विचार / लेख
-दिनेश श्रीनेत
नीरज चोपड़ा को तीन प्रदेश सरकारें मिलकर 9 करोड़ रुपया देंगी। इसके अलावा कई निजी कंपनियों से दी गई धनराशि को देखेंगे तो आने वाले समय में यह रकम भी शायद 10 करोड़ के आसपास बैठेगी। खिलाड़ी जब जीतते हैं तो उनके संघर्ष की कहानियां भी आम होने लगती हैं। जैसे कि इस देश में संघर्ष करना कोई अनिवार्यता हो। हर किसी के अपने निजी संघर्ष होते हैं मगर संसाधनों का अभाव, भेदभाव, आर्थिक असुरक्षा कोई संघर्ष नहीं है, यह शर्मिंदगी का विषय है।
मिडिल क्लास फैमिली का बच्चा अगर खेलने लगे तो उसकी नौकरी की चिंता हो जाती है। अगर खेलने दिया तो सबसे पहले कोशिश यह होती है कि कैसे वह रेलवे, पुलिस या ऐसी किसी जगह खेल कोटे में फिट हो जाए। लड़कियों को इन सबके अलावा एक पहाड़ जैसे जेंडर भेदभाव से जूझना पड़ता है। खेल में लड़कियों शारीरिक से ज्यादा मानसिक दबाव सहना पड़ता है- परिवार का असहयोग, खेल के अवसरों में भेदभाव, शोषण के मौके ताड़ते रहने वालों से बचना, शादी और बच्चों का दबाव।
मैने बहुत कम सुना है कि मेरा भारत महान कहने वाली कंपनियों ने अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा नशे में झूमते युवाओं के आयोजन स्पांसर करने या फिर कैलेंडर और फैशन शो में खर्च करने के अलावा कभी खेल को प्रोत्साहित करने में लगाया किया हो। निजी प्रयासों को थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दें, सरकार और संस्थाओं को अब इस बात पर खर्च करना चाहिए कि देश से एथलीट कैसे निकलें।
रिपोर्टिंग के दिनों में एक कोच ने मुझे बताया था कि आदिवासी बच्चों में गेंद से खेलने की अद्भुत प्रतिभा होती है, जो एक शहरी बच्चा कई सालों में सीखता है वे कुछ ही दिनों में सीख जाते हैं। देश सुविधाविहीन इलाकों से बहुत शानदार खिलाड़ी निकल सकते हैं। क्या छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, तेलंगाना जैसे राज्यों में छोटे छोटे मानक सेंटर नहीं बन सकते, जहां से नीरज चोपड़ा जैसे एथलीट निकल सकें?
भारत के विशाल भूखंड में प्राकृतिक आपदाओं से संघर्ष करते लोगों, संसाधनों के लिए संघर्ष करते लोगों में अपार जीवट है। जाने कितने दूर-दराज के गांवों मे बच्चे आज भी तैर कर स्कूल जाते हैं। तेज बहती नदी के ऊपर टूटी डगमग करती पुलिया को हर रोज नन्हें सधे हुए पैरों से पार करते हैं। गुलेल का हर निशाना उन बच्चों के लिए स्वाद की दुनिया खोलता है। भाला फेंकना भोजन का जुगाड़ है। दौडऩा समय की बचत है।
भारत की जनसंख्या का लगभग 9 प्रतिशत आदिवासियों का है, जो अपना अस्तित्व और जंगल बचाने के संघर्ष में लगे हैं। पॉलिटिकल प्रॉपेगैंडा उनके हाथों में हथियार थमा रहा है। उनकी पहचान खत्म किए बिना उन्हें मुख्यधारा से जोडऩे का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता। उनका संगीत, उनकी कलाएं और उनका खेल बेजोड़ है। थोड़ा सा फोकस भी उनको अंतरराष्ट्रीय ऊँचाइयों तक लेकर जा सकता है।
वहीं मध्यवर्गीय परिवार भी खेलों को सिर्फ सरकारी नौकरी के शॉर्टकट के रूप में न सोचें। सरकारें देश की खुशहाली को सिर्फ आर्थिक इंडेक्स के आधार पर न तय करें। खेलों में भागीदारी किसी भी देश की सामूहिक मानवीय शक्ति, उसके उत्साह, उसकी जिजीविषा का भी इंडिकेटर होता है। (फेसबुक से)


