विचार / लेख
-सनियारा खान
मक़बूल शेरवानी वह नाम है, जिसे भारतीय सेना ने हमेशा एक जांबाज देशप्रेमी के रूप में सम्मान दिया है। इसी लडक़े के बारे में मुल्क राज आनंद जी ने ‘डेथ ऑफ़ ए हीरो’ लिखा था।
अक्टूबर 1947 का यह वाकय़ा है। आज़ादी को ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था। सीमावर्ती इलाक़ों में बारूद की गंध फैली हुई थी। पाकिस्तानी सेना कश्मीर हथियाने की पुरज़ोर कोशिश में थी। श्रीनगर विमानतल पर उन लोगों की ख़ास नजऱ थी, क्योंकि उन्हें मालूम था कि अगर वे विमानतल पर कब्जा कर लेते, तो भारतीय सेना कश्मीर में कदम नहीं रख पाती और उस सूरत में हिंदुस्तान कश्मीर को खो देता।
कश्मीर जल रहा था। अराजक तत्वों द्वारा लूट-पाट, हत्या और बर्बादी का भयानक मंजऱ चल रहा था। उन्हें रोकने के लिए भारतीय सेना अभी कश्मीर नहीं पहुँच पाई थी। दिल्ली भी उस वक़्त पूरी तरह स्थिर नहीं थी।
उसी समय बारामुला के राजपथ पर उन्नीस साल का एक मामूली कश्मीरी लडक़ा खड़ा था। उसका नाम था मक़बूल शेरवानी। यह लडक़ा राष्ट्रीय कांग्रेस सम्मेलन का एक युवा सदस्य होने के साथ-साथ एक देशप्रेमी और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी माना जाता था। एक बार इस लडक़े ने मोहम्मद अली जिन्ना को भी सांप्रदायिक राजनीति को लेकर खरी-खोटी सुनाई थी।
पाकिस्तानी दुश्मनों का सामना इसी मक़बूल से हुआ। उन्होंने मक़बूल से श्रीनगर विमानतल पहुँचने का सबसे जल्दी वाला रास्ता पूछा। मक़बूल को माजरा समझ में आ गया। उसके दिल में एक ही बात थी—उन लोगों को इधर-उधर भटकाए रखना, ताकि उनसे पहले भारतीय सेना किसी तरह श्रीनगर विमानतल पहुँच जाए।
मक़बूल ने उनसे कहा,
‘मुझे रास्ता मालूम है। मेरे पीछे-पीछे आइए।’
अब वह उन्हें सीधे रास्ते से न ले जाकर जंगल और पहाड़ों के बीच से ख़तरनाक रास्तों पर घुमा रहा था। वह शिद्दत से चाहता था कि इस तरह वक़्त बर्बाद होता रहे और भारतीय सेना को श्रीनगर विमानतल पर उतरने का मौका और समय मिल जाए। वे सभी लोग पूरी तरह राह भटक चुके थे, और आखऱिकार दुश्मनों को भी समझ में आ ही गया कि यह छोटा-सा कश्मीरी लडक़ा उन्हें बेवकूफ़ बना रहा है।
इस बीच भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट श्रीनगर विमानतल पर पहुँच चुकी थी। अपना मिशन नाकाम होने पर पाकिस्तानी सेना ने ग़ुस्से में मक़बूल को बारामुला के बीच रास्ते में एक खंभे से बाँध दिया। उसके हाथों में कीलें ठोक दी गईं और सिर पर बंदूक तान कर हुक्म दिया गया—
‘कहो, पाकिस्तान जि़ंदाबाद।
कहो, शेर-ए-कश्मीर मुर्दाबाद।’
दर्द को दरकिनार करते हुए मक़बूल ने जवाब दिया—
‘हिंदुस्तान जि़ंदाबाद।
हिंदू-मुस्लिम की दोस्ती जि़ंदाबाद।’
ग़ुस्से में पागल होकर पाकिस्तानी पश्तून जनजाति के चौदह लोगों ने मिलकर उसका पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया। वह ज़मीन पर गिर पड़ा। लेकिन वह अपने मक़सद में कामयाब हो गया था। श्रीनगर बच गया था।
भारतीय सेना को बारामुला पहुँचकर मक़बूल का मृत शरीर मिला। उस दिन अगर वह यह हिम्मत नहीं दिखाता, तो आज शायद कश्मीर का नक़्शा ऐसा नहीं होता। भारतीय सेना ने हमेशा मक़बूल शेरवानी को वह सम्मान दिया है, जिसका वह हक़दार है। बारामुला में मक़बूल शेरवानी के नाम पर एक थिएटर और एक स्मृति-स्थल भी है।
उन्नीस साल का यह लडक़ा देश के लिए मरकर यह सिखा गया कि देशप्रेमी होने के लिए हिंदू या मुसलमान होने से पहले इंसान होना जरूरी होता है।


