विचार / लेख

तल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मजा कहते हैं
03-Mar-2023 3:43 PM
तल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मजा कहते हैं

-ध्रुव गुप्त
ज़िन्दगी की ख़ूबसूरती तथा तल्खियों के शायर रघुपति सहाय 'फ़िराक' गोरखपुरी का ज़िक्र शायरी के एक अलग अहसास, एक अलग आस्वाद का ज़िक्र है। वे उर्दू के कुछ बड़े आधुनिक शायरों में एक थे जिन्होंने शायरी में एक नई परंपरा की बुनियाद रखी थी। जिस दौर में उन्होंने लिखना शुरू किया, उस दौर की शायरी का एक बड़ा हिस्सा परंपरागत रूमानियत और रहस्यों से बंधा था। समय की सच्चाई और लोकजीवन के विविध रंग उसमें लगभग अनुपस्थित थे। नजीर अकबराबादी और इल्ताफ हुसैन हाली की तरह फ़िराक ने इस रिवायत को तोड़कर शायरी को नए मसलों, नए विषयों और नई भाषा के साथ जोड़ा। उनकी गजलों में सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर ढला है। वहां रूमान के साथ ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयां भी मौजूद हैं। उर्दू ग़ज़ल की बारीक़ी, तेवर, नाज़ुकमिजाजी और सौंदर्य को देश की संस्कृति और प्रतीकों से जोड़कर फिराक ने अपनी शायरी का महल खड़ा किया था। अदबी दुनिया में फ़िराक़ की बेबाक़ी, दबंगई और मुंहफटपन के किस्से ख़ूब कहे-सुने जाते हैं। अपनी शायरी की अनश्वरता पर उनका आत्मविश्वास किस क़दर गहरा था, यह उनके इस शेर से समझा जा सकता है - आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअसरों / जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने फ़िराक़ को देखा है। आज फ़िराक़ की पुण्यतिथि पर उनकी स्मृतियों को नमन, उनकी ही एक ग़ज़ल के चंद अशआर के साथ !
गैर क्या जानिए क्यों मुझको बुरा कहते हैं
आप कहते हैं जो ऐसा तो बजा कहते हैं
हो जिन्हें शक वो करें और खुदाओं की तलाश
हम तो इन्सान को दुनिया का खुदा कहते हैं
शिकवा-ए-हिज़्र करें भी तो करें किस दिल से
हम खुद अपने को भी अपने से जुदा कहते हैं
लोग जो कुछ भी कहें तेरी सितमकोशी को
हम तो इन बातों को अच्छा ना बुरा कहते हैं
और का तजुरबा जो कुछ हो मगर हम तो फ़िराक
तल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मजा कहते हैं

 


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