राजपथ - जनपथ
दिग्गजों के दिल्ली से हलचल
प्रदेश भाजपा के अंदरखाने में हलचल है। बताते हैं कि हाईकमान के प्रदेश अध्यक्ष किरण देव, क्षेत्रीय महामंत्री अजय जम्वाल और महामंत्री (संगठन) पवन साय दिल्ली गए हैं।
तीनों नेताओं की राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष और राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री शिवप्रकाश से चर्चा की खबर है।
दरअसल, भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन होना है। ऐसे में प्रदेश के तीनों नेताओं की हाईकमान से चर्चा के मायने तलाशे जा रहे हैं। प्रदेश संगठन में तमाम नियुक्तियां हो चुकी हैं।
अब निगम-मंडलों में कुछ और नियुक्तियां होनी हैं, लेकिन इसकी ज्यादा चर्चा नहीं है। अलबत्ता, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए उपयुक्त नामों पर चर्चा की खबर है।
एक खबर यह है कि प्रदेश से राष्ट्रीय महामंत्री अथवा कोषाध्यक्ष पद के लिए उपयुक्त नामों पर चर्चा हो सकती है। राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राजेश अग्रवाल उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। वे पिछले छह साल से पार्टी का कोष संभाल रहे हैं। अब उनके काफी सीनियर होने की वजह से नए कोषाध्यक्ष की तलाश किए जाने की चर्चा है। छत्तीसगढ़ में कोष प्रबंधन से जुड़े नेताओं पर हाईकमान की नजर है। देखना है कि हाईकमान प्रदेश के नेताओं को क्या जिम्मेदारी सौंपता है।
नक्सली आजाद, सहयोगी जेल में

जब नक्सलवाद के खिलाफ सरकार ने सफलता हासिल कर ली है, तब इसके कई परोक्ष प्रभावों पर नीतिगत फैसला जल्दी लेने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ में जिन नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, वे खुली हवा में सांस ले रहे हैं, पुनर्वास पैकेज और योजनाओं का लाभ उठाने लगे हैं, पर हजारों की संख्या में वे लोग जेलों में बंद हैं, जिन पर इनका सहयोग करने का आरोप है।
बस्तर संभाग की जेलों में बंद बड़ी संख्या उन आदिवासियों की है जिन पर नक्सलियों की मदद करने, उन्हें भोजन देने, रास्ता बताने या अन्य किसी तरीके के सहयोग का आरोप है। दूसरी ओर, नक्सलियों के कई समूह, संगठन छोडक़र मुख्यधारा में लौट चुके हैं। उन्हें पुनर्वास योजनाओं का लाभ मिल रहा है, आर्थिक सहायता दी जा रही है, कौशल प्रशिक्षण और समाज में फिर से जगह बनाने के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि यदि हथियार उठाने वाले लोगों को मौका मिल सकता है, तो केवल सहयोग के आरोप में जेलों में बंद आदिवासियों के लिए ऐसा क्यों नहीं सोचा जा रहा है?
राज्य की जेलों में 16 हजार से अधिक आदिवासी बंद हैं, जिनमें पांच हजार से ज्यादा पर नक्सलवाद से जुड़े होने के आरोप हैं। ज्यादातर मामलों में आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं और विचाराधीन कैदी बने हुए हैं। कई मामले 10-10 साल से लंबित हैं।
पूर्ववर्ती सरकार ने सन् 2019 में न्यायमूर्ति ए. के. पटनायक की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर सैकड़ों मामलों को वापस लिया गया और एक हजार से अधिक आदिवासियों को राहत मिली। गंभीर अपराधों, जैसे हत्या और हत्या के प्रयास, के मामलों को अलग रखा गया, जबकि अपेक्षाकृत मामूली आरोपों वाले मामलों में छोड़ दिया गया, हालांकि वह पहल भी पर्याप्त नहीं थी, लेकिन इससे इच्छाशक्ति तो साबित हुई ही थी। उसके बाद से अब तक कोई व्यापक समीक्षा अभियान दिखाई नहीं दे रहा है। नक्सलवाद से बस्तर को मुक्त करने के लिए निर्णायक लड़ाई शुरू की गई तब भी इस पहलू की तरफ ध्यान किसी ने नहीं दिया।
जेलों में बंद ज्यादातर आदिवासी आर्थिक संसाधनों की कमी, कानूनी सहायता के अभाव, जमानत के लिए जरूरी शर्तें पूरी न कर पाने की समस्या से घिरे हैं। लंबे समय से जेलों में बंद होने के कारण उनके परिवारों को गरीबी, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव को बस महसूस ही किया जा सकता है। अब जब नक्सलवाद खत्म हो चुका है, सरकार चाहे तो मामलों की समीक्षा कर सकती है और मामलों मुकदमों की स्थिति का परीक्षण कर उन्हें वापस लेने की अदालतों से सिफारिश भी कर सकती है। बस्तर में न्याय, विकास और विश्वास बहाली के लिए प्रशासन नए सिरे से जुट गया है। बहुत से कार्य तेजी से चल रहे हैं, जो आज तक नक्सलियों की खौफ के चलते नहीं हो पाए। ऐसे में सवाल बना हुआ है कि क्या न्याय का तराजू संतुलित है?
अब ट्रेनें लेट लतीफ नहीं कहलाएंगी...

जल्द ही रेलवे वीआईपी कहे जाने वाली मेल, राजधानी, वंदे भारत जैसी ट्रेनों को लाइन क्लीयर देने सामान्य यात्री ट्रेनों को रोकना बंद करेगा।इन प्रीमियम ट्रेनों को समूह में एक के पीछे एक चलाने टाइम टेबल में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। इसे कंबाइंड स्लॉट आपरेशन कहा जा रहा है।
रायपुर रेल मंडल के लोको पायलट्स ने बताया इसके लिए टाइम स्लॉट पर मंथन जारी है। ऐसा देश भर में बढ़ती तीसरी रेल लाइन के आपरेशन और नान इंटरलाकिंग सिग्नलिंग की वजह से संभव हो पा रहा है।अभी ऐसी वीआईपी ट्रेनों को रास्ता देने सामान्य ट्रेनों को लूप लाइन या बीच के किसी स्टेशन पर रोक दिया जाता है। इससे आम पैसेंजर ट्रेन तय समय पर गंतव्य पर नहीं पहुंच पातीं। इन ट्रेनों के यात्रियों को भी राइट टाइम पहुंच देने की योजना बनाई जा रही है।
नई व्यवस्था के तहत दोनों श्रेणियों की ट्रेनों का समय ऐसे व्यवस्थित किया जाएगा कि वे एक-दूसरे के रास्ते में बाधा न बनें। दोनों को निर्धारित समयांतर पर चलाया जाएगा।
रेलवे की समय सारिणी में अभी वंदे भारत, राजधानी, शताब्दी जैसी ट्रेनों को प्राथमिकता में है । रेल बोर्ड के नए प्रस्ताव के मुताबिक ऐसी प्रीमियम ट्रेनों को समूह कंबाइंड स्लॉट में चलाया जाएगा। इससे वीआईपी ट्रेन निर्बाध दौड़ेंगी, जबकि आम पैसेंजर , लोकल शटल ट्रेन के लेट होने का समय भी घटकर 10 मिनट तक किया जा रहा है।
130-160 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार वाली वंदेभारत , राजधानी जैसी इन प्रीमियम ट्रेनों को पांच से 10 मिनट के अंतराल (सेफ्टी गैप) पर चलाया जाएगा। 110 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति वाली ट्रेनों को दूसरे स्लॉट में चलाया जाएगा। समान गति पर यह ट्रेन पूरे रास्ते आगे-पीछे चलेंगी। इससे किसी ट्रेन को लूप लाइन पर खड़ा नहीं होना पड़ेगा। नागपुर-हावड़ा मार्ग पर
अभी रोजाना औसतन 110- 120 से अधिक ट्रेनें चलती हैं। इससे पैसेंजर ट्रेन अमूमन 15-20 मिनट लेट चलती है जबकि लंबी दूरी की ट्रेनें 45 मिनट से 1 घंटे देर से। अब आने वाले दिनों में लेट लतीफ नहीं कहा जा सकेगा।


