महासमुन्द

अक्ती: शीतला-ठाकुर देव को दोने में धान समर्पित कर खेती की शुरुआत, गुड्डे-गुडिय़े की शादी भी
19-Apr-2026 5:01 PM
अक्ती: शीतला-ठाकुर देव को दोने में धान समर्पित कर खेती की शुरुआत, गुड्डे-गुडिय़े की शादी भी

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुंद,19अप्रैल।
रविवार को गांवों में अक्षय तृतीया (अक्ती) का पर्व मनाया जा रहा है। सुबह सोकर उठते ही स्नान आदि करके गांव की शीतला मंदिर-ठाकुर देव में ग्रामीण किसान पहुंचे और दोना में धान के बीज रखकर पूजा की। बीज के साथ साथ ग्रामीण हल्दी और तेल भी लेकर गये और माता सीतला को अर्पण किया। इसके बाद माता को अर्पित बीज के दोने सहित ले जाकर किसानों ने खेतंो में छिडक़ाव किया।
चलन है कि आज के ही दिन से खेती किसान का काम शुरू हो जाता है। बच्चे गुड्डे गुडिय़े की शादी भी आज के ही दिन करते हैं और घरों में नये घड़े में पानी भरकर पितरों को तर्पण किया जाता है।
अक्षय तृतीया को लेकर छत्तीसगढ़ के गावों और शहरों में अलग-अलग परंपराएं हैं। गांवों में अक्षय तृतीया अक्ती के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि साल में आज के दिन महामुहूर्त होता है। इसे अबूझ मुहुर्त भी कहा जाता है।
गांवों के लोग आज भी मानते हैं कि आज के दिन की गई शादी टूटती नहीं है, खरीदे हुए सोने चांदी और कीमती सामान अक्षय रहता है। अत: जिन परिवारों में विवाह योग्य बेटे-बेटी होते हैं, उनके लिए अच्छा रिश्ता ढूंढकर अक्षय तृतीया के दिन विवाह कराया जाता है।
गांवों में बच्चे नकली दूल्हा-दुल्हन मतलब गुड्डे-गुडय़ा का ब्याह रचााते हैं। छोटे बच्चे बाजार से गुड्डा-गुडिय़ा खरीदकर लाते हैं और परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर उनके विवाह रचाने का खेल खेलते हैं। गुड्डे गडिय़े के विवाह से पूर्व बकायदा देवी-देवताओं का आह्वान करके शीतला तालाब से मिट्टी लाने की रस्म निभाई जाती है। इसे चूलमाटी रस्म निभाना कहते हैं। इसके अलावा अनेक रस्म निभाई जाती है, जिनमें गुड्डे गुडिय़ा को उबटन, तेल, हल्दी लगाने, बारात परघनी, मौर.मुकुट बांधने,सात फेरे लेने,दुल्हन की बिदाई और ससुराल में दुल्हन का स्वागत करने की रस्में शामिल हैं।
महासमुंद नगर पंडित पंकज तिवारी का कहना है कि हिंदू पंचांग में एक वर्ष में चार ऐसे मुहूर्त हैं, जिनमें पंचांग देखे बिना शुभ संस्कार संपन्न किया जा सकता है। इनमें माघ माह में वसंत पंचमी, कार्तिक माह में देवउठनी एकादशी और भड़ली नवमी तथा वैशाख माह में अक्षय तृतीया को विशेष महत्व दिया गया है। कई घरों में मिट्टी के नये घड़े का पानी भी आज से पीना शुरू करते हैं। नये घड़ों में पानी भरकर उसमें क्वांरी धागा लपेटकर कुलदेवता की पूजा की जाती है जिसमें आम की कैरी रखी जाती है।  चूंकि छत्तीसगढ़ में प्रकृति पूजा का महत्व सबसे ऊपर है। अत: घरों में आज के दिन प्रकृति पूजा करके शुभ कार्योंक ी शुरआत होती है। इन कामों में सबसे बड़ा काम किसानी का है।


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