राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : दूबर बर दू असाढ़ - जी राम जी
17-Dec-2025 6:06 PM
राजपथ-जनपथ : दूबर बर दू असाढ़ - जी राम जी

दूबर बर दू असाढ़ - जी राम जी

मनरेगा में केंद्र सरकार अकुशल मजदूरी का सौ प्रतिशत और सामग्री लागत का 75 प्रतिशत वहन करती थी। व्यवहार में केंद्र और राज्य का अनुपात लगभग 90:10 रहता था। यानी छत्तीसगढ़ जैसे सामान्य राज्य को कुल खर्च का करीब 10 प्रतिशत ही देना पड़ता था।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में मनरेगा के तहत छत्तीसगढ़ को केंद्र से 2295.02 करोड़ रुपये मिले हैं। पुराने पैटर्न के हिसाब से राज्य का हिस्सा करीब 255 करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। विकसित भारत- जी राम जी बिल 2025 में केंद्र-राज्य हिस्सेदारी को बदलकर 60:40 करने का प्रस्ताव है। उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को छोडक़र छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों पर यह नियम लागू होगा। यानी अब राज्य सरकार को कुल खर्च का 40 प्रतिशत देना होगा।

कुल व्यय को कुछ कम कर देते हैं, क्योंकि 100 फीसदी राशि तो इस योजना की आज तक खर्च नहीं हुई। मान लें कि छत्तीसगढ़ ने चालू आवंटन के अनुसार करीब 2550 करोड़ रुपये केंद्र से हासिल किया। तो पुराने पैटर्न में राज्य का हिस्सा 255 करोड़ रुपये का होगा। लेकिन अब नए पैटर्न में राज्य का हिस्सा 1020 करोड़ रुपये हो जाएगा। इस हिसाब से छत्तीसगढ़ पर करीब 765 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।

इधर, छत्तीसगढ़ सरकार इस समय जबरदस्त वित्तीय दबाव में है। राज्य का राजस्व बढ़ाने के लिए एक के बाद एक ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं, जिनका सीधा असर आम जनता पर पड़ा है। बिजली दरों में 10 से 20 पैसे प्रति यूनिट की बढ़ोतरी की गई और रियायत सीमित की गई।  इसी तरह जमीन रजिस्ट्री के लिए कलेक्टर गाइडलाइन रेट्स में कई जगहों पर 100 से 900 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी गई। विरोध के चलते बिजली रियायत में संशोधन करना पड़ा, जमीन रजिस्ट्री की नई गाइडलाइन को वापस लेना पड़ा। इसके चलते राजस्व बढ़ाने के ये दोनों उपाय काम नहीं आए।

वैसे महतारी वंदन योजना में खर्च कुछ कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। लाभार्थी के लिए ई केवाई सी सत्यापन अनिवार्य किया गया है। लोकसभा चुनाव के पहले इस पर कोई बात थी, जिसने आवेदन किया- सबको मिला। इधर, धान खरीदी में टोकन का भारी टोटा है। मामला किसान के जहर पीने तक चला गया है। खरीदी की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले कम है। सरकार कम धान खरीदना चाहती है ताकि भुगतान कम करना पड़े। यह विपक्ष का सदन में लगाया गया आरोप है ।

युवाओं की नाराजगी थामने की कोशिश करते हुए भी सरकार दिखती है। बीते दिनों दो साल की उपलब्धियों को गिनाते हुए वही वायदा दोहराया गया है जो 2023 के विधानसभा चुनाव में किया गया था। तब हजारों सरकारी खाली पदों पर भर्ती की गारंटी थी। हर साल करीब एक लाख लोगों के लिए। मगर, आज 16 लाख से अधिक बेरोजगार केवल रोजगार कार्यालय की फाइलों में दर्ज हैं। जिन्होंने पंजीयन नहीं कराया, उनकी संख्या अलग जोड़ लें।

भीड़ कैसे जाएगी उस दूसरी दुनिया

विधानसभा के नए भवन में शीतकालीन सत्र आज खत्म हो जाएगा। 4 दिन का यह सत्र, पंडरी से लेकर जीरो प्वाइंट तक के तीन लाख लोगों के लिए मानो-अच्छा सत्र हुआ था क्या? जैसी स्थिति में निपट गया। वर्ना 9-10 किमी का यह पूरा इलाका 25 नहीं तो 20 वर्ष से हर सत्र में विधानसभा घेराव के राजनीति प्रदर्शनों से हलाकान रहता था। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, छुट्टी देनी पड़ती थी। मोवा के मेडिकल हब में मरीज, परिजन अस्पताल नहीं पहुंच पाते। फ्लाइट, बस-ट्रेन पकडऩे वालों को घंटों पहले घर छोडऩा पड़ता रहा। रोजी मजदूर, ठेला कारोबारियों को एक दिन के लिए धंधा बंद करना पड़ता। इन सबसे अलग पुलिस प्रशासन की अपनी अलग परेशानी रहती थी। अब इन सबसे मुक्ति ही मिल गई शहर के इस हिस्से को। अब यह सब कुछ 30 किमी दूर नवा रायपुर में होगा। वहां ऐसे प्रदर्शन के लिए दलों की एक नई समस्या होगी। वह है-भीड़ जुटाने की। यहां पंडरी मंडी गेट के पास तो भीड़ पहुंच जाती रही लेकिन वहां के लिए भीड़ जुटाने के साथ लाने ले जाने का भी इंतजाम करना होगा जो महंगा पड़ेगा। क्योंकि भीड़ एक हाथ ले दूजे से ले वाली हो गई है। ऐसे ही हर सत्र में विधानसभा घेराव अब संभव नहीं। साल में एक प्रदर्शन हो जाए तो बहुत है। संभव हो नए शहर को मुक्ति मिले।


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