विचार / लेख

गोदी नौकरशाही!
29-Dec-2023 4:34 PM
गोदी नौकरशाही!

  डॉ. आर.के. पालीवाल

गोदी मीडिया की तरह गोदी नौकरशाही की परंपरा भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। ऐसा नहीं कि पहले इस तरह की परंपरा नहीं थी, जब कुछ खास नौकरशाहों को ट्रान्सफर पोस्टिंग , डेपुटेशन , एक्सटेंशन एवम पोस्ट रिटायरमेन्ट नियुक्तियों में अन्य अफसरों से ज्यादा तवज्जो दी जाती थी, लेकिन यह अमूमन उन अफसरों के साथ ही होता था जिनकी कर्मठता और ईमानदार छवि प्रमुख प्रशासनिक पदों के लिए उपयुक्त होती थी।

ऐसी नियुक्तियां अक्सर जनता और विशेष रूप से प्रबुद्ध जनों और मीडिया द्वारा भी सराही जाती थी। इस कड़ी में आज़ादी के तुरंत बाद पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के सचिव वी पी मेनन का नाम बहुत आदर के साथ याद किया जाता है जिन्होंने राष्ट्रीय एकता और अखंडता बरकरार रखने के लिए राजे रजवाड़ों के साथ बहुत प्रभावी ढंग से वार्ता कर उन्हें अखंड भारत का अभिन्न अंग बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी तरह बाद में टी एन सेशन जैसे कुछ और अधिकारी भी हुए हैं जिनकी योग्यता और प्रशासनिक क्षमता को मुख्य चुनाव आयुक्त के रुप में आज भी हर आम चुनाव के वक्त शिद्दत से याद किया जाता है और निकट भविष्य में भी किया जाता रहेगा।

आजकल प्रवर्तन निदेशालय, दिल्ली पुलिस कमिश्नर,केंद्रीय प्रत्यक्ष एवम अप्रत्यक्ष कर बोर्ड में चेयरमैन एवम मेंबर आदि की नियुक्ती हो या चुनाव आयुक्त और राज्यों के प्रमुख सचिव और डी जी पी की नियुक्ति हो, काफी मामलों में विवादित छवि के लोगों के चुनाव या बहुत से योग्य अफसरों के होते हुए कुछ खास लोगों को बार बार एकस्टेंसन देने की परंपरा हो गई है जिसकी विपक्षी दलों के साथ साथ प्रबुद्ध जनों और मीडिया द्वारा भी मुखर आलोचना होती है। वह मामला भी बहुत पुराना नहीं है जब उत्तर प्रदेश में आई ए एस एसोसिएशन द्वारा चिन्हित किए गए भ्रष्ट अफसरों को प्रमुख सचिव बनाया गया था और सेवानिवृति के बाद ही आर्थिक घोटालों के संगीन मामलों में उन्हे जेल की सजा हो सकी थी।

मध्य प्रदेश में भी शिवराज सिंह चौहान की निवर्तमान सरकार में मुख्य सचिव को चुनाव की पूर्व संध्या पर दूसरी बार सेवा विस्तार देने पर विपक्ष ने चुनाव आयोग तक लिखित शिकायत की थी हालांकि केन्द्र सरकार की सहमति के बाद चुनाव आयोग ने इस सेवा विस्तार को निरस्त नहीं किया था जिसकी वजह से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े किए गए थे। बहुत से उपयुक्त उम्मीदवार होने के बावजूद जब मुख्यमंत्री, केन्द्र सरकार या खास विचारधारा से नजदीकियों वाले अधिकारियों को प्रशासन के शीर्ष पर बैठाकर सेवा विस्तार दिए जाते हैं तब इस तरह की गोदी नौकरशाही पर विपक्ष और जनता का संदेह स्वाभाविक है।

    तेलंगाना में चुनाव आयोग द्वारा तत्कालीन डी जी पी का निलंबन भी इसी श्रेणी की मानसिकता का ताजा उदाहरण है। चुनाव नतीजों का रुझान देखकर डी जी पी का विपक्षी दल के प्रमुख नेता, जिनकी अगला मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना थी, को बधाई देने पहुंचने का मामला इस लिहाज से संवेदनशील है क्योंकि पुलिस प्रशासन के शीर्षस्थ अधिकारी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सत्ता का रुख देखकर अपना व्यवहार तीन सौ साठ डिग्री बदल ले। सरदार पटेल ने आज़ादी के बाद भारतीय नौकरशाही को प्रशासन का स्टील फ्रेम कहा था। पिघलते पिघलते उस स्टील फ्रेम का लचीली प्लास्टिक बनकर गोदी नौकरशाही तक पहुंचने का सफर, संविधान,लोकतंत्र और राष्ट्र के हित में नहीं है। नौकरशाही में इस गिरावट के लिए उच्च पदस्थ अफसर, पी एम ओ, गृह मंत्रालय और मुख्यमंत्री आदि सभी सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ऐसे हर मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते जहां योग्यता और दक्षता के इतर कारणों से शीर्ष पदों पर ऐसे लोगों की नियुक्तियां होती हैं जिनसे निष्पक्ष प्रशासन की उम्मीद नहीं होती। विभिन्न सिविल सेवाओं की एसोसिएशन को अपनी अपनी सेवा की इस गिरावट को रोकने की कौशिश करनी होगी तभी नौकरशाही का सम्मान बच सकता है।


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