नारायणपुर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
नारायणपुर, 9 अप्रैल। बस्तर के दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्र अबूझमाड़ में वर्षों से जारी ‘चावल की जंग’ अब थमने की कगार पर है। लगभग 3904 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके में, जहां आजादी के दशकों बाद भी बुनियादी सुविधाओं की पहुंच सीमित रही, अब प्रशासनिक पहल से बड़ा बदलाव नजर आने लगा है।
जिला प्रशासन, कलेक्टर नम्रता जैन के नेतृत्व में, अब ग्रामीणों तक सीधे तीन महीने का राशन ट्रैक्टरों के माध्यम से गांव-गांव पहुंचाने की तैयारी कर रहा है। यह पहल उन सैकड़ों परिवारों के लिए राहत लेकर आई है, जिन्हें अब तक राशन के लिए लंबी और जोखिम भरी दूरी तय करनी पड़ती थी।
10 से 45 किलोमीटर तक का सफर, अब गांव में ही सुविधा
अबूझमाड़ क्षेत्र के कई ग्राम पंचायतों में स्थिति यह थी कि ग्रामीणों को राशन लेने के लिए 10 किलोमीटर से लेकर 45 किलोमीटर तक का सफर तय करना पड़ता था।
दिए गए आंकड़ों के अनुसार—ग्राम पंचायत गुडाडी - लगभग 15 किमी, झुरली - लगभग 25 किमी, मसपुरदा - लगभग 45 किमी, कंदाड़ी - लगभग 10 किमी, पोटावाड़ा - लगभग 35 किमी, गुमागाल - लगभग 40 किमी, कोडोली - लगभग 30 किमी, मंडाली - लगभग 20 किमी, जाटलूर - लगभग 35 किमी, हिकुल - लगभग 40 किमी
इन दूरियों ने राशन प्राप्ति को एक कठिन और समयसाध्य प्रक्रिया बना दिया था।
नदी-नालों में हादसे, जान जोखिम में डालकर लाते थे चावल
पूर्व में ग्रामीणों को राशन लाने के दौरान कई बार नदी-नालों को पार करना पड़ता था। विशेषकर बारिश के मौसम में यह सफर और भी खतरनाक हो जाता था।
बीजापुर क्षेत्र में इंद्रावती नदी पार करते समय राशन लेकर लौट रहे ग्रामीणों के हादसों के मामले सामने आए, जिसने इस समस्या को एक ‘काले अध्याय’ के रूप में चिन्हित कर दिया। यह स्थिति बस्तर के ग्रामीण जीवन को झकझोर देने वाली रही है।
अब ट्रैक्टरों से पहुंचेगा तीन माह का राशन
इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन ने अब नई व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ट्रैक्टरों के माध्यम से गांव-गांव तक तीन महीने का राशन पहुंचाया जाएगा। दूरस्थ बस्तियों में डोर-स्टेप डिलीवरी सुनिश्चित की जाएगी। वितरण व्यवस्था को नियमित और पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया है।
राशन दुकानों की स्वीकृति, गांवों में निर्माण की तैयारी तेज
प्रशासन द्वारा अबूझमाड़ के कई गांवों को उचित मूल्य दुकानों की सूची में शामिल करते हुए स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है। गांवों में स्थायी राशन दुकान (पीडीएस) खोलने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। भवन निर्माण और पहुंच मार्ग विकसित करने की दिशा में कार्य शुरू किया गया है।
अन्य जिलों से संचालित हो रही दुकानें
भौगोलिक कठिनाइयों और पहुंच के अभाव के कारण जिले की कुछ राशन दुकानें अभी अन्य जिलों से संचालित की जा रही हैं— छोटे बेटिया (जिला कांकेर), भैरमगढ़ (जिला बीजापुर), गीदम (जिला दंतेवाड़ा)
यह व्यवस्था अस्थायी तौर पर लागू की गई थी, ताकि ग्रामीणों को किसी तरह राशन मिल सके।
सडक़ बनी बदलाव की राह
नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में पहले चरण में सडक़ों का निर्माण प्राथमिकता के साथ किया गया। इन सडक़ों ने प्रशासनिक पहुंच को मजबूत किया और अब उसी का परिणाम है कि राशन जैसी मूलभूत सुविधा गांवों तक पहुंचाई जा रही है।
अबूझमाड़ में बदलती तस्वीर
ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, अबूझमाड़ के गांवों में पहली बार यह स्थिति बन रही है कि ग्रामीणों को अपने ही क्षेत्र में राशन उपलब्ध हो रहा है।
यह पहल न केवल ‘चावल की जंग’ को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह बस्तर के सबसे दुर्गम इलाके में विश्वास और विकास की नई शुरुआत भी है।


