विचार / लेख

फिर किसी महिला दिवस की न जरूरत होगी...
08-Mar-2022 12:30 PM
फिर किसी महिला दिवस की न जरूरत होगी...

-पुष्य मित्र

आज भी इस दुनिया के ज्यादातर पुरुष अपनी सबसे करीबी स्त्रियों के कन्धों पर किसी बेताल की तरह लटके हैं।

हम पुरुषों का अपना जीवन सरल और सुविधाजनक हो, इस कोशिश में हम स्त्रियों को अपने साथ बांधे रहते हैं। जबर्दस्ती, ताकत की जोर पर, परम्पराओं और सामाजिक नियमों के नाम पर या प्रेम, भावुकताओं के सहारे।

हर पुरुष को एक स्त्री चाहिए, जो उसकी गैरहाजिरी-हाजिरी दोनों में उसके घर को सुव्यवस्थित और चलायमान बनाये रखे। जहां काम और मौज-मस्ती के बाद पुरुष लौटे तो उसे खाना, आराम और शांति मिल सके। ताकि फिर से वह तरोताजा होकर बाहर निकल सके। उसे एक ऐसी स्त्री चाहिये जो उसके बच्चों, उसे और यहां तक कि उसके माता-पिता को भी संभाल सके। ताकि वह अपनी इन तमाम जिम्मेदारियां से थोड़ा आजाद हो सके।

आज भी हर पुरुष अपनी सबसे करीबी स्त्री से कमोबेश यही चाहता है। और जाने-अनजाने हर स्त्री अपनी पीठ पर किसी न किसी बेताल पुरुष को लटका महसूस करती है। उसे ढोती रहती है। उसकी पीठ दुखती है, मगर वह सौ में निन्यानवे मर्तबा चुप रह जाती है।

अगर हम पुरुष आज के दिन सचमुच अपनी प्रिय स्त्रियों के लिये कुछ करना चाहते हैं तो बस इतना करें कि उनकी पीठ से उतर जायें। वे खुद तनकर खड़ी हो जायेंगी। फिर किसी महिला दिवस की न जरूरत होगी, न प्रासंगिकता।


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