विचार / लेख

2024 का रोड मैप
24-Feb-2023 3:34 PM
2024 का रोड मैप

 राजशेखर चौबे
 उस जमाने के सोवियत रूस के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर में भी शतरंज काफी लोकप्रिय था। सडक़ किनारे खेलने वालों की भीड़ होती और एक शक्तिशाली प्लेयर के विरुद्ध हम जैसे दसों लोग खेलते फिर भी वही जीतता था। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध विपक्ष की हालत भी वैसी ही है। विपक्ष कमजोर है और हमेशा कमजोर का साथ देना चाहिए इसलिए मैं विपक्ष के साथ हूँ। विपक्ष की भलाई इसी में है कि वे  यह समझ ले कि वह पांच मैचों में पहले दो मैच हार चुके हैं और बचे हुए तीनों मैच उन्हें जीतना है। मोदी जी बढ़त ले चुके हैं। प्रमुख विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा को लेकर अति उत्साह में दिख रही है लेकिन 2024 के आम चुनाव में इसका विशेष असर नहीं होगा।  जिससे आपको लडऩा है आपको उनकी ताकत और कमजोरी पता होना चाहिए। पहले हम भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन   (हृष्ठ्र) के ताकत की चर्चा करेंगे।

नरेंद्र मोदीजी के नेतृत्व में इस सरकार ने हिंदुत्व को बढ़ावा दिया जिसके अंतर्गत अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, धारा 370 की समाप्ति , काशी कॉरिडोर का निर्माण,  सीएएएनआरसी का केवल विधेयक पारित करना आदि है। मौजूदा सरकार की दूसरी ताकत है रेवड़ी यानी फ्रीबिस का वितरण। लगभग 80 करोड़  गरीब लोगों को अभी भी मुफ्त राशन दिया जा रहा है , प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्जवला योजना जैसे कई योजनाएं हैं। इस सरकार की तीसरी ताकत है आक्रामक राष्ट्रवाद का हिमायती होना।  कार्ल माक्र्स ने धर्म को अफीम बताया था लेकिन मैं इसमें उग्र राष्ट्रवाद को भी जोडऩा चाहूंगा। उग्र राष्ट्रवाद का रास्ता घृणा से होकर गुजरता है। इस सरकार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि और ताकत है मीडिया का अधिग्रहण। आज प्रत्येक निष्पक्ष नागरिक यह जानता है कि कुछ गिने-चुने अखबारों को छोडक़र पूरा मीडिया सरकार के कब्जे में है। सोशल मीडिया खासकर व्हाट्सएप का इस सरकार ने बेहतर इस्तेमाल किया है और अपना एजेंडा आगे बढ़ाने का काम किया है। इस सरकार को मोदी जी की मनमोहक छवि का  भी लाभ मिल रहा है। इस छवि को गढऩे में मीडिया का विशेष रोल है हालांकि वे उन्हें इसका श्रेय नहीं देते हैं।  अब हम मौजूदा सरकार की कमजोरियों की चर्चा करेंगे। इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी है गरीबी महंगाई और बेरोजगारी का बढऩा ।  इस सरकार की आर्थिक नीतियां खासकर नोटबंदी जीएसटी तालाबंदी ने आम जनता की कमर ही तोड़ दी है। केंद्र सरकार को जी एस टी का लाभ हुआ है परंतु राज्य सरकारों की केंद्र पर निर्भरता बढ़ी है और  वे याचक की भूमिका में आ गए हैं। पिछले नौ  वर्षों में गरीब और गरीब हुआ है और अमीर और अमीर हुआ है इसे कोई नकार नहीं सकता। प्रतिवर्ष दो करोड़  रोजगार का वादा किया गया परंतु इन नौ वर्षों में  एक लाख  बेरोजगारों को भी  रोजगार नहीं मिला है। इस सरकार की दूसरी कमजोरी है कारपोरेट का हिमायती होना।  पहले कारपोरेट छिपकर अपना काम करते थे।  अब वे छुपकर चंदा ( इलेक्टोरल बांड ) देते हैं परंतु  खुलकर अपना काम करते हैं। कोविड  के दौरान पूरी दुनिया की दौलत कम हुई परंतु देश के कारपोरेट घरानों के धन में बेतहाशा वृद्धि हुई। कॉरपोरेट टैक्स घटाकर सरकार ने अपनी पक्षधरता  बता दी है। कॉरपोरेट के द्वारा सरकार ने मीडिया पर कब्जा जमा रखा है । आज गरीबी महंगाई बेरोजगारी की बात करने वालों को देशद्रोही करार दिया जा रहा है। इस सरकार से  मुस्लिम ,अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और पिछड़े समुदाय का एक बड़ा तबका नाराज है। उन्हें लगता है कि उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है । सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग केवल विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। सत्ता पक्ष के किसी भी नेता पर आज तक कोई भी कार्रवाई नहीं हुई है,  जनता इन बातों से वाकिफ है। इस सरकार में भी भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आई है। आज भाजपा को विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बताया जा रहा है।  

भाजपा की चुनावी रैलियों और अन्य  खर्चों को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्हें धन की कोई कमी नहीं है। आज वह सबसे धनवान पार्टी है। इलेक्टोरल बांड से भी उसे ही सबसे अधिक धन मिला है। आप यह भी नहीं जान सकते कि किसने उन्हें चंदा दिया है।  क्या ईमानदारी से ऐसे चुनाव लड़े जा सकते हैं और क्या जनप्रतिनिधियों की इस पैमाने पर खरीद-फरोख्त की जा सकती है? जन प्रतिनिधियों को धमकाने व डराने के लिए केंद्रीय एजेंसियों की मदद जगजाहिर है। संवैधानिक संस्थाएं जैसे चुनाव आयोग,  नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भी दबाव में नजर आ रहे हैं। न्यायपालिका के निर्णय भी विभिन्न कारणों से प्रभावित होते रहे हैं। कॉलेजियम  को समाप्त कर न्यायपालिका पर भी कब्जे का प्रयास प्रारंभ हो गया है। विरोध में लिखने और बोलने वाले मीडिया संस्थानों को डराया व दबाया जा रहा है। बीबीसी पर छापा इसका ताजा उदाहरण है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है।  इन वर्षों में हमें एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के लायक नहीं समझा गया।

इस समय विपक्ष के पास कोई ताकत नहीं है केवल सत्ता पक्ष की कमजोरी ही विपक्ष की ताकत है। विपक्ष में सभी विरोधी दल शामिल हैं। ये सभी विरोधी दल यह समझ लें कि यदि वे 2024 में नहीं  जीत सके तो 2029 में भी नहीं जीत सकेंगे। भारतीय जनता पार्टी के पुराने सहयोगी शिवसेना और अकाली दल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हो चुके हैं । अभी जो भी सहयोगी एन डी ए से जुड़े हुए  हैं वे या तो डर से जुड़े हैं या लालच से। जिस दिन यह डर व  लालच  खत्म हो जाएगा वे भी अलग हो जाएंगे।  एनडीए का अर्थ  केवल और केवल  भारतीय जनता पार्टी है। भाजपा जिन क्षेत्रों  में मजबूत है वहां बेहद मजबूत है और जहां कमजोर है वहां काफी कमजोर है। 

 भाजपा  प्राय: हिंदीभाषी क्षेत्र, कर्नाटक और गुजरात में मजबूत है ।  इस क्षेत्र में लोकसभा की 250 सीटें हैं । बची हुई  293 सीट पर  भाजपा कमजोर है। इन 293 सीटों में  भाजपा को अधिकतम 60 सीट मिल सकती हैं। बची हुई 250 सीटों में यदि विपक्ष 65त्न यानी लगभग 163  सीटों पर भाजपा को रोक ले तो वह भाजपा को 2024 में बेदखल कर सकता है। इस तरह भाजपा को 223 सीट पर रोका जा सकता है। सत्ता की मुख्य लड़ाई का केंद्र वही 250 सीट है जिस  पर भाजपा मजबूत है । विपक्ष को उसी पर मुख्य ध्यान देना होगा।
सबसे पहले विपक्ष को वही करना होगा जो भाजपा करती आई  है यानी कुछ मुद्दों को छोडऩा होगा जैसे धारा 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण कानून सीएएएनआरसी कानून आदि। लगभग पूरे विपक्ष को एकजुट होना होगा। सीटों के लिए सबको दिल बड़ा रखना होगा। जिस राज्य में जो विपक्षी पार्टी अधिक ताकतवर है उसे ही  कमान संभालनी  होगी। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं यदि 75 सीटों पर समझौता हो जाता है तो पांच सीटों पर फ्रेंडली कंटेस्ट भी हो सकता है। कांग्रेस  जब सत्ता में थी तब यही कहा जाता था कि विपक्ष एक  साल से अधिक न  तो साथ साथ रह सकता है और न ही अलग-अलग। यह बात अब भी लागू होती है। विपक्ष को चुनाव पूर्व अपना नेता चुनने की गलती नहीं करनी चाहिए अन्यथा क्या होगा हम सभी जानते हैं। मोदीजी के सामने कोई भी विपक्षी चेहरा टिकने  वाला नहीं है। किसी चेहरे को चुनने का मतलब है मोदी जी को वाकओवर देना। यह अधिक अच्छा होगा कि राहुल गांधी जी यह घोषणा कर दें कि  मैं या गांधी परिवार का कोई भी सदस्य  2024 में प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं है। 1977 और 1989 का आम चुनाव 2024 में विपक्ष के लिए सबक हो सकता है। यदि इन  चुनावों  में चुनाव पूर्व नेता चुना जाता तो वह विपक्ष का ही नेता बनता। भाजपा भी इस मुद्दे पर मुखर नहीं हो सकती क्योंकि 2017 में उत्तरप्रदेश के चुनाव के बाद ही योगी जी को नेता चुना गया था। सोशल मीडिया प्रचार का सशक्त माध्यम बन गया है। भाजपा ने इसकी ताकत को भांप लिया है। विपक्ष को भी इस पर ध्यान केंद्रित करना होगा। आम आदमी को समझाना होगा कि यह सरकार क्रोनी कैपिटलिज्म वाली सरकार है और अमीरों के हित में ही  फैसले लिए जा यह हैं। इस सरकार से गरीब किसी चीज की उम्मीद न करें  सिवाय खैरात के। अमीरों की बढ़ती अमीरी और गरीबों की बढ़ती गरीबी इस बात का प्रमाण है।

2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस ने प्रत्येक गरीब परिवार को प्रतिवर्ष 72000 देने का वादा किया था । विपक्ष इस तरह के अविश्वसनीय वादों से परहेज करे। ऐसे वादे प्राय:  हारने वाला दल ही करता है। पंद्रह लाख  प्रत्येक परिवार को देने का वादा कर और कुछ भी न देकर दो बार चुनाव जीतने वाले बिरले ही होते हैं। आप जो वादे पूरे कर सके वही वादे किए जाने चाहिए। सत्ता पक्ष की  मुख्य कमजोरी  गरीबी महंगाई बेरोजगारी पर विपक्ष को पूरा जोर लगाना होगा। भाजपा को ध्रुवीकरण का लाभ मिलता है और  इसके लिए वे प्रयास भी कर सकते हैं। इसके लिए विपक्ष को तैयार रहना होगा और विपक्ष के बयानवीरों को जुबान पर  लगाम लगाना होगा। वर्ष 1977 में जनता दल का गठन अभूतपूर्व  प्रयोग था  जिसमें अधिकांश विपक्षी दल एक ही छतरी के नीचे आ गए थे। इसी तरह 1989 के चुनाव में भाजपा और कम्युनिस्ट एक साथ थे और कांग्रेस के विरुद्ध मिलकर लड़े थे। 2024 में भी भारतीय राष्ट्रीय पार्टी (क्चक्रस्) जैसी किसी पार्टी का गठन  अधिकांश विपक्षी दल मिलकर कर सकते हैं। भूले भटके यदि विपक्ष सत्ता में आ गया तो उसके लिए एक जरूरी संदेश है कि भ्रष्टाचार पर हर हालत में नियंत्रण पाना होगा।

किसान आंदोलन ने किसानों की ताकत का एहसास करा दिया है । अब आम व गरीब आदमी की बारी है। अभी भी देश में कुछ हद तक लोकतंत्र कायम है और आम और गरीब आदमी अपने वोट के सहारे बहुत कुछ बदल सकता है।  कारण चाहे जो भी हो लेकिन आम आदमी त्रस्त है और उसकी कहीं भी सुनवाई नहीं है। भले ही  राहुल,  ममता, अरविंद, नीतीश आदि 2029 तक इंतजार कर सकते हैं लेकिन आम आदमी 2029 तक इंतजार करने के मूड में नहीं है जरूरत है उसे नेतृत्व प्रदान करने की । विपक्ष को ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा। देखना होगा क्या विपक्ष आम जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगा अन्यथा जैसे दस वर्ष बीते हैं वैसे ही और पांच  वर्ष भी ‘अच्छे दिन’ की आस में गुजर जाएंगे।


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