विचार / लेख

बुरा स्पर्श, दरिंदे और अभिभावक
17-Oct-2022 7:21 PM
बुरा स्पर्श, दरिंदे और अभिभावक

-सनियारा खान

दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय में एक 11 साल की बच्ची को उसी विद्यालय के दो सीनियर छात्रों ने बलात्कार किया। ये खबर हमें आहत करती है। इस बात पर भी हम हैरान  हैं कि इस विद्यालय ने इस घटना को दबाने की कोशिश की। उन्हें उस नन्हीं बच्ची से ज़्यादा अपनी बदनामी की फिक्र थी।

छोटे-छोटे बच्चों को हमारे समाज में इंसानी मुखौटा पहनकर घूमने वाले दरिंदे आए दिन रौंदते हैं। एक के बाद एक खबर पढ़-पढक़र हमलोग तो जैसे बेहिस होते जा रहे हैं। किसी भी मासूम के शरीर और मन में एक दरिंदा बस एक पंजा मारे और सारी जिंदगी के लिए वह जख्मी होकर रह जाती है! तो अब बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर नजर रखते हुए अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को कम उम्र से ही सचेत करना भी एक जरूरी काम हो गया है। लेकिन एक दुविधा तो मन में रहती है कि कैसे बहुत ही छोटे और मासूम बच्चों से इस तरह की बात करे? यहां बात शर्म की नहीं है।

बात ये है कि इतने कम उम्र के बच्चों को ये बताना कि हर अच्छा दिखने वाला इंसान अच्छा नहीं भी हो सकता है। क्या उनकी मासूमियत को चोट पहुंचाना नहीं है? इस तरह सोचने वालों में मैं भी थी। कुछ दिन पहले मेरी एक बचपन की सहेली से मैं बात कर रही थी। बात करते करते हम इसी टॉपिक तक पहुंच गए। उससे बात करने के बाद मैं बातों को नए सिरे से सोचने लगी। मेरी सहेली की बेटी की ट्विन बच्चियां हैं। दोनों चार साल की  हैं। उसने मुझे कहा कि उसकी बेटी ने अब अपनी दोनों बेटियों से अच्छा स्पर्श और बुरा स्पर्श के बारे में बात करना शुरू कर दिया है। मैं ये बात सुन कर बहुत ही हैरान हो हो गई कि इतनी छोटी बच्चियों की मासूमियत से ये तो खिलवाड़ जैसा है। मानसिक रूप से ऐसी बातें क्या उन्हें दुविधा में नहीं डाल देंगी! तब उसने मुझे बताया कि हमारे देश में लगभग तीस प्रतिशत बच्चें तो उन अपनों के ही शिकार होते हैं जिन से वे पिता, भाई, चाचा मानकर अपनेपन से चिपकते हैं और करीब-करीब साठ प्रतिशत बच्चें पड़ोसी, दोस्त और परिचित लोगों द्वारा शोषित होते हैं।

 ये बात कटु हो कर भी सत्य है कि अभी की दुनिया में अति आधुनिकता की ओट में जो अश्लीलता फैल चुकी  है, वह मासूम बच्चों को भी अपने चपेट में ले रही हैं। फिर यही हमारे लिए ज़रूरी हो जाता है कि बच्चों को सिखाया जाए कि हर आदमी पिता जैसा नहीं है और हर भैया भरोसे लायक नहीं है। स्कूल बस में सचेत रहे। किसी अनजान की बातों में न आए.... वगैरा-वगैरा। मेरी बेटी जब स्कूल जाती थी तो मैं निश्चिंत रहती थी। वह घर आ कर टीचर, माली भैया, गेट में रहने वाला अंकल, रिक्शे वाले अंकल..... सभी की अच्छाइयां बताती थी। शायद वह किस्मतवाली थी। या शायद तब हम ज्यादातर लोगों पर भरोसा कर पाते थे। भोपाल की एक खबर पढ़ी कि साढ़े तीन साल की एक बच्ची से स्कूल बस ड्राइवर ने गलत काम किया। शर्म की बात ये भी है कि इस जघन्य कृत्य में एक महिला कर्मचारी ने ही उस ड्राइवर की मदद की। शायद अब वक्त सच में पूरी तरह बदल गया है।

घर, सडक़, हर जगह, जहां तक संभव हो, अब बच्चों को निगरानी में रखना जरूरी हो गया है। जब बूढ़ी औरत से ले कर नवजात शिशु भी दरिंदों से बच नहीं पाते, तो मासूम बच्चों की मासूमियत को भले ही थोड़ी सी चोट पहुंचे चलेगा, लेकिन उन्हें गलत हाथों से बचाने के लिए ज्यादा ध्यान तो रखना ही पड़ेगा। ये सच है कि बीस प्रतिशत दरिंदे अस्सी प्रतिशत इंसानों के बीच मुखौटे पहनकर जीते हैं। ये भी तो सच है कि उन बीस प्रतिशत को हमेशा पहचानना आसान नहीं होता है। अभी अभी एक खबर में नजर अटक गई। एक बुजुर्ग पड़ोसी ने नन्हीं बच्ची को घूमाने ले जाने के बहाने उसे हवस का शिकार बना लिया। बात इन्ही बीस प्रतिशत दरिंदों से बचने की कोशिश की है। बहुत सचेत रहना ही होगा। इसे अभिभावक अपने  लिए एक अग्नि परीक्षा भी मान सकते हैं। इस अग्नि परीक्षा में वे  तब सफल होंगे, जब बाकी अस्सी प्रतिशत भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने में रुचि रखेंगे।


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