विचार / लेख
कांग्रेसी, समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक बुद्धिजीवियों का यह फतवा कि संघ और भाजपा परिवार के अंदर बुद्धिजीवी हैं ही नहीं। मुझे नागवार गुजरता रहा है। मैं यह बात कभी नहीं मान सका कि देश की बड़ी राजनीतिक पार्टी और उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा में बुद्धिजीवियों का अकाल ही रहा है। फिर भी उनकी प्रसिद्धि और सफलता की धरती इतनी उर्वर कैसे होती चली गई कि वह आज केंद्रीय सत्ता पर काबिज है। बल्कि बहुत मजबूती से काबिज है। अब पूरा खेल ही उसके हाथ आ गया लगता है। वे ही खेल के नियम तय करते हैं। वे ही फैसला भी करते हैं। बाकी लोग आलोचना करने के वैचारिक दलदल में फंसा दिए गए हैं। उनमें कुछ अपने मुंह मियां मि_ू बनने की आदत पाल चुके हैं। अपने हाथों आत्ममुग्ध होकर अपनी पीठ ठोंकने की अदा को लगता है कि दक्षिणपंथी विचारधारा के ‘नुमाइन्दों’ में जनता के मन को समझने वाले लोग नहीं हैं। हो लेकिन उलटा ही रहा है।
तथाकथित दक्षिणपंथी निजाम और विचारधारा ऐसा एजेंडा लागू करते हैं जो देशहित में न होकर समय के खिलाफ होता है। वामपंथी बुद्धिजीवी लेकिन अपनी सार्थक, तटस्थ और वस्तुपरक भूमिका से छिटक जाते हैं। राजनीतिक पार्टियां भी बेपरवाह हो जाती हैं। फिर भी उन्हें लगता है कि कभी तो दक्षिणपंथी विचारधारा को मुकम्मिल तौर पर परास्त कर सकेंगे। लगातार चुनावों के परिणाम बता रहे हैं कि यह हसीन मुगालता है। हालिया कर्नाटक में एक मुस्लिम छात्रा को हिजाब लगाकर अपने कॉलेज जाने से श्रीराम सेने के कुछ ‘उत्साही’ (हालांकि वे कूढ़मगज हैं) छात्रों ने रोकने की कोशिश की। विरोध में अपनी देह पर भगवा दुपट्टे लहराए। ‘जय श्री राम’ का घातक संदेश बनाकर नारा लगाया। उनसे बिना डरे जवाब में छात्रा ने भी ‘अल्लाह हू अकबर’ नारा लगाया। ‘जय श्री राम’ तो हिंसक नारा बना दिया गया है। हिंदू अतिवादिता ने उसे खास तौर पर मुसलमानों के गर्दन को हलाल करने की तरह चलाया है। ‘अल्लाह हू अकबर’ लेकिन उसका इलाज नहीं है। छात्रा मुस्कान द्वारा ‘अल्लाह हू अकबर’ का उद्घोष प्रतिरोधी सांप्रदायिकता की गूंज है। उसकी अनावष्यक तारीफ नहीं की जा सकती। सेकुलरिज्म का तो दोनों ओर से नुकसान होता है। भारत के समझदार नागरिकों को ठंडे दिमाग से तटस्थ और वस्तुपरक ढंग से सोचना होगा। हिन्दुत्व की सांप्रदायिकता बनाम इस्लामिक कठमुल्लापन से देश को वैचारिक श्मशान बनाम कब्रिस्तान ही मिल रहे हैं। नारेबाज इतिहास नहीं रचते। जानना चाहिए हिंदुस्तान में संविधान के मकसद और सांप्रदायिकता बनाम सेकुलरिज्म को लेकर पिछले 75 वर्षों से ज्यादा से खेला हो रहा है। उसकी बुनियाद में कई जज्ब की गई यूरो अमेरिकी मान्यताएं हैं। नागरिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक जीवन जहरीला किया जा रहा है। यह तो जाहिर है कि संविधान में यूरोपीय नस्ल का सेकुलरिज्म एक नये संवैधानिक विचार के रूप में इंजेक्ट किया गया है। पहले शब्दों में नहीं किया जा सका क्योंकि राजनीतिक परिस्थितियां और इतिहास के घटनाचक्र प्रतिकूल रहे हैं। विभाजन मुख्य घाव था। इंदिरा गांधी ने उसे 42 वें संशोधन संविधान संशोधन के जरिए शब्द में उच्चारित किया। सेकुलरिज्म की अवधारणा नेहरू की अगुवाई में आई थी। सबसे निर्णायक पद पर बिठाए गए डॉक्टर अंबेडकर समर्थक थे। कई कांग्रेसी ढके, मुंदे तौर पर विरोध करना चाहते थे, लेकिन नेहरू के कद्दावर व्यक्तित्व के सामने सब चुप रहे। और अंबेडकर ने कबूल किया कि कांग्रेस और नेहरू के संविधान बनाने में सहूलियत हुई। वह सहूलियत अब सेकुलरिज्म और समाजवाद के नारे का मलीदा बनाते तत्वों को हजम नहीं हो पा रही है। नफरत का घाव पक गया है। कई शब्दों पर ही हिंदुत्व समर्थकों का कब्जा हो गया है जबकि वे अपने गर्भगृह में संप्रदायवादी नहीं हैं। यह देश हिंदुओं का तो है। इसमें कहां शक है? हिंदू इस देश के निवासी हैं। लेकिन हिंदू होने का अभिप्राय क्या है? सनातनी हिंदू से याने जब कोई विदेशी भारत में नहीं आया था। या जब सब बाहरी लोग भारत आ चुके थे? पीढिय़ों से रचे बसे लोग हिंदू की समावेशी व्यापक परिभाषा में हैं कि वे सब भारतवासी हैं। मजहब नहीं इतिहास के चश्मे के लिहाज से अपने देश की संतान हैं।
संविधान में भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में कई प्रावधान बनाए गए। अन्यथा देश में आगे विभाजन और खतरा था। कई अनुच्छेदों में अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को पुष्ट करने साफ-साफ ऐलान किए गए। अनुच्छेद 14 भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से वंचित नहीं करेगा। इसमें हिंदू मुसलमान विभाजन को बहिष्कृत किया गया है। अनुच्छेद 15 में भी धर्म मूल वंश जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद की पूरी मनाही है। अनुच्छेद 25 में अंत:करण और धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार की आजादी दी गई है। जिससे खास तौर पर अल्पसंख्यकों को धार्मिक और संवैधानिक सुरक्षा का भाव महसूस हो। मसलन कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिक्ख धर्म को मानने का अंग समझा जाएगा। अनुच्छेद 26 में धर्म प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना की जा सकती है। विशेष धर्म की शिक्षा देने के संबंध में भी है। भारत के किसी भी इलाके में नागरिकों के किसी भी विभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा लिपि है, संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। धर्म या भाषा पर आधारित अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।
कर्नाटक के हुबली के शिक्षा संस्थान में हुआ यह कि एक मुस्लिम लडक़ी को हिजाब पहनकर जाने से रोका गया है। उसे कहा जा रहा है कि वह उस संस्था का ड्रेस कोड है। केंद्र सरकार और भाजपा के नुमाइंदे छाती ठोंक कर कह रहे हैं कि प्रत्येक शिक्षण संस्थान को अपना ड्रेस कोड बनाने का हक है। विद्यार्थियों को उसे मानना जरूरी होगा। किसी भी व्यक्ति को और लड़कियों को भी अपनी पसंद, रुचि और परंपरा की पोशाक पहनने का अधिकार तो संविधान के साथ ही पारंपरिक है। उसे रोका नहीं जा सकता। उलट तर्क है कि ड्रेस कोड लगाने का अधिकार शिक्षा संस्थान को है। शिक्षा संस्थान को ड्रेस कोड लगाने का अधिकार लेकिन संविधान नहीं देता है। ड्रेस कोड लगाने का अधिकार एक व्यावसायिक, प्रषासनिक या स्वविवेक का है। बंदिश लगाने के अधिकार से इनकार तो नहीं किया जा सकता। लेकिन ऐसी बंदिशें लगाने का अधिकार सरकार को भी तब है जब संविधान इजाजत दे, अन्यथा नहीं। डे्रस कोड पसंद नहीं है तो मत पढि़ए कहना घातक और असंवैधानिक है। सेना के सभी अंगो का ड्रेस कोड बदला गया है। उसका कर्नाटक के दृष्टांत से कोई समानांतर नहीं है। सेना संवैधानिक निकाय ही है। राज्य को अधिकार है कि अपने कानून और निर्देश बनाए और उनको मानना आवश्यक होगा। लाल टोपी समाजवादी पार्टी का, खादी का धोती कुर्ता, टोपी कांग्रेस का, भगवा दुपट्टा, झंडा, रंग संघ परिवार का स्वैच्छिक आचरण रहा है। लाल झंडा कम्युनिस्ट पार्टी का पूरी दुनिया में है। पोशाकों या प्रतीकों से प्रेम ही मौलिक अधिकार है। वह किसी अन्य व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं करता। भगवा दुपट्टा काले हिजाब के लिए दी ग्रेट खली क्यों बनाया जा रहा है। यह एक असंवैधानिक आचरण का नमूना है। अब तो हालत है कि धार्मिक आस्थाओं और संविधान की आयतों पर चौधरियों की मनाही है। बाबरी मस्जिद गिरने के बाद राम मंदिर मामले में पांच जजों की बेंच ने भी आस्था को हिन्दू तर्कों का आधार माना। उसका कोई वैज्ञानिक परीक्षण नहीं हुआ है। तब यदि मुसलमान कहते हैं कि हिजाब पहनना उनके धर्म, परंपरा और धार्मिक अनुभवों के कारण आचरण में आया है, तो यह फतवा नहीं दिया जा सकता कि धार्मिक आस्थाओं पर ड्रेस कोड का बुलडोजर चढ़ा देंगे। संविधान सभा में समान नागरिकता के सिद्धांत पर बहस में केवल मुसलमान सदस्यों ने विरोध किया। एक भी हिंदू सदस्य ने समर्थन नहीं किया। इसके ठीक उलट एक भी मुसलमान सदस्य इतना उदार नहीं था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के प्रस्ताव का समर्थन करता। दोनों धर्म के मानने वाले आजादी की राजनीति के सिपहसालार भी इतने संकुचित थे कि देश हित में समान वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आगे नहीं आ पाए। यही कमजोरी संघ परिवार ने पकड़ ली। इसीलिए जब व्याप्त कुरीति तीन तलाक की परम्परा को खारिज किया। तो मुस्लिम औरतों का उनको पष्चिम उत्तरप्रदेश से खासतौर पर इतना समर्थन मिला। कम से कम चार बार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र शासन को हिदायत दी है कि सामाजिक गतिशीलता के हित में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करे। परंपरा हर वक्त जायज नहीं होती। पारंपरिक पोशाक अपरिवर्तनषील भी नहीं होती। निजी संस्थान कह सकते हैं ड्रेस कोड नहीं मानना है तो नौकरी मत करिए। लेकिन जहां शिक्षा पाना मौलिक अधिकार है। शिक्षा देना एक कर्तव्य है। वहां इतनी आसानी से फतवा नहीं दिया जा सकता। संविधान बनाने में हिंदू मुस्लिम एकता की कलई खुली। उड़ीसा के सदस्य लोकनाथ मिश्र ने सेकुलरिज्म का इतना मजाक उड़ाया कि उसे पढऩे से कोफ्त होती है। उन्होंने इस्लाम और ईसाइयत की इतनी बुराइयां निकालीं कि उसे वह संविधान सभा की पोथी का वायरस लगता है। कभी सरदार पटेल तक ने कह दिया था कि मुसलमानों को इतनी रियासतें हमने दे दी हैं। फिर भी लोग खुश नहीं हैं। उनके लिए बस एक ही जगह है और वह है पाकिस्तान। यही आज गिरिराज सिंह विकृत अर्थ में लगातार उगलते रहते हैं। नागरिकता के मामले में पंजाब राव देशमुख ने भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ जो कुछ कहा था पढऩे में बहुत बुरा लगता है। 1955 में जब नेहरू हिंदू कोड बिल लेकर आए जिसमें हिंदुओं के पारंपरिक अधिकारों के बदले अधिनियमित अधिकार देने की बात कही गई। तब मुसलमानों की उनकी परंपराओं की बुराई करते करते भी एमएस गोलवलकर और करपात्री जी ने हिंदू धर्म में किसी भी तरह के कानूनी हस्तक्षेप की बात को कबूल नहीं किया। लोग कहते हैं कि धर्म हमारी आस्था का विषय है और धार्मिक मामलों को लेकर संविधान को हस्तक्षेप करने की आजादी नहीं देते। हम संविधान ही बदल देंगे। केंद्र सरकार में लोग बहुत सयाने और चतुर हैं। वह एजेंडा सेट करते हैं और विपक्षी अपने आप को बहुत विद्वान समझते भाजपा संघ के जमावड़े को कम बुद्धि का समझते हैं पीछे पीछे दौडऩे लगते हैं। जम्मू कश्मीर विवाद, अनुच्छेद 370, कर्नाटक का ड्रेस कोड, कब्रिस्तान बनाम श्मशान, जय श्री राम, हिंदू राष्ट्र का आव्हान, संविधान में इंडिया दैट इज़ भारत, मदरसों में कठमुल्लापन, लव जिहाद जैसे ठनगन मोदी सरकार सेट करती है। बाकी पार्टियां पीछे दौड़ती भी गाल बजाती हैं कि हिंदू धार्मिक जमावड़े में बुद्धिजीवियों की कमी है। हद है कि गाय, गंगा, गीता, हिंदू, हिंदुत्व, श्रीराम, जय श्रीराम, मथुरा, बनारस, वाराणसी, काशी जैसे सैकड़ों शब्द भाजपा संघ की डिक्शनरी के कॉपीराइट में हैं।
अचरज है कि हिंदू महासभा के तत्कालीन नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उप समिति की बैठक में प्रस्ताव में दिया था। उसमें अल्पसंख्यकों को बहुत अधिकार देने की बात की थी। उसे संविधान सभा ने नेहरू और अंबेडकर की अगुवाई में और यहां तक कि बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के नेताओं ने भुला दिया। वरना आज अल्पसंख्यकों को इतने संवैधानिक अधिकार होते कि हिंदू मुस्लिम का पचड़ा ही देश में खत्म हो गया होता। हिंदुत्व और हिंदू सांप्रदायिकता का बखान करने आलोचना करने के साथ-साथ मुस्लिम कठमुल्लापन पर खुलकर बात करनी चाहिए। अन्यथा सेकुलरिज्म का अर्थ तुष्टीकरण है कहना सरल हो जाता है। क्या मुस्लिम परंपराएं अनुमति देती हैं कि संविधान उनकी परंपराओं के खिलाफ है। कहीं भी संविधान प्रतिबंध नहीं लगा सकता? एक विद्यार्थी को हिजाब नहीं पहनने को लेकर सरकार तक अनुच्छेद 19 के तहत कानून नहीं बना सकती। तब स्कूल या कॉलेज कब बना सकता है। चित और पट दोनों कैसे चल सकते हैं।


