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कत्थक का अर्थमय सौंदर्य : रायगढ़ घराना
06-Jun-2023 8:07 PM
कत्थक का अर्थमय सौंदर्य : रायगढ़ घराना

-सतीश जायसवाल
कथक का रायगढ़ घराना अब मान्य हो चुका है। कवि, कला मर्मज्ञ आईएएस अधिकारी अशोक वाजपेई ने इसके लिए एक ठोस जमीन तैयार की थी। उस समय छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में था। अब छत्तीसगढ़ अलग है।एक राज्य है।और रायगढ़ छत्तीसगढ़ में है।

छत्तीसगढ़ में कोटा (करगीरोड) में डॉ. सी.वी. रामन विश्विद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने ‘कथक’ के विकास के काम को आगे बढ़ाया और सन 2020 में अपने यहां ‘रायगढ़ कथक केंद्र’ की स्थापना की। संतोष चौबे के पास साहित्य और कला के प्रति समान संवेदनात्मक जुड़ाव है।

कथक के सौंदर्य की अर्थमयता को समझने के लिए इस ‘रायगढ़ कथक केंद्र’ ने अपने यहां एक बड़े ‘कथक समारोह’ का आयोजन किया। उसमें कथक की प्रस्तुतियों के साथ उनके विभिन्न पक्षों पर सार्थक चर्चाएं भी हुईं। वह एक विपुल अनुभव था।

इन चर्चाओं को संयोजित करने और उनसे प्राप्त संक्षेपों को संकलित-संपादित करने का महत्वपूर्ण काम डॉ.चित्रा शर्मा ने किया-‘कत्थक का अर्थमय सौंदर्य : रायगढ़ घराना’ में। चित्रा शर्मा हिन्दी कला समीक्षा में एक परिचित नाम हैं।

‘कत्थक का अर्थमय सौंदर्य : रायगढ़ घराना’ में चित्रा ने कथक के अधिकृत विद्वानों के 14 आलेख शामिल किए हैं।इनके बीच में एक मैं भी, अपनी अकिंचनता के साथ शामिल हूं। चित्रा शर्मा का मुझसे प्रबल आग्रह था। मैं मना नहीं कर सका।लेकिन अपने लिए कोई औचित्य भी नहीं पा रहा था। तब, थोड़े समय पहले ही प्रकाशित, अशोक वाजपेई के एक सांदर्भिक वक्तव्य ने मुझे अपनी उपस्थिति को एक प्रश्न से जोडक़र देखने की तरफ बढ़ाया।

अशोक वाजपेई का वक्तव्य था-हिन्दी साहित्य कलाओं के प्रति ज्यादा कृतज्ञ नहीं है...’
वहां, कथक के इतने बड़े समारोह में और कथक के गुरुओं, अधिकृत विद्वानों के बीच, मेरी उपस्थिति भी हिन्दी साहित्य से ही थी। इसलिए इस प्रश्न के साथ मैं अपने को जोड़ सका कि स्वयं मैं अपनी कितनी कृतज्ञता के साथ यहां हूं ?

मैं इस बात पर संतोष कर सकता हूं कि मुझे कथक के अनेक भव्य समारोहों में उपस्थित रहने के अवसर मिले हैं। लेकिन अब अपने पर हैरान हूं कि इस प्रश्न ने इससे पहले मुझे क्यों नहीं घेरा।

अब मैं समझ सकता हूं कि किसी कृतज्ञता भाव तक पहुंचने से पहले यह समझना जरूरी होगा कि किन्हीं भी भव्य या अभव्य कला समारोहों में हम अपनी कितनी संवेदनशील अनुभूतियों के साथ उपस्थित रहते हैं?

मैंने अपने से एक प्रश्न किया-मैं कथक का कैसा दर्शक हूं?’

अब चित्रा शर्मा के आग्रह को मान लेने के लिए मैं अपनी दुविधा से मुक्त था। कथक के अधिकृत विद्वानों के बीच, अपनी अकिंचनता के साथ-कथक : एक दर्शक मैं भी।’


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