विचार / लेख
-प्रकाश दुबे
उत्तर प्रदेश को मिले अनेक वरदानों ने उसे प्रश्न प्रदेश बनाने में कम सहयोग नहीं दिया। सुफला नदियों और उर्वर जमीन का लाभ उठाने के लिए स्वार्थ आधारित आर्थिक कारणों ने नया अवतार लिया। बाहुबल, जातीय और धार्मिक तनाव के प्रयोग ने विषमता को बढ़ाया। कई सदियों के इस रोग को राम, कृष्ण आदि के अवतारों के माध्यम से मेलजोल और समता का संदेश देने वाले कवि-कलाकार, साहित्यकार और समाजसेवी सम्मानित हुए। उनके संदेश पर सत्ता की चाह हावी होती गई। समता वंचित नारी सहित विवश जन समुदाय ने कोई नृप होय हमें का हानी। दासी छोड़ न बनिहैं रानी वाली मुद्रा अपना ली। असहाय आम आदमी ने जब जब होय धरम की हानी—तब-तब प्रभु धरि मनुज शरीरा कहते हुए अवतारवाद के आगे घुटने टेक दिए। यह किसी एक धर्म के कारण नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश में भारत के दो प्रमुख धर्मावलंबियों के आस्था और शिक्षण केन्द्र हैं। हथियार और अहिंसा दोनों के बूते देश को आज़ाद कराने सबने कुर्बानी दी है। हिंदी और उर्दू प्रचार पत्रकों में वंदे मातरम और इन्कलाब जिंदाबाद के नारे साथ छपे और लगे। देवबंद से अंग्रेजों को किसी कीमत भगाने का उपदेश दिया गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद राम, शिव और कृष्ण के जन्मस्थान पर खींचतान शुरु हुई। फिरंगी जा चुके थे। देश बंट चुका था। घाव गहरे थे। इस राजनीति को समझते हुए संवाद और न्यायपालिका के सहारे नया देश रचने के प्रयास हुए। तनाव और चुनावी आशंकों के बावजूद जिन लोगों का दिमाग ठिकाने रहता है, वे जानते हैं कि धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करने के पीछे सत्ता की ताकत जताना मुख्य उद्देश्य था। सत्ताधारियों ने यह आदत ने तो किसी दूसरे देश से आकर सीखी थी और न अपने पुरखों से। भक्तिमार्गी और मठवादी कुरीतियों से धर्म को मुक्त कर नया पंथ बनाने वालों के हठधर्मी बाहुबली इससे पहले भी तोडफ़ोड़ करते रहे हैं। जिनके प्रमाण साहित्य और इतिहास में दर्ज हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने समाजवादी युवजनों को धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण के घाव दूर करने के लिए प्रेरित किया। केरल के वर्तमान राज्यपाल सहित अनेक जन इस पहल से सहमत थे। डा राम मनोहर लोहिया ने आदिवासी बहुल चित्रकूट में रामायण मेला आयोजित किया। ताकि विषमता पर भी उतना ही कठोर प्रहार हो।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उत्तर भारत में जिन्ना प्रभाव नहीं बना सके। भारत की कुरीतियों का इसमे अपना योगदान है। धर्म बदलने वाला हर ईसाई या मुसलमान समान सामाजिक या आर्थिक दर्जा प्राप्त नहीं कर सका। अन्य धर्म को स्वीकार करने वाले भी अपने को सवर्ण मानते हुए नर-नारी समता तक को स्वीकार नहीं कर सके। दूसरी ओर विवशता, लोभ या आर्थिक संकट से बचाव के लिए धर्म बदलने वाला वंचित वर्ग आज भी गैर बराबरी का बड़ी हद तक शिकार है। मध्यकालीन शासकों ने सिर्फ जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन नहीं कराया। ओहदा और आर्थिक लाभ के लालची उच्चवर्णीय भी गए। तब चुनाव नहीं होते थे। धर्म परिवर्तन, स्वधर्म वापसी और क्षतिग्रस्त आस्था केन्द्र वैचारिक मुद्दा तब भी थे। एक व्यक्ति, एक वोट का युग आया। अब ये राजनीतिक मुद्दा हैं। रामायण के भाष्यकार डा कामिल बुल्के धर्मपरस्तों को पसंद हैं। उनके नाम से पहले फादर जुड़ा होने के बावजूद सम्मान कायम है।कितनों के गले से यह बात उतरेगी कि डा पीसी अलेक्जेंडर को वाजपेयी सरकार राष्ट्रपति बनाना चाहती थी। विरोध कांग्रेस ने किया था।
दुनिया भर में फैला हरे राम हरे कृष्ण आंदोलन भारतीय आस्थावानों को पुलकित करता है। दूसरे धर्म में शामिल होने पर अलग अलग स्थितियों में अलग प्रतिक्रिया होती है। बरसों पहले तमिलनाडु के वंचित-बेरोजगार लोगों ने इस्लाम कबूल करने का ऐलान किया। जर्बदस्त प्रतिक्रिया हुई। ओडिशा में धर्म परिवर्तन की अफवाहों के चलते एक पादरी की सपरिवार हत्या कर दी गई। महाराष्ट्र में इसी तरह के आरोपों में बंदी पादरी की जेल में सुविधाओं के अभाव में मौत हुई। मेवाड़ राजघराने के भांजे दिलीप सिंह जूदेव वर्तमान छत्तीसगढ़ी आदिवासियों के चरण-पूज कर घरवापसी कराते थे। जबर्दस्त लोकप्रियता के बावजूद एक दांव में फंसे। उनका राजनीतिक अवसान हुआ। भारत और अन्य कुछ देशों में धर्मांतरण कर हिंदू धर्म अपनाने वालों का स्वागत होता है। स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन पर न कानूनी रोक और न किसी को आपत्ति होगी। इतना विचार अवश्य होना चाहिए कि पिछले धर्म से आपत्ति रही या उसका पालन कराने वाले समुदायों अथवा सत्ता से। इससे हर धर्म को अपनी कुरीतियों को छोडऩे में मदद मिलेगी। अरब देशों में उदारता की हवा पहुंच रही है। महिलाओं को आंशिक अधिकार, अमानवीय कानूनों और सजा पर पुनर्विचार किया जा रहा है। धार्मिक उदारता में हिंदू धर्म को ऊंचाई से खींचने वालों कारणों में छुआछूत और जातिवाद समाप्त करने के उपायों का लाभ हुआ है परंतु समस्या को अब तक समूल नष्ट नहीं किया जा सका। किसी भी धर्म के प्रति आकर्षण और लगाव तभी होगा जब वह वर्तमान की कसौटी पर खरा उतर सके। सत्ता के बूते खरीदे गए विधायक बदल सकते हैं। धर्म बदलना इतना आसान नहीं होता। धर्मावलंबी संख्या में बढ़ोत्तरी कर राजनीति में लाभ पाने के उदाहरण अधिक नहीं हैं। किसी सरकार में धर्मांतरण का विभाग नहीं हो सकता। इसकी पहली शर्त है-लोकतंत्र को समाप्त करना या फिर जबर्दस्त ज्वार पैदा कर उत्तेजित समुदाय तैयार करना। उसके लिए उपासना के तरीके और स्थल निशाने बनाए जाते हैं।
वर्ष 2021 के आखिरी पखवाड़े में हरनाथ यादव ने उपासना स्थल विशेष उपबंध कानून को निरस्त करने की मांग की ताकि मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि का नए सिरे से निर्माण किया जाए। वर्ष 2002 तक वे इस तरह के कानून के कट्टर हिमायती रहे। समाजवादी पार्टी की बदौलत दो बार उत्तर प्रदेश विधान परिषद में पहुंचे। अगला चुनाव हारते ही पार्टी निष्ठा बदली। उन्हें लपकने में सफल राजनीतिक दल ने सही दांव चला। प्रदेश संगठन में पद, राज्यसभा सदस्यता दी। मैनपुरी वासी हरनाथ को मुलायम सिंह के क्षेत्र का प्रभारी बनाया। उपासना स्थलों में 15 अगस्त 1947 वाली स्थिति रखने का कानून 1991 में प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने बनाया था। लोगों को अपना विचार बदलने का अधिकार है। बानियान में बुद्ध की ऐतिहासिक प्रतिमा तोडक़र तालिबानियों ने कट्टरता को संजीवनी दी। चुनावी लाभ के लिए कट्टरता को मनोरोग बनने से रोकना आसान नहीं रहा। बीते एक अप्रैल को 80 वर्ष पूरे कर चुके हरनाथ जानते हैं कि परिहास का शिकार बनने से कोई भी समाज और देश बचना चाहेगा। सुनील दत्त, नरगिस ने मोर्चे पर तैनात जवानों का मनोरंजन करने की शुरुआत की। सार्वजनिक मंचों पर बड़बोले तुरही वादकों की टोलियां आजकल अन्य धर्मावलंबी को अपशब्द कहकर तालियां मांगकर कमाई करती हैं। दबाव डालकर धर्मांतरण कराना किसी राजनीतिक दल या सत्ता का लक्ष्य नहीं हो सकता। संगठनों को अपने विचार फैलाने की संविधान में गारंटी है। लोकतंत्र और धर्म में श्रद्धा और असहमति की अवहेलना से नए पंथ जन्मे। कोई धर्म इससे नहीं बचा। सहनशीलता के लिए सुपरिचित धर्म और स्वामी विवेकानंद जैसे धर्म विश्लेषक को नारे की तरह इस्तेमाल करना आसान है। एकतरफा प्रचार के बावजूद लोकतंत्र में असहमति कायम रहती है। कविता और लोकतंत्र का दिलचस्प संगम हाल ही नागपुर के खासदार महोत्सव में देखने मिला जहां संचालक ने वीरत्व बेचते कवि पर चुटकी ली-आप तो कोर्स की कविता पढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ राजनीति में अपनी हालत का दर्द भी बखान किया। जनप्रतिनिधि इस तरह के आयोजनों से लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


