सरगुजा

पुरातत्व और लोक संस्कृति ही राष्ट्र की नींव- अजय चतुर्वेदी
22-Feb-2026 10:05 PM
पुरातत्व और लोक संस्कृति ही राष्ट्र की नींव- अजय चतुर्वेदी

सरगुजा में गूँजी विरासत की प्रतिध्वनि: 5 दिनी राज्य स्तर कार्यशाला संपन्न

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

अंबिकापुर, 22 फरवरी। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक जड़ों को संरक्षित करने के उद्देश्य से संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय कार्यशाला ‘सरगुजा का पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य’  का  आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम सरगुजा की सांस्कृतिक धरोहरों को समझने, सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। छत्तीसगढ़ की विरासत को संजोने के लिए सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर में 17 से 21 फरवरी तक आयोजित  कार्यशाला में जिला पुरातत्व संघ के सदस्य और प्रदेशभर से आए लगभग 90 शोधार्थियों एवं इतिहास और पुरातत्व विभाग के महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

राज्यपाल-पुरस्कृत व्याख्याता जिला पुरातत्व संघ सूरजपुर के सदस्य अजय कुमार चतुर्वेदी ने सरगुजा अंचल की लोक संस्कृति और उसका संरक्षण विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने लोक संस्कृति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि—  सरगुजा के पारंपरिक गीत, नृत्य,बोली, रहना सहन,खान पान रीति रिवाज और कलाएँ आधुनिकता की दौड़ में खोती जा रही हैं। प्राचीन समय में 70-80 प्रकार के लोक वाद्य प्रचलित थे, जिनकी ध्वनि इतनी प्रभावशाली थी कि जंगली जानवरों को भी प्रभावित कर सकती थी।

 सरगुजिहा, सादरी सहित कोड़ाकू, कोरवाई, कुडुख जैसी जनजातीय बोलियाँ तेज़ी से विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरगुजा की संस्कृति वैश्विक स्तर पर पहचान बना चुकी है, लेकिन इसे बचाने के लिए समाज के हर वर्ग की भागीदारी आवश्यक है। अजय चतुर्वेदी में सभी प्रतिभागियों ने सरगुजा की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित एवं संवर्धित करने का संकल्प दिलाया। कार्यशाला के अंतिम दिवस पुरातात्विक स्थल महेशपुर का भ्रमण कराया गया।

कार्यशाला में पुरातत्व और इतिहास जगत के अनेक विशिष्ट विशेषज्ञ शामिल हुए, जिनमें बोधगया विश्वविद्यालय के डॉ. सचिन मंदिलवार, विनोद पांडेय (मनेन्द्रगढ़), डॉ. अजय पाल सिंह (अंबिकापुर), डॉ. विनय तिवारी (जशपुर), डॉ. भाग्यश्री दीवान, प्रभात कुमार सिंह (रायपुर) शिरीष मिश्रा सहित कई वरिष्ठ पुरातत्वविदों ने सरगुजा की सांस्कृतिक परतों पर गहन चर्चा की। यह आयोजन न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि इसने स्पष्ट संदेश दिया कि यदि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों—पुरातत्व, लोककला और भाषाई विरासत—को भूल जाते हैं, तो राष्ट्र की नींव कमजोर हो जाएगी।

कार्यशाला ने छत्तीसगढ़ की पुरातत्व और सांस्कृतिक पहचान को नया बल देते हुए समाज को अपने अतीत से जुडऩे की प्रेरणा दी।


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