महासमुन्द
हवा में प्रदूषण भी बढ़ रहा
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुंद, 28 मई। जिला मुख्यालय से सटे गांवों में रबी फसलों की कटाई के बाद किसान खेतों में बची पराली हटाने आग लगा रहे हैं। प्रशासन की स्थिति नियंत्रण से बाहर नजर आ रही है। जिले के ग्राम बेमचा, खरोरा, मचेवा, बम्हनी, चिंगरौद, लाफिन खुर्द और बरोंडाबाजार सहित दर्जनभर गांवों में पराली जलाने का सिलसिला जारी है। खेतों से उठता धुआं अब पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है। पराली जलाने से आसपास के गांवों में आग भी लग चुकी हैं। जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की कार्रवाई केवल गांवों में मुनादी कराने तक सीमित रह गई है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने पराली जलाने पर पूरी तरह रोक लगाते हुए जुर्माने का प्रावधान किया है। लेकिन मैदानी अमले की निष्क्रियता के चलते नियम केवल कागजों तक सीमित दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलने से कार्बन डाइऑक्साइडए कार्बन मोनोऑक्साइड और पीएम 2.5 व पीएम 10 जैसे खतरनाक कण बड़ी मात्रा में हवा में घुल रहे हैं। इससे एयर क्वालिटी इंडेक्स एक्यूआई बिगड़ रहा है और वातावरण में धुंध बढऩे लगी है।
महासमुंद जिले के बेमचा, खरोरा समेत दर्जनभर गांवों के लोगों में सांस संबंधी बीमारी का खतरा बढ़ा है। जिला मुख्यालय के आसपास गांवों में खेतों की पराली में आग लगाने के बाद आग की लपटें दूर तक धधकती नजर आती हैंं। इससे पिछले दिनों ग्राम लाफिन खुर्द में बरोडा बाजार मार्ग के पास एक खेत में लगाई गई आग की लपटें रिहायसी इलाके में ग्रामीण जगदीश साहू की बाड़ी तक पहुंच गई थी और इससे बाड़ी में रखे 55.60 ट्राली पैरा और दो बैल बुरी तरह झुलस गए थे। ग्रामीणों ने मशक्कत करके आग पर काबू पाया। इसी तरह बीते सोमवार को बसना क्षेत्र के गढफ़ूलझर के धान संग्रहण केंद्र में आग लगने की घटना में लगभग 90 हजार रुपए की क्षति हुई है। इस मामले में धान संग्रहण केंद्र बसना के केंद्र प्रभारी ने थाना बसना में अज्ञात व्यक्ति के विरूद्ध एफआईआर दर्ज भी किया है और मामले की जांच की जा रही है।
कृषि और वन विभाग लगातार किसानों को सचेत कर रही है कि पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। पकी हुई मिट्टी बंजर हो जाती है और इसमें कोई भी बीज नहीं उगता। आग से खेतों में मौजूद लाभकारी जीवाणु और सूक्ष्म जीष नष्ट हो जाते हैं। पीएम 2.5 पीएम 10 सांस और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं। एनजीटी ने भी पराली जलाने पर प्रतिबंध व जुर्माने का प्रावधान किया है। कलेक्टर विनय लंगेह ने अपील की है कि किसान अपने खेतों में परावली न जलाएं। खेतों में पराली जलाने से आगजनी की बड़ी घटनाएं हो सकती हैं। इससे जन.धन व पर्यावरण को भी नुकसान होता है। उन्होंने निर्देश दिए कि कोटवारों के माध्यम से गांवों में मुनादी कराई जाए। किसानों को जागरूक किया जाए। एसडीएम व तहसीलदारों को इस संबंध में कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक साकेत दुबे कहते हैं कि पराली जलाने से मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। पराली को वेस्ट डिकम्पोजर की मदद से खेत में ही सड़ाएं तो बेहतरीन जैविक खाद बन सकती है। वहीं आग से जमीन की ऊपरी सतह पर मौजूद केंचुए, मित्र कीट और सूक्ष्म जीव्यणु जलकर मर जाते हैं। साथ ही धुएं से लोगों को आंखों में जलन, गले में खराश और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं आ रही है। इस पर सीएमएचओ डॉ.आई नागेश्वर राव ने बताया कि हवा में फैल रहा यह धुआं फेफड़ों के लिए बेहद खतरनाक है। अस्पतालों में अस्थमा, बोंकाइटिस और सांस के मरीजों में करीब 20 पीसदी का इजाफा हुआ है।


