विचार / लेख

अपनी-अपनी भावनाओं का बिहार!
25-Oct-2025 10:34 PM
अपनी-अपनी भावनाओं का बिहार!

-हेमंत कुमार झा

अंजना ओम कश्यप बिहार आई हैं। अपने आने को और बिहार चुनाव के अपने कवरेज को विज्ञापित करते हुए उनका छोटा सा वीडियो यूट्यूब पर अभी दिखा। वे बोल रही थी, ‘बिहारी गिर कर उठते हैं, गिरते हैं, फिर उठते हैं।’ वे आगे भी कुछ बोल रही थी जो शब्दश: तो ध्यान में नहीं लेकिन ऐसा ही कुछ था कि ‘बिहारी आसमान को नया रंग देते हैं...।’

रिमोट का बटन दबा तो अगला वीडियो भी आजतक न्यूज चैनल का ही आया। कोई रिपोर्टर रेलवे स्टेशन पर रुकी बिहार आने वाली किसी ट्रेन के स्लीपर क्लास में बैठे यात्रियों को दिखा रहा था, ‘ये देखिए बिहार जाने वाली ट्रेन, स्लीपर क्लास में किस तरह यात्री ठुंसे हुए हैं, स्लीपर का हाल भी जनरल क्लास जैसा ही है।’

रिपोर्टर आगे बढ़ता है और ट्रेन के टॉयलेट की टूटी खिडक़ी में कैमरा फोकस कर बताता है, ‘ये देखिए, टॉयलेट में भी लोग भरे हुए हैं, गेट पर इतनी भीड़ है कि घुसना नामुमकिन है लेकिन लोग हैं कि घुसे जा रहे हैं।’

तभी, वही रिपोर्टर चिल्लाता हुआ आगे दौड़ता है और ट्रेन की खिडक़ी से भीतर घुसते हुए लोगों पर कैमरा केंद्रित कर लगभग हांफते हुए बोलता है, ‘ये देखिए, गेट से घुसने में मुश्किल है तो ये भाई साहब खिडक़ी से ही घुसे जा रहे हैं।’ खिडक़ी में घुसते यात्री को ऊपर उठा कर घुसाने में मदद करने के बाद खुद भी खिडक़ी में जाने का प्रयास करते साथी से रिपोर्टर पूछता है, ‘बिहार में कहां जा रहे हैं?’  ‘जहानाबाद...’, यात्री जवाब देता है। फिर रिपोर्टर प्लेटफार्म पर की भयानक भीड़ पर कैमरा घुमाते हुए अपनी रिपोर्टिंग जारी रखता है, ‘यही है बिहार, यही हैं बिहारी, अपनी मिट्टी से, अपनी संस्कृति से, अपने पर्व त्योहार से कितना प्रेम है इन्हें, ये हम यहां देख पा रहे हैं। ये अपनी माटी, अपनी संस्कृति को नहीं भूलते और इतना कष्ट सह कर भी छठ में अपने गांव जा रहे हैं।’

कैमरा प्लेटफार्म की भीड़ में शामिल चेहरों पर जूम होता है। धंसी आंखों, असमय बूढ़े हुए अधेड़ों के सूखे चेहरे, ऊर्जा से सराबोर लेकिन थके टूटे चेहरे लिए नौजवान, भीड़ देख कर आंखों में भय का बोझ समेटे महिलाओं के झुंड, भीड़ की रेलमपेल से हैरान परेशान बच्चे...।

यहां दानापुर, पटना, आरा, मोकामा स्टेशनों पर ऐसी ही ट्रेनों में जानवरों की तरह ठुंसे हुए आए और अब उतरे परेशान हाल यात्रियों के आगे पीछे रिपोर्टर्स की भीड़ दौड़ती है, ‘बिहार में चुनाव है, आप वोट देने के लिए रुकेंगे कि छठ के बाद लौट जाएंगे? किसको वोट देंगे? क्या लगता है आपको, चुनाव में क्या मुद्दा है?’ कोई यात्री रिपोर्टर को अनसुना कर आगे बढ़ जा रहा है, कोई जवाब देता है, ‘अपना काम देखेंगे कि वोट देखेंगे, छठ के बाद जल्दी नहीं जाएंगे तो काम से भी जाएंगे, चुनाव तो नेतवन के लिए है, हमारे लिए क्या है, भर दिन मजदूरी करते हैं तो शाम को बाल बच्चा खाता है।’

रिमोट का अगला बटन दबता है। कोई परिचर्चा चल रही है। एक गंभीर से दिख रहे विश्लेषक बोल रहे हैं, ‘बिहार के वोटर बहुत मेच्योर हैं। बिहार देश की राजनीति को रास्ता दिखाता रहा है। इस बार का चुनाव दोनों पक्षों के उलझे समीकरणों को देखते हुए लगता है कि जनता ही लड़ेगी।’

अगला विश्लेषक पिछले की बात को आगे बढ़ाता है, ‘और जब जनता चुनाव लड़ती है तो राजनीति बदल जाती है, इस बार का चुनाव कैसे परिणाम लाएगा इस पर अभी कुछ नहीं कह सकते, लेकिन इतना कह सकते हैं कि बिहारी वोटर ने कई बार देश को चौंकाया है, इस बार भी ऐसा ही कुछ लगता है।’

बिहार, बिहार के नौजवान, बिहार के श्रमिक, बिहार की मिट्टी, बिहार की संस्कृति, बिहार के वोटर...एक रूमानियत...निष्ठुर रूमानियत सी छाई रहती है जब रिपोर्टर्स या विश्लेषक इन पर चर्चा करते हैं। जी करता है कि इनमें से किसी को पकड़ कर किसी ट्रेन के शौचालय में खड़ी भीड़ में धकेल दें और कहें कि 24-26 घंटे इस शौचालय में खड़े खड़े यात्रा करो और याद करो कि कितनी फिलासफी, कितना विश्लेषण झाडऩे लायक तुम रह जाओगे।

अभी पिछले सप्ताह ही एक रिपोर्टर बनारस की संकरी गलियों में अंधकूप से बने ब्वायज हॉस्टल्स के अंधेरे कमरों में दिखा रहा था कि बिहार से गए बच्चे किस तरह वहां रह रहे हैं। बिना किसी खिडक़ी के भयानक उमस भरे उन बेहद छोटे छोटे अंधेरे कमरों में तीन तीन बेड लगे थे जहां कुर्सी रखने की जगह भी नहीं थी, टेबल की कौन कहे। निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के लग रहे वे बच्चे, जो उन कमरों में रह रहे थे, रिपोर्टर को बता रहे थे, ‘मैंने बिहार में फलां यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया था, लेकिन जब यहां के कॉलेज में हो गया तो वहां का एडमिशन कैंसिल करवा लिया।’ बच्चे बता रहे थे, ‘बिहार में जिस कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ था वहां तो मेरे सब्जेक्ट में सिर्फ एक टीचर थे, कई सब्जेक्ट में तो टीचर थे ही नहीं, क्या करते हम लोग, यहां एडमिशन मिल गया तो आना पड़ा।’

रिपोर्टर दिन के उन उमस भरे अंधेरों में कमरे में जलते बल्बों पर कैमरे को फोकस करता बोल रहा था, ‘बिहार के बच्चों के जीवट का लोहा सारा देश मानता है। ये लोग पत्थर पर उगी दूब की तरह अपनी प्रतिभा और अपनी मेहनत के बल पर देश की किसी भी परीक्षा में अग्रणी स्थान हासिल करते हैं।’ वह बिहार की मिट्टी में समाई जिजीविषा का महिमा गान करता अपनी बातों को आगे बढ़ा रहा था।

बिहार रिपोर्टिंग के लिए अच्छा मसाला है। हर साल छठ पर दिल्ली, बैंगलोर, गाजियाबाद, सूरत आदि शहरों के रेलवे स्टेशनों पर जा कर रिपोर्टर्स बेसंभाल, बेशुमार भीड़ को दिखाते हैं, लोगों की हालत देख कर कलेजा मुंह को आने लगता है, बिहार के नेता, बिहार के वोटर और बिहार की राजनीति...सबसे वितृष्णा होने लगती है। यह वितृष्णा तब और बढऩे लगती है जब अंजना ओम कश्यप जैसी नामी रिपोर्टर बिहार के शहरों में घूमती, बिहारी वोटर्स से बतियाती दार्शनिक अंदाज में बोलती है, बिहार आसमान में नए रंग भरता है, बिहारियों की मेहनत से महानगरों की रफ्तार तय होती है आदि आदि।

जब भी बिहार में कोई अवसर आता है, जब भी कहीं बिहारियों को पीटा जाता है, जब भी कहीं बिहारियों को भगाया जाता है, जब भी छत दिवाली का त्योहार आता है, बिहार और बिहारी पूरे देश के लिए तमाशा बनते हैं, न्यूज चैनल्स वाले, यूट्यूब वाले आदि इस तमाशे को खूब भुनाते हैं। बिहारी कैमरों से इस तरह शूट किए जाते हैं जैसे चिडिय़ाघर से निकले कोई अजीब से जीव हों जो पूरे भारत में सिर्फ बिहार में ही पाए जाते हैं, जो अपनी मेहनत से महानगरों की जीवन रेखा को संवारते हैं, जो देश की फैक्ट्रियों में अपनी मेहनत और अपने शोषण का ईंधन डालते हैं।

और जब चुनाव होते हैं बिहार में, तो विश्लेषक गण एक बात कहना नहीं भूलते, बिहार के वोटर बहुत मेच्योर होते हैं।

अभी कल ही एक रिपोर्ट सुन रहा था कि 1990 में बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश की सबसे निचली पंक्ति में था, 2005 में भी सबसे नीचे था, और...अब 2025 में भी प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में सबसे पीछे ही है। लेकिन, बिहार के वोटर्स की मैच्योरिटी और बिहारी मजदूरों के जीवट की प्रशंसा हर कोई करता है।

यह जीवट और यह मैच्योरिटी बिहार को बदलने में कारगर क्यों साबित नहीं होती? यह अंतर्विरोध ही बिहार को परिभाषित करता है।


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