विचार / लेख

एक मुलाकात पुतिन से!
05-Mar-2022 1:37 PM
एक मुलाकात पुतिन से!

-ध्रुव गुप्त

आज मीडिया पर एक सनसनीखेज खबर देखी कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की साइबर सेना दुनिया के कई देशों की सरकारों के वेबसाइट और सबसे शक्तिशाली लोगों के सोशल मीडिया एकाउंट्स हैक कर रही है। सरकारों की चिंता सरकारें करें, मुझे अपने सहित देश के असंख्य कवियों-कवयित्रियों की चिंता हुई। बचपन से सुनता रहा हूं कि हम कवि लोग ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोग होते हैं जो अपनी कविताओं से जब चाहे दुनिया बदल सकते हैं। रात इसी चिंता में डूबे-डूबे नींद आई ही थी कि सूट-बूट में पुतिन महोदय हाजिर हो गए। चेहरे पर वही आत्मविश्वास और चाल-ढाल में वही दंभ। उन्होंने पूछा-'आपने मुझे याद किया। कहिए, मैं क्या मदद कर सकता हूं आपकी?'

मैंने उनके सामने अपनी और अपने कवि मित्रों की निजता पर हमले संबंधी अपनी चिंताओं से उन्हें अवगत कराया और हाथ जोड़कर उनके लिए अभयदान की मांग की। उनका जवाब था- आपके कवियों ने लोगों का जीना दूभर कर रखा है। जब भी फेसबुक खोलता हूं, एक साथ आप सबकी सैकड़ों कविताएं सर पर हथौड़ों की तरह बजती हैं। कभी-कभी अवसाद में भी चला जाता हूं। दरअसल बम मैं आप कवि लोगों पर ही गिराना चाहता था, लेकिन मोदी जी से मेरे मित्रतापूर्ण संबंधों ने मुझे रोक लिया। दुर्भाग्य से मेरे गुस्से के शिकार यूक्रेन के लोग हो गए। लेकिन मैं आप हिंदुस्तानी कवियों को माफ कर दे सकता हूं बशर्ते आप मेरी एक मदद करें।'

मैंने उत्साहित होकर कहा- 'आदेश करें, कामरेड?' पुतिन ने कहा- 'यूक्रेन के साथ लंबे खिंचते युद्ध में मेरे सैनिक थकने लगे हैं। आगे लड़ाकों की भारी किल्लत हो सकती है। आप हमारे पक्ष में लडऩे के लिए अपने देश के कुछ वीर कवियों के नाम सुझा सकते हैं?' मेरे लिए आपदा को अवसर में बदलने का मौका था। मैंने अपनी मित्र-सूची से वीर रस के युद्धोन्मत सौ राष्ट्रवादी कवियों और सौ क्रांतिकारी वामपंथी कवियों की सूची उन्हें सौंपते हुए कहा-'हुज़ूर, आप इन्हें उठवा लें। युद्ध में अपनी कविताएं सुना-सुनाकर ये आपके तमाम दुश्मनों को आत्महत्या को मजबूर कर दे सकते हैं।ज् उन्होंने इन बीर-बांकुरे कवियों की फीस पूछी तो मैंने कहा- 'इन्हें बदले में आपसे कुछ नहीं चाहिए। बस उनका एक-एक कविता संग्रह प्रकाशित करवा दें। यहां के प्रकाशक एक-एक किताब के लिए पच्चीस से पचास हजार रुपयों तक मांग रहे हैं।'

पुतिन ने हामी भरी और सहयोग के लिए मुझे थैंक्स कहकर मुड़े ही थे कि मैंने पूछ लिया- 'हुज़ूर, एक आखिरी अनुरोध। हम फेसबुकिया कवि बहुत गरीब लोग हैं। दिन-रात मेहनत कर फेसबुक को समृद्ध कर रहे हैं, मगर वह अमरीकी जुकरबर्ग हमें फूटी कौड़ी भी नहीं देता। कभी किसी साहित्यिक पत्रिका या अखबार में कविता छप भी जाय तो कुछ हाथ नहीं लगता। उल्टे संपादकों को ही धन्यवाद देना पड़ता है। आप चाहें तो हमारे लिए कुछ कर सकते हैं।' उन्होंने सवालिया निगाहों से मुझे देखा तो मैंने सकुचाते हुए कहा-'मुझे पता है कि आपके और आपके खरबपति मित्रों की दुनिया भर के बैंकों में जमा अवैध कमाई की अथाह रकम नाटो देशों ने जब्त कर ली हैं। आप कहें तो अपनी कविताएं सुनाने की धमकी देकर नाटो देशों के राष्ट्रध्यक्षों को हम उस रकम को मुक्त करने के लिए मजबूर कर दे सकते हैं। हम ऐसा कर सकें तो क्या आप उस रकम में से एक-एक लाख हम भारतीय कवियों को...।' मेरा इतना कहना था कि पुतिन ने अपनी अटैची से एक छोटा-सा एटम बम निकाला और मुझ पर छोड़ दिया। अच्छी बात यह हुई कि बम विस्फोट के ठीक पहले मुहल्ले से गुजरने वाली नगर निगम की गाड़ी के इस गीत से मेरी आंखें खुल गई-गाड़ीवाला आया, घर से कचरा निकाल!

 


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