राजपथ - जनपथ
...युवा आईएएस और मेंटोरशिप में ट्रेनिंग
डिपार्टमेंट ऑफ़ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) सीनियर और युवा आईएएस अधिकारियों के बीच मेंटरशिप और नॉलेज-शेयरिंग के लिए स्ट्रक्चर्ड ग्रुप ऑर्गनाइज करने का प्लान बनाया। वैसे अब तक इनके बीच तालमेल, संबंध आदि परीक्षावधि प्रशिक्षण (प्रोबेशन ट्रेनिंग) के समय में होते रहे हैं। मेंटेरोशिप के चलते युवा अफसरों को कुछ वर्षों तक वरिष्ठों के प्रशासनिक अनुभव का लाभ मिलता रहेगा। इसकी शुरुआत इसी वर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस 31 अक्टूबर से होने जा रही है। तब तक राज्यों में ऐसे मेंटोर और बडी नियुक्त किए जाएंगे।
दरअसल यह कांसेप्ट दिसंबर, 2025 में हुए चीफ सेक्रेटरी के नेशनल कॉन्फ्रेंस से निकला है। इसमें प्रधानमंत्री ने कहा था, आईएएस और दूसरी सर्विसेज़ के पहले बैच हर साल 31 अक्टूबर को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जाकर और उनके साथ एक दिन बिताकर युवा ग्रुप को मोटिवेट करें। डीओपीटी ने हाल ही में सभी राज्यों के चीफ सेक्रेटरी को लिखे एक लेटर में उनसे इस विजिट के लिए ऑफिसर नॉमिनेट करने को कहा। डीओपीटी ने इस साल एकता दिवस पर गुजरात के एकता नगर में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी में होने वाले पहले इंटरैक्शन के लिए ऐसे ऑफिसर नॉमिनेट करने को कहा।
डीओपीटी ने सुझाव दिया कि सीनियर या अनुभवी और साथ ही युवा आईएएस अधिकारियों को अलग-अलग बैच से चुना जा सकता है और उन्हें गवर्नेंस, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, पॉलिसी बनाने वगैरह के अलग-अलग डोमेन में एक्सपर्टीज हो। राज्य सरकारों से भी विजिट के लिए सभी जरूरी इंतजाम करने को कहा गया।
न्याय के उपहास पर छत्तीसगढ़ का दस्तावेज
मद्रास हाईकोर्ट ने बीते 3 जून को एक फैसला दिया। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2016 की राधापुरम् सीट से पराजित डीएमके उम्मीदवार एम अप्पावु ने चुनाव याचिका दायर की थी। उन्होंने एआईडीएमके प्रत्याशी आईएस इंबादुराई की जीत को चुनौती देते हुए कहा था कि जिन पोस्टल बैलेट्स के आधार पर 49 मतों से परिणाम प्रतिवादी के पक्ष में गया, उनकी सही गिनती नहीं हुई। अवैध मतपत्रों को भी प्रतिवादी के पक्ष में वैध बताते हुए गिन दिया गया और वादी के पक्ष में डाले गए मतों को गलत तरीके अवैध बताते हुए रद्द कर दिया गया। हाईकोर्ट ने पाया कि परिणाम गलत था। अप्पावु को दरअसल 103 वोटों से जीत मिलनी चाहिए थी। मगर, फैसला तब आया है जब इंबादुराई का कार्यकाल कई साल पहले 2021 में ही पूरा हो चुका है। अब, अप्पावु को फिर से विधायक बनाया तो नहीं जा सकता। हाईकोर्ट के हाथ में जो था, उसने किया। अदालत ने उन्हें पेंशन सहित पूर्व विधायक के तौर पर मिलने वाली सभी सुविधाओं को छोडऩे का आदेश दिया है। साथ ही इलेक्शन कमीशन को रिकॉर्ड सुधारने का निर्देश दिया है।
इस फैसले में दिलचस्प बात यह है कि जस्टिस जयचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट के रवैये पर आपत्ति दर्ज की है और हवाला दिया है- छत्तीसगढ़ के एक मामले- मो. अकबर विरुद्ध अशोक साहू पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी का।
सन् 2013 के छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में कवर्धा सीट से बीजेपी के अशोक साहू के विजयी होने के बाद कांग्रेस प्रत्याशी मो. अकबर ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में 20 जनवरी 2014 को एक चुनाव याचिका दायर की। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव जीतने के लिए तय सीमा से अधिक खर्च की गई, भ्रष्ट आचरण अपनाया गया। जब इस याचिका पर 15 महीने बाद भी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ट्रायल शुरू नहीं हुआ तो मो. अकबर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। उन्होंने कहा कि सुनवाई बार-बार स्थगित हो रही है। याचिका पर सुनवाई करते हुए 27 फरवरी 2015 को जस्टिस चेमलेश्वर की बेंच ने कहा कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पब्लिक एक्ट 1951 की धारा 86(7) के तहत हर चुनाव याचिका को जितना शीघ्र संभव हो, ट्रायल में लिया जाए और प्रयास किया जाए कि 6 महीने के भीतर मुकदमे का निपटारा कर दिया जाए। हालांकि बेंच ने याचिका के गुण-दोष पर विचार नहीं किया था, केवल मेरिट के आधार पर सुनवाई का निर्देश दिया था। इसका असर यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की लगातार सुनवाई हुई और 4 मई 2016 को जजमेंट आ गया। हालांकि, अकबर की याचिका खारिज हो गई और अशोक साहू की जीत कायम रही, पर फैसला तो आया। यह अलग किस्सा है कि सन् 2018 में मो. अकबर चुनाव जीते और मंत्री बने। फिर 2023 के चुनाव में हार गए।
मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जयचंद्रन ने अपने जजमेंट में इस बात का उल्लेख किया था कि प्रतिवादी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपने बचाव के लिए जो याचिका दायर की गई थी, वहां वह 6 साल तक लंबित रही। इस वजह से विधायक के तौर पर वह व्यक्ति पूरे कार्यकाल में काम करता रहा, जिसका निर्वाचन ही अवैध था। जजमेंट में कहा गया कि चुनावी विवाद में देरी- मॉकरी ऑफ जस्टिस बन जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल तक मामले को लटकाया, फिर मुख्य कानूनी सवाल पर कोई राय दिए बिना केस वापस हाईकोर्ट भेज दिया। जबकि मो. अकबर के मामले में उसने ही यथाशीघ्र मुकदमों की सुनवाई का निर्देश दिया था। जस्टिस जयचंद्रन ने कहा है सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही दिशानिर्देश का पालन नहीं किया। उन्होंने कहा है- कोर्ट अपनी ही टिप्पणियों को अनदेखा करता रहेगा तो उन तानाशाहीपूर्ण देशों की राह पर जा सकता है, जो हमारे साथ आजाद हुए थे। देरी से लोकतंत्र कमजोर होता है। वोटर्स की इच्छा का मजाक बनता है और सही प्रतिनिधि के बजाय गलत व्यक्ति को फायदा मिलता है।
मो. अकबर के मामले में स्पष्ट निर्देश के कारण फैसला तो सुप्रीम कोर्ट जाने की वजह से एक साल 3 माह के भीतर आ गया, मगर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में कई ऐसी चुनाव याचिकाएं लगी हैं, जिन पर फैसला आने में सालों लग गए। जैसे किरणमयी नायक ने रायपुर दक्षिण के विजयी प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ 2014 में याचिका दायर की थी। इसका फैसला 27 जुलाई 2017 को आया। 2008 के विधानसभा चुनाव में सरोज पांडेय के खिलाफ बृजमोहन सिंह ने याचिका दायर की थी। साडिय़ां और नगद वितरण का दावा करते हुए भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाते हुए। इस पर फैसला 2013 में तब आया जब सरोज पांडेय का कार्यकाल समाप्त होने वाला था। हालांकि दोनों ही मामलों में विधायकी बरकरार रही, परिणाम पर असर नहीं पड़ा। पर फैसले 4 से 5 साल के बाद आए। और कई मामलों में सुनवाई अभी जारी है।
भाजपा में युवा नेतृत्व को तरजीह
दस राज्यों की 22 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है। हालांकि छत्तीसगढ़ में इस बार राज्यसभा चुनाव नहीं हो रहे हैं। यहां राज्यसभा की दो सीटें वर्ष 2028 में रिक्त होंगी। इसके बावजूद संभावित उम्मीदवारों के नामों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा और उत्सुकता बनी हुई है।
कांग्रेस की सूची में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा का नाम भी शामिल है। 83 वर्षीय खरगे वर्तमान में संसद के सबसे वरिष्ठ सदस्यों में गिने जाते हैं। उनके कर्नाटक से एक बार फिर राज्यसभा में निर्विरोध चुने जाने की संभावना जताई जा रही है।
दूसरी तरफ,भाजपा द्वारा घोषित प्रत्याशियों में अधिकांश चेहरे अपेक्षाकृत नए हैं और उनकी आयु 45 से 65 वर्ष के बीच है। परंपरागत रूप से राज्यसभा को अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं के सदन के रूप में देखा जाता रहा है। कांग्रेस की सूची में यह प्रवृत्ति अब भी दिखाई देती है, लेकिन भाजपा में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका धीरे-धीरे सीमित होती नजर आ रही है।
भाजपा ने मध्यप्रदेश से रजनीश अग्रवाल तथा गुजरात से मानसिंह परमार, मुकेश राठौर और जितेंद्र कंजारिया जैसे अपेक्षाकृत युवा नेताओं को उम्मीदवार बनाया है। जबकि इन राज्यों में कई वरिष्ठ नेता भी राज्यसभा में जाने के लिए प्रयासरत रहे हैं।
इन नियुक्तियों से संकेत मिलते हैं कि भाजपा भविष्य में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी टिकट वितरण के दौरान उम्र और नेतृत्व की नई पीढ़ी को प्राथमिकता दे सकती है। ऐसे में सीनियर नेताओं की भूमिका धीरे-धीरे मार्गदर्शक मंडल जैसी जिम्मेदारियों तक सीमित होती दिखाई दे रही है।


