विचार / लेख
भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा सपना और ऐतिहासिक है और पौराणिक भी। अवाम पर सबसे ज्यादा असर राम का है। अनगिनत हिन्दुओं ने मौत के बाद खुद को राम के हवाले कर दिया है। इतिहास के सबसे एकनिष्ठ पति राम का सीता के निर्वासन के कारण औरतें माफ नहीं कर पा रहीं। उन्होंने पत्नी, बच्चे, मां-बाप, राजपाट, भाई बहन, परिवार, नगर, समाज या जीवन का समन्वित सुख सब खोया। राम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा उच्चतम न्यायालय भी थे। उन्होंने लोकनीति और न्यायिक निष्कपटता सुनिश्चित की। राम ने उस अंतिम व्यक्ति का सम्मान किया जिसे रस्किन ने गांधी की चिन्ता के खाते में डाला।
राम सदियों से देश के काम आ रहे हैं। देश उनके काम कब आएगा? लोग आपस में मिलते ‘राम राम‘ कहते हैं। वीभत्स दृष्य या दुखभरी खबर मिले तो मुंह से ‘राम राम‘ निकल पड़ता है। अब भी ‘जयरामजी‘ कहने की परंपरा है। मेघालय की पान बीड़ा बेचने वाली स्नातक छात्रा ने स्मरणीय टिप्पणी की थी इस देश के लोग ‘जयराम‘ कहने के बदले ‘जयसीताराम‘ क्यों नहीं कहते।
अकबर के समकालीन गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस के कारण लाखों घरों की सांसों में राम ने पैठ जमा ली। मौका मोहनदास करमचंद गांधी ने सबसे मौलिक ढंग से पाया। आजादी के युद्ध में अंगरेज से लड़ने, हिंदू मुसलमान एका करने, धर्म को राजनीति की ताकत बनाने, आंदोलन में नैतिक संस्कार भरने, कांग्रेस पार्टी बल्कि देश को तकरीबन रामसेना की तरह ढालने और उपेक्षित वर्ग को गले लगाते राम का मर्म गांधी ने दुनिया को परोस दिया।
गांधी की उत्तराधिकारी कांग्रेस ने राम को फकत हिन्दुओं का सरगना समझा। आज इतिहास दंड दे रहा है। संघ परिवार में उच्च वर्गों की जय है। संघ परिवार ने गांधी के ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम‘ को ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं,‘ ‘भारत में यदि रहना होगा, वंदेमातरम कहना होगा‘ और ‘जयश्रीराम‘ में रंग दिया।
वाल्मीकि और तुलसी के राम जुदाजुदा होकर भी चरित्र के गुलदान में गुलाब की तरह खुंसे हैं। लोकतंत्र का थर्मामीटर और मर्यादा का बैरोमीटर रहते कुतुबनुमा हैं। जिधर राम हैं उधर ही उत्तर है। उनको लेकर चलाई गई साम्प्रदायिक बहसें ठीक अयोध्या में दम तोड़ती नज़र आ रही हैं। राम को जांचना लोकतंत्रीय चुनौती है। उनका अक्स समझे बिना मजहबी दृष्टिकोण से लडा़ई नहीं जीती जा सकती। साम्प्रदायिक कठमुल्लापन हिन्दू और मुसलमान दोनों में है।
राम मंदिर में धार्मिक मुखौटे के सिर झुकाते नेता सहयोगियों को ‘यसमैन‘ बनाकर खुद को महिमामंडित करते हैं। राम परिवारवादी नहीं थे। लक्ष्मण और सीता को छोड़ लंका विजय तक कोई रिश्तेदार साथ नहीं था। उन्होंने दलितों, आदिवासियों, वंचितों को लोकतंत्र के युद्ध का साहसिक पुर्जा बनाया। यह सदी ये बुनियादी सवाल अपनी छाती पर कब छितराएगी?
रामनाम का मजहबनामा
राम को संघ परिवार उस पार्टी से उठा ले गया जिसके मसीहा ने छाती पर गोली खाने के बाद ‘हे राम‘ कहा था। कांग्रेस सम्मेलन में गांधी की आश्रम भजनावली का उच्चारण नहीं होता। प्रभात फेरी, खादी, मद्य निशेध, अहिंसा गायब हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिए राम से बड़ी कुर्बानी इतिहास में किसी ने नहीं की। एकाकी रहे राम को भीड़ के नारों की लहरों पर बिठाया जाता है।
‘जयश्रीराम‘ के उत्तेजक नारे वाला आदमी भी हिन्दू विश्वास में बहता है कि आखिरी यात्रा पर चलेगा तब पीछे ‘राम नाम सत्य है‘ का नारा अवष्य गूंजेगा। दिल्ली के तख्तेताउस पर एक पार्टी राम की बैसाखी लेकर बैठी है। दूसरी ‘हे राम‘ कहने वाले सबसे बड़े सेनापति को भुलाए बैठी है। उसके ही पूर्व प्रधानमंत्री ने राम मन्दिर का ताला खुलवाया था। वह राम को धर्मनिरपेक्षता का ब्रांड एम्बेसडर नहीं बना पाती। गांधी ने ही कहा था ‘ईश्वर, अल्लाह राम के ही नाम हैं।‘ राम क्या केवल अयोध्या नगर निगम के मतदाता हैं?
संसद और राष्ट्रपति भवन में जय श्रीराम का नारा गूंजा है। गूंजते रहने की लगातार गुजाइशें हैं। करोड़ों ग्रामीण राम की नसीहतों के मुताबिक संवैधानिक आचरण कर रहे हैं। एक हुकूमत सड़कों पर स्त्री के शील से खेलते एंटी रोमियों स्कवाड बनकर नपुंसक शेखी बघारती है। राम की पुलिस के लिए तो उनका नाम ही अनुशासन पर्व था।
कोई राम के चेहरे पर भगवा रंग भरे तो मुकाबले के लिए उनको ही ढूंढना होगा। विदेशों से पढ़कर आए हैं। हजारों साल से चली आ रही भारतीय समझ की खिल्ली उड़ाते हैं। परोपकारी अर्थ में धर्म हिंदुस्तान का अस्तित्व है। धर्म की हेठी औसत भारतीय को कुबूल नहीं। विचारों की लड़ाई में जीतना है तो राम चरित्र घर घर बताने वाली पार्टी ही केन्द्रीय हो सकती है।
राम को ‘चुनाव आयोग‘, ‘हाथ का पंजा‘, ‘कमल निशान‘, ‘हाथी‘ ‘साइकिल‘ जैसी बहुत सी तस्वीरें चौराहों पर लटकी मिलीं। लोग मिले। उन्होंने राम को विदेशी मुद्रा दिखाई। बताया इसी से धर्म युद्ध के हथियार खरीदे जाते हैं। इसी से धर्माचार्यों के आश्रम चलते हैं। इसी से चुनाव होता है। अचरज और राम एक दूसरे को घूरते हैं। इत्तिहाद, अदमतशद्दुद, मजहब, ज़मीर, सुकून जैसे शब्दों का हिन्दी में अनुवाद नहीं हो रहा है। भारत, भारतीयता, भारतीयकरण जैसे शब्दों का पेटेन्ट दाढ़ी मूंछ धारियों के हाथों में है जो मुस्टन्डे अखाड़ों में दंड पेलते उन्हें आश्रम कहते हैं। ‘मदरसा‘ शब्द का पर्याय ‘गंडासा‘ पढ़ाया जा रहा है।
राम के नाम पर
राजनेता संविधान की उद्देशिकाओं की कसम खाते हैं। वह राम की शब्दावली में है। इसके बावजूद मंत्री अपने खिलाफ प्रथम दृष्टि में स्थापित विधि की प्रकिया के अनुसार तथ्यपरक जांच रिपोर्ट खुद ही बांचते हैं कि वे अपनी दृष्टि में दोषी नहीं हैं।
राम के लिए बेकार मध्यवर्गीय नवयुवकों की भीड़ के द्वारा धोबी के मकान पर हमला कराने के बाद जिन्दाबाद के नारे लगवा लेना कठिन नहीं था। अपना यश सुरक्षित रखने के बदले राम ने नियमों और मर्यादाओं के लिए दाम्पत्य जीवन, पुत्रमोह, परिवार सुख और सत्ता की बलि चढ़ा दी। शिकायत करने का सार्वजनिक अधिकार आज राम की वजह से जिन्दा है। हर मुसीबतजदा, अन्यायग्रस्त, व्यवस्थापीड़ित व्यक्ति के दिल में साहस का दीपक जलता है। उसमें राम की बाती है।
राजनेता अपने परिवारजनों के कारण मारे जा रहे हैं। लगातार जीतने का रेकार्ड बनाकर भी शराबी पुत्र के कुलक्षणों पर पर्दा डालने, सरकारी जंगलों की लकड़ी कटाई के आरोपों को लेकर नेता सांसत में हैं। सत्ताधीश खुद के खर्च से प्रायोजित मौसमी संस्थाओं की नकली उपाधियों से विभूषित अपनी रामलीला में रमे हैं। बुद्धिजीवियों को बीन बीनकर राज्य व्यवस्था बाहर कर रही है। मुलजिम न्याय सिंहासन पर काबिज हैं। विद्वानों की जगह नवरत्नों की शक्लों में रिटायर्ड, बर्खास्तशुदा और इस्तीफाग्रस्त नौकरशाही ले चुकी है। वे राज्य को लोकसेवा नहीं, शासन का अहंकार बनाते हैं।
आर्य बनाम म्लेच्छ युद्ध में राम विजय पुरस्कार की ट्रॉफी बने इतिहास की खूंटी पर टांग दिए गए हैं। देश गुंडों, मवालियों, खलनायकों, हत्यारों, दंगाइयों के हवाले है। राम का लोकतंत्रीय आचरण पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है। शबरी, जटायु, त्रिजटा, सुग्रीव जैसे चरित्र सांस्कृतिक हाशिये पर धकेले गए हैं। रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद वगैरह ने तख्ते ताऊस पर कब्जा कर रखा है। काल दहाड़ें मारकर रो रहा है। सदी बेवा की तरह चीख रही है। परम्पराएं मवाद से भर गई हैं।


