राजपथ - जनपथ
काश! अपनी बाड़ी से डीजल उगा लेते
आज जब ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच तनाव ने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी हैं, तब छत्तीसगढ़ में एक वक्त का पुराना नारा याद आता है- डीजल नहीं अब खाड़ी से, मिलेगा अपनी बाड़ी से। यह नारा कभी उम्मीदों का एक बड़ा गुब्बारा था। किसान मालामाल होने वाले थे मगर, ऐसा गुब्बारा निकला जो उडऩे से पहले ही फुस्स हो गया।
योजना क्या थी? छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाई गई। 2005 में तब के 16 जिलों में 16 करोड़ रतनजोत के पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया। 1.65 लाख हेक्टेयर बंजर और वेस्टलैंड पर खेती का लक्ष्य था। 2015 तक राज्य को बायोडीजल में आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा गया। 2010 के बाद हर साल 40 अरब रुपये की कमाई बीज बेचकर होने वाली थी। राज्य के सरकारी वाहनों को 2007 तक रतनजोत डीजल पर चलाने का ऐलान किया गया था। भारतीय ऑयल के साथ क्रेडा बायोफ्यूल्स कंपनी बनाई गई। बंजर जमीन, वन विभाग की भूमि और यहां तक कि किसानों की खेती वाली जमीन पर भी पौधे लगाए गए। मनरेगा और बीज विकास निगम के जरिए लाखों पौधे मुफ्त बांटे गए। 7 नवंबर 2006 को सुंदरखेड़ा गांव में तब के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने खुद रतनजोत का पौधा लगाया।
प्रचार चरम पर था। राज्य सरकार ने अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 350 करोड़ रुपये लगाए। केंद्र सरकार ने 2013 में ही नर्सरी के लिए 13.5 करोड़ रुपये दिए। 2005 में तो केंद्र से 15,000 करोड़ रुपये का निवेश मांगा गया था। हालांकि वह राशि मिली नहीं। तब की रमन सिंह सरकार ने बड़े उत्साह के साथ रतनजोत की खेती को बढ़ावा दिया था, सीएम ने अपनी सरकारी गाड़ी इसी डीजल से चलाकर दिखाई।
दावा किया गया था कि इससे बायोडीजल बनेगा और छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर हो जाएगा। गांव-गांव में पौधे लगे थे, लेकिन न डीजल निकला, न किसानों को फायदा मिला। रतनजोत के पौधे आज भी कई जगह सूखे खड़े मिल जाएंगे, किसी अधूरे वादे की याद दिलाते हुए।
मंत्रिमंडल की चर्चा!!
पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच सत्ता और संगठन—दोनों ही स्तर पर हलचल तेज हो गई है। चार मई को नतीजे आने के बाद कई राज्यों में सरकारों के भीतर बड़े फेरबदल की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। संकेत साफ हैं कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और ओडिशा में भी कैबिनेट में बदलाव संभव है।
छत्तीसगढ़ की बात करें तो भाजपा सरकार करीब ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से मिड-टर्म रिव्यू की स्थिति बन रही है। पार्टी पहले भी गुजरात मॉडल पर बड़े प्रयोग कर चुकी है, जहां आधे कार्यकाल में पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया गया था। इसी फार्मूले की झलक लोकसभा चुनाव में भी दिखी थी, जब अधिकांश मौजूदा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों पर दांव खेला गया और नतीजे पार्टी के पक्ष में आए।
प्रदेश में भी इसी तरह के प्रयोग को लेकर अटकलें तेज हैं। अंदरखाने की खबर है कि मंत्रियों के प्रदर्शन का आकलन लगातार किया जा रहा है। संगठन और वैचारिक स्तर पर भी समीक्षाएं जारी हैं, और प्रमुख नेताओं के साथ लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। कुछ मंत्रियों का प्रदर्शन औसत माना जा रहा है, जिससे बदलाव की संभावना को और बल मिल रहा है।
इसी बीच एक और चर्चा यह है कि अनुभवी विधायकों को फिर से कैबिनेट में मौका दिया जा सकता है। इनमें अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, लता उसेंडी, विक्रम उसेंडी और पुन्नूलाल मोहिले जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक भी संभावित दावेदारों में गिने जा रहे हैं।
हालांकि समीकरण सिर्फ मंत्रिमंडल तक सीमित नहीं हैं। यह लगभग तय माना जा रहा है कि किसी वरिष्ठ विधायक को विधानसभा उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन दिलचस्प यह है कि जो नेता पहले मंत्री रह चुके हैं, वे इस पद को लेकर खास उत्साहित नजर नहीं आ रहे।
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, अटकलबाजियों का दौर जारी है। लेकिन इतना तय है कि जैसे ही चुनावी प्रक्रिया खत्म होगी, सत्ता के गलियारों में हलचल और तेज होगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पार्टी क्या वाकई गुजरात फार्मूला अपनाती है या फिर कोई नया राजनीतिक समीकरण सामने आता है।

ड्रग्स, और कारोबारी
प्रदेश में गैरकानूनी तरीके से अफीम की खेती के खुलासे के बाद अब प्रशासन पूरी तरह एक्शन मोड में नजर आ रहा है। पुलिस मुख्यालय से सख्त निर्देश जारी किए गए हैं और नशे के कारोबार के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू हो गई है। खासकर सीमावर्ती जिलों में ड्रोन के जरिए संदिग्ध फसलों की निगरानी की जा रही है, जिससे अवैध खेती पर सीधा वार किया जा सके।
सूत्र बताते हैं कि इस अभियान की जद में अब प्रभावशाली लोग भी आने लगे हैं। रायपुर के दो प्रतिष्ठित ड्रग कारोबारी भी जांच के दायरे में आ गए हैं। हालांकि ये सीधे तौर पर अफीम या अन्य मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े नहीं थे, लेकिन प्रतिबंधित दवाइयों की थोक सप्लाई के जरिए नशे के नेटवर्क को मजबूती दे रहे थे।
बताया जाता है कि इन कारोबारियों के रसूख के चलते कार्रवाई रोकने के लिए ऊंचे स्तर से सिफारिशें भी आईं, लेकिन पुलिस ने इस बार सख्ती दिखाते हुए किसी दबाव को तवज्जो नहीं दी। स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि नशे के कारोबार में लिप्त लोगों को बचाने के लिए आने वाले किसी भी फोन या सिफारिश को नजरअंदाज किया जाए।
पुलिस मुख्यालय से सभी रेंज को यह संदेश साफ तौर पर दिया गया है नशे के खिलाफ इस अभियान में किसी तरह की ढिलाई या हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।


