न एबनॉर्मल, न कलंकभूषण, न अटपटा, न सनकी, न उचक्का- तो मेरी आत्म कथा या संस्मरण मैं धरा क्या है ? खाक! उबाऊ चीज ही होगी-सो पाठक भोगें!’
-रमेश अनुपम
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओं से मेरा विधिवत परिचय सन 1970-71 के दौर में हुआ। माना कैंप में नौकरी के दौरान बांग्ला साहित्य और संस्कृति को जानने-समझने तथा उसके निकट आने का मुझे अवसर मिला।
माना कैंप में रहते-रहते गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की अनगिनत कविताएं मैं मूल बांग्ला में पढ़ चुका था। गुरुदेव की ‘संचयिता’ मैंने उसी दौर में खरीद ली थी। लेकिन बहुत दिनों तक गुरुदेव की ‘फांकि ’ कविता मेरी दृष्टि से ओझल रही। इस कविता को मैं सन 2000 के आस-पास ही पढ़ पाया।
इस कविता को पढऩे के पश्चात स्वाभाविक है कि मैं कौतूहल से भर उठा था। मेरे लिए यह बेहद रोमांच का विषय था कि क्या सचमुच गुरुदेव छत्तीसगढ़ आए थे? अगर ऐसा है तो यह छत्तीसगढ़ राज्य के लिए कोई कम सौभाग्यशाली घटना नहीं है।
मुझे लगा इस कविता पर मुझे गंभीरतापूर्वक काम करना चाहिए। काम नहीं शोध, जो गंभीर और किसी निष्कर्ष तक पहुंचाने वाला हो।
पहला सवाल तो यह था कि क्या सचमुच गुरुदेव बिलासपुर आए थे? दूसरा सवाल यह कि इस कविता में बीनू कौन है ? तीसरा सवाल कुछ ज्यादा गंभीर था कि अगर आए थे तो क्यों आए थे ? चौथा सवाल यह कि वह कौन सा कालखंड था जिसमें गुरुदेव बिलासपुर आए थे?
ये चारों सवाल ‘फांकि’ कविता को लेकर मेरे मन में उठ रहे कुछ जरूरी सवाल थे।
पहले बिलासपुर में खोजबीन की।बांग्ला भाषी विद्वानों से मिला। वे ‘फांकि’ कविता से परिचित थे।उनमें से कुछ लोगों का अनुमान था कि गुरुदेव भतीजी को लेकर आए थे। कुछ लोग मानते थे कि गुरुदेव अपनी भांजी को लेकर आए थे। गुरुदेव के पेंड्रा रोड जाने और वहां टी.बी. सैनेटोरियम में इलाज करवाने को लेकर वे सभी एकमत थे।
मैं ‘फांकि’ कविता को बार-बार पढ़ता था। विश्व भारती प्रकाशन से प्रकाशित गुरुदेव की ‘संचयिता’ मेरे पास थी ही। मैं बार-बार ' पतालका ’ सीरीज में जाकर ‘फांकि’ कविता को पढ़ता रहता था। उसके एक-एक शब्द के अर्थ और निहितार्थ को पकडऩे की कोशिश करता था। कुल मिलाकर मैं ‘फांकि’ कविता में पूरी तरह से डूब चुका था। सन् 2005 में कोलकाता गया, वहां से शांति निकेतन भी। तब शैलेंद्र त्रिपाठी शांति निकेतन के हिंदी विभाग में प्राध्यापक थे। डॉ हरिश्चंद्र मिश्र भी शांति निकेतन में ही थे।
मैंने गुरुदेव की ‘फांकि’ कविता को लेकर उन सबसे अपनी जिज्ञासा प्रकट की। सभी ने कहा इस पर बांग्ला विभाग के प्राध्यापकों से भी वे चर्चा कर बाद में मुझे सूचित करेंगे, यह भी कि किन्हीं कारणों से उनसे तत्काल चर्चा संभव नहीं है।
मैं खाली हाथ रायपुर लौट आया।मेरी हालत ‘लौट के बुद्धु घर को आए ’ जैसी हो गई थी। मैं लगातार शांति निकेतन फोन किया करता था, कभी शैलेंद्र त्रिपाठी को, तो कभी प्रो. हरिश्चंद्र मिश्र को। कुछ दिनों बाद शैलेंद्र त्रिपाठी का ही फोन आया कि गुरुदेव के निज सहायक कृष्ण कृपलानी ने अपनी किताब में लिख दिया है कि ‘फांकि’ कविता एक काल्पनिक कविता है। वह किताब मेरे पास भी थी (अभी भी है), पर मेरा दिल न तब मानने को तैयार था और न अब। मैं किसी भी शर्त में ‘फांकि’ कविता को काल्पनिक कविता मानने के पक्ष में नहीं था।
दूसरी बात यह कि मैं औरों की तरह यह मानने को भी तैयार नहीं था कि गुरुदेव अपनी भतीजी या भांजी को लेकर पेंड्रा रोड आए थे।
‘फांकि’ कविता मुझसे बार-बार कह रही थी कि बीनू कोई और नहीं गुरुदेव की चिरसंगिनी मृणालिनी देवी ही हैं। मुझ पर एक अलग ही जुनून सवार था, एक अलग ही पागलपन तारी था। मैंने कोलकाता की ओर ज्यादा से ज्यादा रुख करना शुरू कर दिया।
बांग्ला में जो भी किताबें मुझे इस संदर्भ में मिलती मैं खरीदता रहता था। मृणालिनी देवी से लेकर कादंबरी देवी तक जो भी बांग्ला की किताबें मुझे कॉलेज स्ट्रीट में मिल जाती मैं उसे तुरंत खरीद लेता था।
मैं अपने विश्वास में कायम था कि इस कविता में वर्णित बीनू गुरुदेव की धर्मपत्नी मृणालिनी देवी ही हैं।
इस बीच दो-तीन बार पेंड्रा रोड भी गया। वहां अनेक लोगों ने बताया कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपनी पत्नी को लेकर यहां आए थे। कुछ लोगों ने वे जगहें बताई जहां गुरुदेव बैठते थे। कुछ लोगों ने उनका कॉटेज भी दिखलाया जहां गुरुदेव मृणालिनी देवी के साथ दो महीने तक रुके हुए थे। कुछ लोगों ने बताया कि गुरुदेव ने यहां रहते-रहते एक नाटक का मंचन भी किया था। पेंड्रा रोड में बहुत सारे लोगों की यही राय थी कि गुरुदेव सपत्नीक यहां आए थे।
‘फांकि’ कविता से पहले ‘संचयिता’ के ‘पतालका ’ सीरीज में एक ‘मुक्ति’ नाम की कविता है। इस कविता में गुरुदेव ने जैसे मृणालिनी देवी को ही केंद्र में रखा है। इस कविता में नौ वर्ष में ब्याह होने से लेकर ऐसा बहुत कुछ है जिससे यह प्रदर्शित होता है कि यह कविता गुरुदेव ने मृणालिनी देवी पर लिखी है।
‘मुक्ति ’ और ‘फांकि’ में बेहद सामंजस्य है। दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई कविताएं हैं।
मृणालिनी देवी 12 सितंबर 1902 को चिकित्सा के लिए शांति निकेतन से कोलकाता आई थीं 23 नवंबर 1902 को जोड़ासांको में उनकी मृत्यु हुई। सितंबर से लेकर नवंबर के बीच क्या वे जोड़ासांको में ही रहीं हैं या कहीं और इसकी जानकारी नहीं मिलती है ।
तो क्या इस काल अवधि में वे पेंड्रा रोड में रही हैं? क्या पेंड्रा रोड जाते समय जब उन्हें छ: घंटे बिलासपुर में रुकना पड़ा था उसी समय रूखमणी से मृणालिनी देवी का साक्षात्कार हुआ होगा ?
ये कुछ ऐसी बातें थी जो मुझे यह मानने के लिए उकसा रही थीं कि गुरुदेव निश्चित तौर पर अपनी चिरसंगिनी मृणालिनी देवी को लेकर बिलासपुर और पेंड्रा रोड आए थे।
‘फांकि’ कविता में वर्णित एक-एक शब्द मुझसे कह रह थे कि बीनू कोई और नहीं मृणालिनी देवी हैं। पर यह सब आप सभी सुधि जनों पर छोड़ता हूं इसका फैसला आप सब पर और मेरे जैसे जिज्ञासुओं पर छोड़ता हूं , जो भविष्य में इस पर गंभीरतापूर्वक शोध करेंगे तथा इस कविता के मर्म तक पहुंचने का प्रयत्न भी।
मैं एक अदना सा शोधार्थी
इसके सिवाय और कुछ नहीं।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के छत्तीसगढ़ प्रवास पर जो कुछ भी लिख सका, उसके लिए मैं गुरुदेव को ही श्रेय देना चाहूंगा और गुरुदेव का मैं आजीवन ऋणी रहूंगा।
(बाकी अगले हफ्ते)
भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनन्यतम सखा ठाकुर जगमोहन सिंह..
-बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका-जैसे कुछ देशों में लोग मुखपट्टी लगाए बिना इस मस्ती में घूम रहे हैं, जैसे कि कोरोना की महामारी खत्म हो चुकी है। उन्होंने दो टीके क्या लगवा लिये, वे सोचते हैं कि अब उन्हें कोई खतरा नहीं है लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टी.ए. ग्रेब्रोसिस ने सारी दुनिया को अभी से चेता दिया है। उनका कहना है कि यह दूसरा साल, कोविड-19 का, पिछले साल से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। उसने तो सिर्फ एक खतरा बताया है। वह यह कि कोरोना की इस महामारी के सिर पर अब एक नया सींग उग आया है। वह है- बी.1.617.2. यह बहुत तेजी से फैलता है। यह तो फैल ही सकता है लेकिन मुझे यह डर भी लगता है कि भारत की तरह अफ्रीका ओर एशिया के गांवों में यह नया संक्रमण फैल गया तो क्या होगा ? हमारे गांवों में रहनेवाले करोड़ों लोग भगवान भरोसे हो जाएंगे। न उनके पास दवा है, न डाॅक्टर है और न ही अस्पताल। उनके पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे शहरों में आकर अपना इलाज करवा सकें। इस समय भारत में 18 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना का टीका लग चुका है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है लेकिन अगर कोरोना का तीसरा हमला हो गया तो क्या पता कि अकेला भारत ही दुनिया का सबसे अधिक दुखी देश बन जाए।
भारत अपने भोलेपन पर शायद खुद पछताए। उसने छह करोड़ से ज्यादा टीके दुनिया के दर्जनों देशों को बांट दिए लेकिन अब भी कई देशों के पास करोड़ों टीकों का भंडार भरा हुआ है लेकिन वे उन्हें भारत को देने में आनाकानी कर रहे हैं। रुस-जैसे देश दे रहे हैं लेकिन जो टीका भारत में 100-150 रु. का बनता है, उसे वह हजार रु. में बेच रहा है। यह भी कितना विचित्र है कि भारत की कुछ कंपनियां, जो रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाती है, सिर्फ निर्यात के लिए, उनको अभी तक भारत सरकार ने देश के अंदर इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी है। लाखों इंजेक्शन मुंबई हवाई अड्डे पर पड़े धूल खा रहे हैं। यह ठीक है कि दुनिया के कई छोटे-मोटे देश भारत को ऑक्सीजन-यंत्र, दवाइयां, कोरोना-किट आदि भेंट कर रहे हैं लेकिन वे यह क्यों नहीं सोचते कि भारत के बुजुर्गों को टीके सबसे पहले लगने चाहिए। उन देशों के बच्चों और नौजवानों को उतना खतरा नहीं है, जितना भारत के बुजुर्गों को है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के देशों से अपील की है कि वे फ्रांस और स्वीडन का अनुकरण करें, जिन्होंने अपने वरिष्ठ नागरिकों को टीके लगाने के बाद उन्हें अन्य देशों के जरुरतमंदों को उपलब्ध करवाना शुरु कर दिया है। जो भी हो, भारत के 140 करोड़ लोगों को अपनी कमर कसनी होगी। अगर तीसरा हमला हुआ तो उसका मुकाबला भी डट कर करना होगा। टीका, इंजेक्शन, ऑक्सीजन वगैरह तो जुटाएं ही जाएं, उनके साथ-साथ मुखपट्टी, शारीरिक दूरी, प्राणायाम, काढ़ा, घरेलू इलाज और अपना मनोबल बुलंद बनाकर रखा जाए। (नया इंडिया की अनुमति से)
-बादल सरोज
गाजा पट्टी पर जारी इसरायली हवाई हमलों में बहुत से फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए हैं। 1948 के बाद से फिलिस्तीन की जमीन पर यहूदीवादी-जिओनिस्ट-कैंसर की तरह बढ़ते बढ़ते अब इस इलाके में बचे फिलिस्तीनियों की सबसे सघन बसाहट यहीं बची है। गाजा पट्टी, जिसे जंगखोर और युद्द अपराधी इसरायल ने 2006 से जमीन, समुद्र और हवाई नाकाबंदी में जकड़ा हुआ-दुनिया की सबसे सघन आबादी इलाके में से एक है। करीब 20 लाख फिलिस्तीनी मुस्लिम, ईसाई, यहूदी फिलिस्तीनी इस छोटे से इलाके में रहते है।
यह हमला 2014 के बाद का सबसे भीषण हमला है। यह यहूदीवादी इसरायल और धर्मनिरपेक्ष फिलिस्तीन के बीच में युद्ध नहीं है, यह फिलिस्तीनियों को पूरी तरह मिटा देने के लिए किया गया दुष्ट राज्य-रोग स्टेट-इजरायल है।
इसरायली की मंशा पूर्वी यरूशलम पर पूरी तरह से कब्जा करने की है। ऐसा करने के लिए वह फिलिस्तीनियों पर हमले कर रहा है। इस हमले की शुरुआत नजदीक की बस्ती शेख जर्राह में रहने वालों को जबरन निकालने की इसरायली कोशिशों के खिलाफ उठी आवाज को कुचलने से हुई। हालांकि बाद में खुद इसरायली सुप्रीम कोर्ट ने इन बेदखलियों पर फिलहाल रोक लगा दी थी। मगर हमले जारी हैं। बेदखली की ये कोशिशें, फिलिस्तीनियों को बेदखल करके उनकी जगह यहूदी बसाहटें कायम करने की राह हमवार करने के लिए की जा रही हैं।
पूर्वी यरूशलम दुनिया के तीन धर्मों से जुड़ा ऐतिहासिक शहर है। एक किलोमीटर से भी कम दायरे में तीनो धर्मो के जन्म और उनके पैगम्बरों के साथ जुड़ाव के महत्वपूर्ण तीर्थ हैं। ईसामसीह को यहीं सूली पर चढ़ाया गया था और ईसाई मान्यताओं के हिसाब से यहीं वे पुनर्जीवित हुए थे।
मक्का, मदीना के बाद इस्लाम का यह तीसरा सबसे पवित्र धार्मिक स्थल है। इस्लाम धर्म की घोषणा यहीं हुयी थी और इस्लामिक मान्यताओं के हिसाब से पैगम्बर हजरत मोहम्मद यही से खुदा के पास गए थे। यहूदी धर्म का प्राचीनतम टेम्पल भी पहाड़ी हैं। इस तरह साफ़ हो जाता है कि फिलिस्तीन पर हमलों का किसी भी तरह के धार्मिक विवाद से कोई संबंध नहीं है-यह सीधे सीधे फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा कर उसे अपना उपनिवेश बनाने की साजिश है।
इसरायली सेनाओं ने इनमे से एक ऐतिहासिक स्थल अल अक्सा मस्जिद पर धावा बोला है। इस हमले में रमजान के महीने के दौरान, प्रार्थना कर रहे सैकड़ों लोग घायल हुए हैं ।
हाल में हुए कई चुनावों में इजरायल का प्रधानमंत्री नेतन्याहू बहुमत हासिल करने में बार बार विफल रहा है। अपने क्षुद्र राजनीतिक लाभ के लिए और कोविड महामारी के प्रकोप से जनता को बचाने में अपनी सरकार की विफलता पर पर्दा डालने के लिए, ये हमले किए जा रहे हैं। नेतन्याहू सरकार द्वारा लागू की जा रही रंगभेदी नीतियां इस कोरोना महामारी के बीच भी जारी हैं। इसरायल के कब्जे वाले भूभाग में रह रहे फिलिस्तीनियों के साथ टीका लगाने के मामले में भी भेदभाव किया जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने पूरे इतिहास में जितने प्रस्ताव इसराइल की करतूतों और मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ पारित किये हैं उतने किसी और मामले में नहीं किए-इजरायल की यह बर्बरता सारे अंतरराष्ट्रीय कानूनों और पारित किए गए विभिन्न प्रस्तावों को अंगूठा दिखाना है। भारत की जनता और भारत सरकार हमेशा इजरायल के खिलाफ और फिलिस्तीनी जनता के समर्थन में रहा है। इन हमलों के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है। मौजूदा सरकार की चुप्पी शर्मनाक है-भारत की आम स्वीकृति वाली विदेश नीति का निषेध है।
-अखिलेश प्रसाद
अभी-अभी पैरासिटामोल खरीदने एक दवा दुकान पर जाना हुआ। दुकान वाला इशारे से सभी को लाइन से आने बोल रहा था। हम अपनी बारी का इंतजार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। मेरे आगे एक बुजुर्ग थे। कपड़े के नाम पर नीचे गमछा लपेटे थे और ऊपर एक उधड़ी हुई बनियान। चेहरे पर उदासी और लाचारी साफ झलक रही थी।
अपनी नम्बर आने पर दुकान वाले को उन्होंने दवाई मांगी। गमछे से पैसा निकाला और दे दिया। दुकानदार जब तक पैसा वापिस करता, वे बगल में खड़े हो गए।
अब हमारी बारी आ गई थी। हमने पैरासिटामोल 650 एमजी एक पत्ता मांगा। दुकानदार ने कहा भाई, खत्म हो गई। एक ही पत्ता था। अंकल को दे दिया।
मैं उदास होकर वहां से निकलने लगा, तभी बुजुर्ग ने कहा! मेरे पत्ते से आधा इनको दे दीजिए। हम बोले नहीं रहने दीजिए। हम कोई और दुकान से खरीद लेंगे और आपको ऐसे भी इसकी जरूरत है।
तभी बुजुर्ग बोले, बेटा एक ही रात में थोड़ी न सब टेबलेट खा लूंगा। सामने वाली फूटपाथ पर मेरी बूढ़ी पत्नी लेटी हुई है। उसको बुखार है। एक खाने से ही आज रात भर किसी तरह निकल जायेगा। तुम आधी ले लो, तुम्हारा भी काम हो जाएगा, आज के लिए।
दुकानदार ने कैंची से काटकर मुझे पांच टेबलेट पकड़ाया और बोला कि इतने पैसे आप इनको दे दीजिए। जैसे ही हम पॉकेट से पैसा निकालकर उनको देना चाहा, वे लेने से साफ इंकार कर दिए। बोले कि बेटा अब क्या हम तुमसे इतनी दवाई का पैसा लें। मेरा गला भर आया! मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। सामने सडक़ पार करने पर एक झोपड़ी में वे बुजुर्ग घुस गए। जिसमें से कोई मद्धम रोशनी आ रही थी। मुझे हिम्मत नहीं हुआ कि मैं क्या बोलूं उनको और किस तरह से धन्यवाद दूं।
आज जब करोड़ों रुपये कमाने वाले और महल में रहने वाले नकली दवा का कारोबार में लगे हैं ऐसे वक्त में कोई इंसान अपने हिस्से का दवा मुझे दे गया।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ईद के मौके पर अफगान सरकार और तालिबान ने तीन दिन का युद्ध विराम घोषित कर रखा है लेकिन देखिए कि यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों के खास तीर्थ-स्थल में क्या हो रहा है। यरुशलम, गाजा और आसपास के इलाकों में सैकड़ों लोग हताहत हो रहे हैं। फिलीस्तीनी संगठन हमास ने यहूदी बस्तियों पर सैकड़ों मिसाइल बरसा दिए हैं और जवाब में इजराइल ने अरब बस्तियों पर इतने जबर्दस्त हमले बोल दिए हैं कि जो लोग मरने से बच गए, वे उन इलाकों को खाली करके दूर-दूर भाग रहे हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन कह रहे हैं कि इजराइल को अपनी रक्षा का पूरा अधिकार है और जल्दी ही वहां शांति हो जाएगी। लेकिन तुर्की और मलेशिया जैसे देश इजराइल को इस हिंसा के लिए दोषी ठहरा रहे हैं। उनका इशारा अमेरिका की तरफ है। उनका मानना है कि अमेरिका के दम पर ही इजराइल इतना बड़ा दुस्साहस करता आ रहा है। कुछ हद तक यह सच भी है।
अमेरिका में यहूदियों की संख्या ज्यादा नहीं है लेकिन उनके पास संख्याबल की बजाय धनबल और बुद्धिबल कई गुना ज्यादा है। कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति इजराइल-विरोधी रवैया कभी नहीं अपना सकता है। यद्यपि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इजराइल-फिलस्तीनी संबंधों में सुधार की कुछ पहल जरुर की थी लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीति अभी भी जस की तस चलती दिखाई पड़ रही है। लेकिन मिस्र, कतर और संयुक्तराष्ट्र संघ की कोशिश है कि यह हमास—इजराइल मुठभेड़ शीघ्र ही रुक जाए।
संयुक्तराष्ट्र संघ ने दो राज्यों-इजराइल और फलस्तीन- का प्रस्ताव भी पारित किया है लेकिन उस पर अमल होना तो बहुत दूर की बात है, जिन इलाकों पर इजराइल ने 1967 के युद्ध में कब्जा कर लिया था, उन पर वह न केवल यहूदियों की बस्तियां बढ़ाता जा रहा है बल्कि वह अरबों को वहां से खदेड़ता जा रहा है। आजकल जो युद्ध का माहौल बना है, उसका भी तात्कालिक कारण यही है। अल-अक्सा मस्जिद के निकटवर्ती शेख जर्रा इलाके से अरबों को खदडऩे के कारण ही यह दंगा भडक़ा है।
हमास और इजराइली फौजों ने मिसाइल तो बाद में दागे हैं, चार-पांच दिन पहले फलस्तीनियों और इजराइलियों के बीच सीधे झगड़े हुए हैं। उन दंगों और मारपीट ने ही अब युद्ध का रुप धारण कर लिया है। इस सांप्रदायिक दंगे को युद्ध का रुप देने का एक कारण यह भी हो सकता है कि इजराइल में आजकल भयंकर अस्थिरता चल रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता आजकल डांवाडोल है। उनके लिए राष्ट्रीय महानायक बनने का यही मौका है। उन्होंने अत्यंत उत्तेजक भाषण भी दिया है। ऐसा भाषण कि उनके विरोधी भी उन्हें अपना नेता मानने के लिए मजबूर हो जाएं। इस सारे मामले में भारत की भूमिका बिल्कुल तटस्थ है, जो ठीक है लेकिन वह मूकदर्शक बना रहे, यह उचित नहीं है। इजराइल से भारत के संबंध नरसिंहराव के जमाने से काफी घनिष्ट हो गए हैं और फलिस्तीनी नेता यासिर अराफात तो भारत के प्रिय मित्र रहे ही हैं। भारत चाहे तो अब भी काफी सार्थक भूमिका निभा सकता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-विकास कुमार
इजरायल और फिलिस्तीन का संघर्ष लगभग 73 वर्ष पुराना है। आज तक यह विवाद सुलझ नहीं पाया। महाशक्तियां इसमें अपना -अपना राष्ट्रीय हित देखती हैं। जिस कारण से आज पश्चिमी एशियाई देशों में अस्थिरता बनी हुई है। दोनों देशों के मध्य विवाद के चलते तनाव के कारण युद्ध होते रहते हैं। युद्ध किसी भी जाति, समुदाय, वर्ग एवं देश के लिए नहीं अपितु संपूर्ण मानवता के विरुद्ध है। आधुनिकता में युद्ध की रणनीति में भी परिवर्तन हुआ है। तकनीकी और प्रौद्योगिकी के विकसित स्वरूप में एक क्षण में करोड़ों लोगों को मारा जा सकता है। इसे रोकने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समझौते हुए, परंतु महाशक्तियों के एकल रवैया के कारण यह संपन्न नहीं हो सका। युद्ध में कई परिवार बर्बाद हो जाते हैं, बच्चे अनाथ हो जाते हैं, महिलाएं विधवा हो जाती हैं, और राष्ट्रीय विकास और चरित्र निर्माण का स्तर भी कमजोर हो जाता है।
इजरायल और फिलिस्तीन के बीच पिछले कुछ दिनों से ऐसे ही युद्ध चल रहे हैं। दोनों देशों में भयावह स्थिति हैं। बच्चे चीख चिल्ला रहे हैं , लोग बेघर हो गए हैं, घायल और पीड़ित तड़प रहे हैं, दैनिक जीवन से जूझता कामगार वर्ग छिपा बैठा है और कर्मचारी काम छोड़कर अपनी जान बचाने में लगा है। आख़िर यह बर्बादी का रास्ता मानवता को किस ओर ले जा रहा है। हम भविष्य की पीढ़ियों को क्या सीख दे कर जा रहे हैं? यह बातें सभी महत्वकांक्षीयों के समझ के परे हैं। इन देशों के विवाद का मूल कारण येरूशलम (तकरीबन 35 एकड़ क्षेत्र) है। जो ईसाई, यहूदी एवं मुस्लिम तीनों धर्म का पवित्र एवं प्रमुख क्षेत्र माना जाता है।
तीनों धर्म - मतावलंबियों के लिए यह तीर्थ स्थल है। प्रथम विश्व युद्ध (1914 - 1918) एवं द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) मैं यूरोप में अशांति और अस्थिरता के चलते भारी संख्या में यहूदियों ने इस क्षेत्र में आकर बसना प्रारंभ किया। यह क्षेत्र अरब क्षेत्र का भाग था। जब दोनों में संघर्ष चलने लगा, 1947 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रस्ताव -181 पारित किया और फिलिस्तीन तथा इजरायल नामक दो राज्यों की घोषणा कर दी। इस प्रस्ताव से अरब देश नाखुश थे, मिश्र के नेतृत्व में इजरायल पर हमला कर दिया। यह विवाद तभी से बढ़ता चला गया, जो आज तक तनाव की स्थिति में बना हुआ है।
इजरायल के सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को फिलिस्तीन परिवारों को सीमा क्षेत्र से बाहर करने का एक प्रस्ताव पारित किया। क्योंकि रमजान के चलते अलअक्सा मस्जिद में नमाज के लिए बहुत लोग एकत्रित हुए थे ,जिन्होंने इस प्रस्ताव का विरोध किया। सूत्रों के मुताबिक इस क्षेत्र में हिंसात्मक हमला भी किया। दूसरे पक्ष में इजरायल प्रत्येक वर्ष 10 मई को येरूशलम दिवस मनाता है, जिसमें हमास की ओर से आक्रमण किया गया। जिसके प्रतिउत्तर में इजरायल ने फिलिस्तीन पर हमला कर दिया। युद्ध अभी भी जारी है, जिसमें 80 से अधिक लोगों की जाने गई और 350 से अधिक लोग घायल हैं। इसमें बच्चे ,महिलाएं एवं बुजुर्ग आदि शामिल हैं।
इजरायल एक तकनीकी संपन्न देश है जिसके तकनीकी मिसाल पूरी दुनिया मानती है। हमास द्वारा छोड़े गए मिसाइल और रॉकेट को इजरायल के 'आयरन डोन' ने हवा में ही मार गिराया। इस युद्ध में अरब देश एवं अन्य मुस्लिम देशों के सम्मिलित होने की संभावना है। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से इस संबंध में बात करते हुए फिलिस्तीन का साथ देने को कहा । जिसमें इस्लामिक सहयोग संगठन (1969) की इमरजेंसी मीटिंग बुलाने के लिए भी कहा गया। उधर लेबनान ने भी इजरायल के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी है। तुर्की के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन से बात करते हुए फिलिस्तीन सहयोग की आशा जताई है। ऐसे में एक पक्ष यह बन रहा है कि क्या यह युद्ध दो गुटों में परिवर्तित हो जाएगा? क्योंकि इसमें आशंका नहीं है कि अमेरिका एवं अन्य कई यूरोपीय देश इजरायल के पक्ष में हैं। यही कारण है कि अमेरिकन राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा की युद्ध जल्दी समाप्त होने चाहिए, परंतु इजरायल ने जो आक्रमण किया वह आत्म रक्षा हेतु था। इस संबंध में यही प्रतीत होता है कि आर्मेनिया और अजरबैजान जैसे विवाद की तरह इसमें भी सभी देश अपना हित देख रहे हैं।
इजराइल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अभी तो शुरुआत है , हम उसे इतना तबाह कर देंगे कि भविष्य में आक्रमण करना भूल जाएंगे। प्रतिदिन कई मिसाइल और रॉकेट फिलिस्तीन में दागे जा रहे हैं। हमास भी इजराइल में लगातार आक्रमण कर रहा है। परंतु इजरायल तकनीकी एवं सैन्य सामग्री से अधिक संपन्न है। यही कारण रहा कि 1967 में (सिक्स डेज वार )एवं 2005 में लेबनान के विरुद्ध युद्ध में वह जीता। जब 1967 में इजरायल ने फिलिस्तीन की कई एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया। इस जमीन को छोड़ने को तैयार नहीं है और वहां स्थाई बस्तियां भी निर्मित कर दी थी। 1993 में इजरायल एवं 'फिलिस्तीन मुक्त संगठनों' के बीच ओस्लो शांति समझौता हुआ। इस समझौते में यह प्रावधान किया गया कि कब्जा किए गए सभी अवैध क्षेत्र वापस कर दिए जाएंगे। दोनों देश शांति के साथ रह सकेंगे। इसी बीच हमास (1987) संगठन ने इसका विरोध करते हुए इजरायल के विरुद्ध सर्वनाश की जंग छेड़ दी। दोनों के मध्य आपसी संघर्ष चलते रहे।
इजराइल सीमा में बनी फिलिस्तीन बस्तियों पर सैन्य हमला करता रहता है तो हमास इजरायल में। विगत 5 दिनों से इस युद्ध में फिलिस्तीन और इजरायल में भयावह स्थिति बनी हुई है। फिलिस्तीन में लगभग 80 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई है। जिसमें 17 बच्चे शामिल हैं। यह स्थिति कब तक बनी रह सकती है, इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया जा सकता। क्योंकि दोनों के मध्य विवाद की जड़ पुरानी है और तनाव की स्थिति अधिक है। इजरायल का मानना है कि 1967 के पहले के प्रावधान को नहीं मानेगा, क्योंकि वर्तमान स्थिति कुछ दूसरी है। उसका यह भी कहना है कि फिलिस्तीन से गए हुए शरणार्थी वापस फिलिस्तीन नहीं आएंगे और नाही भविष्य में वह अपनी सेना रख सकता है। यह मत पूर्णतया कट्टरवादी प्रतीत होता है। इस संबंध में भारत का मत बहुत ही स्पष्ट है।
भारत का कहना है कि दोनों देशों के आपसी शांति और सुलह से यह विवाद का निपटारा हो सकेगा। यही कारण रहा कि 2017 में भारतीय प्रधानमंत्री ने जब इजरायल की यात्रा की तो वहीं 2018 में उन्होंने फिलिस्तीन की यात्रा भी की। फिलिस्तीन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च सम्मान 'ग्राउंड कलर ऑफ द स्टेट आफ पलेस्टाइन' से सम्मानित किया गया। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और महाशक्तियों को चाहिए कि इसमें निष्पक्ष रूप से न्यायोचित तरीका अपनाकर निर्णय निर्मित करें। सर्वप्रथम तो दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को युद्ध स्थगित कर देना चाहिए। युद्ध स्थगित के लिए सभी देशों को दबाव डालना चाहिए , क्योंकि इससे निर्दोष लोगों की जानें जा रही हैं। इस समस्या के समाधान का भी व्यावहारिक तरीका ढूंढना चाहिए। कट्टरवाद, हठधर्मिता और गलत रणनीति अपनाकर निपटारा नहीं किया जा सकता। युद्ध जब किसी देश में होते हैं तो आसपास के नागरिक भी इससे प्रभावित होते हैं और वह एक देश से निकाल कर दूसरे देश की ओर जाते हैं। युद्ध और हिंसात्मक तरीका कभी भी सन्मार्ग पर नहीं ले जा सकता।
(रिसर्च स्कॉलर केंद्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक)
-डॉ राजू पाण्डेय
हमारे देश में चल रहे कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम की विसंगतियों को समझने के लिए सरकार और मीडिया द्वारा लगातार दुहराए जाने वाले कुछ कथनों का सच जानना आवश्यक है। आदरणीय प्रधानमंत्री जी अपने संबोधनों में बारंबार दो स्वदेशी वैक्सीन्स का जिक्र करते रहे हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। केवल भारत बॉयोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन को ही स्वदेशी वैक्सीन कहा जा सकता है। कोविशील्ड वैक्सीन तो ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका का भारतीय संस्करण मात्र है। दूसरी बात यह है कि जब हम स्वदेशी वैक्सीन्स का जिक्र करते हैं तो इससे यह ध्वनित होता है कि इन वैक्सीन्स के निर्माता भी भारत सरकार के उपक्रम हैं जिन पर सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण है। किंतु स्थिति ऐसी नहीं है। अधिक उपयुक्त होता यदि प्रधानमंत्री जी "स्वदेशी पूंजीपतियों की निजी कंपनियों द्वारा निर्मित दो वैक्सीन्स" जैसी किसी अभिव्यक्ति का प्रयोग करते। गांधी जी के युग से स्वदेशी शब्द ने अनेक अर्थ धारण किए हैं और अब मोदी काल में स्वदेशी शब्द कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों के औद्योगिक साम्राज्य का पर्यायवाची बनता जा रहा है।
वास्तविकता यह है कि इस भयानक वैश्विक महामारी की विनाशक दूसरी लहर के दौरान हमारे विशाल देश का कोविड-19 टीकाकरण अभियान अब तक दो प्राइवेट निर्माताओं पर आश्रित है। स्वाभाविक रूप से इनकी व्यवसायिक प्राथमिकताएं एवं प्रतिबद्धताएं हैं।
आश्चर्यजनक रूप से वैक्सीन निर्माण से जुड़े भारत सरकार के उपक्रमों को कोविड-19 हेतु वैक्सीन निर्माण की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए इस बात पर घोर आश्चर्य व्यक्त किया था कि एचएलएल बायोटेक लिमिटेड इंटीग्रेटेड वैक्सीन काम्प्लेक्स चेंगलपट्टू तमिलनाडु का उपयोग ऐसी विषम परिस्थिति में भी कोरोना वैक्सीन के निर्माण हेतु क्यों नहीं किया जा रहा है। माननीय न्यायालय ने आश्चर्यपूर्वक कहा- "यह उच्चस्तरीय अत्याधुनिक सुविधाओं वाली केवल वैक्सीन का ही निर्माण करने वाली इकाई है। इस काम्प्लेक्स को राष्ट्रीय महत्व का प्रोजेक्ट माना जाता है। इसकी अनुमानित लागत 594 करोड़ है। बावजूद इन विशेषताओं के पिछले 9 वर्षों से इसे उपयोग में नहीं लाया जा सका है।"
माननीय न्यायालय ने आगे कहा-" एक बात साफ है, सरकार वर्तमान में कोविड वैक्सीन्स निजी निर्माताओं(कोवैक्सीन- भारत बॉयोटेक और कोविशील्ड -सीरम इंस्टीट्यूट) से प्राप्त कर रही है। इसका अर्थ यह है कि भारत सरकार के वैक्सीन निर्माण करने वाले संस्थानों का जरा भी उपयोग नहीं किया गया है।- हमारी पीड़ा यह है कि जब सरकार के पास खुद के वैक्सीन निर्माण संस्थान हैं तब इन मृतप्राय पब्लिक सेक्टर यूनिट्स को पुनर्जीवित कर इनका सार्थक उपयोग किया जाना चाहिए जिससे कि सरकार सभी नागरिकों तक टीका पहुंचा सके।"
एक सहज सवाल जो हम सब के मन में है वह माननीय न्यायालय ने भी पूछा- "यदि कोवैक्सीन को भारत बॉयोटेक ने इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के सहयोग से विकसित किया है तो फिर इसका उत्पादन सरकारी वैक्सीन निर्माण संस्थानों को छोड़कर एकमात्र निजी संस्थान में क्यों हो रहा है?"
ऐसा नहीं है कि राज्यों के मुख्यमंत्री इन सरकारी वैक्सीन इंस्टीट्यूट्स को कोविड-19 वैक्सीन निर्माण में लगाने की मांग नहीं कर रहे हैं। मीडिया में आई खबरों के अनुसार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री जी के साथ 17 मार्च की वीडियो कांफ्रेंस में राज्य के स्वामित्व वाले हॉफकिन इंस्टीट्यूट ऑफ मुम्बई को कोवैक्सीन की टेक्नोलॉजी के स्थानांतरण हेतु अनुरोध किया था किंतु प्रधानमंत्री जी से उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला था।
सरकारी क्षेत्र के अनेक टीका निर्माता संस्थान हमारे देश में हैं। तमिलनाडु में ही बीसीजी वैक्सीन लेबोरेटरी,पॉश्चर इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया जैसे संस्थान भी हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश में सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट, उत्तरप्रदेश में भारत इम्युनोलॉजिकल्स एंड बायोलॉजिकल्स कारपोरेशन लिमिटेड एवं तेलंगाना में ह्यूमन बायोलॉजिकल्स इंस्टीट्यूट भी वैक्सीन निर्माण के सरकारी संस्थान हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार अब जाकर 16 अप्रैल 2021 को भारत सरकार ने वैक्सीन निर्माण हेतु तीन पीएसयू को अनुमति देने की योजना बनाई है। किंतु अब भी स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन आने वाली तीन बेहतरीन वैक्सीन निर्माता सरकारी कंपनियां इस सूची से बाहर हैं।
अमेरिका और इंग्लैंड की सरकारें अपने देश में उत्पादित हो रही वैक्सीन्स को केवल घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित रख रही हैं। यूरोपीय संघ भी अपने सदस्य देशों द्वारा उत्पादित वैक्सीन्स को इन देशों के मध्य ही वितरित कर रहा है। चीन ने कोविड वैक्सीन का निर्यात किया है किंतु वह इसका सबसे बड़ा उत्पादक भी है, वहाँ कोविड-19 संक्रमण नियंत्रित है और शायद वह वैक्सीन उपलब्ध करा कर इस वायरस के प्रसार हेतु खुद को उत्तरदायी ठहराए जाने से बिगड़ी छवि को सुधारना भी चाहता है। प्रसंगवश यह उल्लेख भी कि अधिकांश विकसित देश वैक्सीन निर्माता कंपनियों को वैक्सीन के प्री आर्डर 2020 के मध्य में ही दे चुके थे। अनेक विकसित मुल्क तो अपनी आबादी को दो बार वैक्सीनेट करने लायक संख्या में वैक्सीन के आर्डर दे चुके हैं। इन देशों ने कोविड की विनाशक पहली और दूसरी लहर का बारीकी से अध्ययन कर टीकाकरण के महत्व को समझा है।
अपने देश में उत्पादित वैक्सीन को अन्य देशों को उपलब्ध कराने वाला दूसरा देश भारत है। प्रधानमंत्री जी ने 28 जनवरी 2021 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक में कहा था- "आज भारत, कोविड की वैक्सीन दुनिया के अनेक देशों में भेजकर, वहां पर टीकाकरण से जुड़ी अधोसंरचना को तैयार करके, दूसरे देशों के नागरिकों का भी जीवन बचा रहा हैऔर ये सुनकर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में सभी को तसल्ली होगी कि अभी तो सिर्फ दो मेड इन इंडिया कोरोना वैक्सीन्स दुनिया में आई हैं, आने वाले समय में कई और वैक्सीन भारत से बनकर आने वाली हैं।ये वैक्सीन्स दुनिया के देशों को और ज्यादा बड़े स्केल पर, ज्यादा स्पीड से मदद करने पूरी तरह सहायता करेंगी।"
विदेश मंत्री जी ने 17 मार्च 2021 को राज्यसभा में और स्वास्थ्य मंत्री जी ने 9 अप्रैल 2021 को कोविड-19 पर हुई मंत्री समूह की बैठक में प्रधानमंत्री जी की दूरदर्शिता और मार्गदर्शन की प्रशंसा करते हुए उनके निर्देश पर चलाई जा रही वैक्सीन मैत्री पहल की प्रगति का विवरण दिया। विदेश मंत्रालय का 22 अप्रैल का आंकड़ा बताता है कि भारत 94 देशों को 6 करोड़ 60 लाख वैक्सीन दे चुका है।
इस विवरण में तारीखों का उल्लेख इसलिए कि यही वह कालखंड था जब कोरोना के नए वैरिएंट्स हमारे देश में अपने पैर पसार रहे थे और कोरोना की दूसरी लहर धीरे धीरे रूपाकार ले रही थी। यदि तब इन वैक्सीन्स का उपयोग हमारे देश में हुआ होता तो शायद दूसरी लहर इतनी भयानक नहीं होती। दूसरे देशों को भेजी गई वैक्सीन्स की यह संख्या हमारे दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरों को संक्रमण रोधी कवच पहना सकती थी।
वैसे कहा तो यह भी जा रहा है कि इन 6 करोड़ 60 लाख वैक्सीन में से एक बड़ी संख्या एसआईआई के पिछले कमिटमेंट्स को पूर्ण करने के लिए भेजी गई थी जो उसने कोवैक्स अलायन्स के कॉन्ट्रैक्ट के तहत किए थे। केवल 1 करोड़ 6 लाख 10 हजार वैक्सीन्स ही ग्रांट्स के तहत भेजी गई थीं। प्रदर्शनप्रिय भारतीय सरकार का अन्तरराष्ट्रीयतावाद भी खालिस नहीं था।
भारत को विश्व गुरु बनाना तो नहीं अपितु खुद को विश्व नेता के रूप में प्रस्तुत करना आदरणीय प्रधानमंत्री जी का लक्ष्य रहा है और उन्होंने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को हमारे विकासशील देश पर इस तरह आरोपित कर दिया है कि आज देश जीवनरक्षक वैक्सीन की उपलब्धता के संकट से जूझ रहा है।
शायद प्रधानमंत्री जी को सच बताया नहीं गया। यह भी संभव है कि अब वे सच से परहेज करने लगे हों जिससे उनकी आत्म मुग्धता का रचा आभासी संसार कायम रह सके, सत्य का ताप उसे वाष्पित न कर पाए।
सर्वोच्च अधिकारियों द्वारा सरकार को लगातार गलत परामर्श दिए जाते रहे। दिसंबर 2020 में कोरोना से लड़ाई में सरकार के मजबूत स्तम्भ डॉ वी के पॉल (जो स्वयं एक पीडियाट्रिशियन हैं, न कि महामारी विशेषज्ञ) ने सरकार को बताया था कि हमें केवल 15 करोड़ वैक्सीन्स की जरूरत पड़ेगी। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव श्री राजेश भूषण हाल के दिनों तक कहते रहे हैं कि हम उन्हें ही वैक्सीनेट करेंगे जिन्हें इनकी जरूरत है न कि उन्हें जो वैक्सीन लगाना चाहते हैं। स्थिति के आकलन की यह चूक भयंकर,आश्चर्यजनक और दुुःखद है।
कोविड-19 की वैक्सीन के निर्माण की वर्तमान रणनीति प्रचलित सीजनल इन्फ्लूएंजा वैक्सीन निर्माण क्षमता का त्वरित उपयोग कोविड-19 वैक्सीन के उत्पादन हेतु करने की योग्यता पर आधारित है। भारत में सीजनल इन्फ्लूएंजा वैक्सीन का बाजार बहुत कम है। यह यूरोपीय देशों और अमेरिका में फैला हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2005 में यह अनुभव किया कि वैश्विक महामारी के प्रसार की स्थिति में विश्व में वैक्सीन की कमी पड़ सकती है। यही कारण है कि उसने इन्फ्लुएंजा वायरसेस के लिए ग्लोबल एक्शन प्लान(2006-2016) प्रारंभ किया। इस कारण वैश्विक महामारी हेतु वैक्सीन निर्माण की क्षमता तो बढ़ी किंतु इस वृद्धि से वैक्सीन उत्पादन की असमानता यथावत रही। अभी भी उच्च आय वर्ग वाले विकसित देश लगभग 69 प्रतिशत इन्फ्लूएंजा वैक्सीन का उत्पादन कर रहे हैं जबकि निम्न और मध्यम आय वर्ग के देशों में इस प्रकार की वैक्सीन का उत्पादन 17 प्रतिशत के आसपास है। भारत की तीन कंपनियां इन्फ्लूएंजा वैक्सीन का उत्पादन करती हैं। इनमें से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया सबसे प्रमुख है। शेष दो जाइडस कैडिला और सीपीएल बायोलॉजिकल्स प्राइवेट लिमिटेड हैं।
यदि मोदी सरकार ने उत्पादन क्षमता और संभावित मांग-आपूर्ति का आकलन किया होता तो उसे यह आसानी से समझ में आ जाता कि हमारी क्षमता अपनी खुद की आबादी को भी वैक्सीनेट करने की नहीं है। जिन दो उत्पादकों पर उसने भरोसा किया है- भारत बॉयोटेक और एसआईआई- वे समूचे देश की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते। हमने विदेशी वैक्सीन निर्माताओं को अपने देश में आने नहीं दिया। स्वास्थ्य मंत्री जी ने फाइजर की भारत में वैक्सीन निर्माण की क्षमताओं पर सवाल उठाए।
सरकार के सामने दो विकल्प थे- स्वयं वैक्सीन का उत्पादन करना अथवा अधिकाधिक निजी वैक्सीन निर्माताओं को मैदान में उतारना। वर्तमान सरकार तो पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स को बेचने पर आमादा है, उससे यह कम ही आशा थी कि वह सारी सरकारी टीका कंपनियों को पुनर्जीवित करेगी।
सरकार का निर्णय बताता है कि संकीर्ण राष्ट्रवाद और देशी पूंजीपतियों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति साथ साथ चलते हैं। सरकार चाहती तो देश के सम्पन्न लोगों को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लाभ मिल सकते थे। विदेशी वैक्सीन निर्माता कंपनियों के प्रवेश के बाद कम कम से आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के पास अलग अलग प्रकार की वैक्सीन्स में से चुनने का अवसर उत्पन्न होता, शायद प्रतिस्पर्धा के कारण वैक्सीन की कीमतें भी नियंत्रित होतीं।
इसके साथ साथ यदि सरकारी क्षेत्र के उपक्रम भी टीके का उत्पादन करने लगते तब निजी कंपनियों पर और दबाव बनता तथा कीमतें काबू में रहतीं। यदि ऐसा नहीं भी होता तब भी कम से कम देश के निर्धन वर्ग को समय पर मुफ्त वैक्सीन मिलने की गारंटी होती।
प्रधानमंत्री जी ने अदार पूनावाला के सीरम इंस्टीट्यूट का दौरा कर पता नहीं देश के लोगों को क्या संदेश देने की कोशिश की थी। लेकिन इसके बाद मीडिया ने पूनावाला को एक राष्ट्रभक्त धनकुबेर के रूप में प्रस्तुत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। यदि प्रधानमंत्री जी भी कुछ ऐसा ही जाहिर करना चाहते थे तो बाद के घटनाक्रम ने इस झूठ को उजागर कर दिया। अदार पूनावाला अपनी व्यावसायिक प्रतिबद्धताओं को ऊपर रखते दिखे। सरकार ने उन्हें राज्यों और प्राइवेट अस्पतालों को मनचाही कीमत पर वैक्सीन बेचने का अवसर भी प्रदान किया। वे उस अवसर का आनंद भी लेते किंतु वे यह भूल गए थे कि व्यापारियों का भला इसी में है कि वे राजनीतिज्ञों से दूरी बनाए रखें। वैक्सीन की कमी से बौखलाए राजनेताओं का दबाव उन पर भारी पड़ा और अब वे देश से बाहर हैं।
बहरहाल अभी स्थिति यह है कि देश में टीकाकरण कार्यक्रम विसंगतियों और खामियों सर्वश्रेष्ठ संकलन बना हुआ है। सरकार को शायद डिजिटलीकरण के सरकारी आंकड़ों पर ज्यादा यकीन है न कि जमीनी हकीकत पर। यही कारण है कि वैक्सीनेशन के लिए ऑन लाइन पंजीयन अनिवार्य बनाया जा रहा है। यह ग्रामीण भारत और निर्धन भारत को वैक्सीनेशन से दूर कर सकता है। लेकिन विडंबना तो यह है कि क्रैश होते कोविन पोर्टल पर उस वैक्सीन के रजिस्ट्रेशन की मारामारी है जो स्टॉक में है ही नहीं। वैक्सीन की भारी कमी के बीच प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से हम 11-14 अप्रैल के बीच टीका उत्सव मना चुके हैं और अब जब टीकों का नितांत अभाव है तब हमने 1 मई से 18-44 वर्ष आयु वर्ग के लोगों का टीकाकरण शुरू कर दिया है। यह तय नहीं है कि जो 50 प्रतिशत वैक्सीन सीधे कंपनियों से खरीदी जानी है उसमें राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों की कितने प्रतिशत की हिस्सेदारी होगी। निजी अस्पताल वैक्सीन निर्माताओं को ज्यादा दाम देंगे। कहीं यह स्थिति न बन जाए कि राज्य सरकारों के पास इसलिए टीके न हों क्योंकि टीका निर्माता ने ज्यादा मुनाफा देखकर निजी अस्पतालों को टीके बेच दिए हैं।
अब तो स्थिति यह है कि पंजाब, उड़ीसा जैसे अनेक राज्य कोवैक्स अलायन्स जॉइन करने और ग्लोबल टेंडर करने की बात कर रहे हैं। वैश्विक महामारी के दौर में हमारा देश बंट रहा है।
कुछ बुद्धिजीवी और कानूनविद लगातार यह आपत्ति उठाते रहे हैं कि हमारा टीकाकरण कार्यक्रम जीवन के अधिकार का सम्मान नहीं करता। जीवन का अधिकार एक सार्वभौमिक अधिकार है, हर व्यक्ति को चाहे वह किसी भी जाति,धर्म,सम्प्रदाय या लिंग का हो, चाहे वह निर्धन या धनी हो, उसे यह अधिकार प्राप्त है। हमारा टीकाकरण कार्यक्रम तो अलग अलग लोगों के जीवन की अलग अलग कीमत लगा रहा है। यदि टीके का एक मूल्य भी होता तब भी अलग अलग आर्थिक स्थिति के लोगों पर यह मूल्य पृथक पृथक प्रभाव डालता। इसीलिए मुफ्त टीकाकरण आवश्यक है। यह तभी संभव है जब सरकार टीकों का उत्पादन और वितरण खुद करे।
सरकार चलाने वाले नेता और नौकरशाह बड़ी हिकारत से इन तर्कों को सुन रहे हैं- बीते युग के घिसे पिटे कान पकाऊ तर्क!
इधर लोग हताश हैं, घबराए हुए हैं, मौत का तांडव जारी है। सचमुच इस निर्मम समय में मानव जीवन से सस्ता और महत्वहीन कुछ और नहीं।
रायगढ़, छत्तीसगढ़


