विचार / लेख

अगर दूसरी विधा में भी लिखा है तो...
11-Jun-2022 12:19 PM
अगर दूसरी विधा में भी लिखा है तो...

विष्णु नागर
अगर मैं गलत हूँँ तो मुझे ठीक करें कि हिंदी साहित्य की परंपरा कुछ ऐसी रही है कि विभिन्न विधाओं में लिखने वाले लेखकों की भी कोई एक साहित्यिक पहचान ही स्वीकार की जाती है, चाहे वह निराला हों या जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन हों या मुक्तिबोध जैसे बड़े लेखक। ये सब कवि के रूप में हिन्दी में सर्वमान्य हैं मगर इनका योगदान कहानी, उपन्यास, निबंध, आलोचना आदि में भी न्यूनाधिक रहा है। बल्कि इनमें से अधिकतर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मुक्तिबोध को एक उदाहरण के रूप में लें तो उनकी कहानियाँ किसी भी बड़े (प्रेमचंद को छोड़ दें) कहानीकार से कम नहीं हैं। उनका आलोचना के क्षेत्र में योगदान किसी भी बड़े आलोचक से बड़ा है मगर उनकी चर्चा अक्सर कवि के रूप में शुरू होकर वहीं खत्म हो जाती है। शायद ही कोई आलोचक जब हिंदी कहानी की चर्चा करता है तो उसे जयशंकर प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा आदि की कहानियाँ याद आती हैं, जबकि बाद के भी बहुत से कवियों का कहानियों की ओर रुझान रहा है बल्कि उनका योगदान मानना चाहें तो शायद है।

कवियों ने उपन्यास अपेक्षया कम लिखे हैं मगर फिर कुछ बड़े कवियों के नामों को याद करें तो अज्ञेय समेत कुछ का बड़ा योगदान रहा है। इधर विनोद कुमार शुक्ल जरूर अज्ञेय की तरह अपवाद रहे हैं,जिनके उपन्यासों की  चर्चा हुई है मगर समस्या केवल किसी एक विधा तक सीमित नहीं है, दूसरी विधाओं के लेखकों का भी उनकी मुख्य समझी जाने वाली विधा से अलग जो योगदान रहा है, उसे विस्मृत सा किया गया है या जब उस लेखक- विशेष पर चर्चा हुई है तो उसके अन्य विधाओं में योगदान को भी संयोगवश याद किया गया है।

एक ऐसी दृष्टि आलोचना में विकसित क्यों नहीं हुई कि अगर किसी कथाकार का किसी अन्य विधा में महत्वपूर्ण योगदान है  तो उस विधा पर चर्चा के समय उसे भुला न दिया जाए। कुछ मामले अपवाद  रहे हैं, जैसे मोहन राकेश हैं। उन्हें कथाकार तथा नाटककार दोनों रूपों में समान रूप से मान्य किया गया है।लेकिन नाटक की क्षेत्र में उनके योगदान को उस दुनिया में  स्वीकृति खूब मिली,इसीलिए शायद उनका यह रूप साहित्य में भी स्वीकृत हुआ।
मेरा कतई यह मत नहीं है कि एक विधा में लिखने वाले ने अगर दूसरी विधा में भी लिखा है तो वह उल्लेखनीय ही होगा मगर है तो उसकी चर्चा उस विधा की चर्चा के समय उपेक्षित क्यों होनी चाहिए? पाठकों तक समग्र दृष्टि क्यों न पहुंचे?

 


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