विचार / लेख
-राजेश अग्रवाल
सवाल- छत्तीसगढ़ के देवभोग में हीरा खनन की प्रक्रिया क्यों रुकी है?
एक आलेख के रूप में जवाब मिला- हाल के समय में हीरे के खनन में रुकावट आईं हैं। पहला कारण है कि हीरे की कीमतों में अधिकतम गिरावट के चलते उत्पादन में कमी आई है। दूसरा कारण है कि खनन कंपनियों को स्थानीय निवासियों को नौकरी देने और सामाजिक उत्थान के लिए संबंधित स्थानों के साथ समझौते करने की आवश्यकता है। तीसरा कारण है कि हीरे के खनन में उपयोग किए जाने वाले तकनीकों की उन्नति नहीं हुई है। सभी कारणों के अलावा कोविड-19 महामारी ने भी हीरे के उत्पादन और खनन में बाधा डाली है। महामारी के कारण लोगों के संचार और उत्पादन की व्यवस्था में बदलाव हुए हैं, जिससे हीरे के उत्पादन में विलंब हुआ है।
यह सवाल ओपन आई वेबसाइट के फीचर चैट जीपीटी से किया गया था। फिर ठीक यही सवाल गूगल से किया गया।
गूगल ने अपनी ओर से कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि 0.24 सेकंड में इंटरनेट पर मौजूद बहुत से लिंक साझा कर दिए। थोड़ा वक्त लगा लेकिन उनमें से एक सबसे ठीक लगने वाला जवाब मिल गया। एक अखबार की वेबसाइट की खबर थी जिसमें बताया गया कि 5 महीने पहले रायपुर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खनिज विभाग की एक बैठक ली थी, जिसमें गरियाबंद जिले के 6 स्थानों पर हीरे की मौजूदगी और उसके खनन में आ रही बाधाओं को लेकर चर्चा की गई। इसमें बताया गया कि मुख्यमंत्री ने खनिज विभाग के अफसरों को न्यायालय से लगी रोक हटवाने के लिए कोशिश करने का निर्देश दिया है। स्टे आर्डर को वापस लेने के लिए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए ताकि वह हीरा खदान संचालित करने की प्रक्रिया शुरू हो सके। इसी में यह भी पता चला कि सन् 1990 से पायलीखंड और बेहराडीह के करीब 40,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में हीरे के भंडार का पता लग चुका है। तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने सन् 1992 में इसकी खुदाई के लिए कोशिश शुरू की थी। एक प्रमुख खनन कंपनी डी बियर्स को पट्टा भी मिल गया लेकिन कुछ शिकायतों की वजह से टेंडर रद्द कर दिया गया। सन् 1998 में एक बार फिर कोशिश हुई। इस बार भ्रष्टाचार के आरोप लगे और विवाद बढ़ा तो फिर से खनन में रुकावट आ गई। नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया। उसके बाद खनिज संसाधन विभाग ने पट्टा धारी कंपनी को नोटिस जारी किया। सरकार और कंपनी के बीच सहमति नहीं बन पाई, कंपनी हाईकोर्ट चली गई। हाईकोर्ट ने यह मामला मिनिस्ट्री आफ माइन्स के दिल्ली ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया। अब वहां करीब 13 साल से यह प्रकरण चल ही रहा है।
गूगल पर नवीनतम जवाब 5 महीने पहले छपी खबर है। इस बीच मुख्यमंत्री के निर्देश के परिपालन में अधिकारियों ने कौन से कदम उठाए, अदालती अवरोध की अभी स्थिति क्या है, कब तक गरियाबंद में हीरा का खनन शुरू हो सकता है? यह जानने के लिए संबंधित दफ्तरों और अफसरों से ही संपर्क करना होगा।
पर, चैट जीपीटी का जवाब तो सिरे से गलत है। यह दावा हम इसलिए कर सकते हैं क्योंकि हमारे पास इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के अलावा भी अखबारों और चर्चा-परिचर्चा से मिली जानकारी उपलब्ध है। देश दुनिया के ऐसे कई सवाल हमारे मन में उठते हैं और यदि चैट जीपीटी के विवरण को सही मान लिया जाए तो बड़ी भूल हो जाएगी। इस्तेमाल करने वाले बताते हैं कि निबंध, एप्लीकेशन, रिज्यूमे आदि तैयार करने, हलवा आदि बनाने की विधि जानने के लिए चैट जीपीटी से अच्छी मदद मिल जाती है। पर उसके पास हर बात का जवाब नहीं है। ख़ुद यह वेबसाइट कहती है कि उसकी जानकारी 2021 के बाद की नहीं है।
इंसानी दिमाग के पास सहज बोध और तार्किकता होती है। नतीजा इसी दोनों के बीच द्वंद और चिंतन से निकलता है।
किसी समझदार डॉक्टर से या स्कूल कॉलेज में विद्वान प्रोफेसर से बात करेंगे तो वे कहेंगे कि ज्यादा गूगल मत किया करो। चैट जीपीटी इस मामले गूगल सर्च से भी बढ़कर है। गूगल जो हजारों नतीजे देता है, उसमें आपके पास विकल्प होता है कि आप विश्वसनीय सूचना कौन सी है यह तय कर सकें, पर चैट जीपीटी में यह सुविधा नहीं है। आने वाले दिनों में लोग कहेंगे, ज्यादा जीपीटी मत किया करो।


