विचार / लेख
-अशोक पांडे
वहां से आने वाली ख़बरें उसे एक ऐसी धरती के रूप में दिखाती हैं जिसमें चारों तरफ सिफऱ् गर्द और ख़ौफ़ है, जहाँ अन्याय का विरोध का करने पर मौत मिलती है, जहाँ औरतें गुलामों से भी खऱाब हालातों में रहने को मजबूर बना दी गई हैं, जहाँ गीत गाना या कोई साज़ छेडऩा ईश्वर का अपमान करना समझा जाता है।
2021 में तालिबान के दूसरी बार सत्ता कब्जाने के बाद स्थितियां बदतर हुई बताई जाती हैं। जीना, विशेषत: महिलाओं के लिए जीना किसी लम्बी सज़ा काटने जैसा हो चुका है। लड़कियां छठी से आगे नहीं पढ़ सकतीं। अस्पताल जैसी जगहों के अलावा उन्हें कहीं भी नौकरी करना निषिद्ध है, परिवार के किसी पुरुष के साथ के बगैर न वे बाहर जा सकती हैं, न लम्बी यात्राएं कर सकती हैं, सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें बुर्का पहनना अनिवार्य है।
खेल, सिनेमा, नाटक वगैरह में उनका जाना अपराध है। अस्पतालों में बहुत कम संख्या में महिला डॉक्टर और नर्सें हैं जबकि महिलाओं को पुरुष डॉक्टर को दिखाना भी मना है। पूरे देश की किसी भी अदालत में कोई महिला जज नहीं है, घरेलू हिंसा, जबरन विवाह, बाल-विवाह पर कोई कानून नहीं है, उलटे ऐसी किसी भी शिकायत करने पर सज़ा का प्रावधान है।
बाल-विवाह और किसी के भी साथ जबरन ब्याह दिया जाना आम है। स्त्री को एक संपत्ति माना जाता है। पूरे मुल्क में मोरल पुलिस घूमती रहती है जो सडकों पर निगरानी करती है और औरतों के कपड़ों, उनकी आवाज़, उनके साथ रहने वालों पर नजऱ रखती है। एक भी नियम टूट जाय तो सबके सामने कोड़े मारे जाते हैं, जेल में डाल दिया जाता है।
31 जुलाई 2024 को जारी किए गुए एक फतवे के बाद तालिबानी विचारधारा ने औरत शब्द की आधिकारिक परिभाषा बताई – औरत ऐसी चीज़ है जिसे पूरी तरह ढँका जाना चाहिए। उसका चेहरा, उसका हँसना बोलना, गाना, और सार्वजनिक जगहों पर उसकी मौजूदगी – सब कुछ औरत है।
स्त्री को इंसान नहीं, एक नैतिक ख़तरा बताने वाली इस सत्ता ने उसकी आवाज़ को भी औरत की परिभाषा का हिस्सा बनाया – यानी उसकी आवाज़ घर की दीवार के बाहर कहीं भी सुनाई दे जाय तो उसे अपराध माना जाएगा।
इस सारी अमानवीयता के बीच, कहीं भीतर, इसी मुल्क के भीतर से रिस कर कुछ आवाज़ें अब भी बाहर आ जाती हैं और दुनिया को अपना पता बताती हैं। अपने घर में उनका अस्तित्व फुसफुसाहटों से अधिक नहीं लेकिन सुनने वाले कान उन्हें सुन लेते हैं।
अफगानिस्तान की दो युवा बेनाम बहनों ने तालिबान का विरोध करते हुए यूट्यूब पर अपना एक म्यूजिक चैनल बनाया – द लास्ट टॉर्च! उन दोनों के असल नाम आज तक कोई नहीं जानता।
अफगानिस्तान की औरतों की पहचान बन चुके नीले बुर्कों में अपना ढँक कर गाने वाली ये दो बहनें सिर्फ अपनी कांपती-लरज़ती आवाजों की मदद से अपनी कहानी दुनिया के सामने कहती हैं। उनके गाने में किसी भी तरह का कोई साज़ इस्तेमाल नहीं होता – वैसे भी तालिबानों ने सुनिश्चित कर रखा है कि पूरे मुल्क में कहीं भी एक भी साज़ बचा न रहा जाए – न कोई हारमोनियम, न गिटार, न रबाब, न पन्दूर, न तबला। सब कुछ जलाया जा चुका है।
इन दो बहनों का गाना एक ऐलान है। एक इनकार है।
काबुल पर बर्बरों के कब्ज़े के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने अफग़़ानिस्तान की कवयित्री नाडिया अंजुमन की एक कविता को अपने स्वर में गा कर पोस्ट किया। साल 2005 में सिर्फ 25 साल की उम्र में अत्यंत प्रतिभाशाली नाडिया अंजुमन की हत्या उनके ही पति और उसके घर वालों ने मिल कर कर दी थी- उसका का जुर्म सिर्फ यह था की उसने शायरी लिखने का पाप किया था। बहनों ने गाया:-
मेरे मुंह में जहर भर दिया गया है
शहद की बात कैसे करूँ?
अफ़सोस, मेरा मुँह एक बेरहम मुक्के ने कुचल दिया है
काश वह दिन भी आए जब मैं कैद का पिंजरा तोड़ सकूँ,
इस तन्हाई से आज़ाद होकर
खुशी में गा सकूँ।
अपने घर के किसी कोने में डरी हुई, काँपती आवाजों में गाती हुई ये बहनें एक अभागे देश की सारी औरतों के भीतर जमे हुए गुस्से को जबान दे रही थीं। वे औरतों पर हो रहे जुल्म, उन पर लादी गई कैद, और रोजमर्रा के जीवन में मिलने वाली तौहीन की बात कर रही थीं। यह कोई मनोरंजन नहीं था- एक गवाही थी। गोया जिंदा होने की शहादत।
छोटी बहन ने बाद में एक इंटरव्यू में कहीं कहा कि उसने तालिबान की वापसी से पहले कभी कविता नहीं लिखी थी। ‘यह सब उन्होंने हमसे लिखवाया,’ उसने कहा। यह एक वाक्य नहीं-पूरा साहित्य है। अक्सर जुल्म ही ज़बान को जन्म देता है। जब बोलने के तमाम रास्ते बंद कर दिए जाएँ, तब शायरी दीवारें फाँद लेती है।
इसलिए उन्होंने अपने समूह का नाम रखा-द लास्ट टॉर्च। आखिरी मशाल। जैसे यह मानते हुए कि अँधेरा बहुत गाढ़ा है, और रौशनी बहुत कम। लेकिन मशाल की फि़तरत ही यही है - वह अँधेरे से यह नहीं पूछती कि वह कितना फैला है। वह बस जलती है।
इन गीतों में कोई बड़े नारे नहीं हैं, कोई लम्बे मंसूबे नहीं। इनमें रोजमर्रा की जिंन्दगी है-बंद स्कूल, खिड़कियों पर पड़े पर्दे, गलियों में पसरा डर, और घरों के भीतर घुटन।
वे यह भी दावा नहीं करतीं कि वे नायिकाएँ हैं। वे बस इतना कहती हैं कि वे साँस लेना चाहती हैं - इज़्ज़त के साथ।
सोशल मीडिया उनके लिए एक छुपा हुआ मंच बन गया। घर की चारदीवारी के भीतर बैठकर दर्ज किया गया विरोध। यह एक नई कि़स्म की बग़ावत है - जहाँ हथियार नहीं, अल्फ़ाज़ हैं; जहाँ चेहरा नहीं, आवाज़ है; जहाँ शोर नहीं, लगातार जलती लौ है।
उनका गाना सुनते हुए बार-बार यह खय़ाल आता है कि दुनिया कितनी आसानी से ख़ामोश हो जाती है। हम ख़बर पढ़ते हैं, वीडियो देखते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन किसी के लिए यह ख़बर नहीं - जि़न्दगी है। इन बहनों का साहस इसी में है कि वे हमारी आरामदेह दूरी में एक बेचैनी पैदा करती हैं।
द लास्ट टॉर्च कोई तहरीक नहीं। एक इशारा भर है। एक याददिहानी कि जब सब कुछ बुझा दिया जाए, तब भी कुछ लोग माचिस की तीली बचा लेते हैं। और कभी-कभी, तारीख़ की दिशा वही छोटी-सी लौ बदल देती है।
कुछ समय पहले अपनी जान बचाने की गरज से दोनों अपना मुल्क छोड़ कर किसी अनाम जगह पर अनाम जि़ंदगी बिता रही हैं ताकि सत्ता की क्रूरता कहीं उनकी आवाज़ को पूरी तरह खामोश ही न कर दे, जिसने अभी उम्मीद की बहुत सारी कहानियां कहनी हैं।
हो सकता एक दिन ये बहनें अपने बुकऱ्े उतारकर खुले आसमान के नीचे भी गाने लगें।
दुआ ही कर सकते हैं!


