विचार / लेख

कंगना अभूतपूर्व नहीं है...
13-Nov-2021 2:04 PM
कंगना अभूतपूर्व नहीं है...

-पुष्य मित्र
इतिहास पढ़ते रहने की लत ने मुझे कई अनावश्यक तनाव से बचा लिया है। अब जैसे कंगना राणावत जी का ही मसला है। मगर यह कोई अभूतपूर्व प्रसंग नहीं है। इतिहास के पन्नों पर ऐसे किरदार पहले भी दर्ज हुए हैं। जैसे ये मोहतरमा।

ये सावित्री देवी हैं। ये हिटलर की खास थीं। भारतीय नहीं थीं, मगर हिन्दू बन गई थीं। इन्हें लगता था कि हिन्दू ही आर्यों की संस्कृति को बचा सकते हैं। इन्होंने एक किताब द्वितीय विश्व युद्ध से पहले लिखी थी। ए वार्निंग टू हिंदुइज्म। जिसके भूमिका वीडी सावरकर के भाई जीडी सावरकर ने लिखी थी। वीडी सावरकर से भी इनके करीबी रिश्ते थे। इस किताब में उन्होंने लिखा था कि हिंदुओं को मुसलमानों की बढ़ती आबादी से खतरा है। भारतीय महिलाओं को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिये। मतलब अधिक से अधिक बच्चे पैदा करना चाहिये।

सावित्री देवी दरअसल फ्रेंच थी और इनका नाम मैक्सिमजानी जूलिया पोर्ता था। ये युवावस्था में हिटलर से काफी प्रभावित थी। इन्हें हिटलर देवता लगता था। इस वजह से वे हिटलर के करीब आ गयी। इन्हें लगता था कि हिटलर ही दुनिया की किस्मत बदल सकता है। हिटलर की आर्यन थ्योरी से प्रभावित होकर वे आर्यों की तलाश में भारत आ गयीं।

यहां उनका परिचय यहां के हिंदूवादी नेताओं से हुआ। इन्होंने अपना नाम बदलकर सूर्य की किरणों के नाम वाली देवी सावित्री के नाम पर रख लिया। यहीं उन्होंने घोषणा की कि हिटलर विष्णु के कल्कि अवतार हैं। हिटलर के प्रोपेगेंडा विभाग के एक भारतीय सज्जन असित कृष्ण मुखर्जी से इन्होंने शादी कर ली।

हिटलर की मौत और नाजीवाद के पतन के बाद भी वे नाजीवाद का प्रचार करती रही। हिटलर के जीवन से जुड़े स्थलों को तीर्थ के रूप में विकसित करने की कोशिश करती रही। 90 के दशक में उनकी मृत्यु हो गई। दिलचस्प जानकारी है वे भले नाजीवादी थी, मगर पशु अधिकारों की प्रबल समर्थक थी।

इनके बारे में मुझे तब पता चला, जब मैं हिटलर के प्रशंसक बुद्धिजीवियों के बारे में पता करने की कोशिश कर रहा था कि वे कैसे थे, नाजी दमन के बारे में उनके क्या विचार थे। हिटलर के दमन का वे किन शब्दों में समर्थन करते थे।


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