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कॉमरेड गांधी लाल सलाम!
01-May-2023 3:28 PM
कॉमरेड गांधी लाल सलाम!

चित्रः अनुसूइयाबेन साराभाई और महात्मा गांधी।


-सुदीप ठाकुर

महात्मा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा की विचारधारा ने दुनियाभर के जनांदोलनों और संघर्षों को प्रेरित किया है। अपने शुरुआती सार्वजनिक जीवन के दो दशक गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में बिताए थे, जहां उनके संघर्ष की बुनियाद ही नस्लीय भेदभाव के खिलाफ थी, जिसका प्रभाव नेल्सन मंडेला के संघर्ष में भी बाद के वर्षों में नजर आया था। मंडेला की तरह ही अमेरिका में नस्लभेद के खिलाफ संघर्ष करने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी गांधी से प्रभावित और प्रेरित थे। हालांकि ऐसा कम ही हुआ है, जब श्रमिक आंदोलनों में गांधी की भूमिका को रेखांकित किया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के कुछ वर्ष बाद ही गांधी ने एक श्रमिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसे भारत में श्रमिक आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर कहा जा सकता है।

भारत लौटने के दो वर्षों बाद ही 1917 में चम्पारण में नील की खेती करने वाले किसानों के आंदोलन का गांधी ने नेतृत्व किया था। अंग्रेज शासकों के निर्देश पर जमींदार और साहूकार गरीब, भूमिहीन किसानों से जबर्दस्ती नील की खेती करवाते थे, ताकि इंग्लैंड और यूरोप में नील की आपूर्ति की जा सके। इससे खेती बर्बाद हो रही थी। अन्न उपजाना मुश्किल हो गया था। अपने देश में इस आंदोलन में गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा का पहला प्रयोग किया था। यह तकरीबन वही समय था, जब दुनिया प्लेग की महामारी से जूझ रही थी, जिससे भारत का बड़ा हिस्सा भी प्रभावित था।

प्लेग का एक बड़ा असर अहमदाबाद की कपड़ा मिलों में नजर आया जहां आम तौर पर प्रवासी मजदूर काम करते थे। शहर से मजदूरों का पलायन शुरू हो गया। इससे परेशान होकर कपड़ा मिल मालिकों ने श्रमिकों को प्लेग बोनस की पेशकश कर दी। यह उनके वेतन का 75 फीसदी तक था। इसका असर भी हुआ। उस समय अहमदाबाद के मिल मालिकों को प्रवासी मजदूरों की कितनी जरूरत थी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शहर की पूरी अर्थव्यवस्था इस पर निर्भर थी। आखिर पिछली सदी के शुरुआती दशकों में अहमदाबाद को अपनी कपड़ा मिलों के कारण मैनेचेस्टर ऑफ ईस्ट यूं ही नहीं कहा जाता था। जनवरी, 1918 के आसपास जब प्लेग का असर कम होने लगा तब मिल मालिकों ने श्रमिकों को दिया बोनस और अन्य सुविधाएं वापस ले लीं। मगर श्रमिकों ने बढ़ती कीमतों का हवाला देकर वेतन में बढ़ोतरी की मांग की, लेकिन मिल मालिक इसके लिए तैयार नहीं थे। श्रमिकों ने एक सामाजिक कार्यकर्ता अनुसूइयाबेन साराभाई से संपर्क किया, जो कि पहले से श्रमिकों के बच्चों के लिए काम कर रही थीं। वह उनकी आवाज उठाने के लिए तैयार हो गईं, जबकि वह खुद एक मिल मालिक अम्बालाल साराभाई की बहन थीं।

उन दिनों गांधी देशभर में घूम जरूर रहे थे, लेकिन अपना ठिकाना अहमदाबाद में बना रखा था। वह प्रशिक्षित वकील भी थे और दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष के कारण सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी उनकी पहचान बन चुकी थी। श्रमिकों के आंदोलन के बीच में ही गांधी परिदृश्य में आते हैं और जैसा कि दस्तावेज बताते हैं, उन्हें जिले के ब्रिटिश कलेक्टर की पहल पर मिल मालिकों और श्रमिकों के बीच मध्यस्थता की जिम्मेदारी दी जाती है। श्रमिक पचास फीसदी वेतन वृद्धि की मांग करते हैं, लेकिन मिल मालिक 20 फीसदी से एक पैसा अधिक देने को तैयार नहीं होते। बात टूट जाती है और मिल मालिक तालाबंदी कर देते हैं। इसके साथ ही गांधी की भूमिका भी बदल जाती है और अब वह खुलकर श्रमिकों के पक्ष में आ जाते हैं और श्रमिकों की हड़ताल का एलान करते हैं।

अंततः मिल मालिक गांधी की पहल पर श्रमिकों के वेतन में 35 फीसदी की वृद्धि के लिए तैयार हो जाते हैं। यह पूरा आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से चला था, जबकि उसी दौरान कई जगहों पर श्रमिक आंदोलनों के हिंसक होने के कई वाकये हो चुके थे।

इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि में गांधी की मदद से अनुसूइयाबेन साराभाई ने टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (टीएलए) की स्थापना की थी, जो कि कई दशकों तक प्रभावशाली ट्रेड यूनियन बना रहा।

यह पूरा घटनाक्रम ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में उपलब्ध है और कई किताबों तथा जर्नल में इसका जिक्र है। मसलन रामचंद्र गुहा ने गांधी की जीवनी में इसका जिक्र किया है। इसी तरह से सुब्बैया कन्नपन ने 1962 के अपने एक आलेख द गांधियन मॉडल ऑफ यूनियनिज्म इन ए डेवलपिंग इकनॉमी (आईएलआर रिव्यू) में इस पर विस्तार से लिखा है। 

ध्यान रहे, गांधी ने श्रमिकों की मांग को लेकर अनशन करने के साथ ही एलान किया था कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जाएंगी वे मोटरकार में भी नहीं चलेंगे। कई हजार श्रमिकों को एकजुट करके शांतिपूर्ण सफल आंदोलन करने की यह अनूठी मिसाल थी।

आज जब गांधी और उनकी विचारधारा पर लगातार हमले हो रहे हैं और श्रमिक हाशिये पर धकेले जा रहे हैं, यह घटना याद आ गई। प्लेग फैलने के करीब सौ साल बाद जब 2020 में कोरोना महामारी फैली, तब भी श्रमिकों पर पहाड़ टूटा था। प्रधानमंत्री मोदी ने जब कुछ घंटे के नोटिस पर देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की थी, तब हम सबने देखा था कि किस तरह से करोड़ों प्रवासी मजदूर महानगरों से बेबसी और हताशा में अपने घरों को लौट रहे थे। गांधी होते तो निश्चय ही उनकी प्राथमिकता में ये श्रमिक होते।  भारत आज दुनिया की तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन इसका एक बड़ा कामगार वर्ग आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहा है। आज भी असंगठित क्षेत्र में करोड़ों श्रमिकों के काम के घंटे और छुट्टियां तक ठीक से तय नहीं हैं। जबकि एक मई, 1889 को अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस यानी मई दिवस की शुरुआत ही श्रमिकों के इन्हीं बुनियादी अधिकारों को लेकर हुई थी।

अनुसूइयाबेन साराभाई और गांधी के अहमदाबाद के कपड़ा मिल श्रमिकों के आंदोलन को याद करें, तो सचमुच श्रमिकों के हक में नई राह खुल सकती हैं।

 


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