विचार / लेख
-अजीत साही
इसमें दो राय नहीं कि तालिबान का इतिहास और विचारधारा हिंसक है, लेकिन हिंदुस्तान में आज तालिबानियों के खिलाफ चल रही बहस के बीच एक सवाल जायज होगा। क्या अमेरिका को वहाँ और रुकना चाहिए था? इसके बावजूद कि अमेरिका एक आक्रांता था, जिसने पूरे अफगानिस्तान में कत्लेआम करके ऐसा आतंक फैलाया कि करोड़ों लोग उससे नफरत करने लगे थे, उसे वहाँ काबिज रहते रहना चाहिए था तालिबान को रोकने के लिए? अमेरिका तो रुकना नहीं चाह रहा था। पैसे उसके खर्च हुए आपके नहीं। सैनिक उसके मरे आपके नहीं। फिर आखऱि क्या संभावना बननी चाहिए थी आपके हिसाब से?
आप कह रहे हैं कि तालिबान को सत्ता में नहीं आना चाहिए था। चलिए मान लिया। तो फिर आपके हिसाब से अमेरिका के जाने पर किसे राज करना चाहिए था? अशरफ गनी की सरकार तो पूरी तरह लचर और भ्रष्ट थी। बल्कि सरकार ही फर्जी थी क्योंकि उसका चुनाव ही फर्जी था। तो जनता के बीच जब उसकी वैधता ही नहीं थी तो वो सरकार कैसे टिकी रहती? क्या आपने खबरें नहीं पढ़ी थीं कि अफगान सेना को खाने का राशन नहीं मिल रहा था? पूरी पगार नहीं मिल रही थी? कि अशरफ गनी और उसके आसपास लोग अरबों डॉलर खा चुके थे? ये सब आपको मंजूर था? ऐसी सरकार का प्रशासन पर कुछ भी प्रभाव या दबाव रहा होगा? आपको क्या लगता है?
दरअसल बात ये है कि अशरफ गनी की सरकार की पहले ही कोई नहीं सुन रहा था। काबुल के आसपास छोडक़र और दो-तीन शहर छोड़ कर वैसे भी अलग-अलग सूबों में अलग-अलग स्थानीय मिलिशिया का प्रभाव था। अमेरिका के जाने पर अशरफ गनी की सरकार का और भी अधिक लचर हो जाना निश्चित था। फिर क्या होता? पूरे देश में गृहयुद्ध छिड़ जाता। हजारों-हजार लोग मारे जाते। क्या वो आपको मंजूर था? उन हजारों लोगों में औरतें भी होतीं, बच्चे भी होते। हजारों परिवार बेघर हो जाते। लाखों बच्चे अनाथ हो जाते। हजारों लड़कियों के साथ दुष्कर्म होता। वो सब आपको मंज़ूर था? स्कूल बंद हो जाते। धंधा ठप हो जाता। लूटपाट होती। ये सब ठीक होता?
कुछ हालात ऐसे होते हैं जिनके लिए अंग्रेज़ी का जुमला है there are no good answers so you look for the least bad answer। आप बताइए, क्या लीस्ट बैड आंसर होता आपके हिसाब से अफगानिस्तान के लिए आज के हालात में?
आप कह सकते हैं कि जो बातें मैंने ऊपर लिखी हैं वो तो तालिबान के रहते भी हो सकती हैं। बिल्कुल सही बात है। ज़रूर हो सकती हैं। लेकिन पिछले एक हफ्ते में हुई हैं क्या? ये सही है कि पूरे अफगानिस्तान में महिलाएँ घबराई हुई हैं। उनका भय बिल्कुल समझ आता है। लेकिन तालिबान नहीं होता अभी और सरकार गिर चुकी होती और गृहयुद्ध चल रहा होता तो वो महिलाएँ हंस-खेल रही होतीं? तालिबान नहीं होता और गृहयुद्ध होता तो क्या सैकड़ों अफगान अमेरिकी विमान पर चढक़र नहीं मर रहे होते? भाग नहीं रहे होते? अगर आप थोड़ा भी पढ़े-लिखे हैं तो आपको याद होगा कि 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था तो पहले दो महीनों में पूरे देश में भयानक अराजकता फैल गई थी क्योंकि अमेरिका ने सोचा ही नहीं था कि सद्दाम के भागने पर शासन कौन चलाएगा। आज भी इराक में उसके दुष्परिणाम जाहिर हैं।
देखिए, एक बुनियादी बात समझिए। किसी भी मुल्क में, समाज में बाहर से आए आक्रांता के खिलाफ उस समाज की पहली लड़ाई होती है। ये अफसोस की बात है कि न आपको अमेरिका का अफगानिस्तान पर कब्जा बुरा लगता है और न ही आपको मालूम है कि जितना अत्याचार और जितनी हिंसा अमेरिका ने किया उसका एक-चौथाई भी तालिबान ने नहीं किया। अमेरिका ने घर-घर घुस-घुसकर आठ-आठ साल के लडक़ों की हत्या करवाई है। हवाई बम गिराए हैं। कार्पेट बाम्बिंग की है। टैंक से गोलीबारी की है। बेगुनाह लोगों को महीनों बंद करके यातना दी है। उनके ऊपर पेशाब किया है। उनकी उँगली काटते थे। सैनिकों को कहते थे कि प्रैक्टिस के लिए सिविलियन को मारो। आप चाहते हैं कि जिन्होंने अपना सब कुछ खोया है, वो अपना दर्द, अपमान सब भूल जाएँ और अमेरिका को सपोर्ट करते रहें?
तालिबान गुड आंसर नहीं है। ये समझने के लिए पीएचडी की जरूरत नहीं है। लेकिन आज के हालात में अब तक वही लीस्ट बैंड आंसर है। अब तालिबान कैसे हटेगा? तो अगर रूस, चीन, अमेरिका, पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपना गंदा खेल नहीं जारी रखा तो अफगान लोगों को मौका मिलेगा कि वो ख़ुद अपने को धीरे-धीरे मजबूत करें और अपने हकूक के लिए लोकतांत्रिक लड़ाई लड़े। इसमें वक्त लग सकता है और लगेगा भी। दस साल। बीस साल। लेकिन इसी समाज की महिलाओं से, श्रमिकों से, युवाओं से असली लोकतंत्र का बीज फूटेगा। अमेरिका के कब्जे में मिली आजादी वैसी ही आजादी थी जैसी की ब्रिटिश काल में भारतीयों को मिली आजादी थी। अगर आपको लगता है कि पराधीनता में दोयम दजऱ्े का नागरिक बनने में ही खुशी है तो फिर आप गुलाम मानसिकता के हैं। लिबरल और प्रोग्रेसिव तो बिल्कुल ही नहीं हैं।
पिछले एक हफ्ते में जो हमने तालिबान को देखा है वो पच्चीस साल पहले हमने तालिबान में नहीं देखा था। हमने कई-कई समाजों में देखा है कि परिस्थितियाँ बदलती हैं तो किरदार भी बदलते हैं। जीसस, मुहम्मद, बुद्ध, गाँधी सबकी शिक्षा यही है कि हर इंसान बदलाव के काबिल है। और इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है।
असली बात ये है कि लोकतंत्र कोई बाहर से आकर नहीं थोप सकता। स्वाभिमान विदेशी नहीं पैदा कर सकता। यूएन और अमेरिका अफगानिस्तान को तालिबान से आजादी नहीं दिला सकते। अफगानिस्तान के लोगों को खुद मजबूत होकर अपनी लड़ाई लडऩी होगी।


