राजनांदगांव
मजदूर दिवस पर विशेष
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 1 मई। समाज के बीच की एक मुख्य कड़ी माने जाने वाले श्रमिक वर्ग की हालत और भविष्य सालों से अंधेरे में नजर आ रही है। सामाजिक तानाबाना में सबसे पीछे पंक्ति पर खड़ा यह वर्ग बढ़ती आर्थिक खाई के चपेेट में आ गया है।
01 मई यानी मजदूर दिवस की खासियत से अनजान यह वर्ग नियति का लिखा मानकर फावड़ा-गैती के साथ ईंट और पत्थर ढ़ो रहा है। मौसम की मार की परवाह छोडक़र श्रमिक वर्ग साल-दर-साल आर्थिक मोर्चे में पिछड़ता दिख रहा है। मजदूरों को सबसे ज्यादा शोषित वर्ग माना जाता है इसके बाद भी सरकारी नीतियां इस वर्ग की तरक्की और उत्थान को लेकर असरकारक नहीं रही। यही वजह है कि आज भी इस वर्ग के जीवन स्तर में बड़ा परिवर्तन नहीं आया। ‘छत्तीसगढ़’ ने मजदूर दिवस के खास मौके पर कुछ श्रमिकों से उनकी निजी जिंदगी पर नजर ड़ाला।
डोंगरगांव विधानसभा के टेकाहरदी के रहने वाले 25 साल के युवा राजेश भारती बताते है कि मकान निर्माण का काम वह होश संभालने के बाद से कर रहे है। खुले आसमान में ईंट जोडऩे से लेकर वह मकान संबंधी सभी काम कर रहे है। उनका कहना है कि श्रमिकों के लिए सरकारी स्तर पर एक निश्चित दिहाड़ी तय होना जरूरी है। एक ही काम के लिए अलग-अलग जगहों पर मेहनताना में काफी अंतर होता है।
इसी तरह लखोली की कुंती साहू 10 साल से मकान निर्माण में ईंट ढोने का काम कर रही है। कुंती मजदूर दिवस के महत्व से बेखबर है। वह कहती है कि रोजाना काम करने पर ही शाम को घर का चूल्हा जलता है। वह कहती है कि मजदूरी से ही उसका घर चलता है। इधर एक और महिला मजदूर सूरजबाई रजक अपनी स्थिति को लेकर कहती है कि किस्मत में पत्थर-ईंट ढोना लिखा है। सरकारी नीतियों को वह कागजी घोड़ा मानती है। वह कहती है कि शासन स्तर पर मजदूरों को लेकर कई वायदें और योजनाओं को सुनती है। लेकिन गरीबी से उबरने के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना नही है।
इधर शहर में कई होटलों, दुकानों और ठेला चलाने वालों को दिन-रात मेहनत करते देखा जा सकता है। मजदूरों का कहना है कि आर्थिक रूप से ताकतवर वर्ग हमेशा शोषण करने को अपना हक मान रहा है। दिन भर शरीर को झोंकने के बाद भी लोग मेहनताना देने से पहले खरी-खोटी भी सुनाते है। श्रमिक वर्ग ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए अब खुद को अभ्यस्त मानकर जीतोड़ मेहनत को तकदीर का लिखा मान बैठा है।


