राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : जांच से पहले ट्रायल की बाढ़
24-Oct-2025 6:17 PM
राजपथ-जनपथ : जांच से पहले ट्रायल की बाढ़

जांच से पहले ट्रायल की बाढ़

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी पर यौन उत्पीडऩ का आरोप कल शाम से ही सोशल मीडिया ट्रायल का विषय बन गया है। पुलिस मुख्यालय ने जांच का आदेश जारी कर दिया है, पर इससे पहले ही एक्स (पूर्व ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है। लोग अपने-अपने नजरिए से इस पूरे घटनाक्रम की व्याख्या कर रहे हैं।

एक सब इंस्पेक्टर की पत्नी, योग प्रशिक्षिका ने आईपीएस रतनलाल डांगी पर मानसिक और शारीरिक उत्पीडऩ के आरोप लगाए हैं। शिकायत के साथ उन्होंने कई डिजिटल सबूत भी डीजीपी को सौंपे। दूसरी ओर, डांगी ने एक दिन पहले ही उसी महिला के खिलाफ ब्लैकमेलिंग की एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। सरकार ने रुख साफ किया है कि दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन जांच से पहले ही ऐसे पोस्ट आ रहे हैं, जिनमें सवालों के बौछार हो रहे हैं।

इनमें रायपुर से लेकर दिल्ली से लेकर पत्रकार और वकील शामिल हैं। भाजपा से जुड़े एडवोकेट नरेश चंद्र गुप्ता ने एक्स पर जांच अधिकारी पर ही सवाल उठाया है। उन्होंने लिखा है क्या यह न्याय का उपहास नहीं है कि जिस अधिकारी (आनंद छाबड़ा) पर खुद सीबीआई जांच चल रही है, जो भाजपा को खैरागढ़ में हराने में लगे हुए थे- उन्हें इस मामले की जांच का जिम्मा दिया गया है? भगवान छत्तीसगढ़ पुलिस की रक्षा करे।

इधर, दिल्ली के पत्रकार कन्हैया शुक्ला ने अपनी पोस्ट में लिखा कि डांगी कई सालों से महिला का उत्पीडऩ कर रहे थे, और अब खुद को ब्लैकमेलिंग का शिकार बताकर जांच को भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया है कि जब पीडि़ता ने सबूतों के साथ शिकायत की है तो अभी तक एफआईआर क्यों नहीं हुई? क्या पुलिस महकमे के बड़े अधिकारियों का दबाव है कि यह मामला दबा दिया जाए?  कन्हैया शुक्ला ने जानना चाहा है कि आखिर किस दबाव में डांगी महिला की बात मानते हुए चल रहे थे? उनकी लंबी पोस्ट कई बार शेयर हो चुकी है। कई यूज़र्स ने लिखा कि जब आरोपी खुद पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी हो तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? दूसरी ओर डांगी के पक्ष में भी कई पोस्ट हैं। इनमें दावा किया गया है कि डांगी डीफफेक वीडियो के शिकार हुए हैं।

फिलहाल, पीडि़ता की शिकायत और डांगी की सफाई, दोनों पुलिस मुख्यालय में दर्ज हैं। विभाग ने जांच अधिकारियों की नियुक्ति कर दी है। डांगी से पहले भी कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ यौन उत्पीडऩ के आरोप लग चुके हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस की साख पर एक बार फिर दांव पर है।

अपने-अपने इलाके के राजा?

कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के चलते एक तरह से प्रदेश के प्रमुख नेता पूर्व सीएम भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का लिटमस टेस्ट होने जा रहा है। पिछले कई दिनों से एआईसीसी के पर्यवेक्षकों ने ब्लॉकों में जाकर जिलाध्यक्ष के लिए नामों पर रायशुमारी की थी, और फिर छह नाम का पैनल तैयार कर हाईकमान को सौंप दिया।

प्रदेश के सभी प्रमुख नेता, जिलों में अपनी पसंद का अध्यक्ष बनवाने के लिए प्रयासरत हैं। गुरुवार को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल ने चारों नेता भूपेश बघेल, सिंहदेव, डॉ. महंत व बैज से बारी-बारी से चर्चा की, और पर्यवेक्षकों के पैनल पर राय ली। चारों ने हरेक जिले में अध्यक्ष के लिए अपनी पसंद बता दी है।

बताते हैं कि सबसे पहले वेणुगोपाल ने सिंहदेव को आमंत्रित किया, और फिर उनसे राय ली। इसके बाद भूपेश बघेल के सुझाव लिए गए। इसी बीच बैठक स्थगित हो गई। वेणुगोपाल को बिहार चुनाव से जुड़े एक अन्य बैठक में शामिल होने जाना था। बाद में करीब दो घंटे के ब्रेक के बाद डॉ. महंत, और दीपक बैज को बुलाया गया, और उनसे सुझाव लिए गए।

वेणुगोपाल ने पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू को भी बुलवाया है। साहू शुक्रवार की रात दिल्ली पहुंचे। चर्चा है कि साहू की दिलचस्पी दुर्ग, और बेमेतरा जिले को लेकर ज्यादा है। वो महासमुंद, धमतरी, और गरियाबंद जिलाध्यक्ष को लेकर सुझाव दे सकते हैं। क्योंकि उन्होंने महासमुंद लोकसभा का चुनाव लड़ा था।

पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि कुछ अध्यक्षों को लेकर दिग्गज नेता अड़ सकते हैं। मसलन, बेमेतरा, दुर्ग ग्रामीण, राजनांदगांव शहर-ग्रामीण, और कवर्धा जिलाध्यक्ष के लिए पूर्व सीएम भूपेश बघेल की अपनी पसंद जगजाहिर है। इसी तरह सरगुजा संभाग के  जिलाध्यक्षों के लिए सिंहदेव ने उपयुक्त नाम सुझा दिए हैं। डॉ. महंत का बिलासपुर, कोरबा, और जांजगीर-चांपा की विशेष दिलचस्पी है। बैज की कोशिश है कि कम से कम बस्तर संभाग के जिलों में उनकी पसंद का अध्यक्ष बन जाए। मगर यहां के पर्यवेक्षक सप्तगिरि उलका उन्हें महत्व देते नहीं दिखे हैं।

सप्तगिरि उलका, ओडिशा के सांसद हैं, और छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी सचिव रह चुके हैं। वो बस्तर की बारीकियों से अवगत हैं। इससे बैज थोड़े असहज हैं। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के लिए परीक्षा की घड़ी है कि वो अपनी पसंद पर हाईकमान की मुहर लगवा पाते हैं या नहीं।

बिहार में अफसरान का तनाव

बिहार चुनाव में प्रदेश के 11 आईएएस, और 2 आईपीएस अफसरों को भारत निर्वाचन आयोग ने पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। चर्चा है कि ज्यादातर अफसर किसी तरह बिहार जाने से बचना चाह रहे थे, और उन्होंने इसके लिए अलग-अलग स्तरों से प्रयास भी किया। मगर सिर्फ दो ही अफसर पुष्पेंद्र मीणा, और डॉ. सारांश मित्तर को राहत मिल सकी है, और उन्हें चुनाव ड्यूटी से मुक्त कर दिया गया।

पुष्पेंद्र मीणा, और डॉ. सारांश मित्तर के लिए विभाग ने भी निर्वाचन आयोग को लिखा था। बाकी अफसरों की अलग-अलग जिलों में तैनाती हो गई है। चुनाव की वजह से ये सभी अफसर दिवाली पर भी घर नहीं आ पाए। अब सीधे 15 नवंबर को चुनाव निपटने के बाद ही वापसी हो पाएगी। एक अफसर ने इस संवाददाता से चर्चा में कहा कि हिमाचल या दक्षिण के राज्यों में ड्यूटी होती, तो चुनाव ड्यूटी किसी पिकनिक की तरह होता, लेकिन बिहार संवेदनशील राज्य है, और यहां हर तरह का जोखिम रहता है।

मासूमियत और संघर्ष की छवि

नदी किनारे की ढलान में बच्चे खेलते हुए ऊपर चढ़ रहे हैं, फिर नीचे फिसल रहे हैं। मिट्टी से सने नंगे बदन मगर चेहरे पर चमकती मुस्कान यह बताती हैं कि खुशी साधनों से नहीं, बल्कि सादगी से भी पैदा हो जाती हैं। बस्तर की यह छवि अंकुर तिवारी ने फेसबुक पर साझा किया है।


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