विचार / लेख

वो समाज स्त्रियों के लिये उतना ही अनुदार है...
28-Dec-2021 1:36 PM
वो समाज स्त्रियों के लिये उतना ही अनुदार है...

-कनुप्रिया


स्त्रियों का दुख
स्त्रियों का सुख
स्त्रियों का प्रेम
स्त्रियों की इच्छा, कामना
स्त्री की पीड़ा
इस सबको जिस तरह स्त्री के नाम पर categorised किया जाता है वो भी एक समस्या है, स्त्रियों के गिर्द एक रहस्यमयी आवरण बुनने का काम स्त्री विरोधियों ने ही नही स्त्री का मन लिखने वालों ने भी किया है।  दुनिया की तमाम स्त्रियों को सिर्फ स्त्री की श्रेणी में biologically categorise   करना तो ठीक है मगर उससे इतर जो भी कहा जाता है  वहाँ उसे खोलकर देखने की जरूरत महसूस होती है। इसलिये स्त्री के नाम पर अति भावुक, चाशनी में पगे, आह उह करते संबोधनों और विश्लेषणों से विरक्ति होती है, क्यों उन्हें किसी भी मोल्ड में, किसी खाँचे में घुसाने की जबरन कोशिश की जाती है। अगर कोई उस तरह की स्त्री की होने से इनकार कर दें तो क्या स्त्री नहीं रहेगी?

Biological hormonal difference  के अलावा स्त्री के दुख, पीड़ा, सुख, प्रेम, कामना, इच्छा, महत्वाकांक्षा, किसी में भी कुछ भी रहस्य नहीं है, सब वैसा ही है जैसा एक इंसान का होता है, बात ये है कि क्या समाज उसे स्वीकारने को तैयार है? और उधर उसके इंसान होने को खारिज महज समाज ही नहीं करता वो भी करते हैं जो उसके प्रति अति भावुक, रहस्यवादी किस्म की व्यंजनाएँ रचते हैं, यह समाज के नजरिये को कहीं न कहीं पुनर्स्थापित करने जैसा लगता है कि आप स्त्री को उन सीमाओं से बाहर आने ही नहीं देना चाहते, वो जहाँ है वहीं बनी रहे उसी में उदासी है, उसी में खूबसरती, धत्त।

जिस तरह Men will be men   के नाम पर पुरुषों का खाँचाकरण हुआ, उसी स्त्री के नाम पर कही गई अधिकांश रचनाओं में उनका श्रेणीकरण होता है, उन्हे ‘स्त्री’ की विशेष किस्म विशेषताओं से लैसकर उनमें फिट करने की जबरन कोशिश होती है।  
होममेकिंग, कला, लेखन के अलावा स्पोर्ट्स, एडवेंचर, लीडरशिप, टेक्नोलॉजी, पत्रकारिता, बिजनेस हर क्षेत्र में स्त्रियाँ हैं, उनके अपने अनुभव हैं, अपना स्ट्रगल है, paitrichal society  से भिड़ंत है तो ख़ुद को बतौर इंसान e&plore करना भी है जिसके अवसर समाज उन्हें कम देता है। मगर इस सबमे कुछ भी ऐसा नहीं है जो उन्हें इंसान होने से अलग करता हो। अगर कुछ है जो अलग करता है तो वो समाज है, स्त्री नहीं। ‘स्त्री’ को जिस समाज में जितना ‘स्त्री’ कह कहकर खाँचाबद्ध किया जाए समझिये वो समाज उतना ही स्त्रियों के लिये अनुदार है, बन्द है, वो उसे इंसान बनने नहीं देना चाहता। क्योंकि एक खुले समाज में स्त्रियों की उतनी ही वैरायटी संभव है जितनी इंसानों की संभव हो सकती है।

 


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