सरगुजा

प्रभारी मंत्री चौधरी ने की सरगुजा में बकरियों में किए जा रहे कृत्रिम गर्भाधान की प्रशंसा
08-Jul-2024 10:35 PM
 प्रभारी मंत्री चौधरी ने की सरगुजा में बकरियों में किए जा रहे कृत्रिम गर्भाधान की प्रशंसा

अम्बिकापुर,8 जुलाई। बकरी पालन का कार्य सबसे गऱीब किसान करता है क्योंकि इसको पालना और खिलाना आसान होता है,खेती- किसानी के साथ बकरी पालन कर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोग लाभ कमा रहे हैं। शीघ्र ही सरगुजा जिले में अफ्रीकन  ‘ बोयर ’ नस्ल के बकरा-बकरी नजर आएंगे। स्थानीय बकरा -बकरी की तुलना में इनका वजन तीन से चार गुना अधिक होता है। अफ्ऱीकन बोयर नस्ल का बकरा का औसत वजन 100 किलो तथा बकरी का वजन 80 किलो तक होता है।

बकरी पालकों के हित मे कलेक्टर विलास भोसकर के निर्देश पर पशुपालन विभाग ने बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान के लिए 7800 सीमेन मंगाए गए हैं। इसमें जमुनापारी, सिरोही, बारबरीके साथ विदेशी नस्ल अफ्रीकन बोयर कासीमेन भी मंगाया गया है। पहली बार अफ्रीकन नस्ल के बकरा के सीमेन मंगाए हैं। कृत्रिम गर्भाधान की शुरुआत भी कर दी है।

सीमेन की उपलब्धता उत्तराखण्ड लाइव स्टाक डेवलपमेंट बोर्ड ऋषिकेश द्वारा सुनिश्चित किया गया है।इसके लिए पशु रोगी कल्याण समिति से कलेक्टर सरगुजा के द्वारा राशि स्वीकृत की गई है।

आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीणों के एटीएम का कार्य करने वाले बकरा-बकरी अब प्रशासनिक पहल से ज्यादा लाभ दे रहे हैं। स्थानीय नस्ल के बकरो का अधिकतम वजन 20 से 25 किलोग्राम होता है लेकिन कृत्रिम गर्भाधान से नस्ल सुधार में मिली सफलता के बाद इसके पहले तक 40 से 45 किलो तक के बकरा-बकरी की बिक्री कर ग्रामीण अपनी जरूरतों की पूर्ति कर रहे थे। लेकिन अब अफ्ऱीकन बोयर नस्ल के सीमेन के उपयोग से 80 से 100 किलो तक के बकरा-बकरी उनके पास उपलब्ध होंगे।500  रुपये प्रति किलो की दर से बिकने वाले बकरा के मांस के अनुपात में एक बकरा की बिक्री से  से 50 हजार तक की आय होगी।पशुपालन विभाग द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का जो प्रयास आरंभ किया गया था उसका सुखद परिणाम अब सामने आने लगा है।इस नवाचार के लिए जिला पशु रोगी कल्याण समिति से भी मदद मिल रही है। बकरी पालन का कार्य सबसे गरीब और छोटे किसानों द्वारा अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए किया जाता है। ये वे किसान होते हैं जो गाय और भैंस का पालन नहीं कर पाते है।

 

आर्थिक सशक्तिकरण के लिए ये सफल नवाचार है

 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान की शुरुआत नवाचार के रूप में सबसे पहले छत्तीसगढ़ राज्य के सूरजपुर और सरगुजा जिले में की गई थी। नस्ल सुधार के इस नवाचार को व्यापक सफलता मिलने के बाद सरगुजा जिले में बकरियों के कृत्रिम गर्भाधान की शुरुआत अब जिले के सभी ब्लाक में कर दी गई है। कृत्रिम गर्भाधान से सरगुजा में जमुनापारीसिरोही और बारबरीनस्ल के बकरा-बकरी प्राप्त हो रहे थे लेकिन अब अफ्रीकन नस्ल बोयर के बकरा-बकरी भी अतिरिक्त आय का जरिया बनेंगे।

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का सहारा

बकरा-बकऱी का पालन ग्रामीणों के लिए एटीएम के रूप में होता है।छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर किसान जिन्हें नकद रकम की जरूरत होती है वे आवश्यकता के अनुरूप इसकी बिक्री करते है।नकद राशि मिलने पर अपनी जरूरतें पूरी करते है।बकरा जितना अधिक वजन का होगा,दाम उतना अधिक मिलेगा इसलिए नस्ल सुधार को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्थानीय नस्ल के बकरा-बकरी का वजन ज्यादा नहीं होने के कारण ज्यादा लाभ नहीं मिल पाता था। नस्ल सुधार से अब ज्यादा आय अर्जित होगा।


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