महासमुन्द
सडक़ दुर्घटना ने अचल किया लेकिन जिद ने जिंदा रखा
उत्तरा विदानी
महासमुंद, 6 अप्रैल(‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। पूरे छह साल बाद महासमुंद की तेजस्वी सडक़ों से गुजरने लगी है। वह रोज सुबह दफ्तर जाती है, दिन भर दिव्यांग बच्चों को पढ़ाती है और शाम ढले वापस अपनी मां के पास लौट जाती है। उस मां के पास जिन्होंने सडक़ दुर्घटना अचल हो चुकी तेजस्वी को वापस जीवनदान दिया, चलने फिरने की हिम्मत दी। तेजस्वी अचल होकर भी अपने हिम्मत की बदौलत आर्थिक रूप से सक्षम हो चुकी है। अब उसे कोई भी दु:ख हरा नहीं सकता। पूरा शहर तेजस्वी की हिम्मत को दाद देता है।
ग्राम मचेवा महासमुंद की तेजस्वी बचपन से दिव्यांंंंंंंंंंंग नहीं है। मां ने उनके चेहरे में तेज देखकर ही उनका नाम तेजस्वी रखा था। साढ़े पांच फीट ऊंचाई वाली सांवली सलौनी तेजस्वी अगस्त 2020 में कॉलेज की परीक्षा देने महासमुंद से रायपुर जा रही थी। तभी एक सडक़ दुर्घटना में उसे स्पाइनल कार्ड एंजुरी हुई और वह अचल हो गई। महीनों बिस्तर में पड़े-पड़े उसका शरीर खराब होने लगा। ...लेकिन न तो तेजस्वी ने हार मानी और न ही मां ने। वह रोजी मजदूरी करके भी तेजस्वी का इलाज कराती रही। इलाज तो नाम मात्र का था लेकिन वह तेजस्वी को हर वक्त हौसला देती और कहती ...मैं साथ हूं न..तुम ठीक हो सकती हो।
तेजस्वी भी कहां हार मानने वाली थी? घटना के पंद्रह दिन बाद उसका आपरेशन हुआ तो वह बिस्तर पर रहकर ही कॉलेज परीक्षा की तैयारी करने लगी। एक हाथ काम नहीं करता था, उसने एक हाथ से ही वक्त से जीतने की जंग शुरू किया। मां के सहयोग से चंडीगढ़ जाकर ट्रेनिंग ली कि दिव्यांगों के लिए निर्मित बाइक का संचालन कैसे कि या जाता है। उसका हौलसा अटल था। वह पहले की तरह सडक़ों पर सरपट तेज चलना चाहती थी, अपने हांथों में कलम पकडक़र लिखना चाहती थी, दिनचर्या के सारे काम खुद ही करना चाहती थी। कहते हैं न कि कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो इंसान कड़ी चुनौतियों को पार कर कुछ ऐसा कर गुजरता है कि वह प्रेरणा बन जाता है। तेजस्वी ने भी यही किया। पीजी की परीक्षा एक हाथ से दिलाई और पास भी हो गई।
यह बात जब समाज कल्याण विभाग की उप संचालक संगीता सिंह को पता चला तो वह तेजस््वी मिलने उनके घर गर्इं और बहु विकलांग संस्था में दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा। तेजस्वी तैयार हो गईं। आज वह अपने परिवार के लिए आर्थिक संबल बनी हुई है। हालांकि तेजस्वी अब भी दिनचर्या के कामों के लिए मां पर निर्भर है। आज भी हर सुबह मां ही तेजस्वी को नहलाती है, तैयार करती है और स्पेशल बाइक पर बिठाती हैं। इसके बाद एक हाथ से ही तेजस्वी बाइक चलाते चार किलोमीटर दूर बहु विकलांग केन्द्र पहुंचती हैं। दिन भर काम करने के बाद वह वैसे ही वापस मां के पास लौट आती हैं।
इस तरह तेजस्वी की जिंदगी का सफर थोड़ा से मुमकिन हुआ है। इस बेहद मुश्किल दौर में भी तेजस्वी आशा की डोर थामे मुश्किलों को आसान बनाने की जिद में है। उसे यकीन है कि एक दिन सब कुछ ठीक होगा। उसका दर्द और चेहरे का भाव बताता है कि शारीरिक तौर से अक्षम होने के पश्चात भी वह अपने साहस और मजबूत इरादों के दम पर अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकती है।
अपने भीतर एक पूरा समंदर समेटे तेजस्वी जब बहु विकलांग केन्द्र में प्रवेश करती हैं तो दिव्यांग बच्चे उनसे लिपट जाते हैं। उन बच्चों की मुस्कान के बीच वह हर आघात के बाद और मज़बूत होती हैं। आज भी समाज उसे सवालों की नजऱ से देखता है। लेकिन तेजस्वी अपने उत्तर खुद गढ़ती है, उसके हौसले डगमगाते ज़रूर हैं, मगर पस्त नहीं होते। यह कहानी उनकी साहस की है जो एक प्रतीक है, जो जीने की जिद में दिव्यांग होकर भी पूरा आकाश बन गई हैं। दफ्तर के अधिकारी बताते हैं कि दिव्यांग बच्चे तेजस्वी की बातें खूब समझते हैं। वह सभी बच्चों को बहुत ही प्यार से समझाती हैं। बच्चे उन्हें घेरे रहते हैं और तेजस्वी कभी उनसे नाराज तक नहीं होती।
तेजस्वी ने ‘छत्तीसगढ़’ से बातचीत में स्पष्ट किया कि दिव्यांग होकर भी मैं नार्मल बच्चों के लेबल में रहना चाहती हूं। मैं जो हूं आज मां के कारण हूं। मुझे उनकी मेहनत का अहसास है। उनके जैसा इस दुनिया में कोई नहीं। हालांकि मुझे पता है कि मैं कभी अपने से बैठ नहीं पाऊंगी। मेरे पेट में सर्वाइकल को सीधा रखने के लिए एक मशीन लगा हुआ है। जिसमें हर तीन महीने में दवाई डालना पड़ता है। ........बावजूद इसके मुझे पता है कि ङ्क्षजदगी बेहद खूबसूरत है और इसे उतनी ही खूबसूरती से निभाऊंगी भी।


