रायपुर
इसरो में हमारे युवा वैज्ञानिक ने भी रखी थी करीबी नजर
छत्तीसगढ़ के लिए 23 अगस्त का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। कल शाम चंद्रयान-3 ने चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की. इसको लेकर देशभर में खुशी का माहौल है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों में बैंगलुर से, भिलाई रायपुर बिलासपुर, अंबिकापुर तक चंद्रयान-3 के सफल लैंडिंग पर खुशी के आंसू के साथ मुस्कान देखी जा रही है। इसरो की अलग अलग टीमों में हमारे प्रदेश के युवा वैग्यानिक भी शुमार रहे। किसी ने लॉचिंग राकेट बनाया तो कोई स्पेक्ट्रोमीटर स्थापित किया। अपने होनहारों की उपलब्धि से परिवार, पड़ोसी और समाज भी गौरवान्वित हुआ है। चांद की उड़ान में इनकी भूमिका पढ़े।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 24 अगस्त। अम्बिकापुर का निशांत सिंह इसरो के वैज्ञानिकों की टीम ने ही चंद्रयान-3 में एक उपकरण लगाया है जो चांद पर मिट्टी सहित अन्य तत्वों का अध्ययन करेगा. निशांत के साथ टीम ने अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्टरोमीटर चंद्रयान-3 में स्थापित किया है। इस गौरवपूर्ण उपलब्धि से निशांत के परिजनों समेत समूचा सरगुजा गौरवांवित हैं। निशांत के परिवार के सदस्य आज सुबह से चंद्रयान-3 की सफलता के लिए हवन, पूजन कर रहे थे और सुबह से टीवी के सामने टकटकी लगाए हुए थे।वहीं अब उनके चेहरे पर खुशी झलक रही है।
तीन साल में खूब डांट खाई टेंशन झेला

रायपुर के आर. आदित्य भी है। इन्हें पूरा परिवार मणि के नाम से पुकारता है। और आदित्य ने अपने नाम को आज सार्थक किया। रायपुर में ही पले बढ़े आदित्य ने बचपन में ही तय कर लिया था कि उसे स्पेस साइंटिस्ट बनना है। आदित्य ने हायर सेकंडरी की शिक्षा विशाखापट्टनम में और उच्च शिक्षा त्रिवेंद्रम कॉलेज से पूरी करने के बाद इसरो ज्वाइन किया। आदित्य ने चंद्रयान -2 में भी अहम भूमिका निभाई थी। आदित्य ने बताया था कि उसके बाद से पूरी टीम इसके लिए जुटी हुई थी। जो आज सफल रही।पीएचई मेंं इंजीनियर आर मुरली, और एलआईसी पंडरी में कार्यरत आर.रामलक्ष्मी के पुत्र आदित्य इस लॉचिंग में सैटेलाइट कंट्रोल सिस्टम के साथ लैंडर के लैंडिंग सिस्टम प्रोग्राम टीम के सदस्य है। वह साइंटिस्ट-ई के पद पर और इस प्रोजेक्ट में असिस्टेंट प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत है । कल रात वह दो बजे अपने क्वाटर पहुंचा। उसके पिता ने बीते तीन वर्षों से बेटे की मेहनत, और तनाव को करीब से महसूस किया। कल वह खुशी से रो रहा था। कह रहा था कि तीन साल से बहुत डांट खाई, और टेंशन झेला, चंद्रयान-2 की असफलता के बाद लगभग एक सप्ताह वह ऑफिस में ही रहा। और इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी. शिवन के निर्देशन में उस असफलता की खामियों का पता लगाया।
बिलासपुर की स्वाती कर रहीं थीं मॉनिटरिंग
चंद्रयान के पृथ्वी से लांच होने के बाद से चन्द्रमा की सतह पर पहुंचने तक का कंट्रोल बिलासपुर की स्वाति स्वर्णकार और उनकी टीम के हाथों में था। चंद्रयान थ्री में इनका मुख्य योगदान पोस्ट लांच एंड मिशन सपोर्ट एनालिसिस करना है। जैसे पृथ्वी के अलग-अलग ऑर्बिट को पार करना, पार होते हुए चन्द्रमा और पृथ्वी के बीच उसे ट्रैक करना और चन्द्रमा के ऑर्बिट में चंद्रयान के प्रवेश करते तक का हर एक जरूरी डाटा एनालिसिस का काम स्वाति व इनकी टीम के ही जिम्मे था। स्वाति का इसरो में मुख्य डोमेन, कंट्रोल सिस्टम डिजाइन एंड डेवलपमेंट पर काम करना है। स्वाति ने बिलासपुर के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से बीई की पढाई की, जिसके बाद उन्होंने आईआईटी रुडक़ी से एमटेक पूरी कर आईआईटी कानपुर से फ्लाइट मैकेनिक्स एंड कंट्रोल में पीएचडी पूरी की है। स्वाति बिलासपुर के मेडिकल काम्पलेक्स निवासी रामसिंह स्वर्णकारकी
पुत्री हैं।
विकास, रूपाली भी रहे टीम में
चंद्रयान को कैरी करने वाले रॉकेट को तैयार करने वाली टीम में रहे। वह 07 से इसरो में सेवारत है। विकास कीपूरी पढ़ाई बिलासपुर में हुई । उनके पिता दिनेश श्रीवास रिटायर्ड उद्यानिकी अधिकारी, मां भावना जी लेखिका है। इसी तरह से रूपाली साहू पिता तामेश्वर लाल साहू निवासी प्रदीप्ति नगर बोरसी दुर्ग-भिलाई भी इसरो में वैज्ञानिक है। मंगलयान, चन्द्रयान-2 एवं चन्द्रयान-3 में इनका भी विशेष योगदान है।
बीएमवाई चरौदा के साइंटिस्ट के भरतकुमार की माता, पिता का सेवा समिति के सदस्यों ने सम्मान किया।



