महासमुन्द
अंतरराष्ट्रीय अभिलेख-पुरालेख दिवस पर विशेष
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुंद, 9 जून। आज 9 जून को अंतरराष्ट्रीय अभिलेख पुरालेख दिवस है। आज पूरी दुनिया अपनी प्राचीन विरासतों को याद कर रही है और हम महासमुंद के बारे में बता दें कि महासमुंद जिले ने देश के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक सुनहरी लकीर खींची है। महासमुंद जिले के घने जंगलों और आदिवासी बस्तियों के भीतर एक ऐसी दुनिया मिली है,जो सदियों से ताड़पत्रों पर उकेरी गई थी। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान के तहत महासमुंद ने छत्तीसगढ़ राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया है।
यहां कई पांडुलिपियां मिली हैं जो 300 साल से अधिक पुरानी हैं, जिन्हें धातु के नुकीले औजारों से ताड़ के पत्तों पर उकेरा गया है। इनमें से कुछ ग्रंथ सचित्र भी हैं, जिनकी कलाकारी आज भी स्पष्ट दिखाई देती है। महासमुंद जिले के घने जंगलों और आदिवासी बस्तियों के भीतर एक ऐसी दुनिया मिली है,जो सदियों से ताड़पत्रों पर उकेरी गई थी। इस ज्ञानभारतम् अभियान के तहत जिले में 3286 दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गई हैं,जो हमारी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का प्रमाण हैं। सर्वेक्षण में सामने आया है कि ये पांडुलिपियां केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि ये तत्कालीन समाज के एनसाइक्लोपीडिया हैं।
बागबाहरा ब्लॉक और कोमाखान के जनजातीय क्षेत्रों में मिले इन ग्रंथों में अद्भुत जानकारियां छिपी हैं। इनमें भागवत पुराण, लक्ष्मी पुराण और दुर्गा ग्रंथों के साथ-साथ ज्योतिष, पारंपरिक जड़ी-बूटी चिकित्सा आयुर्वेद, पशु चिकित्सा और तंत्र.मंत्र शामिल हैं। अधिकांश ग्रंथ उडिय़ा भाषा और गोलाकार मुंडिय़ा लिपि में लिखे गए हैं। पांडुलिपि सर्वेक्षण के जिला नोडल अधिकारी रेखराज शर्मा के नेतृत्व में टीमों ने गांव-गांव जाकर इन धरोहरों को सूचीबद्ध किया।
कलेक्टर के मार्गदर्शन में गठित समिति ने न केवल ग्रंथों को खोजा, बल्कि ज्ञानभारतम ऐप के माध्यम से उनका पंजीकरण और डिजिटलीकरण भी सुनिश्चित किया। इससे पहले वर्ष 2007 में डॉ.विजय शर्मा ने 172 पांडुलिपियां खोजी थीं, जिन्हें अब 2026 में पुन: ट्रैक कर डिजिटल स्वरूप दिया। महासमुंद के ग्रामीणों के पास इन ग्रंथों को सहेजने का अपना विज्ञान है। भले ही संरक्षक बहुत अधिक शिक्षित न हों, लेकिन उनके लिए ये ग्रंथ किसी देवता से कम नहीं हैं। ग्रामीण इन ग्रंथों को पवित्र वस्त्रों में लपेटकर घर की पाटी ;छत के नीचे का हिस्साद्ध में रखते हैं। खास बात यह है कि रसोई से निकलने वाला धुआं प्राकृतिक कीटनाशक का काम करता है, जिससे ताड़पत्रों को कीड़े नहीं लगते। वे आज भी इन ग्रंथों की पूजा करते हैं और विशेष अवसरों पर इन्हें पढ़ते हैं।
ज्ञानभारतम् अभियान के तहत जिले में 3286 दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गई हैं
यहां कई पांडुलिपियां मिली हैं जो 300 साल से अधिक पुरानी हैं, जिन्हें धातु के नुकीले औजारों से ताड़ के पत्तों पर उकेरा गया है


