विचार / लेख

आवारा पशु
29-Dec-2023 4:23 PM
आवारा पशु

 विष्णु नागर

वैसे ‘आवारा’ एक बदनाम सा शब्द है। चिपक जाता है किसी पर तो मुश्किल से छूटता है मगर अनेक बार यह बहुत बुरा शब्द भी नहीं समझा गया है। राजकपूर की एक फिल्म थी-‘आवारा’। इसमें एक गाने में नायक खुद को ‘आवारा हूं, आसमान का तारा हूं’ बताता है। विष्णु प्रभाकर ने शरदचंद्र की जो मशहूर जीवनी लिखी है,उसका शीर्षक है-‘आवारा मसीहा’। एक जमाने में कवि-शायर अपना उपनाम या तखल्लुस आवारा रखा करते थे। एक लोकप्रिय उपन्यासकार हुआ करते थे-प्यारेलाल आवारा।

आवारा मगर अकसर इतना अच्छा शब्द भी नहीं माना गया है। पशु जो निराश्रित हैं,किसी के पाले हुए नहीं हैं या पाल कर छोड़ दिए गए हैं, उन्हें भी ‘आवारा’ कहा जाता है। ‘आवारगी’ न उनकी पसंद है और न वे बदचलन, लुच्चे- लफंगे हैं, जो आवारा शब्द का एक प्रचलित और शब्दकोशीय अर्थ है। उनके निराश्रित होने में उनका दोष नहीं है।आपको विदेशी कुत्ते पसंद हैं, देसी कुत्ते पालने में आपकी हेठी होती है तो आप अकसर इन्हें नहीं पालते। आप गाय को अपने स्वार्थ के कारण छुट्टा छोड़ देते हो,जब वे उपयोगी नहीं रहतीं, दूध नहीं देने के कारण भारस्वरूप हो गई हैं। उत्तर भारत में हिंदूवाद का उत्पात बहुत ज्यादा है। धर्म भी इसकी इजाजत नहीं देता कि इन्हें कटने भेज दिया जाए (हालांकि कौन कहता है कि कटती ही नहीं हैं?)। इस नाम पर दंगा भी हो सकता है। हत्या हो सकती है। भले ही ये जानवर भूखे मरने के कारण रात को किसानों की फसल बर्बाद कर दें!

भैंसें आपको ‘आवारा’ नहीं दिखतीं क्योंकि उन्हें अनुपयोगी होने पर निपटा दिया जाता है। बिना शोर के। तब धर्म अधिक नहीं आता। धर्म भी तभी आड़े आता है,जब उसे आड़े आना होता है।

तो जानवरों की ‘आवारगी’, इनकी ‘आवारगी’ नहीं , हमारी स्वार्थपरता, हमारी सीमा है, हमारी आवारगी है। आवारा हम हैं, जानवर नहीं।


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