मनेन्द्रगढ़-चिरिमिरी-भरतपुर
खरगोश पकडऩे की दौड़ में इंद्रावती प्रथम
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
मनेंद्रगढ़, 7 मार्च। प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी मनेंद्रगढ़ विकासखंड के ग्राम पंचायत ताराबहरा के आश्रित ग्राम बैरागी में शुक्रवार को रोमांचक खेल स्पर्धा का आयोजन किया गया। प्रकृति से जुड़े इन खेलों को देखने के लिए न केवल स्थानीय ग्रामीण, बल्कि दूर-दराज से भी बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और बच्चे बैरागी पहुंचे।
एमसीबी जिला मुख्यालय से लगभग 35 किमी दूर स्थित ग्राम बैरागी में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। शुक्रवार, 6 मार्च को आयोजित इस उत्सव की शुरुआत गांव की महिलाओं द्वारा जंगल के नदी-नालों से केकड़ा और मछली पकडऩे के साथ हुई। आयोजन स्थल पर प्लास्टिक बिछाकर एक कृत्रिम (ऑर्टिफिशियल) तालाब बनाया गया और उसमें मछलियों व केकड़ों को छोड़ा गया। इन जलीय जीवों को पकडऩे के लिए गांव के पुरुषों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा हुई। ग्रामीणों का मानना है कि इस खेल से गांव में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। स्पर्धा का सबसे रोमांचक हिस्सा खरगोश पकडऩे की प्रतियोगिता रही, जिसमें केवल महिलाओं ने हिस्सा लिया। खुले मैदान में खरगोश को छोड़ा गया और लगभग 20 महिला प्रतिभागियों ने उसे पकडऩे के लिए दौड़ लगाई। काफी मशक्कत और भाग-दौड़ के बाद ग्राम कचोहर निवासी इंद्रावती ( 45) ने फुर्ती दिखाते हुए खरगोश को पकड़ लिया और प्रथम स्थान प्राप्त किया।
प्रतियोगिता की संवेदनशीलता को देखते हुए, खेल संपन्न होने के बाद खरगोश को सुरक्षित वापस जंगल में छोड़ दिया गया। इस पारंपरिक खेल के नियम भी बेहद दिलचस्प और कड़े हैं। यदि ऑर्टिफिशियल तालाब में मछली और केकड़ा पकडऩे के दौरान किसी पुरुष प्रतिभागी को केकड़ा काट लेता है, तो उसे दंड स्वरूप आयोजन समिति को 1000 रुपए नकद या एक बकरा जुमनि के तौर पर देना पड़ता पड़ता है। यही नियम महिलाओं की खरगोश पकड़ो स्पर्धा पर भी लागू होता है। यदि कोई भी महिला खरगोश पकडऩे में विफल रहती है, तो उन्हें भी जुर्माना भरना पड़ता है। ताराबहरा के पूर्व सरपंच शिव प्रसाद बताते हैं कि यह रिवाज उनके जन्म के पूर्व से चला आ रहा है। उन्होंने कहा, यदि कभी जंगल में खरगोश नहीं मिलता, तो मुर्गे के साथ यह प्रतियोगिता संपन्न कराई जाती है, लेकिन परंपरा कभी नहीं टूटती। प्रतियोगिता के समापन के बाद पूरे गांव के लिए सामूहिक भोज का आयोजन किया गया। सामूहिक सहभोज के साथ ही बैरागी में रंगों और उमंग के पर्व होली का आधिकारिक समापन हुआ। यह आयोजन न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह वनांचल क्षेत्रों में मानव और प्रकृति के बीच के गहरे जुड़ाव और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक अनूठा उदाहरण भी पेश करता है।


