राजपथ - जनपथ
स्वीपर प्रसव कराए तो और क्या होगा?
सरगुजा जिले के लखनपुर विकासखंड में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) कुन्नी की घटना ने फिर से प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को उजागर कर दिया। 16 फरवरी को एक गर्भवती महिला गौरी यादव को प्रसव पीड़ा होने पर अस्पताल लाया गया, तो वहां डॉक्टर और स्टाफ नर्स मौजूद ही नहीं थे। नतीजतन, वहां मौजूद स्वीपर ने डिलीवरी कराने की कोशिश की और नवजात की मौत हो गई। बच्चे की स्थिति 'ब्रिज प्रेजेंटेशन' थी। यह एक जटिल मामला था, मगर सामान्य हालात में भी किसी स्वीपर से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह डॉक्टर-नर्स के काम को संभाल लेगा। दोषियों को सख्त सजा देने के आश्वासन के साथ सीएमएचओ ने मामले की जांच बैठाने का ऐलान किया है। मगर, यह किसी एक परिवार की पीड़ा नहीं है। आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में सरकारी अस्पतालों की दशा दयनीय है। स्टाफ की कमी, उपकरणों का अभाव और प्रशिक्षण की कमी जैसी समस्याएं आम हैं। सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल जिलों में डॉक्टरों के गायब रहने से भगवान भरोसे वाली व्यवस्था चल रही है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में मातृ और शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों, सीएचसी और पीएचसी में केवल 30-40 प्रतिशत पद भरे हुए हैं। रात की ड्यूटी पर अक्सर कोई नहीं होता। इस घटना में भी अस्पताल में सिर्फ तीन स्टाफ नर्स थीं, जिनमें से अधिकांश छुट्टी पर थीं। ऐसे में स्वीपर को प्रसव जैसा संवेदनशील काम करना पड़ा।
छत्तीसगढ़ ने अपनी स्थापना की 25 सालों में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं, जो व्यवस्था की जड़ों में सड़ांध को दर्शाते हैं। 2014 में बिलासपुर जिले के तखतपुर में आयोजित नसबंदी कैंप में 83 महिलाओं की सर्जरी औसत 2 से 3 मिनट के भीतर कर दी गई। इस कैंप में 11 महिलाओं की मौत हो गई थी, जबकि दर्जनों गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। जांच में पता चला कि एक ही डॉक्टर ने एक बंद अस्पताल भवन के अस्वच्छ वातावरण में दर्जनों ऑपरेशन किए और दवाइयों में जहर था। घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा मचाया, लेकिन सुधार के नाम पर सिर्फ कुछ अधिकारियों को निलंबित या बर्खास्त किया गया। इसी तरह 2021 में अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज में चार नवजातों की मौत हुई। यहां ऑक्सीजन की कमी और स्टाफ की लापरवाही सामने आई थी। अक्टूबर 2024 में दंतेवाड़ा के सरकारी अस्पताल में मोतियाबिंद सर्जरी के बाद 13 मरीजों को आंखों में संक्रमण हो गया।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी कई बार स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर चिंता जताई है। 2025 में कोर्ट ने रायपुर के एम्स और अन्य सरकारी अस्पतालों की खराब स्थिति पर स्वत: संज्ञान लिया, जहां रीएजेंट और मेडिकल किट की कमी जैसी समस्याएं उजागर हुईं।
समस्या पूरे सिस्टम की है। विशेषज्ञों और तकनीशियनों की भर्तियों को टालकर केवल भवन बनाने और उपकरण की खरीदी में रुचि लेना, ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ डॉक्टरों की गैरहाजिरी ऐसी समस्याएं हैं जिस पर कोई भी स्वास्थ्य मंत्री या विभागीय सचिव गहरी रूचि लेकर समाधान का इरादा नहीं दिखाते। नतीजतन, गरीब और ग्रामीण आबादी सबसे ज्यादा प्रभावित है।
लखनपुर के मामले में स्वीपर ने नेक नीयत से ही प्रसव की जिम्मेदारी ली होगी, पर उसकी अपनी क्षमता है। डॉक्टर-नर्स क्यों मौजूद नहीं थे इस पर सवाल है। जिस मां ने अपने नवजात को खोया है, क्या उसे कोई मुआवजा मिलेगा?
लोकसभा की तर्ज पर आसंदी

जैसा कि हमने इसी कालम में पिछले दिनों बताया था उसी अनुरूप नई विधानसभा के सदन में आसंदी की व्यवस्था में बदलाव किया गया है। इसे लोकसभा, राज्यसभा की तर्ज पर नया रूप दिया गया है। पहला यह कि अध्यक्ष की आसंदी की ऊंचाई कम की गई है। दूसरी यह कि आसंदी के दोनों तरफ यानी दाएं बाएं सिरे से वहां पहुंचा जा सकेगा। वैसे दोनों ओर से एंट्री एग्जिट का उपयोग, नए चुनाव उपरांत सदस्यता की शपथ के बाद अध्यक्ष के अभिवादन के दौरान किया जाता है। इससे पुरानी विधानसभा में 25 वर्ष और इस नए भवन में भी पिछले शीत सत्र तक एक ही तरफ की व्यवस्था थी। शीत सत्र के बाद सचिवालय ने सदन के भीतर की बनावट में कुछ बदलाव किया है। जो इसे लोकसभा की आसंदी का लुक दे रहा है।
52 एकड़ में 350 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बना नया विधानसभा भवन की खामियों दिक्कतों को शीत सत्र के दौरान सचिवालय ने नोट किया था। कुछ सुधार ली गई हैं और शेष को। मानसून सत्र तक दूर किया जाएगा।
प्रमुख खामियों में सदन में अध्यक्ष और सचिव की आसंदी को शेष सदस्यों से काफी दूर रखा जाना शामिल है। इसे पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने भी सदन में चर्चा के दौरान इंगित किया था। उन्होंने आसंदी की ऊंचाई कम करने कहा था ताकि अध्यक्ष सदन में प्रवेश करते नजर आएं।


