विचार / लेख
दिनेश राय द्विवेदी
घर पर अभी भी फिजिकली एक अखबार आता है। पर खबरें? उसमें बहुत कम होती हैं। जिन्हें हम लीड खबरें कहते हैं उनकी दशा बहुत खराब है।
आज का अखबार सामने है। लीड में खबर है ‘सत्ताईस दिन बाद’ ‘मंत्रिमंडल का गठन आज’ 18 से बीस मंत्री ले सकते हैं शपथ। नीचे संभावित मंत्रियों के नाम हैं, सीएम और दो डिप्टी सीएम के कुछ सप्ताह पहले शपथ लेने की खबर का दोहराव है।
अब आप खुद सोचिए ये खबर है? केवल सस्पेंस बनाए रखना है। मुआ अखबार न हुआ जासूसी नॉवल की स्टोरी हो गयी। आज मंत्रिमंडल का गठन हो जाता सबके नाम छाप देते तो खबर होती। पर मुखपृष्ठ का आधा तो विज्ञापन है शेष के दो तिहाई में यह सस्पेंस है और एक तिहाई में खबर है ‘यूपी की तर्ज पर छापे’ तीसरे दिन 3426 बदमाश गिरफ्तार, अब तक 9994 बदमाशों को सलाखों के पीछे पहुँचाया।
असल में इनमें ज्यादातर वे छोटे मोटे गरीब अर्धबेरोजगार लोग हैं जिनकी लिस्ट थानों में हमेशा रहती है इन्होंने कभी कोई अपराध कर लिया होता है और इनका नाम थाने में दर्ज हो जाता है। हर गुम अपराध के बाद इन्हें थाने में बुला कर कुटाई की जाती है तब कोई दूर दराज का सुराग पुलिस को मिलता है। यह काम पुलिस वैसे भी हर साल दिसम्बर माह में करती है। यह पुलिस का रूटीन का काम है। पर अखबार ने इसे नयी सरकार से जोड़ दिया है।
अगला पूरा पेज विज्ञापन है। फिर तीसरे पर वही लीड है ‘रामलला श्वेत होंगे या श्याम’? जिसने भी यह हेडिंग दिया है वह दिमाग में जरूर गोरा-काला सोच रहा होगा। उसके बाद छोटे मोटे अपराधों की खबरें हैं। सूबे के सबसे बड़े अफसर के रिटायरमेंट और पुलिस महानिदेशक के वीआरएस की खबर है। यह उन सफेदपोश लोगों को राहत है जो इनके कारण परेशान थे। बाकी दुर्घटनाओं और अपराधों की खबरें हैं। लेकिन इन दुर्घटनाओं और अपराधों के कारणों की वजहें नदारद हैं। कुछ सरकारी कार्यवाहियों पर जनसमूहों के विरोध के समाचार भी हैं। युवाओं को दिल के दौरे पडऩे और सरकारी जमीन पर कब्जे कर भूमाफियाओं द्वारा प्लाट बेचने की खबरें भी हैं। कार्यवाही की खबर कभी नहीं छपती। एक पेज पर मरने वालों के संस्कारों के विज्ञापन और तमाम धार्मिक आयोजनों की खबरें हैं।
अखबार में एक संपादकीय पेज भी है जिसके आधे पेज पर प्रधान संपादक जी के न समझ आने वाले गरिष्ठ विचारों की उल्टी है। हताहतों के वीडियो फैलाने पर एक लेख है और धार्मिक कट्टरपंथ के बढऩे के खतरे के बारे में लेख है। यह मौजूदा केन्द्र सरकार के लिए जरूरी खुराक है। इसी पर सरकारी पार्टी की राजनीति चलती है। शेष पृष्ठों पर पानी, जंगल, जमीन के खराब होते जाने की खबरे हैं, जिनके लिए सिर्फ जनता दोषी है। इन्हें खराब करने की छूट देने वाली सरकारें और खराब करने वाले पूंजीपतियों को पूरी तरह बरी कर दिया गया है। खेल रूटीन खबरें हैं।
कुल मिलाकर अखबार पाँच मिनट रोज का किस्सा और साढ़े पाँच रुपए रोज का जबरन खर्चा मात्र रह गया है। फायदा सिर्फ इतना है कि उत्तमार्ध इस पर सब्जी फैला कर साफ करती है। घर और कार के शीशे इससे पौंछे जा सकते हैं। इस्त्री वाला कपड़ों पर इस्त्री करने के बाद अंदर रख देता है जिससे उनकी स्टिफनेस बनी रहे। पर वह भी एक दिन शिकायत कर रहा था कि अब कागज बहुत खराब आता है उसमें स्टिफनेस ही नहीं है।
बस कहा जा सकता है कि अखबार अभी जीवित हैं। पर मुझे अपने एक सीनियर की 30 साल पहले न्यायव्यवस्था के बारे में कही गयी बात याद आती है कि ..
न्यायपालिका तो कब की मर चुकी, हम न्यायपालिका की लाश ढो रहे हैं। यह सुनने के बाद मैंने पूछा तो फिर अब क्या होगा?
कहने लगे कुछ नहीं होगा, फिर प्रलय होगा और फिर नव निर्माण।
तब से मैं प्रलय का इंतजार कर रहा हूँ। पर फिलहाल तो होता नहीं दीखता। बीच बीच में अखबार ही खबर छापता रहता है कि फलाँ तारीख को प्रलय होने वाला है। तारीख निकल जाती है पर होता नहीं। पर मन में यह विश्वास पक्का है कि होगा जरूर एक दिन। इंसान खुद ही कर डालेगा।


