रायपुर

ग्रीन गुफा कोई नई या अलग गुफा नहीं- डॉ. विश्वास
04-Feb-2026 4:01 PM
ग्रीन गुफा कोई नई या अलग गुफा नहीं- डॉ. विश्वास

गुफा विज्ञान को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम

से जोड़ा जाना चाहिए

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

रायपुर, 4 फरवरी।  नेशनल केव रिसर्च एंड प्रोटक्शन ऑर्गेनाइजेशन के डा जयंत विश्वास ने कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान के ग्रीन गुफा के संदर्भ में मांग की है कि गुफा विज्ञान को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ा जाना चाहिए। श्री विश्वास ने कहा कि इस संबंध में उन्होंने पीएम मोदी और मानव संसाधन मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से पत्राचार किया है।

 जयंत ने इस संबंध में बुधवार को रायपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि एक सामान्य अनुमान के मुताबिक, कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान में जितनी गुफाएं होंगी, अब तक उसने मात्र 10 प्रतिशत की जानकारी ही हमारे पास उपलब्ध है। अनेकों गुफाएं तो अब तक बाहरी दुनिया के साथ संयोजित ही नहीं हो पाई है। इन गुफाओं को इंतजार रहता है कोई छोटी मोटी प्राक्तिक अस्थिरता का, जिसमे कोई चट्टान ध्वस्त हो और गुफा का सिराना खुल जाए। ग्रीन गुफा कोई नई या अलग में गुफा नहीं है। यह कोटमसर गुफा का पृष्ठभाग मात्र है, जिसे हम पहले ग्रीन चेम्बर कहा करते थे। इसका द्वार डेढ़ से दो सौ साल पहले ही खुला होगा तो ज्यादा पुराना नहीं है।वैसे ग्रीन गुफा का वास्तविक नाम सलमा सितारा रखा गया था, तो को चट्टान के पीछे खोजी द्वारा लिखा भी हुआ है, जो  दिख भी जाएगा। दरअसल बरसात के समय जब  गुफा का मुख्य हरी चट्टान (स्टेल्कटाईट) बरमान के छींटों से भीग जाती है और उस पर सूरज की रोशनी पड़ती है, तब इसमें कुछ झिलमिलाहट सी नजर आती है, शायद गलमा सितारा नाम की यही वजह होगी। डा विश्वास ने कहा कि वे अपने टीम के साथ इस गुफा में अस्सी के दशक से ही लगातार जा रहे हैं।

यहां एक बिंदु विशेष उल्लेखनीय है कि यह गुफा 10से 15मीटर दूर से जितनी मनोरम दिखती है, पास से उतना मनोरम नहीं दिखती।

जयंत ने बताया कि

वर्ष 2017 में  सिद्धार्थ विश्वास ने एक  शोध प्रवंन्ध भी तैयार किया था अपने मास्टर्स डिग्री के लिए, जिसमें में भी शामिल था, उस समय हमने इस गुफा कि मैंपिंग भी की थी। यह गुफा लगभग 20 मीटर ऊंची और लगभग उतनी ही लम्बी पर 30 डिग्री पर झुकी हुई द्वार के द्वारा खुलती है, जिसके तहत इस गुफा के अंदर दिन के समय हमेशा उजाला ही रहता है। इस गुफा को बिना किसी कृत्रिम रोशनी के पर्यटक आराम से देख सकते है। वैसे इस गुफा में हमने पाया था कि अंदर और बाहर के बीच मात्र 2 से 4 डिग्री सेल्सियस का ही फर्क रहता है। जितना कि अंतर घर के बाहर और बरामदे के बीच होता है।

जबसे यह गुफा पर्यटकों को समर्पित होने कि बात उठी है, हम देख रहे है कि कोई न कोई वि?द्वान अपनी राय इसमें दे रहा है। एक विद्वान ने कहा कि, इस गुफा को केवल शोध के उद्देश्य से ही रखा जाए। में पूछना बाहता हूँ कि कौन करेगा शोध ? जिस देश में कहीं भी किसी भी शिक्षा प्रणाली में गुफा विज्ञान को पढ़ाया ही नहीं जाता, वहां से आप गुफा विज्ञान से गुणवत्ता वाले शोध कि आशा करते है? जिस देश के बहुत ही कम प्रोफेसर कभी फील्ड में जाते हो वहां से आप गुणवत्ता वाले शोध कि आशा करते है? हमारे देश के गुफाओं से उपजे अब तक जो भी उल्लेखनीय शोध हुए है, वे सब विदेशी शोधकर्ताओं के सहयोग से ही संभव हुए है, फिर चाहे वह मेघालय पुग हो, पृथ्वी में पाए जाने वाली सबसे बड़ी गुफा मछली हो, या फिर कांगेर पार्टी के दंडक केव से खोजी गई इतिहास का रहस्य हो। आपको शायद ज्ञात हो कि  लैलूंगा में स्थित कुर्रा गुफा से पहचान की गई एक झिंगुर का नाम मेरे नाम पे रखा गया है, उक्त शोध भी एक जर्मन शोधकर्ता के सहायता में ही संभव हे सका था।

किसी विद्वान ने बायोफिल्म के बारे में जिक्र किया, जो कि उच्च आदता वाली गुफाओं में ही संभव हो सकता है, इसके अलावा किसी ने लैम्पन फ्लोरा का भी उल्लेख जिक्र किया है। लैम्पन फ्लोरा का डर सम्भवत वहां होता हे जंहा निरंतर रोशनी उपलब्ध कराई जाती है।


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